| उदाहरण होने से बचकर अशोक वाजपेयी विनोद कुमार शुक्ल पर लिखा गया पहला आलोचनात्मक लेख |
साहित्य एक ऐसी स्थिति में पहुँच गया है जो कठिन, सीमित और नश्वर है; अब उसे अपने अलंकरणों की नहीं, अपनी त्वचा की रक्षा करना पड़ रही है.
रोलाँ बार्तों
वैसे तो यह कहा-माना जाता रहा है कि पिछले बीस-पच्चीस बरसों में कविता ने अलंकारों से अपने को मुक्त किया है और सपाटबाजी और सीधे साक्षात्कार को अपना मूलाधार बनाया है, लेकिन इस व्यापक काव्य-मुक्ति के बावजूद यह देख पाना बहुत मुश्किल नहीं है कि ज्यादातर कविता बराबर किसी-न-किसी आलंकारिता का शिकार होती रही है. परंपरा से चले आए और जाने-पहचाने अलंकार आभूषण भले छोड़ दिए गए हों, तथाकथित सामाजिकता और उसको लेकर विकसित हुआ ‘हीरोइक्स’, तनावग्रस्त व्यक्ति और उसे लेकर घिरी आत्मदया और नैतिक अहंकार आदि अनेक नई रूढ़ियों ने काव्यदृश्य पर- और यह अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है कि युवा प्रतिभा पर-कब्जा जमाया है. जिम्मेदार और सार्थक रचना वहाँ संभव हुई है जहाँ इस नई आलंकारिता के प्रलोभन के प्रति कवि सतर्क रहे हैं और जहाँ कविता को किसी तरह ‘हीरोइक्स’ बनाए बगैर एक सीधे-सच्चे आदमी के बेलाग और तीखे बयान और बखान के रूप में लिखा और पहचाना गया है. ऐसे कवियों में, जो हर हालत में थोड़े ही हैं, विनोदकुमार शुक्ल की कोशिश बहुत उल्लेखनीय है.
विनोदकुमार शुक्ल के यहाँ कविता किसी भी तरह की यानी चालू मुहावरों की नई आलंकारिता, सबको तुच्छ-नगण्य मानने की अतार्किक बहादुरी, बड़बोलेपन और मध्यवर्गीय आत्मदया, सभी से मुक्त है. यही कारण है कि उनकी कविता सबसे अलग दीखती है: इतनी अलग कि न केवल पुराने पैमानों से बल्कि कविता के तीस विद्रोही वर्षों के बाद बनी पहचान से भी उसे ठीक-ठीक पहली नजर में कविता कहना मुश्किल है. यह कविता इतनी धूसर, शांत, सादी और कविता के लटकों से अलग है कि कविता ही नहीं लगती. वह आजकल लिखी जा रही कविता का एक तरह से प्रतिपक्ष है- प्रति कविता है. निजीपन और सामाजिकता का द्वैत इस कविता के लिए अप्रासंगिक ही है और सबसे बड़ी बात यह है कि विनोदकुमार शुक्ल कविता को लेकर किसी शहादत या वीरताभाव से कतई पीड़ित नहीं है.
यह कविता में अविश्वास नहीं है, बल्कि एक तरह का ‘ट्रैजिक’ और वस्तुनिष्ठ आकलन है कि कविता में किसी भी चीज को, चाहे वह स्वयं कविता ही क्यों न हो, बहुत बढ़ा-चढ़ाकर नहीं देखा जा सकता. अगर हमारे समाज में और मध्यवर्गीय मानसिकता में कविता कोई केंद्रीय भूमिका अदा नहीं करती तो यह भी आज की उस मानवीय स्थिति का अंग है जिसका साक्षात्कार कविता को करना है और उसे लेकर किसी तरह का अतिरेक बेमानी होगा. दरअसल, विनोदकुमार शुक्ल का काव्य निर्मोह और अपस्फीति का काव्य है, जो जैसे अपने काव्य होने के प्रति भी कोई मोह नहीं पालता और उनके चारित्रिक मसखरेपन से, अपने काव्य होने पर भी, स्वयं प्रश्नचिह्न लगाता चलता है.
ज्यादातर कवि निचले मध्यवर्ग से आते हैं और किसी-न-किसी तरह के आभिजात्य के प्रति उनका आकर्षण अस्वाभाविक नहीं है. मसलन कई बार लगता है कि यौन या क्रांतिकारिता के प्रति जो ललक युवा कवियों में रही है वह कहीं-न-कहीं अपनी सामाजिक आकांक्षाओं की क्षतिपूर्ति या एक ऐसे लोक में शरण लेने की इच्छा के कारण रही है जिसमें कुछ महत्वपूर्ण या चौकानेवाला करने से मान्यता मिल सके. ये सभी अंततः आभिजात्य के ही संस्करण हैं, मान्यता की ही तलाश है. हुआ यह है कि यह आकर्षण और यह खोज कवियों को उनकी मध्यवर्गीयता की ठोस जमीन से दूर ले गई है. उसके नीरस उबाऊपन से मनोवैज्ञानिक मुक्ति पाने के लिए युवा कवि महत्व की उन धारणाओं से प्रेरित हुए हैं जो उनके निजी संघर्ष से अर्जित या उनकी अपनी हालत की निर्मम खोज से पैदा नहीं हुई है. इसलिए उनकी रचनाएँ महत्व की खोज हैं पर वैसा महत्व नहीं जो उन्हें अपनी जड़ों की खोज से मिल सकता है, बल्कि वह जो दूसरों के द्वारा अभीष्ट है और जिसे पाने की इच्छा अपनी सामाजिक स्थिति को नजरअंदाज या अपनी स्थिति को अतिरंजित करने पर ही होती है.
विनोदकुमार शुक्ल की एक यह भी विशेषता है कि उसमें मध्यवर्गीय परिवेश से भागने की कोई कोशिश नहीं है. उलटे, कविता लगभग जिद्दी ढंग से अपने को निचले मध्यवर्ग और उसकी अनगिनत छोटी-बड़ी सचाइयों में ही रोपे रहती है. अतिरंजना से वह लगभग कविता न माने जाने की हद तक मुक्त है. दूसरे शब्दों में वह ऐसी कविता है जो कवि की ठोस निजी जिंदगी और सामाजिक स्थिति को उसके पूरे ब्यौरों में स्वीकार कर चलती है और कवि के मानवीय होने के समूचे अर्थ को धीरे-धीरे और अविचलित भाव से इन्हीं सचाइयों में खोजने के लिए जैसे प्रतिश्रुत है. विनोदकुमार शुक्ल की पूरी बिंब-व्यवस्था, जीवन की छवियाँ, मुद्राएँ और मुहावरे सब इस सीमित दुनिया से आते हैं: मुहल्ला, खटारा साइकिल, रौताइन, धँसी इमारत में बूढ़ा माली, म्युनिसिपैल्टी का नल, बाल्टी, औरत, लड़की, दुकानदार, चपरासी, किराएदार, पेड़, हरा तोता, पिंजरा, मालिक, घोड़ा, अठन्नी, गन्दा झोला, ईदगाहभाटा, नौकरी आदि मिलकर जो दुनिया बनाते हैं, वह निचले मध्यवर्ग की जानी-पहचानी लेकिन कविता से अब तक छूटी हुई-सी दुनिया है. नायाब और दूरदराज से चकित कर देनेवाले बिंब और प्रतीक जुटाने की खासी आजमाई हुई हिकमतें इस कविता के लिए गैर-ज़रूरी हैं. कल्पना की दूरगामी उड़ानें भी उसके लिए अप्रासंगिक ही हैं. जिस कविता में बिंबों का चमकता संसार नहीं, कल्पना की उड़ानें नहीं, उसमें भला बचता ही क्या है?
सुखद आश्चर्य यही है कि जो बचता वह एक बिलकुल अप्रत्याशित ढंग से कविता है. जो कुछ बचता है उसमें चीजों और लोगों के साथ अनेकविध और अप्रत्याशित संबंध है: यह कविता महानगर के अधिकतर कल्पित ऐश्वर्य और अतिरंजित संत्रास की कविता नहीं है. वह छोटे शहर की, मुहल्ले की कविता है: वह किसी शिखर या चौक के किसी मंच से दिया गया उद्दाम बयान नहीं है, बल्कि जैसे मुहल्ले की किसी चाय की दुकान की बेंच पर बैठकर की गई निजी बातचीत है. इस कविता में कवि एक स्पष्ट और सक्रिय चरित्र है, पर उसे अपने कवि होने का कोई सीधा या हस्तक्षेपकारी बोध नहीं है. वह मुहल्ले में एक ‘कवि’ नहीं है- वह मुहल्ले में एक ‘आदमी’ है. वह अपना और अपने संसार का शांत भाव से बखान करता है लेकिन दोनों की सीमाओं के प्रति बराबर सचेत है:
मैं हमेशा जाता हुआ दिखाई देता हूँ.
मैं अपनी पीठ बहुत अच्छी तरह पहचानता हूँ.
अपनी पीठ अच्छी तरह पहचानने से ही विनोदकुमार शुक्ल की कविता में प्रामाणिक सघनता आ पाई है: उसमें कहीं भी ऊपर या बाहर से दृष्टिपात करने की मुद्रा नहीं है. यह बखान बीचोंबीच फँसे-बसे आदमी का है, जिसकी हिस्सेदारी के बारे में शक की कोई गुंजाइश नहीं.
मध्यवर्गीयता के गहरे रचे-बसे होने का यह आशय कतई नहीं है कि इस कविता में कल्पनाशील साहस का अभाव है या कि जिस तरह के कामचलाऊ और शुद्ध व्यावहारिक मूल्यों पर वैसा जीवन चलता है, उससे कोई समझौता विनोदकुमार शुक्ल करते हैं. उनकी संवेदना उनके सारे शांत मिजाज और ठेठपन के बावजूद, निरे वस्तुसंसार में और मानवीय संबंधों में ऐसा कुछ खोजती है जो गहरी अंतर्दृष्टि देता है और ऐसे अप्रत्याशित, विचलित करनेवाले अनुभवों के बीच हमें ले जाता है:
घोड़ा भूखा था तो
उसके लिए कुहरा हवा में घास की तरह उगा था.
और कई मकान, कई पेड़, कई सड़कें इत्यादि कोई घोड़ा नहीं था.
अकेला एक घोड़ा था. मैं घोड़ा नहीं था.
लेकिन हाँफते हुए, मेरी साँस हुबहू कुहने के नस्ल की थी.
यदि एक ही जगह पेड़ के नीचे खड़ा हुआ वह मालिक आदमी था
तो उसके लिए
मैं दौड़ता हुआ, जूते पहिने हुए था जिसमें-
घोड़े की तरह नाल ठुकी थी.
विनोदकुमार शुक्ल के यहाँ बराबर एक तरह की शांत पर अनिवार्य ऐंद्रिकता है, जो ‘कुहरा हवा में घास की तरह उगा था’ जैसी पंक्ति से अत्यंत नाटकीय रूप से व्यक्त होती है, हालाँकि प्रायः कभी भी कोई विशाल और पारंपरिक किस्म की हाहाकारी नाटकीयता उसमें नहीं होती. चीजों को देखने-पकड़ने में उनके यहाँ एक तरह की आदिम शक्ति का भी एहसास होता है. कुहरा, हवा, पेड़, घोड़ा, मालिक और नस्ल जैसे बिलकुल अतिपरिचित बिंबों से वह लगभग अनायास एक ऐसे अनुभव-बिंदु पर पहुँचते हैं जहाँ आदमी और घोड़े के बीच एक और आदमी के मालिक होने से एक अत्यंत विचलित करनेवाला तादात्म्य हो जाता है. इस तादात्म्य को बिना किसी शोरगुल के दिखा पाना ही कामचलाऊपन और व्यावहारिकता के मध्यवर्गीय समझौतों से कविता को मुक्त करना है. मुक्तिबोध फेलोशिप के दौरान लिखी गई कविताओं में यह बात ज्यादा साफ तौर पर समझ में आती है कि वह अपनी नैतिक संवेदनशीलता तक ही सीमित नहीं हैं और आदमी और उसके पड़ोस, आदमी और चीजों के संसार और आदमी के संसार को नियमित करनेवाली शक्तियों के संघर्ष के प्रति उनकी संवेदना का विस्तार हुआ है. उनका निरुद्वेग पहले जो भ्रम पैदा करता रहा हो, अब कम-से-कम इतना साफ है कि वह तटस्थ नहीं है:
यह जमीन पर गिरे
दो किलो चावल के एक-एक दाने को बीनकर
मुहल्ले के लोगों के द्वारा
इकट्ठा करने का
इस तरह पेट से ज्यादा
समूह की ताकत बढ़ाने का हिसाब है
. . . . .
एक-एक कर जिसको जब भी मौका मिले
अकेले से अच्छा
किसी को साथ लाना है.
. . . . .
डंक मारनेवाले विचारों को फैलाना है.
जरूरी काम है.
प्रगतिशीलता के नए दौर में भी लफ्फाजी से छुटकारा चूँकि नहीं हो सका है, यह अचरज नहीं होना चाहिए कि इस तरह की कविता की गहरी मानवीय आस्था को पहचाना न जाए और उसे एक तरह की शुद्ध कविता मानकर ख़ारिज कर दिया जाए. लेकिन यह बात उल्लेखनीय है कि वैचारिक स्पष्टता और पक्षधरता विनोदकुमार शुक्ल ने अपनी कविता और मुहावरे का स्वाभाविक और संवेदनशील विस्तार करके ही अर्जित की है. उन्हें किसी दुराग्रह की तरह ऊपर से थोपा या चस्पाँ नहीं किया है. चूँकि वह एक सजग कवि हैं, उन्होंने इसकी बराबर सावधानी बरती है कि चालू मुहावरों का कोई दखल उनकी कविता में न होने पाए. अपने मुहावरे और अनुभव की शुद्धता पर ऐसा आग्रह हर तरह की जोखिम उठाकर करना मार्मिक होने के साथ ही फलदायी भी रहा है. नतीजा यह है कि विनोदकुमार शुक्ल का मुहावरा बिलकुल अलग से पहचाना जा सकता है. वह उन थोड़े से मुहावरों में से है जिसका अलग व्यक्तित्व शुरू से ही स्पष्ट रहा है और जिसका आतंक अनेक युवा कवियों पर है. कई बार तो इतना कि उसकी अनुगूँजों से उनकी कविता मुक्त नहीं रह पाती. अपेक्षाकृत युवा कवि के लिए अपने काव्य-समय में ऐसी जगह पा सकना निश्चय ही उपलब्धि है.
आत्मविश्लेषण अकसर इधर की कविता का स्थाई भाव रहा है. लेकिन ज्यादातर विश्लेषण वस्तुपरक न होकर आत्मस्फीति में बदलता रहा है. दूसरों को कमतर दिखाना या अपने को दूसरों से बेहतर बता पाना ही इस तरह के विश्लेषण का हश्र हुआ है. विनोदकुमार शुक्ल की कविता में इस तरह विश्लेषण एक लगातार प्रक्रिया है और आत्मस्फीति की बजाय उनके यहाँ लगातार अपस्फीति है. लेकिन यह अपस्फीति अपना या दूसरों का भंडाफोड़ करने जैसे आसान हरकत पर अपने को केंद्रित नहीं करती: सब पर शक करने की नैतिक संवेदनहीनता से यह कविता मुक्त है. बल्कि इसके बरक्स उसमें एक सूक्ष्म नैतिक बोध है जो अतिरंजना का बराबर निषेध कर वस्तुपरकता की ओर ले जाता है. अपनी या दूसरों की जो चीरफाड़ कविता में विनोदकुमार शुक्ल करते हैं वह सब कुछ को एकबारगी संदेहास्पद बनाने के लिए नहीं है: वह अपनी हालत को ठीक-ठीक समझने-परखने के लिए है और अपने वर्ग को तजे बिना उस नाटकीय स्फीति से बचने के लिए है जिसमें मध्यवर्गीय व्यक्ति विशाल और मौलिक परिवर्तन का केंद्रीय वाहक होने की खुशफहमी पालता है. एक तरह का शरारती क्रीड़ा-भाव भी इन कविताओं में बार-बार उभरता है: कुछ-कुछ ऐसा, जैसे कि कोई अपना गुब्बारा फोड़ने के बाद दूसरों के पास वैस ही गुब्बारा दिखने पर उसे सुई चुभो रहा हो. दूसरों पर जो टिप्पणी इस कविता में है उसका अधिकार खुद अपने पर निर्मम टिप्पणी कर कवि ने अर्जित किया है- और यह अधिकार बाहर नहीं कविता के अंदर ही स्वायत्त किया गया है. इसलिए यह कविता सिर्फ भाषाई अन्वेषण नहीं है, नैतिक अन्वेषण भी है.
अपस्फीति का काव्य एक जमाने में हमें मनुष्य की नगण्यता की और ‘लघु मानव’ की ओर, नई कविता के दौर में, ले जा चुका है. विनोदकुमार शुक्ल की कविता में महिमा-मंडित मनुष्य नहीं है, बल्कि एक ऐसा मनुष्य है जो अपनी साधारणता में बराबर ‘वेध्य’ है. लेकिन उनकी कविता पढ़ने से कोई बेचारगी या लघुता का बोध नहीं होता. अपनी निरलंकार साधारणता में मनुष्य अपने द्वारा किए जा रहे दूसरों के शोषण और खुद के शोषण को पहचानने की कोशिश करता है और शोषण से मुक्ति पाता है. यह मुक्ति, जो आत्मान्वेषण की शांति परंतु कठिन प्रक्रिया से मिलती है, इस कविता का एक तरह से अभीष्ट है.
दरअसल, विनोदकुमार शुक्ल अपने वर्ग की सबसे गहरी और प्रामाणिक पहचान इसी शोषण को देखने-परखने में देते हैं: मध्यवर्ग का जंजाल भी इसी में सबसे स्पष्ट रूप से झलक पाता है. मध्यवर्गीय मनुष्य स्वयं शोषक है और शोषित भी, और स्थिति का व्यंग्य और आशा दोनों इसी में हैं कि वही इस शोषण को पहचान भी पाता है. अपने चारित्रिक स्वभाव के अनुरूप इस कविता में इस शोषण का बखान कभी भी मुखर या सीधा नहीं है: यह राजनैतिक समझ नैतिक संवेदना और एक परिष्कृत काव्यसंवेदना के साथ ऐसी घुली-मिली है कि उसे अलग देख पाना आसान नहीं है. उसे कविता के अनिवार्य रूपाकार से बाहर निकालकर निरे विचार के रूप में रखना और परखना भी उन शर्तों के प्रतिकूल है जिन्हें सच्ची कविता अपने पाठक पर अदृश्य रूप से लागू करती है- भले ही आलोचनात्मक विश्लेषण के लिए ऐसा करना लगभग अनिवार्य-सा है.
भाषा और मुहावरे की समृद्धि का पारंपरिक प्रमाण यह रहा है कि किसी कवि का शब्द-भंडार कितना विपुल है. इस दृष्टि से देखें तो विनोदकुमार शुक्ल की कविता को समृद्ध की बजाय विपन्न मानना होगा. लेकिन अगर समृद्धि का प्रमाण यह भी हो कि अपने शब्द-भंडार से कवि कितना काम लेता है और मानव-संसार और संबंधों की कितनी बारीकियों और संभावनाओं को उजागर कर पाता है, तो उनकी कविता विपन्न कतई नहीं है. आमतौर से एक छोटे शहर का निम्न-मध्य-वर्गीय जो कामचलाऊ शब्द-भंडार बरतता है, उसे ही उन्होंने अपना कारगर औजार बनाया है. उनकी सारी कविताओं में शायद ही कोई ऐसा शब्द हो जो असाधारण हो या दूर की कौड़ी लगता हो. वह कभी-कभी विन्यास को अप्रत्याशित मोड़ देकर या सामान्य शब्दों-छवियों को एकाग्र सघनता और पारदर्शिता देकर उनका अर्थ-विस्तार करते हैं. रूपकों और प्रतीकों की भाषा उनके लिए अप्रासंगिक है लेकिन यह असमर्थता नहीं है. इस तरह के प्रयोगों से एक नई ताजगी का अहसास होता है:
बत्तख का झुंड
बत्तख की तरह था.
बत्तख की तरह चोंच और पंख थे.
(‘लगभग जयहिन्द’ में कविता चार)
सुबह छह बजे का वक्त सुबह छह बजे की तरह
(‘लगभग जयहिन्द’ में कविता पाँच)
मध्यवर्गीय व्यक्ति की भाषा और उक्तियाँ कहावतों, उपमाओं आदि में वैसी रसी-बसी नहीं होतीं जैसी कि मसलन किसानों या मजदूरों की. उसकी भाषा कुछ-कुछ स्वाभाविक रूप से उनकी गहरी जड़ों से कटी होती है जो विविध अनेकायामिता और चित्रवर्णी समृद्धि को पोसती है. यह वर्गीय असमर्थता विनोदकुमार शुक्ल अपनी कविता में साफ स्वीकार करते हैं. पर इसी का इस्तेमाल वह निपुणता से एक ऐसी कविता रचने में करते हैं जो ‘मिनिमल’ है. युवा पीढ़ी के दूसरे महत्वपूर्ण कवि धूमिल जब-तब उद्दाम वक्तव्य देते हैं और कविता को वक्तव्य मानते भी हैं, लेकिन विनोदकुमार शुक्ल में ज्यादातर ठंडा और सपाट बखान है. उनकी कविता में धूमिल जैसी दृश्य-गतिशीलता भी नहीं है बल्कि खंडित और गद्यधर्मी ठहराव जैसा है. मध्यवर्ग के यातना शिविर में यत्किंचित् साधनों का प्रयोग कर इधर-उधर लिख ली गई इबारतों की तरह से कविताएँ हैं. लेकिन कहीं भी उनमें तदर्थता या कामचलाऊपन नहीं है. उनकी अन्तर्निहित छटपटाहट को यकायक पहचान पाना कठिन जरूर है, पर असंभव नहीं है. ऐसी सीमित-बाधित और विपन्न हालत में भी कविता संभव है- यह बात बहुत मार्मिकता के साथ विनोदकुमार शुक्ल की कोशिश सिद्ध करती है.
ठंडेपन, निरुद्धेग और सपाटबयानी के बावजूद विनोदकुमार शुक्ल की कविता का एक दूसरा पक्ष उनकी ऐंद्रिकता है. उनकी कविता में भावुकता के लिए कोई जगह नहीं है, लेकिन चीजों को उनकी भौतिक उपस्थिति की पूरी सघनता में उनकी कविता पकड़ और दिखा पाती है. दो-एक उदाहरण ही काफी होंगे:
हरे रंग का तोता
इतना जाना-पहचाना
कि तोता कम हरा रंग ज्यादा
तोता यदि निकलेगा
तो पिंजड़े में हरा रंग छोड़कर…
. . . . .
दूसरे पेड़ पर कौवे के बाजू में बैठी
रोती ज्यादा औरत की गोद में
खेलते ज्यादा बच्चे का
बड़े होने का भरोसा है…
यह नहीं है कि इस तरह की ऐंद्रिकता कभी-कभार या किन्हीं खास अवसरों पर ही झलकती हो: यह उनकी काव्य-प्रकृति का सहज और अनिवार्य अंग है. इसलिए छोटी कविताएँ हों या लंबी, उनमें संवेदना की यह ऐंद्रिक पकड़ हर जगह अचूक है. यही ऐंद्रिकता उनकी निरीक्षण की शक्ति को भी बहुत पैना बनाती है. किसी भी दृश्य या संबंध की बारीकियों को वह उसी के कारण अलक्ष्य नहीं कर पाते. विनोदकुमार शुक्ल की कविता में ‘मिनिमैलिटी’ के बावजूद, बहुत बारीक निरीक्षण का हमेशा साक्ष्य रहता है और कभी-कभी एक ऐसी अबोध सरलता भी, जो उनकी दहशत-भरी दुनिया में राहत का काम करती है.
फैंटेसी का भी इस्तेमाल इस कविता में है, लेकिन इतना बारीक और सुघर कि किसी तरह का झटका कभी नहीं लगता. एक बेहद सामान्य स्थिति के बखान को विनोदकुमार शुक्ल बहुत शांति और बिना किसी नाटकीयता के ऐसा मोड़ दे देते हैं कि कुछ अप्रत्याशित सामने आ जाता है, पर वह फिर सामान्य की ओर वापस चले जाते हैं. सामान्य और असामान्य के बीच एक द्वंद्वात्मक संबंध उनके यहाँ बराबर मिलता है, लेकिन कभी भी फैंटेसी और यथार्थ के बीच एक महीन अंतर से अधिक कुछ नहीं होता. दिलचस्प यह है कि फैंटेसी किसी तरह के इच्छित विश्वास या क्षतिपूर्ति की इच्छा का संस्करण नहीं बनती.
विनोदकुमार शुक्ल फैंटेसी और सामान्य के ऐसे तीव्रीकरण को कि वह असामान्य लगे- कभी चौंकाने के लिए इस्तेमाल नहीं करते. उनका काव्यशास्त्र चौंकाने का है ही नहीं: वह विचलित करने का है, हमारे समय की ऐसी सचाई दिखाने-समझने का है, जो अन्यथा अदृश्य रहती और जिसे कविता में देखना कहीं गहरे विचलित होना है.
कविता का काम जहाँ चीजों के बीच गए संबंध खोजना है, वहाँ चीजों को उनकी स्वतंत्र सत्ता में देखना भी है. अगर विनोदकुमार शुक्ल को ‘गरीब का लड़का’ प्रतीकों के बाबा-सूट में कहीं जाने को तैयार दीख पड़ता है तो वह एक और प्रमाण उनके उस आग्रह का है जिसमें वह एक चीज को ठीक उस चीज के रूप में निषेध करते हैं. चीजों और उनके संबंधों के प्रति यह सम्मान ही उन्हें गरीब लड़के को गरीबी का उदाहरण मानने को आसान प्रवृत्ति से मुक्त रखता है. हिंदी में हर चीज को किसी दूसरी चीज का प्रतीक मानने की इतनी भयनक रूढ़ि है कि चीजों और उनकी स्वतंत्रता के प्रति आदर और संवेदनशीलता का यह पुनर्वास मूल्यवान और कुछ मायनों में ऐतिहासिक है.
उनकी कविता इस अर्थ में बहुत मौलिक कविता है. वह चीजों को किन्हीं अन्य आशयों के लिए इस्तेमाल करने अर्थात् वस्तु-जगत का शोषण करने से जान-बूझकर बचती है- व्यक्ति-व्यक्ति के शोषण के साथ-ही साथ विनोदकुमार शुक्ल स्वयं माध्यम के, और किसी भी तरह के भावात्मक शोषण न करने के प्रति बराबर सतर्क हैं.
विनोदकुमार शुक्ल की कविता एक ठोस, जाना-पहचाना लेकिन अप्रत्याशित और विचलित करनेवाला संसार हमारे लिए खोजती-रचती है जो प्रामाणिकता और व्यापकता रखते हुए भी उनका है, अद्वितीय है और उदाहरण होने से बचा हुआ है. वह निश्चय ही हमारा भी है लेकिन अपनी पूरी सघनता, निर्ममता, वस्तुपरकता और ऐंद्रिकता के साथ एक संसार है, इस-उसका उदाहरण नहीं.
(पूर्वग्रह पत्रिका के जनवरी-फरवरी, 1977 अंक से आभार सहित)
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अशोक वाजपेयी ने छह दशकों से अधिक कविता, आलोचना, संस्कृतिकर्म, कलाप्रेम और संस्था निर्माण में बिताये हैं. उनकी लगभग 50 पुस्तकें हैं जिनमें 17 कविता-संग्रह, 8 आलोचना पुस्तकें एवं संस्मरण, आत्मवृत्त और ‘कभी कभार’ स्तम्भ से निर्मित अनेक पुस्तकें हैं. उन्होंने विश्व कविता और भारतीय कविता के हिन्दी अनुवाद के और अज्ञेय, शमशेर, मुक्तिबोध, भारत भूषण अग्रवाल की प्रतिनिधि कविताओं के संचयन सम्पादित किये हैं और 5 मूर्धन्य पोलिश कवियों के हिन्दी अनुवाद पुस्तकाकार प्रकाशित किये हैं। अशोक वाजपेयी को कविताओं के पुस्तकाकार अनुवाद अनेक भाषाओं में प्रकाशित हैं. अनेक सम्मानों से विभूषित अशोक वाजपेयी ने भारत भवन भोपाल, महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, रज़ा फ़ाउण्डेशन आदि अनेक संस्थाओं की स्थापना और उनका संचालन किया है. उन्होंने साहित्य के अलावा हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, आधुनिक चित्रकला आदि पर हिन्दी और अंग्रेजी में लिखा है. फ्रेंच और पोलिश सरकारों ने उन्हें अपने उच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया है. दिल्ली में रहते हैं. |




यह बेहद महत्वपूर्ण आलेख है…जिसमें वि.कु.शु.जी की कविता पर पूरे Gravitas से लिखा गया है…
गुज़र गए विनोद कुमार शुक्ल पर श्री अशोक वाजपेयी का लेख पढ़ा । वाजपेयी जी वक़्त को पीछे ले जाते हैं । अशोक जी का कभी-कभार क़ीमत देने पर उपलब्ध है । गुज़ारिश है कि निःशुल्क किया जाये ।
समालोचन ने आलोचकों, कवियों और लेखकों के फ़ोन नंबर लिखना बंद कर दिया । शायद ही किसी को फ़ोन किया हो । फ़ेसबुक पर के कुछ मित्र निकट और आत्मीय बन गए हैं ।
उदाहरण के तौर पर श्री अनवर सुहैल साहब ।
उन्हें सेतु प्रकाशन से श्री मधुकर उपाध्याय द्वारा लिखी बापू नाम से जीवनी डाकघर के ज़रिए तोहफ़े में भेजी थी । संयोग से आज मिली । उन्होंने फ़ेसबुक पर साझा की ।
३० जनवरी को महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है ।