विनोद कुमार शुक्ल की पहली प्रकाशित कविताएँ
प्रस्तुति : मनोज मोहन

१.
मेरा अँधेरा
कोई भटककर
आयी किरण
मेरे चारों ओर के
अँधेरे को
छेदने का प्रयत्न करे
तो मैं यह नहीं चाहता.
मैं तो चाहता हूँ
कि मेरा अंधेरा
किरणों को भटकने न दे
२.
उदरस्थ
मेरे पेट में मेरा
दिमाग.
मेरे पेट में
अकेला मैं
गर्भस्थ.
अपने पेट में
अपनी ही जूठन खाकर
बढ़ रहा हूँ
मैं
मैं.
पेंसिल की
नोक चबाकर
पेट भर सोचता हूँ.
मेरे पेट में
मेरा दिमाग़
बगीचे सा खिला हुआ है.
३.
वासना
टूटा हुआ कँटीला अहाता
और अहाते के बाहर
निकला हुआ संपूर्ण बगीचा—
अस्त-व्यस्त झाड़ियों में
खिले हुए लाल-लाल फूल
मुझे याद आता है तुम्हारा
वह वहशी जंगली रूप.
४.
एक प्रेम-कविता
लिखने के उपरांत
मन में उठे हुए भाव—
बनाया हवादार मकान
उस मसान में
जहाँ मैं मर गया था,
और खुली आँखों से
खिड़कियों की राह
हर साँझ को सूँघता हूँ
अहाते में (जिसके नीचे
दबा हुआ है मेरा मसान)
फिर मेरी ही खाद से
उगी हुई
मेहँदी की उड़ी-उड़ी
लाल खुशबू!
खुलकर जीने के लिए
तबीयत होती है
एक बार और मरा जाए.
५.
चारों तरफ़ और मैं
मैं अपने घर में तटस्थ
मेरी दृष्टि बरसाती कोट ओढ़कर
देखती है
संघर्ष की बाढ़ चारों तरफ़—
कीचड़ में व्यस्त सड़क,
टूटते वृक्ष,
भीगते हुए खड़े घर.
इन सबसे कितना ओछा है—
आँखों का डबडबा जाना,
मेरा टूटना
और दृष्टि का भीग जाना.

६.
इच्छा
बाज़ार की सड़क
व्यस्त आदमी
और उसके दोनों हाथों
गंदा झोला
कहीं फटा
एक ख़ाली
और दूसरा भरा
जिसके अन्दर
आलू, भाजी,
गरम मसाले की पुड़िया
और मिर्चा
लाल या हरा. काश! मैं—
दस रुपए का नोट बनकर
उसकी झोली में
पनाह पाता.
७.
औरतों का पुरुषत्व
समता की होड़ में
देखता हूँ मैं
औरतों की भी मूँछें
हर जगह और
हर प्रकार की मूँछें
कि हाथ मूँछें पैर मूँछें
सीना मूँछे
केवल मूँछें
और फिर मज़ा ये
देखता हूँ जगह-जगह
गुँथी चोटियाँ उनमें
बँधे फीते—
रंग बिरंगे.
८.
नये ज़माने की इज्ज़त में
नयी काट का बुशशर्ट
जिसके ऊपर के
दो तीन बटन
कहीं टूट गये
इसलिए ही दीख पड़ा
बालदार छाती का
एक टुकड़ा—
नये जमाने की
उघरी
और ठंडी इज्ज़त में
ऊनी पैबन्द-सा
भद्दा.
९.
रातों में
तारे रह-रह के चौंकते हैं
काली करतूतों का
मेडल
झिलमिलाता है.
१०.
झुर्री की आड़ में
हर झुर्री की आड़ में
एक-एक रंगीन सूरज .
(सुबह के नहीं
शाम के!)
आभार: कृति , सितम्बर, 1960
मनोज मोहन
मनोज मोहन वरिष्ठ पत्रकार व लेखक. वर्तमान में सीएसडीएस की पत्रिका ‘प्रतिमानः समय समाज संस्कृति के सहायक संपादक.इन दिनों सीएसडीएस की आर्काइव परियोजना के अंतर्गत आज़ादी से दशक भर पहले से लेकर सातवें-आठवें दशक की हिंदी पत्रिकाओं के आलेखों, कविताओं और कहानियों के दस्तावेज़ीकरण जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं. manojmohan2828@gmail.com |




इन आरम्भिक कविताओं में भी विनोद जी के उन प्रस्थानों को लक्ष्य किया जा सकता है जो बाद में और गहरे, और विलक्षण होते गए ।