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Home » आत्महत्या के विचार के इर्दगिर्द : बाबुषा कोहली

आत्महत्या के विचार के इर्दगिर्द : बाबुषा कोहली

रूटीन की निरर्थकता भी एक सामाजिक आत्महत्या ही है. आत्महत्या के विचार की सुरंग में प्रवेश करती बाबुषा कोहली की ये कविताएँ अंतत: स्मृति और स्पर्श के सहारे जीवन की ओर अपना रास्ता पुनः पहचान लेती हैं. रोशनी को पहचानने की कविता में बदल जाती हैं. आत्महत्या के विरुद्ध उठाया गया हर कदम जीवन की ओर लौटने की एक निर्णायक हरकत में बदल जाता है. शब्दों की डोर बाहर खींच लाती है. इन रचनाओं में रचनात्मकता नीरस नियमितता का प्रतिपक्ष मात्र नहीं बनती, वह उसके विरुद्ध एक सुदृढ़ नैतिक और सौंदर्यात्मक तर्क भी प्रस्तुत करती है. प्रस्तुत हैं कविताएँ.

by arun dev
December 6, 2025
in कविता
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आत्महत्या के विचार के इर्दगिर्द : बाबुषा कोहली
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आत्महत्या के विचार के इर्दगिर्द
बाबुषा कोहली

 

१.

अपने नाम की गूँज की ख़ातिर

जब एक इंसान आत्महत्या का इरादा करता है
कोई बता सकता है कि तब उसके भीतर क्या चलता है

मन के आर-पार एकदम साफ़-साफ़ देख पाने वाली
कोई मशीन होती
तो मैं ढूँढ़-ढूँढ़ कर ऐसे लोगों से मिलती
जो अपने आपको ख़त्म कर देने का मन बना लेते हैं

देखना चाहती हूँ ख़ुद को मारने के पहले
इंसान कैसा दिखता है? वह ज़िंदा दिखता है या फिर
मुर्दा दिखता है?

जैसे दफ़्तर में दाख़िल हो चुका मुलाज़िम
बड़े साहब को दिख रहा होता है कि वह प्रेज़ेंट है
फिर भी बायोमेट्रिक मशीन में अंगूठा लगाकर
अपनी आमद को दर्ज करता है

क्या आत्महत्या करने वाला पहले ही मर चुका होता है
और ख़ुद को मारकर केवल एक खानापूर्ति करता है ?
या फिर एक आख़िरी बार अपने ज़िंदा होने का सबूत देता है किसी धमाके की तरह; जिसकी गूँज
हमेशा सुनाई दे

जैसे आज तक सुनाई पड़ती हैं
हिरोशिमा-नागासाकी में हुए धमाके की गूँजें

 

 

२.

वे

मृत्यु के साथ इतना सहज है मेरा संबंध
जैसा किसी बच्चे का अपनी माँ के साथ होता है
कम थी उम्र जब पक्की नींद में मुझे स्वप्न हुआ
कि जीवन एक खेल है

दिन भर खेल के मैदान में धमाचौकड़ी मचाने के बाद
जैसे बच्चे के कान उमेठते, खींचते या दुलारते हुए
माँ घर ले जाती
फिर छाती से चिपका कर सुलाती है
वैसे ही एक दिन मृत्यु को मेरे पास आना है
दिन डूबने का वास्ता दे मुझे साथ ले जाना है
और दुनिया की सबसे मीठी लोरी सुनाना है

मृत्यु मेरी परम माता है; अपनी माँ से
मैं नहीं डरती

ज़ोर-शोर से शामिल हूँ खेल में
कई बार चुप्पियों की ओट में चले जाना भी खेल का हिस्सा है
मन ही मन इंतज़ार किया करती हूँ माँ के आने का
शान से जाऊँगी उसकी अँगुली थामे कूदते-उछलते
या चुपचाप उसकी गोदी में बैठे पीछे छूटे
मैदान को देखते

बहुत सोचती हूँ उन लोगों के बारे में
जो दुनिया के सामने यह साबित करना चाहते हैं
कि वे जीवन की अनचाही औलादें हैं
पीड़ित और पराजित
तिरस्कृत और अपमानित

चाहते हैं कि माँ उन्हें गोद ले ले
मानो वे बताना चाहते हों कि इस ख़ुदगर्ज़ और
बेदिल दुनिया में उनका भी कोई अपना है
सरनेम जोड़ना चाहते हैं
अपने नाम के साथ हमेशा के लिए
कि जब भी कोई याद करे उन्हें
दत्तक माता के नाम के साथ याद करे

वे थक गए हैं
माँ की गोदी में सोना चाहते हैं

 

pinterest से आभार सहित

३.

गले लगाना (एक)

मेरा बस चले तो एक एजेंसी खोल लूँ
जहाँ मेरा और मेरी टीम का एक ही काम हो
दुनिया भर में ऐसे लोगों की खोज करना
जो आत्महत्या करने वाले हैं

मैं उनके पास जाऊँगी
उन्हें गले लगाऊँगी
और तब तक अपनी छाती से चिपकाए रखूँगी
जब तक उन्हें यह एहसास न हो जाए
कि उनकी माँ पास है
साथ है

समझने-समझाने के लिए मेरे पास कुछ ख़ास नहीं
बस एक आभास है कि किसी को
ज़ोर से गले लगा लो
तो थोड़ी दूर खिसक जाती है मृत्यु
गले लगाने की अपनी बारी का इंतज़ार करते हुए

 

४.

गले लगाना (ख)

पन्ना-पुखराज के बारे में नहीं जानती
तांत्रिक-ओझा को नहीं जानती

थोड़ा-बहुत समझती हूँ गले लगने-लगाने की कीमिया
गले लगाने से समस्या भले न हल हो
बड़े-बड़े संकट टल जाते हैं

यक़ीन न हो तो आज़मा कर देख लीजिए
मुसीबतें आपके गले पड़ गई हों
आप किसी दोस्त के गले पड़ जाइए
चिपक जाइए अपने दोस्त के सीने से
या दोस्त मुश्किल में हो
तो आप उसे ज़ोर से गले लगा लीजिए

रुपए-पैसे से ऊपरी अड़चनें सुलझती हैं; अंदरूनी नहीं
धन के पास न कभी था
न होगा आत्मा की भूख का भोजन

गले लगाने से कुछ हल नहीं हो जाता
बस ! लगती है सुरति कि एको अहं द्वितीयो नास्ति
गले लगाने से जंग भले न थमती हो
भिन्नता कुछ कम होती है
जागती है एक धुँधली स्मृति कि दो लोग
‘दो’ नहीं होते

जैसे सटे हुए दो पेड़ों की छाया
दो नहीं होती

 

५.

गले लगाना (तीन)

पेड़ तुम्हारी भाषा नहीं समझता
वह चीन्हता है उस हवा को
जो तुम्हारी साँसों में रहती है मुसलसल जागते-सोते

गले लगने के लिए कोई दोस्त न हो
तो किसी पेड़ से लिपट जाना
तुम पेड़ को जानो
न जानो
पेड़ तुम्हें जानता है

कारीगर ने दुनिया को स्मृति के एक पतले तार से बुना है
यहाँ कुछ ऐसा नहीं
कोई भी नहीं
जिस पर परिचय के निशान न पड़े हों

देखना आसपास
शायद कुछ पेड़ इंतज़ार में खड़े हों

 

pinterest से आभार सहित

६.

सह-अनुभूति

मृत्यु नहीं
मुझे आत्महत्या विचलित करती है

ज़िया ख़ान मरी— मुझसे खाना छूटा रहा दिनों दिन तलक
रोहित वेमुला मरा— मैं सीधे अस्पताल पहुँच गई
दो बोतल गुलकोस चढ़ाया गया
सुशांत सिंह मरा— मेरी रातों की नींद उड़ गई
दवाइयाँ खिला कर सुलाया गया

मोहल्ले के बच्चों के साथ हुई लड़कपन की लड़ाइयों में
मेरी माँ ने मुझे शायद ही कभी बचाया हो
पर न्यूज़ चैनलों से मुझे बचाने का जतन करती रहीं
आज भी बचाती हैं

आड़े-टेढ़े रास्तों से होते हुए अंजाने
या जाने-पहचाने लोगों की आत्महत्या की ख़बरें
मुझ तक पहुँचती रहीं
उनके साथ थोड़ा-थोड़ा मैं भी मरती रही

सोते हुए मेरा दम कई बार घुटा है
जैसे गले पर कोई फंदा कस रहा हो
कितनी बार बेबात उल्टियाँ हुई हैं मानो
फ़िनायल पी लिया हो

एक दिन वह तकनीक खोज ली जाएगी
जिससे पता चलेगा कि जंगल में जब
एक पेड़ कट कर गिरता है
समूचा जंगल शोक में डूब जाता है

लकड़हारा पेड़ काट कर आगे बढ़ जाता है

हज़ारों पेड़ों की हरी हँसी से बनता है जंगल
एक पेड़ की मौत पर मर जाता है

 

७.

पहचान

कोई आत्महत्या
आत्महत्या नहीं होती
अपने आपको कोई नहीं मारता
मार नहीं सकता

हर आत्महत्या
दरअस्ल हत्या होती है
सोची-समझी साज़िश के तहत
धीमे-धीमे की गई हत्या

कोई नहीं पकड़ पाता हत्यारों को
वे छुप जाते हैं घड़ियाली आँसुओं और शोक-संदेशों के पीछे

हत्यारों को पहचानना बहुत मुश्किल नहीं
वे अपना काम तमाम करने के बाद
अक्सर सावधान मुद्रा में खड़े होते हैं और
ज़रूर रखते हैं दो मिनट का मौन

 

 

८.

आप चुप रहिए, प्लीज़ !

आत्महत्या कायरता नहीं है
बहुत हिम्मत चाहिए उस डोर को काट देने के लिए
जिसके सहारे अपनी जानी-पहचानी हर एक चीज़ से
कोई जुड़ा है

मैं आत्महत्या की वकालत नहीं कर रही
न यह कह रही कि यह कोई गर्व करने योग्य कृत्य है

मैं बस मामूली-सी एक बात कह रही हूँ कि
जिसकी कंपकंपाती आवाज़ को
अपनी आवाज़ की गर्माहट से आपने कभी न सेंका
जिसकी घुटी हुई रुलाई को खुलकर बह निकलने की
ज़रा-सी जगह तक न दी

जिसके टूटे सपनों की किरचें कभी न समेटीं
जिसकी भाषा के व्याकरण को कभी न समझा
जिसकी तितर-बितर साँसों को कभी न सहेजा
जिसकी सुन्न पड़ती जा रही आँखों में कभी न झाँका

उसे कायर कहने का अधिकार
आपके पास नहीं है

आप चुप रहिए, प्लीज़ !

 

 

९.

बुद्ध का दुःख

हत्यारे को पछतावा नहीं होता

सैकड़ों लोगों का ख़ून बहा कर जो पछताया था
वह अंगुलिमाल नहीं था
बुद्ध ही था

सारे दुःख ओछे हैं
केवल बुद्ध का दुःख गहरा है

सारी आत्महत्याएँ स्व-देह हत्या हैं
केवल बुद्धों की मृत्यु आत्म-निवृत्ति है
आत्महत्या नहीं
आत्म से भी मुक्ति !

 

pinterest से आभार सहित

१०.

आउट होने के पहले

पुरानी बात है
बहुत पुरानी बात
अब तो लगता है जैसे
किसी और जन्म की बात हो

एक बार मुझमें भी ख़ुद को मारने की इच्छा जागी
कोई ख़ास वजह न थी
बस कुछ निराशाएँ चढ़ गई थीं हताशा का पहाड़
और वहाँ अवसाद का झण्डा गाड़ दिया था

दुनियावी सफलता-असफलता से कभी न रहा
मेरे अवसाद का संबंध
बस यह कि दुनिया प्लास्टिक की लगती
सब कुछ झूठ लगता
किसी पर भरोसा न होता
जीवन व्यर्थ लगता
दिन-रात एक से नीरस लगते
खाने का स्वाद थर्माकोल-सा लगता

एक बार बचपन में खेल-खेल के दौरान मैंने
थर्माकोल की बरफ़ी बनाई थी
तब से जीभ को थर्माकोल का स्वाद पता है
पर बचपन के उस खेल की मिठास
थर्माकोल के निपट बेस्वाद एहसास पर भारी पड़ गई

इस तरह लगभग आउट होते-होते
मैं खेल में बच गई

 

 

११.

तरकीब

एक बार मेरे कल्याण-मित्र ने मुझसे कहा
वे समझ सकते हैं मेरे घोर अवसाद की बात
पर मान नहीं पाते कि मैं
कभी आत्महत्या के बारे में सोच सकती हूँ

यह मुझ पर उनका भरोसा था

भले ही आपमें ख़ुद को मार देने की हिम्मत हो
पर जीवन में कम-अज़-कम एक इंसान ऐसा होना चाहिए
कि उसका भरोसा तोड़ने की आपमें क़ुव्वत न हो
किसी का भरोसा बचाए रखने के लिए
मैं सौ बार आत्महत्या स्थगित कर सकती हूँ

किसी पर भरोसा करना
उसे ज़िंदा रखने की एक तरकीब भी है

 

 

१२.

एक सुंदर सुसाइड नोट लिखने के पहले

जीवन के व्यर्थता-बोध ने मुझे उकसाया
तब ख़ुद को मारने का ख़याल मुझे आया

सुसाइड नोट लिखने के लिए
मैंने पेन और डायरी उठाई
एक सुंदर पंक्ति की तलाश में कई रातें
जागते हुए बिताईं

एक सपाट संदेश लिख कर मैं नहीं मर सकती थी
मेरी मौत का ज़िम्मेदार कोई नहीं है
यह झूठ लिखकर मैं नहीं मर सकती थी

मैं एक पंक्ति लिखती
और असंतुष्ट होकर काग़ज़ को गुड़ी-मुड़ी कर फेंक देती
फिर एक और पंक्ति लिखती
मुँह बिरा कर उसे भी काट-पीट देती
इस तरह एक के बाद पंक्तियों को ख़ारिज करते
कई-कई पंक्तियाँ लिख गई

एक समय अपने कमरे में
मैंने मुड़े-तुड़े काग़ज़ों का टीला बना लिया था
जिसकी चोटी पर बैठकर मैं ध्यान लगाया करती

धीरे-धीरे मरने की बात पीछे चली गई
और एक सुंदर पंक्ति की तलाश में मैं रम गई

तो
जब मैं कहती हूँ
मुझे कविता ने बचाया है
इसे हल्के में मत लीजिएगा, दोस्तों
कविताई मत समझ बैठिएगा
लफ़्फ़ाज़ी मत मान बैठिएगा

कविता ने मुझे बचाया है
वह हमेशा मुझे बचाती है
यह ठीक वैसा ही सच है

जैसे पृथ्वी
सूरज से जीवन पाती है

 

 

१३.

अब मुझे आना चाहिए

फिर एक दिन वह पंक्ति मुझे मिल गई
वही, जिसके इंतज़ार में कागज़ों के टीले पर
ध्यानस्थ हो गई थी

“अब मुझे जाना चाहिए !”

इस एक पंक्ति ने मेरे भीतर सब कुछ बदल दिया
मैं टीले से नीचे उतर आई
अब मुझे पालथी मारकर ध्यान में बैठने की ज़रूरत न रही
ध्यान की आदत या अभ्यास या मुद्रा
जीवन में सहज चली आई

उसके बाद ताबड़तोड़ कई पंक्तियाँ आईं
मसलन कि

“अब मुझे आना चाहिए !”
“अब मुझे रहना चाहिए !”
“अब मुझे जीना चाहिए !”
“अब मुझे जागना चाहिए !”
“अब मुझे देखना चाहिए उस साँस को
जिसकी मैंने अब तक अनदेखी की !”

पिछली सदी की बात लगती है जब
एक सायकियाट्रिस्ट से मिली थी
दो-तीन सेशन्स में ही लगा मुझे उसकी नहीं
उसे मेरी ज़रूरत है

कुछ सालों बाद सुनने में आया कि उसने
आत्महत्या कर ली है

घोर अवसाद के दिनों में यह पंक्ति
मुझ तक आई

जो जाने का रास्ता है, वही आने का रास्ता है!

 

बाबुषा कोहली
जबलपुर

प्रकाशन : पहला कविता-संग्रह ‘प्रेम गिलहरी दिल अखरोट’ (2014) भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित व पुरस्कृत. गद्य-कविता संग्रह ‘बावन चिट्ठियाँ’ (2018 ) रज़ा पुस्तक माला के अंतर्गत राजकमल से प्रकाशित व वागीश्वरी पुरस्कार से सम्मानित. कथेतर गद्य ‘भाप के घर में शीशे की लड़की’ (2021) रुख़ पब्लिकेशन्स से प्रकाशित. कविता-संग्रह ‘तट से नहीं…पानी से बँधती है नाव’ ( 2021) हिन्द युग्म से प्रकाशित. कविता-संग्रह ‘उस लड़की का नाम ब्रह्मलता है’ (2023 ) रुख़ पब्लिकेशन्स से प्रकाशित. डायरी ‘मिज़राब’ (2023) आवाज़घर से प्रकाशित. हाल ही में रुख़ पब्लिकेशन्स से पहला उपन्यास ‘लौ’ प्रकाशित व शब्द शिल्पी पुरस्कार से सम्मानित.

ऑटम पब्लिकेशन्स, पटियाला द्वारा ‘भाप के घर में शीशे की लड़की’ का पंजाबी अनुवाद प्रकाशित. वर्णमुद्रा प्रकाशन, शेगाँव द्वारा पहले कविता-संग्रह ‘प्रेम गिलहरी दिल अखरोट’ का ‘ईश्वर मला गुणगुणतो दीप रागासारखा’ शीर्षक से मराठी अनुवाद प्रकाशित. कैलिबर पब्लिकेशन, पटियाला द्वारा ‘उदास कुड़ी दा हासा’ शीर्षक से प्रतिनिधि कविताओं का पंजाबी अनुवाद प्रकाशित. मराठी, बांग्ला, तेलुगू, पंजाबी, गुजराती, उर्दू, संस्कृत, उड़िया, मैथिली, नेपाली, स्पैनिश, फ़्रेंच तथा अंग्रेज़ी में कविताएँ अनूदित. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ व गद्य प्रकाशित.

अन्य : दो लघु फ़िल्मों ‘जंतर’ तथा ‘उसकी चिट्ठियाँ’ का निर्माण व निर्देशन. रसूडॉक्स सिनेमा, जबलपुर द्वारा कहानी ‘हमीं अस्तो’ पर लघु फ़िल्म का निर्माण.

संपर्क
baabusha@gmail.com

Tags: 20252025 कविताएँआत्महत्या के विचार के इर्दगिर्दबाबुषा कोहलीबाबुषा कोहली की नई कविताएँ
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Comments 8

  1. जावेद आलम ख़ान says:
    2 months ago

    आत्महत्या पर इतनी गहराई से इतनी संख्या में कविताएं इससे पहले नहीं पढ़ीं। बेहतरीन कविताएं।

    Reply
  2. रितु वर्मा says:
    2 months ago

    सच है कि जो जाने का रास्ता है वही आने का भी है ।
    सुन्दरता हमेशा सच के करीब होती है।

    Reply
  3. पूनम पांडेय says:
    2 months ago

    इन कविताओं के बारे में क्या कहूं….. सिर्फ इन एहसासों को समझा जा सकता है… मुझे लगता है हर भावुक व्यक्ति के जीवन में कभी ना कभी ऐसा दौर ज़रूर आता है, यह और बात है, कि कोई इन भावनाओं के साथ बह जाता है, और कोई पता नहीं कैसे.? कौन से तिनके का सहारा लेकर बाहर आ जाता है …जीवन को समझना आसान नहीं है…सब परमात्मा की माया है

    Reply
  4. मंजुला रतन says:
    2 months ago

    जब अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए शब्द ही न मिले तो ऐसे में कैसा लगता है आप भली-भांति समझतीं होंगी। कविताओं को पढ़कर आँखों से आंसू झर पड़े बाबुषा जी साथ में शब्द भी खो गए सिर्फ एहसास बाकी रहा।

    Reply
  5. SANTOSH SINGH RAKH says:
    2 months ago

    अब मैं क्या ही कहूं, बाबुषा के लिए । कह भी नहीं सकता। औकात नहीं है मेरी। पर हां, जब भी मौका मिला या कोई बहाना मिलता, मिलने का प्रयास करता हूं उनसे वर्चुअली, उनकी कविताओं के माध्यम से। मैने एक पूरी दुनिया बसा रखी है उनकी, अपने आस पास , जिसमें असंख्य केवल मैं पाया जाता हूं। असल में वे लेखिका हैं ही नहीं । वे एक थेरेपिस्ट हैं stethoscope को थामे । एक फकीर हैं हाथ में चिमटा लिए मेरे इर्द गिर्द । बाबुषा के मामले में मैं थोड़ा नहीं, पूरा स्वार्थी हूँ। आलम यह है कि दिन निकलना अब उन्हीं पर है निर्भर, न जाने कितनी रातें जाया करेंगी बाबुषा। आज की दौर की महादेवी को मेरा नमन 🙏

    Reply
  6. Priynka Pandit says:
    2 months ago

    बहुत दिनों के बाद बहुत सेंसिबल कविताएंँ पढ़ने को मिली.. बहुत बधाई बाबुषा जी..

    Reply
  7. Pallavi Sharma says:
    2 months ago

    बाबुषा को पढ़ना जीवन के मर्मज्ञ ज्ञानी को पढ़ना है! वो ज्ञानी जिसका ज्ञान किताबों से नहीं बल्कि जीवन के अनुभवों की परख से आया है! उनकी संवेदनशीलता बैचेन नहीं करती, आध्यत्मिक रौशनी से निलाह देती है! जिसने जाना हो सपने में ये संसार एक खेल है वो जानता है जीवन और आत्महत्या जैसे गंभीर विषयों पे गहराई से लिखना! बाबुषा के जीवन दर्शन और लेखनी को सलाम! समालोचन को बधाई!

    Reply
  8. अपर्णा मनोज says:
    1 month ago

    पता नहीं कैसे यह लड़की सहजता से जीवन जीने की कुंजी थमा जाती है। लड़की मेरी कभी कभी गले लगाने से भी इंसान बचना चाहता है। इगो की फांस निकालना कठिन होता है। अब कुछ तो कबीर तेरी कविताओं में हैं और कुछ बुद्ध तो कितनी आसान लगने लगती हैं चीज़ें। सीधे चित पर आकर लगती हैं बाबू की कविताएं। मन का इलाज है इस लड़की के पास। तसल्ली से फिर से पढूंगी कविताएं। पढ़ने के साथ सुन भी रही हूं। देख भी रही हूं।
    पिछली सदी की बात लगती है जब
    एक सायकियाट्रिस्ट से मिली थी
    दो-तीन सेशन्स में ही लगा मुझे उसकी नहीं
    उसे मेरी ज़रूरत है
    तेरी जरूरत कईयों को है। काम करती रह लड़की।

    किसी पर भरोसा करना
    उसे ज़िंदा रखने की एक तरकीब भी है।

    Reply

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