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Home » ज्ञानरंजन का कथा-संसार : प्रेमकुमार मणि

ज्ञानरंजन का कथा-संसार : प्रेमकुमार मणि

लेखक जब संपादक भी हो जाता है तब संपादन की ज़िम्मेदारी उसके लेखन पर दो तरह से असर डालती है. लेखन के लिए समय सिमट जाता है और उसका संपादक-व्यक्तित्व इतना प्रभावी हो उठता है कि उसका लेखक-रूप ओझल होने लगता है. ज्ञानरंजन निस्संदेह स्वतंत्र भारत के बड़े साहित्यिक संपादकों में हैं, पर वे उतने ही महत्त्वपूर्ण कथाकार भी हैं. उनके कथाकार-रूप का समग्र मूल्यांकन अभी शेष है. फिलहाल उनकी दो चर्चित कहानियों के साथ प्रेमकुमार मणि उन्हें स्मरण कर रहे हैं. प्रस्तुत है.

by arun dev
January 9, 2026
in आलेख
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ज्ञानरंजन का कथा-संसार :  प्रेमकुमार मणि
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ज्ञानरंजन का कथा-संसार
प्रेमकुमार मणि

 

हम लोगों ने साहित्य की दुनिया में जब आँखें खोलीं, तब ज्ञानरंजन नौजवान लेखकों के पसंदीदा थे. कवियों का मेला अलग होता था, उनकी अलग जमात थी और यह कहना सही होगा कि 1970 के दशक में जब हमारी पीढ़ी उठ रही थी, तब कविता का आकर्षण कम था. वह कहानियों का दौर था. कविता का दौर 1980 में वापस आया. कहानी और कविता की आवाजाही के पीछे कई कारण थे. बड़ा कारण आज़ादी के बाद एक नए मिज़ाज का उभरना था. हमारी पीढ़ी के पास कहने के लिए बहुत कुछ था. कविता विधा में जनता से संवाद की संभावनाएं कम थी. धूमिल या आलोकधन्वा की कविताओं में संवाद करने की जो बेचैनी है, वह अकारण नहीं है. वह तत्कालीन समाज की बेचैनी थी, जो रचनाकारों के माध्यम से साहित्य में उझक रही थी.

राजनीति में यह बेचैनी नक्सलवाद के रूप में उभरी. साहित्य में भी कई विश्रृंखलित रूपों में हम इसे देखते हैं. मैं विश्रृंखलित शब्द जानबूझकर इस्तेमाल कर रहा हूँ. इसलिए कि साहित्य का संवहन करने वाला जो हिन्दी इलाके का मध्य वर्ग था, वह बहुधा अपने आप ऊहापोह में था. उसके पास जीवन-बोध की कोई स्पष्ट अवधारणा नहीं थी. बौद्धिक रूप से हिंदी क्षेत्र अपेक्षाकृत कुछ अधिक पिछड़ा हुआ था. और यह कोई अचानक नहीं हो गया था. इसकी बुनावट ही ऐसी थी. गंगा, गाय और गोबर-गणेश की त्रिवेणी से घिरे हुए इस यह इलाके ने उपनिवेशवाद विरोधी राष्ट्रीय आंदोलन में चाहे जितनी कूद-फांद की हो, अपनी प्रवृतियों में बहुत कुछ मध्ययुगीन था.
उसकी राष्ट्रीयता को भी मध्ययुगीन ख़याल प्रभावित कर रहे थे. बंगाल और महाराष्ट्र की तरह यहाँ कोई सामाजिक नवजागरण नहीं हुआ था. इसके अभाव में सामाजिक-विमर्श विकसित होने की कोई संभावना आखिर कैसे हो सकती थी. इस खालीपन को गांधी ने समझा था और 1935 में हुए इंदौर हिन्दी साहित्य सम्मलेन में उन्होंने हिन्दी लेखकों से पूछा था कि आपके बीच कोई रवीन्द्रनाथ टैगोर, जगदीशचंद्र बोस और प्रफुल्लचन्द्र राय क्यों नहीं है?

गांधी के इस सवाल ने हिन्दी लेखकों के बीच कोहराम खड़ा कर दिया था. बनारस के इर्दगिर्द जमे हुए तमाम हिन्दी के झंडेबरदार उबल पड़े थे कि गांधी इस विषय पर अनाड़ी हैं. निराला के नेतृत्व में विरोध का स्वर जोशीले रूप में उभरा था, जो उनके ज्ञान से अधिक उनके अहंकार का प्रतिनिधित्व कर रहा था. लेकिन इस चर्चा को हम यहीं स्थगित करना चाहेंगे, क्योंकि अपने तय विषय पर हम लौट सकें.
गांधी इंदौर में हिन्दी समाज की जड़ प्रवृतियों पर (1935 में ) सवाल उठा रहे थे, उसके साल भर बाद ही उसी महाराष्ट्र के अकोला में ज्ञानरंजन जन्मे. कई शहरों में घूमते उनका परिवार इलाहाबाद पहुंचा, जहाँ उनका बचपन और युवाकाल बीता. उन्नीसवीं सदी के रूसी आलोचक चेर्नीशेव्स्की की इस बात से मैं सहमत हूँ कि किसी लेखक की कृति पढ़ने के पूर्व उसके जीवन को जानना चाहिए. ज्ञानरंजन के दिल-दिमाग पर इस मध्यवर्गीयता का गहरा प्रभाव है. उन पर अपने शहर और समय का भी प्रभाव है. ज्ञान यदि इलाहाबाद की जगह बनारस में पले बढ़े होते तो उनके मानसिक गठन की पार्श्व-भूमि इस तरह की होती मुझे संदेह है. उनके मनो-मिज़ाज पर नेहरू के साइंटिफिक टेम्पर और उस दौर में इलाहाबाद में उभर रहे सत्यसभा के विचारों के नवोन्मेष का प्रभाव देखा जा सकता है. उनकी भाषा, दृष्टिकोण और वर्ण्य-विषय परंपरा से जुड़े रह कर भी कुछ ऐसी नवीनता लिए हुए हैं, जो युवा पाठकों को प्रिय था. जब भी हम ज्ञानरंजन पर बात करें तो उनके समृद्ध परिवेश की अनदेखी नहीं करें. उनका पूरा ठाठ-वितान नगरीय है और उसमें उस ग्रामीण तत्व का अभाव है जिसे हिन्दी वाले प्रेमचंद की परंपरा बतला कर ढोए जा रहे हैं.

प्रेमचंद को जितना और जैसा मैंने समझा है उसके आधार पर कह सकता हूँ कि उनकी परंपरा के वास्तविक वाहक फणीश्वरनाथ रेणु और ज्ञानरंजन जैसे कथाकार हैं, क्योंकि यही लोग हैं जो प्रेमचंद द्वारा स्थापित आधुनिकता को समझते हैं. ज्ञानरंजन अपने लेखन में सामाजिक परिवर्तन की द्वंद्वात्मकता को बखूबी समझते हैं इसलिए वह उसके मिथ्याचार को समझने में समर्थ होते हैं. यही चीज उन्हें समर्थ लेखक बनाती है.

सब जानते हैं मात्रा के हिसाब से ज्ञान ने बहुत कम लिखा है. मेरे जानते उनके पास कुल पचीस कहानियाँ हैं और इसमें उल्लेखनीय मुश्किल से सात-आठ होंगी. ‘बहिर्गमन’ ,’ घंटा ,’ ‘सम्बन्ध ‘, ‘पिता ‘ और ‘ फ़ेन्स के इधर और उधर ‘ उनकी ऐसी कहानियाँ हैं, जो खूब चर्चित हैं. कहा जा सकता है इनके पढ़े बगैर कोई हिन्दी साहित्य का मिज़ाज समझ ही नहीं सकता. मैं ऊपर वर्णित कहानियों में से आखिरी दो को अपनी चर्चा में शामिल करना चाहूंगा.

‘पिता’ और ‘फ़ेन्स के इधर और उधर ‘ दोनों 1965 के आस -पास लिखी गई कहानियाँ हैं. हिन्दी कहानियों का चर्चित नई कहानी का दौर बीत चुका था. 1962 में चीनी आक्रमण और उससे हुई फौजी फजीहत के पश्चात् भारत की आज़ाद अस्मिता को बड़ा झटका लगा था. नेहरू युग का सतरंगापन एक झटके से ध्वस्त हो गया था. राष्ट्रीय स्तर पर मोहभंग और उदासी पसरी-फैलती जा रही थी. इस दौर का युवा मन व्याकुल-बेचैन था. नेहरू युग में चलाई गई पंचवर्षीय योजनाओं का फलाफल अभी सतह पर नहीं आया था, इसलिए चतुर्दिक एक हाहाकार विकसित हो रहा था. इसी मोहभंग, उदासी और हाहाकार की मनःस्थिति के लेखक ज्ञानरंजन और उनकी पीढ़ी के दूसरे लेखक हैं. लेकिन अपनी पीढ़ी के दूसरे लेखकों के मुकाबले ज्ञान अलग इसलिए दिखते हैं कि वह अपने समय को दूसरों की अपेक्षा अधिक गहराई से समझते हैं. आज़ादी और उसके बाद की विकसित परिस्थितियों ने अपने ज़माने की दो पीढ़ियों के बीच एक बड़ा द्वंद्व खड़ा कर दिया था. पुरानी दुनिया और नई दुनिया, पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच एक अघोषित संघर्ष आरम्भ हो गया था. इसी संघर्ष को ज्ञान रेखांकित करते हैं.

 

पिता

कहा जा सकता है, इन दोनों कहानियों में पारम्परिक कथानक अथवा किस्सागोई का अभाव है, जो हिन्दी कहानियों के लिए एक अनिवार्य शर्त के रूप में आलोचकों द्वारा पेश की जाती रही हैं. ‘पिता’ एक मध्यवर्गीय परिवार में घटित देर रात के कुछ पहर का ब्यौरा है, जिसमें बेहद उमस भरी और उबाऊ गर्मी से जूझता एक पिता-पुत्र आमने-सामने है, या नहीं भी है. क्योंकि दोनों अलग-अलग स्तरों पर अपनी ऊब को झेल रहे हैं. पारम्परिक ख्यालों में जीता पिता अपने ही परिवार में अजनबी बना हुआ है. जीवन की अनिवार्य जरूरतों से भी झल्लाता है. मानो निषेध का जीवन उनकी कोई उपलब्धि हो. अपने ही बेटे द्वारा वह नहीं समझा जा रहा है. बेटे की इच्छा के अनुसार वह कैसे जीवन जिए और अपने खान-पान-पहनाव को बदले! बेटे उसे अपनी तरह का देखना चाहते हैं. बेटे की इच्छा है, वह उनकी शर्तों पर जिएं और अपनी पुरानी आदतों, जिसके कारण कई दफा उसके परिवार की मर्यादा को बट्टा लगने जैसा होता है, को वह बदलें. पिता अपनी राह पर जीने को अपने जीवन की सार्थकता समझता है. दरअसल दो अस्मिताओं का सीधा संघर्ष आमने-सामने है.

गर्मियों के रात की दोपहरी है. पिता उमस से परेशान कभी जनेऊ से पीठ खुजलाते, कभी अपनी सुराही से पानी निकाल कर पीते, खाट की पाट धोते सोने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन सो नहीं पाते. उनका ध्यान आम के पेड़ से टपकने वाले आम पर भी है, जिसका कोई हिस्सा वह खोना नहीं चाहते. इसके समान्तर घर के भीतर अपनी पत्नी देवा के साथ सोने की कोशिश कर रहा कहानी का नरेटर भी एक द्वंद्व जी रहा है. पिता के साथ अपने पूरे संघर्ष को वह याद करता है. रात्रि ढल रही है. पिता-पुत्र का अनकहा संघर्ष परवान चढ़ रहा है. झल्लाता हुआ पुत्र इस निष्कर्ष पर आता है -‘ पिता तुम हमारा निषेध करते हो. तुम ढोंगी हो, अहंकारी हो, बज्र अहंकारी..’ और इसी ख़याल में जागता हुआ पुत्र अनुभव करता है कि ” पिता अब निश्चित रूप से सो गए शायद “; क्योंकि उनके द्वारा की जा रही खटर-पटर अब स्थगित हो चुकी है.

ज्ञान की खासियत है कि उनके पास एक खूब व्यवस्थित भाषा है. वाक्यों की विशद बुनावट और प्रवाहमयता के साथ एक खास तरह का अंतर-राग उनके गद्य की विशेषता है. लेकिन सबसे बड़ी बात है कि चेतना के स्तर पर उनकी यह कहानी हमें झकझोरती है. क्या यह नहीं प्रतीत होता कि ज्ञान के ज़माने में चल रहे गांधी बनाम नेहरू का वैचारिक संघर्ष इस कहानी में मूर्त हुआ है. पिता की जिद नई पीढ़ी के खिलाफ नहीं है, उनके अपने अस्मिता को बचाए रहने की जिद है. अपने निषेध के जादू से परिवार पर वह वर्चस्व जताना चाहते हैं, जैसे गांधी अपने विचारों से अधिक अपनी जिद की धौंस जताते थे. पिता की अनकही योजना है कि आप लोग अपनी राह चलो, लेकिन मेरे मुआमले में दखलंदाजी मत करो. मुझे मेरी शर्तों पर जीने दो. यदि इस दृष्टिकोण को स्वीकार किया जाए तो यह कहानी अपने समय के सबसे बड़े सामाजिक-राजनीतिक द्वंद्व को सामने इस रूप में रखती है,मानो कोई बात ही न हो. इस अबोधपन के सौंदर्य पर कोई भी रीझ सकता है.

 

फ़ेन्स के इधर और उधर

दूसरी कहानी ‘ फ़ेंस के इधर और उधर ‘ एक दूसरे तरह के द्वंद्व को सामने लाती है. इसी द्वंद्व पर गांधी ने ऊँगली रखी थी. कहानी का नरेटर अनुभव करता है उसके घर से लगे फ़ेंस के उस पार जो एक नया परिवार रहने आया है उसकी दुनिया बिल्कुल अलग है. वह अपनी तरह के एक कौंच से भर जाता है. आखिर वे हैं किस तरह के लोग ! वे हमारी तरह क्यों नहीं हैं ? कुल जमा तीन लोगों का यह परिवार हाल में ही आया है. लेखक का जोर है ‘तीन हैं, चौथा कोई नहीं.” श्री, श्रीमती और सुश्री.

कथाकार छोटी-छोटी चीजों की नोटिस लेता है. उसका पूरा ध्यान उस घर की युवा बेटी में है, ‘जो सुंदर नहीं, किन्तु सलीके वाली है.” नरेटर चाहता है कि वे लोग उनके परिवार से घुलें-मिलें, क्योंकि किसी से अनासक्त न रहना इनकी नियति है. लेकिन परिवार इनकी कोई नोटिस नहीं लेता. वे अपने में मग्न रहने वाले लोग हैं. लड़की है कि हंसना कोई उससे सीखे. हँसते-हँसते बार-बार दोहरी हुई जाती है. उसका दुपट्टा गिरने-गिरने को हो आता है. वे अपने घर के सामानों के रख-रखाव की तनिक चिंता नहीं करते. कुर्सियां रात में भी बाहर ही छोड़ जाते हैं. लेकिन आश्चर्य कि उनकी कुर्सियां कभी चोरी नहीं गईं. आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब होती है जब खूब हंसाने वाली उस छोरी का विवाह होता है और कोई धूम-धड़ाका नहीं होता. यहाँ तक कि पड़ोसी तक को जो बस फ़ेंस के इस तरफ है भी न्योता नहीं गया. विवाह भी इतना संक्षिप्त. दुपट्टे वाली लड़की ने उस रोज साड़ी पहनी, हाथ में नारियल लिया, बिना धूम धड़ाके के साथ आए पति के साथ चंद कदम चुस्त चाल में बिना लजाए चली और बस हो गई शादी. विदाई के समय लड़की की आँखों में ख़ुशी, आश्वस्ति और नए जीवन में कदम रखने के उत्साह जरूर छलछलाए, किन्तु कोई रुलाई-धुलाई नहीं हुई.

नरेटर के पूरे परिवार का ध्यान इस नये परिवार पर है, लेकिन उनलोगों का तनिक-सा भी ध्यान इनलोगों पर नहीं है. नरेटर के मन में एक चुप्पा ख़याल जरूर आता है कि काश मैं उनके परिवार में पैदा होता. लेखक की जादुई जुबान में ‘ रात शाम का केंचुल उतार रही है, ‘ यानी गहरा रही है. नरेटर के घर पड़ोसी निंदा का बाजार गर्म है और इसी के साथ कहानी समाप्त हो जाती है.

सामान्य तौर से बहुत साधारण दिखने वाली यह कहानी दो दुनिया की कहानी को आमने-सामने रखती है. दो अलग-अलग जीवन पद्धतियां हैं दोनों तरफ. हैं तो एक ही शहर में और बस फ़ेंस के इधर और उधर रह रहे हैं. लेकिन कितना बड़ा अंतर है. जैसे एक ही मुल्क में हिन्दी प्रदेश के बाजू में बंगाल है. यह पिछड़े हिन्दी परिवार और जाग्रत बंगाली परिवार की तरह की दुनिया है; जहाँ लालन फ़क़ीर से लेकर डिरोजिओ, राजा राममोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, रवीन्द्रनाथ आदि हुए हैं. उनका मनोमिजाज अलग है. फ़ेंस के इस पार एक बंद दिमाग वाला परिवार है,जिसके यहाँ मर्यादा का अर्थ स्त्रियों और मिहनतक़शों की गुलामी है. बिना किसी शोर-शराबे के यह कहानी हिन्दी समाज के पिछड़ेपन को हमारे समक्ष रख देती है, जिसकी व्याख्या की कोई जरूरत नहीं रह जाती.

ज्ञानरंजन इसी कारण हिन्दी के तमाम लेखकों से अलग दिखते हैं. उन्हें समझना आसान भी है, और मुश्किल भी. जिस आधुनिकता की वह प्रस्तावना करते हैं, जिसकी तरफ देखने के लिए हमें उत्साहित करते हैं वह फ़ेन्स के उस पार की दुनिया है. यह दृष्टि हिन्दी के दूसरे लेखकों में नहीं मिलती. एक लेखक का बहुत लिखना महत्वपूर्ण नहीं है; देखा यह जाना चाहिए कि उसने लिखा क्या है. हर लेखक-दार्शनिक का अपना एक यूटोपिया होता है. ज्ञानरंजन एक ऐसे आधुनिक लोकतान्त्रिक समाज का स्वप्न पालते हैं, जो वैज्ञानिक नजरिया रखता हो. उनकी कहानियाँ हमें उसी तरफ हौले-से धकेलती हैं.

 

प्रेमकुमार मणि

बिहार के किसान पृष्ठभूमि के एक स्वतन्त्रता सेनानी पिता और शिक्षिका माँ के घर 25 जुलाई 1953 को जन्मे मणि ने विज्ञान विषयों के साथ स्नातक किया और फिर नवनालन्दा महाविहार में भिक्षु जगदीश काश्यप के सान्निध्य में रह कर बौद्धधर्म दर्शन की अनौपचारिक शिक्षा प्राप्त की. छात्र जीवन में ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े, कुछ समय तक सरकारी नौकरी की और छोड़ी, राजनीतिक आन्दोलनों और सक्रियताओं से जुड़े, कथाकार, उपन्यासकार और प्रतिनिधि लेखक के रूप में पहचान बनाई और कुछ पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया. निरन्तर समसामयिक विषयों पर भी लिखते रहे. पाँच कहानी संग्रह, एक उपन्यास और लेखों के पाँच संकलन प्रकाशित हो चुके हैं एवं अनेक कहानियों के अनुवाद अंग्रेज़ी, फ्रांसिसी, उर्दू, तेलगु, बांग्ला, गुजराती और मराठी आदि भाषाओं में हो चुके हैं. लेखन के साथ वह अपनी सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के लिए भी जाने जाते हैं.

943166221

Tags: 2026कथाकार ज्ञानरंजनज्ञानरंजनप्रेमकुमार मणि
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Comments 3

  1. Dr. Archana Mishra says:
    2 months ago

    समालोचन : एक मानीखेज वेबपत्रिका
    पिछले करीब एक-डेढ़ साल पहले आकस्मिक रूप से इस पत्रिका को देखने का अवसर मिला और तब से हर बार यह मुझे चकित और आह्लादित करती रही है. इसकी हर एक प्रस्तुति अर्थवत्तापूर्ण और संग्रहणीय होती है. अफ़सोस, इसे डाउनलोड कर अपनी निजी डिजिटल लाइब्रेरी में मैं सुरक्षित नहीं कर पाती.
    इसके लेखों की बेबाक ईमानदारी और उत्प्रेरक विचारमंथन मुझे सदा ही प्रभावित और मेरी अकादमिक निष्क्रियता पर प्रहार करता है.
    संपादक / संपादकों को मेरा सश्रद्ध विनम्र अभिनंदन! कृपया बताएँ कि इस पत्रिका को मैं अपने ईमेल पर मँगाने हेतु सब्सक्राइब कैसे कर सकती हूँ?
    सधन्यवाद सादर

    Reply
  2. राजाराम भादू says:
    2 months ago

    ज्ञान जी की कहानियों का पुनर्पाठ होना चाहिए। तब उनके तत्कालीन रचनात्मक हस्तक्षेप की उल्लेखनीय तसवीर उभरेगी, साथ ही वर्तमान प्रासंगिकता को लेकर सीमाएँ भी सामने आयेंगी।
    बहरहाल, समालोचन ने मणि जी का यह लेख प्रस्तुत कर जरूरी भूमिका निभाई है। एक रचनाकार को स्मरणांजलि का यही तरीका है।

    Reply
  3. डॉ. सुनील कुमार says:
    1 month ago

    समालोचन का हर लेख समृद्ध ही करता है, प्रेमकुमार मणि जी को इस लेख के लिए हार्दिक धन्यवाद।

    Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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