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Home » जेन ज़ी क्या पढ़ रही है? : त्रिभुवन

जेन ज़ी क्या पढ़ रही है? : त्रिभुवन

जेन ज़ी (जनरेशन Z) उन युवाओं के समूह को कहा जाता है जिनका जन्म लगभग 1997 से 2012 के बीच हुआ है. ये इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के साथ बड़े हुए हैं; इसलिए इन्हें तकनीकी दुनिया का स्वाभाविक निवासी माना जाता है. यह पीढ़ी तेजी से बदलते डिजिटल माहौल के साथ सहजता से स्वयं को ढाल लेती है. जेन ज़ी ने कई देशों की राजनीति को प्रभावित किया है और अब उसका प्रभाव और अधिक मुखर होता जा रहा है. वरिष्ठ पत्रकार-लेखक त्रिभुवन ने जेन ज़ी की पठन-रुचियों पर शोध और सर्वे के आधार पर यह विशेष आलेख तैयार किया है. ‘जेन ज़ी क्या पढ़ रही है?’ विषय पर इतना सुव्यवस्थित और सुदीर्घ आलेख शायद ही आपकी नज़र से गुज़रा हो. समालोचन की ओर से नव वर्ष की अग्रिम शुभकामनाएँ. आलेख प्रस्तुत है.

by arun dev
December 30, 2025
in आलेख
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जेन ज़ी क्या पढ़ रही है? : त्रिभुवन
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जेन ज़ी क्या पढ़ रही है?
त्रिभुवन

 

समय की नदी में डबडब तैरते अँधेरों और पूर्वग्रहों में डूबे बूढ़े नई उम्र के उफान को “अति”, “भटकाव”, “अव्यवहारिकता” और “कुछ नहीं पढ़ते-लिखते” कहकर काल के खोखले विवर में फेंक देना चाहते हैं; लेकिन बूढ़ों की बनाई कुराहों और दु:स्वप्नों से अच्छादित विनाश लीलाओं के बीच चक्रव्यूहों को तोड़कर वही युवा छोटे-छोटे उजालों के सहारे आगे बढ़कर आशाओं की नई आकाशगंगाएँ रचते हैं.

 

1.

युवा कोई अवस्था नहीं, उफनती ऊर्जा और आकुल ऊष्मा है. अर्थ अभी तय नहीं, केवल लय है, प्रश्न हैं और एक निहत्थी अधीरता. आज की बुज़ुर्ग बुद्धि कूढ़मग़ज़ नहीं, पर थकी हुई है; लेकिन बीते कल में वह भी इसी रूप में थी और जाने कैसी-कैसी निराशाओं-दुराशाओं और दुर्निवार विधाओं-विवशताओं को पार करके यहाँ तक पहुँची है. वह उत्तरों में नहीं रही, उसने प्रश्नों में साँस ली और एक वर्तमान गढ़ा. जाने कितनी अजनबी भाषाओं में लिखी किताबों को लेकर आए. जिन्हें अभी पढ़ा नहीं जा सकता था, केवल सुना या देखा जा सकता था; लेकिन उस पीढ़ी ने उन्हें इस तरह ला दिया कि उन्हें जिया जा सकता है. पीढ़ी जो प्रश्नों के प्रहार झेलती-जीती है, वही नया विचार लेकर आती है और अगली भाषा लिखती है.

 

2.

किताब में एक आब है. लेकिन प्रख्यात कवि परवीन शाकिर कहती हैं,

ऐ मिरी गुल-ज़मीं तुझे चाह थी इक किताब की
अहल-ए-किताब ने मगर क्या तिरा हाल कर दिया.

ऐ मेरी फूलों-सी सरज़मीन वतन, पुष्पोद्यान जैसे देश, ओ मेरी शस्य श्यामला धरती तू तो बस “इल्म–किताब–सभ्यता” चाहती थी; लेकिन “किताब वालों” ने उसी के नाम पर तेरी क्या दुर्दशा कर दी है.

लेकिन यह कौनसी पीढ़ी है? क्या यह किसी युवा या किसी जेन-ज़ी ने किया? नहीं. लेकिन ये भी एक समय के युवा थे; जिन्हें बेबी-बूमर जनरेशन कहा गया था. ख़ासकर जो 1946-1964 के बीच पैदा हुए, जिनके हाथ में आज देश, साहित्य, संस्कृति, समाज, पर्यावरण आदि की शासन-व्यवस्था है. स्वतंत्रता के बाद का दौर, सरकारी नौकरियाँ, स्थायित्व, संस्थानों पर भरोसा आदि इस पीढ़ी की पहचान रही है. दरअसल, भारत में पीढ़ियों का अनुभव पश्चिमी देशों से अलग रहा है.

हमारे देश में पढ़ने की आदत को 1991 के आर्थिक उदारीकरण ने बहुत प्रभावित किया है. किसी समय अधीनताओं को तुच्छता समझा जा रहा था और सोशल मीडिया से आसन्न पूर्व की मोबाइल क्रांति ने पीढ़ियों के फ़र्क़ को पैना बनाना शुरू किया और सोशल मीडिया ने उसे प्रभावी बना हुए पूरी की पूरी एक पीढ़ी के लिए तुच्छताओं की अधीनता को सहज स्वीकार्य बना दिया.

 

3.

युवा के प्रति वितृष्णा का भाव इसलिए होता है, क्योंकि वह संभावनाशीलता उफनता नद होता है. और संभावना हमेशा डराती है; क्योंकि उसे दिशा नहीं, पूरा आकाश चाहिए. इसलिए कभी माखनलाल चतुर्वेदी ने कहा था, “लाल चेहरा है नहीं फिर लाल किसके? लाल खून नहीं, अरे कंकाल किसके?”

हर युग अपने युवाओं को उदास और उपद्रवी समझता है. लेकिन उपद्रवी कल कविता, संगीत, विचार और सौंदर्य का शांत पूर्वज बन जाता है. अति, जिससे आज डर लगता है, कल का बौद्धिक विवेक बनती है. सच्चे युवा के सभी प्रेम, भले वे किताबों से हों, वस्त्रों से हों, संगीत से हों या जीने के तौरतरीकों से हों, लगभग हास्यास्पद से प्रेम ही से जन्मते हैं. उसका प्रेम बहुत बाल सुलभ और निष्पाप हृदय से होता है. चाहे वह मनुष्य से हो, भाषा से हो, भविष्य से हो या पशु-पक्षियों या जीवन से. और यह प्रेम सबसे पहले युवाओं की बेचैनी में दिखाई देता है. युवा हमारे समय के छंद या व्याकरण नहीं, फ्री-वर्स होते हैं. उन्मुक्त. उनका पढ़ना भी वैसा ही है.

 

४.

यह 2017 या 2018 की बात है. अख़बार में इंटर्नशिप के लिए पत्रकारिता की एक छात्रा का मैसेज आता है. सामान्य-सा औपचारिक अनुरोध, “सर, मैं आपके अख़बार में इंटर्नशिप करना चाहती हूँ….”
मैं आदतन पूछता हूँ, “कुछ पढ़ा है?”

मेरे मस्तक पर वही जर्जर पूर्वग्रह बैठा है, जो आजकल हर दूसरे कथित वरिष्ठ के बिना सींग वाली कटूक्तियों पर सवार रहता है. “अरे, आजकल के लड़के–लड़कियाँ क्या पढ़ते होंगे? इन्हें तो बस सोशल मीडिया आता है! किताबों का इनसे क्या लेना-देना!”

वह बताती हैं,

“मैंने विनोद कुमार शुक्ल, निर्मल वर्मा, मानव कौल आदि पूरे पढ़ रखे हैं. और…व्लादिमिर नाबोकोव.” मैं थोड़ा अविश्वास से, थोड़ा आदतवश परीक्षा की मुद्रा में प्रतिप्रश्न करता हूँ: “किसका क्या पढ़ा है? ज़रा बताइए तो.”

और फिर जो होता है, वह मेरे भीतर के पूर्वग्रह को धीरे-धीरे तोड़ना-भुरभुराना शुरू कर देता है. वह विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यासों और कहानियों की बारीकियाँ खोलने लगती हैं. उनके वाक्यों की धीमी रौशनी, साधारण आदमी की असाधारण उपस्थिति, “खिलने” और “देखने” के छोटे-छोटे क्षण. हर लफ़्ज़ और हर लम्हे का अपना विवरण.

वह निर्मल वर्मा के यहाँ अकेलेपन, यात्रा, स्मृति और दुःख के सौंदर्य की बात करती हैं, जो उनकी उम्र से बहुत परे की बात थी. मानव कौल के नाटकों–कहानियों में शहर, रिश्ते और अधूरापन कैसे एक ख़ास किस्म की बेचैनी पैदा करते हैं, वह इसे अपनी भाषा में, बिना किसी “कोट” के, बहुत स्वाभाविक ढंग से रखती हैं.

मैं पूछता हूँ, इतने पढ़े में कोई सबसे प्रिय वाक्य याद हो तो लिखें.

“हिन्दी में कि इंग्लिश में?”

मैं कहता हूँ, इंग्लिश; लेकिन देवनागरी लिपि में.

वह बहुत सुंदर अक्षरों में लिखती हैं :

“लोलिता, लाइट ऑफ़ माई लाइफ़, फ़ायर ऑफ़ माई लोइन्स. माई सिन, माई सोल. लो-ली-टा: द टिप ऑफ़ द टंग टेकिंग अ ट्रिप ऑफ़ थ्री स्टेप्स डाउन द पैलेट टू टैप, ऐट थ्री, ऑन द टीथ. लो. ली. टा.

शी वाज़ लो, प्लेन लो, इन द मॉर्निंग, स्टैंडिंग फ़ोर फ़ीट टेन इन वन सॉक. शी वाज़ लोला इन स्लैक्स. शी वाज़ डॉली ऐट स्कूल. शी वाज़ डोलोरेस ऑन द डॉटेड लाइन. बट इन माई आर्म्स शी वाज़ ऑलवेज़ लोलिता.”

 

५.

यह पत्रकारिता विश्वविद्यालय की एक क्लास है. कक्षा में उस दिन के प्रमुख अख़बार सामने हैं. चर्चा चल रही है. उसी दिन एक बड़े हिन्दी अख़बार में प्रथम पृष्ठ पर एक “गंभीर और गहरे रिसर्च” के दावे वाली प्रमुख ख़बर छपी है. स्टोरी का निष्कर्ष बहुत साफ़ और सुविधाजनक है: सस्ते इंटरनेट कनेक्शन और स्मार्टफोन पर पोर्न देखने की सुविधा और इसीलिए छोटी बच्चियों से बलात्कार बढ़ रहे हैं. ख़बर के साथ बॉक्स है, अख़बार ने “पॉर्न साइट्स पर रोक लगाने के लिए अभियान” शुरू करने की घोषणा की है. अर्थात् समस्या भी हमने खोज ली, समाधान भी हम ही देंगे.

कक्षा में जब प्रमुख ख़बरों पर चर्चा शुरू होती है तो पोर्न, रेप, वल्गैरिटी वाली इस ख़बर को छोड़ देना बेहतर समझा जाता है. लेकिन एक स्टूडेंट अख़बार हाथ में लेकर ख़बर पढ़ती है. कक्षा में आम तौर पर ख़याल था कि सब ही कहेंगे: “हाँ, बिल्कुल सही बात है… सचमुच पोर्न ही बिगाड़ रहा है सब….” कुछ छात्रों ने यह आभास दिया भी. लेकिन वह लड़की अख़बार की उस स्टोरी को पढ़कर सिरे से ख़ारिज कर देती है.

वह लगभग ग़ुस्से में कहती है:

“ये झूठी और बकवास ख़बर है. पोर्न तो हम लड़कियाँ भी देखती हैं तो फिर हम बलात्कार क्यों नहीं करतीं?”

कक्षा कुछ क्षण के लिए सन्न रह जाती है. हर समय विह्वल-सी रहने वाली सिर्फ़ सतरह साल की वह छात्रा बताती है कि उसने सिमोन द बोवा को “पूरा” पढ़ा है.

“मैंने सीमोन वेल, हान्ना आरेंट, जूलिया क्रिस्तेवा, ल्यूस इरिगारे और एलेन सिक्सू भी पढ़ रखा है.”

उसके तर्कों में केवल गुस्सा नहीं, लैंगिक राजनीति, सत्ता सम्बन्धों और “स्त्री-शरीर के वस्तुकरण” पर पढ़ी हुई गहरी बातें शामिल हैं. वह कहती है कि अख़बार समस्या को इतना “हल्का” बना देते हैं कि असली ज़िम्मेदारियों से ध्यान हट जाए.

किन ज़िम्मेदारियों से? जवाब आता है : पितृसत्ता, सत्ता–संरक्षण, पुलिस और न्याय व्यवस्था की विफलता और परिवार और समाज के भीतर की हिंसा, जिसने संस्कृति, परंपरा और रस्मोरिवाज़ का सम्मोहक पवित्र रूप ले लिया है. इन सब पर बात करने की जगह सारा दोष एक क्लिक और कुछ पॉर्न वैबबसाइट पर डाल देना आसान है. इस बार अवाक् होने की बारी फिर मेरी थी. मैं जिसने अख़बार को “सत्य का पहला मसौदा” मानकर दशकों काम किया, अचानक देखता हूँ कि मेरी ही क्लास में बैठी जेन-ज़ी की एक छात्रा सिमोन द बोवा ही नहीं, सीमोन वेल, हान्ना आरेंट, जूलिया क्रिस्तेवा, ल्यूस इरिगारे और एलेन सिक्सू के सहारे भी अख़बार के “सत्य” को चुनौती दे रही है.

 

6.

हम कुछ मित्र ग्रेजुएशन कर रहे कुछ तरुणों के साथ एक जगह चाय पी रहे हैं. मैं उन्हें हिन्दी के शीर्षस्थ कवियों के बारे में बता रहा हूँ. डीयू के थर्ड ईयर का वह छात्र प्रश्न करता है :

“आपने कुमार अंबुज को पढ़ा है? उनकी कविता ‘क्रूरता’ में मानवीय संवेदना कितनी गहरी है?”

वह मुझे यू ट्यूब का एक विडियो दिखाता है, जो रामगोपाल बजाज की प्रस्तुति था. मैं थोड़ी देर तो सिर्फ़ उसे देखता रहा. आधुनिक दिखने वाला, जीन्स–टी-शर्ट, मोबाइल हाथ में, पूरी तरह “आज का लड़का”. वह आगे कहता है,

“केदारनाथ सिंह ज़्यादा पॉपुलर हैं; लेकिन केदारनाथ अग्रवाल की कविता ज़्यादा गहरी और वैराइटी वाली नहीं है?”
अब वह मुक्तिबोध के “अँधेरे में” पर आता है.

मैं पूछता भी नहीं, वह ख़ुद ही सामने बैठकर जैसे अपनी निजी कविता–कॉन्फ़्रेंस शुरू कर देता है. कुमार अंबुज की कुछ पंक्तियाँ याद से सुनाता है; फिर केदारनाथ सिंह के बर्फ़, गेहूं, हाथ, दाने, पेड़ और भाषा वाले छोटे–छोटे चमत्कारों की बात करता है; और साथ ही केदारनाथ अग्रवाल के श्रम, नदी और प्रेम के ठेठ, रॉबस्ट संसार की.

उसके बाद कुंवर नारायण, ज्ञानेंद्रपति, श्रीकांत वर्मा और शमशेर बहादुर सिंह— वह एक–एक नाम पर रुककर उनकी कविताओं के उदाहरण देने लगता है. कुंवर नारायण की “अयोध्या” से लेकर श्रीकांत वर्मा के “मगध” तक, शमशेर की “बात बोलेगी” से लेकर ज्ञानेंद्रपति की कठिन; लेकिन चमकती हुई पंक्तियों तक. मैं इस लड़के को कब से जानता था; लेकिन इसका यह स्वरूप मेरे सामने नया था.

मैं महसूस करता हूँ कि यह लड़का सिर्फ़ नाम नहीं गिना रहा, पढ़ी हुई कविताओं की अपनी निजी नक़्क़ाशी भी कर रहा है. दूसरे कोने पर बैठी लड़की अचानक बातचीत में शामिल होती है. वह पूछती है,

“आपने ओरहन पॉमुक को पढ़ा है? “माई नेम इज़ रेड” में जो “गिल्ट” और “डेज़ायर” है, वो मिलान कुंदेरा के “दॅ अनबियरेबल लाइटनेस ऑव बीइंग” से बिलकुल अलग है.”

फिर वह माइकेल ऑन्दात्ज़े की “दॅ इंग्लिश पेशेंट” की टूटी हुई स्मृतियों और प्रेम की दास्तान.

 

7.

यह सब कोई सेमिनार नहीं, कभी किसी ऑफ़िस, कभी किसी कैफ़े या घर के ड्राइंग रूम में चलती आम-सी बातचीत है; पर यह बातचीत बता रही है कि “आज के लड़के–लड़कियाँ” हमारी अपेक्षाओं से बहुत ज़्यादा पढ़ और सोच रहे हैं. एक तरफ़ वह छात्रा है, जो विनोद कुमार शुक्ल, निर्मल वर्मा और मानव कौल के टेक्स्ट को टिकटॉक-इंस्टाग्राम वाली उम्र में भी अपनी आँखों में अध्ययन का अथाह वैभव सहेजे हैं. और दूसरी तरफ़ वह लड़की है जो पोर्न और बलात्कार पर अख़बार के नैतिकतावादी निष्कर्ष को काटने के लिए सिमोन द बोवा और उन जैसी अन्य लेखकों-विचारकों को अपना हथियार बनाती है और अख़बारों की अंधी अतल ऊंचाइयों से खामख़याली धारणाओं को रूई की तरह उड़ा देती हैं.

 

8.

यह सीमोन के पढ़ने का ही प्रभाव था कि जर्नलिज्म के ग्रेजुएशन की एक स्टूडेंट एक स्टोरी ट्रांस्जेंडर के लिए वॉशरूम न होने के बारे में तैयार करती है, जबकि इस संवेदनशील सोच का कोई भावनात्मक टुकड़ा हमें किसी अख़बार में शायद ही कभी दिखता हो. सीमोन का पढ़ना लैंगिक राजनीति, सत्ता-संबंधों और “स्त्री-शरीर के वस्तुकरण” पर पढ़ी हुई गहरी बातों की गाँठों को खोलना है.

ये बातें वाक़ई अवाक् करती हैं और इस बात का साबुत सबूत हैं कि नई हवा हमारे दिलो-दिमाग़ और सोच-विचार के पुराने किवाड़ों पर तड़ातड़ थप्पड़ जड़ रही हैं. नई पीढ़ी के हृदय के आंगन में एक नई धूप है और पुरानी पीढ़ी दीवारों की तरह उस बहस को सुन रही है, जो हवा और दरवाज़े के बीच हो रही है, जिसका एक ख़ूबसूरत रूपक कभी कुंअर नारायण ने बुना था.

इन घटनाओं की स्मृतियां मुझे समय सरिता के किनारों पर अठखेलियाँ करती पुरवाई की तरह लगती हैं. लेकिन इन्हीं के भीतर से यह सवाल उठता है कि आख़िर हम किस “युवा पीढ़ी” की बात कर रहे हैं?

एक तरफ़ वह लड़का है, जो कुमार अंबुज, केदारनाथ सिंह, केदारनाथ अग्रवाल, कुंवर नारायण, ज्ञानेंद्रपति, श्रीकांत वर्मा और शमशेर की कविताओं को अपने समय की भाषा में समझता–उलटता है; दूसरी तरफ़ वह लड़की है जो ओरहान पामुक, मिलान कुंदेरा, लोलीटा और माइकल ओन्डात्जे की दुनिया को अपनी निजी रीडिंग बायोग्राफ़ी का हिस्सा मानती है; तीसरी तरफ़ इंटर्नशिप वाली छात्रा है, जो विनोद कुमार शुक्ल, निर्मल वर्मा और मानव कौल को “पूरा पढ़ रखा है” कहकर डिस्कशन शुरू करती है और जिसने व्लादिमिर नाबोकोव की वे लाइनें आत्मसात कर रखी हैं और चौथी तरफ़ वह विश्वविद्यालय वाली लड़की है, जो पॉर्न और बलात्कार पर अख़बार के नैतिकतावादी निष्कर्ष को काटने के लिए सीमोन द बोवा को अपना हथियार बनाती है.

 

९.

क्या यह वही जेन ज़ी है, जिसे हम हर समय “रील देखने वाली, सतही, न पढ़ने वाली” पीढ़ी घोषित करते रहते हैं? या तस्वीर इससे कहीं ज़्यादा जटिल है, जहाँ इंस्टाग्राम, रील्स, मीम्स और नोटिफ़िकेशन्स के बीच कहीं चुपचाप कुमार अंबुज, केदारनाथ अग्रवाल, कुंवर नारायण, विनोद कुमार शुक्ल, सीमोन द बोवा, सिल्विया प्लाथ, हान कांग, मारकेज़, मुराकामी, राहुल सांकृत्यायन और क्लैरिस लिस्पेक्टर भी पढ़े जा रहे हैं?

 

१०.

आजकल अख़बार, टीवी चैनल, यूट्यूब चैनल आदि साहित्य की तरफ पीठ फेरे; लेकिन स्मार्ट और तेजतर्रार लोगों से संचालित हैं. अभी 18 दिसंबर, 2025 को जब अमेरिका में हाउस ओवर साइट कमेटी ने जेफ़्री एप्स्टीन एस्टेट से जुड़ी तस्वीरों का “फ़ोटो डंप” जारी किया तो युवतियों की देह के कुछ हिस्सों पर नाबोकोव के “लोलिता” की पंक्तियाँ लिखी हुई दिखीं (जैसे “लो-ली-टा…”, “शी वॉज़ डोलोरस ऑन दॅ डोटिड लाइन…”); लेकिन हमारे अख़बारों में 1955 के उस विश्वप्रसिद्ध उपन्यास की इन प्रारंभिक पंक्तियों की कोई चर्चा नहीं हुई, जिसके पहले ही पन्ने की ये थीं. लेकिन पुरानी पीढ़ी के वरिष्ठतम संपादकों की निगाह से ये पंक्तियाँ छूट गईं; लेकिन यह सच है कि उस न्यूज़रूम में मौजूद एक जेन ज़ी पत्रकार को उस बारे में काफी बेहतरीन जानकारी थी.

जेफ़्री एप्स्टीन प्रकरण में कोर्ट रिकॉर्ड में दर्ज़ यह उद्धरण हिंसा, स्त्री-वस्तुकरण और “सुंदर गद्य” के सहारे अपराध को सौंदर्यबोध देने की प्रवृत्ति को दिखाता है. भाषा की मोहकता और नैतिक विकृति वाला यह प्रसंग प्रश्न पैदा करता है कि क्या आरोपी साहित्यिक शैली का सहारा लेकर अपराध को रोमैंटिसाइज कर रहा था? या फिर यह उद्धरण गूमिंग या ऑब्सेशन और नैरेटिव-मैनिपुलेशन का संकेत है? यह उस दिन के अख़बार के लिए एक अलग और बेहतरीन स्टोरी का आधार था.

अलबत्ता, अमेरिका में अभियोजन और मीडिया में यह बात अवश्य उभरी कि नाबोकोव की उस चेतावनी को याद किया जाए, जिसमें उन्होंने कहा था कि सुंदर गद्य पर भरोसा मत करो; वही अक्सर अविश्वसनीय खलनायकीय कथावाचक का औज़ार होता है. दैनिक अख़बारों के पहले पन्नों पर कोई सप्ताह भर छाई रही एप्स्टीन एस्टेट की ख़बरों में इन पंक्तियों की व्यापक चर्चा इसलिए हुई; क्योंकि उन्होंने भाषा की चमक बनाम नैतिक सच्चाई के टकराव को फिर सामने रख दिया और माना कि कला की शैली कैसे कभी-कभी अपराध को ढँकने या भ्रम पैदा करने के लिए इस्तेमाल की जाती है.

यह उपन्यास बहुत से युवा आजकल पढ़ते देखते गए हैं और इसीलिए जब हम ताज़ा एप्स्टीन प्रकरण को देखते हैं तो लोलिता का केंद्रीय विषय नाबालिग लड़की के प्रति वयस्क पुरुष की आसक्ति और शोषण आज के उस माहौल को प्रतिध्वनित करता है, जिसमें यौन शोषण और बालिकाओं की तस्करी संबंधी विकृतियों का एक व्यापक उफान दिखता है. इसलिए जब ऐसी पंक्तियाँ तस्वीरों में शरीर पर लिखी दिखीं, तो लोगों ने इसे एप्स्टीन के नेटवर्क की मानसिकता और फेटिशाइज़ेशन के “कच्चे संकेत” की तरह पढ़ा. मेरे ख़याल से यह एक ऐसी पंक्ति थी, जिसकी विह्वल बाँहें सहसा अख़बार के पहले पन्ने के गले से लिपट जाने को आतुर थीं और वे एंकर स्टोरी बनकर ही संतुष्ट होती.

“लोलिता ” ख़ुद व्यावहारिक तौर पर अपराध या अपमान का प्रचार नहीं है, एक करीबी विकृत चेतना की कहानी है, जिसे नाबोकोव ने बड़ी ही सावधानी के छबील कुंज में बैठकर लिखा था, न कि ग्लैमराइज किया था. क्या इस उपन्यास से जुड़े प्रश्न हमें “धुरंधर” से उठते सवालों नहीं जोड़ते, जिसके लिए जेन ज़ी की भीड़ लगी है.

फ़िल्म ही नहीं, अगर हम हिन्दी साहित्य के इस नए रीडिंग रूम से लेकर अंगरेज़ी शेल्फ़ों, उर्दू के कोनों और अन्य भारतीय भाषाओं के छोटे–छोटे द्वीपों तक झाँकेंगे तो पाएंगे कि आज का युवा पाठक किताब, स्क्रीन और अपनी बेचैनियों को साथ लेकर बैठा है. यही कारण है कि मशहूर कवि दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल “तू किसी रेल-सी गुजरती है, मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ” का एक हिस्सा ‘मसान’ फ़िल्म में एक गहरे रूपक के तौर पर इस्तेमाल होता है तो उसे यह पीढ़ी चित्त में बसा लेती है.

 

११.

साठ के दशक वाली पीढ़ी जीवन की जिस टूटी कठपुलिया से गुजर रही थी, उसमें किताबें आज़ादी, जयप्रकाश, लोहिया, मार्क्सवाद और क्रांतिगीतों से प्रेरित थीं. वह पीढ़ी किसी प्यासे चीते की तरह उम्मीदों के झरने में पाँव रखे बैठी थी और बेरोज़गारी जैसे कितने ही सवालों से जूझ रही थी. उस पीढ़ी का रीडिंग रूम बहुत ही अलग था. उसमें अपूर्ण दिनों और अधूरे सपनों के खंडित रूपों का ढेर था. लेकिन आज की जेन ज़ी के ज़ेहन में या उसकी ‘हिन्दी के रीडिंग रूम में क्या चल रहा है? अंगरेज़ी में जेन ज़ी कौन-सा साहित्य चुन रही है? उर्दू किस तरह नए माध्यमों से लौट रही है? और भारतीय भाषाओं का युवा पाठक अपने-अपने कोनों में क्या–क्या छुपाकर पढ़ रहा है? वैश्विक परिदृश्य क्या है? फिलहाल इतना तय है कि जेन ज़ी को “न पढ़ने वाली पीढ़ी” मान लेना हमारे समय की सबसे बड़ी भूल है.

आज की पीढ़ी किताबों के पन्ने खोलने से पहले अपने सेलफ़ोन के स्क्रीन खोलती है. उसके “रीडिंग रूम” में दीवारें काग़ज़ की नहीं, स्क्रीन की हैं; मेज़ पर कलम की जगह कीबोर्ड, कॉमेंट सेक्शन और स्क्रॉल-बार रखा है. इस रीडिंग रूम का नाम है – जेन ज़ी.

 

१२.

जेन ज़ी यानी 1997 के बाद जन्मे जो किशोर–युवा अब 20–27 की उम्र में हैं. इन्हीं को दुनिया जेन ज़ी कहती है. इनके लिए लैंडलाइन, ट्रंक-कॉल, टाइपराइटर, रेडियो, रिस्ट वॉच आदि चीज़ें नॉस्टेलजिया हैं.और वाईफाई, स्मार्ट फोन, लैपटॉप, कंप्यूटर, टैब, यूट्यूब, इंस्टा, चैटजीपीटी, ग्रोक आदि नैसर्गिक रूप से प्राप्त हैं. आज इनका रीडिंग रूम सिर्फ़ लाइब्रेरी के शांत कमरे में नहीं, मेट्रो की सीटें, हॉस्टल के बेड पर, कोचिंग की लाइनें, एयरपोर्ट के लाउंज, प्लेन की सीटें, ट्रेन या दिन में लंबी दूरियों को तय करती कैब भी हैं. और सबसे ज़्यादा स्मार्टफ़ोन का वह स्क्रीन, जो 6 इंच के शीशे पर फैला है.

जेन ज़ी वही पीढ़ी है, जिसने वाई-फ़ाई को ऑक्सीज़न की तरह लेते हुए होश संभाला. जिसकी आँख खुलते ही दुनिया का सबसे हिंसक, अस्थिर और शोरगुल से भरा संस्करण सामने था— नौ-ग्यारह, मंदी, जलवायु संकट, आतंक, और सोशल मीडिया की भीड़-हिंसा—सब कुछ एक ही न्यूज़फ़ीड में. और जिसे हर दूसरे दिन यह सुनना पड़ा कि “तुम लोग बहुत नाज़ुक हो,” और अगले ही दिन वही आवाज़ कहती है—“तुम ही भविष्य हो, दुनिया बचाओ.”

उसके लिए लैंडलाइन, ब्लैक-एंड-व्हाइट टीवी और ट्रंक कॉल किसी पीरियड ड्रामा के दृश्य हैं. डायल-अप इंटरनेट और ऑरकुट—बड़े भाई-बहनों की उदास मुस्कान वाली यादें. उसकी अपनी स्मृति वहीं से शुरू होती है, जहाँ स्क्रीन स्थायी हो गया—यूट्यूब, एंड्रॉयड, फ़ेसबुक और इंस्टाग्राम; फिर टिक-टॉक और रील्स; और उनके साथ व्हाट्सऐप ग्रुप्स, गूगल क्लासरूम, ऑनलाइन परीक्षाएँ और ज़ूम स्कूल.

युवा पीढ़ी जो कुछ भी करती है, उस पर तुरंत कोई ठप्पा चिपक जाता है— आलसी, भटका हुआ, वोक, कन्फ़्यूज़्ड. लेकिन भीतर से वह ख़ुद को ऐसे देखती है: बहुत बेचैन, बहुत सजग, बहुत थकी हुई; और फिर भी कुछ नया रचने को बेचैन. जैसे दुनिया ने उसे एक साथ बहुत ज़्यादा दिखा दिया हो और उसी अति-दर्शन से उसने सीख लिया हो कि आँखें बंद करना विकल्प नहीं है. थकान के नीचे भी एक कुतूहल है—कुछ बदलने का, कुछ कहने का, कुछ अपना बनाने का.

यह वही पीढ़ी है, जो हैरी पॉटर पढ़कर बड़ी हुई है; लेकिन “एकोटार”, “फोर्थ विंग”, “कॉलीन हूवर”, “बुक टॉक रिकमंडेशंस” जैसे शब्द भी ऐसे बोलती है, जैसे हम “प्रेमचन्द का गोदान”, “सुभद्राकुमारी चौहान की रानी लक्ष्मीबाई”, “निराला की कुकुरमुत्ता”, “गोर्की की माँ”, “मुक्तिबोध की चाँद का मुँह टेढ़ा था”, “फणीश्वरनाथ रेणु का मैला आंचल”, “मंटों की टोबा टेकसिंह” या “इस्मत चुगताई की लिहाफ़” बोलते थे.

 

13.

जेन ज़ी पढ़ती क्या है? किताब, कॉमिक, वेबटून, थ्रेड या ये सब? हमें पहले यह मानना पड़ेगा कि “रीडिंग” अब सिर्फ़ मुद्रित किताब” का सच नहीं है. किताब सस्वर भी हो जाती है और चित्रात्मक भी. वह आरोह-अवरोह भी होती है और किसी दूसरे फॉर्मेट में लयात्मक भी. जेन ज़ी के लिए रीडिंग या पढ़ने के बहुत सारे रूप हैं. उनके लिए अब पुरानी किताबों की गंध भी नॉस्टेल्जिया है.

यह पीढ़ी रोमैंस या रोमैंटेसी भी पढ़ती है. इंग्लिश में कोलीन हूवर, सराह जे. मास, रेबेका यैरोज तो हिन्दी में निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल, गुनाहों का देवता, कसप, प्रेमचन्द, मानव कौल और कभी-कभी कुछ-कुछ चेतन–टाइप पॉप फ़िक्शन साथ-साथ. यह पीढ़ी सेल्फ़हेल्प, हैबिट या प्रोडक्टिविटी की किताबें भी पढ़ रही है; जैसे एटोमिक हैबिट, सटल आर्ट, सेपियंस, 48 लॉज…. यह पीढ़ी मेंटल हेल्थ से जुड़ी किताबें भी पढ़ती है तो सैड गर्ल-हॉट गर्ल लिट, हॉट गर्ल लिट, आइडेंटिटी, सेक्सुअल्टी आदि पर भी. कुछ युवा बताते हैं कि उनके लिए कॉमिक्स, मांगा, वेबटून्स का भी महत्त्व है.

जापान–कोरिया के मांगा-वैबटॅन फॉर्म ने पूरी दुनिया के टीन-यूथ को ये सिखाया है कि कहानी सिर्फ़ अक्षरों से ही नहीं, पैनल, चित्र और साउंड इफ़ेक्ट की कल्पना से भी पढ़ी जाती है. कुछ युवाओं में वैबनॉवेल और ऑनलाइन अफ़साने लोकप्रिय हैं तो कुछ में चीन के वैबनॉवेल प्लेटफ़ॉर्म, कोरियाई वैब्टून-नॉवेल साइट्स, वाटपैड, फैन-फिक्शन पोर्ट्ल्स. यहाँ हर हफ़्ते चैप्टर ड्रॉप होता है, रीडर्स लाइव फीडबैक देते हैं और कहानी उनके साथ इवॉल्व होती हुई ठठाकर खिलखिलाने लगती है.

जेन ज़ी की रीडिंग लिस्ट की शैली दिनोदिन बदल रही है और नए-नए रूपाकार ले रही है. इस पर एआई का नया प्रभाव सामने आ रहा है. यह रीडिंग लिस्ट अछोर से चहल-पहल करती हुई इच्छा तरंगों की लयात्मकता में ढलती है. कॉमिक्स, रोमांस, फैंटेसी और सेल्फ़ हेल्प वाली लिस्ट को थोड़ा खोलें तो आजकल कॉमिक्स और ग्राफिक नॉवेल स्टोरी टेलिंग के लिए नैसर्गिक माध्यम है. अब यह सिर्फ़ बाल साहित्य नहीं रहा; अब ग्रैफ़िक मेमोयर, पॉलिटिकल कॉमिक्स और मेंटल हेल्थ कॉमिक्स मिलकर एक सीरियस रीडिंग का हिस्सा बनते हैं.

फिक्शन में आज जो सबसे तेज़ धड़क रहा है, वह है रोमांस और फ़ैंटेसी का संगम. यह महज़ पलायन नहीं, एक कोमल उपचार है. लोग उन दुनियाओं की ओर लौटते हैं, जहाँ प्रेम अब भी संभव है, जहाँ जादू टूटे यथार्थ पर मरहम रखता है, जहाँ “चुना हुआ” होना भाग्य नहीं, घावों से उबरने की यात्रा है. यह फिक्शन डर से नहीं, थकान से जन्मा सपना है, जिसमें कहानी थोड़ी देर के लिए जीने की वजह बन जाती है. यह आ रही पीढ़ी के साथ लय-विलय भी है और पुरानी पीढ़ी के साथ जीवन-राग को न टूटने देने की धुन भी. ठीक पांचवें या छठे दशक की पीढ़ियों के अल्हड़ विद्रोही तेवरों के प्रतिकूल.

जेन ज़ी का रीडिंग रूम किसी एक शेल्फ़, किसी एक फ़ॉर्मैट या किसी एक आदत में बंद नहीं है. वह ट्विटर या एक्स के थ्रेड्स से इंस्टा स्लाइड्स तक, सबस्टैक न्यूज़लेटर्स से मीडियम एस्सेज़ तक, टेलीग्राम पीडीएफ़, व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड्स और रेडिट पोस्ट्स के बीच फैला हुआ है. इस दुनिया में केवल एक “हार्डकवर नॉवेल” लेकर प्रवेश करना वैसा ही है, जैसे किसी बहु-द्वार वाली इमारत में सिर्फ़ एक चाबी लेकर खड़े रह जाना. आज ज़रूरत एक ऐसी मल्टी-डोर लाइब्रेरी की है, जहाँ एक ही कंटेंट कई दिशाओं से भीतर आता है और हर पाठक अपने दरवाज़े से प्रवेश करता है. यह पीढ़ी एक अलग तरह के जादू से अपने आपको बांधे हुए है.

अक्सर यह शिकायत सुनाई देती है कि आज के बच्चे किताबें नहीं पढ़ते, उनका अटेंशन-स्पान ख़त्म हो गया है. लेकिन यह तस्वीर अधूरी ही नहीं, भ्रामक भी है.

जेन ज़ी उन दफ़्तरों में काम करने वाली या वहाँ पहुँचने का सपना देखने वाली पीढ़ी है, जहाँ बाहर से सब कुछ कॉर्पोरेट द्युति में नहाया हुआ दिखता है. ओपन ऑफ़िस, ग्लास केबिन, को-वर्किंग स्पेस. पर इस काँच के भीतर जो जीवन धड़क रहा है, वह अब तक का सबसे असुरक्षित और सबसे ज़्यादा सवाल करने वाला जीवन है. बाज़ार उन्हें दुनिया के सबसे केयरफ्री लोग कहते हैं, जबकि सच यह है कि वे केयरफ्री नहीं, मल्टीकेयर लोग हैं—एक साथ कई चिंताओं को लिए हुए. यह पीढ़ी बहुतों को पसंद करती है और इस सदी के मध्य की पीढ़ियों की तरह भयभीत नहीं करती.

उन्हें अपनी मानसिक सेहत की भी फिक्र है, नौकरी और ईएमआई की भी, कुत्ते-बिल्ली-पंछी-पेड़ की भी, और कहीं-कहीं माँ-बाप, भाई-बहन और दो-तीन सबसे क़रीबी दोस्तों की भी. कभी-कभी तो सचमुच यह संभव है कि किसी अनजान पिल्ले की चिंता उन्हें किसी औपचारिक “आदमी” से ज़्यादा बेचैन कर दे. किसी भूखे बालक को खाना खिलाने या किसी निर्धन विद्यार्थी की पढ़ाई मोबाइल न होने के कारण छूट रही हो तो उसे वह भी दिलाने तक यह पीढ़ी सहानुभूति को सिर्फ़ प्रकट करने तक सीमित नहीं रखती; उसका दायरा विस्तृत है, लगभग असहज करने की हद तक.

सोशल मीडिया पर यही पीढ़ी भयंकर रूप से मुखर है. इन्हें अपनी राय रखने में झिझक नहीं होती. इस पीढ़ी के भीतर के छंद में चाहे कितनी भी अटपटी इच्छाएँ बंद हों, लेकिन वह कभी अतीत में जीने को आतुर रहती है तो कभी वह मंगल पर बस्तियाँ बसाने वाले इलॉन मस्क को अपना नायक मानती है. जहाँ मिलेनियल्स अक्सर संकोची असहमति तक सीमित रहे, वहीं जेन ज़ी सीधे स्टोरी, पोस्ट, रील और मीम के ज़रिये जवाब देती है. उनके लिए पढ़ाई जीवन का पूरा ढाँचा नहीं, बस उसका एक हिस्सा है. डिग्री, स्कोर और सर्टिफ़िकेट ज़रूरी हैं, लेकिन वे यह नहीं चाहते कि कोई मंत्र रटा दिया जाए और वे जीवन भर उसका अर्थ समझे बिना उसके पीछे चलते रहें. इस पीढ़ी का प्रेम प्रेम की ठहर गई स्मृति की तरह अनछुआ और नाज़ुक नहीं है. वह अब किताब का हो या संगी-साथी का, स्टेटस का आकार इठलाता है.

इस पीढ़ी के लिए ज्ञान का मतलब है— सरल और सारगर्भित. भाषा सरल हो, विचार साफ़ हों, लेकिन भीतर अर्थ की रोशनी हो. यह पीढ़ी ख़ाली श्रद्धा से ज़्यादा अर्थ चाहती है. कोई श्लोक, कोई उद्धरण, कोई थ्योरी या आइडियोलॉजी तब तक उन्हें नहीं छूती, जब तक यह न लगे कि यह सीधे उनकी ज़िंदगी में किसी जगह फिट बैठती है—किसी डर, किसी सवाल, किसी निर्णय के बीच. यही वजह है कि जेन ज़ी सुनती भी है, पढ़ती भी है और मानती भी है; लेकिन आँख बंद करके नहीं, अर्थ की रोशनी में.

 

१४.

जेन ज़ी का दिमाग़ हाइपरलिंक्ड है. वह पढ़ते-पढ़ते किसी नाम या विचार पर रुकता है और तुरंत विकिपीडिया, यूट्यूब या एआई की ओर चला जाता है. उसकी पढ़ाई रेखीय नहीं, नेटवर्क की तरह है; चैप्टर से वीडियो, वीडियो से मीम, मीम से कमेंट और फिर मूल स्रोत की ओर वापसी. यह बिखराव नहीं, मल्टी-ट्रैक सोच है, जहाँ ज्ञान एक सीधी सड़क नहीं, ऊपर-नीचे की डबल लेन, ट्रिपल लेन, फोर लेन, फाइव या सिक्स लेन वाला ऊपर-नीचे और भीतर-बाहर फैलता हुआ शहर है, जिसमें हर लेन किसी दूसरी लेन से जुड़कर अर्थ की नई गति पैदा करती है. यह अमिट अनुभव के सौंदर्य को अलग तरह से जीती है.

अब एक ही समय में उनके सामने कई स्क्रीन खुले रहते हैं; चैट चल रही होती है, कोई गाना बज रहा होता है, नोट्स बन रहे होते हैं और बीच-बीच में कोई रील भी उभर आती है. इसका अर्थ यह नहीं कि वे गहराई से पढ़ नहीं सकते; इसका अर्थ यह है कि गहरी पढ़ाई उनके लिए एक सचेत चुनाव है, एक मोड स्विच. वे जानकारी को केवल तथ्यों की तरह नहीं, इस कसौटी पर ग्रहण करते हैं कि “यह मुझे छूता है या नहीं.” कोई किताब तथ्यात्मक हो; लेकिन उसकी आवाज़ ठंडी हो तो उँगली स्वाइप कर देती है. लेकिन कोई किताब पूरी तरह परफेक्ट न भी हो, फिर भी अगर वह ईमानदार और असुरक्षित है तो वही किताब देर रात तक अंडरलाइन होती रहती है.

इसलिए सवाल यह नहीं है कि जेन ज़ी पढ़ती है या नहीं; असली सवाल यह है कि हम उनकी डिफ़ॉल्ट सेटिंग को समझकर उससे संवाद कैसे करें. जेन ज़ी तक पहुँचाने के लिए पहले text नहीं , हुक चाहिए. उनकी रीडिंग जर्नी अक्सर किसी रील से शुरू होती है—किसी ने एक धमाकेदार पंक्ति पढ़ी, नीचे लिखा था “फ़्रॉम, फलाँ किताब”, और वहीं से जिज्ञासा ने जन्म लिया. फिर गूगल सर्च, ऑनलाइन ऑर्डर, फ़्री पीडीएफ़ की तलाश या ऑडियोबुक का छोटा-सा सैंपल—किताब तक पहुँचने के रास्ते कई हो जाते हैं.

और अब किताब सिर्फ़ किताब नहीं रही. वह एक पूरा कंटेंट-यूनिवर्स है. प्रिंट और ईबुक तो बुनियादी ढाँचा हैं ही, साथ में ऑडियोबुक; क्योंकि जेन ज़ी सफ़र, वर्कआउट और देर रात की बेचैनी में सुनना पसंद करती है. लेखक और किसी होस्ट के बीच पॉडकास्ट सुने जा रहे हैं, जिससे किताब की थीम्स खुलती है और कई पाठक पहले सुनते हैं, फिर पढ़ने तक पहुँचते हैं. किताब आने से पहले उसके दो-तीन चैप्टर साप्ताहिक ऑनलाइन सीरीज़ की तरह ड्रॉप किए जाते हैं. और कई बार यह कहानी दृश्यात्मक भी रहती है तो और शॉर्ट कॉमिक पैनल्स, कैरेक्टर आर्ट या वैबटून अडैप्टेशन सोशल मीडिया पर लगातार अपनी जगह बनाते रहते हैं.

यानी पुरानी पीढ़ी की तरह अब जेन ज़ी तक किताब की राह एक नहीं रही. वह कई रास्तों, कई फ़ॉर्मैट्स और कई अनुभवों से होकर गुजरती है और यही बहु-मार्गी यात्रा आज के पाठक की असली भाषा बन चुकी है. ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं कि एक बच्चा जिसकी सुबह अख़बार नहीं, फोन से शुरू होती है और फिर रात को वह 400 पेज की फैंटेसी बुक बिंज करके सो जाता है.

हम जब “आज का युवा” कहते हैं तो अक्सर सबको एक थैले में डाल देते हैं. पर यहाँ जिस पीढ़ी की बात है, वह जेन ज़ी है, मोटे तौर पर 1997 के बाद और 2012 तक जन्मी पीढ़ी है. यह बहुत तेजी से बदलती पीढ़ी है. ये वही पीढ़ी है, जो फेसबुक से मुँह मोड़ चुकी है और उसका रोज़मर्रा का सार्वजनिक जीवन अब इन्स्टाग्राम, स्नैपचैट, कभी-कभी यूट्यूब शॉर्ट्स या निजी ज़िंदगी वॉट्सऐप या डीएम में चलती है. यानी जिस लाइब्रेरी की हम बात कर रहे हैं, उसके रैक्स पर काग़ज़ी किताबें नहीं, स्क्रीन, नोटिफिकेशन और एल्गोरिद्मिक फीड करीने से रखे हैं.

जयपुर शहर के एक पुराने पुस्तकालय में एक दोपहर मैंने देखा कि कुछ लड़के-लड़कियाँ किताबों को सूंघ रहे हैं. पुस्तकालय प्रभारी मित्र ने कहा, अभी इनको देखना. क्या बातें करते हैं! तभी उन विरल क्षणों में ठिठकते इठलाते ठहाके के बीच तेज़ आवाज़ में एक विलक्षण व्याख्या सुनाई दी, “पुरानी किताब के काग़ज़ की ख़ुशबू और स्क्रीन की चमक अगर साथ आ जाएँ!” यह पीढ़ी दरअसल भागते-दौड़ते उजास को आत्मसात करने और नाज़ुक लम्हों की ख़ुशियों को आकंठ जी लेने वाली कोमल कलंदर पीढ़ी है.

जेन ज़ी की छवि या इमेज को लेकर भी कुछ मामले हैं. जैसे ये “परवाह नहीं करते” या “बस ख़ुद की ज़्यादा करते हैं”. समाज या बाज़ार ने जेन ज़ी की जो तस्वीर बनाई है, वह कुछ ऐसी है –“ये लोग किसी की परवाह नहीं करते, बस एस्थेटिक, सेल्फी और स्वाइप में जीते हैं.” लेकिन अगर थोड़ा ईमानदारी से देखें तो तस्वीर उलटी है. वे समाज की कम, ख़ुद और ख़ुद को जो भा जाए उसकी परवाह ज़्यादा करते हैं.

यह पीढ़ी पेड़ों, पक्षियों, गानों, किताबों, मूवीज, ओटीटी आदि में पगी है और अगर इसे एक नए संधि तट से देखें तो यह तड़ित कौंध गति से जीवन जीती है. इसमें वह ठहराव और धीरज नहीं है, जो अक्सर पुरानी पीढ़ियों को कुछ चीज़ों से बांधे रखता था. यह नए आवेग में जीती-बहती पीढ़ी है. इसके सरोकार भी नए हैं. जैसे मेंटल हेल्थ, बॉडी इमेज, आइडेंटिटी, जेंडर, सक्सेस, बर्नआउट. इसी वजह से वे बहुत मुखर हैं और अपनी ऑपनियन पर डटे रहते हैं, चाहे आपको वो पसंद आए या नहीं. मिलेनियल्स कई चीज़ों को “चुपचाप झेल” जाने वाली पीढ़ी थे; जेन ज़ी कई बार ख़ुद-केंद्रित हैं और म्यूट नहीं हैं. यही आभ्यांतरिकता कि “मैं कैसा महसूस कर रहा हूँ?” उनके पढ़ने के तौरतरीक़ों और रुचियों को भी प्रभावित करती है. वे ऐसी किताबें ढूँढते हैं जो या तो उन्हें ख़ुद समझाएँ या उन्हें ख़ुद से डिस्ट्रैक्शन दें.

 

१५.

पुरानी पीढ़ी समीक्षा के आधार पर पुस्तकें पढ़ती थी; लेकिन यह पीढ़ी रिव्यू नहीं, रील, रिसर्च और रिकमेंडेशन पर फ़िदा है. “किसने पढ़कर रिकमंड किया?” आज के युवा के लिए किताब चुनने का पहला क्राइटेरिया ये नहीं है कि संडे सप्लीमेंट में किस बड़े क्रिटिक ने क्या लिखा, यह है कि किस दोस्त, किस टीचर या किस बेहतरीन व्यक्ति ने कहा: “यह ज़रूर पढ़ो”. कौनसे दोस्त ने कौनसी पुस्तक सजेस्ट की और कौनसी पुस्तक के पन्नों ने मोहासक्त कर लिया. इसीलिए दिखता है कि इस बुक्सटाग्रैमर या बुक्टॉकर ने 30–60 सेकंड की रील बनाकर रोते या मुस्कुराते हुए कहा : “दिस डिस्ट्रॅयड मी!” या किसी ने इंस्टा पर लिखा : “ब्रो, दिस डिस्ट्रॅयड मी!” या किस इन्फ्लुएंसर की “ईयरली रीडिंग लिस्ट” में वह किताब बार–बार दिखी. यानी: युवा अब व्यू या रिव्यू के हिसाब से नहीं, रिकमंडेशन के हिसाब से पढ़ते हैं. रिव्यू किसी एक विशेषज्ञ की आवाज़ है; लेकिन रील, रिसर्च और रिकमंडेशन अपने ट्राइब की आवाज़ है और जेन ज़ी ट्राइब-कॉन्शस है.

जैसे मैंने अभी बहुत से जेन-ज़ी युवाओं से उनकी रीडिंग लिस्ट ली; लेकिन एक कुशाग्र युवा पत्रकार की रीडिंग लिस्ट में डेबोरा लेवी, डोना टार्ट, हान कांग, सूसन सोंटैग, आनी एर्नो और साथ में निर्मल वर्मा, राहुल सांकृत्यायन, धर्मवीर भारती, विनोद कुमार शुक्ल…आदि की पुस्तकें आईं. ये दरअसल एक रेयर रीडर जेन ज़ी का नमूना है, जो वर्ल्ड लिट्रेचर, थियरी, हिन्दी-उर्दू मेमोयर सबको साथ लेकर चल रही है.

हान कांग के गद्य में जहाँ हिंसा हमेशा किसी धारदार औज़ार की तरह नहीं, त्वचा के नीचे उतरती हुई ठंडी धूप की तरह महसूस होती है; और उसी के साथ कोमलता किसी घायल पत्ते की नसों-सी काँपती रहती है, वहीं आनी एर्नो की लेखनी अपनी ही परतें उतारती हुई ऐसी निर्मम, लगभग शल्य-क्रिया जैसी ईमानदारी तक पहुँचती है कि पाठक के पास अपने झूठ बचाने का कोई कोना नहीं रह जाता.

पैट्रिशिया हाइस्मिथ के यहाँ नैतिकता एक स्थिर तख्ती नहीं, बहुरूपी छाया है. उसके किरदार हमें आकर्षित करते हुए धीरे-धीरे यह सिखा देते हैं कि “ग़लत” अक्सर “साफ़” नहीं होता और “सही” हमेशा “निर्दोष” नहीं. और क्लैरिस लिस्पेक्टर का मिस्टिकल इंटीरियर मोनोलॉग, जो आत्मा के भीतर जलती, बुझती, फिर जल उठती लौ की तरह भाषा को भीतर से रोशन करता है, जेन ज़ी के भीतर किसी अधूरे प्रश्न की तरह धड़कता है, उनकी बेचैनी को नाम देता है और उन्हें अपने ही भीतर उतरकर देखने की वह तड़प जगाता है, जिसे वे स्क्रीन पर नहीं, सिर्फ़ किताब के सन्नाटे में पकड़ पाते हैं.

नॉन-फ़िक्शन आज दो ध्रुवों के बीच झूल रहा है और दोनों का उन्माद, आवेग और तनाव एक ही मनःस्थिति से जन्मता है. एक तरफ़ जीवनियाँ और संस्मरण हैं. सेलिब्रिटीज़, कलाकार, विचारक, सर्वाइवर— जैसे ब्रिटनी स्पीयर्स से पैटी स्मिथ तक, मीना कुमारी की टूटन से हान कांग के मानवीय कृत्यों तक. ये किताबें दूसरों की ज़िंदगी पढ़कर अपनी ज़िंदगी समझने की कोशिश हैं; जैसे किसी और के अनुभव में अपना प्रतिबिंब खोज लेना, ताकि बिखराव को कोई आकार मिल सके. दूसरी तरफ़ सेल्फ़-हेल्प, प्रोडक्टिविटी और आध्यात्म; जहाँ आदतें परमाणुओं में टूटती हैं, भौतिकी सात पाठों में सिमट जाती है, जीवन दस नियमों में और उदासी चार अध्यायों में बाँध दी जाती है. यहाँ भाषा तेज़ है, वाक्य छोटे हैं और वादा साफ़. जल्दी समझो, तुरंत लागू करो, असर देखो.

इसीलिए कार्लो रोवेली की सेवन ब्रीफ़ लेसन्स ऑन फ़िज़िक्स और किसी भारतीय फ़िल्मी कलाकार की जीवनी; दोनों एक ही मानसिक शेल्फ़ पर रखी जा रही हैं. पाठक दरअसल विषय नहीं चुन रहा; वह स्पष्टता चुन रहा है. उसे वह किताब चाहिए जो देर न करे, धुंध न रचे, और मन में सीधी उतर जाए.

पर इस साफ़गोई की कीमत भी है. आनंद के लिए पढ़ना; यों ही, बिना उद्देश्य, बिना लक्ष्य—धीरे-धीरे सिकुड़ रहा है. पढ़ना अब अक्सर किसी काम में फिट किया जाता है. परीक्षा, कॅरियर, आत्म-सुधार, पहचान या उपचार. खालिस विस्मय, आलस्य में भटकना, पन्नों के बीच बेकार घूम आना—ये सब अब विलासिता बनते जा रहे हैं. जैसे कहानी से पहले उसका औचित्य माँगा जा रहा हो, और किताब से पहले उसका उपयोग. और इन्हीं किताबों में बहती हुई यह पीढ़ी जयपुर लिट्रेचर फेस्टीवल जैसे साहित्य और पुस्तकों के उत्सवों में उल्लास भरती है और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम आते हैं तो जेन ज़ी एक ही परिसर में तीस हज़ार से अधिक की तादाद में आ जुटती है. जयपुर जैसे परंपरावादी और रूढ़िग्रस्त शहर में, जहाँ बेचैन आधुनिक सौंदर्यबोध सदैव ही कभी परंपरा के झीने पर्दे में रहता है तो कभी रिवाज़ों की किसी पारदर्शी ओढ़नी में. आधुनिकता का अलौकिक आवेग भी चेहरों को ढक कर ही निकलता है. लेकिन यह सब किसी अचानक फैशन का नहीं, एक धीरे-धीरे घटते हुए—लगभग अनचीन्हे—आंतरिक बदलाव का परिणाम है.

हमारे स्कूलों और कॉलेजों की कक्षाओं में अब अक्सर लड़कों से अधिक संख्या में लड़कियाँ बैठी हैं; और यह केवल संख्या का अंतर नहीं, संवेदना की दिशा का भी संकेत है. वे अपने भीतर के अनुभव को शब्द देने, उसे समझने, और उसकी नमी को बचाए रखने की ज़िद के साथ साहित्य के पास आती हैं—जैसे कहानी उनके लिए मनोरंजन नहीं, अपने जीवन का नक़्शा हो; जैसे कविता किसी सजावट का नाम नहीं, एक ऐसा छुपा हुआ दरवाज़ा हो, जिससे भीतर का कमरा खुलता है. इसलिए यह जो नई तड़प और नई संवेदनशीलता दिखाई देती है, उसके पीछे किसी बाहरी ट्रेंड से ज़्यादा, वही स्त्री-उपस्थिति है, जो संस्थानों के भीतर धीरे-धीरे बढ़ते हुए, भाषा और साहित्य को फिर से जीवित, जरूरी और निजी बना रही है.

 

16.

जेन ज़ी के रीडिंग रूम में जेंडर कोई दीवार नहीं, एक धुँधली रेखा है, जिसे पार करना सहज लगता है. यह धुँधलापन केवल किताबों तक सीमित नहीं; संगीत, फैशन, विज़ुअल कल्चर—हर जगह एक ही सौंदर्य उभर रहा है, जहाँ पहचान तय नहीं, तरल रूप से बहती हुई है. के-पॉप के मंचों पर यह बहाव पहले संगीत बनकर उतरा; ऐसी धुनें, ऐसे चेहरे, ऐसे हाव-भाव और वस्त्र कि “लड़का” या “लड़की” पूछना बेसुरा लगने लगे. लोकप्रियता ने यहाँ जेंडर को नहीं, अनुभूति को आगे रखा. बीट्स ने शरीर से ज़्यादा मन को छुआ और पहचान की पुरानी तख़्तियाँ अपने-आप ढीली-शिथिल और निष्प्राण पड़ गईं. वही लय पढ़ने में उतर आई; जहाँ कहानी जेंडर नहीं पूछती, बस सुनती है; और पाठक-श्रोता-दर्शक बिना बायस के, उस संगीत में बह जाता है.

जेन ज़ी उन पात्रों की ओर खिंचती है, जो तयशुदा जेंडर-खाँचों में फिट नहीं बैठते, जिनकी चाह, देह-भाषा और पहचान स्थिर नहीं, प्रयोगशील है. यह समय “मरदानापन” या “स्त्रैण” की प्रतियोगिता का नहीं है. यह समय साफ़-साफ़ मनुष्य होने का है. उस मनुष्य का, जो भीतर से महसूस करता है, बाहर से ज़िम्मेदार रहता है, और दोनों के बीच झूठे कवच नहीं पहनता. अब पहचान का सबसे ईमानदार नाम जेंडर नहीं, गरिमा है; सबसे सच्चा प्रमाण ताक़त नहीं, संवेदना है; और सबसे आधुनिक भाषा जेंडरलेस नहीं; वह भाषा है जिसमें कोई भी देह, कोई भी मन, किसी भी प्रेम, किसी भी डर के साथ अपमानित नहीं होता.

अगर देशों में कट्टरतावाद और धर्मोन्मुखी संकीर्ण राष्ट्रवाद वाला दौर शुरू नहीं होता तो आज जिस तरह जेंडर-खाँचे खंडित हो रहे हैं, वैसे ही नेशनलिस्टिक खाँचे भी खंडित हो रहे होते. पर्यावरण पर सीओपी सम्मेलन देशों की वह वार्षिक वैश्विक बैठक  मुझे अच्छी तरह याद हैं, जहाँ जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए उत्सर्जन घटाने, वित्त और साझा जिम्मेदारियों पर समझौते किए जा रहे थे तो कतर की राजधानी दोहा में भारतीय और पाकिस्तानी लड़के-लड़कियाँ यह कहने पर भड़क उठे थे कि उनसे उनकी राष्ट्रीयता क्यों पूछी जा रही है. यह तो अपमानजनक बात है. उस समय उन युवाओं के लिए जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, वैश्विक तापमान, जलवायु वित्त और पर्यावरणीय न्याय से जुड़े नियम, लक्ष्य और समझौते सबसे अहम सरोकार थे, जो आज साफ़ दिखाई दे रहे हैं. आज जब दुनिया जल रही है और जलवायु, युद्ध, नफ़रत, अकेलापन, मानसिक थकान की चिंताएं सता रही हैं, तब हमें “पुरुष” और “स्त्री” की पुरानी परिभाषाओं में नहीं, मनुष्य की साझा जिम्मेदारी में उतरना होता है.

जेंडरलेस का अर्थ यह नहीं कि हम फ़र्क़ मिटा दें; अर्थ यह है कि हम फ़र्क़ को हक़ बना दें और किसी को भी, किसी भी रूप में, कमतर न ठहराएँ. आज विश्व साहित्य में इन सरोकारों पर टिकी चिंताएँ अहम हैं. इसीलिए जॉन लेनॅन का गाना “इमेजिन” जेन ज़ी में भी लोकप्रिय है, जिसकी मशहूर पंक्तियाँ कहती हैं कि न कोई स्वर्ग है, न कोई नरक, कोई सीमाएँ नहीं; सारी धरती एक है, और इंसान भी. यह गीत धर्म, राष्ट्र और युद्ध से परे एक साझा, मानवीय दुनिया की कल्पना करता है और इसीलिए यह आज भी शांति और जेंडर आइडेंटिटी से परे सोच का वैश्विक एंथम माना जाता है.

यह समय वह है जहाँ “मर्दानगी” का शोर नहीं, मानवता की स्पष्ट आवाज़ चाहिए; कम शब्दों में, गहरे अर्थों में, और बिना किसी डर के. इसी खुलेपन के बीच रोमांटिक-फ़ैंटेसी की चमकदार दुनिया भी है. ड्रैगन, जादू, निषिद्ध प्रेम, और टूटन से उबरने की लंबी यात्राएँ. ये कहानियाँ सिर्फ़ कल्पना नहीं बेचतीं; वे एक ऐसा स्पेस रचती हैं, जहाँ घावों को भाषा मिलती है और उपचार कथा के भीतर घटित होता है. नई पीढ़ी के लिए यह मनोरंजन और अर्थ का संगम है, जहाँ राजनीति, इतिहास और कल्पना अलग-अलग नहीं रहते, एक-दूसरे में घुलकर नई दुनिया रचते हैं.

दिलचस्प यह है कि इसी रीडिंग रूम में पुराना और नया आमने-सामने नहीं, कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं. जेन ज़ी सिर्फ़ ताज़ा शीर्षक नहीं पढ़ती; वह पुराने ग्रंथों को भी नए चश्मे से देखती है. कोई क्लासिक प्रेमकथा अचानक त्रासद रोमांस की तरह लौट आती है, कोई यात्रा-वृत्तांत साहस और स्मृति की कहानी बन जाता है, कोई अवसाद-भरा उपन्यास आज की मानसिक सेहत की भाषा बोलने लगता है. स्मृति, एकांत, अकेलापन, और जादुई यथार्थ—ये सब अलग-अलग परंपराओं से निकलकर एक साझा शब्दावली बना लेते हैं.

इस तरह एक ही शेल्फ़ पर कई दुनिया टिक जाती हैं. किसी देश का मिथकीय गाँव, किसी और भूगोल की हिंसक शांति, कहीं से आई प्रेम की थकी हुई विरासत और कहीं से उभरा कोई ताज़ा, वायरल शीर्षक. सब एक साथ, एक ही पीढ़ी के मन में दर्ज होते हुए. यह पीढ़ी चयन नहीं, सह-अस्तित्व में विश्वास करती है. उसके लिए पढ़ना किसी एक धारा में बहना नहीं, कई धाराओं को एक साथ महसूस करना है, जहाँ पहचान स्थिर नहीं रहती और कहानी हर पन्ने पर ख़ुद को फिर से गढ़ती है.

 

17.

यहाँ असली टकराव “सरलता की माँग” और “अर्थ की भूख” का नहीं, उनके तनावपूर्ण गठबंधन का है. जेन ज़ी भाषा को आसान चाहती है, संरचना को साफ़; पर वह सतह पर टिककर खुश नहीं होती. उसके लिए कहानी के पीछे अर्थ होना चाहिए, और उस अर्थ के पीछे ईमानदारी. वह उन मंत्रों से थक चुकी है जिन्हें जीवन भर बिना समझे दोहराया जाए; इसलिए वह हर किताब से यह पूछती है, यह मेरी ज़िंदगी में कहाँ रोशनी डालती है? किस कोने को स्पष्ट करती है? किस डर को नाम देती है?

यही वजह है कि विचार अगर आए तो वह सूसन सोंटैग की तरह साफ़ और तेज़ हो, स्मृति अगर खुले तो आनी एर्नो की तरह लगभग क्लिनिकल सचाई के साथ, प्रेम अगर बोला जाए तो सिल्विया प्लाथ या जोन डिडियन या ईव बैबिट्ज़ की तरह आत्म-जागरूक और हिन्दी-हिन्दुस्तानी अनुभव अगर सामने आए तो निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल, धर्मवीर भारती की तरह—गहरा, पर पहुँचा देने वाली भाषा में. इस पीढ़ी के लिए किताब अब “बिना मतलब के आजीवन साथ ले जाने लायक मंत्र” नहीं; वह “कुछ समय के लिए मेरे किसी सवाल को रोशनी देने वाला उपकरण” बनती जा रही है; ऐसा उपकरण जो उपदेश नहीं देता, भीतर की धुंध में एक छोटा-सा, स्पष्ट प्रकाश रख देता है.

अगर इस सबको एक फ्रेम में रख दें तो जेन ज़ी का रीडिंग रूम ऑर्बिट से स्पेस में झांकने जैसा दिखता है. कमरे के एक हिस्से में फैले अंतरिक्ष में लैपटॉप खुला है, मोबाइल पर रील चल रही है—किसी ने त्यागपत्र की एक पंक्ति पढ़कर रो दिया है, बैकग्राउंड में कोई के-पॉप ट्रैक धीमे बज रहा है और बिस्तर के पास किताबों का ढेर लगा है; ह्यूमन ऐक्ट्स, प्ले इट ऐज़ इट लेज़, खिलेगा तो देखेंगे, अ हैंडबुक फ़ॉर माई लवर, सेवन ब्रीफ़ लेसन्स ऑन फ़िज़िक्स और उनके बीच, जैसे दो अलग सदियों की हथेलियाँ मिल रही हों; गुनाहों का देवता और रात का रिपोर्टर. इस ढेर में कोई एक किताब “केवल किताब” नहीं रहती; हर शीर्षक एक दरवाज़ा है और हर दरवाज़े के पीछे एक ही आग्रह धड़कता है—सरल कहो, पर सच कहो; कम में कहो, पर अर्थ में कहो.

वह “दुनिया का सबसे केयरफ़्री यूथ” असल में हर चीज़ से जूझता हुआ यूथ है, जो सरल भाषा में अर्थ, आकर्षक कवर के भीतर ईमानदारी, और किसी कम्युनिटी की सिफ़ारिश में अपना अगला सहारा ढूँढता है. उद्विग्न और अधीर चुनौतियाँ हमारी हैं. हम अपनी किताबों, निबंधों, उपन्यासों और कविताओं को इस रीडिंग रूम के दरवाज़े तक कैसे पहुँचा दें. अगर हम वहाँ तक पहुँच गए तो बाकी काम वह ख़ुद कर लेगा—हाइलाइट, अंडरलाइन, शेयर, रिकमेंड—और उसी दिन से किताब सचमुच “ज़िंदा” होने लगेगी; क्योंकि वह किताब अब काग़ज़ पर नहीं, किसी मन में चल रही होगी.

इस रीडिंग रूम की शेल्फ़ पर विरोध की आवाज़ें हैं—

रोमिला थापर की वॉइसेज़ ऑफ़ डिसेंट, कोबाड़ गांधी की फ़्रैक्चर्ड फ़्रीडम, जोसी जोसेफ़ की द साइलेंट कूप; और सत्ता, समाज, विवेक के बीच चलती बहसों में अरुंधति रॉय की किताबें—वॉकिंग विद द कॉमरेड, कठघरे में लोकतंत्र, एक था डॉक्टर, एक था संत: आंबेडकर-गाँधी संवाद.

आदित्य मुखर्जी की नेहरू’ज़ इंडिया है, संस्कृति के चार अध्याय है, विनय सीतापति की जुगलबंदी: बीजेपी बिफ़ोर मोदी है, संतोष सिंह की रूल्ड ऑर मिसरूल्ड: स्टोरी ऐंड डेस्टिनी ऑफ़ बिहार है.

अहिंसा और विवेक की परंपरा में नंदकिशोर आचार्य की अहिंसा की संस्कृति, अनुपम मिश्र की विचार का कपड़ा और आज भी खरे हैं तालाब, पेरियार की सच्ची रामायण और धर्म और विश्वदृष्टि, पुष्यमित्र का जब नील का दाग़ मिटा: चंपारण 1917, राममनोहर लोहिया का हिंदू बनाम हिंदू, गांधी के प्रार्थना प्रवचन और मुरिएल लेस्टर की गांधी की मेज़बानी—सब एक साथ हैं. और इसी कतार में आनंद तेलतुंबड़े की जनवादी समाज और जाति का उन्मूलन, ओमप्रकाश वाल्मीकि की जूठन, राही मासूम रज़ा की टोपी शुक्ला भी—

जैसे यह शेल्फ़ सिर्फ़ पढ़ने की नहीं, अपने समय को समझने की तैयारी है.

लेकिन दृश्य में एक और बात भी है—काफ़ी बार बूढ़े अंदर हैं और युवा बाहर. आप पूछते हैं तो जवाब आता है: “मैं नहीं पढ़ता.” फिर कहा जाता है: “अटेंशन स्पैन कम है.” हो सकता है. पर यह भी हो सकता है कि भीतर की जगहें ऐसी बन गई हैं जहाँ युवा की साँस अटकती है, जहाँ किताब से पहले अनुशासन माँगा जाता है, और अर्थ से पहले अनुमति. युवा बाहर इसलिए नहीं कि वह पढ़ना छोड़ चुका है; वह बाहर इसलिए है कि उसने पढ़ने के रास्ते बदल दिए हैं. वह दरवाज़ा ढूँढ रहा है—और अक्सर उस दरवाज़े पर कोई बुज़ुर्ग-सा ताला लटका मिलता है: भाषा का, ढाँचे का, दंभ का, या “हम बताते हैं” वाली आवाज़ का.

इसीलिए आज सबसे जरूरी काम यह है कि हम अपने भीतर के कमरे खोलें—और युवाओं के लिए नहीं, युवाओं के साथ. उन्हें बुलाने के लिए नहीं, उनके साथ बैठने के लिए. क्योंकि जिस दिन यह दूरी घटेगी, उसी दिन “मैं नहीं पढ़ता” का वाक्य भी बदलने लगेगा कि “मैं पढ़ता हूँ, बस वहाँ नहीं; यहाँ.” और तब अटेंशन स्पैन का सवाल नहीं रहेगा; सवाल सिर्फ़ यह रह जाएगा कि आपकी किताब उसके किसी सवाल तक पहुँचती है या नहीं. अगर पहुँच गई, तो वह उसे अपनी तरह से जी लेगा—और वही जीना किताब की सबसे बड़ी प्रकाशन-तिथि होगी.

 

18.

जेन ज़ी को मोटे तौर पर तीन धाराएँ आकार दे रही हैं— बुकटॉक वाली किताबें, स्पॉटिफ़ाई-टिकटॉक वाला संगीत, और सोशल-जस्टिस वाली राजनीति—और तीनों अलग-अलग द्वीप नहीं, एक ही मनःमहाद्वीप की तीन तट-रेखाएँ हैं. उनकी किताबों की दुनिया में आज कोलीन हूवर की इट एंड्स विद अस और वेरिटी जैसे शीर्षक एक तरफ़ हैं, और दूसरी तरफ़ सारा जे. मास की अ कोर्ट ऑफ़ थॉर्न्स ऐंड रोज़ेस (एकोटार) जैसी सीरीज़—जहाँ फ़ैंटेसी के भीतर रोमांस का ताप है, और रोमांस के भीतर घावों का इतिहास. इसी लहर में रेबेका यारॉस की फ़ोर्थ विंग उड़ती है. ड्रैगन-राइडर अकादमी की चमक के साथ; और टेलर जेनकिंस रीड की द सेवन हज़बैंड्स ऑफ़ एवलिन ह्यूगो, जहाँ पहचान, ग्लैमर और निजी सच एक साथ झिलमिलाते हैं. यह पढ़ना सिर्फ़ भागना नहीं; यह एस्केपिज़्म और थेरैपी का मिश्रण है. ऐसी दुनिया चुन लेना जहाँ “चुना हुआ” होना किसी को हक़ीक़त से काटता नहीं, जीने की ताक़त देता है.

इसी के साथ उनकी दूसरी शेल्फ़ भी है. जेम्स क्लियर की एटॉमिक हैबिट्स जैसी किताबें, जो जीवन को माइक्रो-आदतों में बाँधकर संभालने का ढाँचा देती हैं; और मैट हेग की द मिडनाइट लाइब्रेरी, जो पछतावे, अवसाद और वैकल्पिक ज़िंदगियों के बीच एक दरवाज़ा खोलती है. भारत के मेलों और स्टॉल्स पर यह दृश्य अब सामान्य है कि काफ़्का, ऐनिमे-मंगा, और “रोमैंटैसी” एक ही टेबल पर हैं; जैसे गंभीर साहित्य और पॉप फ़ैंटेसी एक-दूसरे को रद्द नहीं कर रहे, एक ही पाठक के भीतर सह-अस्तित्व में हैं. यहाँ तक कि डेटिंग-बायो में “बुकस्टोर” और “बुक बॉयफ़्रेंड” का ज़िक्र भी तेज़ी से बढ़ता है; प्रेम की कल्पनाएँ सचमुच उपन्यासों से आयात होने लगती हैं.

उनके कानों में जो संगीत बजता है, वह भी इसी मनःस्थिति का विस्तार है. पॉप और हिप-हॉप की तेज़ धड़कन और भीतर कहीं एक लगातार चलती बेचैनी. सैब्रिना कार्पेंटर का “एस्प्रेसो” जैसे हल्के, मीम-योग्य हुक्स; बेंसन बून का “ब्यूटीफ़ुल थिंग्स”; बिली आयलिश का “बर्ड्स ऑफ़ अ फ़ेदर”; जो उदासी को भी शिल्प में ढाल देता है; टेडी स्विम्स का “लूज़ कंट्रोल”; फ़्लॉयीमेनर और क्रिस एमजे का “गाटा ओनली”; और 2025 की वैश्विक धुनों में लेडी गागा और ब्रूनो मार्स का “डाई विद अ स्माइल”—ये सब मिलकर उनकी प्लेलिस्ट का मूड-मैप बनाते हैं. रिकॉर्डों की भाषा में द वीकेंड की “ब्लाइंडिंग लाइट्स” अब भी एक स्थायी साइनबोर्ड की तरह खड़ी है—और टेलर स्विफ़्ट, बिली आयलिश, ओलिविया रोड्रिगो, सैब्रिना कार्पेंटर, बैड बनी, ड्रेक, एसज़ेडए, बीटीएस, केंड्रिक लामार—ये नाम किसी चार्ट के नहीं, एक पीढ़ी के भाव-व्याकरण के हैं. टिकटॉक का एल्गोरिदम इस व्याकरण में एक और चमत्कार जोड़ देता है—जैसे 1962 की कॉनी फ़्रांसिस का “प्रिटी लिटल बेबी” अचानक 2025 में फिर से दुनिया की धड़कन बन जाए. यानी जेन ज़ी “नया” ही नहीं उठाती; वह एल्गोरिद्म से मिला “पुराना” भी पूरे वर्तमान में बदल देती है.

जेन ज़ी कोलीन हूवर से एकोटार और फ़ोर्थ विंग तक प्रेम और फ़ैंटेसी की कहानियाँ पढ़ती है, जो एस्केपिज़्म भी हैं और सेल्फ़-थेरैपी भी; उसके कानों में बिली आयलिश, ओलिविया रोड्रिगो–टेलर स्विफ़्ट, लाना डेल रे से लेकर लियोनार्ड कोहेन की डायरी-आवाज़ें हैं और साथ में द वीकेंड की “ब्लाइंडिंग लाइट्स” जैसी धुनें, जो बेचैनी, पहचान और हल्के नाच को एक साथ ढोती हैं; और उसके भीतर एक राजनीति है, जो दिल से सामाजिक न्याय चाहती है, दिमाग़ में आर्थिक असुरक्षा लिए चलती है और संस्थाओं से नाराज़ रहते हुए भी पूरी तरह ख़ामोश नहीं रहती. यह पीढ़ी भाग नहीं रही—यह नई भाषा में जी रही है: किताबों की, गीतों की और सवालों की.

लेकिन किताबें क्या ऐसे ही आ जाती हैं? सच में तो किताबें अपने कालखंड का आकुल कंठ होती हैं. आर्सेनी तारककोव्स्की की एक कविता की एक पंक्ति है कि सच-सच कहा जाए तो हम काल और स्थान की भाषा हैं. आज जब नैतिक पराभव, सत्य से पीठ फेरने और तटस्थता के आपराधिकता में सक्रिय हो जाने का समय है तो किताबें ही हैं, जो ख़ामोश नहीं हैं और मुखर होकर बोल रही हैं. इसलिए इस समय की राजनीति भी लेखन को प्रभावित करती है.

जेन ज़ी किसी एक विचारधारा का एकरूप ब्लॉक नहीं है, पर उसके भीतर मुद्दों की एक धुरी साफ़ दिखती है. क्लाइमेट चेंज, जेंडर और एलजीबीटीक्यू के अधिकार, नस्ली-जातिव जैसी न्याय-चेतना, गन वायलेंस, बॉडिली ऑटोनॉमी, मेंटल हेल्थ सपोर्ट, सस्ती शिक्षा और आवास जैसे उनके मुद्दे साफ़ हैं. भारत के संदर्भ में भी उसकी चिंताओं का त्रिकोण अक्सर रोज़गार, गरिमा और पर्यावरण बन जाता है. शिक्षा, कौशल, बेरोज़गारी, जलवायु, यौन उत्पीड़न और मानसिक स्वास्थ्य की बेचैनी साथ-साथ चलती है. वे ऑनलाइन अभियानों में आगे हैं, विरोध में तेज़ हैं, पर मुख्यधारा संस्थाओं और पार्टियों से नाराज़ भी. उन्हें लगता है कि वे अपने माता-पिता से बदतर स्थिति में पहुँच सकते हैं. और फिर भी यह कहानी एकतरफ़ा नहीं; एक हिस्से में गतिशील आग्रह है तो कहीं-कहीं—खासकर युवा पुरुषों में—एक बैकलैश भी उभरता दिखता है. दक्षिण एशिया में कई जगह यह राजनीति विचारधारा से कम और एंटी-एस्टैब्लिशमेंट मूड से ज़्यादा दिखती है—भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, नौकरियाँ और सम्मान के प्रश्नों के इर्द-गिर्द.

 

19.

आज की जेन ज़ी ख़ुद को किसी एक परिभाषा में बंद नहीं देखती. वह एक साथ कई सवालों, कई चाहतों और कई आशंकाओं के बीच जीती है—और उसी बीच अपने लिए अर्थ खोजती है. धर्म और आस्था को लेकर उसका रुख़ साफ़ है: वह आध्यात्मिक हो सकती है, पर अंधविश्वासी नहीं. पश्चिम में वह अधिक सेक्युलर या “नथिंग इन पार्टिकुलर” की ओर जाती दिखती है; भारत और एशिया में वह मंदिर–मस्जिद–गुरुद्वारे, कीर्तन और सूफ़ी परंपराओं में भी जाती है; लेकिन सवाल पूछते हुए. उसे उस हिपोक्रेसी से चिढ़ है, जहाँ बराबरी सिखाने वाला धर्म नफ़रत या पैट्रिआर्की का औज़ार बन जाए. उसकी नई स्पिरिचुअलिटी में एस्ट्रोलॉजी ऐप्स, टैरो, मैनिफ़ेस्टेशन और “यूनिवर्स इज़ लिसनिंग” जैसी चीज़ें भी शामिल हैं; क्योंकि वह ईश्वर से ज़्यादा मीनिंग, जस्टिस और मेंटल शांति ढूँढ़ रही है.

भविष्य उसके लिए सरल सपना नहीं, बल्कि “यूटोपिया और एंग्ज़ायटी” का मिश्रण है. वह ऐसी दुनिया चाहती है, जहाँ क्लाइमेट कॉलैप्स, रैंडम वॉर्स, महँगी एजुकेशन और अनपेड इंटर्नशिप न हों. सर्वे बताते हैं कि वही सबसे ज़्यादा क्लाइमेट-ऐंक्शस और फ़्यूचर-ऐंक्शस पीढ़ी है—उसे लगता है कि पिछली जनरेशन्स का मेस उसी को साफ़ करना है. उसकी कल्पना में ग्रीन सिटीज़, फ़ेयर जॉब्स, सभी जेंडर्स के लिए डिग्निटी, अफ़ॉर्डेबल थेरैपी और हेट-पॉलिटिक्स का वॉल्यूम लो होना चाहिए—हालाँकि भीतर कहीं यह डर भी है कि शायद वह अपने पैरेंट्स जितनी सिक्योर कभी नहीं हो पाएगी.

और अगर नई किताबों को देखें या कहानियों को तो भविष्य में वह मल्टी-जनरेशनल लिविंग और पर्सनल बाउंड्रीज़ का संतुलन चाहती है. जैसे कहना हो, “आप हमारे रूट हैं, पर हमारी ब्रांचेज़ मत काटिए.” लड़कों के भीतर आज भी भारी दबाव हैं—प्रोवाइडर, स्ट्रॉन्ग, इमोशनलेस और हमेशा कॉन्फ़िडेंट दिखने का. अंदर, इनसिक्योरिटी, बॉडी इमेज इश्यूज़ और परफ़ॉर्मेंस एंग्ज़ायटी चलती रहती है. वे फ़ेमिनिज़्म का मैसेज सुनते हैं और सपोर्ट भी करते हैं, पर कई बार महसूस करते हैं कि “सिस्टम सबका है, ब्लेम सिर्फ़ हम पर क्यों?” कुछ लड़के राइट-विंग या हाइपर-मास्कुलिन इन्फ़्लुएंसर्स की ओर खिंचते हैं—जहाँ सिंपल आन्सर्स और “रियल मैन” वाली पहचान मिलती है. वहीं बहुत से लड़के थेरैपी, वल्नरेबिलिटी, कंसेंट और जेंडर-इक्वैलिटी को गंभीरता से लेते हैं—पर “सिम्प-वीक-सॉफ़्ट” के टैग का डर बना रहता है. उनके भीतर एक युद्ध चलता है: ओल्ड मर्दानगी बनाम न्यू ह्यूमैनिटी.

लड़कियों के लिए सिक्योरिटी, कंसेंट और फ़्रीडम—तीन बड़े कीवर्ड हैं: सड़क पर, सोशल मीडिया पर और बेडरूम में. बहुत-सी लड़कियाँ फ़ाइनैंशियली इंडिपेंडेंट और इमोशनली सेल्फ-ओन्ड होना चाहती हैं; शादी उनके लिए एंड गोल नहीं, एक ऑप्शन है. रिसर्च बताती है कि जेन ज़ी की लड़कियाँ राजनीति में अधिक प्रोग्रेसिव और सोशल-जस्टिस ओरिएंटेड दिखती हैं. बॉडी इमेज और ब्यूटी फ़िल्टर कल्चर ने उन्हें चोट पहुँचाई है. इसलिए बॉडी-पॉज़िटिविटी, “माय बॉडी माय रूल्स” और सेफ़ स्पेसेज़ उनके लिए क्रूशियल हैं. भीतर की पंक्ति साफ़ है: “केयरटेकर हों तो चॉइस से, कम्पल्शन से नहीं.” हिन्दी की समकालीन चेतना में जो किताबें पसंद की जा रही हैं, उनमें पात्रों का अध्ययन करने पर साफ़ पता चलता है कि इस मामले में हिन्दी का संसार अभी थोड़ा पीछे है; लेकिन विदेशी साहित्य में बहुत काम हो रहा है.

भारत में प्रकृति और पर्यावरण संबंधी किताबें भी खूब बिकी हैं; क्योंकि प्रकृति के साथ उनका रिश्ता प्रेम और विरोधाभास का है. क्लाइमेट एंग्ज़ायटी उनकी नसों में दौड़ती है—ग्लेशियर, कोरल, फ़ॉरेस्ट और एयर सब ख़तरे में हैं. वे प्लांट-पैरेंट्स बनते हैं, थ्रिफ़्ट करते हैं, मेटल स्ट्रॉज़ लेते हैं, क्लाइमेट मार्च में जाते हैं—फिर भी चीप फ़्लाइट्स, फ़ास्ट फ़ैशन और ऑनलाइन शॉपिंग छोड़ पाना कठिन है. उनका सपना है: विकास बिना विनाश के—गाँव की हवा और शहर की सुविधा साथ-साथ. और रोज़ का सवाल: “क्लाइमेट पर पोस्ट करना काफ़ी है, या लाइफ़स्टाइल सच में बदलनी होगी?”

लिटरेचर में उनका व्यवहार तेज़ और बिखरा हुआ लगता है, पर भूख असली है. रील्स और मीम्स के बीच अटेंशन स्पैन छोटा हो सकता है, पर स्टोरीज़ की प्यास गहरी है. लॉन्ग नॉवेल्स कम सही—फ़ैनफ़िक्शन, वेबटून्स, मांगा, इंस्टा-पोएट्री और बुकटॉक रेक्स वे खूब कंज़्यूम करते हैं. कैनन ऑथर्स से डर कम है—कोलीन हूवर, मुराकामी, गीतांजलि श्री, फ़ैंटेसी ट्रिलॉजीज़ और फ़ैनफ़िक ऑथर्स एक ही शेल्फ़ पर साथ रह सकते हैं. उन्हें वे किताबें खींचती हैं, जो मेंटल हेल्थ, सेक्शुअलिटी, आइडेंटिटी, कास्ट-क्लास, डिस्टोपिया, रोमांस और रेज़िस्टेंस को जोड़कर बात करें. उनके लिए साहित्य सिलेबस नहीं, सांत्वना और रिप्रेज़ेंटेशन है.

पॉलिटिक्स में वे एपॉलिटिकल दिख सकते हैं, पर असल में हाइपर-पॉलिटिकल और हाइपर-डिसइल्यूज़न्ड हैं. सिस्टम उन्हें रिग्ड लगता है. करप्शन, नेपोटिज़्म, ओल्ड फ़ेसेज़ और ओल्ड स्लोगन्स पर डीप डिस्ट्रस्ट की वजह से. वे इश्यू-बेस्ड एक्टिविज़्म के क़रीब हैं—क्लाइमेट, फ़ीस, मेंटल हेल्थ, जेंडर जस्टिस, पैलेस्टाइन, रेशियल-कास्ट इनजस्टिस, इंटरनेट फ़्रीडम. स्ट्रीट प्रोटेस्ट, कैंपस मार्च और ऑनलाइन पिटीशन—सब मिलकर उनकी राजनीति बनती है. भीतर स्प्लिट भी है: कुछ बहुत प्रोग्रेसिव, कुछ कंज़र्वेटिव-पॉपुलिस्ट, और एक बड़ा हिस्सा सिर्फ़ “एंटी-हाइपोक्रेसी, एंटी-बुलशिट.” उनकी डिमांड सिंपल है: साफ़ भाषा, साफ़ काम, और फ़्यूचर जो सिर्फ़ स्पीचेज़ में न रहे.

नेशनलिज़्म के बारे में वे झंडा फहराने से नहीं डरते, पर ब्रेनवॉशिंग से डरते हैं. देश से प्यार—भाषा, खाना, म्यूज़िक, लोकल कल्चर, स्पोर्ट्स—जेनुइन प्राइड है. पर वह नेशनलिज़्म उन्हें अनकंफ़र्टेबल करता है जो सवाल पूछने पर ग़द्दार ठहरा दे, या दूसरों को नीचा दिखाकर ही ख़ुद को ऊँचा माने. वे ज़्यादा प्लैनेट-फ़र्स्ट और पीपल-फ़र्स्ट हैं—क्योंकि ग्लोबल प्रॉब्लम्स के सामने सिर्फ़ “मेरा देश सबसे बड़ा” काफ़ी नहीं. उनका वर्ज़न सीधा है: “हम अपने देश से प्यार करते हैं, पर उसके लिए दिमाग़ ऑफ़ नहीं करते.”

 

20.

भारतीय जेन ज़ी का आकर्षण फ्रेंच के लिए भी है. फ़्रेंच साहित्य अक्सर “विदेशी” नहीं, एक अलग तरह की आत्म-भाषा है. कभी इंस्टा-रील्स के कोट्स से, कभी किसी मित्र की रिकमंडेशन से, और कभी अकेलेपन के बीच अचानक खुली किसी किताब से. वे वहाँ “फ़्रेंच” खोजने नहीं जाते; वे वहाँ अपने ही सवालों का दूसरा उच्चारण खोजते हैं.

फ़्रेंच साहित्य की धारा एक अजीब, सुंदर विरोधाभास में बहती है, जहाँ एक ओर मासूमियत के भीतर छिपा दर्शन है और दूसरी ओर जीवन को हल्का करने की ईमानदार चाह. इसी धारा का सबसे चमकीला, सबसे सार्वभौमिक चेहरा है आंत्वान द सैंट-एक्ज़ुपेरी का ले पती प्रांस. एक ऐसी किताब जो बच्चों की आँखों से पढ़ी जाती है, पर बड़ों के हृदय में खुलती है. लगभग दो सौ मिलियन प्रतियों और छह सौ से अधिक भाषाओं व बोलियों में अनुवाद के साथ यह केवल फ़्रेंच साहित्य की नहीं, दुनिया की साझा स्मृति की किताब बन चुकी है. यह एक दार्शनिक फ़ेबल है, जो हमें याद दिलाती है कि सबसे ज़रूरी चीज़ें आँखों से नहीं दिखतीं और शायद इसी वजह से यह हर पीढ़ी में नई लगती है.

आज का फ़्रेंच पाठक इसी परंपरा से निकलकर दो समानांतर रास्तों पर चलता दिखाई देता है. एक ओर हैं वे उपन्यास, जो जीवन को ज़रा-सा थामकर, उसे फिर से जीने की प्रेरणा देते हैं; राफ़ाएल जियोर्दानो की ता दोज़ियेम वी कॉमांस कां तू कॉम्प्रां कि तू नॉं आ क्यून जैसी किताबें, जो फ़िक्शन और पर्सनल डेवलपमेंट के बीच पुल बनाती हैं. ये किताबें भारी नहीं होतीं, पर हल्की भी नहीं; वे पाठक से कहती हैं कि जीवन बदलने के लिए किसी चमत्कार की नहीं, समझ के एक छोटे से मोड़ की ज़रूरत होती है. उसी पंक्ति में आना गवाल्दा की अंसांब्ल, से तू रिश्तों और साथ होने की उस साधारण, पर दुर्लभ खुशी को पकड़ती है, जिसे आधुनिक जीवन अक्सर भुला देता है.

और इसी के साथ, फ़्रेंच साहित्य का दूसरा चेहरा और भी तीखा, और भी निरावरण है—आनी एर्नो की आत्म तत्व को उधेड़ने वाली ऑटोफ़िक्शन, लेइला स्लिमानी की जेंडर और सत्ता की बेचैनी और एदुआर लुई की वर्ग और प्रवास से उपजी कड़वी सच्चाइयाँ. ये किताबें पाठक को दिलासा नहीं देतीं, आईना थमा देती हैं. इतनी साफ़ सतह वाला कि उससे नज़र चुराना मुश्किल हो जाता है.

यही फ़्रेंच पढ़ने की ख़ासियत है: यहाँ एक ही समय में दर्शन और सुकून, चोट और मरहम, आत्म-सुधार और आत्म-स्वीकृति—सब साथ चलते हैं. एक ओर ले पती प्रांस की कोमल फुसफुसाहट है, दूसरी ओर समकालीन लेखकों की बेधड़क, असहज आवाज़. और शायद इसी संतुलन में फ़्रेंच साहित्य आज भी दुनिया को आकर्षित करता है—न बहुत भारी होकर, न बहुत हल्का बनकर, मनुष्य की पूरी जटिलता और संश्लिष्टता के साथ.

 

21.

जापानी साहित्य की किताबें भी पूरी गैलेक्सी की तरह फैलती हैं, जहाँ एक ओर हारुकी मुराकामी की अकेली, संगीत-सनी गलियाँ हैं और दूसरी ओर मंगा और लाइट नॉवेल्स का रंगीन, तीव्र और दृश्यात्मक ब्रह्मांड. हारुकी मुराकामी आज उस जापान का सबसे परिचित चेहरा हैं, जिसे दुनिया पढ़ती है. पचास से अधिक भाषाओं में अनूदित उनकी किताबें—नॉर्वेजियन वुड, काफ़्का ऑन द शोर, १क्यू८४—युवा पाठकों के लिए जापानी लिटरेचर में प्रवेश का लगभग स्वाभाविक द्वार बन चुकी हैं. इनमें अकेलापन किसी शोर की तरह नहीं, धीमी धुन की तरह बजता है; यथार्थ के भीतर से फिसलता हुआ सररियलिज़्म, पॉप म्यूज़िक, शहरी जीवन और स्मृति—सब एक ही वाक्य में साँस लेते हैं.

लेकिन जेन ज़ी की असली धड़कन वहाँ तेज़ होती है, जहाँ पन्ने चित्र बन जाते हैं. जापान में और पूरी दुनिया में मंगा आज भी मास रीडिंग का नाम है. वन पीस से लेकर डीमन स्लेयर, नारुतो, ड्रैगन बॉल, जुजुत्सु काइसेन, स्पाई एक्स फ़ैमिली, ब्लू लॉक, और माय हीरो अकादेमिया तक. अकेले वन पीस का पाँच सौ सोलह मिलियन से अधिक प्रतियों तक पहुँचना यह बताने के लिए काफ़ी है कि कहानी अब सिर्फ़ पढ़ी नहीं जाती—देखी, सुनी और महसूस की जाती है. लाइट नॉवेल्स—स्वॉर्ड आर्ट ऑनलाइन, री:ज़ीरो, दैट टाइम आई गॉट रीइन्कार्नेटेड ऐज़ अ स्लाइम—इसी प्रवाह को आगे बढ़ाती हैं. पहले ऐनिमे, फिर मंगा या लाइट नॉवेल—जापानी पढ़ने का यह क्रम बताता है कि आज की पढ़ाई आँख और मन, दोनों से होती है.

भारतीय जेन ज़ी में “मेमोयर्स ऑफ़ ए गीशा” भी बहुत पॉपुलर है. यह आर्थर गोल्डन का है, जिसमें जापान की गीशा संस्कृति को एक स्त्री की आत्मकथात्मक आवाज़ में पिरोया गया है. सौंदर्य, अनुशासन, इच्छा और मौन की परतों के साथ. इस अद्भुत कृति में गीशा की दुनिया केवल रेशम, संगीत और अनुष्ठानों की चमक नहीं है; उसके भीतर एक लम्बी, धीमी पीड़ा बहती है. यह पीड़ा उस देह की है, जिसे कम उम्र में अनुशासन में बाँध दिया गया, उस इच्छा की है, जिसे मुस्कान के पीछे छिपना पड़ा और उस आत्मा की है, जिसे हर दिन किसी और की नज़र से अपने मूल्य को समझना पड़ा. यहाँ उदासी शोर नहीं मचाती; वह कलाई की हल्की थरथराहट में, गर्दन के झुकाव में, और रात के अंत में अकेले कमरे की खामोशी में टिकती है. दर्द छटपटाहट बनकर उभरता है. भागने की नहीं, अपने ही भीतर कहीं सुरक्षित होने की चाह में. यही वह करुणा है, जो इस कथा को सुंदर होने के साथ-साथ असहनीय भी बनाती है. एक ऐसी स्त्री की कहानी, जो कला बनकर जीती है, और जीते-जी अपने आप से बिछड़ती जाती है.

कोरियन परिदृश्य में यह दृश्यात्मकता और भी स्पष्ट हो जाती है. वहाँ वेबटून्स ने स्क्रीन को ही किताब बना दिया है—वर्टिकल, फ़ोन-फ़्रेंडली, और सीधे जीवन की नसों पर उँगली रखने वाली. ट्रू ब्यूटी, स्वीट होम, ऑम्निसिएंट रीडर, सोलो लेवलिंग, द रीमैरिड एम्प्रेस—ये सिर्फ़ कॉमिक्स नहीं, एक पूरी वेबटून–ड्रामा पाइपलाइन हैं, जहाँ पढ़ना और देखना एक-दूसरे में घुल जाते हैं. और इसी के साथ कोरियन उपन्यासों की दूसरी धारा भी है—प्लीज़ लुक आफ़्टर मॉम जैसी किताबें, जो परिवार और प्रवास की चुप पीड़ा को सामने रखती हैं, और किम जियॉन्ग, बॉर्न 1982, जिसने रोज़मर्रा के सेक्सिज़्म को वैश्विक फ़ेमिनिस्ट बहस का केंद्र बना दिया.

 

२२.

इन सबके बीच, जब दुनिया को एक साथ, एक ही निगाह से देखा जाता है तो पढ़ने की आदतों में कुछ गहरे, साझा संकेत उभर आते हैं; जैसे अलग-अलग भाषाओं में लिखी किताबें भी किसी अदृश्य धारा में एक-दूसरे से जुड़ी हों. रोमांस और फ़ैंटेसी—विशेषकर वह “सैड गर्ल-हॉट गर्ल” साहित्य—बुकटॉक की तेज़ लहर पर सवार होकर भाषाओं की सीमाएँ पार कर रहा है. ऐसा नहीं कि फ़िनलैंड, कोरिया या भारत के युवा अपनी भाषाएँ भूल गए हों; वे उस भावनात्मक ताप की तलाश में हैं, जो इस समय उन्हें सबसे तीव्रता से छू रहा है; इसलिए वे स्थानीय शेल्फ़ छोड़कर सीधे इंग्लिश संस्करण उठा लेते हैं, जैसे दर्द और प्रेम की भाषा पहले ही तय हो चुकी हो.

उसी के समानांतर, सेल्फ़-हेल्प और साइकोलॉजी की किताबें—सैपियन्स, एटॉमिक हैबिट्स, फ़ोर्टी-एट लॉज़ ऑफ़ पावर—हर भाषा में अनूदित होकर एक ही बेचैनी का जवाब बनती जा रही हैं. ये किताबें अलग-अलग देशों में अलग नामों से पढ़ी जाती हैं, पर उनका आशय एक ही है. जीवन को समझने की जल्दी, अर्थ को पकड़ लेने की हड़बड़ी और भविष्य की अनिश्चितता से निपटने की किसी सरल विधि की चाह. और इसी समय, मंगा, वेबटून और ग्राफ़िक नॉवेल यह स्पष्ट कर रहे हैं कि पढ़ना अब केवल भारी-भरकम पाठ से गुजरने का नाम नहीं रहा; दृश्य, संवाद और गति भी अब उतने ही वैध रास्ते हैं जितना एक लंबा, गाढ़ा अनुच्छेद.

सबसे रोचक राजनीति अनुवाद की है—वह चुपचाप चलने वाली राजनीति, जो भाषाओं के बीच पुल बनाती है. जैसे ले पती प्रांस फ़्रेंच से निकलकर दुनिया की साझा स्मृति बन गया, वैसे ही मुराकामी जापानी से, किम जियॉन्ग, बॉर्न १९८२ और प्लीज़ लुक आफ़्टर मॉम कोरियन से, और टूम ऑव सैंड हिन्दी से बाहर निकलकर वैश्विक पाठकों के हाथों में पहुँचीं. ये किताबें अपने साथ केवल कथाएँ नहीं ले गईं, अपने समाजों की गंध, उनकी पीड़ाएँ और उनके सवाल भी ले गईं. इससे यह साफ़ हो जाता है कि आज “दुनिया की पसंदीदा किताबें” किसी एक भाषा की बपौती नहीं रहीं—वे बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक हैं और अनुवाद के रास्तों पर भटकते हुए, हर नई भाषा में अपनी एक नई ज़िंदगी खोज लेती हैं.

 

23.

हंगेरियन साहित्य को अगर इसी समय की वैश्विक अध्ययन के संदर्भ में देखें तो वह किसी अचानक उभरे ट्रेंड की तरह नहीं, एक धीमी, गहरी और असहज धारा की तरह सामने आता है. ऐसी धारा, जिसे हर साल नोबेल की चर्चाओं में बार-बार याद किया जाता है, मानो दुनिया खुद उससे पूछ रही हो कि अब सच को कहने की सबसे कठोर, साफ़गोई वाली और सबसे ईमानदार भाषा कौन-सी है.

हंगरी के लेखकों की दुनिया रोमांस या तसल्ली से शुरू नहीं होती; वह थकान, विघटन और नैतिक बेचैनी से खुलती है. लास्लो क्रास्नाहोरकै जैसे लेखक अपने लंबे, साँस रोक देने वाले वाक्यों में सभ्यता के टूटने की आवाज़ लिखते हैं. उनकी किताबों में समय आगे नहीं बढ़ता, वह घूमता है, फँसता है, और पाठक को भी अपने साथ उसी अँधेरे वृत्त में खींच लेता है. यह वह साहित्य है, जो पढ़ते समय सुख नहीं देता, पढ़ लेने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता. यही कारण रहा है कि उन्हें इस साल साहित्य का नोबेल मिला और वे जेन ज़ी के चहेते बन गए.

इसी परंपरा में इमरे केर्तेस का नाम आता है, जिन्होंने पहले ही यह दिखा दिया था कि हंगेरियन लेखन किस तरह इतिहास की सबसे अमानवीय त्रासदियों को बिना भावुकता, बिना शोर, लगभग ठंडी सटीकता के साथ दर्ज करता है. यहाँ पीड़ा किसी नारे की तरह नहीं आती; वह साधारण वाक्यों में, रोज़मर्रा की भाषा में, और इसी वजह से ज़्यादा असहनीय बनकर सामने आती है.

आज की वैश्विक जेन ज़ी की रीडिंग लिस्ट के संदर्भ में, हंगेरियन लेखक इसलिए महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं; क्योंकि वे सरल समाधान नहीं देते. वे न तो सेल्फ-हेल्प हैं, न ही फ़ील-गुड. वे उस दुनिया के लेखक हैं, जहाँ सिस्टम काम नहीं करता, ईश्वर चुप है और मनुष्य अपने नैतिक चुनावों के साथ अकेला छोड़ दिया गया है. यह वही बेचैनी है जिसे आज का युवा, अलग संदर्भों में, अलग भाषाओं में, लेकिन लगभग उसी तीव्रता से महसूस करता है.

अनुवाद के रास्ते हंगेरियन साहित्य अब सीमित भाषा का मामला नहीं रहा. वह अंग्रेज़ी, जर्मन और अन्य भाषाओं में पहुँचकर एक तरह का एंटी-एस्केपिज़्म बन गया है. ऐसी रीडिंग, जो भागने का रास्ता नहीं देती, ठहरने को मजबूर करती है. और शायद यही वजह है कि जब नोबेल की बात होती है तो हंगरी बार-बार याद आता है; क्योंकि यह साहित्य हमें याद दिलाता है कि दुनिया को समझने के लिए हमेशा आरामदायक कहानियों की ज़रूरत नहीं होती. कभी-कभी सबसे ज़रूरी किताबें वे होती हैं, जो हमें असहज कर देती हैं और उसी असहजता में मनुष्य होने की आख़िरी ईमानदारी बची रहती है. लेकिन यह सुखद है कि नई पीढ़ी को यह असहजता भा रही है.

 

२४.

दुनिया आज अलग-अलग भाषाओं में पढ़ रही है; लेकिन अगर ध्यान से देखें तो वैश्विक बुकशेल्फ़ पर कुछ साझा नसें साफ़ दिखाई देती हैं. भाषाएँ बदलती हैं. हिन्दी, उर्दू, बांग्ला, इंग्लिश, फ़्रेंच, स्पैनिश, जापानी, कोरियन, अरबी; पर पाठक का मन कई जगह एक ही धड़कन पर ठहर जाता है. कहीं गोदान और गुनाहों का देवता आज भी युवाओं के हाथों में हैं, तो उसी बैग में सैपियन्स और फ़ोर्टी-एट लॉज़ ऑफ़ पावर भी रखी जा रही हैं. प्रेमचन्द और धर्मवीर भारती के साथ राहत इन्दोरी, जौन एलिया और इंस्टाग्राम-रील्स से निकली मोटिवेशनल किताबें; सब एक ही समय में पढ़ी जा रही हैं. पढ़ना अब किसी एक परंपरा का अनुशासन नहीं, कई स्रोतों से एक साथ अर्थ खींचने की कोशिश है.

उर्दू की दुनिया में आज भी आग का दरिया, मंटों का पूरा साहित्य और उमराव जान अदा अपनी पूरी गरिमा के साथ मौजूद हैं. ऐसी किताबें, जो इतिहास, नैतिकता और स्त्री-अनुभव को समय से बाहर खड़ा कर देती हैं. इसी परंपरा में कई चाँद थे सरे आसमाँ भी है, जो भाषा की नफ़ासत और तहज़ीब की जटिलता को एक विस्तृत, लगभग शास्त्रीय विस्तार देता है. लेकिन इसी उर्दू संसार के भीतर एक दूसरा, तेज़ और ज़्यादा घूमता हुआ प्रवाह भी है. उमे़रा अहमद की पीर-ए-कामिल और निमरा अहमद की नमल अब अलमारी में कम, मोबाइल की स्क्रीन पर ज़्यादा पाई जाती हैं. पीडीएफ़ फ़ाइलों की तरह, व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड्स की तरह, देर रात पढ़ी जाने वाली गुप्त किताबों की तरह. यह वह उर्दू है जो अध्यात्म, रोमांस और नैतिक द्वंद्व को एक साथ परोसती है, और जिसे युवा पाठक अपने अकेलेपन में, बिना किसी औपचारिक अनुमति के पढ़ते हैं.

और इन दोनों धाराओं के बीच, उर्दू शायरी अब भी साँस लेती है—फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की पंक्तियाँ आज भी प्रतिरोध और प्रेम दोनों की भाषा हैं, और परवीन शाकिर की नाज़ुक, आत्मीय आवाज़ आज की स्त्री-संवेदना को सीधे छूती है. उनकी शायरी इंस्टाग्राम कैप्शन में, स्टोरीज़ में, और निजी डायरी के पन्नों पर लौट-लौट आती है—जैसे उर्दू अब सिर्फ़ पढ़ी नहीं जाती, जानी जाती है.

यानी उर्दू साहित्य आज एक साथ कई समयों में जी रहा है—क्लासिक उपन्यासों की गहराई में, समकालीन लोकप्रिय फ़िक्शन की तेज़ रफ़्तार में, और शायरी की उस धीमी आँच में, जो हर पीढ़ी को फिर से अपना बना लेती है.

बांग्ला में पाथेर पांचाली, देवदास और टैगोर के साथ ब्योमकेश और फेलुदा भी चलते रहते हैं, और वहीं युवा पाठक इंग्लिश बुकटॉक की किताबें मूल भाषा में पढ़ने से नहीं हिचकते. क्लासिक और समकालीन, स्थानीय और वैश्विक—ये अब अलग-अलग खाने नहीं रहे.

स्पैनिश में डॉन क्विक्सोटे और सिएन आन्योस दे सोलेदाद के साथ नए अपराध-उपन्यास और मनोवैज्ञानिक थ्रिलर हैं. पुर्तगाली में द अलकेमिस्ट आज भी एक वैश्विक आध्यात्मिक रूपक की तरह पढ़ा जाता है और ब्राज़ील में आना मारिया गोंसाल्वेस इतिहास को नए नैतिक कोण से देखती हैं.

जर्मन साहित्य में थॉमस मान और गुंटर ग्रास के साथ स्टीफ़न किंग जैसे अनूदित लेखक बराबरी से बिकते हैं. रूसी में तोल्स्तॉय और दोस्तोएव्स्की आज भी केंद्रीय हैं, लेकिन मेट्रो 2033 जैसी डिस्टोपियन दुनिया नए पाठकों को खींचती है. तुर्की में ओरहान पामुक और एलिफ़ शाफ़क ने शहर, इतिहास और प्रेम को वैश्विक संवाद का हिस्सा बना दिया है.

अरबी में नगीब महफ़ूज़ और तैयब सालेह की परंपरा अब भी ज़िंदा है; लेकिन द याकूबियन बिल्डिंग और फ़्रेंकस्टाइन इन बग़दाद जैसे उपन्यास आज की राजनीति और भय को सीधे छूते हैं. फ़ारसी में शाहनामा, द ब्लाइंड आउल और पर्सेपोलिस—तीन अलग युग, तीन अलग स्वर—एक साथ पढ़े जा रहे हैं. चीनी में क्लासिक चार महान उपन्यास अपनी जगह हैं, लेकिन ऑनलाइन वेबनॉवेल्स ने पढ़ने की परिभाषा ही बदल दी है.

अफ़्रीका में थिंग्स फ़ॉल अपार्ट अब भी प्रवेश-द्वार है, लेकिन आज अदिची, अब्दुलरज़ाक़ गुरनाह और त्सित्सी दांगरेंब्गा जैसे लेखक प्रवास, जलवायु, तानाशाही और पहचान की नई कहानियाँ लिख रहे हैं. लागोस में 431 घंटे का रीड-अलाउड मैराथन इस बात का संकेत है कि पढ़ना अब भी सामूहिक उत्सव बन सकता है.

 

२५.

इस पूरी तस्वीर को अगर एक साँस में, बिना ठहराव के, उस बेचैन धैर्य के साथ देखा जाए; जिसमें वाक्य चलते जाते हैं और अर्थ पीछे-पीछे घिसटता आता है तो धीरे-धीरे यह साफ़ होने लगता है कि दुनिया अब पढ़ने के पुराने खाँचों में लौट नहीं सकती; क्योंकि वह न तो “कठिन” के नाम पर खुद को दंडित करना चाहती है और न “सरल” के बहाने खुद से झूठ बोलना, वह ऐसी किताबों की ओर झुक गई है जो उसे उसी अवस्था में पकड़ सकें जिसमें वह पहले से मौजूद है: थकी हुई, संदिग्ध, अधूरी और फिर भी आश्चर्यजनक रूप से जाग्रत.

आज का पाठक—जिसे हम सुविधा से जेन ज़ी कहते हैं—कहानी इसलिए नहीं चाहता कि वह किसी दूसरी दुनिया में भाग जाए, इसलिए कि इस दुनिया में टिके रहने का कोई अस्थायी ढाँचा मिल सके; वह किताब से सहारा माँगता है, समाधान नहीं, और अर्थ की तलाश करता है, सिद्धांत की नहीं—ऐसा अर्थ जो अलग-अलग भाषाओं, भूगोलों और इतिहासों से गुजरकर भी उसी अकेलेपन को पहचान ले जो रात के किसी एक बजे, किसी एक कमरे में, किसी एक स्क्रीन के सामने बैठा पाठक महसूस कर रहा होता है. इसीलिए आज एक ही मनःस्थिति में अलग-अलग समय और भाषाएँ एक-दूसरे से टकराती हैं, और टकराकर टूटती नहीं, एक अजीब, असहज संगति बना लेती हैं.

किताबें अब राष्ट्रों की सीमाओं से नहीं चलतीं, न ही पुरस्कारों या पाठ्यक्रमों की अनुमति से; वे उस बेचैनी के संकेतों पर चलती हैं, जो पाठक के भीतर पहले से मौजूद होती है. अनुवाद अब केवल भाषा बदलने की प्रक्रिया नहीं रह गया है—वह एक जोखिम है, एक लंबी छलांग, जिसमें कोई कथा यह नहीं जानती कि दूसरी भाषा में वह बचेगी भी या नहीं और फिर भी वह छलांग लगाती है; क्योंकि न लगाना उससे बड़ा नुकसान होता. और इस पूरी आवाजाही में, पढ़ना किसी क्रमिक प्रगति का नाम नहीं, बल्कि एक तरह का चक्कर बन जाता है—उसी प्रश्न के चारों ओर, जो हर किताब अलग शब्दों में पूछती है और कभी पूरा नहीं करती.

यहीं, अंत में, यह एहसास एक विकल बेचैन स्वीकृति की तरह आता है कि जेन ज़ी किताबें इसलिए नहीं पढ़ रही कि दुनिया को समझ ले; क्योंकि दुनिया शायद समझी ही नहीं जा सकती, इसलिए पढ़ रही है कि इस दुनिया के भीतर रहते हुए वह अपने भीतर के विघटन को पूरी तरह बिखरने से रोक सके; और कोई आख़िरी, असुविधाजनक, लगभग असहनीय सच है तो शायद वही है कि आज पढ़ना ज्ञान का नहीं, बचे रहने का सबसे शांत, सबसे लंबा और सबसे ज़िद्दी तरीक़ा बन चुका है.

इस पीढ़ी की कोशिश है कि वह आज की आबोहवा में नश्तर लगाए बिना अपनी सुनहरी शामों को सुबह के एक दरिया में बदलकर जीवन का कोई अनूठा अद्यतन राग बना ले. पढ़-पढ़कर अपने भीतर कुछ गढ़ चुकी इस पीढ़ी ने वर्जित को भी अर्जित किया है. मुखर प्रेम में पगी इस पीढ़ी का हृदय इतना जगा हुआ है कि यह रात के पात जलाकर नया प्रभात समय के रथ पर रखकर जैसे अपनी मुक्ति के द्वार खोल चुकी है. इस पीढ़ी के लिए किताब की एक आब भी है और उल्लसित उम्मीदों का आबशार भी.

 

भारत–पाक सीमा के एक गाँव में जन्मे त्रिभुवन जयपुर में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. वे हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एडजंक्ट प्रोफेसर रह चुके हैं. उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं, “कुछ इस तरह आना,” “शूद्र: एक लंबी कविता,” और “राष्ट्रवाद के नवपरिप्रेक्ष्य .” त्रिभुवन अपने सूक्ष्म राजनीतिक विश्लेषण, संयमित भाषा और गहन पठनशीलता के लिए जाने जाते हैं. जयपुर में रहते हैं.

thetribhuvan@gmail.com

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Comments 29

  1. Ashutosh Kumar says:
    2 months ago

    मेहनत, धीरज और गहरी समझदारी के साथ लिखा गया एक मूल्यवान लेख।

    Reply
  2. Sarang Upadhyay says:
    2 months ago

    यथार्थ से पार का लेख? जेन जी को क्या वाकई में ऐसे समझा जाए?

    Reply
  3. Anonymous says:
    2 months ago

    सुगठित लेख बताता है कि जेन ज़ी, अधिक सतर्क, भविष्य को लेकर चौकन्ने और जीवन के प्रति,पुरानी पीढ़ी से अधिक उतावले होने के बावजूद गम्भीर दृष्टिकोण रखते हैं। उनकी समझ विकसित है, व्यापक है।

    Reply
  4. विष्णु नागर says:
    2 months ago

    बढ़िया लिखा गया है। त्रिभुवन जी ने जेन जी के बारे में नई दृष्टि दी। उन्हें और समालोचन को धन्यवाद।

    Reply
  5. विनय कुमार says:
    2 months ago

    पढ़नेवाले जेन ज़ी के बारे में बहुत कुछ !
    कमाल की भाषा और प्रवाह भी ख़ूब ।
    दुर्भाग्य कि जेन ज़ी का अधिकांश रील-ग्रस्त !

    Reply
  6. पंकज मित्र says:
    2 months ago

    जेन जी के मानस, उनकी पढ़ने की आदतें और उनके संसार को खोलने वाला सुचिंतित और दृष्टिसंपन्न आलेख। त्रिभुवन जी और समालोचन का आभार

    Reply
  7. नथमल शर्मा says:
    2 months ago

    सुचिंतित लेख । एक ताज़ी हवा के झोंके सा । कितना कुछ समेट लिया आपने ।
    कितनी सही बात- ये (जेन जी ) किसी एक मंत्र को जीवन से बाँध नहीं लेते ।
    यही इन्हें सबसे अलग बनाता है । जेन जी के बारे में धारणा तोड़ता और नई अवधारणा रचता लेख । वाह ।

    Reply
  8. चंद्रशेखर प्रसाद साहु says:
    2 months ago

    जेन जी को उनके बारे में आधुनिक सन्दर्भ में समझने में यह विस्तृत आलेख सहायक है। परंतु जेन जी के जिन आधुनिक दृष्टिकोणों का उल्लेख किया गया है, वास्तव में ऐसे दृष्टिकोणों से कितने युवा सरोकार रख रहे हैं। कतिपय युवा ही साहित्य, समाज, सौंदर्य बोध व रचनाशीलता को लेकर गम्भीर हैं और इस दिशा में अध्ययनशील हैं। वैसे युवाओं की तादाद अधिक है जो निम्न स्तर के रिल्स और शॉर्ट्स बना रहे हैं और देख रहे हैं। फिर भी जेन जी का अपना एक मिज़ाज है जिसे हमें गम्भीरता से समझने की जरूरत है। आज के युग का वही सही मायने में संवाहक हैं।

    Reply
  9. Rubel M says:
    2 months ago

    यह आलेख बहुत दिलचस्प तरीके से नई पीढ़ी के प्रति हमारी समझ बढ़ाता है।
    लेकिन पीढ़ियों को जिस तरह से परिभाषित किया जाता रहा है उस ऑब्जेक्टिव विश्लेषण की अपनी सीमाएं होती हैं। पीढ़ियों के वर्गीकरण में बहुत ही सामान्य आधार को समझकर (जहां उनके पैदा होने वाले समय को मुख्य मानकर ) बाकि आर्थिक,सामाजिक,राजनीतिक बिन्दुओं को नजरअंदाज किया जाता है।इस तरह के सामान्यीकरण करते हुए मान लिया जाने लगता है कि जो हमें दिख रहा है और जो हमारी सीमाओं के भीतर है वही पीढ़ी का मुख्य रूप है।
    हालांकि यह अपने आप में विज्ञान का प्रश्न है,जहां पीढ़ियों के किसी भी वर्गीकरण को स्थाई नहीं माना जाता है, इसीलिए सिर्फ सामान्य गुणों के आधार पर किसी एक पीढ़ी की पसंद एक छोटे से समूह की पसंद हो सकती है उसका एकीकरण करना थोड़ा मुश्किल क्षेत्र है।

    Reply
  10. राजेश जोशी says:
    2 months ago

    उन्होंने नई पीढ़ी के उन अंदरूनी कोनों तक पहुँचने की कोशिश की है जहाँ पहुँच बग़ैर उसे समझ पाना असंभव है। इस आलेख को ज़्यादा से ज़्यादा नौजवानों तक पहुंचाया जाना चाहिए।

    Reply
  11. Garima Srivastava says:
    2 months ago

    आलेख बहुत परिश्रम से लिखा गया है।पर ज़ेन जी सिर्फ़ पढ़ती नहीं उसकी दुविधाएँ,समस्याएँ और भी हैं।एकल परिवारों और माइक्रोफैमिली के ताने -बाने ने ज़ेन ज़ी का संसार निर्मित किया है।और भी बहुत सारे मुद्दे हो सकते हैं।यह बहुत अच्छा है कि लेखक को इस पीढ़ी की सकारात्मकता की तारीफ़ करनी आती है।
    एक समृद्ध और ज्ञानवर्धक आलेख के लिए त्रिभुवन जी और समालोचन का आभार।

    Reply
  12. Rakesh Prasad says:
    2 months ago

    लेख पढ़ते-पढ़ते मुझे अपने gen z बच्चों की बेबाक जिंदगी आँखों के सामने गुजरती रही ।उनके स्टडी टेबल पर करीने से सजती नॉवेल जिसमें कई नाम तो लेख में भी है। त्रिभुवन जी के गहन विश्लेषण , gen z से आत्मिक जुड़ाव और उत्कृष्ट लेखन शैली की गहराई का मंत्रमुग्ध कर देने वाला सफर रहा।
    साधुवाद।

    Reply
  13. डॉ. सुमीता says:
    2 months ago

    जेन ज़ी की ही भाषा-प्रवाह में लयबद्ध सुविचारित और सुविस्तारित यह महत्वपूर्ण आलेख निश्चित ही उन्हें समझने की कुंजी है। ऐसा मैं एक जेन ज़ी के अभिभावक के तौर पर अपनी निजी समझ के आधार पर भी कह रही हूँ। इस आलेख के लिए त्रिभुवन जी और समालोचन को हार्दिक धन्यवाद।

    Reply
  14. ज्योतिष जोशी says:
    2 months ago

    जेन ज़ी पर त्रिभुवन जी का सुविचारित और सुचिंतित आलेख पढ़ा. जेन ज़ी को लेकर जो भ्रान्तियाँ हैं और उनकी अराजकता,दिशाहीनता को लेकर शिकायतें, उसे काफ़ी हद तक उन्होंने वैश्विक संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया है. 1997 से 2012 तक जन्मी पीढ़ी के समेकित व्यवहार और आकांक्षाओं को भी उन्होंने बारीकी से समझाया है, लेकिन इस पीढ़ी की वास्तविक परीक्षा अब होनी है,जब भारत ही नहीं, संसार भर में विपर्यय ही मूल्य बन गए हैं. यूरोप और अमेरिका की नई पीढ़ी तो ने तो अपनी अराजकता और अयोग्यता को जाने कितनी बार प्रमाणित किया है. भारतीय युवा संसार भर को जानें और प्रश्न करने की आकुलता से भरे हुए हों, यह भी ठीक है, पर स्वतन्त्रता के पूर्व और बाद की पीढ़ी को जिस विश्वसनीय पीढ़ी का दर्ज़ा स्वयं त्रिभुवन जी ने इस लेख में दिया है, क्या वह विश्वसनीयता इस उद्याम आवेग से भरी पीढ़ी में दिखती है? और क्या अपने को जाने,पहचाने और अपनी विरासत को बिना समझे, इसे उपलब्ध भी किया जा सकता है? यह प्रश्न हैं जो हर सचेत व्यक्ति नई पीढ़ी से पूछना चाहता है.

    यह चिन्ता स्वयं त्रिभुवन जी की भी हो सकती है. आलेख निश्चित ही बेहद सधा और मानीखेज है जो इन प्रश्नों को उठा पाने की तजबीज भी देता है. समालोचन को इस लेख के लिए बधाई. 💐

    Reply
  15. Anup SETHI says:
    2 months ago

    जेन जी के बारे में विस्तृत जानकारी मिली। लेख की भाषा बड़ी आकर्षक है।

    Reply
  16. विपिन शर्मा says:
    2 months ago

    बहुत महत्वपूर्ण लेख. आधुनिक समाज विज्ञान की दृष्टि से भी इस लेख को देखे जाने की आवश्यकता है. जेन –जी पीढ़ी पर इन दिनों बाद तो काफी की गई. जन आंदोलन के संदर्भ में विशेष रूप से नेपाल के संदर्भ में. इस पीढ़ी की दृष्टि और जीवन को समझने के लिए यह लेख हमें प्रेरित करता है. बहुत सारी किताबों के संदर्भ इसको मूल्यवान बनाते हैं. आज का युवा भी किताबों से उतना ही प्रेम करता है; जितनी हमारी पीढ़ी अथवा उससे पूर्व पीढ़ी, बस बात इतनी सी है शब्दों को महसूस करने के माध्यम बदल गए हैं. आज सुनना ज्यादा पसंद किया जा रहा है पढ़ने से.
    लेख को पढ़ने में आनंद आया. आधुनिक समाज और हमारे युवा वर्ग को समझने के लिए यह लेख महत्वपूर्ण है.
    त्रिभुवन सर को बहुत-बहुत बधाई.

    Reply
  17. रुस्तम सिंह says:
    2 months ago

    यदि कुल मिलाकर बात करें और ज़रा सामान्यीकरण करें, तो जेन-ज़ी अपने राजनीतिक झुकाव में उदारवादी है, जलवायु संकट को लेकर चिन्तित है, यह मानती है कि जलवायु संकट के लिए ख़ुद मनुष्य ज़िम्मेदार हैं तथा महिलाओं और LGBTQ के अधिकारों को लेकर चैतन्य है। लेकिन वह समानता जैसी अवधारणाओं के प्रति उदासीन है।

    यदि भारत जैसे देशों की बात करें तो ये बातें केवल ऊपरी और ऊपरी-मध्य वर्गों की जेन-ज़ी पर ही लागू होती हैं। जहाँ तक निम्न मध्य और श्रर्मिक वर्गों की जेन-ज़ी का प्रश्न है, तो कुल मिलाकर वह राष्ट्रवादी है, यहाँ तक कि उसका झुकाव फासीवाद और दक्षिणपंथ की तरफ़ ज़्यादा है, और वह जलवायु संकट, महिला अधिकारों और LGBTQ के अधिकारों के प्रति उदासीन है।

    Reply
  18. प्रबोध गोविल says:
    2 months ago

    आलेख मात्र एक सवाल ही नहीं रह गया बल्कि सवालों को एक गुलदस्ते की तरह हथेलियों में थाम कर त्रिभुवन ने एक – एक पत्ती के साथ मुठभेड़ की है। युवाओं के पथरीले से वजूद में वो पानी की बूंदें लेकर कोमल प्रहार की शैली अपनाते हैं और अंतः वो निकाल लाते हैं जिसके लिए गए थे।
    वैश्विक साहित्य उनके मक़सद को पीने के लिए किसी सीप सा खुलता है। बेहद अच्छा आलेख।

    Reply
  19. जीवन सिंह says:
    2 months ago

    जेन जी के बारे में विस्तृत, गंभीर और महत्वपूर्ण जानकारियों से भरा आलेख।इसकी अंतर्वस्तु से लगाकर इसकी भाषा तक में एक सम्मोहनकारी लय है। बधाई त्रिभुवन जी व समालोचन दोनों को।

    Reply
  20. राजाराम भादू says:
    2 months ago

    यद्यपि हर दौर की युवा पीढ़ी में कुछ खास रुझान होते हैं, शायद वही पीढीगत अंतराल पैदा करते हैं। फिर भी समूची किसी पीढी का सामान्यीकरण नहीं किया जा सकता। त्रिभुवन जिस वर्गीय और सांस्कृतिक तबके के युवाओं की बात कर रहे हैं, वह कुल युवाओं का एक बहुत छोटा हिस्सा है। उसके बड़े हिस्से की दुनिया को हम नहीं जानते।
    सीएए- एनआरसी विरोधी आंदोलन में हमने देश की सबसे ऊर्जस्व और सृजनात्मक युवाओं को देखा था। लेकिन सत्ता ने उन्हें क्रूरता से दीवारों के पीछे धकेल दिया। उसके बाद भारतीय युवाओं में वैसी मुखरता अभी तक नहीं दिखी है।
    लेख में दोहराव भी है।

    Reply
  21. सिद्धेश्वर सिंह says:
    2 months ago

    1.पहली निगाह में यह लेख अपने टॉपिक / शीर्षक से ध्यान खींचने वाला है क्योंकि हमारी हिंदी में पठनीयताजैसे विषय पर बहुत कम साहित्यालोचन है।एक तरह से हम हिंदी वाले साहित्य विमर्श की एक इकहरी दीठ के लगभग अभ्यस्त हैं।इसलिए यह नया (हिंदी में नया!) टॉपिक उत्सुकता जगाता है।

    2.इसका कंटेंट एक तरह का सर्वे जैसा कुछ है – पर्सनल ऑब्जर्वेशन और प्रोफेशनल मोड पर भी लेकिन इतना तो अवश्य है कि यह (हिंदी के हिसाब से) न तो साहित्यिक है और न ही एकेडेमिक। मुझे पता नहीं के की इसका सैम्पल साइज क्या रहा होगा !

    3.मुझे बार – बार लगता है कि हंडी में युवा अध्येता भी पुराने खेवे के हरबे – हथियारों से लैस दिखते हैं – विषय चयन व विमर्श में भी ; ऐसे में यह लेख एक सीमा तक राह सुझाने वाला हो सकता कि ‘कैसे लिखें’।

    4. लेखक व संपादक को इस उम्दा लेख के लिए बधाई।

    5 अभी परसों की बात है चिकित्सा विज्ञान की एक क्लिनिकल शाखा में पीजी कर रही एक युवा ने पूछा कि आसपास जो लोग कभी लिट्रेरी टेस्ट के नहीं दिखे थे कभी अब वे भी विनोद कुमार शुक्लके देहांत के बाद उनकी कविताओं और गद्यके ‘कोट्स’ के कंटेंट्स शेयर कर रहे हैं ; ऐसा क्यों? क्या यह ‘ट्रेंडिंग’ है? क्या लिट्रेचर में पहले भी ऐसा रहा है या यह मीडिया प्रेजेंस की ‘अर्ज’ की वजह से है?
    (इस बारे में हमारा लम्बा टेली – संवाद हुआ)

    6. आज इस लेख को एक जेन -जी इंजीनियर को भेजा जो कि ‘कीन – रीडर’ है।तो उसका जवाब था – ‘जेन जी खुद जेन – जी से परेशान है’

    Reply
  22. डॉ स्मृति चौधरी says:
    2 months ago

    बहुत ही सटीक और सत्य कहा वर्तमान का सबसे चर्चित विषय पर लिखा गया यह आलेख बहुत ही सुंदर एवं सुलभ भाषा में अपने विचारों को दर्शाता है। साहित्य में एक नया विषय हमेशा चर्चा में रहना चाहिए क्योंकि लेखक का काम है समाज में हो रही उथल-पुथल को अपने शब्दों के माध्यम से समाज को जागृत करें यह आलेख इस और इंगित करता है।

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  23. कुमार अम्‍बुज says:
    2 months ago

    यह विस्‍तृत आलेख बहुआयामी ढंग से एक ऐसे विषय को प्रकाशित कर रहा है जो किंचित धुंध में लिपटा हुआ सा लगता है यानी ‘साहित्यिक परिप्रेक्ष्‍य में जेन-जी’। साहित्य पठनशीलता का विषय इस आलेख की ताक़त और सीमा है। यह सर्वे और आकलन का मिश्रित स्‍वरूप है। जिसमें आकांक्षा और सुविचारित अनुमान को भी कुछ ‘स्‍पेस’ मिल गया है। ज़ाहिर है यह ‘सब कुछ’ को नहीं समेट सकता बावजूद इसके कि इसमें बहुत कुछ है। जेन-जी में पढ़ने के तरीकों ने, तकनीक और ऐप संस्‍कृति ने, एक बड़ा पैराडाइम शिफ्ट कर दिया है। यह इसी का यह एक विस्‍तृत, विचारोत्‍तेजक, दिलचस्‍प विवेचन है। यह एक अपूर्व प्रयास है।

    संदर्भ बहुलता ने मुझे विस्मित और आश्‍वस्‍त किया। उन अनगिन किताबों, चीज़ों की तरफ़ ध्‍यानाकर्षण किया, जिनसे मैं अनभिज्ञ था अपना मुँह फेरे हुए था। जेन-जी की मुश्किलों और कमियों की तरफ़ भी इशारे हैं। ‘अभी तय नहीं केवल लय है।‘ ‘छंद नहीं फ्री वर्स है।‘- जैसे वाक्‍य और नौकरी, ईएमआई की चिंता के साथ लैंगिकता, जलवायु, राजनीति आदि पर जेन-जी के विचार या संशय या दृष्टिकोण का यथास्‍थान विवरण इस लेख को अनेक आयामों तक ले जाता है। काग़ज़ नहीं, अब स्‍क्रीन है। किताबों तक पहुँचने की अनेक राहें हैं, वातायन, झरोखे और दरवाज़े हैं। एक चौपाल है, चौराहे हैं जहाँ से अनेक रास्‍ते फूटते हैं। इसमें जेन-जी की भाषा और प्रचलित पदों का ख़ासा उपयोग है। भाषा एक प्रवाह की तरह है। कोई सोता खुल गया है और झरना बह निकला है।

    यदि यह सर्वे है तो इसकी सीमाएँ हो सकती हैं लेकिन यह नवाचारी काम भी है। स्‍पष्‍ट है कि उस जेन-जी का ही समावेश है जो पढ़ने-लिखनेवाला, शिक्षित वर्ग का प्रतिनिधित्‍व करता है। यह एक सीमित ‘सेम्‍पल’ है लेकिन यह एक दिशा को प्रकाशित करता है। आशा है इस विषय पर और भी लेख आगे संभव होंगे। इस तरह के प्रकाशनों के अर्थ की अपनी एक रोशनी है जो अनछुए विषयों ‍के लिए प्रेरित कर सकती है। निबंध के लिए त्रिभुवन जी को बधाई। ‘समालोचन’ पर यह सब बीच-बीच में घटित होता रहता है। अरुण देव को भी बधाई।

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  24. डाॅ सच्चिदानन्द देव पाण्डेय says:
    2 months ago

    जेन ज़ी के बारे में इतनी कोमलता और आत्मीय संवेदना से युक्त लेख पहली बार पढ़ रहा हूँ। लेखक ने जेन ज़ी पीढ़ी के भीतरी हृदयाकाश में बहुत विस्तार से मुक्त उड़ान भरी है और बहुत गहराई तक जाकर उसकी थाह पाने की कोशिश की है। इतने संदर्भों ,संस्मरणों और युक्तियुक्त तर्को के सहारे जो समझाना चाहा है वह बहुत अनूठा बन पड़ा है।बहुत अच्छा लगा ।युवाओं को प्यार भरी दृष्टि और सहयोगी भावना से देखने की जरुरत है। वे बहुमार्गी और बहुआयामी दुनिया के जीव हैं और इसलिए पुरानी पीढ़ी से अधिक संभावनाशील भी हैं।यही उनको देखने समझने का सही नजरिया है।

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  25. Chandan Gupta says:
    2 months ago

    हमें नई पीढ़ी को पुराने पैमानों से नहीं आंकना चाहिए,
    पढ़ने-समझने के तरीके समय के साथ बदलते रहते हैं, खत्म नहीं होते।
    हमारे अन्दर सवाल बहुत है और जानने की बेचैनी भी, सच में आज के यूवा कमजोर नही हैं बस उन्हें मौका मिलना चाहिए
    संवाद और सीखने का भाव ही पीढ़ियों को जोड़ता है, जैसे मै आपसे जुड़ा और आपके लगभग सारी लेख मैं पढ़ चुका हूँ |
    और मैं एक लेखक की दूरदृष्टि को समझना और आत्मसात करने की कोशिश करता हूँ ,

    Reply
  26. Chandan Gupta says:
    2 months ago

    बहुत ही सुन्दर लेख

    Reply
  27. Amitabh Mishra says:
    2 months ago

    बहुत मेहनत से लिखा गया लेख।
    इस नई पीढ़ी की अध्ययनशीलता और किताबें पढ़ने की आदत चमत्कृत करती है। पर सोचने लायक बात यह भी है कि वही ज़ेन जी ज्यादा यथास्थितिवादी क्यों है । पर्यावरण की चिंता करते हुए वह इंसानी चिंताओं से परे क्यों है। साम्प्रदायिक और ज्यादा रूढ़िवादी क्यों है। प्रतिरोध क्यों कम होता जा रहा है।

    Reply
  28. दिवा भट्ट says:
    1 month ago

    अभिभूत करने वाला लेख है। पिछली पीढ़ियों को जेन जी॰ को समझने की दृष्टि देता है। लेखक का विश्व साहित्य का ज्ञान चकित करता है। इतनी सारी खिड़कियां एक साथ खोल कर उनकी झलक दिखाता हुआ आज के समय को समझने की तमीज सिखाता है। इसे समझने के लिए किसी एक ही भाषा – साहित्य का अध्ययन पर्याप्त नहीं है। स्वयं अलग -अलग होते हुए भी संवेदना सबकी एक ही दिशा की ओर इंगित करती है।
    विस्तृत अध्ययन के साथ भाषा की काव्यमय प्रवाह शीलता बहुत प्रभावित करती है।
    धन्यवाद।

    Reply
  29. नीलाम्बुज सरोज says:
    2 weeks ago

    इस लेख के निष्कर्ष महानगरीय शहराती युवाओं पर शायद लागू हो जाएं, कस्बाई या ग्रामीण युवक , युवतियों पर नहीं हो सकते। कस्बाई या ग्रामीण युवक युवतियों में साहित्य के नाम पर आज भी स्टेशन के व्हीलर या ऐसी ही पुस्तक केंद्रों पर रखी कुछ चुनिंदा किताबें आकर्षण हैं। कभी कभी पत्रिकाएं भी। प्रेमचंद और हरिवंश राय बच्चन, दिनकर, कबीर के पद, लोलिता निश्चित रूप से जेन ज़ी की हिंदी साहित्यिक पठनीयता के हिस्से हैं। कभी कभी दिव्य प्रकाश दुबे और सत्य व्यास भी। ,रील आदि लगातार देखने के प्रभाव से वो वि कु शुक्ल, केदारनाथ सिंह, निर्मल वर्मा आदि का नाम अवश्य जानते हैं। अंग्रेजी में भी वही अमीश त्रिपाठी, अश्विन संघी, डैन ब्राउन जैसे चंद लेखक। अखबार पढ़ना इस पीढ़ी में निस्संदेह कम हुआ है। यूट्यूब देखना बढ़ा है।

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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