| आदम की जात योगिता यादव |
जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र दोनों एक ही खिड़की पर बनते हैं. बिल्कुल एक ही तरीके से. इस खिड़की पर यह मेरा चौथा फेरा था. हर बार कोई न कोई कमी रह जाती और मुझे लौटना पड़ता. अब मेरी फाइल बस क्लियर होने ही वाली थी.
मगर इससे पहले, जरूरी कागज जुटाने के लिए मैंने कहाँ-कहाँ धक्के नहीं खाए थे. इस सफर में हर आम–ओ–खास के साथ बहुत अनूठा अनुभव रहा था मेरा. अपने–पराए सब गड्डमड्ड हो गए थे.
मैं हर बार एक ही सूट पहन कर आती थी. शायद इस कोशिश में कि वे मुझे पहचान लें और हर बार नए सिरे से पहचान न बतानी पड़े. मगर इसका कोई खास असर नहीं हुआ था.
चूहेदानी जैसे उस छोटे से छेद में हाथ घुसाकर मैंने रसीद आगे बढ़ाते हुए पूछा, “चेक कीजिए क्या यह फाइल क्लियर हो गई?”
“क्या नाम है?’
‘सीमा सिंह”
“कब पैदा हुआ था बच्चा?”
“नहीं, मुझे मत्यु प्रमाण पत्र लेना है.” मैंने दबी सी आवाज़ में कहा. आवाज़ ही नहीं, इन दिनों मैं अपने व्यक्तित्व में भी एक तरह का दब्बूपन महसूस करने लगी थी. चश्मे का नंबर बढ़ गया था, त्वचा में पीली रुखाई आ गई थी और बालों को बांधना मैं भूलने लगी थी. एक उदास मोटापा पूरे शरीर पर चढ़ने लगा था.
“अच्छा जी, कब हुई थी डेथ?” उसने कुछ नर्मी से पूछा –
“13 दिसंबर! “ बोलते हुए फिर से मेरी आवाज़ लरज गई, आंखें गीली हो गईं और हथेलियाँ ठंडी होने लगीं.
यही वो तारीख़ थी जब मैं पहली बार इस अस्पताल की तरफ आई थी और सोचा था कि अब कभी दोबारा इस दिशा में देखूंगी भी नहीं. पर कुछ छूट गया है यहाँ, जिसे लेने बार–बार यहाँ आना पड़ता है.
“आपको कुछ जगह साइन करने होंगे, बॉडी लेने से पहले.” सफेद कोट वाले उस आदमी ने कहा था, जिसे तीन घंटों से मैं बदहवास सी खोज रही थी, और जो बस दो मिनट पहले ढेर सारे उपकरणों के साथ जीवन बचाने की कोशिश का एक फूहड़ दिखावा कर रहा था. मगर सब बेकार.
प्रेम, चुनाव, पहचान और स्वीकार की लड़ाई का मेरा साथी घायल होकर विदा हो चुका था. उससे पिछले सप्ताह ही हमने अपने भावी जीवन की बहुत सारी योजनाएँ बनाईं थीं. खुद को लेकर, बच्चों को लेकर और अपने–अपने कॅरियर और मकान के बारे में भी. लग रहा था अब सब ठीक हो जाएगा, हमारे जीवन का संघर्ष अब समाप्त होने को है. समझ का वही सिरा जो बरसों की जद्दोजहद में छूट गया था, फिर से हम दोनों के हाथ आ गया था. मगर ये बस क्षणिक सुख था, कौर मुँह तक आया था, मुँह में गया नहीं था और एक दुर्घटना में सब चकनाचूर हो गया.
मैं एकदम खाली हो गई थी. लगा था कि जैसे सिर पर रखा पानी का भारी घड़ा फूट गया है. इतने बरसों में मायके और ससुराल, माँ और पति के बीच पुल बनती, समझौतों के पैबंद लगाती मैं बहुत थक गई थी. दोनों ही तरफ की आक्रामकता समय के साथ बढ़ती जा रही थी. शादी के कार्ड से शुरू हुआ जाति छुपाने का यह दबाव अब बच्चों के पासपोर्ट और इंस्टाग्राम अकाउंट तक आ पहुंचा था.
“भला हुआ मेरी गगरी फूटी, मैं तो पनिया भरन से छूटी.”
मगर जो गगरी फूटी थी, उसका पानी मेरी देह पर रिस रहा था, सिर से पांव तक. भीतर, बाहर, रोम–रोम में. हमें जाति से कोई मतलब नहीं था. समीर अपने नाम के साथ एक अलग ही शीर्षक लगाता था. मगर पिछले कुछ सालों से वह भी इसे एक जरूरी मसला मानकर जब तब झगड़ने लगा था. मैंने उसके खूबसूरत चेहरे को सहलाया. गाल का सौम्य स्पर्श मेरी हथेली में अवशोषित हो गया. मैं अकेली होकर भी अब हर पल उनके साथ थी. पहले से ज्यादा निर्भयी, पहले से ज्यादा नाजुक. कठोर इतनी कि कोई छू न पाए, और नाजुक ऐसी कि कोई छू दे तो बिखर जाऊं.
“चलिए कहाँ करने हैं साइन”, मैं उस सफेद कोट वाले के पीछे उसके बताए केबिन तक चल पड़ी थी. मफलर से अपनी आंखें पोंछते पापा मेरे साथ–साथ थे. सफेद कोट वाले ने कंप्यूटर पर जरूरी चीजें दर्ज कीं.
मैं अपना ध्यान कंप्यूटर स्क्रीन पर लगाने की कोशिश कर रही थी.
“नाम ग़लत लिखा है इसमें”, गालों पर ढुलक आए आँसू पोछते हुए मैंने कुछ भर्रायी आवाज़ में कहा था.
“क्या?”
“ये नाम नहीं है मेरे पति का”
“हमारे रिकॉर्ड में तो यही है, फिर से चेक करो”
“क्या चेक करूं?”
“मेरा मतलब है, पिछले अस्पताल से यही नाम आया था हमारे पास.” अपने सवाल पर वह कुछ अचकचा गया और झेंप छुड़ाने के अंदाज में बोला.
‘मैं बता तो रही हूँ उनका सही नाम, आप ठीक कर लीजिए सारे रिकॉर्ड.
ये देखिए उनका आधार कार्ड, ये पैन कार्ड सब में लिखा तो है उनका नाम.’ मैंने मोबाइल की गैलरी में मौजूद सरकारी दस्तावेजों की कॉपी दिखाई.
“ऑरिजनल कहाँ है? बहस का कोई फायदा नहीं, हमारे पास यही नाम है.”
“अजीब आदमी हैं आप, मेरी बात भी नहीं मानेंगे? मैं उनकी पत्नी हूँ.”
“हमें क्या पता, हम आप पर भरोसा कैसे कर लें, हमारे रिकॉर्ड के हिसाब से हमने जिसे ट्रीटमेंट दिया है, उसका नाम संजय है. ”
“हद है, वो अब बचे नहीं, उनकी पहचान की गवाही अब मैं किससे दिलवाऊं?”
“आप सुपरिटेंडेंट साहब से बात कर लो.”
सफेद कोट वाला अपनी बात पर अड़ा हुआ था. खुद को बहुत व्यस्त दिखाते हुए वह बार–बार चक्कर काट रहा था. मगर हर फेरे में वह पूछना नहीं भूलता, “क्या सोचा आपने?”
उसी आंखों में सामान्य से अधिक हरकत थी. उसकी पुतलियाँ बात करते हुए भी कई काेणों पर देखती रहती थीं. इन्हीं आंखों को घुमाते हुए उसने सुझाव दिया, “आप ऐसे ही परेशान हो रहे हो, बस एक एफिडेविट लगेगा और पंद्रह मिनट में नाम ठीक हो जाएगा. अभी की कार्रवाई तो पूरी करो. क्यों बॉडी को खराब करना!”
उसने फिर उन्हें बॉडी कहा था. मैंने आंख उठाकर उसकी तरफ देखा.
“अंकल जी, आप तो समझदार हैं. समझाओ बहनजी को.” सर और मैडम छोड़कर अब वह कुछ पिघली हुई भाषा में बोल रहा था.
“कर दे बेटा, जहाँ कहते हैं वहाँ साइन. नहीं तो ये सारे दिन यहीं बैठाकर रखेंगे. शाम होने वाली है, ज्यादा देर करना ठीक नहीं. बाद में बनवा लेंगे एफिडेविट.’’
“पापा ग़लत नाम पर साइन कैसे कर दूं. अब तक सबकी मानती आई हूँ. अब ग़लत पर साइन नहीं करूंगी.”
पूरी जिंदगी जैसे किसी रील की तरह मेरे सामने घूम गई. मैं उनकी पहचान के लिए डटी हुई थी, जिसे अब तक हर बार छुपाया ही गया था. पर पहले सिर्फ उनकी जाति छुपाई जाती थी, इस बार उनका नाम ही ग़लत हो गया था. मैं डटी हुई थी, कि मैं यहाँ से समीर वर्मा को ही लेकर जाऊंगी. अब न मैं उनकी जाति छुपाऊंगी और न ही ग़लत नाम स्वीकार करूंगी.
मैंने बहुत सालों बाद महसूस किया कि मैं पापा के सामने कुछ बोल सकती हूँ. मेरी हथेली में अब भी समीर के गालों की छूअन मौजूद थी. जिसके साथ होने के लिए मैं अब तक सब कुछ बर्दाश्त करती आ रही थी, क्या उसका छूटना मुुझे निर्भयी बना रहा है?
“अरे यार ठीक कर लो, कितनी देर लगेगी?” पापा ने गर्म हो रहे माहौल को संभालने की गरज से कहा.
“नहीं सर हम नहीं कर सकते. आप सीएमओ साहब से बात कर लीजिए. अब सब कुछ ऑनलाइन है. जो एक बार चढ़ गया वो चढ़ गया.”
बस इस चढ़े हुए ग़लत नाम को ठीक करवाने के लिए मैं अब तक चक्कर काट रही थी.
दूसरा दिन भी अस्पताल में उसी रस्साकशी के साथ शुरु हुआ था. सफेद कोट वाला किसी भी तरह मानने को तैयार नहीं था. थक हार कर असली और नकली नाम के बीच उर्फ लगाकर कागज तैयार करने पर सहमति बनी. पुलिस की फाइल भी बदली गई और अस्पताल के रिकॉर्ड भी. सभी में समीर उर्फ संजय वर्मा लिखा गया. मगर ये वर्मा लिखे हुए कागज पापा किसी को दिखाना नहीं चाहते थे. अस्पताल से पोस्टमार्टम तक, पोस्टमार्टम से एँबुलेंस तक और एँबुलेंस से मेरे ससुसराल तक, पापा एक शर्म का बोझ अपने साथ लिए चल रहे थे. जिस बात को उन्होंने 18 साल छुपाए रखा, वह इस तरह सबके सामने आएगी, उन्होंने सोचा भी नहीं था. भाभियाँ और बहनें जब मेरे ससुराल तक चलने को तैयार हुईं तो माँ ने बहन को इशारा किया. गाढ़े दुख की उस घड़ी में भी आंख का वह छोटा सा इशारा दीदी और मैं दोनों ही समझ गए. और सभी को रोक दिया गया. दुख अकेला नहीं आता, अपना कुनबा साथ लेकर आता है. इन्हीं छोटे–बड़े दुखों में घिरी मैं कभी–कभी दृश्य से गायब हो जाती थी.
पीछे वाले व्यक्ति के कंधा थपथपाने पर मैं वापस दृश्य में लौटी.
“ये फाइल तो चली गई.”
“चली गई, कहाँ चली गई?”
“फाइल तो परसों ही क्लियर हो गई. आप घर में पूछाे, कोई ले गया होगा.”
“किससे पूछूं, मैं ही आती हूँ हर बार, मेरे अलावा कोई नहीं ले जा सकता.”
“हमारे पास से तो चली गई. आधार कार्ड लाए हो?”
“हाँजी”, मैंने थैले से निकालकर दोनों आधार कार्ड खिड़की के भीतर सरका दिए. मैंने जल्दी–जल्दी मुट्ठियाँ खाेलीं और बंद कीं …. ताकि ठंडी होती हथेलियों में फिर से खून का बहाव हो. मुझे अभी बहुत काम करने थे.
“समीर वर्मा…., सीमा सिंह… कौन लगते हैं जी आपके?”
“मेरे पति हैं.”
“आप सिंह, वो वर्मा…!” वह गंभीरता से दोनों आधार कार्ड का अक्षर–अक्षर पढ़ने लगा. “ इंतज़ार करो आप थोड़ा, पता करते हैं.”
उसने दोनों आधार कार्ड वापस सरका दिए.
पीछे की लंबी कतार अपनी बारी के इंतज़ार में व्याकुल थी. मैं कतार से बाहर हो गई. यह पहली बार नहीं हुआ था. मेरे लिए नया नहीं था यह अनुभव.
ऐसे ही भाव आए थे उस डॉक्टर के चेहरे पर, इसी कौतुक से पूछा था उस पुलिस कर्मी ने भी, और लगभग ऐसे ही अनमने भाव से पीछे हट गया था वह बड़े चैनल का स्थानीय पत्रकार भी.
अस्पताल के रिकॉर्ड में नाम ग़लत होने पर जब दो दिन बाद भी हमें उनकी देह नहीं मिल पा रही थी, तब एक दोस्त ने उसे भेजा था हमारी मदद के लिए. तेज लेकिन सादा आदमी था वह. सुबह की ठंड में गरम लोयी लपेटे मोटरसाइकिल पर आया था और आते ही उसने कहा था, “अंकल जी आप बिल्कुल फिक्र मत करो. आप ने कल ही क्यों नहीं बताया, मैं खाट खड़ी कर देता सबकी. आप तो अपनी ही कम्युनिटी के हो. हमारी बहन–बेटी को ये साले ऐसे परेशान करेंगे! जिससे भी जरूरत पड़ेगी मैं बात करूंगा.”
बहुत भरोसे के साथ मैंने सारे कागज उसके हाथ में दे दिए.
“असली नाम क्या है?’
“समीर वर्मा “
“इन्होंने क्या लिख दिया?”
“संजय वर्मा”
“वर्मा हैं?”
“इंटरकास्ट है मामला?”
यह एकदम गैरजरूरी सवाल था, फिर भी मैंने जवाब में हामी भर दी.
इस सारी बातचीत को पापा सुन रहे थे और उसके ‘वर्मा और इंटरकास्ट’ कहते ही वे भी तनाव में आ गए थे. उनकी अपनी कम्युनिटी के एक अजनबी आदमी को पता चल गई थी, उनकी बेटी के दिवंगत पति की जाति.
उसने हमारे बयान लिए, वीडियो बनाया, फोटो खींचे और मोटर साइकिल पर सवार होकर लौट गया. वह छाेटे शहर का छोटा सा पत्रकार था, मगर उसकी कम्युनिटी बड़ी थी. कम्युनिटी के लिए उसका अपनापन गाढ़ा था. इसी अपनेपन में उसे यहाँ भेजा गया था और इसी कम्युनिटी की आन–बान–शान की खातिर इतने बरस मैं सबसे कटी रही थी.
अस्पताल में जुट आई यही सामुदायिक भीड़ पापा के चेहरे का तनाव बढ़ा रही थी. वे भावनात्मक रूप से लाचार थे, बूढ़े थे, अकेले थे. उन्हें इस समय सहयोग और सांत्वना दोनों की जरूरत थी. मगर मेरे चाचा, ताऊ, मामा, बुआ के बच्चों का आना, सब जानना उनके बरसों के जोड़े झूठ को ध्वस्त कर रहा था. यह उनके लिए दोहरा आघात था.
समीर के जाने के दुख में सब नाते–रिश्तेदार मुझसे लिपट पड़े थे. मगर मुझे अब किसी से नहीं मिलना था. सबका गले लगना मुझे कांटों सा चुभ रहा था. हमारी शादी के खिलाफ खड़े हुए ये दोनों पक्ष के लोग, क्या अब हमारा रिश्ता टूटने का जश्न मना रहे हैं? मुझे किसी से कुछ नहीं कहना था. मेरा मौन संवाद केवल समीर से था.
समीर आखिरी बारी जिस रजाई से उठकर निकला था, शोक के 13 दिनों में मैं उसी रजाई को लपेट कर बैठी रहती. ये दिन गुजरते ही मैं अपने काम में लग गई थी. मुझे बच्चों की पढ़ाई देखनी थी, समीर के छूटे हुए काम करने थे. उसका नाम ठीक करवाना था, जो अब भी समीर उर्फ संजय वर्मा के नाम से दर्ज था. परिवार में कई वकील, कई पुलिस अधिकारी थी. मगर मम्मी–पापा नहीं चाहते थे कि किसी के भी ध्यान में यह बात जाए.
मैंने प्रेम किया था, वह भी जात बाहर. यहीं से मेरी अपराध कथा शुरू हुई थी. एक होनहार लड़की से खुदगर्ज बेटी और फिर एक गुमनामी में खो जाने वाली अनावश्यक स्त्री तक. परिवार की, सात पुश्तों की इज्जत की परवाह किए बगैर मैंने अपनी मर्जी से शादी करने की जिद की थी. मेरे बान बैठने तक वे खोजते रहे थे कि कोई अच्छा घर–वर मिल जाए. मगर मेरी नौकरी भी इसमें उनके लिए मुश्किल खड़ी कर रही थी. मजबूरन उन्हें इस शादी के लिए मानना पड़ा था.
मगर यह मानना इतना आसान नहीं था. यह शादी पूरी तरह नाटकीयता से भरी थी. जात बाहर, माने जात बाहर, फिर चाहें वह कोई भी जाति हो. मेरे बाद मेरे छोटे भाई–बहनों की शादी कैसे होगी, इसी अनावश्यक डर से माँ ने सख्त हिदायत थी कि मैं अपने परिवार और उसकी जाति के बारे में किसी को कुछ न बताऊं, कभी भी.
शादी के कार्ड पर समीर के नाम के अलावा, उसकी जाति, उसका शहर, उसका गोत्र सब ग़लत लिखे गए थे. यह त्रुटिपूर्ण निमंत्रण पत्र मेरे किसी काम आने वाला नहीं था. न मैंने अपने दफ्तर में यह कार्ड दिया, न अपनी सहेलियों को. यह सिर्फ रिश्तेदारों में बांटा गया था. छोटी बहनें, मौसियाँ, मामियाँ, चाची, ताई, मैं सबकी बहुत लाडली थी. मगर अब किसी को भी मुझसे बात करने की अनुमति नहीं थी. सच मैं बता नहीं सकती थी और झूठ मैं क्या बोलती. जाति छुपाने के लिए शहर से दूर जाकर शादी का आयोजन किया गया था. जहाँ गाँव–कस्बे, आस–पड़ोस से कोई पहचान न पाए कि मेरी शादी किस जाति में हो रही है. पूरी शादी में माँ और पापा खिंचे–खिंचे रहे थे. बल्कि एक बार तो लगभग भिड़ ही गए थे, मेरी होने वाली सास और ननदों से.
इस अनावश्यक भिड़ंत से पहले तक समीर का संबल था मेरे साथ. मगर परिवार की बेइज़्ज़ती उनके सिर चढ़ गई थी. वे अब किसी भी तरह बस शादी करके यहाँ से विदा होना चाहते थे. मेरे परिवार से मिली सारी बेइज़्ज़ती, सारा तनाव, ससुराल पहुंचते ही मुझे तोहफे में लौटा दिया गया था. जो सारी उम्र मेरे साथ रहा. यह तनाव, यह खटास हमारे रिश्ते का एक अवांछित मगर स्थायी तत्व बन गई थी. जिसे कम करने में हर बार मुझे अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती थी. मैं अब भी वही अतिरिक्त मेहनत कर रही थी.
२.
कुछ देर चक्कर काटने के बाद मैंने फिर खिड़की पर पूछा, “मेरी फाइल का कुछ पता चला?”
“नहीं मिल रही जी. आप भी ढूंढो, हम भी ढूंढ रहे हैं. आप अगले शुक्रवार को आना.”
एक और छुट्टी बेकार हो गई थी, बिना काम बने. मैंने लौटने से पहले फिर उन्हीं को फोन किया जिनसे इस बार फाइल जल्दी क्लियर करवाने के लिए सिफारिश लगवाई थी.
फाइल न मिलने, और अगली तारीख़ मिलने की बात सुनते ही उन्होंने विभाग के लोगों को देशज में कुछ अश्लील गालियाँ दीं. फिर मेरे सामने यह सब कहने के लिए सॉरी कहा और मुझसे वहीं कुछ देर इंतज़ार करने को कहा.
वे एक पुलिस कर्मी थे और लगभग हर रोज किसी न किसी केस के लिए अस्पताल आया करते थे. मेरी दोस्त की दोस्त के कारण उनसे मेरा परिचय हुआ था. जो रिश्ते में उनकी भांजी लगती थी.
वे बहुत आदर से मिले थे. शुक्र है कि जितना गुस्सा उन्होंने फोन पर दिखाया था, व्यवहार वैसा नहीं था.
“आओ जी आप मेरे साथ.” वे मुझे अपने साथ खिड़की वाले कमरे में ले गए. फाइलों से भरे हुए रैक, बोरों में भरी हुई फाइलें, धूल की परतों में सने रजिस्टरों के अंबार से भरा हुआ कमरा. सीलन, रद्दी और पसीनों की मिलीजुली गंध वाला कमरा, जिसमें खिड़िकयों से सटी मेजों पर कंप्यूटर रखे थे. यहाँ सब उन्हें पहचानते थे. लोग उन्हें नमस्कार कर रहे थे, बहुत ही दोस्ताना अंदाज में.
मेरी फाइल के बारे में उन्होंने पूछा. कुछ बातें मेरे सामने हुईं और कुछ इतने धीमे स्वर में, लगभग इशारों में कि मुझे समझ ही नहीं आईं. बगल में ढेरों फाइलें दबाए वे कई व्यक्तियों से मिल रहे थे.
“चाय पिलाओ मैडम को”, वहीं एक कुर्सी खींचकर मेरी तरफ बढ़ाते हुए उन्होंने चपरासी को आदेश दिया.
बच्चे स्कूल से आ गए होंगे, मैं घर लौटना चाहती थी. मगर मैं बैठ गई, अगर थोड़ा और समय लगाकर आज ही फाइल मिल जाए तो कितना अच्छा हो.
चाय आई, पकौड़े आए,
पूरा स्टाफ इसी टेबल पर आ जुटा था. बाहर अब भी वैसी ही कतार लगी थी. मैं उनके घर–बार की बातें, विभागों की राजनीति, आने–जाने, नियुक्ति–तबादलों के किस्से सुन रही थी. जो मेरे लिए एकदम फिजूल थे.
“ऐसा है मैडम, फाइल आपकी मिल जाएगी. आप घबराओ मत. मैं बैठा हूँ न. समझो अब ये मेरा काम है. आपको आना ही नहीं है. फाइल क्या, सब कुछ ठीक होकर, सर्टिफिकेट आपके घर आएगा.”
“बहुत–बहुत धन्यवाद.’ मैंने अभिभूत होकर कहा.
“घर कैसे जाओगे? गाड़ी है?’
“मैं टैक्सी कर लूंगी.”
“मैं छोड़ देता हूँ आपको, कहाँ परेशान होगे.”
संकोच के बावजूद मैं उस दोहरे कद और भारी–भरकम आदमी के प्रस्ताव पर उसकी कार में बैठ गई.
“आप सिर्फ मुझे टैक्सी स्टैंड तक छोड़ दीजिए, मैं चली जाऊंगी आगे.”
“घबराती क्यों हो आप इतना? जहाँ कहोगे, वहाँ छोड़ देंगे. ये तो छोटा सा काम है, आगे भी कभी कैसी भी जरूरत पड़े, तो मुझे फोन कर लेना.
अभिलाषा का फोन आया था मेरे पास. जबी मैं भागा–भागा आया, कि भाई ये काम किसी और के बस का नहीं है. मुझे ही चलना पड़ेगा.
सीएमओ दोस्त है मेरा. मैं जहाँ कह दूं, वहाँ साइन करेगा.”
“मैं कितने ही चक्कर काट चुकी हूँ. हमेशा कोई न कोई ऑब्जेक्शन लगा देते हैं.”, मैंने अपनी परेशानी थोड़े और विस्तार से बताई.
“आप ग़लत जगह जा रहे थे न, सही जगह आप अब आए हो, गियर बदलते हुए उसने मेरे हाथ को छू दिया.”
मैंने इसे अनजाने में हुआ स्पर्श मानकर खुद को थोड़ा और समेट लिया.
“अभिलाषा ने भी दूसरी कास्ट में की है शादी. पर हमारे साथ उसका बहुत अच्छा है. यूपी की कोई कास्ट है. हमारे यहाँ तो होती ही नहीं. पर वो नहीं करती किसी की परवाह.
“वो एकदम मस्त है.
कहीं भी जाती है, किसी के भी साथ घूमती है
पूरी बिंदास है!
घर जाने की कोई जल्दी तो नहीं है न? ”
उसके शब्दों में मुझे अजीब सा लिजलिजापन महसूस हुआ. लग ही नहीं रहा था कि वह अपनी बहन की बेटी के बारे में बात कर रहा है.
“मुझे पहले ही काफी देर हो चुकी है. बेटी स्कूल से आ गई होगी.” मैंने सपाट सा उत्तर दिया.
“फुर्सत से आओ कभी, ऐसे जल्दबाजी में काम थोड़े होते हैं.” उसके बातों में वही लिजलिजापन था.
“रोकिए, वो आगे वाली बस हमारे यहाँ की सीधी है. यहीं छोड़ दीजिए आप मुझे.” मैंने कार के आगे जा रही बस की तरफ इशारा करके कहा.
“ऐसे एकदम कैसे रोक दूं?”, उसने कड़क आवाज़ में कहा.
“मगर मुझे इसी बस में जाना है.”
“क्यों परेशान हो रही है, ये कोई गाँव थोड़ी है. यहाँ हर पंद्रह मिनट में बस आती है. उसकी भाषा अब निचले स्तर पर उतर रही थी.
बिंदास कथा में आए व्यवधान से वह झुंझला गया था. मगर अब कार रोकने के अलावा कोई और चारा नहीं था. उसने कार बस से थोड़ा आगे लेकर रोक दी. मैं धन्यवाद कहकर उसकी गाड़ी से उतर गई. बिना उसकी तरफ देखे.
“अब जब भी आना हो, तो पहले मुझे फोन करना. मैं लेने आ जाऊंगा.” उतरते हुए मेरी पीठ पर उसने अगली मुलाकात तय करनी चाही. मगर मैं बिना मुड़े, बिना कुछ जवाब दिए ही बस में चढ़ गई थी.
मुझे अब उससे कभी नहीं मिलना था. मुझे एक बार फिर से, नए सिरे से कोशिश करनी होगी. मेरी हथेलियाँ ठंडी हो रही थीं. मैंने दो तीन बार जल्दी–जल्दी मुट्ठियाँ खोलीं, बंद की. ताकि हथेलियों में खून का प्रवाह बढ़े. मुझे अभी बहुत काम करने हैं. मई के गर्म मौसम और भीड़ भरी बस में भी, समीर की छोड़ी हुई रजाई फिर मुझसे लिपट गई थी. मैं फिर उससे मौन संवाद करने लगी थी.
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योगिता यादव प्रकाशित कृतियाँ – उपन्यास ‘ख्वाहिशों के खांडववन’ (सामयिक प्रकाशन), तीन कहानी संग्रह ‘क्लीन चिट’, ‘ग़लत पते की चिट्ठियाँ’ (भारतीय ज्ञानपीठ) एवं ‘नये घर में अम्मा ‘ (सेतु प्रकाशन), सांस्कृतिक शोध आलेख संग्रह ‘आस्था की अर्थव्यवस्था – मंदिरों के शहर जम्मू में’. कथा सप्तक – सात चुनिंदा कहानियों का संग्रह (शिवना प्रकाशन) संपादन – रमणिका फाउंडेशन की स्त्री रचनात्मकता श्रृंखला ‘हाशिये उलांघती औरत’ के जम्मू-कश्मीर विशेषांक का संपादन. महाराष्ट्र से प्रकाशित पत्रिका सार्थक नव्या के जम्मू-कश्मीर विशेषांक का संपादन. हंस पत्रिका के जून 2024 अंक का संपादन. फैलोशिप – संस्कृति मंत्रालय से जूनियर फैलोशिप. पुरस्कार – कहानी संग्रह ‘क्लीन चिट’ पर 8वां ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार (2014), ‘झीनी-झीनी बिनी रे चदरिया’ पर कलमकार सम्मान (2015), राजधानी के भीतर बाहर कहानी पर राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान (2016), उपन्यास ‘ख्वाहिशों के खांडववन’ पर शिव कुमार मिश्र स्मृति सम्मान (2018) |




बहुत ही सघन बुनी हुई कहानी है। भावनाओं का उतार चढ़ाव और हमारे समाज की विडंबना स्पष्ट है। कमजोर की ताक में बैठे शिकारी भी।
लगा कहानी अभी और चलेगी। पर अचानक खत्म हो गई। पर मन में चल रही कि आगे क्या हुआ होगा।
‘आदम की जात’ एक गहरी संवेदनात्मक और सामाजिक यथार्थ से भरी कहानी है, जो प्रेम, जाति, पहचान और स्त्री की असुरक्षित स्थिति को अत्यंत मार्मिक ढंग से सामने लाती है। कथा का केंद्र एक ऐसी स्त्री है, जो अपने पति की मृत्यु के बाद शोक से अधिक एक अमानवीय व्यवस्था, जातिगत पूर्वाग्रह और सत्ता–संरचनाओं से जूझती है।
गंभीर विषय पर सघनता से बुनी हुई उम्दा कहानी
योगिता यादव की कहानी आदम जात एक बार में आप पढ़ जाते हैं।यह रचनाकार की सबलता है कि वह संवाद और वर्णन दोनों में संतुलन बनाए रखता है, इसलिए कहानी नीरस नहीं बनती। किन्तु समस्या कहानीपन को लेकर है। कहानी में तीन आयामों को मिश्रित किया गया है। एक ओर अंतर्जातीय विवाह के बाद परिजनों और समाज का व्यवहार जो जिसका सामना जीवन जीने में और पति की मृत्यु के बाद भी पत्नी को करना पड़ता है।
फिर उसका सामना व्यवस्थागत विरूपताओं से होता है। इसमें तीसरी बात यह भी आती है, उसकी विवशता पर लोलुपता भरी नजर भी है।
इन तीनों का मिश्रण कर कहानी बुनी गई है। लेकिन अंतिम आयाम समूची कहानी के आंतरिक तर्क से बेमेल बना रहता है। इसलिए कहानी का प्रारंभ और संवर्धन के साथ तीसरे आयाम से समापन तर्कसंगत नहीं लगता। कहानी का आखिरी परिणाम जबरन पैबंद जैसा लगता है। क्योंकि यह प्रविष्ट होने से पहले पूरी कहानी में नहीं था।