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समालोचन

Home » परम्परा, आधुनिकता तथा समकालिकता: राधावल्लभ त्रिपाठी

परम्परा, आधुनिकता तथा समकालिकता: राधावल्लभ त्रिपाठी

“ऋषि जा चुके थे. मनुष्यों ने देवताओं से पूछा, अब हमारा ऋषि कौन होगा? देवताओं का उत्तर था. अब तर्क तुम्हारा ऋषि होगा. यास्क इस कथा के अंत में जोड़ते हैं कि जो ऊह-अभ्यूह करता है, वह भी ऋषि हो जाता है.” यह कथा मानो हमारी सांस्कृतिक चेतना की उपस्थिति का रूपक है, जहाँ परम्परा और आधुनिकता केवल दो विचारधाराएँ नहीं, बल्कि एक निरंतर, जटिल और कभी-कभी असहज संवाद में बदल जाती हैं. परम्परा अतीत का संग्रहीत अवशेष भर नहीं रहता, अर्थ, भाषा और स्मृति की सतत पुनर्रचना बन जाता है. आधुनिकता परम्परा का आलोचनात्मक पुनर्पाठ ही तो है. और इन्हीं दोनों के बीच समकालिकता, एक ऐसा बेचैन मध्यस्थ, जिसमें वैश्विकता, स्थानीयता और हस्तक्षेप एक साथ सक्रिय रहते हैं. राधावल्लभ त्रिपाठी को पढ़ना इसी त्रिकोण में प्रवेश करना है, जहाँ परम्परा समय के बोझ से नहीं, अपने पुनः व्याख्यायित अर्थों से जीवित होती है. कालिदास के प्रसंगों में गौण समझे गए पात्रों की आवाज़, उनकी उपस्थिति और उनकी ऐतिहासिक केन्द्रीयता को जिस संवेदनशीलता और बौद्धिक स्वच्छता से उन्होंने उजागर किया है, वह केवल एक विद्वत कर्म नहीं, बल्कि इस विश्वास का प्रमाण है कि परम्परा तब ही जीवित रहती है जब वह स्वयं को आधुनिकता के प्रश्नों और समय के संशयों के सामने रखती है. यह आलेख उसी संवाद को समझने और पुनः पढ़ने का प्रयास है. आलेख प्रस्तुत है.

by arun dev
November 22, 2025
in आलेख
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परम्परा, आधुनिकता तथा समकालिकता: राधावल्लभ त्रिपाठी
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परम्परा, आधुनिकता तथा समकालिकता
(कालिदास के सन्दर्भ में)


राधावल्लभ त्रिपाठी

परम्परा किसे कहते हैं? व्युत्पत्तिजन्य अर्थ की दृष्टि से परम्पर में टाप् प्रत्यय लगा कर परम्परा शब्द बना है. परम्पर का विग्रहार्थ है- ‘परं पिपर्तीति परम्परः

तारानाथ तर्कवाचस्पति के अनुसार परम् अतिशयेन पृणाति, पिपूर्ति वा इति परम्परः. आशय यह कि पहले के अभ्यास बाद में जन्मे अभ्यासों को सँभालें, परिपुष्ट करें या परिमार्जित करें, तो यह प्रक्रिया परम्परा है. इसके लिये नैरन्तर्य अनिवार्य है. एक के बाद दूसरे का आते जाने का सिलसिला तथा पूर्ववर्ती तथा उत्तरवर्ती में पोष्यपोषक भाव होना परम्परा बनाता है. जो बीत गया है, वह आने वाले को पोसता है. परम्परा के पीछे यह जो सातत्य या सिलसिला है, वह किसी देश, समाज, जाति या व्यक्ति को जिलाये रखने के लिये आवश्यक होता है. सातत्य यदि परम्परा का लक्षण है, तो ठहराव उसका विलोम है. परम्परा बहती धारा है, वह रुक कर पोखर बनने लगे, तो रूढ़ि हो जाती है, या अनुष्ठान, रीति-रिवाज में सिकुड़ जाती है.

परम्परा सिलसिले को रचती है. इस सिलसिले को कोई समाज अपने समय में लागू करता है, परखता है तो आधुनिकताओं का निर्माण होता है. परम्परा के दो पक्ष हैं–  एक में वह प्राचीन को सहेजती है, दूसरे में वह प्राचीन को ताज़ा करती चलती है. इसलिये जो कुछ प्राचीन है, वह ही परम्परा है और जो कुछ नया हुआ है, वह परम्पराबाह्य है– ऐसा नहीं कह सकते.  पुराने को सहेजना और पुराने को नया करना या नये समय में उसका पुनराविष्कार करना- ये दो प्रवृत्तियाँ परम्परा में अन्तर्गर्भित हैं. केवल पुराने को ही सहेजती रहे, तो परम्परा नहीं रहेगी, वह सङ्कलन, पुरातत्त्वसङ्ग्रहालय, रूढ़ि या प्रथा बन जायेगी. इसलिये परम्परा स्वतः आधुनिक होती चलती है.

तब परम्परा का आधुनिकता से विरोध नहीं रहता, दोनों में सङ्गति और अन्ततः सायुज्य भी हो जाता है. परम्परा अपने को निरन्तर नया करती है, उसका नया होते जाना ही आधुनिकता है. परम्परा में आधुनिकता संसक्त है, आधुनिकता में परम्परा. एक के बिना दूसरी हो नहीं सकती. परम्परा के गर्भ से आधुनिकताएँ जन्म लेती हैं, तो प्रायः आधुनिकताएँ भी परम्पराओं का निर्माण करती चलती हैं. दोनों एक ही सिक्के के दो पहलुओं की तरह हैं, पहला पहलू सामने रहता है, तो उसे परम्परा का चेहरा बता दिया जाता है दूसरा सामने हो तो आधुनिकता का.

काल के पौर्वापर्य की दृष्टि से दोनों में अन्तर करना भी समीचीन नहीं है. जो आज आधुनिक है वह कल पुराना हो सकता है. जो पुराना हो गया और चला आ रहा है, वह सदैव परम्परा नहीं हो जाता, जो नया उसके साथ उसके समानान्तर आ रहा है, केवल इसलिये वह आधुनिक नहीं हो जाता कि वह काल की दृष्टि से परवर्ती है. आधुनिकता परम्परा का पुनरन्वेषण है, वह परम्परा का उत्तर पक्ष है. परम्परा में अपने आप को नया करते जाने  अन्तर्निहित शक्ति होती है, परम्परा ही आधुनिकता होती रहती है.

परम्परा आधुनिकता का परिमार्जन करती है, आधुनिकता को सँभाल लेती है. आधुनिकता भटक सकती है, परम्परा उसे रास्ता दिखा देती है. आधुनिकता परम्परा को रूढ़ि मात्र में कैद हो जाने से बचाती चलती है, वह परम्परा के नाम पर एकत्र कचरे को बुहार देती है. आधुनिकता के आलोक में परम्परा भी अपने को संशोधित करती है. आधुनिकता ताजी हवा के झोंके की तरह आती है.

आधुनिकता शब्द ‘अधुना’- इस अव्यय से बना है. अधुना का अर्थ हो अब या इस समय. अधुना में ठञ् प्रत्यय लगा कर आधुनिक शब्द बनता है. जो अधुना या इस समय जन्मा है वह आधुनिक है. आधुनिक होने का भाव आधुनिकता है. हम अपने समय को समझते हैं परखते हैं यह आधुनिकता है पश्चिम के विमर्श में आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता विशिष्ट अर्थों में इस्तेमाल होते हैं. वहाँ दो महायुद्धों की विभीषिका झेल चुके योरोप के मानस में उपजा मोहभङ्ग, विरोध और खीझ का भाव आधुनिकता में विच्छुरित है.

भारत के सन्दर्भ में इसे आधुनिकता क्यों माना जाये? काल की अखण्ड धारा में जो जो आधुनिक है समाता जाता है, और एक अव्याहत प्रवाह का बोध बना रहता है.  पश्चिम में परम्परा और आधुनिकता के बीच एक खाई बन गई है, जिसके कारण कई बार परम्परा से छूट ले कर उसका कुछ उलट करना आधुनिकता मान लिया गया है. हमारी आचार्य-परम्परा पुराने चिन्तकों और कवियों को उद्धृत करते उनका विमर्श करती है, उसी के क्रम में आचार्य अपने समय में हो रहे विमर्श को खोलते हुए कहते हैं– इत्याधुनिकाः – इस समय के विचारक या कवि ऐसा-ऐसा कहते हैं. इस तरह हमारे आचार्य या विचारक परम्परा और आधुनिकता के बीच में संवाद देखते हैं. अभिनवगुप्त आदि दार्शनिक अभिनवभारती जैसे अपने ग्रन्थों में चिरनन्तनास्तु–चिरन्तन या पुराने जमाने के लोग ऐसा कहते आये हैं– यह कह कर परम्परानुसार चले आ रहे व्याख्यानों को सन्दर्भित करते हैं, उनके साथ में अपने समय के विचारकों की भी परवाह करते हैं.  इस तरह हमारे वैचारिक विश्व में परम्परा और आधुनिकता को एक दूसरे के पासङ्ग में रख कर देखा जाता रहा.

तथाकथित छद्म आधुनिकताएँ परम्परा का नकारात्मक विरोध करती हैं. परम्पराएँ रूढ़ियाँ बन कर आधुनिकता के सहज प्रवाह को बलात् छेंकने लगती हैं. परम्परा और आधुनिकता में दूरियाँ और कटुताएँ बलात् पैदा की जाती हैं. दोनों में स्वस्थ संवाद होते रहना ही दोनों के होने को चरितार्थ करता है. परम्परा और आधुनिकता के द्वन्द्वात्मक सम्बन्धों के तानेबाने से परस्पर पूरकता की नई सम्भावनाएँ बनती हैं, परम्परा के सातत्य और गतिशीलता की वल्लरियाँ जोखिम और साहस के श्रमजल से सींची जाती है.

परम्परा में ग्लानि और मूर्च्छा आने लगती है, तो आधुनिकता उसमें नये प्राण फूँकती है. परम्परा में ग्लानि और हानि के प्रसङ्ग प्रत्येक युग में आते रहे हैं और आधुनिकों के नवीन स्फुरण के द्वारा उनका निवारण किया जाता रहा है.

 

2.

समकाल से समकालिक और समकालिकता शब्द बने हैं. अंग्रेजी के कण्टेपोरेरी तथा कण्टेपोरेनाइटी के अर्थ में इनका प्रयोग होता है. संस्कृत व्याकरण के अनुसार तो समकालिकता में वस्तुओं के समानान्तर रूप से एक साथ चलने का अर्थ निहित है. हमारा अपने समय के साथ चलना, अपने समय को समझना और उसे साहित्य या कला में निरूपित कर के उस पर विमर्श रचना समकालिकता है. यह विमर्श जहाँ होता है वहाँ समकालिक बोध बनता है. प्राचीन साहित्य को भी यदि हम अपने समय में रख कर उसके सन्दर्भ से नये रूप में ग्रहण करते हैं तो यह प्राचीन साहित्य की समकालिकता है.

इस तरह समकालिकता का दोहरा अर्थ हो जाता है. कोई रचनाकार अपने खुद के समय को जानता परखता है और रचना में उसे विन्यस्त करता है, यह उसकी अपने समकाल की अपेक्षा से समकालिकता है. वही रचनाकार हमारे समय को किस सीमा तक सम्बोधित करता है– यह उसकी हमारे लिये समकालिकता है.

इसतरह परम्परा आधुनिकता और समकालिकता– ये तीनों प्रत्यय एक दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं, और उनकी परिधियाँ एक दूसरे में अनुप्रविष्ट होती रहती हैं. जो सही मायने में समकालिक है, वही आधुनिक भी हो सकता है और वही परम्परा भी बना सकता है. इस लेख में कालिदास को ले कर हम उनके पारम्परिक बोध, आधुनिक बोध और समकालिक बोध पर विचार करेंगे.

संस्कृत साहित्य के कम से कम पाँच-छह हजार वर्षों के इतिहास में कालिदास सन्धिकाल पर खड़े हुए हैं. रामकरण शर्मा उनको उचित ही सान्ध्यकवि कहते हैं. सन्ध्या का अर्थ सन्धि या जुड़ाव से बना हुआ समय है. सन्ध्या से आशय सङ्क्रान्ति से है. कालिदास सङ्क्रान्ति के कवि हैं. कालिदास सन्धि या जुड़ाव के कवि हैं. वे दो युगों के बीच के जुड़ाव पर खड़े हैं. ऋषियों का समय बीत गया. मन्त्रों का काल समाप्त हुआ.

दिन और रात जहाँ मिलते हैं वह समय सन्ध्या है. रात ढलती है और दिन आने को होता है, उस समय को पूर्वसन्ध्या कहा जाता है. दिन ढलता है, रात आने को होती है, उस समय को पश्चिम सन्ध्या कहा जाता है कालिदास संस्कृत साहित्य के आकाश में पूर्वसन्ध्या के कवि हैँ. शर्मा जी ने उनके लिये सान्ध्यकवि यह एक कविकोटि ही बना दी है, जो सटीक बैठती है.

ईसा से सात करीब सौ साल पहले यास्क अपने निरुक्त नामक ग्रन्थ में इस सङ्क्रान्ति को ले कर एक कथा बताते हैं.

ऋषि जा चुके थे. मनुष्यों ने देवताओं से पूछा कि अब हमारा ऋषि कौन होगा? देवताओं ने कहा कि अब तर्क तुम्हारा ऋषि होगा. इतनी कथा बता कर यास्क कहते हैं कि जो ऊह और अभ्यूह करता है वह भी ऋषि हो जाता है.

ऊह तर्क है, अभ्यूह उस तर्क को सतेजस्क और सार्थक बना कर परिणाम तक पहुँचना है. हर बड़ा रचनाकार परम्परा और समकालिकता दोनों का ऊह औऱ अभ्यूह करते हुए आधुनिक होता है. कालिदास यही करते हैं.

रघुवंश महाकाव्य के आरम्भ में कालिदास कहते हैं कि कहाँ तो सूर्य से जन्मा महान् वंश, कहाँ मेरी छोटी-सी बुद्धि. मैं मोह के कारण दुस्तर सागर को एक डोगी से पार करना चाह रहा हूँ. वे यह नहीं कहते कि दुस्तर सागर को पार करने का मोह छोड़ दूँगा, इसकी आकाङ्क्षा त्याग दूँगा. वे एक अर्थ में हेमिङ्ग्वे के उपन्यास के नायक की तरह हैं. अर्नेस्ट हेमिंग्वे के उपन्यास ‘दि ओल्डमेन एंड द सी’ में क्यूबा का एक मछुआरा सेंटियागो  सागर से भिड़ंत में बार-बार चोट खा कर भी उसे अपना बन्धु बताता रहता है. फर्क दोनों में बहुत ज्यादा है. सैंटियागो को सागर से जूझते रहने के बाद एक दैत्याकार मछली का अस्थिपञ्जर भर मिलता है, कालिदास दुस्तर सागर पार करते हैं.

 

 

3.

हमारी आचार्य परम्परा वाल्मीकि की रामायण और व्यास के महाभारत की काव्यकोटि बाकी सारे साहित्य के अलग निर्धारित करती है. ये दोनों आर्ष काव्य हैं. आर्ष का अर्थ है ऋषि का रचा हुआ. इन दोनों के रचने वाले ऋषि थे, ऋषि होते हुए वे कवि भी बन गये. तो उनकी रचना आर्ष काव्य कही गई. यह माना गया कि हर बड़ा कवि ऋषि हो जाता है, पर वहाँ कवि पहले है. कवि होते हुए वह ऋषि हो जाता है.

वाल्मीकि और व्यास ऋषि हैं. ऋषि होते हुए वे काव्य रचते हैं, तो कवि होते हैं. कालिदास के सामने वाल्मीकि और व्यास के विशालकाय महाकाव्य हैं. ऋषि कवियों के आगे कालिदास को लगता है वे एक बौने हैं. उनकी तरह विराट फलक ले कर कोई काव्य रचने की आकाङ्क्षा एक बौने की ऊँचाई पर लगे फलों को तोड़ने की आकाङ्क्षा की तरह है.

कालिदास कहते हैं कि ऊँचाई पर लगे फलों को उचक-उचक कर तोड़ने वाले बौने की तरह कहीं मैं जग हँसाई न करवा डालूँ.  पर वे यह भी जानते हैं कि ऐसा होगा नहीं. ऊँचाई पर लगे पेड़ सचमुच में फलवाले होंगे तो उनके लिये झुक जायेंगे. भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः – यह वे बाद में कहते भी हैं. अपने समय में अपने उपहासास्पद बनने का बोध, महान् वृक्षों के नीचे खड़े एक कवि का उसके अपने समय मैं अपनी नियति को पहचानने से उपजा बोध कालिदास में है. यह समकालिक बोध है.

समकालिकता का अतिक्रमण आधुनिकता हो जाती है. कालिदास दरअसल कह यह रहे हैं कि मैं यों मन्द बन कर रह गया और कवि की कीर्ति की इच्छुकभर बना रहा, तो मेरी हँसी ही होगी. इसलिये मतिमन्द बना नहीं रहूँगा. यशोलोलुपता से भी ऊपर उठूँगा. यह आधुनिक बोध है. आधुनिक कवि परम्परा को देखता है, तो सप्राण परम्पराओ को चुनता है उनकी माला बना कर प्रस्तुत कर देता है. कालिदास यही कहते हैं-  मैं वह धागा बन जाऊँगा जो मोतियों के एक लड़ी बना देता है.  धागा तो जड़ है कवि तो चेतन धागा है. कविचेतना धागा बनती है और परम्परा के मोतियों को गूँथ कर अपने समय के लिये उनकी एक नई माला बना अपने समय को समर्पित करती है.

कालिदास रघुवंश के पूरे उपोद्धात में समकालिकता को पूर्वपक्ष और आधुनिकता को उसका उत्तरपक्ष बना कर प्रस्तुत कर देते हैं. फिर वे आधुनिकता को पूर्वपश्र और परम्परा को उत्तरपक्ष बना कर भी प्रस्तुत करते हैं. रघुवंश में उनका उक्त वक्तव्य ही उनके विश्वास और अपने समय में कुछ अदना मान लिये गये कवि का प्रतिवक्तव्य है. वे आगे कहते हैं कि रघुवंश का बखान मैं करूँगा, भले ही मेरा वाग्वैभव थोड़ा सा ही हो, क्यों कि उन राजाओं के गुण मुझे खींच रहे हैं, वे बयान के लिये आमन्त्रित कर रहे हैं.  फिर वे यह भी विश्वास प्रकट करते हैं कि कविता के पारखी अपनी आग में जला कर देख लें कि मैं खरा सोना हूँ या नहीं.

इसलिये कालिदास न तो अपने आप को बौना मान कर अपनी जग हँसाई से भयभीत हैं, न कोरी विनय प्रकट कर रहे हैं. पारम्परिक टीकाकारों ने उनको ‘गुप्ताहङ्कारङ्कारभणित्यौदात्य’ का कवि माना है– ऐसा कवि जो अपने अहङ्कार को उजागर नहीं होने देता, अहं का बोध उसे रहता है, पर उसे प्रच्छन्न रहने दे कर वह अपनी उक्ति को उदात्त बनाता चलता है. त्रिलोचन ने कालिदास के मन्तव्य को पकड़ा है. वे अपनी ललक कविता में कहते हैं

हाथ मैंने
उँचाये हैं
उन फलों के लिये
जिनको
बड़े हाथों की प्रतीक्षा है.
फलों को
मैं देखता हूँ
जानता हूँ चीन्हता हूँ
और उनके लिये
मुझमें ललक भी है
हाथ मैंने
उँचाये हैं
उन फलों के लिये
जिनको
बड़े हाथों की प्रतीक्षा है
डर नहीं है
हँसा जाऊँगा. 

(ललक, फूल नाम है एक, 36)

पुराने को सहेज कर उसे नये से जोड़ कर अपने समय में उसकी नई अर्थवत्ता खोजने की प्रवृत्ति कालिदास में आरम्भ से ही रही. ऋतुसंहार उनकी पहली रचना मानी जाती है. यह काव्य छहों ऋतुओं का क्रमशः वर्णन प्रस्तुत करता है.  ऋतुवर्णन की परम्परा पुराने काव्यों में चली आ रही थी. पर पुराने काव्यों में कथाप्रसङ्ग के अनुसार अलग अलग ऋतुओं के वर्णन बिखरे हुए थे. वहाँ ऋतुएँ मुख्य नहीं, आख्यान और आख्यान के पात्र मुख्य होते थे. एक साथ छहों ऋतुओं का ऐसा वर्णन हो कि ऋतुएँ ही नायक-नायिकाएँ हो जायें, कालिदास के पहले ऐसा कोई काव्य नहीं लिख गया था. कालिदास ने प्रावृट्काल (वर्षा के समय) को सजधज के साथ सवारी पर निकला महाराजा बना दिया, वसन्त को तीखे तीर छोड़ने को तैयार योद्धा बना दिया, शरद् को रम्यरूप वाली नववधू बना कर दिखा दिया. वे ऋतुवर्णन की काव्यरूढि को तोड़ कर उसे परम्परा बना देते हैं.

 

4.

अपने देश की धरती पर छहों ऋतुओं का आवर्तन विवर्तन एक साथ प्रस्तुत करते हुए वे इस परम्परा को आधुनिक और समकालीन बना देते हैं. ऋतुसंहार में भारतीय परिदृश्य को समझने और आँकने की चाह भी है और कुछ सघन अनुभूतियों के गुम्फन से बना वैदिक काल के बाद की संस्कृत कविता का पहला स्वतन्त्र प्रगीत भी. उसका प्रारम्भ वसन्त की मादकता से नहीं होता, विन्ध्य के अञ्चल की तीखी झुलसाने वाली गर्मी के वर्णन से होता है. ऋतुओं के सङ्क्रमण में बदलते परिदृश्य और मनःस्थितियों का अंकन करते हुए कालिदास ने कविता के क्षेत्र में उस समय एक नया रास्ता ढूँढा था.

मेघदूत में यक्ष का अलका से उतर कर भारतवर्श के मध्यदेश में रामगिरि पर आना समकाल में अवतरण है. कवि अनुभूतियों के भीतरी संसार तथा समकालीन दृश्यालेख-इन दोनों की एक दूसरे के परिप्रेक्ष्य में व्याख्या करता हुआ इस दिशा में और आगे बढ़ता है.

मनुष्य के स्वप्न, आकांक्षा और दमित भावों के उफनते उच्छ्वास के साथ बाहर के विस्तीर्ण दृश्यफलक को पूरी प्रामाणिकता के साथ उपस्थित कर के कवि ने मात्र सौ पद्यों के काव्य में विराट् महाकाव्यों की गुरुता को समो लिया है.

मेघदूत की रचना के साथ कालिदास की कविता के शतदल नये आकारों में लिखते हैं. एक और संपूर्ण राष्ट्र की सांस्कृतिक चेष्टा से गहरी संसक्ति और उसके साथ अपने युग की धड़कनों और स्पंदनों की गहरी पहचान, तो दूसरी ओर गहन अस्तित्व के संकट-क्षणों में भी न चुकने वाली मनुष्य की अस्मिता की खोज- इन प्रस्थानों से कालिदास कविता को उस बिंदु से आगे ले जाते हैं, जहाँ  वाल्मीकि ने उसे छोड़ा था.

दशरथ को श्रवणकुमार के वध के कारण उसके पिता से मिले शाप का प्रसङ्ग तो वाल्मीकि की रामायण में है ही. पर वहाँ दशरथ मृत्यु के पहले कौसल्या को यह वृत्तान्त याद करते हुए बताते हैं.  कालिदास दशरथ के जीवन में आई शाप की इस छाया को उनके यौवन के दिनों के वर्णन के साथ, ऐन वसन्त के समय में उनके विहार के वर्णन के बाद निरूपित करते हैं. शाप मिलने के बाद दशरथ कहते हैं-

शापोऽप्यदृष्टतनयाननपद्मशोभे
सानुग्रहो भगवता मयि पातितोऽयम् I
कृष्यां दहन्नपि खलु क्षितिमिन्धनेद्धो
बीजप्ररोहजननीं ज्वलनः करोति II
(9.80)

(मैंने तो अभी तक बेटे के मुख की शोभा को निहारा ही नहीं अर्थात् मेरे कोई पुत्र नहीं है. अतः शाप दे कर आप ने मुझ पर अनुग्रह ही किया है. फसल काटने के बाद अगली खेती के लिये लगाई गई आग धरती को जलाती तो है, पर उसे बीजों को अंकुरित करने की शक्ति दे देती है.)

किसान फसल काटने के बाद धरती के बचे फसल के डंठल या फरियाली जला रहे हैं– यह दृश्य कालिदास ने अपने समय में देखा होगा. उसकी व्याख्या में वे आधुनिक हो जाते हैं. दशरथ ने शाप को ऐसे स्वीकार कर लिया, जैसे वरदान मिला हो. कालिदास यह सङ्केत दे रहे हैं कि परम्परा यदि कहीं अभिशाप बन रही हैं, तो वे उसे आधुनिकता की आँच में वरदान बना देंगे.

शाप कैसे वरदान में ढल जाते हैं इसके प्रसङ्ग कालिदास बार-बार ले कर आते हैं. अभिज्ञानशाकुन्तल में दुर्वासा का शाप, शाप के आवरण में छिपा वरदान हो जाता है, क्योंकि दुर्वासा कहते हैं कि अभिज्ञान या पहचान का कोई आभूषण जब दुष्यन्त देखेगा, तो शाप टूट जायेगा.

इसलिये परम्परा में सब कुछ सुन्दर, भव्य, रमणीय है– इस भाव से कालिदास ने परम्पराओं को नहीं समखा है, वे परख कर उनमें से मोती ले कर आते हैं. अपनी पहली नाट्यरचना मालविकाग्निमित्र में वे इसलिये आरम्भ घोषणा करवाते हैं कि जो कुछ पुराना है, वही अच्छा हो यह आवश्यक नहीं, जो नया आ रहा है, वह खराब हो यह भी आवश्यक नहीं. सन्त या ज्ञानी परख कर जो ग्राह्य है उसे अपनाते हैं, मूढ परप्रत्ययनेयबुद्धि होते हैं. यहाँ कालिदास ने परम्पराओं को रूढ़ि बना कर उसका अन्धानुकरण करने वालों के लिये एक शब्द दिया है– परप्रत्ययनेयबुद्धि – दूसरे के कहे को मान कर जिसकी बुद्धि बहकी हुई है.

 

 

5.

रानी धारणी अग्निमित्र और मालविका के प्रेम में प्रत्यवाय है. वह समझ जाती है कि नृत्याचार्य के नृत्य प्रदर्शन के बहाने राजा मालविका को देखना चाहता है, और टिप्पणी करती है- “इस तरह की उपायनिपुणता यदि आपकी राजकार्य में भी होती, तो अच्छा होता!” रानी की चेतावनी राजा कि विलासिता पर टिप्पणी है, उसके पीछे कालिदास का समकालिक बोध है. आगे के दृश्य में उद्यान में राजा और विदूषक को अचानक मालविका दिख जाती है, जिसके लिये राजा अकुला रहा है, तो विदूषक कहता है- “अरे, यह तो छक कर मदिरा पीने के बाद तुम्हे मछली का चिखौना मिल गया!” यहाँ नायिका एक स्त्री नहीं राजा के लिये स्वाद बदलने के लिये मछली है यह अंतर्निहित भाव कितनी विडम्बना का बोध देता है! यह विडम्बना भी समकाल की विडम्बना है.

राजा छिप छिप कर मालविका से मिलता है. धारणी के द्वारा मालविका को बन्दी बना लिये जाने पर छल से उसे कारागार से छुड़ा कर विदूषक राजा के साथ उसके मिलन की व्यवस्था करता है. वहाँ फिर दूसरी रानी इरावती के आ जाने से राजा की गति साँप-छछूँदर के जैसी हो जाती है. इसी समय समाचार मिलता है कि राजकुमारी वसुलक्ष्मी जो गेंद खेल रही थी, एक वानर के द्वारा ऐसी डरा दी गयी है कि उसका डर कम नहीं हो रहा है. राजकुमारी का डर जाना एक ऐसी बात है जिससे के आगे रानी इरावती राजा से लड़ना झगड़ना भूल कर उसे राजकुमारी के पास जाने को कहती है. इस पर विदूषक टिप्पणी करता है-

“बहुत अच्छे, पिंगल वानर, तुमने तो अपने पक्ष के लोगो को बचा ही लिया!”

आदमी आदमी नहीं रहा बन्दर बन गया है– यह विदूषक के मुँह से कालिदास कह रहे हैं. यह समकालिकबोध है.  आगे चल कर विदूषक राजा से कहता है-

“तुम वह  गीध हो, जो कच्चे मांस के लालच में कसाईखाने पर मँडराता भी है और डरता भी है.”

विदूषक के इस प्रकार के कथनों में कालिदास ने अपने समय के सामन्तीय समाज की लिप्सा और विलासिता पर करारा व्यंग्य प्रहार किया है.

वैसे तो ’मालविकाग्निमित्रम्’ की कहानी का सारा ताना-बाना ही इस विदूषक का गूँथा हुआ है- कहना होगा कि कथानक के गठन में विदूषक छाया हुआ है, पर उसके अलावा और भी कई छोटे छोटे पात्र हैं, जिनके बिना कहानी अधूरी रहती है. रनिवास में नायिका मालविका छद्म वेष में रहती है, तो वहीं की दासी बकुलावलिका पग पग पर उसकी सहायता करती है. इसी तरह दासी समाहितिका और उद्यानपालिका मधुकरिका का कथानक के कार्य-व्यापार में अपना हिस्सा है. नाटक में कंचुकी, कुब्जक समाहित और अन्य प्रतीहारियों की भी भूमिका है जो राजा के पीछे मौन खड़ी हैं-वे उसके कामुक कार्य-कलापों और लालसा में पगे कथनों की साक्षी हैं.

जयसेना जो राजा के अमिसार-षड्यंत्र में सहयोगिनी बनती है और माधविका जो राजमुद्रा देख कर धोखा खाती है- इन साधारण सेविकाओं के लिये अंतःपुर के कुचक्र से अपने आपको अलग रखना कठिन हो गया है. पर ’मालविकाग्निमित्रम्’ अंतःपुर के कुचक्र की ही कथा नहीं है, उसमें राजनीति के द्वारा विस्थापित किये गये सामान्य जनों की कहानी भी जुड़ी हुई है. चचेरे भाई के द्वारा राजा माधवसेन को कैद कर लेने पर रनिवास में संगीत और नृत्य के द्वारा नौकरी करने वाली शिल्पकारिकाएं बचती-बचाती भाग कर नौकरी ढूंढने विदिशा पहुँचती हैं. माधवसेन के मंत्री की छोटी बहन भाई को डाकुओं के द्वारा मार देने के बाद इसी विदिशा के रनिवास में परिव्राजिका के वेश में रहती है.

कालिदास की दृष्टि इन तमाम छोटे पात्रों पर गयी है. उन्होंने इनमें से हर एक को एक अनोखा व्यक्तित्व दिया है. यही नहीं, वे बार-बार नायक नायिका को छोड़ कर इन पात्रों के बीच आते हैं, इन्हें दुलारते हैं. इस नाटक की कहानी शक्ल ही नहीं ले पाती. यदि पेट के लिये नृत्य-संगीत सिखा कर नौकरी करने वाले नाट्याचार्य गणदास और हरदास का इस्तेमाल रनिवास की राजनीति में मोहरों की तरह न होता. विदूषक इन दोनों के स्वाभिमान को उकसाता है और दोनों में स्पर्धा जगाता हैं जब ये दोनों नाट्याचार्य राजा के सामने जाते हैं तो जन सामान्य की राजा के आगे जाने पर जो हालत होती है, वही इनकी भी. दोनों कुछ चौकन्ने से, कुछ सहमे से, राजा के पास पहुँचते हैं. हरदास कहता है-

द्वारे नियुक्तपुरूषाभिमतप्रवेशः
सिंहासनान्तिकचरेण सहोपसर्पन् I
तेजोभिरस्य विनिवर्तितदृष्टिपातै-
र्वाक्यादृते पुनरिव प्रतिवारितोऽस्मि II

(घुसते समय द्वारपाल से अनुमति ली, फिर पार्श्ववर्ती अनुचर के साथ ही राजा की ओर बढ़ रहा हूँ. फिर भी राजा का तेज तो देखो कि आँखें इन्हें देखने को गई और चकाचोंध हो कर लौट आईं. राजा ने एक शब्द कहे बिना मुझे रोक दिया.) सत्ता का तेज ही ऐसा होता है. सामान्य आदमी भला उसके पास कहाँ फटक सकता है!

राजमहल के भीतर की दुनिया को व्यवस्था के बाहर खड़े आम आदमी की दृष्टि से देखते, जांचते-परखते कालिदास की दृष्टि रनिवास में नौकरी करने वाले कञ्चुकियों पर बार बार गयी है. कञ्चुकी का बुढापा ही उसकी योग्यता है. जितना ही बूढ़ा कञ्चुकी होगा, रनिवास में चाकरी के लिये उतना ही उपयुक्त समझा जायेगा. कठिन बुढौती में चाकरी, और वह भी स्त्रियों की! इस दुखदायी स्थिति की विडंबना’ विक्रमोर्वशीयम्’ के कञ्चुकी के मुख से सुनिये-

सर्वः कल्पे वयसि यतते लब्धुमर्थान् कुटुम्बी
पश्चात् पुत्रैरपहृतभरः कल्पते विश्रमाय I
अस्माकं तु प्रतिदिनमियं साधयन्ती प्रतिष्ठां
सेवाकारा परिणतिरहो स्त्रीषु कष्टोऽधिकारः II

कञ्चुकी कहना है कि दुनिया में सारे गृहस्थ लोग युवावस्था में काम-धंधा करते हैं, पैसा कमाते हैं और बुढापा आने पर बेटों को कामकाज सौंप कर विश्राम लेते हैं. एक हम हैं कि बूढे हैं, इसीलिये हमें खटते रहना है.

अपने समय की पूरी व्यवस्था पर यह एक प्रश्न भी कालिदास ने खड़ा किया है. वे कैसे राजा हैं, जो बुढ़ापे में असक्त हते चले जाते आदमी से काम करवाते रहना उचित समझते हैं और वे कैसी सन्तानें हैं, जो बुढ़ापे में अशक्त होते चले जा रहे पिताओं को काम करने दे रहे हैं.

कालिदास ने ऐसे राजसेवकों को देखा होगा, तो भरी जवानी में राजसेवा में नियुक्त हुए, बूढ़े होते गये., तो काम से छुट्टी मिलने की बजाय उन्हें रनिवास में कञ्चुकी के रूप में रख लिया गया. युवावस्था में वे राजपुरुष थे, हाथ मं छड़ी रहती थी. छड़ी सत्ता की प्रतीक भी है, राजसेवक या राजा का अफसर होने की निशानी भी है. अभिज्ञानशाकुन्तल का कञ्चुकी कहता है-

आचार इत्यवहितेन मया गृहीता
या वेत्रयष्टिरवरोधगृहेषु राज्ञः I”
काले गते बहुतिथे मम सैव जाता
प्रस्थानविक्लवगतेरवलम्बनार्था II

आचार समझ कर जो पकड़ी थी
अवरोधगृहों में राजा के
बाँस की छड़ी
कितना समय बीत गया
कि वही अब बन गई
चलने में डगमगाती मेरी गति को
थामे रखने का एक सहारा.)

कञ्चुकी कह रहा है कि जब नौकरी करने आया था. यहां तो इस बेंत की छड़ी को सदा हाथ में लिये रहना पड़ता था क्योंकि राजसेवक के लिये यह रिवाज था. बरस पर बरस बीतते चले गये और आज स्थिति यह है कि यह छड़ी हाथ में न हो तो मैं एक कदम चल नहीं सकता. जो रीति थी, अब वह विवशता है.

पर उससे बड़ी विडम्बना और विवशता पर कालिदास ने जो यहाँ कटाक्ष किया है, उस पर समीक्षकों औऱ टीकाकारों ने कदाचित् ध्यान नहीं दिया है. रनिवास के लिये उन्होंने शब्द रखा है– अवरोधगृह. अवरोधगृह के दो अर्थ होंगे – जहाँ जाने से रोका जाता है, दूसरा यह भी कि जहाँ से बाहर आने से रोक जाता हो.

कई उपेक्षित रानियों की आह इस शब्द में दबी हुई है, ऐश्वर्य के सपने दिखा कर वे जिस राजप्रासाद में लाई गईँ, वह उनके लिये कारागार है.

इसे दूरारूढ या खीचातानी की व्याख्या नहीं माना जाना चाहिये, क्यों कि इसके ठीक बाद कालिदास ने एक ऐसी रानी या रखैल का इसी तरह के भाव को प्रकट करने वाला एक दर्दभरा गीत नेपथ्य से गवा दिया है.

 

6.

इधर समाजशास्त्रीय समीक्षा के मानदंडों पर कालिदास को आँकने के जो प्रयास हुए हैं. पश्चिम के दो संस्कृत पंडितों के नाम इस प्रसंग में याद आते हैं, एक हैं पूर्व जर्मनी के प्रो. वाल्टर रूबेन और दूसरे रूस के श्री सेरेब्रयाकोफ. दोनों ही विद्वानों का मानना है कि कालिदास ने गाँव में अपना बचपन गुजारा था और वे एक निर्धन परिवार से आये थे. दरबार में पहुँच जाने पर भी कालिदास अपने वर्ग को, अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि को भूले नहीं. उन्होंने विदूषक जैसे पात्रों को अपना प्रवक्ता बनाया है. शाकुन्तल के विदूषक के लिये खास तौर से यह बात सच लगती है. शाकुन्तल का विदूषक पहली बार मंच पर आता है तो राजा के साथ रहने के कारण जो दुःख वह उठा रहा है, उसका रोना रोता है. कहता है- अच्छे फँसे हम इस शिकार के शौकीन राजा के साथ! भरी दुपहरी ऐसी तेज गर्मी में इस जंगल से उस जंगल भागते फिरो, न खाने का सुख, न पीने का!’ अब शिकार करते करते राजा तपोवन की एक भोली भाली लड़की को अपना शिकार बना लेता है, तो विदूषक उसके मुँह पर खरी खरी कहने से चूकता नहीं. वह कह देता है कि खूब पिण्डखजूर खा खा कर मुँह फिर जाये, तो जैसे इमली की चटना चाटने की तबीयत होती है, ऐसे ही तुम्हारा मन जंगल की लड़की शकुन्तला पर आ गया.

अंतिम दृश्य में इस बेचारे विदूषक की बड़ी पिटाई होती है. कोई अदृश्य सत्ता उसे दबोच कर उसकी धुनाई करती जा रही है-और वह निहत्था है-सहायता के लिये चीख रहा है. राजा शब्दवेधी बाण चलाने को होता है, तब इन्द्र का सारथि मातलि उसे छोड़ कर राजा के आगे प्रकट हो जाता है, राजा उसका स्वागत करता है. तब विदूषक कहता है- जिसने यज्ञ के बलि-पशु की तरह मुझे मारा, उसी का ऐसा स्वागत!

व्यवस्था में दोहरी मार खाते आदमी की ओर से यह अंतिम टिप्पणी है.

यज्ञ के बलिपशुओं की स्मृतियाँ कालिदास में मन में रही होंगी. एक मछुआरे की उक्ति में भी उनके मानस में यह बिम्ब है. कालिदास के समय के समाज के निचले तबके के लोगों को सामने रखने की दृष्टि से शाकुन्तल के छठे अंक का विष्कम्भक अद्वितीय ही है.

कालिदास के समय के समाज के निचले तबके के लोगों को सामने रखने की दृष्टि से शाकुंतल के छठे अंक का विष्कंभक अद्वितीय ही है. एक निर्दोष मछुआरे को चोरी का अपराध लगा कर राजा के सिपाहियों ने पकड़ कर बाँध लिया है. वह गाली खा रहा है, पिट रहा है. पर उसका प्रश्न यह है कि क्या मैं केवल इसलिये चोर हूँ कि मैं गरीब हूँ और मछली मार कर अपना पेट पालता हूँ? जब सिपाही उसकी रोजी की हँसी उड़ाते हैं, तो वह कहता है- काम-धन्धा कोई भी बुरा नहीं होता है. श्रोत्रिय महाराज यज्ञ में पशु की बलि चढ़ा कर भी दयालु बने रहते हैं.

निहत्थे और कमजोर आदमी को शक्तिशाली के द्वारा सताये जाने के उपमान के रूप में कालिदास के मन में यज्ञ में जिबह किये जाने वाले पशु का बिम्ब है. शाकुन्तल में मातलि अदृश्य हो कर विदूषक की खेल खेल में बुरी तरह धुनाई करने लगता है, तब विदूषक भी अपने को यज्ञपशु की तरह बताता है. इस पर आगे बात करेंगे.

राजसेवकों से इतना आतंकित है यह मछुआरा कि अपराध से सम्मानपूर्वक बरी कर दिये जाने पर और राजा के द्वारा खासा इनाम भेंट में दिये जाने पर उस राशि में से कोतवाल और सिपाहियों को ’उनका हिस्सा’ बिना माँगे देने लगता है!

यहाँ राजपुरुषों या आज की भाषा में पुलिस के लोगों को दिये जाने वाले हिस्से के लिये कालिदास ने उस समय की भाषा से एक नायाब शब्द चुन कर यहाँ रखा है – सुमनोमूल्य. यह इतना इतना आप अपने सुमनोमूल्य या फूलपत्ते के लिये ले लीजिये – मधुआरा कहता है.

रूस के समीक्षक श्री सेरेब्र्याकोफ ने हमारा ध्यान इस तथ्य की ओर खींचा है कि कालिदास ने इस पात्र को अपनी ओर से कहीं भी धीवर या मछुआरा नहीं कहा है. उन्होंने उसे कोई नाम भी नहीं दिया है.  वे उसे सिर्फ ‘पुरुष’ कहते हैं- कालिदास की दृष्टि में वह बस एक ‘आदमी’ है- जो व्यवस्था के बाहर खड़ा व्यवस्था को जाँच रहा है. वह आर.के लक्ष्मण के कार्टून में चित्रित किये जाने वाले अनाम और आम मनुष्य की तरह है. कालिदास ने इस अनाम-आम आदमी की उपेक्षा नहीं की.

 

 

7.

कालिदास अपने नाटकों में दो पात्रों के मुँह से बोलते हैं – शाकुन्तल में कण्व जैसे ऋषि और तीनों नाटकों के विदूषक.  कण्व के कथनों में परम्परा का प्रवाह एक ऋषिकी वाणी में प्रवाहित होता है, विदूषक के उक्तियों में कालिदास के समय का एक सामान्य जन बोलता है, जो एक अर्थ में कवि स्वयं है. विदूषक की धारदार व्यङ्ग्योक्तियाँ हों या उसकी विवशता का दुःखड़ा – दोनों में ही कालिदास अपने समय को पिरोते हैं और हमारे समकालीन बनते जाते हैं.

मालविकाग्निमित्रम् में विदूषक रानी के द्वारा कारागार में डाल दी गई नायिका मालविका को वहाँ मुक्त कराने और राजा से उसकी भेंट कराने के लिये एक नाटक रच देता है, जिसमें साँप के डस लिये जाने की चीखपुकार और उसके बहाने रानी की सर्पविष उतारने वाली अँगूठी प्राप्त करनी कूटयोजना है. साँप के द्वारा डस लिये जाने पर पीडा का नाटक करते विदूषक के साथ अन्य् पात्रों के संवाद ये हैं-

विदूषक- अरे पापी मृत्यु ने मुझे पकड़ लिया.

राजा- घबराओ मत. हो सकता है जिस साँप ने डसा, वह विषैला न रहा हो.

विदूषक- अरे कैसे न घबराऊँ, मेरी तो सारी देह झनझना रही है.

धारिणी- हाय, इसका विकार तो अशुभफल दिखा रहा है, सहारा दो ब्राह्मण को!
(परिव्राजिका हड़बड़ी में विदूषक को सहारा देती है)

विदूषक- (राजा को देख कर ) सुनिये मैं बचपन से आपका प्रिय मित्र रहा. उसका विचार कर के मेरी निपूती माँ को सहारा देना.

विदूषक को वैद्य के पास ले जाया जा रहा है. जाते हुए वह बहुत करुणस्वर में रानी धारिणी से कहता है – महोदयाजी, क्या पता बच पाऊँगा या नहीं, इन श्रीमान् जी की सेवा करते हुए मैंने आपके प्रति जो अपराध किया है, उसे क्षमा कर देना.

राजा और रानी दोनों के प्रति कहे गये विदूषक के वाक्यों में दूरगामी अनुगूँजें हैं. अपनी ही मृत्यु का नाटक रचते समय विदूषक एक स्तर पर यह भी सोच रहा होता है कि सचमुच में कहीं में मरने लगूँगा, तो मेरी माँ को कौन सँभालेगा, और यह भी कि राजा की चाकरी करते हुए मैंने कितनी बार इसकी रानी को धोखा दिया है. वह अन्तःपुर की रानियों की विवशताएँ और पीडाएँ समझता है.

शाकुन्तल में विदूषक अपने प्रथम प्रवेश के साथ यह वाक्य बोलता है- भो कष्टम्! एतस्य मृगयाशीलस्य राज्ञो वयस्यभावेन निर्विण्णोऽस्मि – क्या मुसीबत है, हम तो मारे गये इस शिकारी राजा की दोस्ती में! इसके आगे जङ्गल में शिकार खेल कर मन बहलाते राजा के पीछे पीछे भाग-दौड़ में जो तकलीफें उठानी पड़ रही है उनकी तफसील में खुलासा है. पर यह जो पहला वाक्य विदूषक के मुँह से कालिदास ने कहलवाया है वह पूरे नाटक के अन्तर्निहित अभिप्राय व्यक्त करता है.

राजा का शिकार और उसकी परिणतियाँ अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक की पूरी कहानी में आद्यन्त फैली हुईं हैं. शिकार एक अभिप्राय है. विदूषक कहना यह चाह रहा है कि राजा का आखेट जंगली जानवर ही नहीं बन रहे, वह स्वयं भी एक सामान्य आदमी के रूप में उसका आखेट बनता जा रहा है. इस आखेठक्रीडा में शिकार  लोग भी हैं, जो मुँह-अँधेरे उठ कर जंगल में हाँका लगाते हैं, वे यवनानियाँ या ग्रीस देश से मिली बादियाँ भी, जो तीरन्दाजी में माहिर हैं, और जिन्हें भी राजा के साथ जंगल में भागते फिरना है. राजा रथ पर है, ये सब लोग पैदल हैं. आगे के एक वाक्य में वह राजा को यह शिकारी उसे मनोवृत्ति किधर  ले जा रही है इसका खुलासा करता है-

ततो गण्डस्योपरि पिण्डकः संवृत्तः I
ह्यः किलास्मास्ववहीनेषु तत्र भवतो मृगानुसारेणाश्रमपदं प्रविष्टस्य तापसकन्यका शकुन्तला ममाधन्यतया दर्शिता I
साम्प्रतं नगरगमनाय मनः कथं अपि न करोति I

(और फिर यह फोड़े पर फुंसी ओर हो गई. हम लोग गये बीते जो हैं, मेरी बदकिस्मती थी कि हरिण का पीछा करते करते महाराज कल आश्रम में जा पहुँचे और उस तापसकन्या शखुन्तला दिख गई. अब तो वे नगर लौटने की चर्चा ही नहीं करते!)

विदूषक की दृष्टि में राजा का जङ्गल में शिकार करते फिरना एक फोड़ा और शकुन्तला के लिये खिंचाव उस फोड़े पर उग आई एक फुंसी है.

इस फोड़े और फुंसी दोनों से छुटकारे के लिये विदूषक एक नाटक करता है. राजा उसीकी की तरफ आ रहा है और वह अङ्गभङ्ग हो जाने का दिखावा करता हुआ अपने दण्डकाष्ठ के सहारे खड़ा हो जाता है.  अब राजा के साथ इसके कुछ संवाद यों होते हैं–

विदूषक- (वैसा ही खड़ा रह कर) हे मित्र, मेरे हाथ-पाँव तो काम कर नहीं रहे, जो केवल वाणी से ही आपका जाप कर देता हूँ – जय हो जय हो आपकी!

राजा– ये तुम्हारे हाथ-पाँव कैसे बेकार हो गये?

विदूषक– खुद ही हमारी आँखें गुलक दीं और अब पूछ रहे हो कि आँसू क्यों आ रहे हैं?

राजा– मैं समझा नहीं.

विदूषक– हे मित्र, बाँस जो कुबड़े मनुष्य की लीला की भौंडी नकल करता है,  तो वह उसके अपने प्रभाव  होता है या नदी के वेग से होता है?

 राजा– नदी का वेग उसमें कारण है.

विदूषक– मेरे भी कारण आप हैं.

अभिज्ञानशाकुन्तल में शकुन्तला और उसकी सखियों के साथ ठिठोली और चुहलबाजी में दुष्यन्त एक मसखरा बन गया है. दूसरी तरफ विदूषक नाम का पात्र जिसे मसखरा माना जाता है, वह शाकुन्तल में (और दूसरे संस्कृत नाटकों में भी) दरअसल एक कारुणिक पात्र होता है. किसी भी संस्कृत नाटक में विदूषक स्वयं कभी खुल कर हँसा हो – ऐसी प्रसङ्ग मेरी दृष्टि में नहीं है. जिस तरह दुष्यन्त अपने  मन को दो हिस्सों में बाँट लेता है रसिक मन और फक्कड़ मन, उसी तरह विदूषक अपने मन को दो हिस्सों में बाँट लेता है, एक मन जो भीतर से बेहद सञ्जीदा और साक्षी भर है, दूसरा जो दूसरा जो औरों को हँसाने का अभिनय कर रहा है.

औरों को हँसाने के लिये विदूषक स्वयं रोने का अभिनय भी करता है. उसका एक मन उसे इस तरह रोते हुए देखता है तथा कुछ और सञ्जीदा हो जाता है. मालविकाग्निमित्र में विष के प्रभाव से मरने का नाटक करता हुआ विदूषक कुछ इसी तरह अपने को रोता हुआ देख कर भीतर हँसता है और फिर इस रोने के नाटक और हँसने की निरर्थकता को भी जानता है. इस तरह कालिदास के नायक विदूषक बन जाते हैं और विदूषक किसी त्रासदी के नायक.

इसी नाटक में छठे अंक में मातलि अदृश्य रूप में खेल खेल में विदूषक को दबोच लेता है, तब प्राणों के संकट में पड़ा हुआ भी विदूषक अपनी शब्दावली के द्वारा दर्शको को गुदगुदा देता है. वह कहता है- एष मां कोऽपि प्रत्यवनतशिरोधरमिक्षुमिव त्रिभङ्गं करोति. (यह मुझे कोई  गरदन मरोड़ कर ईख की तरह तीन टुकड़ो में मोड़े दे रहा है). मृत्यु के मुख में पड़े विदूषक के द्वारा अपने लिये गन्ने की उपमा बड़ी उपयुक्त है. गन्ने को इक्षुयन्त्र (घानी) पेरने के पहले तीन टुकड़ो में मोड़ दिया जाता है. आगे विदूषक कहता है-

“विडालगृहीत मूषक इव निराशोऽस्मि जीवितो संवृत्तः.”

बिलार के द्वारा पकड़ लिये गये चूहे की तरह मैं अपने जीवन को लेकर निराश हो चुका हूँ. यहाँ विदूषक की उक्तियाँ लोकजीवन की छटा ले कर आती हैं.

मालविकाग्निमित्र नाटक के अन्तिम अङ्क में रानी धारिणी स्वयं राजा की प्रिया मालविका का हाथ उसके हाथ में सौंपने लगती है, और राजा लजा जाता है, तब रानी के मुसकुरा कर यह कहने पर कि आर्यपुत्र आप अपनी प्रिया की उपेक्षा क्यों कर रहे हैं, विदूषक तत्काल कहता है-

भवति, एष लोकव्यवहारः; सर्वो नववरो लज्जातुरो भवतीति-
(रानी जी, यह तो लोकव्यवहार है कि हर नया दूल्हा लाज का मारा दिखता है.)
विक्रमोर्वशीयम् में रानी औशीनरी प्रियप्रसादनव्रत के बहाने राजा पुरूरवा और उर्वशी प्रेम पर अपनी सहमति दे देती है, इस पर विदूषक राजा से कहता है-

छिन्नहस्ते मत्स्ये पलायिते निर्विण्णो धीवरो भणति- गच्छ धर्मो मे भविष्यतीति.-
(यह तो कुछ ऐसा हुआ जैसे मछुआरे के जाल से मछली फिसल कर भाग जाये और वह विरागी बन कर कहे कि जा मैंने तुझे छोड़ा, मुझे पुण्य मिलेगा!)

 

 

8.

विदूषक के पात्र के माध्यम से कालिदास अपने समय की व्याख्या करते हैं और हमारे समकालीन भी हो जाते हैं. दूसरी ओर आश्रम और नगर को आमने सामने पख कर प्रस्तुत करते हउए वे परम्परा और आधुनिकता के बीच के तनाव को निरूपित करते हैं. जब राजा दुष्यन्त शकुन्तला की सखियों के साथ रसमय वार्तालाप में लीन है, उसके अनुयायियों के आने से आश्रम में होने वाली बाधा के वर्णन में कवि ने कहा है-

“घोड़ों के टापों से उड़ती धूल डूबते सूरज की आभा में लाल हो कर पेड़ों के शाखाओं पर लटकाए वल्कलों पर गिर रही है, जैसे उन पर पतिंगे टूट पड़े हों.”

यहाँ नगर के लोगों के आने से आश्रम के शान्त और पावन परिवेश में जो प्रदूषण आ रहा है, उसके लिये उत्प्रेक्षा है. नागरसंस्दृति के द्वारा मचाये गये कोहराम और उससे होने वाली भगदड़ के लिये शलभसमूह की उत्प्रेक्षा नागरिकों के की हिंसा और सर्वनाशी सभ्यता के लक्षण की द्योतक है. यह उत्प्रेक्षा सारे नाटक के अंतःस्वर को मुखरित करती है.

इस भगदड़ से भड़का एक जंगली हाथी आश्रम की ओर बढ़ा चला आ रहा है. इस के लिये तपस्वी के संवाद में कवि ने उपमा दी है- वह हम तपस्वियों की तपस्या का मूर्तिमान् विघ्न है. यह उपमा भी सारे नाटक के कथ्य को उद्भासित कर देती है. नागर संस्कृति के समानांतर यह आश्रमों की संस्कृति की प्रतिष्ठा करते हुए द्वंद्व और विरोध के तेजस्वी स्वर की अभिव्यक्ति भी है.

पाँचवे अंक में कंचुकी के मुख से राजा के कर्तव्य को ले कर यह टिप्पणी बड़ी उपयक्त है-

“अविश्रमो ह्ययं लोकतन्त्राधिकारः लोकतंत्र या प्रजा के पालन में लगे राजा को विश्राम करने का अवकाश नहीं होता. कालिदास की दृष्टि में राजा होने का अर्थ भोग विलास में लिप्त होना नहीं है, वास्तव में तो राज्य करना सुख के उपभोग के लिये नहीं कष्ट झेलने के लिये होता है-

नातिश्रमापनयनाय यथा श्रमाय
राज्यं स्वहस्तधृतदण्डमिवातपत्रम् II

(राज्य करना थकान मिटाने के लिये नहीं, बल्कि थकान के लिये होता है, जैसे धूप से बचने के लिये अपना छत्र स्वयं उठा कर चलना.)

वे कविता को हिमालय की उन ऊंचाइयों तक ले जाते हैं, जहाँ  वनचर अपनी प्रियाओं के साथ क्रीडा कर रहे होते हैं, वे उसे विन्ध्याचल के गहन कांतारों में और मालवे के खेतों की मिट्टी से उठती सौंधी सुगंध में रमाते हैं, बंगाल के धान के खेतों में, उत्कल के ताम्बूल के वनों में, मलय के चन्दन और इलायची के कुञ्जों में और केरल के नारियल और सुपारी के झुरमुटों में विचरण कराते हैं. सम्पूर्ण देश के चप्पे चप्पे से इतना ज्यादा प्यार और परिचय कम कवियों में मिलेगा. सामन्ती व्यवस्था में रहने वाला कवि एक ओर तो कविता में बार-बार धरती से जुड़ता हुआ खेत-खलिहानों, आश्रमों और गाँवों की ओर लौटता है.

यह कुछ विचित्र लग सकता है, पर सत्य भी है, कि सन्धि दो सर्वथा पर्पर विरोधी अर्थ संस्कृत में प्रचलित हैं– फाँक और जुड़ाव अथवा सेंध और समझौता. कालिदास अस अर्थ में सान्ध्य कवि हैं कि वे परम्पराओं, आधुनिकताओं और समकालिकताओँ के बीच की फाँकें और जुड़ाव के मजबूत औजार दोनों को अपनी कविता में सत्यापित करते हैं. इसके लिये वे तीनों नाटकों में कुछ खास अलङ्कारों की संरचनाएँ पिरोते हैं – मालविकाग्निमित्रम् में अपह्नुति, विक्रमोर्वशीयम् में उत्प्रेक्षा और अभिज्ञानशाकुन्तलम् में अन्यापदेश या अन्योक्ति. ये अलङ्कार फाँक और जुड़ाव दोनों को प्रकट करते हैं.

जो फाँक लगती है, वह दरअसल जुड़ाव हुआ करती है. शाकुन्तल में दुष्यन्त के मुँह में यह वाक्य कालिदास ने डाल दिया है-

यदर्धे विच्छिन्नं भवति कृतसन्धानमिव तत्–  जो बीच से टूटा दिखता है, वह जोड़ दिया गया सा होता जाता है. यहाँ जोड़ दिये गये के अर्थ  ‘कृतसन्धानम्’ इस शब्द का प्रयोग कवि ने किया है. ‘कृतसन्धिः’ न कह कर ‘कृतसन्धानम्’ कहा है. सन्धानम् शब्द जुड़ाव को बताता ही है, पर वह छानबीन या ऊह, अभ्यूह और तर्क को भी साथ में जोड़ लेता है, जिसकी बात कालिदास से पहले यास्क कर चुके थे.

 

राधावल्लभ त्रिपाठी
जन्म : 15 फरवरी, 1949; मध्य प्रदेश के राजगढ़ ज़िले में शिक्षा : एम.ए., पीएच.डी., डी.लिट्.
सन् 1970 से विश्वविद्यालयों में अध्यापन शिल्पाकार्न विश्वविद्यालय, बैंकॉक; कोलंबिया विश्वविद्यालय, न्यूयॉर्क में संस्कृत के अतिथि आचार्य. राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में पाँच वर्ष कुलपति (2008-13).  शिमला स्थित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में फैलो जर्मनी, इंग्लैंड, जापान, नेपाल, भूटान, आस्ट्रिया, हालैंड, बांग्लादेश, रूस, थाइलैंड आदि देशों की यात्राएँ
प्रकाशन : ‘आदिकवि वाल्मीकि’, ‘संस्कृत कविता की लोकधर्मी परम्परा’, ‘संस्कृत काव्यशास्त्र और काव्य-परम्परा’, ‘नाट्यशास्त्र विश्वकोश’, ‘बहस में स्त्री’, ‘नया साहित्य : नया साहित्यशास्त्र’, ‘भारतीय काव्यशास्त्र की आचार्य-परम्परा’ आदि समीक्षात्मक पुस्तकों सहित हिन्दी में दो उपन्यास और
तीन कहानी-संग्रह व अनेक नाटक प्रकाशित; संस्कृत में तीन मौलिक उपन्यास, दो कहानी-संग्रह, तीन पूर्णाकार नाटक तथा एक एकांकी-संग्रह प्रकाशित ‘सागरिका’, ‘नाट्यम्’ आदि पत्रिकाओं का सम्पादन पुरस्कार : ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’, ‘शंकर पुरस्कार’, कनाडा का ‘रामकृष्ण संस्कृति सम्मान’, यू.जी.सी. का ‘वेदव्यास सम्मान’, महाराष्ट्र शासन का ‘जीवनव्रती संस्कृत सम्मान’ आदि
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Comments 5

  1. शहादत says:
    2 months ago

    प्राचीनता को समेटे एक बेहद दिलचस्प लेख।

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  2. चंद्रकला सिंह says:
    2 months ago

    बहुत सुन्दर। परंपरा और आधुनिकता के बहाने कालिदास के साहित्य का अवगाहन भी इसे महत्वपूर्ण बनाता है 💐

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  3. M P Haridev says:
    2 months ago

    संस्कृत भाषा और हिंदी के अध्यापकों और प्राध्यापकों सहित बाक़ी शिक्षाविदों के लिए महत्वपूर्ण और संग्रहणीय अंक है ।
    आरंभ आधुनिकता की परिभाषा से । रुढियों को त्यागकर आगे बढ़ने में । समालोचन मेधा का कायाकल्प करता है । बहुत ख़ूब ॥

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  4. Pushpendra Madrecha says:
    2 months ago

    बेहतरीन, जटिल विषय की सरल एवं प्रमाणिक प्रस्तुति!

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  5. अजित कुमार राय कन्नौज says:
    1 month ago

    परम्परा का एक अर्थ है —- श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर। कम्प्यूटर के बाद सुपर कम्प्यूटर। अपने समय में परम्परा को नये सिरे से उपलब्ध करना ही आधुनिकता है और तर्कसंगत वैज्ञानिक दृष्टि बोध का उत्तरवर्ती चरण उत्तर आधुनिकता है। यह आधुनिकता का चरम विस्फोट भी है। किन्तु आज उत्तर आधुनिकता को आधुनिकता के विलोम के रूप में भी देखा जाता है। सुधीश पचौरी उत्तर आधुनिकता के प्रवक्ता हैं। राधावल्लभ त्रिपाठी ने कालिदास के समग्र साहित्य का गहन अनुशीलन करके उनके क्रान्ति द्रष्टा रूप को उद्घाटित किया है। कालिदास कहते हैं कि —–
    आपरितोषाद् विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम्।
    और कहना जरूरी है कि कालिदास के प्रयोग विज्ञान को विद्वान आलोचकों का समर्थन प्राप्त हुआ। उनके काव्य में संश्लिष्ट चाक्षुष बिम्ब विधान के साथ ही उपमेय और उपमान में भाव – साम्य, धर्म साम्य, रंग साम्य, आकार साम्य, लिंग साम्य और गुण साम्य की अनुरूपता के कारण उन्हें उपमा का बेजोड़ कवि कहा गया। शकुन्तला को छोड़कर जाते हुए दुष्यन्त का मन वैसे ही पीछे की ओर भाग रहा है, जैसे आगे की ओर ले जाए जाते हुए ध्वज की पताका पीछे की ओर फहराती है। यहाँ दुष्यन्त का शरीर ध्वज के समान है। कालिदास भविष्य द्रष्टा भी हैं। आज के प्रगतिशील काव्य में नेह की निशानी को काल की कौन सी मछली निगल गई? मेरा मन शुक – शावकों के मुखभ्रष्ट नीवार को अपनी आँखों से बीनते हुए बार बार उस अतीत के कोटर में चला जाता है, जो विहगों का नीड़ है। वहाँ मृग का तो नहीं, किन्तु विश्वोत्तीर्ण सुन्दरी मृगनैनी शकुन्तला का आखेट हो जाता है। शाकुन्तल का अभिज्ञान हमें अतीत, वर्तमान और भविष्य की संश्लिष्ट दृष्टि प्रदान करता है। कालिदास के ‘इत्यादि’ पात्रों के माध्यम से इतिहास के छूटे हुए सन्दर्भों को नये आशयों से मंडित करके नये आलोक में देखने के लिए राधावल्लभ त्रिपाठी जी साधुवाद के सुपात्र हैं। गौणी नहीं, वैदर्भी रीति के अनुशास्ता के गौण प्रसंगों के माध्यम से परम्परा का पुनराविष्कार वरेण्य है।

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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