| रोज़े औसलेण्डर की कविताएँ अँग्रेज़ी से अनुवाद: रुस्तम सिंह |
और उनका प्रेम बुझा दिया
वे आये
बन्दूकें और दाँतेदार झण्डे लेकर
चाँद को गोली मारकर गिरा दिया और सभी सितारों को
और उनकी रोशनी बुझा दी
और उनका प्रेम बुझा दिया
उस दिन हमने सूर्य को दफ़ना दिया
और फिर अन्तहीन रात थी
जैसे कि
जैसे कि
आकाश
और पृथ्वी
ऊपर की ओर देख रहे थे
जैसे कि
धुँधला भूरा
और उज्ज्वल नीला थे
जैसे कि
आकाश-शब्द
और पृथ्वी के शब्द थे
जैसे कि
तुम्हारे शब्द थे मेरे शब्द थे
तुम थे या मैं थी
मैंने कसकर पकड़ा हुआ है
मेरी दृष्टि के सामने से
इन्द्रधनुष को
किसने फाड़ दिया है
मैंने उसे जल्दी से बाँधने की कोशिश की
सात शब्दों के साथ
मेरी आँखें बारिश में
डूब रही हैं
मैंने कसकर पकड़ा हुआ है
इस कागज़ को
कागज़ के इस पन्ने को
तुम्हारा घर
सूर्य कहता है
जागते हुए सो जाओ
मेरे बच्चे
मैं तुम्हारा रास्ता रोशन करूँगा
घर तक
बारिश
मैं उन बच्चों के लिए रो रही हूँ
जो आग में खेले
मेरे साथ रोवो
मेरे बच्चे
राख
शब्दों से घुट रहा है तुम्हारा गला
मेरा घर
तुम्हारा घर है
कर्कश ख़ामोशी
कुछ ने ख़ुद को बचा लिया
और हाथ रेंगते हुए निकले
रात में से
ईंटों की तरह लाल उनके ख़ून से
जिन्हें उन्होंने मार दिया था
यह एक कर्कश दृश्य था
लपटों से बना एक बिम्ब
आग से बना संगीत
फिर मृत्यु चुप हो गयी
चुप हो गयी
यह एक कर्कश ख़ामोशी थी
टहनियों में मुस्काते हुए सितारे
चमक रहे थे
जो बच गये वे इन्तज़ार कर रहे हैं
बन्दरगाह पर
जहाँ टूटे हुए जहाज़ लंगर डाले खड़े हैं
लगभग पालनों की तरह
माँ और बच्चे के बिना
राख
राख की बारिश में
तुम्हारे चिन्ह हैं
वह एक
उत्तम शब्द था
आग ने
उसे खा लिया
मैंने धूल का अपना लबादा
लपटों पर फेंक दिया
उस अन्धी नज़र के पीछे
तुम्हारी आँखें
मुझे तुम्हारी ओर खींचती हैं
प्रेम–3
हम फिर से इकट्ठे होंगे
झील में
तुम पानी होगे
मैं कमल का फूल
तुम मुझे उठाये रखोगे
मैं तुम्हें पियूँगी
दुनिया की नज़र में
हम जुड़े हुए होंगे
और सितारे भी
हैरानी से देखेंगे
कि यह दो
वापिस स्वप्न में बदल गये हैं
जिसने उन्हें चुना था
ताबूत
मुझे
अपने कन्धों पर
ताबूत ले जाने की आदत थी
वे ताबूत इन समयों के
कबाड़ से भारी थे
अब मैं आराम कर रही हूँ
लकड़ी की तरह
घास में
जिसने मुझे उठाया हुआ है
जैसे कि मैं
ताबूत हूँ
चिह्न
मेरी त्वचा पर
गड्डमड्ड चिह्न
गुदे हुए हैं
रात को
मैं एक कलश में रहती हूँ
जिसमें दुनिया की
अस्थियाँ पड़ी हुई हैं
हर सुबह मैं अपनी आँखें
सूर्य की ओर खोलती हूँ
जो उठता है
और मुझे
बाँध
देता है
घड़ी के कँगूरों के साथ
अभी भी रात
कौन कहता है मैं गा रही हूँ
मैं कह रही हूँ गा नहीं रही
कितना प्यारा यह गुलनार अपने काँच में
जब यह सांस ले रहा है
किंवदंती अपनी राह पर
बर्फ़ अब काली
पल्ले के काँच के नीचे
अभी भी रात की कई आवाज़ें हैं
दीवारों से परे दीवारें
इस पृष्ठ पर
छाया
मेरा हाथ है
जो लिख रहा है रात
केवल छाया है और मेरा साथी ज़ोर दे रहा है
मैं सामान बाँध लूँ
मेरा समय यात्रा पर
जा रहा है
प्रश्न
मैं कँटीले
प्रश्नों के साथ आती हूँ
लहूविहीन सूर्य
गोखरू और हवा के साथ
रानी-चींटी
और उसकी ग़ुस्सैल सेना के साथ
कहाँ और किधर जैसे प्रश्नों के साथ
पत्थर के नीचे पहाड़ी के साथ
टिमटिमाती मोमबत्ती
मोम के होंठों
धुएँ से बने प्रश्नों के साथ
उस प्रेम के साथ जिसका गला घोंट दिया गया है
टूटे हुए घड़े के साथ
जिसे तुम्हारी आँखों से चुरा लिया गया है
ऊपर गिद्ध की कर्कश, चीख़ती आवाज़
मैं आती हूँ
किसी के भी पास
क्यों और किस कारण
जैसे प्रश्नों के साथ
हवाई किले
चिड़ियाँ
चली गयी हैं
बचपन के प्रदेश से
बचपन का प्रदेश
चला गया है
सब बच्चे
बूढ़े हो गये हैं
मैं
कागज़ से
हवाई किले बना रही हूँ
उस प्रदेश में जो किसी का भी नहीं है
रहस्य
कुछ देर
बादलों में झाँको
और अक़्सर तुम्हें दिख जायेंगे
दानव और देवदूत
पत्तों के भी
कई चेहरे होते हैं
कभी-कभी मैं किसी मित्र को पहचान लेती हूँ
उनकी नक़्क़ाशी में
कई बार परिचित वस्तुएँ
कितना मानवी बन जाती हैं
लेकिन मनुष्य लोग
ऐसे रहस्य हैं
जिन्हें सुलझाने में मैं लगी हुई हूँ
अनुभव
अनुभव को इकट्ठा करो
वनों में पर्वतों में
शहरों में
पुरुषों और महिलाओं की
आँखों में
बातचीत में
ख़ामोशी में
हवा से बनी चक्कियाँ
हमारी रोटी
बहुत महँगी पड़ती है
हवा से बनी चक्कियाँ
रेत के कणों को पीसती हैं
अकाल
रोटी की पपड़ी के
किनारे पर पलता है
अपने पड़ोसी को वह प्यार दो
जो तुम्हें कभी नहीं मिला
तुम क्या खोज रहे हो
इस क्षणभंगुर जल में
ओ नारसीसस*
*यूनान की मिथिक कथाओं में नारसीसस एक सुन्दर, युवा शिकारी था जिसे उसके अहंकार के कारण नेमेसिस नामकी देवी ने यह श्राप दिया था कि वह तालाब के पानी में अपने ही प्रतिबिम्ब से प्रेम करने लगेगा. बाद में ऐसा ही हुआ और वह अपने प्रतिबिम्ब की लालसा में धीरे-धीरे मर गया.
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रोज़े औसलेण्डर (Rose Ausländer: 1901–1988) का जन्म चेर्निवित्सी में हुआ जो अब यूक्रेन में है. उनके माता-पिता यहूदी थे और जर्मन भाषा बोलते थे. 21 वर्ष की उम्र में वे अमरीका चली गयीं. कुछ वर्ष बाद वे अमरीकी नागरिक बन गयीं हालाँकि बीच-बीच में वे यूक्रेन आती रहीं जहाँ उनकी माँ और भाई रहते थे. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जब नात्सियों ने यूक्रेन पर कब्ज़ा कर लिया था तो उनके परिवार को छुपकर रहना पड़ा था. 1947 में उनकी माँ की मृत्यु के बाद 1966 तक वे मुख्यतया अमरीका में ही रहीं. लेकिन 1967 से 1988 में अपनी मृत्यु तक वे जर्मनी में रहीं जहाँ उन्होंने जर्मन नागरिकता ले ली थी. उनका पहला कविता संग्रह 38 वर्ष की उम्र में प्रकाशित हुआ. उन्होंने 3000 से भी अधिक कविताएँ लिखीं और उनकी मृत्यु तक उनकी 22 पुस्तकें प्रकाशित हुईं. वे जर्मन भाषा में लिखती थीं, हालाँकि उनका कुछ काम अँग्रेज़ी में भी लिखा गया. उनकी कविताओं को पढ़ना और समझना बहुत आसान नहीं होता. वे अपनी वक्तोक्ति (ambiguity) के लिए जानी जाती हैं. |
उनकी कविताएँ अँग्रेज़ी, तेलुगु, मराठी, मल्याली, पंजाबी, स्वीडी, नौर्वीजी, फ्रांसीसी, एस्टोनी तथा स्पेनी भाषाओं में अनूदित हुई हैं. रुस्तम सिंह नाम से अँग्रेजी में भी उनकी चार पुस्तकें प्रकाशित हैं. इसी नाम से अँग्रेजी में उनके पर्चे राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं. उन्होंने नार्वे के कवियों उलाव हाउगे व लार्श अमुन्द वोगे की चुनी हुई कविताओं के पुस्तकाकार अनुवाद हिन्दी में किये हैं जो वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, से 2008 तथा 2014 में प्रकाशित हुए. उन्होंने तेजी ग्रोवर के साथ मिलकर एस्टोनिया की प्रसिद्ध कवयित्री डोरिस कारेवा की चुनी हुई कविताओं का अनुवाद किया है जो संग्रह 2022 में राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, से प्रकाशित हुआ. उन्होंने पंजाबी के सात कवियों की कविताओं का अनुवाद किया है जो संग्रह 2022 में सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर, से प्रकाशित हुआ. इसके अलावा उन्होंने पाँच अन्य पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद किया है. वे भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, तथा विकासशील समाज अध्ययन केन्द्र, दिल्ली, में फ़ेलो रहे हैं. वे “इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली”, मुंबई, के सहायक-सम्पादक तथा श्री अशोक वाजपेयी के साथ महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, की अँग्रेजी पत्रिका “हिन्दी: लैंग्वेज, डिस्कोर्स, राइटिंग” के संस्थापक सम्पादक रहे हैं. वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली, में विजिटिंग फ़ेलो भी रहे हैं. इस सबसे पहले वे भारतीय सेना में अफ़सर (कैप्टन) भी रहे हैं. |

रुस्तम सिंह:


बहूत intensive poems है, भाषा को ऐसे बूँद बूँद बरता है, कि, देखते ही बनता, कविता, कैसे इतने कम शब्दों में संसार और तनाव को एक साथ खींच सकती है। अनुवाद के उस्ताद हैं, रुस्तम।
इन कविताओं में कायनात एक भरपूर उपस्थिति है। सबसे अधिक आग, अपनी मानवीय विकलता में।
दृश्य बहुत शांत है, लेकिन भीतर जैसे कोई घाव रिसता है। सरल शब्दावली में छिपा है एक गहरा विध्वंस। बंदरगाह पर प्रतीक्षा…, अस्थियों वाले कलश की छवि…
मनुष्य की टूटी हुई संवेदनाओं का भूगोल रचने वाले भावों से गुजरना अच्छा लगा।
“इन्द्रधनुष को फाड़… जैसी पंक्तियाँ बताती हैं कि अनुवादक सिर्फ अर्थ नहीं, अन्तर्लय और दृश्य-भाषा को भी पकड़ता है।
बहुत ही बेहतरीन कविताएं और अनुवाद किसी लंबी कहानी से गुजरने जैसा
तुम क्या खोज रहे हो
इस क्षणभंगुर जल में
ओ नारसीसस
कम शब्दों में कही हुईं ये बहुत इंटेंस कविताएँ हैं।
कवि और अनुवादक दोनों के टेम्प्रामेंट का एक विरल संयोजन।
इनमें इतनी मनुष्यता है और इतनी करुणा कि यह देर तक साथ ठहरती हैं।
अंचित
कम से कम शब्दों में बेचैनी की ऐसी तीव्रता को अभिव्यक्ति देना गहन मानवीय संवेदना से ही संभव है।यही कवि रोज़े को विशिष्ट बनाता है। अनुवाद भी बहुत सुन्दर है।