टोडरमल मार्गत्रिभुवन |
डॉ. अनिल मिश्रा ने यूनिवर्सिटी से लौटते हुए आज मुझे न जाने कहाँ छोड़ दिया है. शायद ठीक वहीं, जहाँ मुझे छोड़ा जाना था; लेकिन यह बोध हमेशा कुछ देर बाद आता है.
मैंने पूछा भी नहीं. पूछना अब एक थकी हुई क्रिया लगती है. शरीर जब पहले ही अपने भार से झुक रहा हो तो जिज्ञासा भी अतिरिक्त बोझ हो जाती है. एक अनावश्यक पुराना बस्ता, जिसे जीवन यात्रा के अंत में भी कोई खोलता नहीं. घुटनों में दर्द है. वह दर्द जो चलता-टहलता रहता है, रुकता नहीं. वह दर्द, जो किसी ताज़ा चोट जैसा नहीं, किसी पुराने और अधूरे हिसाब की याद जैसा है; जिसे चुकाने का वादा तो किया गया था, पर तारीख़ कभी तय नहीं हुई.
१.
अनिल ने मुझे माधोसिंह सर्किल से शास्त्रीनगर जाने वाली सड़क पर उतारा. ठीक उस जगह जहाँ हाथी बाबू का मार्ग आकर अचानक रुक जाता है या कहूँ, जैसे सड़क ने स्वयं से ऊबकर आगे जाने से इनकार कर दिया हो.
मैं हाथी बाबू का मार्ग छोड़कर कांतिचंद्र रोड पर बढ़ता हूँ. सड़क परिचित है; लेकिन इसमें वैसा अपनापन बिलकुल नहीं है, जो कुछ सड़कों या राहों में हुआ करता है. कुछ रास्ते वाक़ई ऐसे होते हैं, जो नक़्शों पर कभी दर्ज़ नहीं होते. वे तभी प्रकट होते हैं, जब दिशा-बोध करवाने वाली सूइयाँ थककर गिरने लगती हैं और जब “कहाँ हूँ?” का सवाल “कौन हूँ?” में बदल जाता है.
भटकना यहाँ कोई भूल नहीं, सौंदर्य की एक गुप्त विधि है. जैसे भाषा अपने सबसे चमकीले बिंब तभी रचती है, जब अर्थ क्षण भर को रास्ता भुला दे. कुछ सुंदर पथ खो जाने की शर्त पर ही अपने होने की अनुमति देते हैं.
२.
छोटा-सा तो है टोडरमल मार्ग. चारों ओर दुकानें हैं, लोग हैं, वाहन हैं. बैंक हैं, कॉलेज है और स्कूल हैं. दर्ज़ी है, चाय वाला है, मंदिर है, मसीत है और एक ऐसा शोर है, जो सुनाई तो देता है, पर संवाद स्थापित नहीं करता. सब अपने-अपने काम में लगे हैं, इतनी तन्मयता से कि लगता है, यह शहर केवल चलने के लिए रचा गया है, रुकने के लिए नहीं. यहाँ ठहराव एक असावधानी है.
चलना भी तो एक तरह की असावधानी ही है. एक क्षणिक भरोसा कि ज़मीन आगे भी वैसी ही रहेगी, जैसी अभी पाँव के नीचे है. अब फुटपाथ कोई स्थायी संरचना नहीं रहा. वह एक स्मृति है. नगर-नियोजन की फाइलों में जैसे दबा हुआ कोई प्रागैतिहासिक वाक्य.
हम चलते हैं और अचानक पाते हैं कि चलने की जगह पर ही किसी ने कार पार्क कर दी है. एक क्या, कारें ही कारें. सड़क पर बेतहाशा दौड़ी कारें और फुटपाथ पर पार्क की हुई कारें. किसी ने कोई ट्रांस्फार्मर लगा दिया है, किसी ने ठेला लगा लिया है, किसी ने बजबजाता हुआ पेशाब घर बना दिया है और कहीं डेयरी बूथ लग गया है. रास्तों से फुटपाथ यों ग़ायब हो रहे हैं, जैसे लोकतंत्र हमारी जीवन व्यवस्था से अदृश्य हो रहा है और फिर अनुपस्थित और अंतत: ऐसा कि कोई पूछे भी नहीं कि वह था कब!
अब चलना केवल शरीर की क्रिया नहीं, एक नागरिक जोखिम है. हर क़दम पर यह संभावना नहीं, कहना चाहिए कि आशंका कि तुम ग़लत जगह मौजूद हो, सिर्फ़ इसलिए कि तुम पैदल हो.
३.
एक धूल-धूसर दिशासूचक पट्टिका दिखती है. कुछ पथरीली-सी, जैसे वर्षों से धूप और धूल दोनों ने इसे बराबर मटमैला दिया हो. उस पर काले अक्षरों में लिखा है टोडरमल मार्ग.
मैं अनायास रुक जाता हूँ. यह नाम मैंने पहले भी सुना है, पढ़ा है इतिहास की किताबों में, फुटनोट्स में, कभी-कभी किसी व्याख्यान की ऊबाऊ स्पष्टता में. लेकिन इस तरह इस समय इस काया के साथ यह नाम पहली बार सामने आया है.
टोडरमल मार्ग मेरे ज़ेहन में किसी स्मारक की तरह नहीं, एक घंटी की तरह टनटनाता है. धीमी. गंभीर. निरंतर. ऐसी ध्वनि शृंखला, जो कानों से पहले हमारे भीतर उतरती जाती है और धीरे-धीरे दूर होती हुई अपनी लुप्त होती कर्णप्रियता के साथ किसी अनजान जगह पर ठहर जाती है. वही जैसे साइकिल की वर्षों पुरानी घंटी. लेकिन अब इस मार्ग पर साइकिल के लिए जगह बची ही कहाँ है.
४.
असल में टोडरमल मार्ग पर न कोई मार्ग है, न टोडरमल है. सिर्फ़ एक सड़क है.
सीमेंट, गिट्टी और धूल की सड़क. बिना कोलतार के कोलतार वाली सड़क. पत्थरों से बनी हुई और पत्थरों की तरह ही चुप बिना पत्थरों वाली यह सड़क. यह सड़क मुझे साँस लेती हुई लगती है जैसे इसके भी फेफड़े हों. और उन फेफड़ों से निकलती हवा इतिहास की धूल है, जो वर्तमान की आँखों में भरती चली जाती है. इस क्षण मुझे लगता है कि समय स्वयं बीमार है और यह सड़क उसका लगातार खाँसना है.
मैं वहीं खड़ा हूँ.
और सड़क अपने मौन में मुझसे आगे बढ़ने की कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखाती. मैं पैदल चल रहा हूँ, कुछ सोचता हुआ कि अचानक एक कार मुझे कुचलने को होती है और मैं अपने दर्द से कराहता इतनी दूर कूदता हूँ कि यह मेरे लिए ही आश्चर्य है. क्या मुझमें इतनी शक्ति है कि मैं इतना दूर कूद सकूँ! मुझे इस हालत में देखकर जूतों की पॉलिश करता वह बूढ़ा ज़ोर से हँसता है और कहता है, यह सड़क पहले आज़ाद थी और अब क़ैद हो गई है. और इस क़ैद से छूटने की जल्दबाज़ी में इसके फुटपाथ वहीं के वहीं रह गए हैं.
मैं उस बूढ़े को गंभीरता से देखता हूँ और सोचकर रहा जाता हूँ कि एक बुलंद अख़लाक़ इनसान जूते गाँठ रहा है और जिसे जूते गाँठने थे, वह टोडरमल हो गया है.
५.
मैं सोचने लगता हूँ, कौन था टोडरमल?
यह प्रश्न अपने आप में ही टेढ़ा है, जैसे किसी पुराने दर्पण के सामने खड़े होकर चेहरा देखना. इतिहास की किताबें इस प्रश्न का उत्तर नहीं देतीं; वे बस हल्के-हल्के कंधे उचका देती हैं. इस खालीपन में जातियाँ प्रवेश करती हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसी पुराने खंडहर होते सूने मकान में पहले कबूतर और चमगादड़ आ जाते हैं.
इतिहास के कबूतर और चमगादड़ इसी तरह हर काल खंड में उड़ते-उड़ते और उलटे लटकते रहते हैं. कितने ही मकानों की स्मृतियाँ मेरे मानस पटल पर तैरती हैं, जहाँ वासंती हवाएँ गर्द-आलूद होकर ख़ाक की तरह उड़ती रहती हैं.
एक अख़बार में अग्रवाल सभा की ख़बर बताती है कि टोडरमल अग्रवाल था. यह घोषणा उतने ही आत्मविश्वास से की गई थी जितनी किसी वसीयत की सार्वजनिक घोषणा. कुछ समय पहले खत्री समाज ने उसे अपने कुल में शामिल कर लिया था और अभी-अभी कायस्थों के एक मंच से यह औपचारिक सूचना दी जा चुकी थी कि टोडरमल दरअसल उन्हीं का था. हमेशा से. पोरवाल समाज ने उनकी मूर्ति की स्थापना कर दी थी और उन्हें भगवा ध्वज पहना दिया था.
दरअसल, इन दिनों जातियाँ इतिहास के विराट् व्यक्तियों को अपने नाम की माला में ऐसे पिरोने लगी हैं, जैसे पहचान की कोई दौड़ हो; जिसमें जीत उसी की मानी जाती है, जो अतीत को जितनी तेज़ी से और जितना दूर तक अपने वर्तमान में गिरफ़्त कर ले. धर्म का भी यही हाल है और राजनीति का तो है ही.
गोत्रों की यह धुंध मुझे ठंडी लगती है. इतनी ठंडी कि उसमें पहचान फिसल जाती है, जैसे सुबह-सुबह संगमरमर की सीढ़ियों पर पैर.
लेकिन वह दिन याद आया जब हम चौड़ा रास्ता में साहू टी स्टॉल पर चाय पी रहे थे. लगभग संयोगवश, अशोक अग्रवाल, राजेंद्र खत्री, जीतू पोरवाल और राजकुमार सक्सेना एक ही मेज़ पर बैठे. चाय ठंडी हो रही थी और इतिहास पहली बार थोड़ा थका हुआ-सा लग रहा था. वहाँ बैठने की कोई जगह नहीं थी. एक जगह थी, जहाँ बहुत खुला दालान था और पीछे साड़ियों की दुकान. दुकान वाले ने बहुत चालाकी से दो पुरानी साइकिलों को इस चबूतरे के आगे इस तरह खड़ा कर दिया था, ताकि वहाँ कोई बैठ न सके.
चाय पीते-पीते एक बुज़ुर्ग ने साड़ी शॉप वाले को ज़ोर से कहा, ओए टोडरमल, साइकिलें हटा! इस पर ऊँचा ठहाका लगा तो अशोक, राजेंद्र, जीतू और राजकुमार ने एक-दूसरे को देखा और बोले, एक बात तो तय है, टोडरमल हिन्दू था. इस निष्कर्ष में एक विचित्र राहत थी, जैसे लंबी बहस के बाद किसी ने एक नई खिड़की खोल दी हो, चाहे बाहर का दृश्य कुछ भी हो.
चाय पीते उस बूढ़े का कहना था कि यह दुकानदार टोडरमल है पूरा. फ़ारसी में कानून बनाकर टांग देता है इन खटारा साइकिलों पर और कह देता है, महाराजा जयसिंह का आदेश है.
६.
लेकिन इससे भी ज़्यादा तय यह था कि टोडरमल नाप जानता था. सिर्फ़ ज़मीन का नहीं; धरती का भी नाप. मेहनत का नाप, जो हथेलियों में नहीं, पीठ की मांसपेशियों में दर्ज़ होता है. आदमी की हड्डियों का नाप कि वे कितना दबाव सह सकती हैं, बिना टूटे. और यदि टूटें तो उनका शोर कितना होगा. इतना कि दरबार तक पहुँचे या बस मिट्टी में दब जाए.
वह आज का नहीं, टोडरमल का ही समय था. हिंसा इतिहास के विराट व्यक्तियों, धर्म के शिखर नामों और अनलिखे इतिहास के अघटित प्रसंगों को अपने वर्तमान की माला में ऐसे पिरोने लगी थी, जैसे ज़ुल्म की कोई निर्दय दौड़ हो और उसी दौड़ की धूल में यह सावधानी से देखा जाए कि आदमी की रुलाई कितनी दूर तक पहुँच सकती है. यदि वह चीखे तो उसकी चीख कहाँ तक जाएगी; उसके आँसू गिने जा सकते हैं या वे गिनती से पहले ही सूख जाएँगे. अगर उसे अमानुषिक ढंग से मार दिया जाए तो क्या लोग उसके पीछे दरबार तक जाएँगे या दरबार की दूरी उसकी मृत्यु से भी लंबी होगी? यह पूरा प्रश्न उसकी ताक़त का नहीं, उसकी हड्डियों का नाप था; आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक दबाव की वह सीमा, जिसे वे बिना टूटे सह सकती थीं. और यदि टूटें तो उनका शोर कितना होगा—इतना कि सत्ता के गलियारों तक पहुँचे या बस मिट्टी में समा जाए, इतिहास की अगली जातीय दौड़ के लिए जगह बनाते हुए.
वह समय की संवेदना भी नापता था. कितनी जल्दी कोई युग थकता है और कितनी देर तक एक व्यवस्था ख़ुद को ख़ुदा मानती रहती है.
लेकिन टोडरमल ने खेतों को ऐसे पढ़ा जैसे कोई कवि बारिश को पढ़ता है. हर बूँद को अलग-अलग पहचानते हुए, हर मौसम को स्मृति में दर्ज करते हुए. उसके लिए मिट्टी एक पाठ थी और फ़सल एक टिप्पणी. उसने अन्न की भाषा सीखी और सत्ता से कहा, हिसाब भावनाओं से नहीं चलता; भावनाएँ तो सिर्फ़ आवाज़ करती हैं. हिसाब दिमाग़ से चलता है. ठंडा, स्पष्ट और निर्दय. उसने ग्रंथों का अनुवाद किया. शब्दों को एक भाषा से दूसरी में नहीं, अर्थ को व्यवहार में उतारने का प्रयास किया. शायद, इस क्रम में, उसने मनुष्यता का भी अनुवाद किया. हालाँकि यह अनुवाद हमेशा पूरा नहीं होता.
आज उसी के नाम की पट्टिका के नीचे इक्कीसवीं पीढ़ी खड़ी है. उँगलियाँ रस्सी बुन रही हैं. किसी खेल की तरह, किसी आदत की तरह. नाम बदल गए हैं, उच्चारण बदल गए हैं, दावे बदल गए हैं. लहजे नहीं बदले. वही कठोरता, वही आत्मविश्वास, वही यह मान लेने की सुविधा कि इतिहास ने पहले ही अपना फैसला सुना दिया है.
७.
मेरे मोबाइल में अचानक एक ऑडियो बज उठता है. किसी ने फ़ॉरवर्ड किया है. बिना भूमिका, बिना संदर्भ, जैसे कोई अनाम हाथ मेरे भीतर कुछ गिरा गया हो. आवाज़ साफ़ नहीं है; शब्दों के किनारे घिसे हुए हैं, बीच-बीच में हवा का शोर और किसी दूर खड़े व्यक्ति की हाँफ़ती हुई साँस. लेकिन अर्थ; अर्थ बिलकुल साफ़ है. भयावह रूप से साफ़. एक बूढ़ा मुसलमान. गायें. रास्ता. भीड़. रुकना. मारना. वाक्य पूरे नहीं हैं, फिर भी कहानी पूरी है. मारे जाने वाले का नाम अकबर था. अकबर ख़ान. उम्र नवासी वर्ष. यह विवरण किसी मृत्यु प्रमाणपत्र की तरह ठंडा है और उतना ही अंतिम.
मैं ऑडियो बंद कर देता हूँ. उँगली स्क्रीन पर टिकती है और आवाज़ अचानक कट जाती है. लेकिन जो आवाज़ बंद हुई है, वह असली नहीं थी. असली आवाज़ भीतर चलती रहती है; जैसे मेरे अंदर कोई बैठा हो, लगातार बोलता हुआ, बिना साँस लिए, बिना विराम. वह आवाज़ शब्द नहीं दोहराती; वह दृश्य दोहराती है. रास्ता फिर सामने आ जाता है, भीड़ फिर साँस लेने लगती है और अकबर; इस बार किसी तख़्त पर नहीं, ज़मीन पर पड़ा है. पड़ा क्या है, तड़प रहा है और तड़प क्या रहा है, कराह रहा है. कराह भी कहाँ, वह तो मार दिया गया है. सरकारी प्रवक्ता चिकित्सकों के हवाले से कहते हैं, मार से नहीं, बूढ़ा था तो सांस बंद होने से मर गया है. जवान होता तो अब तक दौड़ रहा होता! यह निराला समय है. निराली विधियों वाला. देश में रहते हुए ही देस-निकाला देने की नई विधियाँ खोज निकालने वाला.
८.
टोडरमल मार्ग के उस मोड़ पर दो सांड आपस में भिड़े हुए थे; उनके सींग हवा में नहीं, समय में टकरा रहे थे. और मैं, एक अवांछित-अनावश्यक दर्शक, मारे डर के उस सटीक क्षण में खड़ा था जब शरीर यह तय करने से पहले काँप उठता है कि उसे भागना है या गिरना; क्योंकि न भागने की स्थिति है और न गिरकर बचने की. मुझे लगा, अगले ही पल मैं उनके सींगों पर उछाल दिया जाऊँगा—किसी भूले हुए वाक्य की तरह, जिसे क्रोध ने विराम दे दिया हो. स्थिति ऐसी कि न दाएँ जाया जा सके और न बाएँ. आगे तो संभव ही नहीं और पीछे भी कहाँ जाओ! उस समय मेरे लिए चारों दिशाएँ एकदम एक साथ बंद थीं. जैसे शहर ने मेरे लिए अचानक भूगोल रद्द कर दिया हो.
मैंने तभी महसूस किया कि मैं पारीक कॉलेज की उस बहुत ऊँची दीवार पर खड़ा हूँ, जिस पर तीखे काँच ऐसे जड़े हैं कि कोई बिल्ली भी उस पर से न लांघ सके. जैसे स्मृति अपनी रक्षा स्वयं कर रही हो. मेरे घुटनों में असह्य दर्द था और मैं चल नहीं, बस घिसट रहा था. और इसी दर्द में मुझे अपने आप पर हैरानी हुई. इतने दु:ख, कष्ट और तकलीफ़ के बावजूद मैं अब भी इतनी ऊँची तीखे काँच लगी दीवार पर खड़ा कैसे हूँ?
कहते हैं, बहुत बड़े ख़तरे के सामने मनुष्य के पास दो ही रास्ते होते हैं. या तो वह उलटे पाँव भागता है या फिर मुक़ाबले की ठान लेता है. लेकिन टोडरमल मार्ग पर एक तीसरी ही स्थिति जन्म ले चुकी थी. न भागना, न लड़ना, स्थिर रह जाना—इतिहास की तरह, जो दो ताक़तों के बीच फँसकर बस खड़ा रहता है और देखता है कि किसका सींग उसे घायल करता है. घायल तो होना ही है. ज़िब्ह भी होना पड़ सकता है.
९.
अकबर तब भी था. अकबर आज भी है.
नाम समय के आर-पार चलता हुआ, जैसे कोई सिक्का जो सदियों तक हथेलियाँ बदलता रहता है, पर घिसकर भी पहचान नहीं छोड़ता. तब वह बादशाह था; तख़्त पर बैठा हुआ, इतिहास की मोटी जिल्दों में सुरक्षित. आज वह सड़क पर है. कभी ठेले के पीछे खड़ा, कभी ऑटो की सीट पर झुका हुआ, कभी दीवार पर रंग चढ़ाता हुआ, कभी खेत में कमर तोड़ता हुआ, कभी किसी मंच के नीचे खड़े होकर ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद करता हुआ. इन सब अकबरों में से कोई भी अब बादशाह नहीं है. लेकिन नाम; नाम बचा हुआ है. और नाम, जब बच जाता है तो काम आने लगता है. कभी डर पैदा करने के लिए, कभी डरने के लिए. एक ही शब्द, दो विपरीत दिशाओं में खिंचता हुआ.
उस बूढ़े अकबर को गाय ले जाते हुए रोका गया. यह विवरण किसी रिपोर्ट की तरह छोटा और ठोस है; लेकिन इसके भीतर का दृश्य बहुत विस्तृत और व्यापक है. उसे रास्ते पर नहीं रोका गया; रास्ता तो चलने के लिए होता है. उसे नफ़रत के चौक पर रोका गया, जहाँ हर चीज़ पहले से तय रहती है. वहाँ धर्म की मुहर लगी थी, जैसे किसी पुराने दस्तावेज़ पर लाल स्याही का ठप्पा. क़ानून चुप रहा. इतनी गहरी चुप्पी कि वह आवाज़ बन गई. और भीड़ की साँस गरम थी; तीनों एक साथ, इतनी सटीक संगति में, जैसे किसी पुराने दृश्य की रिहर्सल हो रही हो, जिसे सब पहले से जानते हों.
मैं सोचता हूँ; यह हिन्दू-मुसलमान का मामला नहीं है. यह विभाजन बहुत छोटा है, बहुत सुविधाजनक है. यह मनुष्य का इम्तहान है. यहाँ एक नाम कभी न्याय की इकाई था; माप, तौल और हिसाब. आज वही नाम ख़ौफ़ की इकाई बन गया है. एक संकेत, एक कारण और एक चेतावनी. यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ; यह धीरे-धीरे हुआ, जैसे अँधेरे में आँखें ढलती हैं और हम समझते हैं कि सब कुछ पहले जैसा ही दिख रहा है.
मैं ख़ुद को मिट्टी नहीं कहता. मिट्टी में अब बहुत कुछ मिलाया जा चुका है. राख, शोर, झूठ और जल्दी में किया गया न्याय. न्याय भी ऐसा कि उसका गरेबान जगह-जगह से रफ़ू.
मैं ख़ुद को स्मृति कहता हूँ. स्मृति भारी होती है. वह शरीर की तरह थकती नहीं; लौटती है, बार-बार, बिना अनुमति के. उसे रौंदा जा सकता है, उसे इतिहास की अपव्याख्या के बसूले से छीला जा सकता है और उस पर सम्मोहक घृणाओं का रंदा चलाया जा सकता है; लेकिन मिटाया नहीं जा सकता.
टोडरमल मार्ग के दोनों तरफ दो मूत्रालय हैं. बजबजाते हुए. एक पर सफ़ेद कली (सफ़ेदी) में लिखा है : सतयुग आएगा. एक पर बदरंग लाल सियाही से खंडित अक्षरों में लिखा है, क्रांति आएगी. इसके पास के महर्षि दयानंद उद्यान की दीवार पर श्राद्ध दिवस की पूरियाँ और हलवा रखा है और आश्चर्यजनक रूप से यहाँ असंख्य कौए निडर बैठे हैं.
सड़कें, पार्क और स्कूल ईंटों और पट्टियों से नहीं बनते. वे उन क़दमों से बनते हैं, जो गिरते हैं और फिर भी आगे बढ़ते हैं. मैं आगे बढ़ता हूँ—इस बोध के साथ कि चलना ही कभी-कभी आख़िरी प्रतिरोध होता है. और मैं चलता रहता हूँ टोडरमल मार्ग पर.
१०.
मैंने कहा था कि अकबर तब भी था. अकबर आज भी है.
यह वाक्य अपने आप में एक गोल चक्कर है, जैसे किसी पुराने सिक्के पर उभरा चेहरा—घिसा हुआ; लेकिन अब भी पहचानने योग्य. अकबर एक नाम है, और नाम जब बहुत पुराना हो जाता है तो वह आदमी से अलग हो जाता है. आदमी समय के साथ थकता है, झुकता है, धीमे-धीमे अपनी गति खो देता है और अंततः मर भी जाता है; लेकिन नाम—नाम वहीं रह जाता है. वह हवा में नहीं, इस्तेमाल में रहता है. वह चलने लगता है, घूमने लगता है, ज़रूरत के हिसाब से हाथ बदलता है. कभी पुकारने के लिए, कभी डराने के लिए, कभी पहचान तय करने के लिए, और कभी—सबसे सटीक क्षण पर—मारने के लिए.
कई बार नाम उस पुराने वस्त्र की तरह हो जाता है, जिससे मोह छूटता ही नहीं. उसे दु:ख में पहन लो, सुख में धारण कर लो, किसी अन्य परिस्थिति में लेकर चल दो. उसे कोई भी पहन ले. निर्धन पहन ले, बादशाह पहन ले, अमीर-फ़कीर कोई ओढ़ ले. नाम के इन वस्त्रों से मोह छूटता भी तो नहीं. कमबख़्त अब भी अकबर जैसे नाम रखे हुए हैं. कौन कहता है, यही नाम रखो. राम रख लो, देवीदत्त रख लो, मोहनकुमार मंगलम रख लो. कौनसा इन नामों के हीरे-मोती जड़े हैं. इनमें क्या है, जो इस तरह के नामों को देह की दौलत पर ख़तरे के निशान की तरह लटकाए फिरते हैं. हर क़दम तो यहाँ अजल हो गया है और हम घूम फिरकर इन नामों के वस्त्रों को पहनकर फिर कूच:-ए-क़ातिल में पहुँच जाते हैं.
११.
मैं मूंगफली ख़रीद रहा हूँ तो मूँगफली वाले से उसका नाम पूछता हूँ. वह बताता है अकबर. मुझे अचानक एक बहुत सस्ती सी इबारत सूझी : टोडरमल मार्ग पर मूंगफली बेचता है अकबर. लेकिन मैंने उसे देखा तो देखता ही रहा. मैं उसके चेहरे को देख रहा था. उसका बिना मूंछ लेकिन दाढ़ी वाला चेहरा! अचानक पारीक स्कूल की दीवार से कूद कर निकले दो लड़कों ने उससे मूंगफली ली और वे कुछ कहकर भागे. यह शब्द मैंने ठीक से तो नहीं सुना था; लेकिन शायद “आंतकवादी” था! हाँ-हाँ आंतकवादी ही, आतंकवादी नहीं!
टोडरमल मार्ग पर झाड़ू लगा रही बिंबो के बेटे को मैंने मूंगफली वाले से गजक लेकर दी तो वह कमर पर हाथ रखकर खड़ी हो गई. कहने लगी, क्या जमाना आ गया है. यह अक्कू (मूंगफली वाला अकबर) इतना सीधा है कि पहले गाय खरीदने-बेचने का काम करता था; लेकिन लिंचिंग के बाद ये कभी मूंगफली बेचता है और कभी सब्ज़ियाँ घर पहुंचाता है. और जब प्रोफ़ेसर्स अपार्टमेंट के फ़्लैट्स पर सब्ज़ी लेकर जाता है और लोग अंदर से पूछते हैं कि कौन? तो पता है ये क्या बताता है? मैंने कहा, क्या बताता है? वह बोली, सोचो. सोचो, सोचो! मैंने कहा, अकबर खान? वह बोली, ना! मैंने कहा, अकबर सब्जी वाला? वह बोली, नहीं!! मैंने कहा, अकबर बादशाह! वह बोली, ना!!! मैंने कहा, तो? वह बोली, “आंतकवादी, सब्ज़ीवाला”! बिंबो ख़तरनाक़ गुस्से में थी : “इन प्रोफ़सर कॉलोनी वालों को भी एक शब्द तक ठीक से बोलना नहीं आता. बोलते हैं, आंतकवादी!” यह संबोधन अब उसके लिए प्रजीत चाट भंडार, खूंटेटा आलू कचौरी और बूश्या हलवाई जैसा ही सामान्य हो गया था.
अकबर ने अपनी बाईं आस्तीन से लम्हों के ज़र्द पत्ते दरकिनार करते हुए मूंगफली सेंकने का अभिनय किया और फुसफुसाया— “बिंबो बहना, घर भी तो चलाना है. एक लफ़्ज़ से क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा!”
बिंबो की आँखें डबडबा गई थीं.
मैं मानो किसी ऊँची दीवार से कीकर के कांटों की ढेरी पर गिरा. लेकिन अब अगली बात से तो मुझे बिंबो ने और गहरी खाई में पटक दिया था. अकबर की इस प्रतिक्रया पर मैंने प्रश्नाकुल निगाहों से बिंबो की तरफ देखा तो वह बोली :
“दर बयाबाँ गर बशौक़े-काबा ख़्वाही ज़द क़दम.
सर-ज़ानिश्हा गर कुनद ख़ारे-मुग़ीलाँ ग़म मख़ूर.”
मैं फ़ारसी के शे’र का इतना शुद्ध और नफ़ासत भरा उच्चारण सुनकर अवाक् था. मेरा मुंह खुला का खुला रह गया. मैंने इस रास्ते पर आते-जाते बिंबो को अक्सर ही देखा ज़रूर था; और सोचा था कि वह झाड़ू लगाती है तो थोड़ा-बहुत पढ़ी लिखी होगी. बाकी तो क्या. उसके वस्त्र मुझे शुरू से ही सम्मोहित करते थे. लेकिन मैं यह कभी नहीं सोच पाया था कि वक्त उस दर्द का शजर है, जिसे सामने खड़े होकर भी कोई कहाँ देख पाता है.
मैंने अपना मोबाइल निकाला और उसका विडियो बनाने लगा तो उसने बहुत शालीनता से मना कर दिया. नहीं, सर. नो-नो. इसके बाद मैंने अपनी डायरी टटोली तो वह तो डॉ. अनिल मिश्रा की कार ही में रह गई थी. मैं अपने फोन की नोटबुक में नोट्स लेने लगा और उस शे’र का मतलब पूछा. बिंबो मुझे समझाने लगी तो मैंने ऑडियो नोट लिया, जो मैं सुन-सुनकर अक़सर हैरान होता रहता हूँ. वह बहुत नफ़ीस भाषा में अविरल बोली, “सघन वनवीथियों और तपते रेगिस्तानों से चलते हुए प्रफुल्लता से काबे के द्वार को ठेलकर अगर उसमें पग रखने की अभिलाषा है तो उस निशान पर विजय श्री का वरण करना बबूल के कांटों से पीड़ा को झेलने से इतर कुछ नहीं है.” मैं उसका मुँह देखता रहा गया.
बातचीत से पता चला कि बिंबो का शिक्षक बनने का सपना सपना ही रहा; क्योंकि उसे राजस्थान पब्लिक सर्विस कमीशन के इंटरव्यू बोर्ड ने तीन बार फेल कर दिया. अब वह सड़क पर झाड़ू लगाती है और शाम को बच्चों को पढ़ाती है. मुझे लगा, मेरे घुटनों का दर्द और बढ़ गया है और मैं अब चल नहीं पाऊँगा.
१२.
अकबर तब भी था और अकबर आज भी है. बिंबो तब भी बिंबो थी और बिंबो आज भी बिंबो है. फ़र्क़ बस इतना है कि तब वह अकबर तख़्त पर बैठा था, इतिहास की ऊँची कुर्सी पर और आज वह सड़क पर चलता है; भीड़ के कंधों के बीच, धूल और शोर के बीच. मैं सोचता हूँ कि इस देश में कितने अकबर होंगे. कोई ठेला लगाता होगा, सुबह-सुबह तराज़ू के पलड़े ठीक करता हुआ. कोई ऑटो चलाता होगा, शीशे में अपनी ही थकी हुई आँखें देखते हुए. कोई दीवारों पर पेंट करता होगा, रंगों के पीछे छिपा हुआ. कोई खेत में काम करता होगा, मिट्टी से लगातार संवाद में. कोई किसी पार्टी के लिए ज़िंदाबाद के नारे लगाता होगा, शब्दों को उधार की आवाज़ में उछालता हुआ. और कोई बस चुपचाप जी रहा होगा; इतना चुप कि किसी को उसका नाम पूछने की ज़रूरत ही न पड़े. इन सब अकबरों में से कोई भी अब बादशाह नहीं है; लेकिन नाम—नाम अब भी भारी है. इतना भारी कि कभी-कभी आदमी उसके नीचे दब जाता है, जैसे कोई पत्थर अचानक छाती पर रख दिया गया हो. और बिंबो तो बिंबो ही है. वह अतीत और वर्तमान में एक ही जैसी है. अकबर तो फिर भी 484 साल पहले बादशाह रहा है; लेकिन बिंबो तो 4840 पहले भी बिंबो थी और आज भी बिंबो है. बिंबो ने एक बात ज़रूर कही, अक्कू ने सोच ना होगा कि अतीत का एक नाम वर्तमान के दूसरे नाम के ज़िगर में पाँच साल बाद इतने नश्तर एक साथ उतार देगा.
१३.
मैं सोचता हूँ कि मैं बार-बार एक ही बात क्यों सोचता हूँ. जिस अकबर की आवाज़ मेरे मोबाइल के ऑडियो में आई थी, वह बूढ़ा था. उसकी आवाज़ में उम्र नहीं थी, उसमें थकान थी—वह थकान जो वर्षों की चुप्पी से बनती है. वाक्य पूरे नहीं हो पा रहे थे, शब्द बीच में अटक जाते थे और साँस बार-बार टूटती थी; जैसे हर साँस ख़ुद को साबित करने की कोशिश कर रही हो. वह गायें ले जा रहा था; यह तथ्य सबसे पहले कहा गया था, इतनी प्राथमिकता के साथ जैसे वही उसका अपराध हो. जैसे गायों का ज़िक्र न किया जाए तो बाकी कहानी अर्थहीन हो जाएगी.
उसे रास्ते पर नहीं रोका गया था. रास्ता तो चलने के लिए होता है, वहाँ रुकना असुविधा है. उसे नफ़रत के चौक पर रोका गया था; उन चौकों में से एक पर, जो हर शहर में होते हैं. नक्शे में उनका कोई नाम नहीं होता; लेकिन लोग उन्हें पहचानते हैं, ठीक वैसे ही जैसे लोग किसी डर को पहचानते हैं बिना उसका नाम लिए. वहाँ धर्म की मुहर लगी थी, किसी अदृश्य दस्तावेज़ पर लगाई गई ठप्पे की तरह. क़ानून चुप था; इतनी सटीक चुप्पी कि वह ख़ुद एक क्रिया बन गई थी. देश की राजधानी में बैठा इन्साफ़ इतना सटीक चुप्पी ओढ़े था कि उसके लिए कुत्ते का काटना बेक़ुसूर इन्सान को ज़िब्ह करने से अधिक अहम लग रहा था.
14.
और भीड़ साँस ले रही थी—तेज़-तेज़ और एक साथ. भीड़ हमेशा साँस लेती है. व्यक्ति सोचता है, हिचकता है, डरता है. भीड़ सोचती नहीं; वह सिर्फ़ साँस लेती है. अपना काम करती है. काम, जो भीड़ तय करती है.
किसी ने कहा—नाम पूछो. किसी ने कहा—पहले मारो, बाद में पूछेंगे. किसी ने मोबाइल उठाया, जैसे स्मृति को कैद करना कोई स्वाभाविक प्रतिक्रिया हो. किसी ने कैमरे की तरफ़ देखा और मुस्कराया—एक क्षणिक, अभ्यास की हुई मुस्कान. किसी ने नज़रें फेर लीं, इस सहजता के साथ जैसे यह सब किसी और के साथ हो रहा हो. एक बात साफ़ थी, लोग करते पहले भी थे यह सब; लेकिन अब हत्या का लाइव विडियो बनाना, हत्यारों के चेहरे एकदम साफ़ सामने आना और क्रूरता को नफ़ासत से उतारना और फिर भी पुलिस, प्रशासन अदालत और लोकसमाज में सलामत रहना एक नई रवायत थी. सारे क़ातिल अब एक धज से ऐसे थे कि उनके लिए मक़तल एक पवित्र धर्मस्थल से कम न था.
मैं यह सब सोचता हूँ और अचानक महसूस करता हूँ कि हिंसा भी एक तरह का उल्लास है और रक्तपात विलास. उस बूढ़े अकबर के पास सोचने का समय नहीं था. उसके पास सिर्फ़ शरीर था. और शरीर बहुत जल्दी जवाब दे देता है. शरीर को न तर्क समझ में आता है, न इतिहास. शरीर को सिर्फ़ दबाव समझ में आता है—और दबाव, जब बहुत सटीक हो तो नाम की ज़रूरत भी नहीं पड़ती.
15.
वह जो लड़का सबसे आगे खड़ा था और जिसने सबसे पहले और सबसे पहला प्रहार किया था, कहा जाता है कि टोडरमल की इक्कीसवीं पीढ़ी का एक वारिस था. वही तो बार-बार बताता था कि टोडरमल का खून दौड़ता है हमारी देह में. वह आजकल किसी गो-सेवक दल में शामिल है या किसी ऐसे संगठन में, जिसका नाम सुनकर लगता है कि वह जीवन बचाने के लिए बना है और काम देखकर लगता है कि वह मृत्यु को व्यवस्थित करता है.
16.
मैं टोडरमल के बारे में सोचने लगता हूँ. जैसे कोई पुरानी इकाई याद आती है, जिससे कभी दुनिया को मापा गया था. उस आदमी ने नाप-तौल सिखाया था. संख्या को सज़ा नहीं, एक नैतिक अनुशासन बनाया था. उसने हिसाब का तरीका बदला—कितना लिया जाएगा, कैसे लिया जाएगा और किससे लिया जाएगा—इन तीनों प्रश्नों को इच्छा के हाथों से छीनकर नियम के काग़ज़ पर रख दिया था.
टोडरमल ने मनमानी को क़ानून की पतली; लेकिन कठोर रेखा में बदल दिया था. ऐसी रेखा, जो शासक की हथेली से नहीं, ज़मीन की ज़रूरत से खिंची थी. उसके यहाँ नाप केवल खेतों की नहीं थी, मनुष्यों की भी थी—कि कितना बोझ कोई सह सकता है बिना टूटे.
आज वही नाप-तौल ग़ायब है. अब कोई इकाई नहीं. कोई स्थिर माप नहीं—सब कुछ एक भाव से चलता है. ग़ुस्से की अचानक बढ़ी हुई दर से, डर के अघोषित टैक्स से और पहचान की उस मुद्रा से जिसका मूल्य हर सुबह बदल जाता है.
पहचान अब नाप से बड़ी हो गई है. और जब माप हार जाता है तो इतिहास हिसाब नहीं रखता—वह सिर्फ़ याद रखता है कि किसकी आवाज़ ऊँची थी और किसका हिसाब चुपचाप चुकता हो गया या ग़ायब.
17.
अकबर अब सिर्फ़ एक आदमी नहीं रहा. वह धीरे-धीरे एक संकेत में बदल गया है. चलता-फिरता, असहज और आँखों के कोने से दिखने वाला. जैसे सड़क पर रखा कोई बोर्ड, जिस पर कुछ लिखा नहीं होता; लेकिन जिसे देखकर लोग अपने कदम अपने आप धीमे कर लेते हैं. वह एक चेतावनी बन गया है—इस बात की कि कौन-सा नाम किस घड़ी, किसके काम आ सकता है. नाम अब पहचान नहीं देता, वह समय बताता है. बताता है कि अभी हवा किस तरफ़ है.
18.
मैं सोचता हूँ, अगर टोडरमल आज ज़िंदा होता तो क्या करता. यह कल्पना मुझे किसी ऐतिहासिक बहस की तरह नहीं, एक निजी अभ्यास की तरह लगती है. शायद वह सबसे पहले भीड़ को गिनता. भीड़ को एक शरीर की तरह नहीं, अलग-अलग वज़न, अलग-अलग आशंकाओं में बँटे हुए व्यक्तियों की तरह. फिर वह हर आदमी का वज़न पूछता. शरीर का नहीं, डर का. फिर वह हिसाब लगाता कि कितना डर पैदा किया गया है और उसमें से कितना डर बाज़ार में उतारा जा सकता है. लेकिन टोडरमल अब सिर्फ़ एक सड़क का नाम है. और सड़कें; मैं यह बहुत देर से समझ पाया हूँ; कभी जवाब नहीं देतीं. सड़कें इतिहास, राजनीति और समाजशास्त्र का चश्मदीद गवाह भी होती हैं; लेकिन वे न गवाही देती हैं, न बयान और न ही सफ़ाई. वे सिर्फ़ सहती हैं और मौन रहती हैं. धूप, धूल, जूतों का दबाव और इतिहास का भार—सब कुछ सहना ही उनका स्वभाव है.
19.
मैं आगे चलता हूँ. घुटनों में दर्द अब पहले से और भी तेज़ है. शायद इसलिए कि अब मैं सिर्फ़ शरीर नहीं ढो रहा, स्मृतियाँ भी ढो रहा हूँ. स्मृति का वज़न अजीब होता है. वह मांसपेशियों में नहीं, चाल में उतरता है. चारों ओर पोस्टर हैं. चेहरे बहुत बड़े, वादे बहुत छोटे. हर चेहरा किसी न किसी तरह से मुझसे बात करता है. हर चेहरा कहता है कि वह मुझे बचाएगा. लेकिन कोई यह नहीं बताता कि किससे. अकबर को कोई नहीं बचाता. उसे बस रोका जाता है. पहले रोका जाता है, फिर पहचाना जाता है, और फिर; बिना जल्दबाज़ी के तय किया जाता है कि उसके साथ क्या किया जाएगा. यह तय करना ही असली प्रक्रिया है.
लोगों के हाथों में मोबाइल हैं. चमकती हुई स्क्रीनें, उठे हुए हाथ. हर कोई रिकॉर्ड कर सकता है. हर कोई गवाह बन सकता है. लेकिन गवाही अब भी दुर्लभ है. इतनी दुर्लभ कि जब वह होती है तो उसे अविश्वसनीय कहा जाता है. गवाहों की तो बात ही छोड़ दीजिए, अब तो रात को कुछ घटित हो रहा हो तो चाँद तारे भी इधर नहीं आते.
ऑडियो फिर चल पड़ता है. इस बार आवाज़ बदली हुई है. स्वर में एक आश्वासन है. कोई कह रहा है कि सब सही हुआ है. यह वाक्य अपने आप में बहुत आत्मविश्वासी है. मैं रुककर सोचता हूँ. सही क्या है. मारना? रोका जाना? चुप रहना? सही शायद वह होता है, जो बाद में समझाया जा सके.
20.
यह हिन्दू-मुसलमान का सवाल नहीं है. यह विभाजन बहुत सपाट है, बहुत आरामदेह. असली सवाल यह है कि कौन आदमी है और कौन भीड़? अकबर कभी सत्ता का नाम था. अब वह असुरक्षा का नाम है. और जब असुरक्षा किसी नाम से चिपक जाती है तो शरीर देर तक टिक नहीं पाता. शरीर सबसे पहले थकता है.
मैं टोडरमल मार्ग पर चलता रहता हूँ. यह मार्ग अब मेरे लिए सिर्फ़ एक नाम नहीं है. यह एक दर्पण बन चुका है. ऐसा दर्पण जिसमें देश अपना चेहरा देख सकता है, अगर वह ठहरकर देखना चाहे. लेकिन ज़्यादातर लोग ठहरते नहीं हैं. वे चलते रहते हैं. जैसे मैं चलता हूँ. जैसे सब चलते हैं. चलना यहाँ सबसे सुरक्षित मुद्रा है.
21.
टोडरमल मार्ग पर चलते हुए मुझे लगता है कि यह सड़क दिल्ली में संसद भवन से 292 किलोमीटर दूर होते हुए भी दिल्ली के भीतर है; जैसे दिल्ली की कोई नस यहाँ तक खिंच आई हो. यहाँ भी वही पोस्टर हैं, वही चेहरे हैं, वही मुस्कानें हैं जो भरोसा नहीं, आदेश देती हैं. यहाँ भी वही भाषा है—विकास, सुरक्षा, आस्था. और हर शब्द के नीचे वही ख़ामोश शर्तें, जिन्हें पढ़ने के लिए अब किसी को रुकने की ज़रूरत नहीं पड़ती.
दिल्ली का सबसे बड़ा आकर्षण यह है कि वह हर आने वाले को यह भरोसा देती है कि वह अकेला नहीं है. भीड़ है, आवाज़ें हैं, रोशनियाँ हैं, और हर मोड़ पर कोई न कोई मौजूद है.
लेकिन यह भरोसा धीरे-धीरे अपना उल्टा रूप दिखाता है. सच यह है कि दिल्ली सबको अकेला बना देती है. यहाँ अकेलापन किसी खाली कमरे जैसा नहीं होता; यह एक भीड़भरा अकेलापन होता है, जहाँ हर आदमी अपने चारों ओर लोगों से घिरा होता है और फिर भी अपने बचाव में अकेला खड़ा रहता है. हर आदमी जानता है कि अगली बारी किसकी है—यह कभी तय नहीं होता. और इसी अनिश्चितता से एक आदत जन्म लेती है: चुप रहने की. चुप्पी यहाँ डर का परिणाम नहीं, समझदारी का अभिनय बन जाती है. और यही चुप्पी दिल्ली की सबसे विश्वसनीय सहयोगी है—बिना शोर के काम करने वाली, बिना सबूत छोड़े साथ निभाने वाली.
मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर उस बूढ़े अकबर की घटना दिल्ली में घटी होती तो क्या सचमुच कुछ अलग होता. शायद बयान ज़्यादा सधे हुए शब्दों में आते, भाषा में थोड़ी सावधानी घुली होती और बहुत से बुद्धिजीवी-न्यायाधीश-मीडिया विश्लेषक नफ़ासत से एक हिंसा को गुनहगार के साथ हुई एक अदद सी घटना साबित करके निरस्त कर देते. शायद जाँच की घोषणा तुरंत कर दी जाती, इतनी जल्दी कि वह स्वयं एक दृश्य बन जाती. शायद कैमरे ज़्यादा होते—हर कोण से, हर चेहरे पर टिके हुए. लेकिन अंत में नतीजा वही रहता. क्योंकि दिल्ली परिणाम नहीं बदलती; वह सिर्फ़ प्रक्रिया को चमकदार और प्रभावशाली बना देती है. वह हिंसा को कच्चे रूप में नहीं रहने देती—उसे प्रबंधन में बदल देती है, क्रम में, फ़ाइलों में, प्रेस नोटों में. हिंसा वहाँ एक घटना नहीं रहती, वह एक व्यवस्थित प्रक्रिया बन जाती है.
22.
टोडरमल की पीढ़ियाँ यह बात समझती थीं. वे दिल्ली के साथ इसलिए थीं; क्योंकि दिल्ली से बाहर रहना अदृश्य होना था. एक ऐसा अस्तित्व जिसे न कोई दर्ज करे, न कोई याद रखे. दिल्ली के साथ रहना दिखना था, चाहे वह दिखना प्रशंसा के लिए हो या आरोप के लिए. दिखना ही मूल्य था. यही कारण है कि पीढ़ी दर पीढ़ी लोग दिल्ली की ओर देखते रहे; सत्ता के गुरुत्व के साथ, राजधानी की धड़कन के साथ, उस अदृश्य लय के साथ जो बताती है कि महत्व कहाँ पैदा होता है.
मैं चलता जाता हूँ और यह भी समझने लगता हूँ कि दिल्ली किसी को सीधे मजबूर नहीं करती. वह आदेश नहीं देती; वह विकल्पों को इस तरह सजाती है कि चुनाव पहले ही हो चुका होता है. वह मुस्कराकर कहती है—तुम स्वतंत्र हो; लेकिन दिशा यही है. यही उसका सबसे परिष्कृत कौशल है. इतिहास यहाँ सड़क नहीं होता, जिस पर कोई कहीं भी मुड़ सके; इतिहास दिशा होता है. और दिल्ली उस दिशा का नाम है.
मेरे घुटनों में दर्द फिर उभर आता है, एक पुराने संकेत की तरह. मैं रुकता नहीं; क्योंकि दिल्ली रुकने वालों को पसंद नहीं करती. दिल्ली पसंद नहीं करती तो जयपुर, भोपाल, शिमला या लखनऊ क्यों पसंद करें.
वह चलने वालों को गिनती है. उनके कदमों को, उनकी गति को, उनकी उपयोगिता को. जो चलते रहते हैं, वही उसके आँकड़ों में आते हैं. और जो गिर जाते हैं, वे बस एक फ़ाइल बन जाते हैं. संक्षिप्त, साफ़ और धीरे-धीरे धूल से ढँकती हुई.
23.
मैं समझने लगता हूँ कि दिल्ली से दूरी किसी नक़्शे पर खिंची रेखा नहीं होती. वह एक मानसिक माप है. ऐसा पैमाना, जिसे हर शहर चुपचाप अपने भीतर साधता रहता है. वह चाहे जयपुर हो, भोपाल, लखनऊ या कि शिमला. ये नाम काग़ज़ पर अलग-अलग बिंदुओं की तरह दिखते हैं, पर भीतर से वे एक ही दिशा में खिंचे हुए हैं, जैसे अदृश्य धागों से बँधे हों. वे दिल्ली की ओर देखते हैं, उससे प्रश्न नहीं करते. वे जानते हैं कि प्रश्न पूछना थोड़ा जोखिम भरा काम है; पहले देखना ज़रूरी है, पहले यह समझना कि सत्ता इस समय किस तरफ़ साँस ले रही है. इसी कारण हर शहर के भीतर एक छोटा-सा दिल्ली उग आता है. वही भाषा, वही तर्क, वही चुप्पी, वही त्वरित नैतिक समझौता, जो निर्णय से पहले ही उसे हल्का कर देता है. दिल्ली से दूर अगर कोई सुबह भी हो तो वह सब्ज़ा-सब्ज़ा सूखकर दोपहर तक ही शाम हो जाती है.
जयपुर में इतिहास पत्थरों में जड़ा है. किलों की दीवारों में या फिर महलों की छायाओं में. यहाँ स्मृति को ऐसे बेचा जाता है जैसे वह कोई दृश्य हो, एक सजावटी वस्तु, जिसे देख कर आगे बढ़ जाना है. पर वही स्मृति जब वर्तमान से टकराती है तो वह अचानक असहज हो उठती है. लोग कहते हैं, इतिहास को इतिहास की तरह देखो. वे भूल जाते हैं कि इतिहास सिर्फ़ देखा नहीं जाता, वह देखता भी है. वह देखता है कि कौन उसके नाम पर बोल रहा है और कौन उसके नाम पर “देख लेने” वाली मुद्रा में आ रहा है. जयपुर में दिल्ली की आदत इस तरह प्रवेश करती है कि हर निर्णय से पहले राजधानी का ख़याल किया जाता है. कौन नाराज़ होगा, कौन प्रसन्न, कौन नोट करेगा और कौन अपनी सुविधा से भूल जाएगा. मंटगुमरी जेल में सत्तर साल पहले फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के साथ कुछ रातें गुजार आया बूढ़ा गुलज़ारसिंह आजकल इसी सड़क पर पंचर लगाता है और बताता है कि दिल्ली, इस्लामाबाद या काबुल में कहीं कोई फ़र्क़ नहीं है. ये बेदादगरों की बस्तियाँ हैं और यहाँ फ़रियाद सर फोड़ती फिरती है.
भोपाल में स्मृति और डर एक-दूसरे से ऐसे चिपके रहते हैं, जैसे किसी पुराने दस्तावेज़ के पन्ने. वहाँ लोग जानते हैं कि हादसे कैसे सामान्य बन जाते हैं और कैसे वर्षों तक हवा में ज़हर रहते हुए भी जीवन अपनी चाल से चलता रहता है. कभी इधर सर पटकता और कभी उधर सर पटकता. भोपाल दिल्ली को इसलिए समझता है; क्योंकि उसने देखा है कि चुप्पी किस तरह नीति का रूप ले लेती है. वहाँ भी अकबर जैसे नाम हैं और वहाँ भी टोडरमल जैसे नाम हैं; लेकिन दोनों के बीच की दूरी हर साल बढ़ती जाती है. एक नाम सड़क बन जाता है, दूसरा
सावधानी और तीसरा अश्रुओं से आलोकित आबशार.
लखनऊ में भाषा सुसंभ्रांत और माधुर्य की लीला को समेटे है. लेकिन उसके नीचे एक कठोर अनुशासन छिपा रहता है. तहज़ीब के पर्दे में बहुत कुछ ढका रहता है—गुस्सा, हिंसा और डर. लखनऊ दिल्ली से इसलिए जुड़ा रहता है; क्योंकि उसने शब्दों से काम लेना सीख लिया है. वहाँ विरोध भी अक्सर इस तरह किया जाता है कि वह सत्ता को असहज न करे. स्मृति वहाँ सहेज कर रखी जाती है, जैसे कोई पुराना दस्तावेज़. ज़रूरत पड़ने पर निकालने के लिए, रोज़मर्रा के उपयोग के लिए नहीं.
24.
टोडरमल मार्ग से दिल्ली ही नहीं, लखनऊ भी साफ़ दिखता है. भोपाल भी, शिमला भी और अब तो मणिपुर भी. पुरख़ुलूस और सुसभ्य नज़ाकत का वह शहर लखनऊ, जहाँ भाषा पहले झुककर बात करती है और तल्ख़ी भी तहज़ीब ओढ़ लेती है; कौन जानता था कि वही शहर इतना क्रूर भी हो सकता है. यह मेरे ख़याल में तब आया जब मेरे सामने अचानक एक बुलडोज़र आ खड़ा हुआ और माथे पर तिलक लगे, बीड़ी पीते, बुरी तरह घूरते, मेरी माँ से शारीरिक संबंध जोड़ते चालक ने कहा, बुड्ढ़े परे हो जा. नहीं तो कट्-उउ- के एन्क्रॉचमेंट की तरह साफ़ कर दूँगा! वाक़ई मैं इसके लिए तैयार नहीं था.
कई बार क्रूरता शोर नहीं मचाती, मुस्कान के भीतर रहती है. कई बार वह करुणा और इन्सानियत के वस्त्र पहनकर आती है. जैसा कि आजकल आप देख ही रहे हैं. नफ़ासत से बोले गए ख़ूबसूरत लफ़्ज़ों और नपे-तुले इशारों में काफी कुछ ख़ामोश सा और उस ख़ामोशी में जहाँ संवेदना को निरर्थक घोषित करके टाल दिया जाता है. तहज़ीब यहाँ एक अजीब शब्द है, किसी ने एक दिन कहा भी तो था.
लखनऊ में हिंसा हमेशा हाथ उठाकर नहीं आती; वह अदब के दस्ताने पहनकर आती है, वह संन्यस्त भाव से चलती है. इहलोक से परलोक को सीधे जोड़ती हुई. इतना सलीक़े से कि पीड़ित को आख़िर तक यक़ीन ही नहीं होता कि वह नग्न ज़मीन पर खड़ा है और उसे चोट लगी है. यह लखनऊ से सीखते-समझते देश के किसी भी रजधनिया शहर को देखकर आसानी से कहा जा सकता है.
शिमला ऊँचाई पर बैठा हुआ शहर है. वहाँ से नीचे देखना आसान है और शायद इसी कारण शिमला ने दिल्ली को हमेशा एक दृश्य की तरह देखा है—दूर, पर निर्णायक. वहाँ भी फ़ाइलें चलती हैं, वहाँ भी आदेश उतरते हैं, वहाँ भी लोग जानते हैं कि मौसम बदल सकता है, पर दिशा नहीं. पहाड़ों में रहकर भी लोग मैदान की राजनीति से मुक्त नहीं होते; वे बस उसे थोड़ी देर से महसूस करते हैं, जैसे गूँज. जैसे बुलडोज़र.
इन शहरों को याद करते हुए मुझे लगता है कि देश किसी एक केंद्र से नहीं चलता, केंद्र की आदत से चलता है. दिल्ली एक आदत है—और यह आदत हर जगह फैल चुकी है. लोग अब यह नहीं पूछते कि क्या सही है; वे पूछते हैं कि क्या चलेगा. क्या चल जाएगा. क्या निकल जाएगा. यही प्रश्न हर शहर में गूँजता है—हर गली में, हर दफ़्तर में, हर परिवार के भीतर. और अब तक दिल्ली की जाने कितनी सलीबें मणिपुर के दरीचे में गड़ी हुई हैं.
25.
टोडरमल मार्ग कभी एक सड़क थी; अब वह एक प्रतीक है. वह बताती है कि नाम कैसे टिके रहते हैं और कैसे अर्थ बदल जाते हैं. टोडरमल ने कभी हिसाब को इंसाफ़ से जोड़ा था. आज उसी नाम के नीचे हिसाब इंसाफ़ से अलग हो चुका है. अकबर का नाम तब सत्ता था; आज वह असुरक्षा है. इन दोनों नामों के बीच फैला हुआ फ़ासला ही इस देश की कहानी बन जाता है.
हिंसा हमेशा शोर नहीं करती. अक्सर वह धीरे-धीरे आती है, इतनी सामान्य होकर कि पहचानी ही नहीं जाती. वह लोगों को यह विश्वास दिलाती है कि यह ज़रूरी था, अपरिहार्य था, टाला नहीं जा सकता था. और जब यह विश्वास जम जाता है, तब हिंसा अपना काम कर चुकी होती है. तब केवल बयान बचते हैं, जाँचें बचती हैं, स्मृतियाँ बचती हैं और स्मृतियाँ भी, थककर अपना भार हल्का करने लगती है. और दु:स्वप्न बनकर मासूम और अनचीन्हे भविष्य को कुतरने लगती हैं.
मैं अपने घुटनों के दर्द को महसूस करता हूँ. यह दर्द अब सिर्फ़ शरीर का नहीं रहा. यह एक तरह की स्मृति है, जो हर क़दम पर ख़ुद को दर्ज कराती है. मैं जानता हूँ कि कहानी यहाँ समाप्त नहीं होती. अकबर का नाम फिर लौटेगा. टोडरमल का नाम फिर किसी पट्टिका पर टँगेगा. दिल्ली फिर किसी नए तर्क के साथ सामने आएगी. शहर फिर अपने-अपने ढंग से उसके साथ खड़े होंगे.
यह हिस्सा बस इतना करता है कि मुझे एक यक़ीन दिला देता है. कि जो मैं देख रहा हूँ, वह नया नहीं है. कि यह दोहराव है. कि यह अभ्यास है. कि यह एक लंबी आदत है, जिसे देश ने सीख लिया है. और इसी समझ के साथ मैं आगे बढ़ता हूँ—यह जानते हुए कि अगला क़दम अंतिम नहीं होगा; लेकिन अंत की तैयारी ज़रूर करेगा.
26.
शाम उतर रही है; लेकिन यह उतरना किसी दिनचर्या का हिस्सा नहीं लगता. इसमें रोशनी है, हाँ, पर वह रोशनी गहरी काली है; जैसे दिन ने विदा लेते-लेते अपने ही अर्थ को जला दिया हो और राख अब हवा में तैर रही हो. सड़क पर फिसलती गाड़ियों की हेडलाइटें मुझे नहीं दिखतीं—वे मुझे देखती हैं, क्षण भर ठिठकती हैं और फिर आगे बढ़ जाती हैं, मानो मेरी मौजूदगी केवल एक क्षणिक परावर्तन हो.
टोडरमल मार्ग पर खड़ा मैं महसूस करता हूँ कि फैलता हुआ यह अँधेरा महज प्रकाश का अभाव नहीं है; यह एक साझा थकान है. एक सामाजिक थकान, जो हर चेहरे पर अलग ढंग से बैठती है, पर सबमें एक ही भार रखती है.
मुझे लगता है कि इतिहास अक्सर घटनाओं की तरह नहीं लौटता; वह भाषा की तरह लौटता है. शब्दों में, आरोपों में, नारों में या किसी गढ़े हुए झूठ में. कभी-कभी वह किसी शाम की तरह लौटता है, जब रोशनी का रंग बदल जाता है और हम उस परिवर्तन को सामान्य मान लेते हैं, जैसे आँखों की आदत हो गई हो.
27.
टोडरमल उस समय का आदमी था जब भाषा सत्ता का औज़ार थी, पर वह औज़ार व्यवस्था गढ़ने के लिए था, किसी देह को कुचलने के लिए नहीं. कहीं ऊपर, आसमान में, मुझे उसका चेहरा नहीं दिखता. केवल उसकी आकृति दिखती है: धुँधली, स्थिर—जैसे वह आदेश नहीं दे रहा, स्मृति को धीरे से उँगली से छूकर जगा रहा हो.
वह स्मृति बताती है कि सोलहवीं सदी के आख़िरी वर्षों में एक फ़रमान जारी हुआ था कि शासन की भाषा फ़ारसी होगी, जिसे ईरानी शैली में लिखा जाएगा. यह कोई सांस्कृतिक आक्रमण नहीं था; यह एक प्रशासनिक निर्णय था, उतना ही ठंडा और सुस्पष्ट जितना किसी खांचे में रखा गया दस्तावेज़. यहाँ भाषा पहचान नहीं थी; भाषा एक उपकरण थी. उसी फ़रमान में यह भी दर्ज था कि प्रशासन ईरानी और हिन्दू लिपिकों, सचिवों और मुंशियों से चलेगा—एक सलामत साझेदारी और एक सरगोश समावेशन के साथ. वह बात जिसे आज हम भाषणों में बार-बार दोहराते हैं, पर व्यवहार में उससे संकोच करते हैं. वही व्यवस्था आगे चलकर मुग़लों के लिए मॉडल बनी और फिर अंगरेज़ों के लिए भी. मानो इतिहास फुसफुसाकर यह कह रहा हो कि कुशलता की कोई एक जाति नहीं होती, कोई एक धर्म नहीं होता; केवल काम होता है और उसे करने का तरीका.
28.
मैं जिस मार्ग की बात कर रहा हूँ, वह दरअसल कोई मार्ग नहीं. एक लंबी, टेढ़ी स्मृति है, जो इस्तरी की ऊष्मा में हर सुबह दोबारा उभर आती है. इस स्मृति की सबसे विश्वसनीय व्याख्याकार अमीरा है. कपड़े प्रेस करने वाली अमीरा. जिसके हाथों में गरम लोहा और ज़बान में ठंडा, तीखा और बहुत दिलचस्प इतिहास है. वह कपड़ों की सलवटें निकालते-निकालते आपको बता देगी कि आप जिसे तेज धूप समझ रहे हैं, उसमें कितनी दूर तक कितना अँधेरा घुला हुआ है और इस अँधेरे में उस हादसे की कितनी बू मौजूद है, जो बताती है कि ख़ून-ख़राबा कितना हो सकता है और कहाँ तक जा सकता है.
अमीरा ‘ट’ को ‘ट’ नहीं, ‘ड’ को ‘ड’ नहीं, दोनों को एक ही साँस में कुछ ऐसा बना देती है कि लफ़्ज़ अपने आप इस्तरी होकर सपाट नहीं, सलवटदार हो जाते हैं. उसकी ज़ुबान से निकला “टोडरमल” आपके कानों तक पहुँचते-पहुँचते “टोटरमल” हो जाता है. शायद इसी कारण लोग एक बार प्रेस करवाए कपड़े भी दुबारा उसी के पास ले आते हैं; क्योंकि बातूनी अमीरा सिर्फ़ कपड़े नहीं, समय की सलवटें भी निकालती है.
वह बताती है; मानो याद नहीं कर रही, अभी-अभी देख कर लौटी हो कि टोटरमल अवध के लहरपुर का एक अनाथ बच्चा था. अनाथ—यह शब्द वह ऐसे बोलती है जैसे कोई पुरानी चादर हो, जिस पर न नाम लिखा हो, न वंश.
वह बताती है, टोटरमल ने तलवार चलाई, बहुत ज़ौहर दिखाए और अमीरा की हथेली हवा में चमकती है; लेकिन वह तलवार से ज़्यादा अपने बनाए कायदों में ज़िंदा रहा.
“याद रखिए,” वह कहती है, और इस्तरी कुछ पल के लिए कपड़े पर ठहर जाती है, “टोटरमल के कायदे. न कोई मुगल उन्हें बदल सका, न अंगरेज़, और न इस आज़ाद मुल्क़ में कोई और.”
मैं देखता हूँ. भाप उठती है, कपड़ा सीधा होता है और 997 हिज़री (सन् 1589) का लाहौर अचानक इस गली में उतर आता है, जहाँ टोटरमल मरता है या शायद सिर्फ़ कैलेंडर बदलता है. अमीरा के लिए हिज़री और ईसवी साल कोई गणित नहीं, बस अलग-अलग तरह की सलवटें हैं, जिन्हें वह अपनी सुविधा से निकालती-डालती रहती है.
इस गली की सबसे बड़ी इतिहासकार वही है. अमीरा. इतनी जानकारियाँ या तो उसकी गरम प्रेस के नीचे दबे-दुबके कपड़े में रहती हैं या फिर बीबीसी वाले संजीव श्रीवास्तव के पास, जिनका घर उसकी ड्राइक्लीनर्स की दुकान से गली के आख़िरी छोर पर दिखता है; ठीक वैसे ही जैसे किसी लंबे वाक्य का अंतिम विराम-चिह्न.
बाक़ी हम सब तो बस राहगीर हैं. अपने-अपने वस्त्रों और अपने-अपने वर्षों के साथ—और अमीरा हमें हर बार याद दिलाती है कि इतिहास दरअसल वही है, जिसे कोई ध्यान से इस्तरी कर दे.
अमीरा बताती है और बताते वक़्त उसकी आवाज़ में इस्तरी की गरमाहट घुल जाती है कि टोटरमल बहुत पूजापाठी और नितनेमी इनसान था. इतना कि उसके दिन की शुरुआत सूरज से नहीं, ठाकुर जी के सिंहासन से होती थी. वह सिंहासन कोई भारी चीज़ नहीं था. बहुमूल्य रेशमी वस्त्रों का एक छोटा-सा चौकोर सा आधार था; लेकिन टोटरमल के लिए वही उसका पूरा ब्रह्मांड था, चलायमान और अत्यंत नाज़ुक.
एक बार वह बादशाह के साथ सफ़र में था. सफ़र; जिसमें रास्ता कम और बेचैनी ज़्यादा होती है. उसी हड़बड़ी में कहीं उसका ठाकुर जी का सिंहासन छूट गया. पहले उसे लगा कि वह ख़ुद भूल आया है; फिर लगा, किसी ने चुरा लिया होगा. अमीरा यहाँ ज़रा रुकती है, इस्तरी उठाती है, फिर कपड़े पर रखती है और सच की सारी सलवटें निकालकर उसे सीधा कर देती है.
वह जैसे बहुत बड़े रहस्य को खोलती हुई बताती है, असल बात यह थी कि मुल्ला बदायूंनी ने उसे बहुत धीरे से;—इतना धीरे से कि किसी के प्रेस्ता तक को भनक न लगे; खिसकाकर कहीं फेंक दिया था. वह मुझसे बोली, प्रेस्ता समझते हो ना? मैं कुछ जवाब देता, उससे पहले ही वह बोल उठी : फ़रिश्ता. आजकल हम राजस्थानियों का प्रेस्ता वही टोटरमल के बाश्शा का फ़रिश्ता है.
“टोटरमल बिना पूजा-पाठ कुछ नहीं करता था.” यह ‘कुछ नहीं’ अमीरा ऐसे कहती है जैसे जीवन का पूरा व्याकरण उसी में सिमट गया हो. “सिंहासन ग़ायब हुआ तो टोटरमल ने न अन्नजल लिया, न ठीक से कभी सोया.” भूख और नींद, दोनों उनके लिए स्थगित कर दी गईं. मानो किसी कैलेंडर से दिन काट दिए गए हों.
वह बताती है, अब जब अकबर बाश्शा को यह मालूम हुआ तो उसने समझाया. अकबर की आवाज़ यहाँ इतिहास नहीं, तर्क बन जाती है. उसने कहा—ठाकुर जी चोरी गए तो क्या ईश्वर भी चोरी चला गया? क्या परवरदिगार यानी परमपिता परमेश्वर भी किसी थैले में रखकर उठा लिया गया?
“आप ध्यान करो,” अकबर बाश्शा ने कहा, “भजन करो—और भोजन भी करो.”
अमीरा मुस्कराती है, जैसे यह मुस्कान अकबर की तरफ़ से हो. वह कहती है, बादशाह ने अकल की बात की. और टोटरमल, जिसने कायदे बनाए थे, जिन्हें आज तक कोई बदल न सका, उसने उस दिन एक बात मान ली.
मैं देखता हूँ, कपड़ा फिर से सपाट है. सिंहासन ग़ायब है; लेकिन अन्न वापस आ गया है. और इतिहास, हमेशा की तरह, पूजा और तर्क के बीच किसी पतली-सी गली में खड़ा साँस ले रहा है.
इसी बीच जैसे किसी वाक्य में अनावश्यक-सा पर असरदार उपवाक्य चला आए, एक अधेड़ व्यक्ति आया. उसने इतना बड़ा पायजामा पहन रखा था कि वह किसी चलती-फिरती विरासत जैसा लग रहा था. उसने कपड़े प्रेस के लिए काउंटर पर फेंके और बिना पीछे देखे, लगभग अपराध-बोध की गति से गली में ग़ायब हो गया.
अमीरा हँस पड़ी. यह हँसी हल्की नहीं थी; इसमें काफी भाप थी.
उसने उस आदमी की ओर, जो अब सिर्फ़ स्मृति रह गया था; उँगली से इशारा किया और बोली, “पता है, इस आदमी का बरजू कितना पुराना है?”
मैंने कहा, “बरजू?”
“हाँ भई,” वह बोली, “वो जो पायजामा पहने था.”
मैंने अनुमान फेंका जैसे लोग पत्थर फेंकते हैं कि पानी की गहराई नाप सकें, “होगा साल-दो साल पुराना.”
अमीरा हँसी. वह हँसी जो हमेशा किसी कैलेंडर को चीर देती है.
“नहीं बीरा,” वह बोली, “ये चार सौ पचहत्तर साल पुराना है.”
मैंने भौंहें चढ़ाईं; शिष्ट लेकिन दृढ़ शब्दों में कहा, “बीबी, ये कोई बात हुई?”
वह फिर हँसी, इस बार और धीरे, जैसे सच को कपड़े के भीतर मोड़ रही हो.
“अकबर बाश्शा के दरबार में,” उसने कहा, “जब पहली बार टोटरमल आया था तो वह पहला हिन्दू था, जिसने धोती-मिर्ज़ई छोड़ी. उसकी जगह बरजू पहना, वही पायजामा; ऊपर चोगा धारण किया, पैरों में मोज़े चढ़ाए और तुर्कों का-सा रूप धर लिया. “घोड़े दौड़ाए,” अमीरा ने कहा, “और जंगें लड़ीं. और जाने कितनी फतहें हासिल कीं.”
मैंने कल्पना की—एक छरहरी सी काया, जो कपड़ों के साथ कैसे इतिहास बदल रही है!
सच मानिए, मुझे उसकी बातों पर कतई भरोसा नहीं हो रहा था. यह भरोसा न होना भी जैसे कथा का हिस्सा था; एक ज़रूरी अविश्वास. वह कह रही थी कि उस वक़्त जामिनी भाषा यानी फ़ारसी पढ़ने से हिन्दू परहेज़ करते थे. शब्द ‘परहेज़’ उसने ऐसे कहा, जैसे कोई ग़ज़ल के किसी शे’र का एक लफ़्ज़ गुनगुना रही हो.
“लेकिन टोटरमल ने,” अमीरा ने इस्तरी उठाते हुए कहा, “सबको पछाड़ दिया.”
कपड़ा फिर से सीधा हुआ. पायजामा अब सिर्फ़ कपड़ा नहीं रहा. और मैं समझ गया; इस गली में लोग अपने शरीर पर सिर्फ़ कपड़े नहीं पहनते, वे सदियों को भी पहनकर चलते हैं.
अमीरा मुझे टोडरमल के बारे में ऐसे बता रही थी; जैसे इतिहास नहीं, कोई पुराना रिश्ता खोल रही हो. मानो उसके और टोडरमल के बीच वर्षों नहीं, वर्षोंवर्ष का बहनापा रहा हो. वह उसे नाम लेकर नहीं, लहजे से पहचानती थी; जैसे किसी भाई को पहचाना जाता है; उसकी आदतों, उसकी हठ, और उसकी चुप्पियों से.
जब वह टोडरमल का ज़िक्र करती तो स्वर में न श्रद्धा होती, न आलोचना. बस एक घरेलू अपनापन. जैसे कह रही हो: “तुम उसे नहीं जानते, मैं जानती हूँ—वह ऐसा ही था.” उसके वाक्य तारीख़ों पर नहीं टिकते थे; वे स्मृति पर फिसलते थे. इतिहास वहाँ परिवार बन जाता था और कैलेंडर एक अनावश्यक काग़ज़.
मुझे लगा, यह बहनापा शायद किसी एक जन्म का नहीं था. यह उस अजीब रिश्ते जैसा था, जिसमें समय गोद लिया जाता है. अमीरा टोडरमल को अपने पास बैठाकर नहीं, अपने भीतर रखती थी; उसी तरह जैसे कोई औरत पुराने कपड़ों में से किसी बिछड़े प्रेमी की गंध पहचान ले.
और तब मुझे समझ आया: इस गली में इतिहास पढ़ा नहीं जाता, पालपोसकर भीतर सहेजा जाता है.
वह कहने लगी, इतनी सहजता से, मानो यह बात अभी-अभी घटकर लौटी हो कि जब टोटरमल फ़ारसी पढ़कर आगे निकला तो कुछ नाराज़ अमीरों की पेशानियाँ सिकुड़ गईं. वे अकबर बाश्शा के पास गए—शिकायत की तरह नहीं, जलन की तरह—और कहा: आपने एक काफ़िर को हम मुसलमानों के ऊपर इतने बड़े हक़ो-हुकूक दे दिए हैं!
अमीरा यहाँ ज़रा रुकती है. इस्तरी को उठाती है. फिर रखती है. जैसे अकबर को बोलने का समय दे रही हो.
अकबर बाश्शा ने; अमीरा की ज़बान में वह कोई बादशाह नहीं, एक तर्क था—कहा:
हर कुदाम शुमा दर-सरकारे-खुद हिन्दुये दारद्.
अगर माहम हिन्दुये दाश्तऽवाशीम्, चिरा अज-ओ बद बायद बूद्.
अगर हम हिन्दू रखते हैं तो इसमें बुरा क्या है? तुम सब अपने-अपने कारबार में कई-कई हिन्दू मुंशी रखते हो. मैंने अगर एक हिन्दू रख लिया तो क्या गुनाह हो गया?
फ़ारसी यहाँ किसी दरबारी भाषा की तरह नहीं, किसी पुराने चोग़े की तरह मेरे सामने फैल गई; लफ़्ज़ों की सलवटों में जैसे जाने कितने इतिहास बोध छिपे हुए हैं.
और तभी मुझे लगा—मैं टोडरमल मार्ग पर नहीं हूँ. यह कोई साधारण मार्ग नहीं, एक दुर्लभ वीथिका है—इतिहास की—जो मेरे लिए अचानक खुल गई है. जैसे किसी बंद आलमारी का पल्ला खुला हो और भीतर से 475 साल पुरानी हवा बाहर निकल आई हो.
मैं वहीं खड़ा रहा—आज में—और अकबर बोलता रहा—कल में.
29.
अमीरा ने टोडरमल का इतना कुछ बांच दिया कि मुझे अपने इतिहास बोध के दारिद्रय पर बहुत शर्म आई. आख़िर हम जब किसी सड़क से गुजरते हैं तो ऐसा क्यों होता है कि हम बेख़ुद होकर किसी ट्रक के पहिये की तरह रास्ते पर से निकल जाते हैं. अमीरा टोडरमल के शैशव से उसके आख़िरी दिनों के बारे में इतना सब कैसे जानती है, जबकि वह तो पढ़ी लिखी भी नहीं.
मेरे कानों में अमीरा के लहरदार लफ़्ज़ अब भी गूंजते हैं. वह कह रही है : अकबर बाश्शा के दरबार के नौरत्नों में टोटरमल का स्थान इतना ऊँचा था कि उसकी परछाईं भी कई आँखों में चुभती थी; ख़ासकर मुल्ला बदायूनी की, जिसे वह फूटी आँख नहीं सुहाता था; और इसी चुभन ने इतिहास के हाशिये पर एक विषाक्त शेर छोड़ दिया—
टोडरमल आँकि ज़ुल्मश बग़िरफ़्तऽ बूद् आलम.
चूँ रफ़्त सूये-दोज़ख़ खल्के शुदंद खुर्रम्.
यानी टोडरमल का ज़ुल्म मानो दुनिया की छाती पर रखा पत्थर था, और जब वह पत्थर नरक की ढलान पर लुढ़का तो लोग ख़ुशी से हल्के हो गए; यह वाक्य नहीं, एक ईर्ष्यालु साँस थी, जो मृत्यु के क्षण में भी न्याय का नहीं, प्रतिशोध का संगीत बजाती है; कहानी के भीतर यह फुसफुसाहट यों फिट होती है जैसे रेशमी परदे पर काले धागे की कढ़ाई; सत्ता के उजास में छिपी वह अँधेरी स्याही, जो किसी के ऊँचा उठते ही कलम की नोक पर ज़हर बन जाती है.
30.
बूढ़े टोडरमल के भीतर अचानक भक्ति जाग उठी थी; ऐसी नहीं, जो शोर करती है, वैसी, जो हिसाब-किताब की पीठिका पर धीरे से दीपक रख देती है. उसने बादशाहत के आँकड़ों, मौतों, विजयों और क्रूरताओं की अगणित गणनाओं के बाद हरिद्वार जाने की इच्छा जताई; कहा कि अब वह भगवान का भजन करना चाहता है, अब आख़िरी समय मौन को आज़माना चाहता है. वह मोक्ष के मार्ग पर चलना चाहता है. वह उस समय लाहौर से भी बहुत परे तैनात था. उसने अकबर से अनुमति माँगी. बादशाह ने पहले इजाज़त दे दी; शायद यह सोचकर कि भक्ति भी एक तरह का अनुशासन ही है. लेकिन बाद में जब टोडरमल हरिद्वार की राह पर निकल चुका था, नया फ़रमान आ गया. अकबर ने कहा, भगवान का भजन भगवान के बंदों की सेवा और सहायता से बढ़कर कुछ नहीं. बादशाह जानता था कि भगवान का भजन अगर भगवान के बंदों की सेवा से अलग हो जाए तो वह सत्ता के लिए ख़तरा बन जाता है. इसलिए हर बादशाह चाहता है कि भक्ति उसकी शक्ति से अलग न हो; क्योंकि शक्ति और श्रद्धा जब साथ हों तो क्रूरता भी पुण्य का मुखौटा पहन लेती है.
टोडरमल हरिद्वार तक नहीं पहुँचा; वह लाहौर में रुका; उसी तालाब के किनारे, जिसे उसने कभी अपने हिसाब से बनवाया था, जैसे पानी भी माप के भीतर रहना चाहिए. और वहीं, उसी तालाब के किनारे, उसकी ही जाति के लोगों ने उसे घेर लिया. वे लोग, जिन्हें उसने कभी बादशाहत के नशे में बिना अपराध के; सिर्फ़ अपराध के शक भर पर दंडित किया था.
वह एक चाँदनी रात थी. 8 नवंबर 1589 की. चाँद पूरा था और इनसाफ़ अधूरा. हत्यारे उसके पास मुरीदों की तरह आए; इतनी विनम्रता से कि क्रूरता भी अदब में लिपटी रही. उन्होंने उसे बेरहमी से मारा; लेकिन ऐसे जैसे वे उसका सम्मान कर रहे हों; मानो हिसाब बराबर कर रहे हों.
टोडरमल अकबर का नवरत्न था. राजा भगवान दास, जयपुर के राजा, उसके गहरे मित्र और मुरीद थे. दोनों के बीच रिश्ता सियासत से अधिक विश्वास का था. रूह का था, रूहानियत से भरपूर. टोडरमल की हत्या की ख़बर पहुँची तो भगवान दास लाहौर पहुँचे; उसकी चिता के पास खड़े हुए, जैसे किसी टूटे हुए तारे को अंतिम प्रणाम कर रहे हों.
और फिर, उसी शोक के कुछ ही दिनों बाद, 4 दिसंबर 1589 को, उल्टियों और पीड़ा के दौर से गुज़रते हुए, भगवान दास भी चल बसे. उनकी मृत्यु पर अकबर ने संवेदना का फ़रमान उनके पुत्र और उत्तराधिकारी मान सिंह प्रथम को भेजा. इतिहास ने उसे दर्ज कर लिया; लेकिन कहीं नहीं लिखा कि उस दौर में हिसाब मर गया था और भक्ति रास्ता भटक चुकी थी. इसलिए मानसिंह पिता के शव के साथ टोडरमल की स्मृतियों को भी जयपुर ले आए, जिसने एक दिन टोडरमल मार्ग का रूप धर लिया.
31.
उसकी मृत्यु की तारीख़ इतिहास में दर्ज है. ठीक, साफ़, नुकीली कलम से चमकती स्याही में; जैसे यह मान लिया गया हो कि जो दर्ज किया जा सकता है, वही सच है. लेकिन दर्ज नहीं हो सकता वह क्षण, जब कोई निर्णय सदियों बाद ग़लत पढ़ा जाने लगता है, जब अर्थ धीरे-धीरे अपनी जगह से खिसक कर किसी और प्रयोजन में जा टिकता है.
32.
अब, आज 2023 के आठ नवंबर को, उसकी इक्कीसवीं पीढ़ी की संतान दिल्ली की भाषा बोल रही है. राजा टोडरमल की भी और राजा भगवान दास की भी.
यह वही दिल्ली है, जिसकी भाषा बार-बार बदलती है; शब्द, मुहावरे, लिपियाँ; लेकिन जिसका लहज़ा नहीं बदलता. वही लहज़ा जो शिकायत की मुद्रा में कहता है कि इतिहास ने हमारे साथ अन्याय किया. वही लहज़ा जो एक ठंडे प्रशासनिक फ़रमान को गरम सांस्कृतिक षड्यंत्र में बदल देता है. वही लहज़ा जो यह तय करता है कि अकबर ने हम पर फ़ारसी लादी थी, और इसलिए आज गाय ले जाता हुआ एक बूढ़ा अकबर दंड का स्वाभाविक पात्र है.
यहीं मुझे कुछ समझ में आता है; बहुत साफ़, बहुत ठंडा, जैसे अचानक हाथ में आ गया कोई धातु का टुकड़ा. यह कि हिंसा अक्सर अज्ञान से नहीं आती; वह चयन से आती है. यह तय करना कि कौन-सा इतिहास याद रखा जाएगा, कौन-सा चुपचाप छोड़ दिया जाएगा और किसे सिर के बल खड़ा कर दिया जाएगा; यह एक सामाजिक चुनाव है.
टोडरमल का फ़रमान याद रखा जाता है, उसका संदर्भ नहीं. अकबर का नाम याद रखा जाता है, उसका समय नहीं. भाषा को मुद्दा बना लिया जाता है, ताकि शरीर को निशाना बनाया जा सके. यह कोई सीधी रेखा नहीं है; यह एक सुविधा-जनित वक्र है, जिसे समाज अपनी ज़रूरत के हिसाब से मोड़ता रहता है, कभी हल्के हाथ से, कभी पूरी ताक़त से.
33.
मैं देखता हूँ कि अँधेरा अब पूरी तरह उतर चुका है. यह अँधेरा किसी एक घटना का परिणाम नहीं है; यह परत-दर-परत जमा हुआ है; बयानों की तरह, चुप्पियों की तरह, छोटे-छोटे समझौतों की तरह, जो हर बार अपने आप को तर्कसंगत बताते हैं. इस अँधेरे में टोडरमल मार्ग एक साधारण सड़क नहीं लगता. वह मुझे एक प्रयोगशाला जैसा लगता है; एक खुली, बेतरतीब प्रयोगशाला, जहाँ यह परखा जा रहा है कि इतिहास को कितनी दूर तक खींचा जा सकता है, बिना यह स्वीकार किए कि उसे विकृत करने का काम वर्तमान ने ही किया है.
मैं अपने भीतर एक अंतिम विचार को जगह देता हूँ, बिना उसे ऊँचा उठाए, बिना उसे किसी निष्कर्ष की तरह सजाए. यह कि समाज तब सबसे अधिक असुरक्षित होता है, जब वह प्रशासनिक निर्णयों को पहचान की लड़ाई में बदल देता है. जब भाषा औज़ार नहीं रहती, हथियार बन जाती है. जब मृत्यु की तारीख़ें याद रहती हैं; लेकिन मृत्यु का कारण नहीं. टोडरमल की मृत्यु 1589 में हुई थी, यह दर्ज है. लेकिन उसकी समझ, उसका तर्क, उसकी साझेदारी; वे कहीं रास्ते में गिर गए. और अब उसकी इक्कीसवीं पीढ़ी, दिल्ली की भाषा में, उसी गिरे हुए अर्थ को उठाकर किसी बूढ़े शरीर पर पटक रही है, जैसे यही इतिहास का इनसाफ़ हो.
34.
शाम अब पूरी तरह काली हो चुकी है; पर यह अँधेरा किसी रंगमंचीय पर्दे के गिरने जैसा नहीं है. यह स्याही की तरह फैलता है, अपने ही वाक्य लिखता हुआ, बिना किसी आवाज़ के. सड़क अब भी है, अपने पुराने भरोसे के साथ. वही भरोसा जो हर दिन रौंदा जाता है और फिर भी बना रहता है. लोग अब भी हैं—कभी चलते हुए, कभी ठिठकते हुए, मोबाइल की नीली रोशनी में एक-दूसरे के चेहरे पहचानते हुए, जैसे पहचान भी अब एक अस्थायी क्रिया हो. मैं भी अब भी हूँ. और शायद यही इस कहानी का आख़िरी, सबसे असहज सच है कि इतिहास हमें आदेश नहीं देता; हम इतिहास को आदेश देते हैं. और फिर, बहुत देर बाद, उसी आदेश की छाया में खड़े होकर कहते हैं कि हमारे पास कोई विकल्प नहीं था; मानो विकल्प कभी किसी और की जेब में रहा हो.
35.
मैं सोचता हूँ कि जयपुर दिल्ली की ओर क्यों देखता है, भोपाल क्यों गर्दन मोड़ता है, लखनऊ क्यों ठहरकर सुनता है, शिमला क्यों ऊपर बैठकर भी नीचे झुकता है. इसलिए नहीं कि ये शहर कमज़ोर हैं, इसलिए कि दिल्ली ने उन्हें यह यक़ीन दे दिया है कि अंतिम निर्णय वहीं होता है. दिल्ली में रहकर ग़लत होना भी सुरक्षित लगता है, क्योंकि वहाँ ग़लती को नीति कहा जा सकता है. वहाँ हिंसा को व्यवस्था कहा जा सकता है. वहाँ चुप्पी को रणनीति प्रमाणित किया जा सकता है. शब्द यहाँ कवच बन जाते हैं.
दिल्ली की तर्कशीलता क्रूर है. वह भावनाओं से नहीं चलती, लेकिन भावनाओं का इस्तेमाल बारीकी से करती है. वह जानती है कि कब डर पैदा करना है, कब उम्मीद दिखानी है, कब पहचान को हथियार बनाना है और कब क़ानून को ढाल. दिल्ली जानती है कि भीड़ कैसे साँस लेती है और व्यक्ति कैसे डरता है. वह दोनों को गिनती है—ठीक वैसे ही जैसे टोडरमल खेतों को गिनता था. फ़र्क़ बस इतना है कि तब गिनती से न्याय निकलता था, और अब गिनती से सत्ता निकलती है.
दिल्ली के बारे में सोचते हुए मुझे यह भी समझ आता है कि वहाँ नैतिकता कभी ग़ायब नहीं होती; वह बस समझौते में बदल जाती है. दिल्ली कहती है, यह पूरी तरह सही नहीं है, लेकिन ज़रूरी है. यह पूरी तरह ग़लत नहीं है, लेकिन उपयोगी है. यही उसका नैतिक संतुलन है, उसका आरामदेह धुँधलका. यही वह जगह है जहाँ अकबर जैसे नाम असुरक्षा में बदल दिए जाते हैं, और टोडरमल जैसे नाम नीली या काली या सफेद पट्टिकाओं पर टाँग दिए जाते हैं. स्थिर, मूक, और सम्मानित.
दिल्ली में हर चीज़ का उपयोग होता है. इतिहास का भी, स्मृति का भी, घावों का भी. वहाँ घाव दिखाए जाते हैं, ताकि नए घावों के लिए जगह बनाई जा सके. वहाँ स्मृति को बार-बार दोहराया जाता है, ताकि वर्तमान को सही ठहराया जा सके. दिल्ली जानती है कि लोग भूलते नहीं हैं; लोग बस थक जाते हैं. और थकान सत्ता के लिए सबसे सुरक्षित ज़मीन होती है.
दिल्ली में सिक्कों की खनक थी. धातु की नहीं, भरोसे की. नाप-तौल की एक भाषा थी, जिसमें भावनाओं के लिए कोई अलग कॉलम नहीं रखा गया था. क़लम की इज़्ज़त थी, क्योंकि वही आदेश को आकार देती थी. हिसाब की हैसियत थी. और हैसियत सत्ता और समय की सबसे टिकाऊ मुद्रा होती है. वहाँ आदमी अपने नाम से पहले अपने काम से पहचाना जाता था; योग्यता वंश से भारी पड़ती थी; और दिमाग़ को तलवार से तेज़ माना जाता था. कम से कम सिद्धांत में, काग़ज़ पर.
दिल्ली ख़ून भी बहाती थी, यह बात कभी छुपी नहीं रही. लेकिन वह हिसाब भी रखती थी और कभी-कभी—कभी-कभी—इंसाफ़ भी करती थी. यही संतुलन या शायद उसका आकर्षक भ्रम, वह गुरुत्व था जिसने टोडरमल को बाँधे रखा. इसीलिए वह दिल्ली के साथ था. इसीलिए उसकी इक्कीसवीं पीढ़ी भी दिल्ली के साथ है. और उससे पहले की पीढ़ियाँ भी. सत्ता के गुरुत्व के साथ, राजधानी की धड़कन के साथ—उस लय के साथ जो बदलती नहीं, बस नए नामों में ख़ुद को दोहराती रहती है.
इतिहास फुसफुसाकर बताता है कि जयपुर, भोपाल, लखनऊ, शिमला—सब दिल्ली के साथ रहते हैं. टोडरमल की तरह. यह कोई औपचारिक घोषणा नहीं है; यह एक आदत है, जो पीढ़ियों में उतर जाती है, जैसे चाल या उच्चारण. इतिहास सड़क नहीं होता, जिस पर मनचाही दिशा में मुड़ा जा सके. इतिहास दिशा होता है और दिशा अक्सर पहले से तय रहती है, हमारे पूछने से पहले.
मैं चलता जाता हूँ.
क्योंकि समय का फेर वास्तव में कुछ नहीं बदलता.
सब कुछ वैसा का वैसा ही रहता है—बस शब्द बदलते हैं, तर्क बदलते हैं, चेहरे बदलते हैं.
दिल्ली चाहे जैसी भी हो—सब उसके साथ रहते हैं.
और अब मुझे यह भी साफ़ दिखाई देता है कि इतिहास के हर मार्ग पर, हर मोड़ पर, हर नाम-पट्टी के नीचे—टोडरमल खड़ा है. मौन. गणना करता हुआ. और हर समय एक न एक टोडरमल रहता ही है दिल्ली में.
36.
दिल्ली कोई स्थान नहीं है, वह एक आदत है; ऐसी आदत जो एक बार लग जाए तो शरीर बदल जाए, शहर बदल जाए, रास्ते, रिश्ते और रूहें बदल जाएँ, पर वह भीतर बनी रहती है. जैसे किसी पुराने इत्र की गंध, जो कोट बदल लेने पर भी अंदर अटकी रहती है.
डॉ. अनिल मिश्रा मुझे हर बार टोडरमल मार्ग पर ही छोड़कर आगे निकलते हैं और चलते हुए मुझे यह बात धीरे-धीरे समझ में आती है कि दिल्ली हमेशा सामने खड़ी नहीं होती; अक्सर वह भीतर बैठी होती है. वहीं से वह तय करती है कि किसे खींचना है, किसे ढीला छोड़ देना है, किसे दबाकर समतल कर देना है और किसे थोड़ी देर के लिए; सिर्फ़ थोड़ी देर के लिए ऊपर उठा देना है. दिल्ली तख़्त का नाम नहीं है; दिल्ली उस भाषा का नाम है, जिसमें तख़्त ख़ुद को सही ठहराता है.
टोडरमल यह जानता था. राजा भगवानदास को यह बोध था. राजा मानसिंह को यह रहस्य अच्छी तरह पता था. राजा जयसिंह को यह सब मालूम था. सभी राजा यही जानते थे. इसीलिए टोडरमल बादशाह अकबर के साथ नहीं था, वह दिल्ली के साथ था. क्योंकि दिल्ली में बादशाहत थी; और बादशाहत किसी एक आदमी की गर्दन के नीचे रखा हुआ तकिया नहीं होती, वह एक पूरा तंत्र होती है, अपने अंगों, अपनी धमनियों और अपनी स्मृतियों के साथ. जो यह समझता है, उसका शबे-ग़म का उफ़क भी सुबह की तरह झमकता है और जो नहीं समझता, उसका दामन दर्द से गुलज़ार हो जाता है.
दिल्ली में मुहरें थीं, भारी, ठंडी; लेकिन हृदयहीन—जो काग़ज़ पर गिरते ही फ़रमान को वैध बना देती थीं. दिल्ली में ख़ज़ाने की चाबियाँ थीं, जिनसे दूर-दराज़ के खेतों की मेहनत खुलती और बंद होती थी, जैसे कोई दराज़. दिल्ली में स्याही थी; ऐसी स्याही जो शब्द नहीं, परिणाम लिखती थी. और दिल्ली में हिसाब था; वह भाषा, जिसे सत्ता सबसे अधिक विश्वास के साथ बोलती है; क्योंकि हिसाब कभी भावुक नहीं होता.
टोडरमल मार्ग से मुड़ते हुए मैंने देखा : दिल्ली लोगों को सिर्फ़ सत्ता नहीं देती, वह उन्हें महत्व का भ्रम भी देती थी. दिल्ली फुसफुसाकर कहती थी और आज भी कहती है; यहाँ आओ, तुम्हारा हुनर देखा जाएगा; यहाँ आओ, तुम्हारी योग्यता को वंश से ऊपर रखा जाएगा; यहाँ आओ, तुम्हारे दिमाग़ को तलवार से तेज़ माना जाएगा. यही उसका आकर्षण था. यही उसका जाल. दिल्ली सबको बुलाती थी, दिल्ली सबको बुलाती है; ईमानदार को भी, चालाक को भी, हिंसक को भी, बेईमान को भी और चुप रहने वाले को भी, कवि को भी, कायर को भी, शायर को भी, संत को भी, शैतान को भी. वह सबको जगह देती है; लेकिन जगहें बराबर नहीं होतीं; कुछ जगहें खिड़की के पास होती हैं, कुछ दरवाज़े के पीछे. दिल्ली इनसाफ़ का क़त्ल करने के लिए इनसाफ़ की मूर्तियाँ गढ़ती थी. गढ़ती है.
|
भारत–पाक सीमा के एक गाँव में जन्मे त्रिभुवन जयपुर में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं. वे हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एडजंक्ट प्रोफेसर रह चुके हैं. उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं, “कुछ इस तरह आना,” “शूद्र: एक लंबी कविता,” और “राष्ट्रवाद के नवपरिप्रेक्ष्य .” त्रिभुवन अपने सूक्ष्म राजनीतिक विश्लेषण, संयमित भाषा और गहन पठनशीलता के लिए जाने जाते हैं. जयपुर में रहते हैं. thetribhuvan@gmail.com |



