| इतिहास का विन्यास इतिहास चेतना के भारतीय प्रस्थान और परंपराएँ ___________________________________________________ माधव हाड़ा |
अधिकांश यूरोपीय और उनके अनुवर्ती कुछ आधुनिक भारतीय इतिहासकारों की धारणा यह है कि प्राचीन भारतीयों की इतिहास लेखन में कभी कोई दिलचस्पी नहीं रही. एक तो उनके अनुसार वे दैवीय शक्तियों के समक्ष अपने को नगण्य समझते थे और नगण्यता का कभी कोई इतिहास नहीं होता दूसरे, पारलौकिकता के प्रति उनके आकर्षण ने उन्हें जागतिक जीवन से विमुख कर दिया और तीसरे, इतिहास की बुनियादी ज़रूरत कालबोध उनकी चेतना का हिस्सा नहीं है.[1]
इतिहास संबंधी, जो पारंपरिक भारतीय साहित्य उपलब्ध है, उसमें से अधिकांश में इस कारण कार्य-कारण संबंध ‘युक्तिसंगत’ और ‘आनुभविक’ तर्क पर आधारित नहीं है, इसलिए इन ‘आधुनिक’ इतिहासकारों-विद्वानों की नज़र में अधिकांश ऐतिहासिक भारतीय साहित्य ‘इतिहास’ की आधुनिक अवधारणा के दायरे से बाहर की चीज़ है. अधिकांश भारतीय इतिहास ग्रंथों में उनके हिसाब से ऐसे मिथक और कल्पना निर्भर असंगत तत्त्वों की भरमार हैं, जिन्हें हटाए बिना सही और असल इतिहास से रूबरू नहीं हुआ जा सकता. इतिहासकार रोमिला थापर यह तो मानती हैं कि “प्रत्येक समाज की अतीत की अपनी कल्पना होती है और इसलिए किसी भी समाज को इतिहास निरपेक्ष नहीं कहा जा सकता”[2], लेकिन उनके ‘आधुनिक’ इतिहासकार का निष्कर्ष भी यही है कि प्राचीन भारत की इतिहास की अवधारणा ‘अपरिष्कृत किस्म की है’[3] और यहूदी–ईसाई परंपरा की तुलना में इसमें ‘सुविकसित इतिहास दर्शन के साक्ष्य निश्चय ही सीमित हैं.’[4]
दरअसल इतिहास की यह अवधारणा यूरोपीय है, जिसका विकास मुख्यतः अठारहवीं सदी में प्रबोधनकाल में हुआ. हर जाति-समाज की उसकी अपनी सांस्कृतिक ज़रूरतों के अनुसार इतिहास चेतना और मानक विकसित होते हैं. भारतीय इतिहास चेतना की भी सदियों की अपनी विकास यात्रा है और इस यात्रा के दौरान ही उसकी अवधारणा और अलग मानक विकसित हुए हैं. प्राचीन और मध्यकालीन पारंपरिक भारतीय ऐतिहासिक सामग्री को इस तरह यूरोपीय इतिहास की अवधारणा के मानकों से देखना-परखना दरअसल मध्ययुगीन शरीर में आधुनिक आत्मा के प्रवेश से मध्ययुगीन अनुभव पाने की अपेक्षा करने जैसा है.[5]
विडंबना यह है कि प्राचीन और मध्ययुगीन भारतीय ऐतिहासिक ग्रंथों को समझने में जैसाकि ए.एल. बाशम ने भी कहा है कि
“भारतीय और यूरोपीय, दोनों इतिहासकारों ने बड़े बचकाने तरीक़े से व्यवहार किया है और अब तक इस बात का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया कि उन पूर्वाग्रहों और साहित्यिक प्रथाओं का अध्ययन किया जाए, जिनके अनुरूप वे लिखे गए.”[6]
भारतीयों के अनैतिहासिक होने की यह धारणा इतनी गहरी और बद्धमूल है कि आज भी कुछ आधुनिक इतिहासकार भारत में इतिहास लेखन की शुरुआत ही यूरोपीय ईसाई पादरियों के आगमन और इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना से मानते हैं.[7] गोया भारतीयों को अपनी स्मृति के संरक्षण और व्यवहार की कभी कोई समझ ही नहीं रही. दरअसल इतिहास लेखन और प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय दस्तावेज़ों की ऐतिहासिकता की पहचान के पारंपरिक ढंग में इधर बदलाव हुए हैं और इस लगभग सर्वमान्य धारणा पर कि भारतीय इतिहास सचेत नहीं थे और उनके पास कोई ऐतिहासिक सामग्री नहीं है, काफ़ी पुनर्विचार हुआ है.[8]
भारतीयों में इतिहास चेतना थी, यह अब कई तरह से प्रमाणित है. निरंतर बाह्य आक्र्मणों और प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद भारत में शासकों सहित अन्य लोगों के 90 हज़ार शिलालेख और लाखों पांडुलिपियाँ हैं और इनकी उपलब्धता अब भी ज़ारी है. खास बात बात यह है इनमें समय और स्थान के उल्लेख का आग्रह भी है. श्रुत परंपरा की रचनाओं- वेद, पुराण और और स्मृतियों में भी वंश, चरित आदि भारतीय इतिहास चेतना के प्रस्थान रूप मौजूद हैं. वंश, चरित आदि इतिहास रूप बाद में ऐतिहासिक प्रबंधों के रूप विकसित हुए और मध्यकाल में क्षेत्रीय ज़रूरतों के अनुसार इनका देशज रूपांतरण भी हुआ. काल गणना की भी भारतीयों की अपनी पद्धति थी, जो प्रायः शासकों के शासन वर्ष पर निर्भर करती थी. इतिहास के इन ‘संचित’ रूपों के आधार पर दार्शनिक अरविंद शर्मा सहित कई देशी-विदेशी विद्वानों ने यह मान लिया है कि भारतीयों में इतिहास चेतना रही है.[9]
भारतविद् शेल्डन पोलक के अनुसार
“पारंपरिक भारत में ऐतिहासिक समझ की अनुपस्थिति के संबंध में दीर्घकाल से प्रचलित विचार पर इतिहास लेखन की अलंकरणप्रधान बुनियाद, आख्यान की प्रकृति, शास्त्रीय पुरातनता में इतिहास लेखन का स्वभाव और पूर्व आधुनिक भारत में वास्तव में उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज़ों जैसी इतिहास की अवधारणाओं पर हाल की विद्वता के आधार पर पुनर्विचार की आवश्यकता है.”[10]
उनके विचार में “संस्कृत भारत में इतिहास उस तरह अज्ञात नहीं है, जैसा उसे बताया जाता है.”[11] कमोबेश यही बात जर्मन विद्वान् एम. विंटरनित्ज ने भी कही है- उन्होंने लिखा है कि
“अकसर यह कहा जाता है कि भारतीयों के पास कोई महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक साहित्य नहीं है और इतिहास में उनकी रुचि बहुत कम है. यह सही नहीं है. उनकी इतिहास में दिलचस्पी है, यह वैदिक साहित्य में उपलब्ध आचार्यों की सूची और पुराण-महाभारत की वंशावलियों से प्रमाणित है. यह अलग बात है कि मिथकीय तत्त्व इनमें कुछ हद तक वर्चस्वकारी हैं, लेकिन फिर भी पुराणों में बहुत मूल्यवान् ऐतिहासिक परंपराएँ सुरक्षित हैं.”[12]
कुछ उपनिवेशकालीन यूरोपीय इतिहासकार, जो भारतीयों के स्मृति के संरक्षण के ख़ास प्रकार के ढंग से अवगत थे, उनकी राय पहले से ही अलग थी. उनमें से एक जेम्स टॉड का मानना था कि भारतीय अनैतिहासिक नहीं हैं और उनके पास अपने इतिहास से संबंधित पर्याप्त सामग्री है. उन्होंने एक जगह लिखा कि “कुछ लोग आँख मीचकर यह मान बैठे हैं कि हिंदुओं के पास ऐतिहासिक ग्रंथों जैसी कोई चीज़ नहीं है. मैं फिर कहूँगा कि इस प्रकार के अर्थहीन अनुमान लगाने में प्रवृत्त होने से पहिले हमें जैसलमेर और अणहिलवाड़ा पाटण के जैन ग्रंथ भंडारों और राजपूताना के राजाओं और ठिकानेदारों के अनेक निजी संग्रहों का अवलोकन कर लेना चाहिए.”[13]

1.
हर समाज अपने जीवन दर्शन, विचारधारा, वर्गीय हित सम्बन्ध और सामाजिक-सांस्कृतिक ज़रूरतों के आधार पर अपने ख़ास इतिहास रूप गढ़ता है. सभी देश-समाजों का इतिहास एक जैसा हो, यह केवल औपनिवेशिक दुराग्रह है. भारतीय इतिहास चेतना का विकास अलग ढंग से हुआ, इसलिए ग्रीक-रोमन ईसाई इतिहास के मानकों के बजाय उसको अपने समय, संदर्भ और विचार में ही अच्छी तरह समझा जा सकता हैं. यह धारणा कुछ हद तक सही है कि भारतीय चेतना में जागतिकता का बहुत आग्रह नहीं है और उसमें काल का बोध भी अलग तरह का है, लेकिन यह मानना ग़लत है कि इस कारण यह इतिहास सचेत नहीं है. भारतीयों के पारलौकिकता के आग्रह को जिस तरह से यूरोप में प्रचारित किया गया, सर्वथा वैसा भी नहीं है. पारलौकिकता के साथ भारतीय चेतना में जीवन और जगत का आग्रह भी बहुत निरंतर और सघन है.
भारतीय इतिहास चेतना का विकास काल बोध की जटिल और बहुरंगी भारतीय अवधारणा के कारण अलग तरह से हुआ, इसलिए उसको केवल चक्राकार या एक रेखिक बोध में सीमित नहीं किया जा सकता. कालबोध के ये दोनों रूप, चक्राकारीय और रेख़ीय, हमेशा से उसकी निर्मिति का ज़रूरी हिस्सा रहे हैं. भारतीय समाज कुछ हद तक स्मृति और संस्कार से चक्रीय काल बोध और सनातनता का आग्रही है और यह विश्वास या धारणा उसके आचार-विचार में कमोबेश सदियों से सक्रिय है. भारतीय ऐतिहासिक दस्तावेज़ों में, इस कारण, देशकाल का संदर्भ कुछ हद तक उस तरह से नहीं आता, जिस तरह से ईसाई पद्धति के इतिहास में आता है. कुछ हद तक ‘मीमांसा’ भी भारतीय इतिहास लेखन और उसमें भी ख़ासतौर पर वैदिक दस्तावेज़ों को अलग और ख़ास रूप देती है. मीमांसा से वैदिक साहित्य की सत्ता कालातीत हो जाती है. वेदों में इतिहास की मौजूदगी को समझने के लिए मीमांसा के साथ उनकी अंतरंगता को गहराई से समझा जाना चाहिए. शेल्डन पोलक ने यही आग्रह करते हुए लिखा है कि “वेद के संदर्भगत क्षेत्र पर मीमांसा के विचार हमारे समझने में सहायक हो सकते हैं. मीमांसा वेद की सत्ता को उसकी कालातीतता पर आधारित करती है, और इस तरह वेदों को उनकी संदर्भ्यता से मुक्त करती है.”[14]
ग्रीक-रोमन ईसाई पद्धति में इतिहास के लिए जिस तरह से समय और स्थान के संदर्भ की अनिवार्यता होती है, वह कई बार वेदों सहित प्राचीन भारतीय दस्तावेज़ों में नहीं मिलती. उनमें वर्णित ऐतिहासिक घटनाएँ और व्यक्तित्व कालातीत होकर या अपने समय और स्थान के संदर्भ से मुक्त होकर सब समयों और स्थानों के लिए उपयोगी और प्रासंगिक हो जाते हैं. ऐसी घटनाओं और व्यक्तित्वों को इतिहास की ईसाई पद्धति इसीलिए ‘इतिहास’ के बजाय ‘मिथ’ की श्रेणी में रखती है, जिसका अर्थ इस परंपरा में व्यापक रूप में प्रचारित और मान्य ग़लत धारणा, विचार या विश्वास है, जबकि भारतीय परंपरा ‘मिथ’ में इतिहास का अस्तित्व भी मानती है.
चक्रीय कालबोध और सनातनता के आग्रह के कारण भारतीय इतिहास चेतना समय और भूगोल से बाहर है, यह धारणा भी पूरी तरह सही नहीं है. दरअसल चक्रीय कालबोध में समय का एक रैखिक बोध भी अंतर्निहित है, इसलिए भारतीय इतिहास चेतना का विस्तार ‘प्राकृतिक देशकाल’ में भी दूर तक है और उसकी परंपरा में इसके पर्याप्त साक्ष्य भी हैं. दार्शनिक अरविन्द शर्मा ने तो समय के चक्राकारीय बोध को हिकारत के साथ यह कह कर ख़ारिज कर दिया कि यह “इतना उलटा-पुलटा है कि हमें भूल की दिशा में ले जाता है.”[15] उन्होंने आगे और लिखा है कि “समय की हिन्दू धारणा एकरंगी नहीं है, बल्कि एक बहुरंगी चित्र है. यह एक जटिल अवधारणा है, जिसे केवल चक्राकारीय कहकर समझा नहीं जा सकता.”[16]
अनिन्दिता एन. बाल्सलेव का कथन है कि
“समय का चक्राकारीय विचार हिन्दू बौद्धिक परम्परा का एक मात्र लक्षण न हो कर “किसी विशिष्ट ब्राह्मणवादी” विचारधारा तक का लक्षण नहीं है; यहाँ तक कि यह किसी वाद-विवाद का विषय भी नहीं है.”[17]
स्पष्ट है कि समय का चक्राकारीय विचार हिन्दू बौद्धिक परम्परा का एक मात्र लक्षण नहीं है. हिन्दू दार्शनिक परम्पराएँ विविध प्रकार की हैं और तदनुसार इसकी इतिहास चेतना भी केवल चक्रीय कालबोध तक सीमित नहीं है. देशकाल की चेतना भी इसमें निरंतर और सघन है और इसकी परंपरा में इसके पर्याप्त साक्ष्य भी हैं. नंदकिशोर आचार्य के शब्दों में कहें तो
“इतिहास अंततः देशकाल में मानवीय क्रियाशीलता का बोध ही तो है. इस दृष्टि से देखें तो एक प्राकृतिक देशकाल में अपनी अवस्थिति, स्थापना और पहचान एक सामान्य भारतीय व्यक्ति के दैनंदिन जीवन में हर अवसर पर दिखाई देती है.”[18]
देशकाल में अपनी पहचान का उसका यह आग्रह उसके जीवन में कई रूपों में दिखायी पड़ता है. एक तो वह हर महत्त्वपूर्ण आनुष्ठानिक कार्य देशकाल का संदर्भ देकर ही करता है, दूसरे, वह अपने पूर्वजों की स्मृति को लेकर बहुत सचेत है- वह उनकी स्मृति को वंशावली, बही आदि के रूप में सुरक्षित रखता है और उसकी इस सजगता के कारण इस कार्य की पेशेवर दक्षता रखने वाली चारण, भाट, राव, तीर्थस्थानों के ब्राह्मण आदि कई जातियाँ सदियों से यहाँ हैं और तीसरे, कर्मफल और पुनर्जन्म में उसका विश्वास यह सिद्ध करता है कि उसका वर्तमान उसके अतीत का फल अर्थात् यह उसके इतिहास से उत्पन्न है. भारतीय वंशावली अभिलेखों के अध्येता विद्वान् माइकेल विटज़ेल ने माना है कि भारतीय परंपरा में ऐतिहासिकता के साक्ष्य पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं. उपलब्ध भारतीय ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अध्ययन के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि “भारतीय ऐतिहासिक लेखन के बारे में जैसाकि आधी सदी पहले सोचा गया था, उससे अलग, अब यह सुरक्षित रूप से कहा जा सकता है कि कम-से-कम मध्यकालीन इतिहास के संबंध में कई स्रोत मौजूद हैं. इसमें बहुत-सी नई खोजी गई सामग्री है, जो हालाँकि पहुँच के अभाव में अभी तक सही तरीके से उपयोग नहीं की गई है. ये स्रोत संभवतः एक साथ मिलकर उतनी बड़ी मात्रा में हैं, जैसे कि अन्य सभ्यताओं में पाये जाते हैं. यहाँ तक कि इनमें पुराने, मध्ययुगीन यूरोपीय अर्थ में भी ऐतिहासिक लेखन मिलता है.” उन्होंने यह भी पाया कि भारत में
“ऐतिहासिक लेखन की कमी और ऐतिहासिक बोध का कथित अभाव, भारतीय सभ्यता के धार्मिक और दार्शनिक सिद्धांतों के बजाय, बड़े पैमाने पर हुईं मध्ययुगीन इतिहास की दुर्घटनाओं के कारण अधिक है.”[19]
दर्शन और विचारधारा का प्राचीन भारतीय कवि-इतिहासकार के नज़रिये पर व्यापक और गहरा प्रभाव है और यह बहुत स्वाभाविक है. कर्मफल में विश्वास के कारण वह अपने चरित्रों के दुर्भाग्य और सौभाग्य को तयशुदा दिशा में ले जाता है और इस कारण घटनाएँ इसमें कई बार अपनी सहज गति से परिचालित नहीं होतीं. इसी तरह मनुष्य की अपार शक्ति और सामर्थ्य में उसका भरोसा भी उसके चरित-नायकों को कई बार अतिमानवीय बना देता है. प्राचीन भारतीय ऐतिहासिक व्यक्तित्वों में इसलिए पौराणिक और अतिमानवीय तत्त्वों की भरमार मिलती है. दर्शन और विचारधाराएँ केवल भारतीय कवि-इतिहासकार को प्रभावित-प्रेरित करती हैं, ऐसा नहीं है. ऐसा कमोबेश सभी सभ्यताओं के इतिहास में होता है. भारतीय इतिहास के मुस्लिम वृत्तांतकारों पर इस्लाम के दर्शन और विचारधारा का गहरा प्रभाव है और उन्होंने हर छोटा विवरण इसके प्रभाव में लिखा है. आधुनिक इतिहासकार भी इनसे सर्वथा अप्रभावित है, यह मानना ग़लत होगा. हमारे समय में पौराणिक तत्त्वों से तो इतिहास ने अपने को कुछ हद तक अलगा लिया है, लेकिन अब विचारधाराएँ और विमर्श उस पर काबिज़ हो गए हैं और इनका बहुत गहरा, मुखर और पारदर्शी प्रभाव उस पर कई बार बहुत साफ़ दिखता है. इतिहासकारों के एक वर्ग ने तो विचारधारा के प्रभाव में मानवीय सभ्यता के इतिहास को ही एक तयशुदा साँचे में सीमित कर दिया.
भारतीय इतिहास परंपरा को इस निगाह से नहीं पढ़ा-समझा गया कि इतिहास अंततः अतीत के यथार्थ का अमूर्तन है. इतिहास लेखन की यूरोपीय पद्धति में वस्तुनिष्ठता या प्रत्यक्षवाद पर निर्भरता का आग्रह इतना बढ़ा कि यह भुला ही दिया गया कि इतिहास में इतिहासकार के व्यक्ति की भी निर्णायक भूमिका होती है. यह तो ई.एच. कार ने भी कहा था कि
“इतिहास के तथ्य कभी हमें शुद्ध रूप में नहीं मिलते, क्योंकि शुद्ध रूप में न वे कभी रहते हैं और न रह सकते हैं; वे हमेशा लेखक के मस्तिष्क में रंगकर आते हैं.”[20]
यह यथार्थ का एक तरह से अमूर्तन है, लेकिन यह इतिहास की नियति भी है. विडंबना यह है कि पूर्व आधुनिक भारतीय ऐतिहासिक दस्तावेज़ों को इस निगाह से पढ़ा-समझा ही नहीं गया. यूरोपीय इतिहासकारों की मनोरचना को आधार बनाकर निकाले गए निष्कर्षों को भारतीय ऐतिहासिक दस्तावेज़ों पर लागू कर दिया गया, जबकि पूर्व आधुनिक भारतीय इतिहासकारों की धार्मिक-सांस्कृतिक मनोरचना उनसे बहुत अलग थी. इतिहास में काल और स्थान को लेकर उनकी दार्शनिक और आध्यात्मिक धारणाएँ और विश्वास अलग थे. उन्होंने अतीत के यथार्थ का अमूर्तन भी तदनुसार किया. गाथाएँ, आख्यान आदि भारतीय इतिहास के ऐसे रूप हैं, जिनमें इतिहासकार की अपनी विचारधारा और मनोरचना की महत्त्वपूर्ण भूमिका है.
प्राचीन भारतीय इतिहासकार, केवल इतिहासकार नहीं हैं, वे कवि-इतिहासकार हैं. भारत में इतिहास लेखन की परंपरा हमेशा दरबारी कविता से संबद्ध रही है. तथ्य पर निर्भरता के साथ भारतीय इतिहासकारों का आग्रह उसको कविता में रचना-बाँधना भी है. वे इसीलिए तथ्यों को उल्लेख तो करते हैं, लेकिन उनके विवरणों में नहीं जाते. विवरणों के स्थान को वे अकसर अपनी कल्पना से भरते हैं. कई बार तथ्य की भूमिका उनकी कल्पना को उकसाने तक ही सीमित रहती है. कल्पना और इतिहास एक-दूसरे के विरुद्ध हैं, यह धारणा सही नहीं हैं. दरअसल “कल्पना की भी इतिहास बोध में निर्णायक भूमिका होती है.”[21]
भारतीय कवि-इतिहासकार के कवि स्वभाव के संबंध में एक ख़ास बात और है, जिसकी ओर हजारीप्रसाद द्विवेदी ने ध्यान आकृष्ट किया है. उनके अनुसार कवि-इतिहासकार कई बार यथार्थ के बजाय उसकी संभावना पर अधिक ध्यान देने लगता है. वे लिखते हैं कि “राजा के शत्रु होते हैं, युद्ध होता है, और भी तो हो सकते थे. कवि संभावना को देखेगा. राजा के एकाधिक विवाह होते थे, यह तथ्य विवाहों की संभावना उत्पन्न करता है. जलक्रीड़ा और वन विहार की संभावना की ओर संकेत करता है और कवि को अपनी कल्पना के पंख खोलने के अवसर देता है.”[22] मध्यकालीन ऐतिहासिक कथा-काव्यों में ऐसी संभावनाओं की भरमार है.
दरअसल प्राचीन भारतीय ऐतिहासिक कथा-काव्यों में उस समय के दर्शन और विचारधारा के अनुसार बनीं ख़ास शैलियों और ढाँचों का इस्तेमाल हुआ है. इनमें विन्यस्त इतिहास कथा-काव्य के बनते–बदलते कवि-कथा अभिप्रायों, समयों और प्रथाओं के बीच में और उनके साथ है. प्राचीन भारतीय कवि-इतिहासकारों के संबंध में ख़ास बात यह है कि वे अकसर अतीत से वही चुनते हैं, जो उनकी रचना के लिए उपयोगी और प्रासंगिक है. वे अतीत के संपूर्ण और निरंतर विवरण में प्रायः नहीं जाते. इतिवृत्तों, प्रबन्धों और आख्यानों में इसलिए शासकों के जीवन के सम्पूर्ण और निरंतर विवरण नहीं, उनके जीवन की कोई घटना या एक चरण है. बाण के हर्षचरित को आधुनिक इतिहासकारों ने अपूर्ण घोषित कर दिया, जबकि वस्तुस्थिति यह है कि रचनाकार के लिए हर्ष का इतना ही जीवन अपनी रचना के लिए अपेक्षित था.[23] प्राचीन इतिवृत्तों में शासकों के जीवन का एक आदर्शक्रम- प्रारम्भ, प्रयत्न, प्रत्याशा, नियताप्ति और फलागम है.[24]
भारतीय इतिहासकारों का ज़ोर इस क्रम के अनुसार उनके जीवन के आदर्शीकरण पर है. आधुनिक इतिहासकारों को इसलिए भारतीय ऐतिहासिक ग्रंथों के विवरण अतिकल्पित और बेतुके लगते हैं. मध्यकाल में शौर्य, पराक्रम और स्वामिधर्म जैसे मूल्य शासकों के अस्तित्व और जनसाधारण में उनकी मान्यता के लिए ज़रूरी थे, इसलिए इतिहासकारों ने इनको ध्यान में रखकर अतीत की पुनर्रचना की. प्राचीन और मध्यकालीन आख्यानों-इतिवृत्तों में इसलिए इतिहासकारों ने इन मूल्यों के लिए लड़ने-मरने वाले वीर नायकों की प्रतिष्ठा की और यह उस समय के प्रचलित दर्शन और विचारधारा के अनुसार है. मध्यकाल में विकसित इतिहास रूपों- प्रबंध, रासो, ख्यात, पाटनामा, चरित आदि में भी वर्णन और कथानक की रूढ़ियाँ बन गईं, जिनका निर्वाह उस समय कवि-लेखक होने की अर्हता थी. रासो ग्रन्थों में युद्ध, ऋतु, नगर, उद्यान आदि का वर्णन भी रूढ़ियों के अनुसार है. वस्तु, कथानक और शैली के मध्यकाल में प्रचलित कवि-कथा समयों को जाने-समझे बिना इन ग्रन्थों को अनैतिहासिक और कल्पित मान लिया गया. रासो ग्रन्थों की ऐतिहासिकता पर आधुनिककाल के आरम्भ में लम्बी बहस हुई और इनके संरचनात्मक ढाँचे को जाने-समझे बिना ही अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों और विद्वानों ने इनको इतिहास के दायरे से बाहर कर दिया.[25]
भारत में कथा की स्वायत्त परंपरा है, लेकिन इतिहास को कथा का रूप देकर ऐतिहासिक कथा-काव्य की रचना की भी यहाँ लंबी और समृद्ध परंपरा है. भारतीय कथा परंपरा की शुरुआत ही ऋग्वेद में ऐतिहासिक कथा संकेतों से हुई.[26] भारतीय मनीषा और चित्त, जो अतीत है या जो बीत गया है, उसको पूरी तरह यथार्थ की तरह रचने का दावा नहीं करता. वह यह जानता है कि अतीत, मतलब जो घट गया, उसका बाद में दिया गया कोई विवरण प्रत्यक्ष और आनुभविक होने पर भी पूरी तरह यथार्थ नहीं हो सकता. यथार्थ का ऐसा विवरण लेखक के आग्रह, रुचि, विचार, समझ, प्रयोजन, विवेक आदि से प्रभावित होकर बदल ही जाएगा.
अतीत का ऐसा कोई भी विवरण हर हाल में यथार्थ नहीं, यथार्थ की पुनर्रचना ही होगा और यह पुनर्रचना इतिहास और कथा का मिलाजुला रूप ही होगी. सही तो यह है कि नाम संज्ञाओं और तिथियों को छोड़कर इतिहास में जो होता है, वह कमोबेश कथा जैसा ही होता है. भारतीय परंपरा में इसलिए आरम्भ से ही इतिहास और कथा की एक-दूसरे में आवाजाही इतनी निरंतर और सघन है कि इनको एक-दूसरे से अलग करके स्वायत्त ढंग से समझा ही नहीं जा सकता. पश्चिम में भी ये दोनों सर्वथा अलग अनुशासन हैं और इन दोनों की अलग परम्पराएँ हैं, सर्वथा ऐसा नहीं है. ‘कथा’ शब्द का प्रयोग भी इस कारण भारतीय वाङ्मय में व्यापक अर्थ में हुआ है और यह लक्ष्य ग्रंथों के आधार पर बदलता भी रहा है. यहाँ सभी प्रकार के ऐतिहासिक-अर्ध ऐतिहासिक चरित काव्यों को ‘कथा’ कहा गया है. तुलसीदास ने एकाधिक बार रामचरितमानस को ‘कथा’ कहा है.[27] इसी तरह विद्यापति ने अपनी रचना कीर्तिलता को ‘कहाणी’ (कथानिका) कहा है.[28]
प्राचीन साहित्य में कथा का प्रयोग एक तो ‘कहानी’ के अर्थ में और दूसरे, अलंकृत काव्यरूप के अर्थ में होता आया है.[29] पंचतंत्र, महाभारत और पुराण के आख्यान और गुणाढ्य की बृहत्कथा सभी की गणना कथा की श्रेणी में ही होती है, लेकिन भामह और दंडी ने इसका प्रयोग विशिष्ट अर्थ में अलंकृत गद्यकाव्य के लिए किया है.[30] दंडी ने आग्रहपूर्वक कथा और आख्यायिका को एक श्रेणी की रचना माना है.[31] रुद्रट ने नवीं सदी में लिखा कि संस्कृत निबद्ध कथाओं को गद्य में लिखने का बंधन है, परंतु अन्य भाषाओं (प्राकृत और अपभ्रंश) में ये पद्य में लिखी जा सकती हैं.[32] स्पष्ट है कि प्राचीन भारतीय साहित्य में कथा का अर्थ केवल कल्पित कहानी नहीं है. आख्यान, आख्यायिका, वंश, वंशानुचरित, चरित आदि ऐतिहासिक और अर्ध ऐतिहासिक रचनाएँ भी इसमें कथा की श्रेणी में रखी जाती थीं. यह विडंबना है कि इतिहास के औपनिवेशिक संस्कार और शिक्षा के कारण हम अपने ऐतिहासिक कथा-काव्य ग्रन्थों को केवल कथा मानकर इतिहास के दायरे से बाहर कर देते हैं. वस्तुस्थिति यह है कि यह स्मृति के रख-रखाव का भारतीय ढंग है. ये रचनाएँ कथा-काव्य के विन्यास में कुछ हद तक इतिहास भी हैं.

2.
भारत में इतिहास और उसके कथा-काव्य में विन्यास की परंपरा बहुत प्राचीनकाल से है. इतिहास का कथा-काव्य की तरह व्यवहार यहाँ बहुत पहले से होता आया है. भारतीय ऐतिहासिक कथा-काव्यों में विन्यस्त इतिहास अपने देश-समाज और संस्कृति के अनुसार अलग और ख़ास तरह का है. चक्रीय कालबोध और सनातनता के आग्रह ने इसे इतिहास को ग्रीक-रोमन ईसाई पद्धति से अलग रूप दिया है, लेकिन इसमें देशकाल की चेतना और संदर्भ की मौजूदगी भी बहुत निरंतर और सघन है. इतिहास सहित इतिहास के 19 आनुषंगिक रूप- ऐतिह्य, पुराकल्प, परक्रिया, अवदान, आख्यान, आख्यायिका, उपाख्यान, अन्वाख्यान, चरित, अनुचरित, कथा, परिकथा, अनुवंश श्लोक, गाथा, नाराशंसी, राजशासन और पुराण भारतीय वाङ्मय में सदियों से चलन में हैं.[33]
यह सही है कि इनमें से कुछ रूप इतिहास के अनुशासन के रूप में अच्छी तरह से विकसित हैं, जबकि कुछ ऐसे हैं, जिनमें इतिहास अविकसित रूप में है, जबकि कुछ ऐसे हैं, जिनमें कथा-कल्पना का तत्त्व बहुत वर्चस्वकारी है, लेकिन यह तय है कि इन सभी में कमोबेश ऐतिहासिक सामग्री किसी-न-किसी रूप में मौजूद है. नाराशंसी, गाथा, आख्यान और पुराण, इतिहास के समानार्थक शब्दों के रूप में यहाँ सदियों से प्रयुक्त हो रहे हैं. इतिहास शब्द का व्यवहार भी वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् ग्रंथों सहित परवर्ती साहित्य में कई जगह मिलता है.
राजाओं के वीरतापूर्ण कार्यों और दानों की सराहना में कहे गए छंद इतिहास के प्राचीनतम भारतीय रूप हैं. ऋग्वेद में इस तरह की कुछ स्तुतियाँ मिलती हैं- एक स्तुति में कहा गया है कि राजानो न प्रशस्तिभिः सोमासो गोभिरंजते. यज्ञो न सप्त धातृभिः॥ अर्थात् जिस प्रकार प्रशस्तियों से प्रशंसित राजा की प्रतिष्ठा होती है तथा सात याजकों द्वारा यज्ञदेव की प्रतिष्ठा होती है, उसी प्रकार गौ-घृतादि से सोमदेव संस्कारित होते हैं.[34]
वेदों में ऐसी रचनाओं को गाथा और नाराशंसी कहा गया है. ये मनुष्यों द्वारा रची गई धर्मेतर रचनाएँ थीं, इसलिए इनको धार्मिक वैदिक ऋचाओं की तुलना में कम महत्त्वपूर्ण समझा जाता था. तैत्तिरीय ब्राह्मण और काठक संहिता में इनको ‘निम्न किस्म’ का कहा गया है और इनका पाठ करने वालों से दान ग्रहण करने की भी निंदा की गई है.[35]
ऋग्वेद में इस तरह की स्तुतियाँ यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि उस समय राजाओं की सराहना और स्तुतियाँ भी छंदबद्ध हो रही थीं. कुछ विद्वान् इस मत के भी हैं कि आरंभ में ऋग्वेद में नाराशंसी और गाथाएँ भी धार्मिक ऋचाओं के बीच-बीच में सम्मिलित थीं, लेकिन कालांतर में इनको निकालकर इसको केवल धार्मिक ऋचाओं तक सीमित कर दिया गया.[36]
परवर्ती ग्रंथ, ख़ासतौर पर निरुक्त और बृहद्देवता ऋग्वेद में इतिहास और आख्यान की मौजूदगी स्वीकार करते हैं. निरुक्त में यास्क एक जगह कहता है कि ऋक्, गाथा और इतिहास का मिलाजुला रूप है.[37] बृहद्देवता तो भागुरि, यास्क और शौनक का संदर्भ देते हुए ऋग्वेद के कुछ सूत्रों को इतिहास की कोटि में रखता है.[38] इसी तरह शाकटायन ने तो ऋग्वेद के एक संपूर्ण सूक्त (10.102) को ही इतिहास सूक्त कहा है- प्रेतीतिहाससूक्तं तु मन्यते शाकटायनः.[39] स्पष्ट है कि आरंभ में गाथा और नाराशंसी धार्मिक और कर्मकांडीय परंपराओं में सम्मिलित थीं, लेकिन कालांतर में इनको धार्मिक परंपरा से अलग कर दिया गया. इस तरह लगता है कि ऋग्वेदकाल में ही धार्मिक और ऐतिहासिक, दो अलग परंपराओं की शुरुआत हो गई थीं. ग़ैर धार्मिक ऐतिहासिक रचनाओं को इसलिए ब्राह्मण[40] और उपनिषद् ग्रंथों[41] तथा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में ‘इतिहास वेद’ (अथर्ववेदेतिहासवेदौ च वेदाः) की संज्ञा दी गई है.[42]
उत्तर वैदिककाल में इतिहास की इस मौखिक परंपरा का विस्तार हुआ और इस दौर में यह मुख्यतः नाराशंसी, गाथा, आख्यान, इतिहास और पुराण के रूप में विकसित हुई. ये सभी इतिहास रूप वैदिक साहित्य में भी थे, लेकिन उत्तर वैदिककाल में आकर ये विशिष्ट साहित्यिक स्वरूप के साथ प्रवृत्तियों के रूप में अस्तित्व में आए. नाराशंसी भारतीय इतिहास की परंपरा का प्राचीनतम रूप है. ऋग्वेद में इसका प्रयोग अलग-अलग रूपों और संदर्भों में एकाधिक स्थानों पर हुआ है.[43] नाराशंसी का विकास इसके व्युत्पत्तिपरक केंद्रीय अर्थ ‘नरों की प्रशंसा या गौरव गान’ के विस्तार से हुआ. निरुक्तकार यास्क ने अपने से पूर्ववर्ती कात्थक्य का संदर्भ देकर इसका अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है कि नाराशंसो यज्ञ इति कात्थक्यः. नरा अस्मिन्नासीना: शंसन्ति. अर्थात् नाराशंस यज्ञ है और नर इसमें आसीन होकर स्तुति करते हैं.[44] बृहद्देवता में यह नरैः प्रशस्य आसीनैर् अर्थात् आसीन होकर नर की प्रशंसा के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है.[45]
एक जगह उसके अनुसार नराशंसमिहैके तु अग्निमाहुरथेतरे अर्थात् कुछ का कहना है कि नराशंस यहाँ अग्नि है. आगे वह फिर कहता है कि नराः शंसन्ति सर्वेऽस्मिन्न् आसीना इति वाध्वरे अर्थात् सब मनुष्य इस पर आसीन होकर प्रशस्तियों का उच्चारण करते हैं, इसे यज्ञ के आशय में ग्रहण करते हैं.[46] निरुक्तकार ने और अधिक स्पष्ट करते लिखा है कि येन नराः प्रशस्यन्ते स नाराशंसो मंत्रः अर्थात् जिस मंत्र से नरों की स्तुति हो, वह नाराशंस मंत्र होता है.[47] आरंभ में नाराशंसी का अर्थ नरों की स्तुति था, लेकिन आगे चलकर ‘नरों द्वारा की गयी स्तुति’ को भी नाराशंसी के दायरे में ले लिया गया. यही नहीं, आगे चलकर मृत पिताओं या पितरों की स्तुति भी इसके अर्थ में जुड़ गयी.[48] कहीं-कहीं तो पितरों को भी नाराशंसी कहा जाने लगा.[49]
ऋग्वेद में नाराशंसी का रैभी (धार्मिक संगीत) और गाथा के साथ भी प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ रचना का एक स्वरूप विशेष है.[50] शतपथ ब्राह्मण नाराशंसी को इतिहास-पुराण के समानांतर रखता है. उसमें कहा गया है कि य एवं विद्याननुशासनानि विद्या वाकोवाक्यमितिहासपुराणं नाराशंसीरित्यहरहः स्वाध्यायमधीते मध्वाहुतिभिरेव तद्देवांस्तर्पयति अर्थात् अनुशासन, विद्या, वाकोवाक्य, इतिहासपुराण, गाथा और नाराशंसी के स्वाध्याय करने से देवों को मधु से पूर्ण आहुतियाँ प्राप्त होती हैं.[51] नाराशंसी की परंपरा आगे भी जारी रही. तैत्तिरीय आरण्यक में उल्लेख है कि यद्ब्राह्मणानीतितिहासान् पुराणानि कल्पान् गाथाः नाराशंसीर्मेदाहुतयो. आशय यह है कि ब्राह्मण, इतिहास, पुराण, कल्प, गाथा और नाराशंसी समान हैं.[52]
याज्ञवल्क्य स्मृति में भी आता है कि वाकोवाक्यं पुराणं च नाराशंसीश्च गाथिकाः. इतिहासांस्तथा विद्याः शक्त्याधीते हि योऽन्वहम्. मांसक्षीरौदनमधुतर्पणं स दिवौकसाम्. करोति तृप्तिं कुर्याच्च पितॄणांमधुसर्पिषा॥ अर्थात् जो वाकोवाक्य, पुराण, नाराशंसी, गाथा, इतिहास और अन्यान्य विद्याओं का प्रतिदिन अध्ययन करता है, वह मांस, क्षीर, ओदन, तथा मधु से देवताओं का तर्पण करता है और अपने पितरों को मधु तथा घृत से तृप्त करता है.[53] स्पष्ट है कि वैदिककाल में नाराशंसी का विकास ऋषियों और राजपुरुषों की प्रशस्ति पर एकाग्र मौखिक इतिहास रूप की तरह हुआ. आरंभ में यह गाथा का एक रूप माना गया और कालांतर में इसे इतिहास-पुराण की परंपरा में समाविष्ट कर लिया गया और इसके तथ्य भी मान्य ऐतिहासिक साहित्य में सम्मिलित हो गए.
गाथा शब्द का व्युत्पत्तिगत अर्थ ‘गै’ (गाना) धातु से निष्पन्न होने के कारण गीत है, लेकिन वैदिक साहित्य में इसका प्रयोग कई अर्थों में मिलता है. आगे चलकर धीरे-धीरे यह साहित्य की एक विधा के रूप में मान्य हो गया. ऋग्वेद संहिता में यह ‘गीत’ या ‘मंत्र’ के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है और इसमें इसका स्तुति, श्लोक और कथा के रूप में भी अर्थ विस्तार मिलता है.[54] ऋग्वेद में ‘गाथपतिं’ गीत का नायकत्व करने वाले व्यक्ति के लिये प्रयुक्त हुआ है.[55] ‘ऋजुगाथ’ शुद्ध रूप से मंत्रों के गायन करने वाले के लिये[56] तथा ‘गाथिन’ केवल गायक के अर्थ में व्यवहृत किया गया है.[57] ऋग्वेद में ही यह शब्द नाराशंसी और रैभी के साथ प्रयुक्त होकर ऐसी रचना के रूप में विशिष्ट अर्थ ग्रहण कर लेता है, जिसमें राजादि के दान, यज्ञादि का वर्णन होता था. यहाँ इसको रैभी और नाराशंसी के साथ रखा गया है. कहा गया है कि रैभ्यासीदनुदेयी नाराशंसी न्योचनी. सूर्याया भद्रमिद्वासो गाथयैति परिष्कृतम्॥[58]
गाथा का रैभी और नाराशंसी के साथ प्रयोग ऋग्वेद संहिता के बाद तैत्तिरीय संहिता[59] और शतपथ ब्राह्मण[60] में भी मिलता है. अथर्ववेद में भी गाथा को इतिहास रूप माना गया. इसमें एक जगह उल्लेख है कि सबृहतीं दिशमनु व्यचलत्. तामितिहासश्च पुराणं च गाथाश्च नाराशंसीश्चानुव्यचलन्॥ इतिहासस्य च वै स पुराणस्य च गाथानां च नाराशंसीनां च प्रियं धाम भवति, य एवं वेद॥ आशय यह है कि व्रात्यस्तोम के प्रसंग में इतिहास, पुराण, गाथा तथा नाराशंसी उसके पीछे-पीछे चली. जो व्यक्ति इसे जानता है, वह इतिहास का, पुराण का गाथाओं का तथा नाराशंसियों का प्रियधाम होता है.[61] ऐतरेय ब्राह्मण के अनुसार ‘गाथा’ मानव से संबंध रखती है, जबकि ‘ऋच्’ देव से संबंध रखता है. आशय यह है कि गाथा मानवीय और ‘ऋच्’ दैवीय होने से अलग मंत्र हैं.[62]
इस तथ्य की पुष्टि शुन:शेप आख्यान के लिये प्रयुक्त ‘शतगाथम्’ शब्द से होती है, क्योंकि शुन:शेप अजीगर्त ऋषि का पुत्र होने से मानव था, जिसकी कथा ऋग्वेद के कई सूक्तों में दी गई है, जिनके मंत्रों की संख्या सौ के आसपास है इसलिए इनको ‘शतगाथम्’ कहा गया है.[63] ऐतरेय ब्राह्मण में भी गाथा शब्द मनुष्य तथा मनुष्योचित विषयों से संबंधित मंत्र के लिए प्रयुक्त हुआ है.[64] ऐतरेय आरण्यक गाथा को ‘ऋच्’ से भिन्न ‘मंत्र’ का एक प्रकार मानता है.[65]ऐतरेय ब्राह्मण के प्रसंग में यज्ञ में विशाल दान देने वाले राजाओं की स्तुति में अनेक प्राचीन गाथाएँ उद्धृत की गई हैं.[66]
आख्यान आरम्भ से ही कथा या ऐतिहासिक वर्णन के अर्थ में प्रयुक्त होता रहा है. आख्यान शब्द का विकास का ‘ख्या’ से हुआ, जिसका व्युत्पत्तिपरक अर्थ ‘कथा’ है. साहित्यदर्पण में आख्यान को ‘पुरावृत्त कथन’ कहा गया है.[67] एस.के. दे के मतानुसार ऋग्वेद के कथात्मक सूक्त वस्तुतः पौराणिक और निजंधरी आख्यान ही हैं.[68] निरुक्त और बृहद्देवता के अनुसार ऋग्वेद की ऋचाएँ आख्यानों से मिलती है.[69] ऋग्वेद में कई आख्यान हैं, जिनमें से कुछ आख्यान तो वैयक्तिक देवता के विषय में हैं और कुछ किसी सामूहिक घटना पर आधारित हैं. ऋग्वेद के भीतर परवर्ती साहित्य में पल्लवित 30 आख्यानों के संकेत मिलते हैं.[70] इनके अलावा इसकी दान स्तुतियों में अनेक राजाओं के नाम उपलब्ध हैं, जिनसे दान पाकर ऋषियों ने उनकी स्तुति में मंत्र लिखे. ऋग्वेद परवर्ती वैदिक साहित्य में भी आख्यान बहुतायत से मिलते हैं, जिनमें से कुछ आख्यान नये हैं, जबकि कुछ ऋग्वेद में संकेतित आख्यानों का ही पल्लवन या विस्तार हैं. बृहद्देवता और निरुक्त में भी इन आख्यानों का उल्लेख आया है.[71]
पुराणों में भी यही आख्यान हैं, लेकिन यहाँ तक आते–आते इनका रूप बदल गया है. शुन:शेप, वसिष्ठ-विश्वामित्र और उर्वशी-पुरुरवा के आख्यान इसके अच्छे उदाहरण हैं. ऋग्वेद में संकेतित शुन:शेप का आख्यान ऐतरेय ब्राह्मण में नए रूप में, उपलब्ध होता है.[72] वसिष्ठ-विश्वामित्र का ऋग्वेद में संकेतित आख्यान परवर्ती वैदिक साहित्य में बदल गया है. ऋग्वेद के प्रख्यात सूक्त (10.95) में पुरुरवा और उर्वशी का संवाद मात्र है, लेकिन आगे चलकर शतपथ ब्राह्मण में यह एक प्रणय गाथा है.[73] आख्यान की स्वीकार्यता इतनी बढ़ी कि उसकी विशेषज्ञता रखने वालों की अलग पहचान होने लगी.[74] आख्यान का अर्थ ऐतिहासिक वर्णन होता है, लेकिन शतपथ ब्राह्मण में आख्यान और इतिहास में भेद किया गया है.[75] आगे चलकर धीरे-धीरे आख्यान इतिहास-पुराण की परंपरा में घुल-मिल गए.
इतिहास भी वैदिककाल में ही एक प्रवृत्ति बन चुका था. आरंभ में इसका व्युत्पत्तिपरक अर्थ ‘इस प्रकार हुआ’ था, लेकिन बाद में इसका विकास हुआ और सभी प्रकार की ऐतिहासिक रचनाएँ इसमें शामिल कर ली गईं. इतिहास का शाब्दिक अर्थ ‘यह निश्चय था’ या ‘वस्तुतः इस प्रकार ऐसा हुआ था’ है. शुक्रनीति में ‘इतिहास’ शब्द का विश्लेषण है. उसमें कहा गया है- प्राग्वृत्तकथनं चैकराजकृत्यमिषादितः. यस्मिन् स इतिहासः स्यात् पुरावृतः स एव हि अर्थात् जिसमें किसी एक राजा के चरित्र वर्णन के व्याज से प्राचीन व्यवहारों का वर्णन हो, उसे इतिहास कहते हैं; इसे ही पुरावृत्त भी कहा गया है.[76] हरिवंशपुराण के अनुसार इतिहास पूर्व घटनाओं की स्मृति होता है या इसमें पूर्व घटनाओं का उल्लेख किया जाता है.[77] निरुक्त भाष्यवृत्ति में दुर्गाचार्य ने इतिहास का आशय स्पष्ट करते हुए लिखा है कि इति हैवामासीदिति यः कथ्यते सः इतिहासः अर्थात् यह निश्चय से इस प्रकार हुआ था, यह जो कहा जाता है, वह इतिहास है.[78] निरुक्त परंपरा के अनुसार ऋग्वैदिक ऋचाओं में ही इतिहास का उल्लेख मिलता है.
यास्क के अनुसार ऋग्वेद में इतिहासयुक्त मंत्र पाए जाते हैं. वह शब्दों और मंत्रों की व्युत्पत्ति और व्याख्या करते हुए एकाधिक स्थानों पर कहता है कि तत्रेतिहासमाचक्षते अर्थात् ऐसा इतिहास की दृष्टि से भी कहा जाता है.[79] इसका एक विद्यानुशान के रूप में पूर्ण और अच्छा उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है.[80] आचार्य शौनक ने बृहद्देवता में महाभारत के युद्ध पर टिप्पणी करते हुए लिखा है कि इतिहासः पुरावृत्त ऋषिभिः परिकीर्त्यते अर्थात् इस विषय का इतिहास ऋषियों द्वारा कीर्तित है.[81] कौटिल्य इतिहास का दायरा बड़ा करता है- वह कहता है कि पुराणमितिवृत्तमाख्यायिकोदाहरणं धर्मशास्त्रमर्थशास्त्रं चेतीतिहासः अर्थात् पुराण, इतिवृत्त, आख्यायिका, उदाहरण, धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र विद्याएँ इतिहास के अंतर्गत हैं.[82] उसके अनुसार अथर्ववेदेतिहासवेदौ च वेदाः अर्थात् अथर्ववेद और इतिहास वेद को वेद कहते हैं.[83] महाभारत के आदि पर्व की ग्रंथ महिमा में इसको एकाधिक बार इतिहास की संज्ञा दी गयी है. एक जगह इसको इतिहासप्रदीपेन अर्थात् यह, भारत के इतिहास का एक जाज्वल्यमान दीपक है, कहा गया है.[84] आठवीं सदी की प्राकृत रचना गउडवहो में वाक्पतिराज ने इतिहास को एवंहास कहा है. उनके अनुसार णंदंति जमेवंहास कारिणो सार-कइणो अ अर्थात् इतिहास लिखने वाले कवि, जिसका अभिनंदन करते हैं.[85]
पुराण शब्द का व्युत्पत्तिपरक अर्थ ‘प्राचीन’ या ‘पुराना’ है. पुराण शब्द का उल्लेख वेद सहित सभी प्रकार के प्राचीन साहित्य में मिलता है. यह विशेषण है, लेकिन अथर्ववेद में संज्ञा के रूप में प्रयुक्त हुआ है, जिसका अर्थ ‘पुरावृत्त’ है. अथर्ववेद के अनुसार ऋच: सामानि च्छन्दांसि पुराणं यजुषा सह अर्थात् पुराणों का आविर्भाव ऋक्, साम, यजुस् और छंद के साथ ही हुआ था.[86] शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि वाचा वै सम्राड्बंधुः प्रज्ञायतऽऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोअथर्वांगिरस इतिहासः पुराणम् विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानानि. अर्थात् हे सम्राट! वाणी से ही ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास प्राच्यविद्या, उपनिषद्, श्लोक सूत्र उत्पन्न होते हैं.[87] छान्दोग्य उपनिषद् ने भी पुराण को वेद कहा है. उसमें कहा गया है कि यजुर्वेदं सामवेदमाथवर्णम चतुर्थमितिहासपुराण पंचमं वेदानां वेदं अर्थात् यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद तथा वेदों में पाँचवाँ वेद इतिहास तथा पुराण है.[88]
महाभारत के आदि पर्व में कहा गया है कि इतिहासपुराणानामुन्मेषं निर्मितं च यत् अर्थात् इस ग्रंथ में इतिहास और पुराणों का मंथन करके उनका प्रशस्त रूप प्रकट किया गया है.[89] स्पष्ट है कि वैदिककाल और बाद में पुराण तथा इतिहास को समान स्तर पर रखा गया है और दोनों का प्रयोग एकाधिक बार सामासिक पद की तरह हुआ है. अमरकोष, शुक्रनीति आदि प्राचीन ग्रंथों में पुराण के पाँच लक्षण- सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित माने गये हैं. इनमें कहा गया है कि सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च. वंशानुचरितं चैव पुराणं पंचलक्षणम्॥[90] पुराणों में पर्याप्त विषय वैविध्य है. इनमें ब्रह्मांड विद्या, देवी-देवताओं, राजाओं, नायकों, ऋषि-मुनियों की वंशावली, लोककथाएँ, तीर्थयात्रा, मंदिर, चिकित्सा, खगोलशास्त्र, व्याकरण, खनिज विज्ञान, हास्य और प्रेमकथाओं के साथ-साथ धर्मशास्त्र और दर्शन का भी वर्णन है.
पुराणों की विषय वस्तु में बहुत अधिक असमानता है. इतना ही नहीं, एक ही पुराण की एकाधिक पांडुलिपियाँ प्राप्त हुई हैं, जो एक-दूसरे से अलग हैं. पुराणों के रचनाकार अज्ञात हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि कई रचनाकारों ने कई सदियों में इनकी रचना कीं. पुराणों में विष्णु, वायु, मत्स्य और भागवत में प्रशस्ति, वंश आदि ऐतिहासिक रूप मिलते हैं. विष्णु पुराण के अनुसार अठारह पुराणों के नाम इस प्रकार हैं— ब्रह्म, पद्म, विष्णु, शैव (वायु), भागवत, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त, लिंग, वराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य, गरुड़ और ब्रह्माण्ड. आगे चलकर इतिहास और पुराण का उल्लेख कभी पृथक्, तो कभी साथ-साथ होने लगा. ज़ाहिर है, इतिहास और पुराण समान विषयवस्तुवाली दो संबद्ध श्रेणी की कृतियाँ थीं.[91]
ख़ास बात यह है कि अपने दीर्घकालीन विकास क्रम में नाराशंसी, गाथा, आख्यान, इतिहास और पुराण की एक-दूसरे में आवाजाही भी निरंतर थी. इतिहास परंपरा की महाकाव्यात्मक रचनाओं, महाभारत और रामायण में गाथाओं और आख्यानों का समावेश हो गया. इसी तरह नाराशंसियों और गाथाओं को इतिहास-पुराणों में सम्मिलित कर लिया गया.

3.
उत्तर वैदिककाल के अंतिम चरण में इतिहास-पुराण परंपरा का विस्तार हुआ. तैत्तिरीय आरण्यक से यह स्पष्ट होता है कि इतिहास-पुराण की मौखिक परंपरा में इस दौरान कई रचनाएँ हुईं. इसके एक परवर्ती अनुच्छेद में इतिहास और पुराण का प्रयोग बहुवचन के रूप एकाधिक बार हुआ है.[92] वंश का एक इतिहास रूप में विकास इसी दौरान हुआ. आगे चलकर इसका कई रूपों- वंशानुचरित, अनुवंश, चरित, प्रबंध आदि में विस्तार हुआ और यह उत्तर मध्यकाल तक जारी रहा. वंश की मौजूदगी वैदिक साहित्य में पुरोहितों और राजाओं की वंशावली की सूची के रूप में थी. आगे चलकर यह पुराणों में शामिल कर लिया गया और इससे पुराणों के आकार में वृद्धि हुई. भरत गाथा इसी समय अस्तित्व में आई.[93]
पुराणों से वंश का संबंध इतना गहरा हो गया कि बाद में इसे इनके पाँच लक्षणों में सम्मिलित कर लिया गया. आख्यान भी इस दौरान कई लिखे गए. व्याकरण रचनाओं में इसके पर्याप्त साक्ष्य मिलते हैं- कात्यायन ने ‘देवासुरम्’ और पतंजलि ने ‘यवकृतिक’, ‘प्रैयंगविक’ और ‘यायातिक’ आख्यानों का उल्लेख किया है.[94] आख्यानों से एक और प्रवृत्ति आख्यायिका का विकास इसी दौरान हुआ. आख्यायिका एक गद्यबद्ध रचना होती थी, जिसे ‘कथा’ कहते थे. इसका पहला उल्लेख (सूर्यमंडलान्याख्यायिकाः) तैत्तिरीय आरण्यक में मिलता है.[95] यहाँ इसका आरंभिक अर्थ नैतिक शिक्षा देने वाली कहानियों से था, लेकिन बाद में यह इतिहास संबंधी एक रचना शैली बन गई. कात्यायन ने इसे इतिहासविषयक एक शैली कहा है.[96] पतंजलि का भी यही मानना है- उनके यहाँ तीन आख्यायिकाओं- वासवदत्ता, सुमनोत्तरा और भैमरथी के नामोल्लेख मिलते हैं.[97] आख्यायिका की मान्यता हमेशा ही एक इतिहास रूप की तरह रही है.
इतिहास की प्राचीन भारतीय परंपरा के निर्माण और विस्तार में भृग्वंगिरसों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है और यह परंपरा बहुत बाद तक जारी रही. ऋग्वेद में ऋषि-कवि का कारु तथा कारिन् के रूप में उल्लेख मिलता है, जो अपने आश्रयदाताओं की प्रशस्ति में रचनाएँ करते थे.[98] वैदिककाल में ऐसे तीन परिवार मिलते हैं- वशिष्ठ और विश्वामित्र भरत राजाओं, कण्व यदुओं, पराश्वों और पुरुओं और भारद्वाज दिवादोस से संबद्ध थे.[99] यह संबंध इस दौर में बदलता भी रहा. उत्तर वैदिककाल में आंगिरस, अथर्वन और भृगु वंश का एकीकरण और सक्रियता बहुत महत्त्वपूर्ण है. इन तीनों के समूह को ‘भृग्वंगिरस’ कहा जाता है.[100] इन तीनों की एक साथ सक्रियता भारतीय इतिहास के विकास में एक बहुत महत्त्वपूर्ण घटना है. ऋग्वेद में इनका एक साथ उल्लेख मिलता है.[101] एकीकरण की यह प्रक्रिया अथर्ववेद में अपने विकसित रूप में है. अथर्ववेद को भृग्वंगिरस या अथर्वांगिरस वेद भी कहा जाता है.[102]
अथर्ववेद के संकलन में भृगु और अंगिरा का योगदान सर्वाधिक है.[103] इतिहास-पुराण परंपरा का विस्तार और पल्लवन भी इस परिवार समूह ने किया. छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार जिस प्रकार ऋक् का ऋग्वेद से, यजुस् का यजुर्वेद से और साम का सामवेद से संबंध है, उसी प्रकार इतिहास-पुराण का संबंध भृग्वंगिरस से है.[104] महाभारत और रामायण का विकास भी इस समूह की देन है. महाभारत के कई संदर्भ भार्गव परिवार से संबद्ध हैं. वि.एस. सुखटणकर का मत है कि महाभारत की पौलोमापर्वन् की अनुश्रुतियाँ भार्गवों की ही देन हैं. उन्होंने लिखा कि “मेरी राय में यह निष्कर्ष निकालने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि महाभारत का जो पाठ आज मौजूद है, उसमें सचेत, बल्कि सुविचारित ढंग से भरत गाथाओं में भार्गव अनुश्रुतियों को मिलाकर साहित्य बुनने या कहें तो ऊपर से सिलाई करने का प्रयत्न किया गया है.”[105] इतिहासकार विश्वंभर शरण पाठक का निष्कर्ष भी यही है कि “महाभारत जिसका विकास भरत कुल की गाथा के अंदर से हुआ, निश्चय ही भृग्वंगिरसों की कृति है.”[106] रामायण के विकास में भी भृग्वंगिरसों का निर्णायक योग है. रामायण की कथा का विकास इक्ष्वाकु कुल के आख्यान से हुआ. इस आख्यान को महाकाव्य का रूप देने वाले वाल्मीकि स्वयं भार्गव थे.[107]
भृग्वंगिरस परिवार के भारद्वाज, आंगिरस, समवर्त, च्यवन, उशनस् आदि के मिथक रामायण में कई बार आते हैं.[108] महाभारत में स्पष्ट उल्लेख है कि इसकी उत्पत्ति में चार गोत्र- अंगिरा, कश्यप, वशिष्ठ और भार्गव का योगदान है.[109] एन.जे. शेंदे ने इस संबंध में विस्तार से विचार किया और वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि “अंगिरस और भृगु का लेखा-जोखा निश्चित रूप से इस निष्कर्ष का पक्षधर है कि भृग्वंगिरस, महाभारत के अंतिम संपादन और विविधता के बीच एकता बनाए रखते हुए धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र और ब्राह्मणवादी परंपराओं के एक विश्वकोश के रूप में संरक्षित करने के लिए उत्तरदायी थे. भृगु और अंगिरस द्वारा महाभारत के इस अंतिम पुनःपाठ में केंद्रीय एकता बनाए रखी गई और पारंपरिक संरचना को संरक्षित किया गया और साथ ही इस तरह, ब्राह्मणवाद के महिमामंडन का उनका उद्देश्य पूरी तरह से पूरा हुआ.”[110]
पुराणों के विकास में भी इस समूह ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. भार्गव अनुश्रुतियों ने पुराणों के विकास और विस्तार में योग दिया. विष्णु पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि इसकी रचना एक ऋषि द्वारा की गई और यह ऋभु, प्रियव्रत भागुरि और अन्य भार्गव ऋषियों- दधीचि, सारस्वत, भृगु, वत्स आदि के माध्यम से पराशर तक पहुँचा.[111] मार्कण्डेय पुराण भी भृगुकुल के च्यवन और मार्कण्डेय से संबंधित माना जाता है.[112] इतिहास-पुराण के अलावा इतिहास परंपरा के दूसरे अनुशासन-आख्यान और आख्यायिका पर भी भृग्वंगिरस समूह का प्रभाव है.[113]
उत्तर वैदिक काल के बाद भी इतिहास की परंपरा पर भृग्वंगिरस समूह का वर्चस्व बना रहा. पुराणों में भृग्वंगिरसों के साथ इतिहास की परंपरा के विकास में सूतों ने भी निर्णायक योग दिया. सूत शब्द का प्रयोग यजुर्वेद, अथर्ववेद और ब्राह्मणों में कई जगह आया है और उससे यह लगता है कि इसका अर्थ उत्तर वैदिककाल में चारण या स्तुतिगान करने वाला था.[114] सूत शब्द के व्युत्पत्ति ‘सु’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ प्रतिष्ठित करना या अभिषेक करना है. कुछ अन्य लोगों की धारणा है कि ‘सु’ धातु का अर्थ प्रेरक से भी लिया जा सकता है. शतपथ ब्राह्मण में इसका यही अर्थ लिया गया है- इसके अनुसार सूत के पाठ से राजा को शक्ति मिलती है और इस प्रकार वह उसको शत्रु को पराजित करने के लिए प्रेरित करता है.[115] सूतों से पहले यह कार्य पुरोहित करते थे. ऋग्वेद की एक ऋचा की व्याख्या करते हुए बृहद्देवता यह उल्लेख करता है.[116] सूत और सौति गोत्र का अंगिरस समूह के भारद्वाजों और कश्यपों में मिलना भी यही सिद्ध करता है. यजुर्वेद में सूत का संबंध गीत से जोड़ा गया है.[117] महाभारत में उग्रश्रवा को ‘सूतनंदन’ कहा गया है.[118]
इतिहासकार विश्वंभर शरण पाठक के अनुसार सूतों और राजाओं के संबंध को देखते हुए ‘सूत’ को ऐसा गीत भी माना जा सकता है, जो राजा की स्तुति करता हो.[119] इस तरह सूत उत्तर मध्यकाल में एक वृत्तिमूलक पदवी थी और वे वंश या वंशावली की रचना करने और उसके संरक्षण के लिए उत्तरदायी थे. सूत भृग्वंगिरस कुलों में ही उत्पन्न थे और इन्होंने कई राजवंशों की वंशावलियों की रचना कीं. भृग्वंगिरसों और अन्य ब्राह्मणों द्वारा निरंतर व्यवहार के कारण वंश भी इस दौरान इतिहास लेखन की ख़ास शैली बन गई थी और परवर्तीकाल में यह कई रूपों में जारी रही. कालांतर में वंश रचनाओं से वंश और वंशानुचरितपुराण का स्वरूप गढ़ा गया और इसको पुराण के पांच लक्षणों में सम्मिलित कर लिया गया.
अब तक इतिहास की मौखिक परंपरा अनुश्रुतियों और अनुभव के रूप मौजूद रही, लेकिन उत्तर वैदिककाल के अंतिम चरण, 400 ई. पूर्व से 400 ई. के बीच यह निश्चित साहित्यिक स्वरूप में ढलने लगी और कुछ हद तक इसका मानकीकरण भी हुआ. शकों की मौजूदगी और इसके सांस्कृतिक प्रभाव से यह प्रक्रिया तेज़ हो गई. शकों के यहाँ बस जाने से वीर काव्यों की ज़रूरत महसूस हुई. आगम संप्रदायों के उदय और सातवाहनों, शुंगों और कण्वों के नए समीकरणों ने भी इसमें अपना योग दिया. आगम संप्रदायों के उदय और सुधारवादी ताक़तों के बढ़ते प्रभाव से आरंभ में कर्मकांडीय परंपराएँ कमज़ोर हुईं, लेकिन प्रति सुधार आंदोलन से धर्म का नया रूप सामने आया. धर्म के नये रूप की ज़रूरतों ने इतिहास-पुराण को एक निश्चित साहित्यिक ढाँचे में सीमित कर दिया गया, जिससे कुछ हद यह अपने ऐतिहासिक चरित्र से हट गया.[120] वंश की परंपरा जारी रही और इसका ऐतिहासिक चरित्र भी बना रहा. इसकी बौद्ध, जैन और दरबारी, तीन अलग-अलग प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं. बौद्ध परंपरा में महावस्तु, सुत्तपिटक और सिंहला अट्ठकथा जैसे ग्रंथ लिखे गए. जैनों ने हरिवंश, रामायण आदि के रूप में ऐतिहासिक और अर्ध ऐतिहासिक कृतियों की रचना कीं. दरबारी परंपरा का ख़ूब विकास हुआ. मौर्यकाल के बाद राजकीय अभिलेखागारों की परंपरा शुरू हुई. कौटिल्य के अनुसार इन अभिलेखागारों में विभिन्न राष्ट्रों, गाँवों, कुलों और निगमों के रीति-रिवाज़, पेशा और लेन-देन, राज दरबारियों को उपहारों से प्राप्त लाभ, राजा की पत्नियों और पुत्रों को हुआ लाभ, राजाओं से हुई संधियाँ, उन्हें दी गई चेतावनियाँ और उनसे प्राप्त या उन्हें दिए हुए नज़रानों का हिसाब-किताब आदि रखा जाता था.[121]
ह्वेनत्सांग ने भी राज्यों के दरबारों के अभिलेखागारों में वंश-वंशालियों के राज्य द्वारा संरक्षण का उल्लेख किया है.[122] विभिन्न राजाज्ञाओं में भी वंश के उल्लेख के प्रमाण मिलते हैं.[123] आगे चलकर वंश की परंपरा ने साहित्यशास्त्रीय स्वरूप ग्रहण कर लिया, जिसमें कई वंश केंन्द्रित रचनाएँ, रघुवंश, हरिवंश, अश्मकवंश, शशिवंश, नृपावली आदि हुईं. कल्हण की राजतरंगिणी और उससे संबंधित परवर्ती रचनाओं की गणना इसी वर्ग में की जा सकती है.
वंश की परंपरा की एक शाखा का विकास राजदरबारों में चरित या जीवनी लेखन के रूप में हुआ. चरित या जीवनी लेखन की परंपरा वैदिक आख्यान, रामायण, बुद्धचरित आदि के रूप में पहले भी थी, लेकिन पूर्व मध्यकाल में जीवित और वर्तमान राजाओं के चरित या जीवनी के लेखन की शुरुआत हुई. इसके विकास में भी भृग्वंगिरसों की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी. इतिहास-पुराण की परंपराओं का चरित या जीवनी लेखन में रूपांतरण भृग्वंगिरसों की स्थिति में आए बदलाव से हुआ. भ्रमणशील सूत और भृग्वंगिरसों की स्थिति अब बदल गई थी- अब वे राजाओं के आश्रय में जीविका प्राप्त दरबारी कवि थे और राजा भी अब क़बीले की जगह सबसे महत्त्वपूर्ण और केन्द्रीय इकाई हो गया था. दरअसल भृग्वंगिरसों ने पूर्व मध्यकाल से पहले ही राज्याश्रय में जाना शुरू कर दिया था. पूर्वी और मध्यभारत के कई राजाओं से इन्होंने आश्रय प्राप्त किए. ये अत्यंत सम्माननीय थे- कहते हैं कि लक्ष्मणराज द्वितीय के समय सोमेश्वर का पालकी उठाने वाला कहार जब थक गया, तो स्वयं लक्ष्मणराज ने पालकी में अपना कंधा लगाया और इसे अपना सम्मान समझा.[124]
दसवीं-ग्यारहवीं सदी में टकारी की ब्राह्मण बस्ती बहुत विख्यात थी. कई अभिलेख यह सिद्ध करते हैं कि वहाँ के ब्राह्मणों ने उड़ीसा, बंगाल, चंदेल, मालवा, कर्नाटक और असम में जाकर राज्याश्रय प्राप्त किया था. ख़ास बात यह है कि इनमें से अधिकांश भृग्वंगिरस समूह से संबंधित थे.[125] राजदरबारों पर भृग्वंगिरसों की निर्भरता से परिवर्तन यह हुआ कि अब उन्होंने प्राचीन ऐतिहासिक परंपराओं और नायकों की जगह अपने आश्रयदाता राजाओं का चरित और जीवनी लेखन शुरू कर दिया. अब वंश से पौराणिक सामग्री निकाल कर उसके आधार पर राजाओं का जीवन चरित्र लिखने की नयी प्रवृत्ति शुरू हुई, जिसमें मध्ययुगीन राजवंशों का संबंध प्राचीनकाल की ऐतिहासिक परंपराओं या वंशों- इक्ष्वाकु और ऐल से जोड़ा गया. यह भी कि कुछ राजाओं ने दरबारी कवियों से अपने को प्राचीन नायकों- इक्ष्वाकु राम, पांडव भीम आदि के रूप में प्रस्तुत करवाया. राजा के उदय और भृग्वंगिरसों की स्थिति में बदलाव से इतिहास लेखन की परंपरा में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए. एक तो यह कि पूर्व मध्यकालीन वंश रचनाओं में पौराणिक तत्त्वों का समावेश बढ़ गया और दूसरे, चौथी सदी बाद के पुराणों में वंश रचना रुक गई और तीसरे, इतिवृत्तात्मक जीवन चरित साहित्य का उदय हुआ.
पूर्व मध्यकाल के अंतिम चरण में भारतीय ऐतिहासिक कथा-काव्य की परंपरा में निर्णायक मोड़ आया. ऐतिहासिक व्यक्तियों को उपजीव्य बनाकर इतिवृत्तात्मक काव्य रचना की प्रथा सातवीं सदी के बाद तेज़ी से बढ़ी और दसवीं सदी के बाद इसका और विस्तार हुआ. इसका विस्तार इस दौरान ईरान में भी हुआ.[126] राजा की संस्था के विकास के साथ राजा, कवि, दरबारी और इतिवृत्तकार एक-दूसरे के पास आ गए. राजा जैसी संस्था के विकास की नई ज़रूरतों के अनुसार इतिवृत्त शौर्य, पराक्रम, वीरता, स्वामिधर्म जैसे नई सामाजिक मूल्यों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गए. इतिवृत्त का एक संरचनात्मक ढाँचा विकसित हुआ, जिसमें राज्यश्री या गौरव का पाने के लिए पाँच चरण- प्रारंभ, प्रयत्न, प्रत्याशा, नियताप्ति और फलागम तय किए गए. अधिकांश इतिवृत्तों में राजा के जीवनक्रम को इन चरणों के अनुसार ढालकर प्रस्तुत किया गया. यह जीवनक्रम तिथियों और वर्षों में नहीं था, यह पहले से नियत पाँच चरणों के क्रम में था. साहित्यशास्त्र में भी यह मान्य हो गया.[127]
600 से लगाकर 1200 ई. के बीच इसी तरह के कई इतिवृत्त लिखे गए. इन जीवनीपरक इतिवृत्तों में बाण का हर्षचरित, बिल्हण का विक्रमांकदेवचरित, सोमश्वर तृतीय का विक्रमांकाभ्युदय, जयानक का पृथ्वीराजविजय आदि प्रमुख हैं. इतिहास-पुराण की परंपरा भी जारी थी. यह इस दौर में यह कश्मीर के प्रसिद्ध इतिहास राजतरंगिणी (1444 ई.) के रूप में फलीभूत हुई, लेकिन कुछ हद तक यह उससे अलग और नवीन भी थी. राजतरंगिणी का आरम्भिक भाग कश्मीर के मिथकीय अतीत से सम्बन्धित है, दूसरे भाग में इसमें विविध स्रोतों से सामग्री ली गई और इसके तीसरे भाग में लोकोत्तर तत्त्वों की जगह इतिहास का आग्रह बढ़ गया है और यह आनुभविक पर्यवेक्षण पर निर्भर लगता है. दरअसल उसका लेखक कल्हण और उसका परिवार ग्यारहवीं-बारहवीं सदी में कश्मीर की राजनीति से सीधे सम्बन्धित थे. राजतरंगिणी के अति विकसित इतिहास बोध के सम्बन्ध में कुछ विद्वानों की यह धारणा कि यूनानी या एशिया माइनर के तुर्की प्रभाव के कारण ऐसा हुआ, सही नहीं हैं. यह भारतीय इतिहास परम्परा की अपनी स्वाभाविक परिणति है. अलबत्ता अपने परिष्कृत इतिहास बोध के लिए इस पर बौद्ध परम्परा का प्रभाव ज़रूर रहा होगा.[128]

4.
संस्कृत के समानांतर, प्राकृत-अपभ्रंश और देश भाषाओं में भी ऐतिहासिक कथा-काव्य की निरन्तर परम्परा मिलती है. संस्कृत के साथ प्राकृत और अपभ्रंश में काव्य रचना बहुत पहले शुरू हो गई थी और इसको दरबारों और लोक में भी मान्यता भी मिलने लग गई थी. प्राकृत के शिलालेख तो अशोक समय से ही मिलने लगते हैं, जिसका समय 274 से 232 ई. पू. है.[129] प्राकृत में विमलसूरि कृत पउमचरियम् की रचना 300-400 ई. में हुई. अपभ्रंश का सर्वाधिक प्राचीन उल्लेख कालिदास के विक्रमोर्वशीय में मिलता है, लेकिन उससे पहले भरत के नाट्यशास्त्र में भरत मुनि ने ‘देशभाषा’ शब्द प्रयुक्त करते हुए इन भाषाओं के प्रयोग के संबंध में बताया है. वे लिखते है कि अतः ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि देशभाषाविकल्पनम्. भाषाचतुर्विधा ज्ञेया दशरूपेः प्रयोगतः॥ अर्थात् अब मैं आगे देशभाषा के प्रयोगों के संबंध में आपको बताऊँगा. दशरूपों के प्रयोगों में चार प्रकार की भाषा का प्रयोग हुआ है.[130]
हेमचंद्र ने अपने प्राकृत व्याकरण सिद्धहेमशब्दानुशासन के चतुर्थ पाद के 448 सूत्रों में शौरसेनी, मागधी, पैशाची चूलिका, पैशाची और अपभ्रंश प्राकृतों के नमूने दिए हैं. इस पाद में सबसे अधिक (सूत्र 329 से 448 तक) नमूने अपभ्रंश के हैं, जिससे लगता है कि उस समय इसका साहित्य बहुत विस्तृत और उन्नत कोटि का था.[131] राजशेखर की काव्यमीमांसा में राज दरबार की आदर्श व्यवस्था के विस्तृत प्रावधानों में संस्कृत कवि, ज्योतिषी और नर्तक सहित अन्य दरबारियों के साथ अपभ्रंश के कवि के बैठने के स्थान का भी प्रावधान है.[132] संस्कृत के उत्साही समर्थक राजा भोज के सरस्वतीकंठाभरण में भी संस्कृत के साथ प्राकृत और अपभ्रंश की कविताएँ उद्धृत की गई हैं.[133] प्राकृतपैंगलम् के अनुसार जयचंद के दरबार के विद्वान् मंत्री गण भी देश भाषा में रचनाएँ करते थे और ये राजप्रशस्तिमूलक थीं, इसलिए ज़ाहिर है, जयचंद इनका सम्मान भी करते थे.[134] गौड़ (बंगाल) देश के पाल, गुजरात के सोलंकी और मालवा के परमारों ने देश भाषाओं को ख़ूब प्रोत्साहन दिया.[135]
संस्कृत अब भी चलन में थी, इसका मान-सम्मान था, इसमें काव्य रचना प्रतिष्ठा का विषय भी था, लेकिन यह सही है कि धीरे-धीरे लोक में इसका व्यवहार सीमित रह गया था. संस्कृत-प्राकृत की कविताएँ लोक भाषाओं के माध्यम से समझायी जाती थीं और इस तरह इनका मूल कुछ बाधा के साथ सामंतों तक पहुँचता था, पर अपभ्रंश की कविता सीधे असर करती थी. ऐसे राजा या सामंत भी कम रह गए थे, जो संस्कृत अच्छी तरह समझते हों. नतीजा यह हुआ कि अपभ्रंश की कविता को राजकीय मान्यता मिल गई. हजारीप्रसाद द्विवेदी के शब्दों में कहें तो
“नाना कारणों से इस काल में अपभ्रंशी कवियों को सम्मान राज दरबार में भी होता था और राजा लोग इन कवियों को अपने दरबार में रखना उतना ही आवश्यक समझते थे, जितना संस्कृत भाषा के कवियों को और पंडितों को. इतना ही नहीं, अधिकांश राजा इनसे विशेष अनुराग भी प्रगट करने लगे थे.”[136]
दसवीं-ग्यारहवीं सदी में उत्तिवसेसोकव्वं भाषा जा होइ सो होउ अर्थात् भाषा जो हो सो हो, कविता तो कथन विशेष का नाम है, यह धारणा बद्धमूल हो गई.[137] आगे चलकर विद्यापति के समय (1350-1450 ई.) तक तो इस संबंध में स्थिति और साफ़ हो गई. उन्होंने कीर्तिलता में खुलकर कहा कि सक्कय वाणी वहुअ ण भावइ, पाउअ रस को मम्म न पावइ. देसिल वयणा सब जन मिट्ठा, तैं तैसन जंपउ अव्हट्ठा॥ अर्थात् संस्कृत भाषा बहुतों को रुचिकर नहीं लगती, प्राकृत का काव्य रस भी सुगमता से नहीं मिलता. देश्य भाषा की उक्ति सब लोगों को मीठी लगती है, इसीलिए मैं देशी बोली अवहट्ठ में रचना करता हूँ.[138]
आख्यान, आख्यायिका, वंश, वंशानुचरित, चरित, इतिवृत्त आदि ऐतिहासिक कथा-काव्य रूप भी देश भाषाओं में चरित, रासो, ख्यात, वंशावली, पाटनामा, बही आदि में ढलने लग गए थे. इतिहास-पुराण के रूप में जो सार्वभौमिक इतिहास लेखन की परंपरा बनी, वह अब कमज़ोर हो गई. उसकी जगह अब देश भाषाओं में क्षेत्रीय इतिहास रूप लेने लग गए. यह प्रक्रिया भी बहुत पहले शुरू हो गई थी. गुणाढ़्य (कंबोडिया के 875 ई. के अभिलेख के अनुसार 600 ई.) की छठी सदी की प्राकृत रचना बृहत्कथा (बड्ढकथा) में कई राजाओं के ऐतिहासिक या अर्ध ऐतिहासिक आख्यान मिलते हैं.[139] इसी तरह वाक्पतिराज की आठवीं सदी की रचना गउडवहो (गौड़ वध) में ऐतिहासिक व्यक्तित्व यशोवर्मन की कथा है.[140]
इसी तरह हेमचंद्र ने बारहवीं सदी में द्व्याश्रय नामक ऐतिहासिक काव्य लिखा, जो संस्कृत और प्राकृत, दोनों में है और इसमें गुर्जर प्रदेश के चालुक्य वंश के संस्थापक मूलराज (942 ई.) से लगाकर सिंधुराज तक का वृत्तांत है.[141] आभीर, गुर्जर और राजपूत समझी जाने वाली जातियों ने भी इसी दौरान अपने राज्य कायम किए. यद्यपि ये जातियाँ अपनी श्रेष्ठता के लिए संस्कृत का सम्मान करती थीं, लेकिन उनको अपभ्रंश और देश भाषाओं की स्तुतियाँ ही अच्छी तरह समझ में आती थीं, इसलिए भी अपभ्रंश के राजस्तुतिपरक साहित्य को मान्यता मिल गई. संस्कृत की परम्परा पूर्ववत जारी रही. क्षेत्रीय शासकों ने इसको प्रश्रय दिया. इस दौरान इसको आगे बढ़ाने में जैन आचार्यों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है. इन आचार्यों ने अपने प्रभाववाले शासकों को धर्म और नीति के उपदेश देने के लिए प्रबंध और वंशानुचरित लिखे. ये प्रबंध प्राचीन परम्परा के अनुरूप थे और इनमें ऐतिहासिकता का आग्रह भी ख़ूब था. जैन आचार्य मेरुतुंगाचार्य की प्रबंधचिंतामणि 1304 ई. में पूर्ण हुई, जो मूलतः कुछ ऐतिहासिक प्रबन्धों का संकलन है. मेरुतुंगाचार्य का आग्रह धर्म और पौराणिकता की जगह ऐतिहासिकता पर अधिक था.[142]
इस परम्परा में राजशेखर सूरि का प्रबंधकोश (1348 ई.) भी महत्त्वपूर्ण है, जिसमें 24 प्रबंध संकलित हैं.[143] ख़ास बात यह है कि ये दोनों रचनाएँ चौदहवीं सदी के पूर्वार्ध में हुईं, लेकिन इनमें संकलित प्रबन्धों की रचना का समय इससे पूर्व का है. बाद में मुनि जिनविजय को पाटन, भावनगर, पूना, अहमदाबाद, राजकोट आदि स्थानों पर प्रबंधचिंतामणि से संबद्ध या इससे समानता रखने वाले ऐसे अनेक प्रबंध और मिल गए, जिनको उन्होंने पुरातनप्रबंधसंग्रह के नाम से प्रकाशित करवाया.[144]
इन संकलनों में जैनाचार्य, संस्कृत कवि-पंडित और शासकों के वृत्तांत हैं. संस्कृत में वंश और तत्संबंधी प्रबंध रचनाएँ उत्तर मध्यकाल में भी हुईं. क्षेत्रीय शासकों ने वाराणसी और दक्षिण भारत से अपने यहाँ इस निमित्त ब्राह्मणों को वृत्ति देकर निमंत्रित किया. सत्रहवीं सदी में मेवाड़ (राजस्थान) के शासक राजसिंह (1629-1680 ई.) के शासनकाल में रणछोड़ भट्ट ने राजप्रशस्तिमहाकाव्यम् और सदाशिव ने राजरत्नाकरमहाकाव्यम् की रचना की. दोनों रचनाएँ वंश या इतिवृत्त रचनाएँ हैं, लेकिन इतिहास-पुराण से प्रेरित हैं. इनका पूर्वार्ध पुराण से प्रेरित है, लेकिन बाद में यह कम होता गया है. ये दोनों रचनाकार वाराणसी से संबंधित थे.[145]
पश्चिम से विदेशी आक्रमण, केंद्रीय शासन के समाप्ति, क्षेत्रीय शासकों का उदय और राज दरबारों में प्राकृत-अपभ्रंश सहित देश भाषाओं की बढ़ती लोकप्रियता से देश भाषाओं में ऐतिहासिक कथा-काव्यों की प्रवृत्ति को स्वीकृति और मान्यता मिली और इसका विस्तार भी हुआ. युद्ध की संस्कृति का विकास हुआ और वीरता, शौर्य और पराक्रम शासक जातियों के जीवन मूल्यों का ज़रूरी हिस्सा हो गए. युद्ध करने वाली जातियाँ अपनी स्तुति और सराहना सुनना चाहती थी और निरंतर युद्ध के लिए प्रोत्साहित करना चारण जाति के लिए नियत कर्म हो गया था. उनका काम था ‘युद्धोन्माद उत्पन्न कर देने वाली घटना योजना का आविष्कार.’[146] गुजरात सहित लगभग पूरे उत्तरी-पश्चिमी भारत इस नयी ज़रूरत से चरित, रासो, ख्यात, पाटनामा, बही आदि साहित्य रूप अस्तित्व में आए. ये सभी रूप वैदिककाल से प्रचलित ऐतिहासिक कथा-काव्य रूपों के स्वाभाविक देशज रूपांतरण थे. शासकों की जीवन से सम्बन्धित प्रबंध, इतिवृत्त, चरित, वंशानुचरित की परंपरा चरित के रूप में जारी रही. विश्वंभर शरण पाठक के अनुसार वैदिक आख्यानों को चरित का पूर्व रूप कहा जा सकता है.[147]
गिरिजाशंकर मिश्र के अनुसार वे चरित जो राजकीय अभिलेखों और प्रशस्तियों के आधार पर लिखे गए इतिवृत्त की श्रेणी में आते हैं.[148] आरंभ में प्राकृत-अपभ्रंश में चरित का अपभ्रंश रूप चरिउ चलन में आया, जो देश भाषाओं में भी जारी रहा. कालांतर में जब देश भाषाओं में तत्सम शब्दों की वापसी हुई, तो कहीं-कही यह फिर ‘चरित’ के रूप में प्रयुक्त होने लगा. रासो भी एक प्रकार की चरित रचना ही थी, लेकिन आगे चलकर यह एक स्वायत्त अनुशासन के रूप में विकसित हो गया. चरित के लिए विलास (राजविलास और अभैविलास), रूपक (गोगादेरूपक और रावरिणमलरूपक) और प्रकाश (जयचंदप्रकाश, छत्रप्रकाश और पाबूप्रकाश) शब्द भी चलन में आए. इन शब्दों के प्रयोग के पीछे इनके स्वरूप को लेकर इनके रचनाकारों की अलग मंशा ज़रूर रही होगी, लेकिन ये सभी आश्रयदाता शासकों के जीवन पर आधारित थे, इसलिए हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इनको चरित्र के व्यापक दायरे में शामिल किया है.[149]
इनमें से कुछ साहित्यिक रचनाएँ थीं, जैसे भवभूति का महावीरचरित और उत्तररामचरित तथा भास का बालचरित, लेकिन ये रचनाएँ अपने समय में प्रचलित ऐतिहासिक वृत्तांतों को भी आगे बढ़ाती हैं. धार्मिक चरित्रों पर आधारित चरित रचनाएँ, जैसे रामचरितमानस भी कई हुईं. चरित रचनाएँ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में हुईं- पद्मगुप्त की रचना नवसाहसांकचरित में मालवा के सिंधुराज का इतिहास दिया गया है. बंगाल के पाल शासक रामपाल का जीवन चरित संध्याकरनंदिन् ने रामचरित नाम से लिखा. जैन यतियों-मुनियों ने पउमचरिउ, सणंकुमार चरिउ आदि कई चरित लिखे. रासो प्राचीन और मध्यकाल का प्रमुख ऐतिहासिक साहित्य रूप था और इसकी परम्परा बहुत प्राचीन है. रास और रासक का प्रयोग बहुत प्राचीनकाल से होता आया है. रास या रासक का अर्थ ‘लास्य’ से लिया गया है, जो नृत्य का एक भेद है. इस व्युत्पत्ति के आधार पर आरंभ में गीत-नृत्यपरक रचनाएँ रास नाम से जानी जाती थीं. श्रीमद्भागवत और हेमचंद्र के काव्यानुशासन आदि में इसका उल्लेख मिलता है.[150]
ऐतिहासिक आख्यान के रूप में इसका रूपांतरण शायद चौदहवीं और पंद्रहवीं सदी में हुआ.[151] ‘रासो’ शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर विद्वान् एक राय नहीं हैं. हरप्रसाद शास्त्री रासो का अर्थ झगड़ा या लंबा विवाद करते हैं, जबकि काशीप्रसाद जायसवाल के अनुसार ‘रहस्य’ पद का प्राकृत रूप ‘रहस्सो’ बना है, जिसका कालान्तर में उच्चारण भेद से बिगड़ता हुआ रूपांतर ‘रासो’ बन गया है.[152] राजस्थानी के विद्वान् हीरालाल माहेश्वरी के अनुसार ‘रासक’ के तीन तत्त्वों- नृत्य, गीत, काव्य से आगे चलकर रासो का विकास हुआ.[153] रामचन्द्र शुक्ल रासो की व्युत्पत्ति ‘रसायण’ से मानते हैं. वीसलदेवरासो में ‘रास’ और ‘रसायण’ शब्द का प्रयोग काव्य के लिए हुआ है. उन्होंने बीसलदेवरास की एक पंक्ति को आधार बनाया है. यह पंक्ति इस तरह है- बारह सौ बहत्तरा मझरि, जेठ बधी नवमी बुधवारि, नालह रसायण आरंभई, शारदा तूठी, ब्रह्मकुमारि.[154]
हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार संदेशरासक के मिलने बाद ये सब अटकलें हैं. उन्होंने इनका समाहार करते हुए लिखा है कि “रासक वस्तुतः एक प्रकार का खेल या मनोरंजन है. रास में भी वही भाव है.”[155] आरम्भ में नृत्य के साथ गाई जाने वाली प्रबंध रचना को रास कहा जाता होगा, लेकिन कालांतर में रासो में इसका रूपांतरण हुआ, जो वंश और आख्यान का मिला-जुला रूप था. आगे चलकर रास प्रेमकथाओं से सम्बन्धित प्रबंध, जबकि रासो वीर प्रबंध काव्यों के लिए रूढ़ हो गया. रासो वंशानुचरित या वंशावली का बदला हुआ रूप था. राजस्थान में रासो और रास काव्य की परंपरा डिंगल-पिंगल, दोनों में मध्ययुग से आरंभ होकर आधुनिककाल तक रही है. पृथ्वीराजरासो, हम्मीररासो, खुम्माणरासो, राणारासो आदि कई रचनाओं की ऐतिहासिकता पर आधुनिककाल में विचार हुआ और इतिहास की आधुनिक कसौटियों पर खरा नहीं उतरने के कारण इन्हें ख़ारिज कर दिया गया. दरअसल भारतीय परम्परा के अनुसार की इन रचनाओं में इतिहास और साहित्य, दोनों हैं. साहित्यिक वर्णन की रूढ़ियाँ भी इनमें पर्याप्त हैं. रासो रचनाएँ वंशानुचरित थीं- इसलिए इनमें पीढ़ी-दर-पीढ़ी नए शासकों के वृत्तांत जुड़ते रहे. परम्परा की समझ के अभाव में इनको प्रक्षिप्त मानकर कुछ लोगों ने इनको जाली मान लिया. आख्यान-आख्यायिका का उत्तर मध्यकाल में राजस्थान में नया रूप ख्यात बना. यह कमोबेश एक ऐतिहासिक रचनारूप था. इसमें वंश और आख्यान दोनों थे- इसमें शासक के साथ उसके शासनकाल की प्रसिद्ध घटनाओं का वृत्तांत भी दिया जाता था. ख्यात का नामकरण उसके विषय के साथ कभी-कभी इसके लेखक के आधार पर भी होता है. ख्यात कमोबेश इतिहास है- इसको डिंगल में लिखी इतिहास की ‘किताब’ कहा गया है.[156]
ख्यात शब्द मूलतः संस्कृत का शब्द है. ‘ख्या’ धातु में ‘क्त’ प्रत्यय जुड़ने से ‘ख्यात’ शब्द बना है, जिसका अर्थ है ‘भूतकाल की घटनाओं का वर्णन’ या ‘भूतकाल को ज्ञात करना’. ख्यातकारों ने ख्यात शब्द का प्रयोग इतिहास के रूप में ही किया था और इसका विकास भी एक इतिहास रूप में ही हुआ. इसकी परंपरा दूसरे रूप में पहले भी रही होगी, लेकिन अकबर (1556 से 1605 ई.) के शासनकाल में अबुल फ़ज़ल द्वारा देशी राज्यों से संबंधित जानकारियों की अपेक्षा करने से इनके लेखन में गति आई. ख्यात वंशावली, पीढ़ियावली और आख्यान का मिलाजुला रूप है, जिसमें किसी शासक के जन्म, उत्तराधिकार, विवाह, संतान, शासनकाल, युद्ध, मृत्यु आदि की तिथियों और उसके समय की प्रसिद्ध घटनाओं का वर्णन होता है. इटली के प्रसिद्ध भारतविद् विद्वान् एल.पी. तेस्सीतोरी ने सबसे पहले कई ख्यातों को उजागर किया. तेस्सीतोरी का ख्यातों का आरंभिक सर्वेक्षण न सिर्फ़ राजस्थानी भाषा के स्वरूप निर्धारण में उपयोगी सिद्ध हुआ, बल्कि यह नयी ऐतिहासिक सामग्री भी प्रस्तुत करने वाला भी था. इसकी भूमिका में तेस्सीतोरी ने लिखा कि
“वर्णनात्मक सूची के इस खंड का महत्त्व इस तथ्य से बढ़ गया कि इसमें वर्णित कार्य राजपुताना के मध्यकालीन इतिहास के संबंध में उपलब्ध जानकारी का सबसे समृद्ध स्रोत है. इस सूची का महत्त्व इस अर्थ में भी है कि अभी तक बिखरी हुई और उपेक्षित इस सामगी को एकत्र और वर्गीकृत किया जाए, जिससे इसकी पहचान और संदर्भ को आसान बनाया जा सके.”[157]
पहली ख्यात 1660 ई. में लिखी गई मुँहता नैणसीरी ख्यात की है, जो उपलब्ध ख्यातों में सबसे अधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक मानी जाती है. परवर्ती अधिकांश ख्यातकारों ने इससे मदद ली है. नैणसी जोधपुर राज्य में दीवान था और सांख्यिकीविद् भी था. उसकी दूसरी रचना मारवाड़रा परगनारी विगत एक प्रकार का गज़ेटियर है. ख्यात लेखक फ़ारसी वृत्तांतकारों और कुछ आधुनिक इतिहासकारों की तुलना में अधिक निष्पक्ष और ईमानदार थे.[158]
मुँहता नैणसीरी ख्यात की ख़ास बात यह कि उसमें दी गई सूचनाओं के स्रोत का भी उल्लेख है और किसी प्रकरण में यदि सूचना के एकाधिक स्रोत हैं और ये अंतर्विरोधपूर्ण हैं, तो उसमें उन सभी का उल्लेख है. ख्यात रचनाएँ अपने चरित्र में ग़ैर धार्मिक भी हैं- इनमें कुछ आधुनिक इतिहासकारों की तरह राजपूत–मुस्लिम संघर्ष ‘धार्मिक’ या ‘राष्ट्रीय’ की तरह वर्णित नहीं है. फ़ारसी वृत्तांतकारों के अनुसार तुर्क और मुग़लों की राजपूत शासकों पर विजय इस्लाम की विजय है, जबकि ख्यातकारों ने इसे केवल मुग़लों या तुर्कों की विजय बताया है. इसी तरह फ़ारसी वृत्तांतकार और कुछ आधुनिक इतिहासकार राजपूत शासकों द्वारा गुजरात, मांडू और दिल्ली के सुलतानों के साथ अपनी बेटियों के विवाह के संबंध में मौन हैं, जबकि ख्यातकारों ने यह उल्लेख बिना किसी संकोच और अपराध बोध के किया है.[159]
मुँहता नैणसीरी ख्यात, जोधपुर राज्यरी ख्यात, उदयभाण चांपावतरी ख्यात, मुन्दियाड़री ख्यात, बाँकीदासरी ख्यात, दयालदासरी ख्यात, मारवाड़री ख्यात, जैसलमेररी ख्यात, जसवंतसिंघरी ख्यात आदि कुछ प्रमुख ख्यातें हैं. यह धारणा निराधार है कि ख्यात रचनाएँ राज्याश्रय में ही चारणों द्वारा लिखी गईं. ख्यातें व्यक्तिगत रुचि से और राज्याश्रय, दोनों में चारणों के अलावा ब्राह्मण, भंडारी, पंचोली और पुरोहित जातियों के लोगों द्वारा भी लिखी गईं. पाटनामा वंश और ख्यात का मिला-जुला और इनसे ही विकसित रूप है. पाटनामा पाटवी मतलब ज्येष्ठ, बड़ा ग्रन्थ था.[160] इसमें शासकों और उनके समय की प्रसिद्ध घटनाओं का वृत्तांत दिया गया है. इसमें गद्य-पद्य, दोनों हैं. चारण या भाट बही लेकर शासक या यजमान के घर जाता था और उसमें विवरण दर्ज़ कर घर लाता और इसको पाटनामा, मतलब ज्येष्ठ ग्रन्थ में दर्ज़ करता था. पाटनामा कम मिलते हैं, बहियाँ ही अधिक मिलती हैं. मेवाड़ के शासकों की वंशावली और प्रमुख घटनाएँ चित्तौड़-उदयपुर पाटनामा में संकलित हैं. बही का विकास मुग़ल इतिहास लेखन की परंपरा के प्रभाव में उत्तर मध्यकाल में हुआ और धीरे-धीरे वंश और ख्यात की कुछ विशेषताएँ इसमें सम्मिलित कर ली गईं. बहियों में उत्तर मध्यकालीन कुछ क्षेत्रीय शासकों के दैनंदिन जीवन का विवरण भी दर्ज़ किया जाता था.
यूरोपीय इतिहासकारों को अपने ग्रीक और रोमन पूर्वजों के स्मृति के रख-रखाव की पद्धति और ढंग पर बहुत गर्व है. मार्क ब्लाख़ ने लिखा है कि “औरों से भिन्न हमारी सभ्यता अपनी स्मृतियों के प्रति बेहद सतर्क रही है. हर चीज़ ने उसका झुकाव इसी दिशा में किया: ईसाई और शास्त्रीय विरासत दोनों ने. हमारे शुरुआती उस्ताद, ग्रीक-रोमन लोग, इतिहास लिखने वाले लोग थे.”[161] इतिहास की यही पद्धति बाद में सार्वभौमिक आदर्श और मानक बन गई. मार्क ब्लाख़ ने साफ़ लिखा कि “ईसाइयत तो इतिहासकारों का धर्म है.”[162]
अपने साम्राज्य के अधीन होने कारण विश्व के कई देश-समाजों का आरंभिक इतिहास यूरोपीय इतिहासकारों ने इसी पद्धति के आधार पर लिखा. विडंबना यह है कि आरंभिक अधिकांश उत्साही ‘आधुनिक’ भारतीय विद्वान् भी यही आदर्श और मानक लेकर अपनी विरासत की पहचान और पड़ताल करने निकल पड़े और यूरोपीय विद्वानों की तरह उन्होंने भी अपने पूर्वजों के स्मृति के रख-रखाव के ढंग को बेतुका और ‘अपरिष्कृत’ मान लिया. सभी देश-समाजों का इतिहास एक जैसा हो, यह आग्रह सिरे से ही ग़लत था. रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने एक निबंध भारतवर्षेर इतिहास में गत सदी आरंभ में ही सचेत कर दिया था कि
“दरअसल इस अंधविश्वास का परित्याग कर दिया जाना चाहिए कि सभी देशों के इतिहास को एक समान होना चाहिए. रॉथ्सचाइल्ड की जीवनी को पढ़कर अपनी धारणाओं को दृढ़ बनाने वाला व्यक्ति जब ईसा मसीह के जीवन के बारे में पढ़ता हुआ अपनी ख़ाता-बहियों और कार्यालय की डायरियों को तलाश करे और अगर वे उसे न मिलें, तो हो सकता है कि वह ईसा मसीह के बारे में बड़ी ख़राब धारणा बना ले और कहे: ‘एक ऐसा व्यक्ति जिसकी औक़ात दो कौड़ी की भी नहीं है, भला उसकी जीवनी कैसे हो सकती है?’ इसी तरह वे लोग जिन्हें ‘भारतीय आधिकारिक अभिलेखागार’ में शाही परिवारों की वंशावली और उनकी जय-पराजय के वृत्तांत न मिलें, वे भारतीय इतिहास के बारे में पूरी तरह निराश होकर कह सकते हैं कि ‘जहाँ कोई राजनीति ही नहीं है, वहाँ भला इतिहास कैसे हो सकता है?’ लेकिन ये धान के खेतों में बैंगन तलाश करने वाले लोग हैं. और जब उन्हें वहाँ बैंगन नहीं मिलते हैं, तो फिर कुण्ठित होकर वे धान को अन्न की एक प्रजाति मानने से ही इनकार कर देते हैं. सभी खेतों में एक-सी फ़सलें नहीं होती हैं. इसलिए जो इस बात को जानता है और किसी खेत विशेष में उसी फ़सल की तलाश करता है, वही वास्तव में बुद्धिमान होता है.”[163]
ऋग्वैदिककाल से ही अपनी ख़ास सामाजिक-सांस्कृतिक ज़रूरत के तहत बनी-बढ़ी स्मृति के संरक्षण की भारतीय परंपरा भी है. चक्रीय कालबोध और सनातनता की चेतना से इसका विकास अलग और ख़ास ढंग से हुआ, लेकिन इसमें देशकाल के संदर्भ के अभाव का आरोप निराधार है. यह भी इसमें निरंतर और सघन है और इसकी परंपरा में इसके पर्याप्त साक्ष्य भी हैं. आरंभ में इसका विकास नाराशंसी, गाथा, आख्यान, पुराण, इतिहास, कथा आदि के रूप में हुआ और दसवीं सदी के आसपास इसके समानांतर गुजरात सहित उत्तरी-पश्चिमी भारतीय प्रदेशों की क्षेत्रीय सामाजिक-सांस्कृतिक ज़रूरतों के तहत इसका प्राकृत-अपभ्रंश और परवर्ती देश भाषाओं में रास-रासो, चरित, ख्यात, बही, पाटनामा आदि में रूपांतरण हुआ.
यह परंपरा भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक ज़रूरतों के अनुसार बनी, इसलिए इतिहास की यूरोपीय ग्रीक-रोमन ईसाई परंपरा से बहुत अलग थी. इसमें इतिहास के ईसाई आदर्श और मानक- युक्तियुक्तता, कार्यकारण संबंध, तथ्य पर निर्भरता, प्रत्यक्ष अनुभव आदि उस तरह से नहीं थे, जिस तरह से सार्वभौमिक और कथित ‘आधुनिक’ इतिहास में होते हैं. इस परंपरा में एक तो स्मृति के दस्तावेज़ी ठहराव के बजाय उसको निरंतर और जीवंत रखने का आग्रह था, दूसरे, इसमें अतीत के यथार्थ का अमूर्तन इस तरह था कि यह वर्तमान में प्रासंगिक और उपयोगी बना रहे. साहित्यिक प्रथाएँ, और कवि-कथा रूढ़ियाँ भी इस परंपरा के दस्तावेज़ों में पर्याप्त थीं.
संदर्भ और टिप्पणियाँ:
[1] देखिए: (i) लोएस डिकिंसन, एन एसे ऑन दि सिविलाइजेशन ऑफ़ इंडिया, चाइना एंड जापान (लंदन एवं टोरेंटो: जे. एम. डेन्ट एंड सन्ज, 1913), 15. (ii) हीरानंद शास्त्री, “प्रोसिडिंग्ज़ एंड ट्रांजिक्शन ऑफ़ दि सिक्स्थ आल इंडिया ओरियंटल कान्फ्रेंस, पटना, दिसंबर,1930” (पटना: बिहार एंड उड़ीसा रिसर्च सोसायटी,1933), 1. (ii) टीलहार्ड दि शार्डिन, दि फिनोमेनन ऑफ़ दि मेन (न्यूयार्क: हारपरेनियल मॉडर्न थॉट, 1947), 211. (iii) चंद्रकांत गजानन राजे, बायोग्राफ़ी एंड हिस्ट्री ऑफ़ संस्कृत लिटरेचर (मुम्बई: बॉम्बे युनिवर्सिटी प्रेस, 1958), 9.
[2] रोमिला थापर, प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास, हिंदी अनु. आदित्यनारायण सिंह (दिल्ली: ग्रंथ शिल्पी, 2001), 232.
[3] वही, 251.
[4] वही, 251.
[5] विश्वंभर शरण पाठक, भारत के प्राचीन इतिहासकार, हिंदी अनु. प्रदीपकांत चौधरी (दिल्ली: ग्रंथ शिल्पी, 2007, मूल अंगेज़ी संस्करण 1966), 11.
[6] ए.एल. बाशम, प्रस्तावना, वही, 9.
[7] द्विजेंद्रनारायण झा, प्राचीन भारत (दिल्ली: ग्रंथ शिल्पी, 2000), 13.
[8] भारतीय इतिहास लेखन के दर्शन और परंपरा की अलग पहचान और देशज स्रोतों के आधार पर भारतीय इतिहास लिखने के कई प्रयास हुए हैं. आरंभ में जयचंद विद्यालंकार ने भारतीय इतिहास की रूपरेखा (इलाहाबाद: हिंदुस्तानी एकेडेमी, 1933) और पं. भगवद्दत्त ने भारतवर्ष का बृहत् इतिहास (अजमेर: वैदिक यंत्रालय, 1951) शीर्षक से आग्रहपूर्वक देशज स्रोतों पर निर्भर प्राचीन भारत के इतिहास लिखे. भारतीय इतिहास दर्शन की पहचान पर एकाग्र कार्यों के रूप में विश्वंभर शरण पाठक, एंशियन्ट हिस्टोरियन्स ऑफ़ इंडिया (एशिया पब्लिशिंग हाउस, बम्बई, 1926), ए.के. वार्डर, इंट्रोडक्शन टू इंडियन हिस्ट्रोग्राफ़ी (मुम्बई: पोपूलर प्रकाशन, 1972), अरविंद शर्मा, हिंदुइज्म एंड इट्स सेंस ऑफ़ हिस्ट्री (दिल्ली: ओक्सफ़ोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, 2003), सिबेश भट्टाचार्य, अंडरस्टेंडिंग हिस्ट्री (शिमला: इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडी, 2010) और नंदकिशोर आचार्य, इतिहास के सवाल (दिल्ली: सस्ता साहित्य मंडल, 2011) का उल्लेख किया जा सकता है. राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी की पहल पर मुनि जिनविजय, राहुल सांकृत्यायन आदि ने भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया. क्षेत्रीय इतिहाकारों में गौरीशंकर ओझा, विश्वनाथ रेउ, रघुवीरसिंह, दशरथ शर्मा, अगरचंद नाहटा, श्यामलदास आदि के कार्यों का भी इस लिहाज़ से महत्त्व है. रोमिला थापर के आरंभिक विचारों में भी अब बदलाव हुआ है. पास्ट बिफोर अस (रानीखेत: परमानेंट ब्लेक, 2013) में अब कुछ हद तक वे इस सामान्यीकरण का समर्थन नहीं करती हैं कि भारतीयों में इतिहास चेतना नहीं है या उनके अतीत में इससे संबंधित पर्याप्त ऐतिहासिक सामग्री नहीं है.
[9] अरविंद शर्मा, “डिड दि हिंदूज लेक सेंस ऑफ हिस्ट्री,” न्यूमेन, 2003 खंड- 50, 2 (2003), 190-227
[10] शेल्डन पोलक, “मीमांसा एंड दि प्रोब्लम ऑफ़ हिस्ट्री इन ट्रेडिशनल इंडिया,” जर्नल ऑफ़ अमरीकन ओरियंटल सोसायटी, खंड-109 (अक्तूबर-दिसंबर, 1989), 603.
[11] वही, 603.
[12] एम. विंटरनित्ज, हिस्ट्री ऑफ़ इंडियन लिटरेचर, जर्मन से अनु. सुभद्र झा (दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास, पुनर्मुद्रण 1985), 2: 88.
[13] जेम्स टॉड, एनल्स एंड एंटिक्विटीज़ ऑफ़ राजस्थान, संपा. विलियम क्रूक (दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास, 1971, प्रथम संस्करण 1920), 1: 268.
[14] शेल्डन पोलक, “मीमांसा एंड दि प्रोब्लम ऑफ़ हिस्ट्री इन ट्रेडिशनल इंडिया,” 603
[15] अरविंद शर्मा, “दि कांसेप्ट ऑफ़ साइक्लिकल टाइम इन हिंदुस्तान,” टाइम इन इंडियन फिलोसोफ़ी – ए कलेक्शन ऑफ़ एसेज, संपा. हरिशंकर प्रसाद (दिल्ली: श्रीसद्गुरु पब्लिकेशन्स 1992), 210
[16] वही, 210.
[17] अनंदिता एन. बाल्सलेव, “टाइम एंड दि हिन्दू एक्सपीरियन्स,” रीलिजन एंड टाइम, संपा अनंदिता एन. बाल्सलेव एवं आर.एन. मोहंती (दिल्ली: लेडन, 1992), 177.
[18] नंदकिशोर आचार्य, इतिहास के सवाल (दिल्ली: सस्ता साहित्य मंडल, 2011), 10.
[19] माइकेल विटज़ेल, “ऑन इंडियन हिस्टोरियन राइटिंग्ज़- दि रोल ऑफ़ वंशावलीज़,” जर्नल ऑफ़ जापानी एसोशियेशन फोर द साउथ एशियन स्टीडीज़, अंक-2 (1990), 47.
[20] ई.एच. कार, इतिहास क्या है, ‘व्हाट इज हिस्ट्री’ का हिंदी अनु. अशोक चक्रधर (दिल्ली: मैकमिलन, 1976, अंग्रेज़ी संस्करण 1961), 19.
[21] नंदकिशोर आचार्य, इतिहास के सवाल, 10.
[22] हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य का आदिकाल (पटना: बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, तृतीय संस्करण 1961, प्रथम संस्करण 1952), 76.
[23] विश्वंभर शरण पाठक, भारत के प्राचीन इतिहासकार, 52.
[24] अवस्थाः पंच कार्यस्य प्रारब्धस्य फलार्थिभिः. आरंभयत्नप्राप्त्याशानियताप्तिफलागमाः. – धनंजय, दशरूपक, 1.19, संपा. वासुदेव लक्ष्मण शास्त्री पनसीकर (मुम्बई: निर्णय सागर प्रेस, द्वितीय संस्करण 1917), 5.
[25] पृथ्वीराजरासो के बंगाल की रायल एशियाटिक सोसायटी के द्वारा प्रकाशन के साथ ही रासो रचनाओं की प्रामाणिकता पर विवाद शुरू हुआ. सबसे पहले डॉ. बूलर ने पृथीराजप्रबंध नामक एक रचना की उपलब्धता के आधार पर पृथ्वीराजरासो को अप्रामाणिक बताकर इसका प्रकाशन रुकवा दिया. बाद में राजस्थान के कई विद्वान्- मुरारिदान, श्यामलदास, गौरीशंकर ओझा आदि भी इस मुहिम में शामिल हो गए. उन्होंने सभी रासो रचनाओं को अप्रामाणिक घोषित कर दिया.
[26] ऋग्वेद में प्रयुक्त आख्यान संकेतों में से कुछ इस प्रकार हैं- 1. शुन:शेप (1.24), 2. अगस्त्य और लोपामुद्रा (1.179), 3. गृत्समद (2.12), 4. वसिष्ठ और विश्वामित्र (3.53, 7.33 आदि), 5. सोम का अवतरण (3.43), 6. त्र्यरुण और वृशजान (5.2), 7. अग्नि का जन्म (5.11), 8. श्यावाश्व (5.32), 9. बृहस्पति का जन्म (6.71), 10 राजा सुदास (7.18), 11. नहुष (7.95),12. अपाला (8.91), 13. नाभानेदिष्ठ (10.61.62), 14. वृषाकपि (10.86), 15. उर्वशी और पुरुरवा (10.95), 16. सरमा और पणि (10.108), 17. देवापि और शन्तनु (10.98), 18. नचिकेता (10.135) आदि.
[27] श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़. (तुलसीदास ने मानस के लिए ‘कथा’ शब्द कई स्थानों पर प्रयुक्त किया है.) – तुलसीदास, रामचरितमानस, संपा. योगेंद्रप्रतापसिंह (इलाहाबाद: लोकभारती प्रकाशन, 1999), 87.
[28] पुरिस कहाणी हउं कहउं जस पत्थावे पुन्न. – विद्यापति, कीर्तिलता, संपा. वासुदेवशरण अग्रवाल (चिरगाँव (झाँसी): साहित्य सदन, 1962), 20.
[29] हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य का आदिकाल, 57.
[30] भामह, काव्यादर्श, 1/ 25-29, संपा. एवं अनु. सी. शंकररामा शास्त्री (मद्रास: बाल मनोरमा प्रेस), 24
[31] दंडी, काव्यादर्श, 1/23-2, अनु. एवं संपा. कुमुदरंजन राय (कलकत्ता: के राय, 176, विवेकानंद रोड), 24.
[32] रुद्रट, काव्यालंकार, 16/22-23, हिंदी अनु. एवं संपा. सत्यदेव चौधरी (दिल्ली: वासुदेव प्रकाशन, 1965), 424.
[33] भगवद्दत्त, भारतवर्ष का बृहत् इतिहास (अजमेर: वैदिक यंत्रालय,1951), 3-17.
[34] ऋग्वेद संहिता, 9.10.3 (दिल्ली: चौखंबा संस्कृत प्रतिष्ठान, पुनर्मुद्रित संस्करण 1995), 565.
[35] (i) तैत्तिरीय ब्राह्मण, 1,3.2.6 एवं 1.3.2.7, संपा. सुब्रह्मयणम् शर्मा, http://www.sanskritweb.net/yajurveda/#TA. (ii) काठकसंहितायाम्, XVI.5, संपा. श्रीपाद शर्मणा दामोदर भट्ट सुनूना (मुम्बई: स्वाध्याय मंडल, 1943), 154.
[36] विश्वंभर शरण पाठक, भारत के प्राचीन इतिहासकार, 23.
[37] निघंटुसमन्वितं निरुक्तम्, IV.6, संपा. लक्ष्मणसरूप (दिल्ली: मोतीलाल एंड बनारसीदास, पुनर्मुद्रण 1998, प्रथम संस्करण 1920-27), 77.
[38] इतिहासमिदं सूक्तम् आहतुर्यास्कभागुरी. कन्येति शौनकस्त्वैद्रं पान्तमित्युत्तरे च ये॥ – बृहद्देवता, VI.107, संपा. एवं हिंदी अनु. रामकुमार राय (वाराणसी: चौखम्बा संस्कृत सीरिज ऑफिस, 1963), 203.
[39] वही, VIII.11, 248.
[40] शतपथब्राह्मणम्, XIII.4.3.12, संपा. अल्बेर्तेन वेबेरेण (वाराणसी: चौखम्बा संस्कृत सीरिज ऑफिस, तृतीय संस्करण 1997), 985.
[41] “छान्दोग्योपनिषत्” VII.1.1, उपनिषत्संग्रह, संपा. पं. जगदीश शास्त्री (दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास, 1970), 71.
[42] कौटलीय अर्थशास्त्र, 1.3, संपा. उदयवीर शास्त्री (नई दिल्ली: मेहरचंद लछमनदास पब्लिकेशंस, 2016), 7.
[43] ऋग्वेद संहिता, 1.106.4, 76; 1.18.9,9; 2.3.2, 151 आदि.
[44] निघंटुसमन्वितं निरुक्तम्, VIII. 6, 152.
[45] बृहद्देवता, III. 3, 75.
[46] वही, III. 2, 75.
[47] निघंटुसमन्वितं निरुक्तम्, IX.9, 162.
[48] मनो न्वा हुवामहे नाराशंसेन सोमेन. पितॄणां च मन्मभिः – ऋग्वेद संहिता, X.57.3, 673.
[49] विश्वेदेवाश्र्वमसेषून्नीतोऽसुर्होमायोद्यतो रुद्रो हूयमानो वातोऽभ्यावृत्तो नृचक्षाः प्रतिखाय्तो भक्षो भक्ष्यमाणः पितरो नाराशंसाः॥ – शुक्ल यजुर्वेदसंहिता, VIII.58, संपा. जगदीशलाल शास्त्री (दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदस, पुनर्मुद्रण, 1999), 152.
[50] रेभ्यासीदनुदेयी नाराशंसी न्योचनी. सूर्याया भद्रमिद्वासो गाथयैति परिष्कृतिम् – ऋग्वेद संहिता, X.85.6, 697.
[51] शतपथब्राह्मणम्, XI.5.6.8, 866.
[52] तैत्तिरीयारण्यकम्, 2.9.1, संपा, विनायक गणेश आप्टे (पूना: आनंद आश्रम मुद्रणालय, 1926) 1: 142.
[53] याज्ञवल्क्यस्मृतिः, 1/45, संपा. गंगासागर राय (दिल्ली: चौखंभा संस्कृत प्रतिष्ठान, 1998), 20.
[54] (i) प्र कृतान्यृजीषिणः कण्वा इंद्रस्य गाथया. – ऋग्वेद संहिता, VIII.32.1, 498.
(ii) अग्निमीळिष्वावसे गाथाभिः शीरशोचिषम्. – ऋग्वेद संहिता, 8.71.14, 536.
[55] गाथपतिं मेधपतिं रुद्रं जलाषभेषजम् – ऋग्वेद संहिता, I.43.4, 28.
[56] धारवाकेष्वृजुगाथ शोभसे – ऋग्वेद संहिता, V.44.5, 308.
[57] इंद्रमिद्गाथिनौ बृहदिंद्रमर्केभिरर्किणः – ऋग्वेद संहिता, I.7.1, 4.
[58] ऋग्वेदसंहिता, X.85.6, 697.
[59] गाथाभ्यः स्वाहा नाराशंसीभ्यः स्वाहा रैभीभ्यः स्वाहा सर्वस्मै स्वाहा॥ – तैत्तिरीय संहिता, 7.5.11, संपा. अनंत शास्त्री एवं योगेश्वर शास्त्री (मुंबई: भारत मुद्रणालय, स्वाधाय केंद्र, 1957), 325.
[60] शतपथब्राह्मणम्, XI.5.6.8, 866.
[61] अथर्ववेद संहिता, 15.1.7 (दिल्ली: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, पुनर्मुद्रित संस्करण 1996), 320.
[62] ऋग्वेद ब्राह्मणा – दि ऐतरेय एंड कौषीतकी, VII.18, संपा. एवं अनु. आर्थर ब्रेडले कीथ (केम्ब्रिज: हार्वर्ड युनिवर्सिटी प्रेस, 1920), 308.
[63] ऋग्वेद संहिता, I. 22-30, 12-16.
[64] ऋग्वेद ब्राह्मणा – दि ऐतरेय एंड कौषीतकी, 308.
[65] ऐतरेय आरण्यकम्, II.3.6, संपा. राजेंद्रलाल मित्र (कलकत्ता, 1926), 238
[66] ऋग्वेद ब्राह्मणा– दि ऐतरेय एंड कौषीतकी, VIII.21, 336-38.
[67] आख्यानम् पूर्ववृत्तोक्तिर्युक्तिरर्थावधारणम् – विश्वनाथ कविराज, साहित्यदर्पण, संपा. एवं टीका कृष्णमोहन शास्त्री (बनारस: चौखम्बा संस्कृत सीरिज, 1955), 428.
[68] एस.एन. दासगुप्त, ए हिस्ट्री ऑफ़ संस्कृत लिटरेचर (कलकत्ता: युनिवर्सिटी ऑफ़ कलकत्ता, 1962), 1: 43.
[69] (i) निघंटुसमन्वितं निरुक्तम्, II.10, 49; X.26, 181; XII.10, 209 आदि (यहाँ सभी स्थानों पर पंक्ति तत्रेतिहासमाचक्षते प्रयुक्त हुई है.).
ii) बृहद्देवता, VI.46, 126; VII.153, 245; VI.107, 203 आदि.
[70] देखिए: टिप्पणी सं. 24.
[71] शतपथब्राह्मणम्, XI.5.1, 855.
[72] ऋग्वेद ब्राह्मणा – दि ऐतरेय एंड कौषीतकी, VIII.21, 336-38.
[73] शतपथब्राह्मणम्, XI.5.1, 855
[74] ऋग्वेद ब्राह्मणा – दि ऐतरेय एंड कौषीतकी, III.24, 180.
[75]शतपथब्राह्मणम्, XI.1.6.9. 832.
[76] शुक्राचार्य, शुक्रनीतिः, संपा. जगदीशचंद्र मिश्र (वाराणसी: चौखंभा सुरभारती प्रकाशन, 1998) 532.
[77] जिनसेन, हरिवंशपुराण, 9.198, संपा. पन्नालाल जैन (दिल्ली: भारतीय ज्ञानपीठ, 12वाँ संस्करण 2010), 182.
[78] निरुक्तम् (दुर्गाचार्यकृतवृत्ति समेतम), 2.10., संपा. काशीनाथ राजवाड़े एवं विनायक गणेश आप्टे (पूना: आनंदाश्रम मुद्रणालय,1926), 1: 161.
[79] निघंटुसमन्वितं निरुक्तम्, II.10, 49.
[80] स बृहतीं दिशमनु व्यचलत्. तामितिहासश्च पुराणं च गाथाश्च नाराशंसीश्चानुव्यचलन्॥ इतिहासस्य च वै स पुराणस्य च गाथानां च नाराशंसीनां च प्रियं धाम भवति य एवं वेद॥ –अथर्ववेद संहिता, XV.6.1, 320
[81] वृहद्देवता, IV.47, 126.
[82] कौटलीय अर्थशास्त्र, I.5.14, 11.
[83] वही, I.3.2, 7.
[84] इतिहासप्रदीपेन मोहावरणघातिना. लोकगर्भगृहंकृत्स्नंयथावत्संप्रकाशितम् – वेद व्यास, महाभारत (आदि पर्व), I.1.87, संपा. रामचंद्र शास्त्री (दिल्ली: ओरियंटल बुक्स रीप्रिंट कारपोरेशन, द्वितीय संस्करण 1979). 13.
[85] वाक्पतिराज गउडवहो, संपा. एन.जी. सुरु (अहमदाबाद: प्राकृत टेक्सट सोसायटी, 1975), 119.
[86] अथर्ववेद संहिता, X.7.24, 262.
[87] शतपथब्राह्मणम्, XIV.6.10.6, 1082.
[88] छान्दोग्योपनिषत्, VII.1, 71.
[89] वेद व्यास, महाभारत, आदि पर्व 1/63, I.1.63, 12.
[90] (i) अमरसिंह, अमर कोषः, संपा. हरगोविंद शास्त्री (वाराणसी: चौखंभा संस्कृत संस्थान, पुनर्मुद्रण 2015), 84.
(II) शुक्रनीतिः, 4.353, 533.
[91] विश्वंभर शरण पाठक, भारत के प्राचीन इतिहासकार, 26.
[92] तैत्तिरीय आरण्यक, 2.9,10,11, 1: 142-148.
[93] विश्वंभर शरण पाठक, भारत के प्राचीन इतिहासकार, 27.
[94] कात्यायन, “अष्टाध्यायीसूत्रपाठः सवार्तिक,” IV.3.88, पाणिनीयसूत्रपाठस्य तत्परिशिष्टग्रंथानां च शब्दकोशाः, संपा. श्रीधर शास्त्री पाठक (पूना: भंडारकर ओरियंटल इंस्टिट्यूट, 1935), 556.
[95] तैत्तिरीय आरण्यक, 1.6, 23.
[96] कात्यायन, “अष्टाध्यायीसूत्रपाठः सवार्तिक,” IV.3.87
[97] ॥लुबाख्यायिकाभ्यो बहुलम्॥ अधिकृत्य कृते ग्रंथ इत्यत्र आख्यायिकाभ्यो बहुलं लुब्वक्तयः. वासवदत्ता. सुमनोत्तरा. न च भवति भैमरथी॥ – पतंजलि मुनि, व्याकरण महाभाष्यम्, संपा. गुरुप्रसाद शास्त्री (दिल्ली: प्रतिभा प्रकाशन, पुनर्मुद्रण 1999), 3: 235.
[98] कारुरहं ततो भिषगुपलप्रक्षिणी नना. – ऋग्वेद संहिता, IX.112.3, 625.
[99] विश्वंभर शरण पाठक, भारत के प्राचीन इतिहासकार, 28.
[100] वही, 29.
[101] अंगिरसो नः पितरो नवग्वा अथर्वाणो भृगवः सोम्यासः. – ऋग्वेद संहिता, X.14, 636.
[102] छान्दोग्योपनिषत्, III.3, 47.
[103] गोपथ ब्राह्मण, 1.39, 2.18, संपा. प्रज्ञादेवी एवं मेधा देवी (दिल्ली: चौखंभा संस्कृत प्रतिष्ठान, चतुर्थ संस्करण 1999) 68, 113 .
[104] छान्दोग्योपनिषत्, III.3, 47.
[105] एस. सुखटणकर, “दि भृगुज एंड दि भरत: ए हिस्टोरिकल स्टडी,” क्रिटिकल स्ट्डी ऑफ़ महाभारत (पूना: वी.एस. सुखटणकर मेमोरियल कमेटी, 1944), 278.
[106] विश्वंभर शरण पाठक, भारत के प्राचीन इतिहासकार, 30.
[107] वाल्मीकिभर्गवान् कर्ता सम्प्राप्तो यज्ञसंविधाम्. येनेदं चरितं तुभ्यमशेषं संप्रदर्शितम्॥25॥ संनिबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विंशत्सहस्रकम्. उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना॥26॥ – श्रीमद्वाल्मीकिरामायण, VII. 94. 26., संपा. से. कुप्पुस्वामि शास्त्री आदि (मद्रास: आर. नारायणस्वामी, द्वितीय संस्करण 1958), 1079.
[108] एन.जे. शेंदे, ऑथरशिप ऑफ़ दि रामायण, खंड-2 (मुम्बई: जेयूबी-XII, 1943), 19.
[109] मूल गोत्राणि चत्वारि समुत्पन्नानि पार्थिव. / अंगिराः कश्यपश्चैव वसिष्ठो भृगुरेव च॥ – महाभारत, XII.296.17, 587.
[110] एन.जे. शेंदे, “ऑथरशिप ऑफ़ दि महाभारत,” एनल्स ऑफ़ दि भंडारकर ओरियंटल इंस्टीट्यूट, खंड-XXIV, 1943, 81.
[111] ऋभुः प्रियव्रतायाह स च भागुरयेऽब्रवीत्॥43॥ भागुरिः स्तंभमित्राय दधीचाय स चोक्तवान्॥ सारस्वताय तेनोक्तं भृगुस्सारस्वतेन च॥44॥ भृगुणा पुरुकुत्साय नर्मदायै स चोक्तवान्॥ नर्मदा धृतराष्ट्राय नागाया पूरणाय च॥45॥ ताभ्यां च नागराजाय प्रोक्तं वासुकये द्विज॥ वासुकिः प्राह वत्साय वत्सश्चा श्वतराय वै॥ कंबलाय च तेनोक्तमेलापुत्राय तेन वै॥47॥ पातालं समनुप्राप्त ततो वेदशिरा मुनिः॥ प्राप्तवानेतदखिलं स च प्रमतये ददौ॥48॥ दत्तं प्रमतिना चैतज्जातु कर्णाय धीमते॥ जातुकर्णेन चैवोक्तमन्येषां पुण्यकर्मणाम्॥49॥ – श्रीविष्णुमहापुराणं, 6.8, संपा. राजेंद्रनाथ शर्मणा (दिल्ली: नाग पब्लिशर्स, द्वितीय संस्करण 1985), 293.
[112] विश्वंभर शरण पाठक, भारत के प्राचीन इतिहासकार, 31.
[113] वही, 31.
[114] (i) अथर्ववेद संहिता, II.5.7, 35. (ii) शतपथ ब्राह्मण, V.3.1.5, 4.4, 17-18.
[115] शतपथ ब्राह्मण, V.3.1.5, 4.4, 17-18.
[116] बृहद्देवता, V.124-138, 172-174.
[117] नृत्ताय सूतं गीताय शैलूषं धर्माय सभाचरं नरिष्ठायै भीमलं नर्माय रेभम् हसाय कारिमानन्दाय स्त्रीषखं प्रमदे कुमारी पुत्रं मेधायै रथकारं धैर्याय तक्षाणम्. – शुक्ल यजुर्वेद-संहिता, 30.6, 520.
[118] वेद व्यास, महाभारत, I.1.2, 3.
[119] विश्वंभर शरण पाठक, भारत के प्राचीन इतिहासकार, 33.
[120] वही, 34.
[121] कौटलीय अर्थशास्त्र, II.25.2, 94.
[122] “उनके अभिलेखागार और अभिलेखों में इनके अलग संरक्षक हैं. आधिकारिक घोषणाएँ और राज्य-पत्रों को सामूहिक रूप से (नी-लो-पी तू (अथवा ‘चा’) कहा जाता है; ये अच्छे और बुरे में दर्ज़ किए जाते हैं, और सार्वजनिक आपदा और अच्छे समय में उदाहरण के रूप में सामने आते हैं.” – युवान च्यांग, ट्रेवल्स इन इंडिया, संपा. टी. वाट्टर्स (लंदन: रॉयल एशियाटिक सोसायटी,1904), 154.
[123] पटे वा ताम्रपट्टे वा स्वमुद्रो परिचिह्नितम्. अभिलेख्यात्मनो वंश्यानात्मानं च महीपतिः –याज्ञवल्क्यस्मृतिः, 142.
[124] विश्वंभर शरण पाठक, भारत के प्राचीन इतिहासकार, 37.
[125] वही, 38.
[126] हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य का आदिकाल (पटना: बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, तृतीय संस्करण 1991). 76.
[127] अवस्थाः पंच कार्यस्य प्रारब्धस्य फलार्थिभिः. आरंभयत्नप्राप्त्याशानियताप्तिफलागमाः. -विश्वनाथ, साहित्यदर्पणः, 6.71, संपा. कृष्णमोहन शास्त्री (बानरस: चैखंम्बा संस्कृत सीरीज, द्वितीय संस्करण 1958), 354.
[128] रोमिला थापर, प्राचीन भारत का सामाजिक इतिहास, 238.
[129] देखिए: राजबली पांडेय, अशोक के अभिलेख (वाराणसी: ज्ञान मंडल लि. संस्करण 2017).
[130] भरत मुनि, नाट्यशास्त्रम् (हिंदी अनुवाद सहित), 17.26, अनु. ब्रजवल्लभ मिश्र (दिल्ली: सिद्धार्थ पब्लिकेशन्स, 1997), 497.
[131] हेमचंद्र, प्राकृतव्याकरणम्, संपा. सागरमल एवं प्रेम सुमन जैन (उदयपुर: आगम, अहिंसा-समता एवं प्राकृत संस्थान), 2: 314-393.
[132] राजा कविः कविसमाजं विदधीत. राजनि कवौ सर्वो लोकः कविः स्यात्. स काव्य परीक्षायै सभां कारयेत्. सा षोडशभिः स्तंभैश्चतुर्भिर्द्वारैरष्टभिर्मत्तवारणीभिरुपेता स्यात्. तदनुलग्नम् राज्ञः केलिगृहम्. मध्येसभं चतुःस्तम्भान्तरा हस्तमात्रोत्सेधा समणिभूमिका वेदिका. तस्यां राजासनम्. तस्य चोत्तरतः संस्कृताः कवयो निविशेरन्. बहुभाषाकवित्वे यो यत्राधिकं प्रवीणः स संक्रम्य तत्र तत्रोपविशेत्. ततः परं वेदविद्याविदः प्रामाणिकाः पौराणिकाः स्मार्त्ता भिषजो मौहूर्त्तिका अन्येऽपि तथाविधाः. पूर्वेण प्राकृताः कवयः; ततः परं नटनर्तकगायनवादनवाग्जीवनकुशीलवतालावचरा अन्येऽपि तथाविधाः. पश्चिमेनापभ्रंशिनः कवयः; ततः चित्रलेप्यकृतो माणिक्यबंधका वैकटिकाः स्वर्णकारवर्द्धकिलोहकारा अन्येऽपि तथाविधाः. दक्षिणतो भूतभाषाकवयः; ततः परं भुजंगा गणिकाः प्लवकशौभिकजंभक मल्लाः शस्त्रोपजीविनो अन्येऽपि तथाविधाः. – राजशेखर, काव्यमीमांसा, संपा. सी.डी. दलाल (बड़ौदा: ओरियंटल इंस्टिट्यूट, तृतीय संस्करण 1934), 54.
[133] देखिए: भोजदेव, सरस्वतीकंठाभरणम्, संपा. कामेश्वरनाथ मिश्र (वाराणसी: चौखंभा ओरेंटेलिया,1992)
[134] भा भंजिए बंगा भग्गु कलिंगा तेलंगा रण मुक्कि चले
मरहठ्टा ढीट्ठा लग्गिअ कठ्टा सोरठ्टा भए पाअ पले
चंपारण कंपा पव्वय झंपा ओत्था ओत्थी जीव हरे
काशीसर राणा किअउ पाअणा विज्राहर भण मंतिवरे.
– हेमचंद्राचार्य, प्राकृतपैंगलम, संपा. चंद्रमोहन घोष (कलकत्ता: एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल, 1902), 244.
[135] हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य का आदिकाल, 29.
[136] वही, 31.
[137] राजशेखर्स कर्पूरमंजरी (हार्वर्ड ओरियंटल सीरीज),1.8, संपा. स्टेन कोनो (दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास, द्वितीय संस्करण 1963), 5
[138] विद्यापति, कीर्तिलता, 14.
[139] बृहत्कथा पैशाची प्राकृत में लिखित सबसे प्राचीन कथा रचना है, लेकिन इसकी पांडुलिपि अभी तक उपलब्ध नहीं हुई है. गुणाढ्य राजा सातवाहन का सभापति था. अब इस रचना के एकाधिक रूपांतरण मिलते हैं. संघदासगणिवाचक की वसुदेवहिंडी इसका सबसे प्राचीन जैन रूपांतरण है. विद्वानों ने इसका रचनाकाल भी बृहत्कथा की तरह 600 ई. आसपास माना है. इस पर निर्भर अन्य उपलब्ध रचनाओं में बृहत्कथाश्लोक संग्रह (बुध स्वामी), कथा सरित्सागर (सोमदेव भट्ट) और बृहत्कथा मंजरी (क्षेमेंद्र) प्रमुख हैं. (देखिए: संघदासगणिवाचक, वसुदेवहिंडी, संपा. श्रीरंजन सूरिदेव (ब्यावर: पंडित रामसरूप शास्त्री चेरिटेबल ट्रस्ट, 1989).
[140] वाक्पतिराज, गउडवहो, संपा. एन.जी. सुरु (अहमदाबाद: प्राकृत टेक्सट सोसायटी, 1975).
[141] हेमचंद्र सूरि, द्वयाश्रयकाव्य, संपा. ए. काठावटे (बीएसएस, 1921). (इस ग्रंथ का प्राकृत अंश कुमारपालचरित के नाम से प्रसिद्ध है. यह लोकप्रिय रचना थी, जिस पर पूर्णकलश गणि ने टीका लिखी. परवर्ती कई ग्रंथकारों ने इसके आधार पर अपनी रचनाएँ कीं.)
[142] मुनि जिनविजय, “प्रास्ताविक वक्तव्य,” प्रबंधचिंतामणि, मेरुतंगाचार्यकृत, हिंदी भाषांतर हजारीप्रसाद द्विवेदी (अहमदाबाद: संचालक–सिंघी जैन ग्रंथमाला, 1940), ट.
[143] देखिए: राजशेखर सूरि, प्रबंधकोश, संपा. मुनि जिनविजय (शांति निकेतन: अधिष्ठाता-सिंघी जैन विद्यापीठ, 1935).
[144] देखिए: मुनि जिनविजय, संपा., पुरातन प्रबंध संग्रह (कलकत्त्ता: अधिष्ठाता-सिंघी जैन विद्यापीठ, 1936).
[145] देखिए: रणछोड़ भट्टकृत राजप्रशस्तिमहाकाव्यम् (साहित्य संस्थान, राजस्थान, विद्यापीठ, उदयपुर, 1973) और सदाशिव रचित राजरत्नाकरमहाकाव्य (राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर, 2000).
[146] हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य का आदिकाल, 43.
[147] विश्वंभर शरण पाठक, भारत के प्राचीन इतिहासकार, 25.
[148] गिरिजाशंकर मिश्र, “प्राचीन भारतीय इतिहास दर्शन और इतिहास लेखन,” इतिहास: स्वरूप और सिद्धांत,” संपा. गोविंदचंद्र पांडेय (जयपुर: राजस्थान ग्रंथ अकादमी, दसवाँ संस्करण 2014)78.
[149] हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य का आदिकाल, 66.
[150] (i) श्रीमद्भागवपुराण में एकाधिक स्थानों पर रास शब्द का प्रयोग (रासक्रीडामनुव्रतैः, 33.2; रासोत्सवः, 33.3; रासपरिश्रांता, 33.11 आदि) मिलता है. – श्रीभागवतमहापुराणम्, संपा. राजेंद्रनाथ शर्मणा (दिल्ली: नाग पब्लिशर्स, 1987), 106-107. (ii) हेमचंद्र, काव्यानुशानुशानम्, संपा. महामहोपाध्याय शिवदत्त (मुम्बई: निर्णय सागर प्रेस, 1934), 391.
[151] नामवर सिंह, पृथ्वीराजरासो : भाषा और साहित्य (नई दिल्ली: राधाकृष्ण प्रकाशन, तीसरी आवृत्ति 2011), 240.
[152] हरप्रसाद शास्त्री, प्रीलिमिनरी रिपोर्ट ओन दि ऑपरेशन इन सर्च ऑफ़ एमएसएस ऑफ़ बार्डिक क्रोनिकल्स (कलकत्ता: एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल, 1913), 25 (काशीप्रसाद जायसवाल के रासो संबंधी विचार हरप्रसाद शास्त्री ने इस पृष्ठ पर पाद टिप्पणी में उद्धृत किए हैं.).
[153] हीरालाल माहेश्वरी, राजस्थानी भाषा और साहित्य (कलकत्ता: आधुनिक पुस्तक सदन, 1960), 360.
[154] रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास (काशी: नागरी प्रचारिणी सभा, 1929), 36.
[155] हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य का आदिकाल, 108.
[156] जहूर ख़ाँ मेहर, “प्रस्तावना,” मुँहणोत नैणसीरी ख्यात, संपा. गौरीशंकर हीराचंद ओझा (जोधपुर: महाराजा मानसिंह पुस्तक प्रकाश शोध केंद्र, द्वितीय संस्करण 2010, प्रथम संस्करण 1925), 7.
[157] एल.पी. तेस्सीतोरी, रिपोर्ट्स ऑफ़ द बार्डिक एंड हिस्टोरिकल लिटरेचर ऑफ़ राजपुताना (कलकत्ता: एशियाटिक सोसायटी, 1917),
[158] अहसान रज़ा ख़ान, “दलपतविलास, नैनसी एंड बाँकीदास: ए स्टडी इन सम आसपेक्ट्स ऑफ़ ख्यात लिटरेचर ऑफ़ राजस्थान,” प्रोसिडिंग्ज़ ऑफ़ दि इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, खंड–37 (1976), 281.
[159] वही, 281-282.
[160] मनोहरसिंह राणावत, संपा., “प्राक्कथन,” चित्तौड़–उदयपुर पाटनामा, (सीतामऊ: श्री नटनागर शोध संस्थान, 2003), 1: IV.
[161] मार्क ब्लाख़, इतिहास का शिल्प, हिंदी अनु. बृजबिहारी पांडेय (दिल्ली: ग्रंथ शिल्पी, पुनर्मुद्रण 2013), 21.
[162] वही, 21.
[163] रबींद्रनाथ टैगोर, विजन ऑफ़ हिस्ट्री, अनु. सिबेश भट्टाचार्य एवं सुमिता भट्टाचार्य (शिमला: इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडी, 2003), 28.
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माधव हाड़ा आलोचक और शिक्षाविद् माधव हाड़ा (जन्म: 1958) की चर्चित कृति ‘पचरंग चोल पहर सखी री’ (2015) है, जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘मीरां वर्सेज़ मीरां’ 2020 में प्रकाशित हुआ. हाल ही में उन्होंने ‘कालजयी कवि और उनकी कविता’ नामक एक पुस्तक शृंखला का संपादन किया है, जिसमें कबीर, रैदास, मीरां, तुलसीदास, अमीर ख़ुसरो, सूरदास, बुल्लेशाह, गुरु नानक, रहीम और जायसी शामिल हैं. उनकी अन्य प्रकाशित मौलिक कृतियों में ‘वैदहि ओखद जाणै’ ( 2023) ‘देहरी पर दीपक’ (2021), ‘सीढ़ियाँ चढ़ता मीडिया’ (2012), ‘मीडिया, साहित्य और संस्कृति’ (2006), ‘कविता का पूरा दृश्य’ (1992) और ‘तनी हुई रस्सी पर’ (1987) प्रमुख हैं. संपर्क: |




The article by Madhav Hada presents a robust defence of ancient and medieval Indian historical consciousness, positioning itself as a decolonial critique of Eurocentric historiography. It argues that the dismissal of Indian traditions as “ahistorical” stems from the imposition of modern (Enlightenment-era) standards on diverse cultural forms of remembering the past, such as genealogies, inscriptions, and oral epics. Drawing on a range of scholars—from colonial figures like James Tod to modern Indologists like Sheldon Pollock—the text seeks to rehabilitate Indian historiography as contextually valid. While this intervention is timely and largely persuasive, it is not without flaws: it occasionally simplifies or selectively interprets sources, adopts a somewhat polemical tone, and under-engages with ongoing debates. It is a valuable corrective to lingering colonial myths, scoring high on evidence and relevance
यूरोप और भारत का द्वन्द उत्तर-औपनिवेशिक विचार के लिए चारा उपलब्ध करवाता है। इसके लिए किसी इकहरे यूरोप की कल्पना की जाती है और किसी इकहरे भारत की भी कल्पना की जाती है। पूरे लेख में यह अनुभव होता है कि लेखक इतिहास लेखन के क्षेत्र यूरोप की श्रेष्ठता का भारतीय परंपरा से उद्धरण ढूँढ कर जवाब दे रहा है।
क्या प्राचीन ग्रीक से लेकर वर्तमान तक यूरोप में कोई एक ही इतिहास लेखन की परंपरा रही है? जिसका जरूरी तौर से रिश्ता ईसाई धर्म से है।
पूरे लेख में भारतीय महाद्वीप की फारसी के तारीख इतिहास लेखन का जिक्र नहीं है, एक जगह तो लेखक उद्धरण करते हुए यह जिक्र भी करते है कि मध्यकालीन दुर्घटनाओं से भारतीय इतिहास लेखन पर प्रभाव पड़ा है। सच कहें तो इस प्रकार के लेख जो ज्ञान के क्षेत्र में भारतीय अस्मिता की स्थापना चाहते है, का इस्तेमाल आसानी से साम्प्रदायिक इतिहासबोध के लिए किया जा सकता है।