| विनोद कुमार शुक्ल का घर-संसार
विपिन शर्मा |
अचल मिश्र द्वारा निर्देशित फ़िल्म ‘चार फूल हैं और दुनिया है’ एक बहु प्रशंसित डॉक्यूमेंट्री है. यह हिंदी के महत्वपूर्ण कवि और उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल की रचना प्रक्रिया और जीवन पर केंद्रित है. एक लेखक जो समाज की विरासत है लेकिन समाज में ही धीरे-धीरे वह विस्मृत होता चला जाता है, यह एक त्रासदी है और समाज किस दिशा की ओर जा रहा है, उस दशा और दिशा को यह डॉक्यूमेंट्री फिल्म बहुत कोमलता के साथ उभारती है.
फिल्म की शुरुआत विनोद कुमार शुक्ल के धीमे-धीमे चलने से होती है.अपनी सोच में निमग्न एक रचनाकार जैसे खुद से बातचीत की मुद्रा में है. जैसे किसी खोए हुए भाव को तलाशता हुआ. फिल्म के शुरुआती दृश्य में एक संवाद है, ‘बिहार से एक फोन आता है मेरे पास, क्या आप जिंदा हैं, और किससे पूछता इसलिए आपसे ही पूछ लिया’. इस बिंदु पर आकर कई बार ठहरकर सोचने को मन करता है; कि एक लेखक को अपने जीने की सनद देनी पड़ती है. और यह हमारे समाज में ही संभव है. हम जितने आर्थिक रूप से संपन्न होते जाते हैं, उतने ही संवेदनात्मक रूप से रिक्त.
एक गहरी बातचीत कितनी सहज हो सकती है और उसके कितने सिरे हो सकते हैं यह बात इस डॉक्यूमेंट्री को देखते हुए बार–बार अनुभव होती है. पूरी फिल्म एक प्रवाह है बहती हुई जिंदगी का. एक रचनात्मकता को आकार लेते हुए महसूस करने का. जब कोलाहल और गहरा शोर जीवन में भरता जा रहा हो, तब धीरे–धीरे एक ऐसे भाव और विचार में उतरना है जो निरंतर सहज होने की मांग करता है और सबसे बड़ी त्रासदी यह ही है उसे जटिल कहकर परे किया जाता रहा है. अचल मिश्र की इस डॉक्यूमेंट्री की एक विशेषता है यह वाचाल होने से ज़्यादा मौन का आख्यान है. यह रायपुर की दो दोपहरों की बतकही का कैमरे के माध्यम से संरक्षण है. डॉक्युमेंट्री हिंदी में बहुत सारी बनी हैं कई बड़े लेखकों पर भी उपलब्ध हैं जैसे उदय प्रकाश द्वारा साहित्य अकादमी के माध्यम से विजय दान देथा पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री. निर्मल वर्मा पर भी साहित्य अकादमी की वह शुरुआती डॉक्यूमेंट्री में से है. चार फूल हैं और दुनिया है डॉक्यूमेंट्री की विशेषता है, दो रचनात्मक लोगों मानव कौल और अचल मिश्रा का इससे जुड़ा होना. हिंदी के युवा लेखक निहाल पराशर की भी इसमें विचार के स्तर पर हिस्सेदारी है.
अचल मिश्र ने एक जगह कहा, ‘मानव कौल और मेरी योजना थी कुछ बातचीत करेंगे. इसमें विनोद शुक्ल जी से बातचीत करने के साथ-साथ शाश्वत गोपाल से भी विनोद कुमार शुक्ल जी के लेखन परिवेश और रचनात्मकता से जुड़े सवालों पर सहज भाव से बातचीत करने की भी योजना थी. रिकॉर्ड करने की पूरी तैयारी के साथ टीम साथ में थी. जब हम डॉक्यूमेंट्री के माध्यम से इस बातचीत को देखते हैं तो इसकी सहजता और प्रवाह तरल जल –सा महसूस होता है. जिसमें कोई बाधा नहीं है और न कोई उलझन. एक बड़ी विशेषता इसका कृत्रिमता से दूर होना है. नहीं तो कई बार लेखक में एक विशिष्टता बोध बातचीत के बाहर भी झांकने लगता है. सवाल जितने अनायास हैं उनके जवाब भी औचक और सहज.
इस डॉक्यूमेंट्री में विनोद कुमार शुक्ल के रचनात्मक संसार को जानने का माध्यम उनके सुपुत्र शाश्वत गोपाल के साथ किया गया सघन संवाद भी है. एक ठहरी हुई खामोशी जैसे एक नया सौंदर्यशास्त्र रचती है. लिखना कितना जरूरी है,उससे ज्यादा जिंदगी को लेकर अनुभव करना जरूरी है. विनोद कुमार शुक्ल का जब भी वह ज़िक्र करते हैं, तो जैसे एक विरासत का वाहक बोल रहा है.
कई बार शाश्वत गोपाल लिखने की प्रक्रिया पर बात करते हैं, ‘दादा हम से ज्यादा रचनात्मक जीवन जीते हैं, वह लिखते हैं, सक्रिय रहते हैं.’ लेखन और स्वयं को अभिव्यक्त करने के शिल्प पर यहाँ एक लंबी बातचीत है. वह स्वयं के न लिखने की वजह पर भी गंभीरता से सोचते हैं. गोपाल यह कहने में भी गुरेज़ नहीं करते, ‘मैं जितना महसूस करता हूँ उसे दर्ज नहीं कर पाता’. वह कौन सा भाव और मन: स्थिति है जो किसी को लेखक– कवि बनाती है. जैसे यह पूरी बातचीत उसी अंत:सूत्र को खोजने का उपक्रम है.
इस डॉक्यूमेंट्री में मौन का जो सौंदर्यशास्त्र है, मौन का संगीत और जो लय है, वह बेहद गहरी है. एक बातचीत इतनी शांत और रचनात्मक हो सकती है इस डॉक्यूमेंट्री को देखते हुए कई बार अनुभव होता है. जब शाश्वत गोपाल बात कर रहे होते हैं तो मुझे रेनर मारिया रिल्के के युवा कवि काप्पुस को लिखे पत्र याद आते हैं. वहाँ लेखक की स्वायत्तता और लेखन प्रक्रिया पर बहुत गंभीरता से बात की गई है. चार फूल हैं और दुनिया है डॉक्यूमेंट्री में अचल मिश्रा ने जो शाश्वत गोपाल से बात की है, उस बात में विनोद कुमार शुक्ल जी की बहुत गहरी उपस्थिति है. उस बातचीत के बीच शब्दों से ज्यादा उनके मंतव्यों पर गौर किया जाना चाहिए; जो शब्दों के बीच कहीं अंतराल में उपस्थित हैं. जब शाश्वत गोपाल कहते हैं ‘मैं लिखने की कोशिश करता हूँ, सोचता भी हूँ मगर लिख नहीं पाता. अथवा खुद को ऐसे नहीं अभिव्यक्त कर पाता जैसे करना चाहिए. लेकिन उनकी बातचीत में भी दिशा है. जैसे फोटोग्राफी में खुद को अभिव्यक्त करना. और जब वह अपनी बेटी की फोटोग्राफी का जिक्र करते हैं, जो एक आंगन के एक ही पेड़ का चित्र पिछले दो वर्षों से उतार रही है, लेकिन हर चित्र में कुछ नयापन है. और जो यह नयापन है यह ही चीजों को देखने की अंतर्दृष्टि है. हम जीवन को जिस रूप में देखते हैं शायद उसे और थोड़ा रचनात्मक होकर अपनी कल्पना के माध्यम से पुन:सृजित करते हैं.
एक कलाकार अपने जिए जीवन और स्मृति को बरतता है. लेकिन याद रखना जितना ज्यादा जरूरी है उतना ही ज्यादा जरूरी है भूल जाना. मौलिकता की जड़ें भूल जाने में गड़ी हुई हैं. हम जितना अध्ययन करेंगे उतने ही अन्य संदर्भ, स्मृतियां हमारे साथ जुड़ती चली जाएंगी. विस्मृति–स्मृति और मौलिकता का एक द्वंद्व है. कई बार शाश्वत गोपाल भूल जाने को व्याख्यायित करते हैं– ‘मौलिकता में एक हाथ भूलने का भी है, यदि आप भूलोगे नहीं तो आपके अंदर सूचनाओं का एक शोर होगा’. वह कहते हैं, ‘मगर विद्वता तो याद रखने से आती है. जो विद्वान हो जरूरी नहीं वह मौलिक हो. इसके विपरीत होने की संभावना ज्यादा है’. इस बात को कैमरामैन ने बहुत कलात्मकता के साथ शूट किया है. गोपाल जी की बातचीत के बीच जो ठहर कर, सोचने की जो मुद्रा है कैमरा उस चेहरे के भाव को भी सघनता से उभरता है. यह जो छोटे-छोटे क्षणों की सुंदरता है,वह कमाल है. एक गहरी एस्थेटिक सेंस इस बातचीत में गहरी परिव्याप्त है.
कुछ लिखने की जद्दोजहद और अंतत :यह स्वीकार करना कि मैं लिख नहीं पाता. सोच पाता हूँ, लिखने के लिए जो विशेष गुण चाहिए, वह शायद मेरे पास नहीं है. कई बार दादा ने कहा कि ’डायरी लिखिए लेकिन हो नहीं पाया.’ शुरुआत कहीं से भी हो सकती है और कभी भी हो सकती है. मगर करनी तो पड़ेगी. यहाँ कलाओं का एक निज संसार भी है, यदि कविता के जीनियस की संगत में आप रहते हों, और इत्तेफाक से वह आपका पिता हो. तब यह आपके लिए कठिन है, आप इस फॉर्मेट में खुद को अभिव्यक्त करें जिसमें आपके पूर्वज कर रहे हैं. शाश्वत गोपाल को सुनते हुए कई बार लगता है, ‘वह विनोद कुमार शुक्ल की ओर खुलने वाली खिड़की हैं. जो खिड़की अक्सर घर में रहती है दीवार में नहीं.’
विनोद कुमार शुक्ल से जो बातचीत मानव कौल ने की है; उस बातचीत में तरलता और सहजता है. बस आप मुग्ध होकर और मुक्त होकर उसको सुनते हैं. एक रचनाकार का जो मन है और लिखने का जो मूड है उस पर बहुत कम बातचीत की जाती है. लिखने में लेखक का मन और उसके मूड की बड़ी भूमिका है. मन:स्थिति को वायवीय कह दिया जाता है. हमारे यहाँ लेखक को समझने के सूत्र बहुत स्थूल हैं, विचारधारा, आर्थिक संसाधन अथवा आर्थिक संघर्ष. यह भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं और होने भी चाहिए; मगर साहित्य का आंतरिक परिवेश और थोड़ा ज्यादा मुक्त और सहज होना चाहिए. अचल मिश्र ने जो यह प्रयास किया है, वह बहुत सार्थक है. कई बार यह इतना मंथर है कि शब्दों के साथ बोलने वाले की भंगिमाओं और लहज़े भी इस बातचीत में कुछ अतिरिक्त जोड़ता है.
विनोद जी कई बार जीवन को लेकर कहते हैं जीवन बेहद ऊबड़–खाबड़ हो गया है. कुछ याद नहीं आता और जो याद आता है, वह जैसा याद आना चाहिए ऐसा नहीं आता. अपने बचपन को याद करते हुए वह अपने स्थानीय परिवेश को याद करते हैं और अपनी जड़ों को याद करते हैं. बचपन में स्वर्गवासी हो गए पिता की स्मृतियां उन्हें बार-बार आती हैं. मां द्वारा लिखने–पढ़ने की आदत और किताबों के संसार से परिचय कराना उनकी स्मृति में सुरक्षित है. उनकी बातचीत मौलिकता और अनुकरण जैसे सवालों को भी हमारे सामने प्रकट करती है. दुनिया में प्रत्येक विषय पर इतना लिखा जा चुका है तब भी कोई लेखक जब लिखता है; तो वह परंपरा से भी लेता है मगर तब भी वह उसका मौलिक सृजन होता है. क्योंकि उसके पास रचनात्मक आंख होती है और अपना फिल्टर. जब एक बार विनोद कुमार शुक्ल ने अपनी मां से कहा किसी ने कहा है कि मेरी कविताओं पर भवानी प्रसाद मिश्र का इतना गहरा प्रभाव है कि एक पंक्ति तो बिल्कुल ऐसा लगता है; जैसे उनकी कविता से आ गई है. तब जो उनकी मां ने कहा, वह बहुत महत्वपूर्ण है. ‘पढ़ो सबको लेकिन अपनी रचनात्मक छलनी जरूर लगाओ’. . !
मुक्तिबोध का विनोद कुमार शुक्ल पर गहरा प्रभाव रहा है. जैसे वह उनके रचनात्मक उस्ताद हों. मुक्तिबोध ने उनकी कविताओं को बहुत पसंद भी किया. इस डॉक्यूमेंट्री में जिक्र है मुक्तिबोध विनोद कुमार शुक्ल से विशेष नेह रखते थे. यह डॉक्यूमेंट्री एक कवि को समझने की प्रक्रिया का दर्शक को भी हिस्सा बनाती चलती है. एक कवि जनमानस में कैसे लोकप्रिय हो जाता है, एक दौर में साहित्य की आंतरिक दुनिया जिस कवि को विस्मृति के हिस्से में डाल देती है कुछ समय के पश्चात हिंदी पाठक और हिंदी जन समुदाय उसे अपना प्रिय कवि बना लेता है. हिंदी लोकवृत्त की इस प्रवृत्ति पर बहुत कम बात हुई है. मगर होनी चाहिए.
मानव कौल जब भारतीय सिनेमा के प्रख्यात निर्देशक मणि कौल के बारे में करते हैं तो विनोद कुमार शुक्ल जैसे स्नेह से नम हो जाते हैं. वह मुक्तिबोध पर सतह से उठता आदमी फिल्म का निर्माण करते हैं. फिल्म की स्क्रीनिंग के समय कुछ बुद्धिजीवी लेखकों –कलाकारों ने फिल्म को लेकर अपनी असहमति दर्ज़ की. मणि कौल जैसा संवेदनशील निर्देशक जो ज्यादा खामोश रहना में ही विश्वास करता है,शुक्ल जी इस प्रकरण पर उनकी असहजता को बहुत तीव्रता से अनुभव करते हैं. अशोक वाजपयी ने तब मणि कौल का पक्ष लिया था, उन्हें अकेला जानकार. दो कलाकारों का यह बेहद आत्मीय रिश्ता रहा. विनोद जी के उपन्यास पर आधारित मणि कौल की फिल्म नौकर की कमीज़ को देखे बिना इस बात को समझना मुश्किल है..! मणि कौल और विनोद कुमार शुक्ल का रिश्ता दो कलाकारों का गहरा संवाद भी है. और इसमें रचनात्मक ऊष्मा भी है.
एक कवि–उपन्यासकार जो मानता है कि व्यक्ति पूरे जीवन एक ही किताब लिखता है. बस उसे खंडों में बांट दिया जाता है, है वह एक ही कृति. चाहे उसे उपन्यास कहिए अथवा कविता. और मणि कौल सामान्य फिल्म निर्देशकों से इन अर्थों में अलग है वह साहित्यिक कृतियों में अपनी कला और कैमरे के अर्थ तलाशते हैं किसी एक साहित्यिक कृति को कैमरे के माध्यम से फिल्म में रूपांतरित करने के लिए. वह रचनात्मकता और संघर्ष के बिल्कुल दूसरे छोर तक जाता है. रंग संयोजन, ध्वनि, और किसी भी टेक्स्ट के मूल भाव को अक्षुण्ण रखने के लिए प्रतिबद्ध. विनोद कुमार शुक्ल स्वीकार करते हैं, ‘मणि जी मेरे लिखे को बहुत पसंद करते थे. जब उनकी बीमारी की खबर पता चली मुझे विश्वास ही नहीं हुआ. मणि जी कुछ नहीं होगा आपको. आप मेरे उपन्यास पर फिल्म बनाएंगे’. होता यही है हम अपने आत्मीय स्वजन के आकस्मिक जाने को कहाँ स्वीकार कर पाते हैं? जब मणि कौल की मृत्यु और उनकी बीमारी के बारे में मानव कौल और विनोद कुमार शुक्ल बात कर रहे होते हैं तो विनोद कुमार शुक्ल के चेहरे को आप देखिए जैसे कहीं कुछ गहरा छूट गया है. जैसे आज हम सब की स्थिति है अपने प्रिय कवि के जाने पर…….!
चार फूल हैं और दुनिया है एक ऐसे कवि–उपन्यासकार के बारे में बहुत आत्मीय होकर बात करती है; जो अपने बारे में जीवन भर बात करने से बचता रहा. साहित्यिक आलोचकों ने उसके लिखे को जादुई यथार्थवाद कहा; कुछ ने फेंटेसी .मगर उसने महसूस किया उसके सामने जैसे साक्षात मुक्तिबोध खड़े हैं अपने शिल्प भाषा और लिखत में. इस डॉक्यूमेंट्री को बनाते हुए अचल मिश्र ने इस बात का ध्यान रखा है एकांत और नीरवता में निहित आंतरिक सौंदर्य बाधित न हो. किसी विषय पर बोलते हुए जब विनोद कुमार शुक्ल ठहर जाते हैं तो जैसे कैमरा भी उनके चेहरे पर लंबे समय के लिए ठहर जाता है. और इस दृश्य को उपस्थित करना और चेहरे के भावों को इतनी सघनता से दर्ज करना बिना गहरी एसथेटिक सेंस के बिना संभव नहीं है. कई बार मानव कौल इस बातचीत में कुछ क्षणों के लिए ठहरे हैं. और वहाँ कैमरा भी ठहर गया है. मुझे विनोद कुमार शुक्ल का वह वाक्य और उससे प्रकट होती तकलीफ़ ’सब कुछ भूल गया हूँ और जीवन ऊबड़–खाबड़ हो गया है’, स्मृति से जाती नहीं. चेहरे पर उम्र और तकलीफ से लड़ते हुए थोड़ा-थोड़ा हताशा का भाव. इसको कैप्चर करना आसान नहीं रहा होगा. मगर कुछ चीजें संभव हो जाती हैं जैसे यह बातचीत.
उम्र के एक पड़ाव पर जाकर चीजों को देखने का लहजा और रेत की तरह वक्त के फिसलने को अनुभव करने की प्रक्रिया जटिल और उदास करने वाली है. एक उम्र के बाद ऐसा लगता है जैसे सब कुछ छूट रहा है. उस छूटने को यह को समझने के लिए उस समय में लौटना पड़ता है और जिए समय का निरीक्षण भी करना पड़ता है. चीजों को हमें छोड़ना तो है ही मगर छोड़ने से ज्यादा जरूरी है अच्छे छोड़ने से. हम एक समय के बाद क्या छोड़ कर जा रहे हैं. जिंदगी की सारी परतों को उतार, कर निरासक्त होकर चले जाना. उनकी बातचीत में एक रूपक आता है, ‘अपने होने में मैं फोटो हो रहा हूँ’. दृश्य में फोटो उभरता है और कविता पढ़ते हुए विनोद कुमार शुक्ल. कविता पढ़ने के बाद रह जाती है खाली कुर्सी और फोटो. एक झूला जो धीमे-धीमे निरंतर गति कर रहा है. वह कविता पाठ करते हैं अपनी मन:स्थिति का–
अपने होने में
मैं फोटो हो रहा हूँ
कि किसी तरह
अपने न होने को फोटो में छोड़ जाऊं
जितने काम का फोटो होता है
उतने कम का रह गया हूँ मैं
बस फर्क इतना है
कुर्सी पर बैठ जाता हूँ
और फोटो को कुर्सी पर लाकर रख दिया जाता है
जो मेरे सामने बैठते हैं
इस तरह बैठते हैं
जैसे मेरी फोटो के सामने कल के भविष्य में बैठे हैं
मैं कहीं जाता नहीं
घर पर रहा आता हूँ
पर फोटो में मुझे खींच कर ले आते हैं
यह इन दिनों की बात है
इन दिनों में हूँ
एक खालीपन और निरंतर रिक्त होते चले जाने की स्थिति को बहुत सहजता से अभिव्यक्त करते हैं. दृश्य में जो खालीपन उभरता है वह हम सबका खालीपन है. और यही एक रेंज है जो हमें अचल मिश्र की और उम्मीद से देखने को विवश करती है. लेखक की आंखों में कैमरे के माध्यम से झांक लेने का हुनर.
एक रचनात्मक व्यक्ति की जीवन यात्रा जितनी बाहरी तत्वों से तय होती है, उतनी ही आंतरिक भी है. मुझे लगता है मौलिकता और भूलने पर इतने व्यापक संदर्भों में पहले कभी बात की गई हो. विनोद जी की उदारता और सहृदयता का जो तरल दरिया इस बातचीत में प्रवाहित हुआ है; वह हिंदी जनसमुदाय और इस डॉक्यूमेंट्री के दर्शक वर्ग के जेहन में हमेशा सुरक्षित रहेगा. और यह स्मरण भी हिंदी भाषा में कोई एक रचनाकार था;जो बहुप्रशंसित–राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से पुरस्कृत होने के बावजूद इतना साधारण और सरल था. घर और रिश्तों के नेह में रचा बसा. इस डॉक्यूमेंट्री में एक मध्यवर्गीय घर है, जिसमें 800 मारुति कार है और उखड़ी हुई रंगाई–और पुताई है. एक लेखक का साधारण जीवन और उसके बीच अंतर्निहित असाधारणता का औदात्य उस दृश्य की विशेषता है.
यह डॉक्यूमेंट्री उस विशेष तत्व को भी लक्षित करती है, जो विनोद कुमार शुक्ल के साथ जुड़ा रहा. वह अपने समकालीनों में सबसे अलग थे. उन्होंने केवल शब्दों में कविता नहीं कही, बल्कि वाक्य में जो विराम है और भाषा में नई बिंबो के माध्यम से जो एक असर पैदा करते हैं कविता वही हैं. और उसका सिरा उनकी जंगलों, पेड़ों और जो मनुष्य ध्यान से वंचित रहे उनको अपनी जद में लेने में है. उनके साथ अपने मन और रचनात्मकता को जुड़ा लेने में है. यह कई बार ‘चार फूल हैं और जिंदगी है’ डॉक्यूमेंट्री में मानव कौल की उनसे बातचीत में उभर कर भी आता है. बैकग्राउंड में जो संगीत है और लोगों के स्वर हैं, सब्जी बेचने वाले,घर में होती पूजा के स्वर यह सब ही तो विनोद जी का संसार है. उनके बारे में ‘था‘ कहना उदास करता है. बेशक उदासी भी उनकी कविता का एक महत्वपूर्ण स्वर है. लेकिन वह उसके पार के संसार के कवि हैं. हमारी स्मृतियों और अकथ को वाणी देने वाले रचनाकार. जिनके लिए मनुष्य और मनुष्यता विकल्प का विषय नहीं है.
घर विनोद जी के लिए संसार है. जहाँ रिश्ते नातों की ऊष्मा है. वह घर से निकलते भी हैं किसी काम से तो घर उनके अंदर से नहीं निकलता. जीवन को देखने की आंख है घर उनके लिए. महत्वपूर्ण स्पेस. पति-पत्नी के संबंध को लेकर मौलिक बात करते हैं और अद्भुत भी. पति-पत्नी का संबंध जितना दो लोगों के बीच का निजी संबंध है उतना ही परंपरागत भी. एक सहज व्यक्ति के रूप में वह कहते हैं यदि पति-पत्नी के बीच कोई मनमुटाव भी है तब भी यह ध्यान रखा जाता है कि यह बात चहारदीवारी के बाहर न जाए. और इस संबंध के वर्तमान स्वरूप में जितना मनुष्य का हाथ है उतना ही परंपरा का भी. वह बहुत नम होकर कहते हैं संसार की किसी भी स्त्री को जानने का माध्यम मेरे लिए मेरी पत्नी है. और इस डॉक्यूमेंट्री में एक सुंदर सी कविता है और मुझे लगता है इस विषय पर इस तरीके से कहा नहीं गया है पहले कभी–
हम दोनों बूढ़े हो गए
थके रहते
घुटनों में तकलीफ़ रहती
बैठने का मन करता
पर बैठ नहीं पाते
मैं बैठ जाता तो जमीन पर
तो उठ नहीं पाता
चलने –फिरने में इतने धीमें हो गए
कि
छोटा घर बड़ा लगता
हम आसपास होते
एक –दूसरे को वही ढूंढते
और वहीं मिल जाते
फिर प्यार से उसे पहले की तरह कह देता हूँ
तुम बहुत अच्छी लड़की हो
वह भी कह देती
तुम बहुत अच्छे लड़के हो
(यह कविता चार फूल है और दुनिया है डॉक्यूमेंट्री में प्रयुक्त हुई है)
शाश्वत गोपाल और विनोद कुमार शुक्ल जी की बात में कई बार गुम हो जाने की फ़िक्र है. मणि कौल के आमंत्रण पर मुंबई जाने पर कहीं गुम हो जाने की चिंता और शाश्वत गोपाल द्वारा यह कहना ‘दादा कहीं गुम न हो जाएं’. यह गुम होना एक अलग मन: स्थित है. जब कोई एक रचनात्मक व्यक्ति अपने निज संसार की निर्मित करता है तो वह दुनियादारी से धीरे-धीरे अनुपस्थित होता चला जाता है. फिर उसके लिए गली –कूचे सब अज्ञात होते चले जाते हैं और अजनबी. लेकिन विनोद कुमार शुक्ल के लिए गुम हो जाना उनकी इच्छा नहीं बल्कि एक डर है और घर से स्नेह है. वह गुम होना नहीं चाहते लौटना चाहते हैं घर हर– बार.. !एक कवि के मन मस्तिष्क को समझने के लिए भी इस डॉक्यूमेंट्री को बार-बार देखा जाना चाहिए. इस से गुजरना एक विशिष्ट अनुभव है.
इस डॉक्यूमेंट्री ने जो विनोद कुमार शुक्ल का जो परिचय हमसे कराया है वह बहुत गहरा है. अचल मिश्र एक निर्देशक और सिनेमा फोटोग्राफर के रूप में इससे जुड़े हैं. उनका नेह दिखता है..! फिल्म का धीमा संगीत और हर गहरी और ठहरे हुए अनुभव को दर्शक से साझा करना एक विशिष्ट भाव की शिद्दत को रेखांकित करता है और इसे संभव बनाया ताजदार जुनैद और रंग संयोजन महक गुप्ता ने. और जो गली –कूचे के स्वर जो आपको सुनाई देते हैं, उन्हें आकार दिया रोहनदीप सक्सेना ने. डॉक्यूमेंट्री एक महत्वपूर्ण विधा है इसके विभिन्न तत्वों पर अलग से बातचीत की जा सकती है. लेकिन चार फूल और दुनिया है यह एक लेखक से भारत के साहित्य रसिक जन को परिचित कराती है .भाषा की हदबंदी के पर जाकर भी यह इसकी विशेषता है.
स्मृति विहीनता के समय में संवाद ही स्मृतियों को बचाए रखेगा. ‘चार फूल हैं और दुनिया है’ एक मन के अथाह सागर में पहले तरंग उत्पन्न करती है और फिर गहरी स्थिरता. संवाद के बीच में गली मोहल्ले से आने वाली आवाज और चिड़ियों का स्वर जैसे इस सारी बातचीत को और सुंदर बनाता है. यह बेहतर ध्वनि संयोजन से ही संभव हुआ. यह डॉक्यूमेंट्री अचल मिश्र के अन्य काम की और भी उत्सुकता को बढ़ाती है.
विपिन शर्मामेरठनई सदी का सिनेमा, मनुष्यता का पक्ष, आजादी की उत्तरगाथा, तुम जिंदगी का नमक हो पुस्तक प्रकाशित vipinsharmaanhad82@gmail.com |

विपिन शर्मा


‘चार फूल हैं और दुनिया है’ की अब तक जितनी भी समीक्षाएँ पढ़ी हैं,उनमें से विपिन शर्मा की यह समीक्षा सबसे अच्छी लगी। मौन इस डॉक्यूमेंट्री का सबसे मुख्य हिस्सा है और उपेक्षित भी,जिसको यहाँ बेहतरीन ढंग से पेश किया गया है।
बहुत खूब लिखा है सर।
हिंदी साहित्य में किसी कृति और कृतिकार को समझने के लिए एक दृष्टि का होना अपरिहार्य हो जाता है,जो दुर्लभ व्यक्ति में देखने को मिलती है। एक ऐसी दृष्टि के अधिष्ठाता डॉ विपिन शर्मा के लेखन में देखने को मिलती है। इनके अंदर यह गवेषणात्मक अंतर्दृष्टि इनको विशेष बनाती है।कृति जो सूत्र छोड़ती चलती है जिनमें उसकी व्याख्या छुपी रहती है जो रचना को प्रासंगिक बनाती है।इन्होंने उसी मौन व्याख्या की अभिव्यक्ति प्रदान की है। ‘चार फूल हैं और दुनिया है ‘ डॉक्यूमेंट्री को लोकप्रिय बनाने में विपिन शर्मा की समीक्षा शसक्त हस्ताक्षर है।
लेखकों द्वारा लेखक पर बनी फिल्म। नवोदित लेखक और फिल्म समीक्षक द्वारा फिल्म की समीक्षा। वाह बहुत सुंदर!
डॉ विपिन शर्मा द्वारा बहुत ही सुंदर ढंग से फिल्म की समीक्षा की गई है।जो फिल्म को देखने के लिए प्रेरित करती है।