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समालोचन

Home » लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र : तबस्सुम बेगम

लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र : तबस्सुम बेगम

प्रो. मैनेजर पाण्डेय की ‘साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका’ हिंदी में साहित्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन की अब भी सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है. इसमें ‘लोकप्रिय साहित्य के समाजशास्त्र’ पर एक अध्याय है और ‘कविता के समाजशास्त्र की समस्याओं’ पर भी एक आलेख है. कथा-साहित्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन के अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं, लेकिन कविता का समाजशास्त्रीय अध्ययन अपेक्षाकृत दुर्लभ है. ऐसे में वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन साहित्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन में कविता का पक्ष जोड़कर जहाँ इस चुनौती को स्वीकार करते हैं, वहीं इस अध्ययन का विस्तार भी करते हैं. वाणी प्रकाशन ने इसे प्रकाशित किया है और इसकी विस्तार से चर्चा कर रही हैं तबस्सुम बेगम.

by arun dev
February 20, 2026
in समीक्षा
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लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र : तबस्सुम बेगम
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समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र का द्वंद्व
तबस्सुम बेगम

हिंदी के अलावा तमाम बोलियों में रचित ज़बानी और लिखित साहित्य से समृद्ध  हिंदी-भाषी समाज के साथ ही, दुनिया-भर में कबीर और तुलसी जैसी महान हस्तियों की स्वीकृति के बावजूद, हिंदी आलोचना में लोकप्रियता को अक्सर शक की नज़र से देखा गया है. आलोचकों के बीच यह यक़ीन बहुत गहरा है कि किसी रचना की श्रेष्ठता का अनिवार्य पैमाना उसका पेचीदा और मुश्किल होना ही है. इसी सोच के तहत, प्रबुद्ध आलोचक किसी रचना के साथ गहरा दिमाग़ी काम करते हुए अपनी अक़्ल से उसके बहुआयामी अर्थों को तलाशने की कोशिश करते हैं और उस पाठ में नए मायनों की गुंजाइशों को हमेशा के लिए बरक़रार मानते हैं. मिर्ज़ा ग़ालिब की का यह शेर आलोचकों की इसी मनोदशा पर तंज़ करता प्रतीत होता है :

लाफ़-ए-तमकनत बा-वजूद-ए-बे-मअनी
तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल-ए-यार को क्या कहिए!

(महबूब (यार) के उस बेरुख़ी भरे अंदाज़ को क्या कहा जाए! वह हमें इस शान और अकड़ के साथ नज़रअंदाज़ कर रहा है जैसे उसमें बहुत गहराई हो, जबकि हक़ीक़त में उसकी इस बेरुख़ी का कोई मतलब ही नहीं है—यह पूरी तरह खोखली है.)

वरिष्ठ आलोचक रवि रंजन की महत्त्वपूर्ण आलोचना-कृति ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’ इसी वैचारिक सुस्ती और पारंपरिक मान्यताओं को चुनौती देने की हिम्मत करती है. यह किताब कविता की लोकप्रियता को मात्र मंचीय प्रशंसा अथवा व्यावसायिक आंकड़ों का लेखा-जोखा मानने के स्थान पर इसे एक अत्यंत जटिल सांस्कृतिक और सभ्यतागत प्रक्रिया के रूप में संवाद हेतु प्रस्तुत करती है. लेखक का यह हस्तक्षेप उस बिंदु पर अपरिहार्य हो जाता है जहाँ अधिकांश आलोचनात्मक दृष्टिकोण सरलता को सतहीपन का पर्याय मानकर उसे पूर्णतः अस्वीकार कर देते हैं.

 

प्रो. रवि रंजन

१.

इस पुस्तक के वैचारिक विन्यास को समझने हेतु उन आधारभूत सिद्धांतों और ऐतिहासिक चरणों को सूत्रबद्ध करना ज़रूरी है, जिनका इसमें विस्तार से ज़िक्र किया गया है. यदि हम चिंतकों के दृष्टिकोण से देखें तो एंटोनियो ग्राम्शी का ‘सांस्कृतिक वर्चस्व का सिद्धांत’ इस विमर्श की आधारशिला है जो यह प्रतिपादित करता है कि किसी रचना की लोकप्रियता कोई आकस्मिक घटना नहीं,बल्कि समाज में सहमति निर्मित करने अथवा उसे चुनौती देने का एक सशक्त माध्यम होती है. इसी क्रम में रेमंड विलियम्स की अनुभूति की संरचना यह स्पष्ट करती है कि लोकप्रिय कविता उन अपरिपक्व और अनकही संवेदनाओं को अभिव्यक्ति प्रदान करती है जो अभी तक किसी वृहद विचारधारा का अंग नहीं बनी हैं. वहीं पियरे बोरदियू (Pierre Bourdieu) का ‘सांस्कृतिक पूँजी’ का सिद्धांत यह व्याख्यायित करता है कि साहित्य की उच्चता प्रायः विशिष्ट वर्गों और संस्थानों द्वारा निर्धारित की जाती है जो सर्वसाधारण की रुचि को अविश्वास की दृष्टि से देखते हैं. जब हम माध्यमों के प्रभाव पर विचार करते हैं तो वाल्टर बेन्यामिन और अडोर्नो के मत एक-दूसरे के सम्मुख खड़े प्रतीत होते हैं.

बेन्यामिन जहाँ यह मानते हैं कि तकनीक ने कला के विशिष्ट प्रभामंडल को तो क्षीण किया है, किंतु, उसे सामान्य जन के लिए सुलभ बनाकर उसका लोकतंत्रीकरण भी किया है. वहीं अडोर्नो संस्कृति उद्योग के खतरों के प्रति सचेत करते हैं. उनकी आशंका यह है कि बाज़ार के दबाव में कविता मात्र उपभोग की एक वस्तु अथवा उत्पाद बनकर रह सकती है. इसी को समकालीन परिप्रेक्ष्य में जोड़ते हुए मार्शल मैक्लुहान का यह कथन कि माध्यम ही संदेश है. यह इंगित करता है कि वर्तमान कविता का स्वरूप उसके प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक अथवा इंस्टाग्राम द्वारा तय हो रहा है जहाँ गहराई की अपेक्षा तात्कालिकता और एल्गोरिदम अधिक प्रभावी हैं.

यदि हिन्दी कविता की शोहरत के मुद्दे पर  ऐतिहासिक पद्धति से सोचें  तो इसका प्रारंभ कबीर और तुलसी जैसे मनीषियों से होता है, जिनकी पहुँच सदैव जनमानस तक रही है. आधुनिक काल में मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी और दिनकर जैसे कवियों ने अपनी ओजस्वी वाणी से सामूहिक स्मृतियों और जातीय वेदना को स्वर दिया तो वहीं बच्चन की मधुशाला और नीरज के काव्य ने भी लोकप्रियता के कीर्तिमान स्थापित किए. इनसे इतर अज्ञेय के काव्य ने आधुनिक मनुष्य के बौद्धिक एकांत और व्यक्तिगत अनुभवों को वरीयता प्रदान की. इसके पश्चात नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, गोरख पाण्डेय, शलभ श्रीराम सिंह, वेणुगोपाल और आलोक धन्वा जैसे कवियों का कालखंड आता है जहाँ कविता मध्यमवर्गीय परिवेश का परित्याग कर ग्रामीण अंचलों और हाशिए के समाज के जद्दोजेहद का मेनिफेस्टो बन गई. इन कवियों द्वारा जाने-अनजाने में ही कार्ल रोसेनक्रांज़ द्वारा प्रस्तावित बदसूरती का सौंदर्यशास्त्र के माध्यम से उस सामाजिक असलियत को प्रस्तुत किया गया जिसकी समीक्षक  निरंतर उपेक्षा करते आ रहे थे.

वर्तमान युग फेसबुकीय कविता का भी है. जहाँ काव्य किसी घटना पर त्वरित प्रतिक्रिया का माध्यम मात्र रह गया है और जिसमें सृजनात्मक अनुशासन का अभाव स्पष्ट झलकता है. ‘लाइक्स’ और ‘कमेंट्स’ के नाम पर तारीफ़ का पुल बाँधने की संस्कृति ने आनन-फ़ानन में कविता के फ़ौरी फैलाव  का मौक़ा तो दिया है , पर उसके स्थायित्व और प्रभाव को सीमित कर दिया है. किताब में ‘फेसबुकीय कविता का समाजशास्त्र’ शीर्षक अध्याय यह प्रतिपादित करता है कि कविता की सार्थकता न तो मात्र उसकी लोकप्रियता में निहित है और न ही केवल उसकी जटिलता में ,बल्कि इस तथ्य में है कि वह लोकप्रियता के बाज़ारी ख़तरों के बीच भी इंसानी अहमियत और समाजी इंसाफ़ के सवालों को कितनी दृढ़ता से थामे रखती है.

डिजिटल माध्यमों ख़ासकर फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया पर कविता की उपस्थिति और उसके कारण उत्पन्न आलोचनात्मक संकट पर केंद्रित इस अध्याय में रवि रंजन मार्शल मैक्लुहान के प्रसिद्ध कथन ‘माध्यम ही संदेश’ है को एक नवीन और भयावह धरातल पर विश्लेषित करते हैं. अकादमिक जगत में प्रचलित फेसबुकिया कवि जैसे शब्दों के स्थान पर आलोचक  ने ‘फेसबुकीय कविता’ नामक जो पदबंध निर्मित किया है वह अत्यंत रोचक और शालीन होने के साथ ही वर्तमान सोशल मीडिया पर प्रसारित कविता की यथार्थ स्थिति का सजीव चित्रण करता है. इसका कारण यह है कि आज फेसबुक पर पोस्ट की जाने वाली बहुतेरी कविताएँ रचनात्मकता की जगह दिखावे और फ़ौरी इस्तेमाल की चीज़ बन गई है. वाल्टर बेन्यामिन ने कला के यांत्रिक पुनरुत्पादन पर लिखते हुए जिस रौनक के लोप होने की चर्चा की थी वह यहाँ एक नये रूप में दृष्टिगोचर होती है.

कुछ अपवादों को छोड़कर फेसबुकीय कविता में कलात्मक आभा के स्थान पर मात्र तात्कालिक आवेग प्रभावी रहता है. इसके बावजूद इस किताब का लेखक फेसबुक माध्यम को पूर्णतः नकारता नहीं है, क्योंकि इसी ने अनेक नवीन काव्य-स्वरों को मंच प्रदान किया है. इसलिए सवाल माध्यम का नहीं, अपितु उसे बरतने वाले रचनात्मक विवेक का है. फेसबुक जैसे सोशल मीडिया मंचों पर कविता लेखन की प्रक्रिया अब एक ऐसी हालत में है जहाँ रचनाकार अपनी कृति को किसी गंभीर पाठकीय विमर्श के लिए नहीं, वरन तात्कालिक प्रतिक्रिया या तारीफ़ के लिए साझा करता है. यहीं से उस खोखले आशीर्वादी और प्रतिक्रियावादी विमर्श का सूत्रपात होता है जो कविता की स्वाभाविक एवं स्वस्थ आलोचनात्मक अभिग्रहण प्रक्रिया के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध बनकर खड़ा है.

आलोचक  रवि रंजन दिलचस्प तरीके से यह उद्घाटित करते हैं कि किस प्रकार फेसबुक पर कविता साझा होते ही टिप्पणियों की जो बाढ़ आती है, उसका ज़्यादातर रचना के मूल पाठ अथवा बोध से कोई ख़ास लेनादेना नहीं होता. पाठकों द्वारा, जो स्वयं भी प्रायः कवि अथवा आलोचक होते हैं. रचना के मर्म को समझे बिना कुछ रटे-रटाए शब्दों का प्रयोग किए  जाते दिखाई पड़ते हैं ,जैसे ‘अद्वितीय’, ‘बहुत सुंदर’, अथवा ‘अद्भुत सृजन’ या ‘नि:शब्द’ आदि.  ये लफ्ज़ अब अपना वास्तविक मानी  खो चुके हैं  और ऐसी टिप्पणियाँ कविता की किसी विशिष्टता को सामने  नहीं लातीं.यह एक ऐसी आभासी मुद्रा बन गई हैं जिसे एक रचनाकार दूसरे को इस प्रत्याशा में प्रदान करता है कि जब वह अपनी रचना साझा करेगा तो उसे भी यही मुद्रा प्रतिदान में प्राप्त होगी. इसमें सोशल मीडिया पर कविता कही जाने वाली सामग्री और नाममात्र की आलोचनात्मक टिप्पणियों में व्याकरणिक त्रुटियों के साथ ही वर्तनी की अशुद्धियों की प्रचुरता और यदा-कदा व्यर्थ का विवाद आदि अत्यंत शोचनीय पक्ष है.

रवि रंजन इस प्रवृत्ति को आलोचनात्मक प्रमाद और बौद्धिक बेईमानी के साथ शालीनता के अभाव के रूप में रेखांकित करते हैं. ‘सतत रचनारत रहिए’ अथवा ‘आपका काव्य-संग्रह शीघ्र प्रकाशित होना चाहिए’ जैसी टिप्पणियाँ वस्तुतः आलोचना का अंत हैं और इनसे हर्षित होकर कविता के नाम पर कुछ भी साझा करने वाले रचनाकार भ्रामक स्थिति में हैं. इतनी कठोर बात कहने का मक़सद यह है कि इन टिप्पणियों से एक ऐसा छद्म परिवेश निर्मित होता है जहाँ प्रत्येक तुक्कड़ स्वयं को महान समझने के भ्रम में जीने लगता है. ये खोखली प्रतिक्रियाएँ रचनाकार को उस सृजनात्मक कठोरता से विमुख कर देती हैं जो उत्कृष्ट काव्य हेतु अनिवार्य शर्त है. जब कवि को यह ज्ञात होता है कि वह कुछ भी लिखेगा उसे सैकड़ों लाइक और प्रशंसात्मक ठप्पे प्राप्त हो ही जाएंगे तो वह अपनी भाषा और शिल्प को परिष्कृत करने की आवश्यकता अनुभव नहीं करता. इस प्रकार डिजिटल माध्यम वाल्टर बेन्यामिन की शब्दावली में कविता की आभा को नष्ट करने के साथ ही उसकी गुणवत्ता को एक औसत दर्जे के दलदल में धकेल देते हैं.

इतना ही नहीं इस डिजिटल परिवेश का एक अन्य दुर्बल पक्ष गुटबाजी और अनर्गल टिप्पणियों का क्रम है. सोशल मीडिया अब मात्र साहित्य का मंच नहीं अपितु ईर्ष्या-द्वेष, जातिवाद, सांप्रदायिकता और साहित्यिक राजनीति का रणक्षेत्र बन गया है. लेखक ने बतलाया है कि किस प्रकार यहाँ साहित्यिक गिरोहबंदी सक्रिय रहती है. यदि कोई रचनाकार किसी विशिष्ट विचारधारा अथवा गुट का अंग नहीं है तो उसकी उत्कृष्ट रचना पर भी मौन साध लिया जाता है अथवा सुनियोजित ढंग से उसे अपमानित करने हेतु तर्कहीन टिप्पणियाँ की जाती हैं. दुर्भाग्यवश यह ट्रोलिंग की संस्कृति अब फेसबुकीय आलोचना का स्थान ग्रहण कर रही है जहाँ तर्क का स्थान कुतर्क और समीक्षा की जगह व्यक्तिगत आक्षेप ले लेते हैं. इस गुटबंदी के कारण एक स्वस्थ आलोचनात्मक संवाद लगभग असंभव हो गया है और सामान्य पाठक इस संशय में रहता है कि कौन सी तारीफ़ प्रामाणिक है और कौन-सी मात्र निजी  पसंद-नापसंद का नतीजा.

डिजिटल माध्यमों के कारण काव्य की जो दुर्दशा हो रही है रवि रंजन उसे उपेक्षित नहीं करते, क्योंकि ये माध्यम स्मृतियों को स्थायित्व प्रदान नहीं करते. यहाँ कविता की आयु अत्यंत न्यून होती है और लाइक अथवा शेयर के साथ ही उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है. लेखक इसे क्षणिक नैतिकता की संज्ञा देते हैं जहाँ संवेदना तीव्र तो होती है किंतु टिकती नहीं. अडोर्नो का यह विचार यहाँ पुनः सत्य सिद्ध होता है कि आधुनिक समाज में भावनाएँ भी उपभोग की एक वस्तु बन जाती हैं. तथापि लेखक यह स्वीकार करते हैं कि इसी जनसमूह में कभी-कभी ऐसा क्षण भी आता है जो एक स्थायी कविता की ओर संकेत करता है. यही बे-यक़ीनी डिजिटल लोकप्रियता का सबसे रोचक और भयावह पहलू है. इसके बावजूद पुस्तक में कुछ ऐसे कवियों की रचनाओं की गंभीर समाजशास्त्रीय व्याख्या उपलब्ध है जो इसी माध्यम पर उपस्थित रहकर कलात्मक संयम के साथ समय की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. लेखक ने इस तथ्य पर खेद व्यक्त किया है कि कुछ प्रतिष्ठित प्रकाशक भी वर्तमान में अल्पकालिक लोकप्रिय कविताओं के संकलन प्रकाशित कर रहे हैं. यह संतुलित दृष्टि उन्हें तकनीक-विरोधी होने से बचाती है.

लियो लावेन्थल ने अपनी किताब ‘साहित्य और जन संस्कृति’ में यह मत प्रतिपादित किया था कि लोकप्रिय कला माध्यम असल में किसी भी समाज के मनोवैज्ञानिक इतिहास के सजीव दस्तावेज़ होते हैं. इसी सैद्धांतिक आधारभूमि पर खड़े होकर रवि रंजन की यह किताब अदब, तहज़ीब और तमद्दुन की दुनिया में शोहरत को एक तारीख़ी और वैचारिक निर्मिति के रूप में देखती है. इस गंभीर बहस-मुबाहिसे के दौरान एंटोनियो ग्राम्शी के सांस्कृतिक वर्चस्व का सिद्धांत तथा लोकप्रिय साहित्य और संस्कृति पर उनका गहरा चिंतन संपूर्ण पुस्तक में एक मार्गदर्शक सूत्र की भाँति व्याप्त है. ग्राम्शी का स्पष्ट मत था कि सत्ता मात्र दमन के बल पर नहीं अपितु समाज में एक सामान्य सहमति का निर्माण करके संचालित होती है. रवि रंजन का तर्क है कि लोकप्रिय कविता इसी सहमति के सांस्कृतिक रणक्षेत्र में अपना स्वरूप ग्रहण करती है. वह कभी स्थापित तंत्र की पोषक बन जाती है तो कभी उसी निर्मित सहमति के भीतर दरारें उत्पन्न कर एक ‘इमकानी शऊर’ (पॉसिबल कॉनशसनेस) पैदा करती है. यह पुस्तक वैचारिक मजबूती के साथ यह स्थापित करती है कि लोकप्रिय कविता का समाजशास्त्र वस्तुतः उस निरंतर संघर्ष का अनुशीलन है जो कवि की निजी संवेदना और समाज की व्यापक संरचना के मध्य अनवरत घटित होता रहता है.

असल  में ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’ पुस्तक हिन्दी आलोचना के उस विशिष्ट प्रस्थान बिंदु पर एक असरदार दख़लअंदाज़ी के रूप में सामने आती है जहाँ लोकप्रियता को या तो साहित्य के अवमूल्यन का पर्याय मान लिया जाता है या फिर जन-स्वीकृति की आड़ में उसे हर प्रकार के आलोचनात्मक परीक्षण से छुटकारा दे दिया जाता है. यह किताब इन दोनों ही अतिवादी दृष्टिकोणों से अपनी स्पष्ट असहमति प्रकट करती है और मक़बूलियत को एक तारीख़ी, समाजी और ज़हनी अमल के तौर पर व्याख्यायित करती है. यहाँ लोकप्रिय कविता न तो स्वतः स्फूर्त कोई पूर्ण सौंदर्यात्मक उपलब्धि है और न ही जन-समूह की चेतना का कोई अपरिपक्व उत्पाद, बल्कि वह सामाजिक अंतर्संबंधों, वर्गीय संरचनाओं, सांस्कृतिक वर्चस्व के द्वंद्व और माध्यमों की आंतरिक राजनीति के मध्य अपना स्वरूप ग्रहण करती है. इस परिप्रेक्ष्य में यह कृति कविता की लोकप्रियता को मात्र मूल्यांकन का विषय न बनाकर विश्लेषण की एक गंभीर समस्या के रूप में हमारे सम्मुख प्रस्तुत करती है.

पुस्तक की भूमिका में ही लेखक यह स्पष्ट कर देता है कि साहित्य और समाज के इस जटिल अंतर्संबंध को प्रतिबिम्ब-सिद्धांत की किसी सरल यांत्रिक पद्धति से नहीं समझा जा सकता. कार्ल मार्क्स का वह सुप्रसिद्ध कथन – ‘मनुष्य अपने इतिहास का निर्माण स्वयं करते हैं पर अपने मनमुताबिक़ हालात में नहीं’ – यहाँ साहित्यिक सृजन के संदर्भ में मुकम्मल तरीक़े से सटीक बैठता है. कविता न तो समाज की कोई कार्बन कॉपी है और न ही उससे सर्वथा विच्छिन्न कोई स्वतंत्र जगत. यहीं ग्राम्शी की सांस्कृतिक वर्चस्व वाली अवधारणा पुस्तक के वैचारिक आधार स्तंभ का कार्य करती है जिनके मुताबिक़ वर्चस्व केवल राजकीय शक्ति से नहीं संचालित होता अपितु वह सहमति के माध्यम से समाज की सामान्य चेतना में अपनी पैठ बनाता है. समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से लोकप्रिय कविता इसी सहमति के धरातल पर अंकुरित होती है.  किंतु, महत्त्वपूर्ण यह है कि वही कविता कभी-कभी इस स्थापित आम राय की सलीक़े से मुखालिफ़त करने का काम भी करती है.

 

२.

अपनी इस किताब में रवि रंजन इसी अंतर्विरोध को दोनों छोरों से ग्रहण करने का यत्न करते प्रतीत होते हैं. यह दीगर बात है कि एक समीक्षक के रूप में मुझे लगता है कि वे एकाध जगह पर अपने तनक़ीदी मक़सद को हासिल करने में पूरी तरह सफल होते-होते रह गए हैं. मिसाल के तौर पर हमारे ज़माने में मुशायरों और कवि सम्मेलनों के मंचों से जिस प्रकार मंचीय सफलता के लिए हिन्दी में सुरीली आवाज़ का जादू बिखेरते हुए कमजोर ग़ज़लों और नज़्मों की ज़बरदस्त तरीके से  गायकी का प्रचलन बढ़ा है उसका कोई विशेष विवरण इस किताब में नज़र नहीं आता, जबकि हिन्दी ग़ज़ल के बेताज़ बादशाह दुष्यंत कुमार के साथ-साथ त्रिलोचन का अप्रतिम गज़ल संग्रह ‘गुलाब और बुलबुल’ एवं शमशेर बहादुर सिंह की अनेक गज़लें उपलब्ध हैं.

हिन्दी में और भी कई अच्छे गज़ल संग्रह हैं, जिनका उल्लेख यहाँ सामयिक होता. इसके अलावा मैं पुर-उम्मीद थी कि हरिवंश राय ‘बच्चन’ की ‘मधुशाला’ की ज़बरदस्त शोहरत के मद्देनज़र, उसके रचनात्मक संदेश और व्यापक सामाजिक प्रभावों का यहाँ गहरा विश्लेषण प्राप्त होगा. किंतु, इस किताब में जहाँ सिर्फ़ विश्वविद्यालयी हलकों में गंभीर विद्यार्थियों के बीच कुछ हद तक मारूफ़ ‘अपनी केवल धार’ के कवि अरुण कमल पर तो स्वतंत्र अध्याय मौजूद है, वहीं लोकप्रियता की दृष्टि से ‘मधुशाला’ जैसी कालजयी कृति और गोपाल सिंह ‘नेपाली’ की कविता का उल्लेख न होना थोड़ा खटकता है. जबकि कविता के मर्मी आलोचक और विद्वान प्रोफ़ेसर के तौर पर रवि रंजन जी को इस क्षेत्र में महारत हासिल है. मुझे पूरा भरोसा है कि पुस्तक के आगामी संस्करण में वे इस अभाव को अवश्य पूरा करेंगे; विशेषकर यह देखते हुए कि एक दशक पूर्व उनके निर्देशन में ‘गोपाल सिंह ‘नेपाली’ की कविता की लोकप्रियता का समाजशास्त्र’ पर शोध कार्य भी हो चुका है.

बहरहाल, इन अभावों के बावजूद इस नायाब किताब की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि का महवर वह बिंदु है, जहाँ रवि रंजन लोकप्रिय साहित्य के वैश्विक सैद्धांतिक चिंतन को वर्गीकृत करते हैं और ‘साहित्य का समाजशास्त्र’ के क्षेत्र में हुए इन सिद्धांतों का हिंदी कविता के संदर्भ में सूक्ष्म विनियोग करते हुए एक विचारोत्तेजक विश्लेषण और आलोचनात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करते हैं. यक़ीनन किताब के ऐसे हिस्से बेहद दिलचस्प, सर्जनात्मक और सराहनीय हैं. यहाँ रेमंड विलियम्स की अनुभूति की संरचना वाली अवधारणा विशेष रूप से अर्थपूर्ण हो जाती है. विलियम्स के अनुसार किसी भी युग की साहित्यिक कृतियाँ केवल स्थापित विचारधाराओं को ही अभिव्यक्त नहीं करतीं बल्कि उन उभरती हुई संवेदनाओं को भी स्वर देती हैं जो अभी तक पूर्णतः किसी वैचारिक सांचे में नहीं ढली हैं. लोकप्रिय कविता प्रायः इन्हीं अधूरी और अनगढ़ अनुभूतियों को अभिव्यक्ति प्रदान करती है. इसलिए उसकी मक़बूलियत को सिर्फ़ सौंदर्य के प्रतिमानों पर परखना उसके गहरे सामाजिक निहितार्थों की अनदेखी करना होगा. लेखक इसी मोड़ पर हिन्दी आलोचना की उस प्रवृत्ति से सीधी बौद्धिक मुठभेड़ करता हुआ दिखाई पड़ता जो जटिलता को ख़ुद-ब-ख़ुद ही गंभीर और सरलता को अनिवार्य रूप से सतही मान लेती है. वास्तविकता यह है कि कविता की सादगी में भी प्रायः अतुलनीय गहराई और सौंदर्य अंतर्निहित होता है.

यह किताब इस वहम का भी समूल नाश करती है कि ‘लोकप्रिय’ और ‘लोक’ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. जैसा कि पुस्तक के परिशिष्ट में सम्मिलित शिशिर कुमार दास के निबंध ‘लोकप्रिय साहित्य और उसे पढ़ने वाला जनसमूह’ में भी अंकित है कि लोक कोई स्थिर सामाजिक इकाई नहीं है बल्कि वह ऐतिहासिक रूप से निरंतर रूपांतरित होता हुआ एक अनुभव-संसार है. लोकप्रियता कभी लोक से निःसृत होती है तो कभी इसे बाज़ार और डिजिटल माध्यमों द्वारा कृत्रिम रूप से भी निर्मित किया जाता है. थियोडोर अडोर्नो और मैक्स होर्कहाइमर ने जिस संस्कृति उद्योग की चर्चा की थी उसका हिन्दी कविता के संदर्भ में रवि रंजन ने अत्यंत सावधानीपूर्वक प्रयोग किया है. वे यह कदापि नहीं कहते कि प्रत्येक लोकप्रिय कविता बाज़ार का उत्पाद है, किंतु, वे यह अवश्य दर्शाते हैं कि वर्तमान युग में लोकप्रियता बिना माध्यमों और वृहत पूँजी के हस्तक्षेप के लगभग असंभव हो गई है. इसीलिए लोकप्रिय कविता के समाजशास्त्र पर कोई भी विमर्श अब डिजिटल माध्यमों के समाजशास्त्र को समझे बिना अपूर्ण ही रहेगा.

दिनकर की ‘रश्मिरथी’ की लोकप्रियता पर केंद्रित अध्याय इस पुस्तक का एक महत्वपूर्ण प्रस्थान बिंदु है. यहाँ लेखक उस पुरातन आलोचनात्मक रूढ़ि से टकराता है जो कवि दिनकर को मात्र भावुक राष्ट्रवाद और मंचीय वाग्मिता तक सीमित मान लेती है. वे ‘रश्मिरथी’ के कर्ण को केवल एक वीर अथवा दानी के रूप में नहीं देखते ,बल्कि उसे जाति आधारित अपमान और सामाजिक बहिष्कार के एक सशक्त प्रतीक के रूप में पढ़ते हैं. इस विश्लेषण में डॉ. अम्बेडकर की उस ‘दर्जा-ब-दर्जा ना-बराबरी’ या क्रमबद्ध असमानता (ग्रेडेड इनेक्वलिटी) वाली स्थापना का संदर्भ विद्यमान है कि जाति केवल श्रम का विभाजन नहीं अपितु श्रमिकों का विभाजन है. महाभारत के कर्ण का संताप मात्र निजी दुःख नहीं बल्कि सामाजिक संरचना की एक बड़ी नाकामयाबी है. यही वजह  है कि ‘रश्मिरथी’ की लोकप्रियता को लेखक एक गहरे राजनीतिक अर्थ से संबद्ध करके देखता है. कविता की यह जनप्रियता उस सामाजिक स्मृति को सक्रिय कर देती है जिसे प्रायः मुख्यधारा के आलोचक अनसुना कर देते हैं.

यहाँ लुकाच की यथार्थवाद संबंधी बहस भी दर-परदा मौजूद है. लुकाच का मानना था कि यथार्थवादी साहित्य वही है जो सामाजिक समग्रता को अभिव्यक्त कर सके. दिनकर की कविता अपनी मिथकीय संरचना के बावजूद इसी सामाजिक समग्रता का स्पर्श करती है. यहाँ एक माक़ूल सवाल उठाया गया है कि क्या आधुनिकता केवल लेखन की नवीन प्रविधियों अथवा शिल्प के प्रयोगों में निहित है या उसका जुड़ाव सामाजिक संदेश और ऐतिहासिक चेतना से भी है. कवि दिनकर और कवि अज्ञेय के बीच का वैचारिक तनाव इसी सवाल से पैदा होता है. अज्ञेय की आधुनिकतावादी कविता जहाँ पाठक से एक व्यक्तिगत और एकांत एकाग्रता की अपेक्षा करती है वहीं ठेठ देसी मिज़ाज के कवि दिनकर की रचनाएँ सार्वजनिक स्मृति और सामूहिक अनुभवों से प्रत्यक्ष संवाद करती हैं.  इस किताब में  किसी एक को श्रेष्ठ या हीन ठहराने के बजाय यह स्वीकार किया गया है कि आधुनिकता के ये दोनों स्वरूप भिन्न-भिन्न सामाजिक परिस्थितियों की परिणति हैं और दोनों को ही गहन विश्लेषण की दरकार है.

अशोक वाजपेयी और अरुण कमल जैसे गंभीर कवियों की डिजिटल पोर्टलों पर उपलब्ध कविताओं पर लेखक की विस्तृत और गंभीर टिप्पणियाँ कविता के समाजशास्त्रीय विश्लेषण को और अधिक सघन बनाती हैं. इस चर्चा के क्रम में नागार्जुन ,राजेन्द्र प्रसाद सिंह ,गोरख पाण्डेय, जाबिर हुसैन, स्वप्निल श्रीवास्तव और अनामिका से लेकर रंजना मिश्र तथा राकेश मिश्र तक के काव्य संसार पर विचार किया गया है. इस दरमियान कविता की शोहरत का मुख्य सवाल कभी-कभार पृष्ठभूमि में चला गया-सा प्रतीत होता है. लेखक का कहना है कि इन कवियों ने जिस प्रकार अपने  समय की     बे-यक़ीनी और अपने दौर की विसंगतियों को वाणी दी है वह कविता को मात्र भावुकता के धरातल से ऊपर उठाकर एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण का विषय बना देता है. यह खंड इस तथ्य का प्रमाण है कि आलोचक रवि रंजन साहित्य का समाजशास्त्र को किसी यांत्रिक अनुशासन के स्थान पर उसे काव्य-संवेदना से संबद्ध एक जीवंत विमर्श के रूप में अंगीकार करते हैं. दुःख और संवेदना पर आधारित कविताओं का विभिन्न अध्यायों में जब विश्लेषण हुआ है, तो उससे लोकप्रिय कविता की नैतिक भूमिका उभरकर सामने आई  है. यहाँ दुःख को कोई व्यक्तिगत भावुकता नहीं, अपितु एक सामाजिक अनुभव स्वीकार किया गया है.

रेमंड विलियम्स के शब्दों में कहें तो यह दुःख मात्र एक संवेदन नहीं बल्कि एक जिया हुआ अनुभव है जिसे कविता अपनी भाषा प्रदान करती है. अरुण कमल पर केंद्रित अध्याय रवि रंजन की विश्लेषण क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है. यहाँ लोकप्रियता प्रत्यक्ष रूप से सत्ता-विरोधी नैतिकता से जुड़ जाती है. ‘बुलडोज़र की गाथा’ जैसी कविता के विश्लेषण में ग्राम्शी की ‘संभाव्य चेतना’ का तसव्वुर क्रियाशील दिखाई देता है. इस दौरान बतलाया गया है कि कविता यहाँ सिर्फ़ यथार्थ का रेखांकन नहीं करती बल्कि इंसाफ़ के इमकान को जिलाए रखने की कोशिश भी करती है. अडोर्नो का यह बयान कि कला का कार्य पूर्व-निर्मित सहमति को खंडित करना है यहाँ पूर्णतः सार्थक सिद्ध होता है. वास्तव में यह अध्याय कविता की समाजशास्त्रीय आलोचना का एक अनूठा उदाहरण है जो साहित्य को शब्दों का ढांचा न मानकर उसे सामाजिक शक्तियों के बीच जद्दोजेहद और ऐतिहासिक चेतना के आईने के रूप में देखता है.

 

३.

समाजशास्त्रीय आलोचना की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि वह रचना को उसके युग और परिवेश से पृथक करके नहीं देखती. लेखक ने आलोचकीय कुशलता के साथ यह बतलाया है कि किस प्रकार अरुण कमल की कविताएँ विगत पचास वर्षों के भारतीय समाज के परिवर्तनशील यथार्थ की विश्वसनीय साक्षी हैं. यह आलोचना पद्धति पाठक को यह बोध कराने में सहायक  है कि साहित्य मात्र व्यक्तिगत अभिव्यक्ति नहीं अपितु संपूर्ण समाज के अवचेतन का एक कलात्मक प्रारूप है. इस अध्याय में अडोर्नो और ग्राम्शी जैसे चिंतकों के माध्यम से समाजशास्त्रीय आलोचना की उस गहराई का स्पर्श किया गया है जहाँ कला और सत्ता के पारस्परिक संबंधों का विश्लेषण होता है. लेखक स्पष्ट करता है कि किस प्रकार पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र प्रायः सामाजिक बहिष्कार का उपकरण बन जाता है जबकि अरुण कमल जैसे आधुनिक रचनाकार विरूपता के सौंदर्य के माध्यम से हाशिए के जनसमूह का चित्रण कर पूँजीवादी ढाँचों का प्रतिरोध करते हैं. देश की आला अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद तथाकथित ‘बुलडोज़री इंसाफ’ वाली समकालीन घटनाओं को कविता के समाजशास्त्रीय परिप्रेक्ष्य से जोड़ना यह प्रमाणित करता है कि रवि रंजन की आलोचना पद्धति अपने समय की विसंगतियों को समझने और उनके विरुद्ध एक नैतिक पक्ष चुनने की सलाहियत रखती है.

इस विश्लेषण की एक बड़ी ख़ासियत यह भी है कि यह श्रम के सौंदर्यशास्त्र को रेखांकित करता है. समाजशास्त्रीय आलोचना यहाँ बौद्धिक और शारीरिक श्रम के बीच की विभाजक रेखा को मिटा देती है जहाँ कवि स्वयं को एक शिल्पी अथवा क़सीदाकारी करती किशोरी के समकक्ष खड़ा पाता है. यह नज़रिया साहित्य को बैठकखानों की विलासिता से बाहर निकालकर सामान्य जन के जीवन और उनके जद्दोजेहद की भूमि पर प्रतिष्ठित करता है. साथ ही यह अध्याय साहित्य के उत्तर-जीवन के आयाम को भी प्रकाशित करता है. नामवर सिंह और फ्रेडरिक जेम्सन के संदर्भों से यह तथ्य पुष्ट होता है कि कविता का अर्थ कभी जड़ नहीं होता वह सामाजिक परिवर्तनों के साथ नवीन व्याख्याएँ ग्रहण करता है. वर्तमान युग में जहाँ कृत्रिम मेधा(ए.आई.) और सोशल मीडिया का प्रभुत्व है, मनुष्य के बढ़ते एकाकीपन को विस्थापन के संकट और अनिश्चितता से जोड़कर लेखक ने  यह सिद्ध किया है कि समाजशास्त्रीय आलोचना सिर्फ़ अतीत का लेखा-जोखा नहीं , बल्कि यह भविष्य के संकटों को पहचानने का एक गंभीर प्रयास भी है.

पुस्तक का परवर्ती भाग एक सजग आलोचक के आत्म-चिंतन का साक्ष्य है. यहाँ लेखक लोकतंत्र, जनसमूह, बाज़ार और आलोचना के संकट पर गहराई से विचार करता है. इस क्रम में प्रश्न उठाया गया है कि आज के समय में आलोचक की वास्तविक भूमिका क्या है और हम कविता से क्या अपेक्षा कर सकते हैं. किताब के अंत में ‘परिशिष्ट’ के रूप में शामिल शिशिर कुमार दास का निबंध इस संपूर्ण विमर्श को एक सुदृढ़ ऐतिहासिक एवं समाजशास्त्रीय आधार प्रदान करता है और लोकप्रिय साहित्य की अवधारणा को शास्त्रीय गहराई देता है. मेरे ख़याल से ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’हिन्दी आलोचना जगत की एक ऐसी विशिष्ट कृति है जो लोकप्रियता को न तो लज्जा का विषय मानती है और न ही गर्व का. वह इसे इतिहास की प्रक्रिया में रखकर समझने और परखने का एक ईमानदार यत्न करती है. इसकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि इसने कविता की लोकप्रियता और उसके मूल्य के मध्य जो एक कृत्रिम द्वंद्व खड़ा किया गया था उसे ध्वस्त कर दिया है. वस्तुतः यह पुस्तक केवल कविता पर संवाद नहीं करती अपितु कविता के वर्तमान के साथ ही उसके सामाजिक भविष्य की चिंता भी करती है और इस अर्थ में यह हिन्दी आलोचना के पाठकों के लिए एक अपरिहार्य पाठ बन जाती है. इस पुस्तक की एक अन्य वैचारिक सफलता यह है कि यह लोकप्रियता को मात्र पाठकों की संख्या अथवा मंचीय तालियों से नहीं आंकती. लेखक स्पष्ट करता है कि लोकप्रियता एक सांस्कृतिक स्थिति है जो उत्पादन, वितरण और उपभोग के तीनों स्तरों पर कार्य करती है.

यहाँ समाजशास्त्री पियरे बोरदियू की ‘सांस्कृतिक पूँजी’ (Cultural Capital) की अवधारणा परोक्ष रूप से विद्यमान है. बोरदियू के मुताबिक़, किसी रचना की साहित्यिक अहमियत (Value) उसमें पैदाइशी तौर पर मौजूद नहीं होती. यह बेहतरीन लेखन के साथ-साथ बड़े तालीमी इदारों (Educational Institutions), कला-साहित्य आदि की अकादमियों, नामवर आलोचकों, बड़े प्रकाशकों, इनाम के तौर पर मोटी रक़म  देने वाली नामी संस्थाओं और मीडिया की शोहरत के मेल-जोल से तैयार होती है.

हिन्दी कविता में लोकप्रियता और मूल्य का जो संघर्ष परिलक्षित होता है वह वास्तव में इसी सांस्कृतिक पूँजी के असमान वितरण से संबद्ध है. लेखक दर्शाता है कि जिस कविता को लोकप्रिय कहकर तिरस्कृत किया जाता है वह प्रायः उन पाठकों तक पहुँचती है जिनके पास तथाकथित वैध सांस्कृतिक पूँजी का अभाव होता है और इसीलिए अभिजात्य आलोचना उसे संदेह की दृष्टि से देखती है. यहीं पर यह पुस्तक लोकप्रियता की अवधारणा को लोकतंत्र के प्रश्न से जोड़ देती है. क्या साहित्य केवल उन्हीं के लिए सुरक्षित है जो तालीमयाफ़्ता हैं और जिन्होंने आलोचना का कोई ख़ास पाठ्यक्रम पूरा किया है या फिर वह उनके लिए भी है जिनके जीवन का अनुभव कविता में पहली बार शब्दों के रूप में साकार होता है. यह प्रश्न किसी भावुक जनवाद का नहीं अपितु साहित्य की वास्तविक सामाजिक भूमिका का है. वाल्टर बेन्यामिन ने लेखक और पाठक के संबंध पर विचार करते हुए लिखा था कि आधुनिक तकनीक इन दोनों के मध्य की दूरी को कम करती है और पाठक को भी एक उत्पादक बना देती है. लोकप्रिय कविता में यह प्रक्रिया और तीव्र हो जाती है. रचनाकार और पाठक के मध्य का अंतराल तो घटता है किंतु इसके साथ यह संकट भी बढ़ता है कि कविता कहीं तात्कालिक सहमति का साधन मात्र न बन जाए.

रवि रंजन इसी जोखिम को लोकप्रिय कविता का सबसे बड़ा संकट स्वीकार करते हैं. पुस्तक में बार-बार यह प्रतिपादित किया गया है कि लोकप्रियता स्वयं में न तो प्रगतिशील है और न ही प्रतिगामी. यह एक खुला प्रांगण है जहाँ निरंतर संघर्ष व्याप्त रहता है. ग्राम्शी के शब्दों में कहें तो यह वह क्षेत्र है जहाँ वर्चस्व और प्रतिरोध परस्पर गुंथे हुए हैं. दिनकर की कविता इसी कारण लोकप्रियता का एक रोचक दृष्टांत है. ‘रश्मिरथी’ की लोकप्रियता जहाँ एक ओर राष्ट्रवादी विमर्श से संबद्ध होती है और जातीय स्मृति की गाथा बनती है , वहीं दूसरी ओर वह जातिगत संताप की कड़वी याद को भी अक्षुण्ण रखती है. इस द्वंद्व की जड़ें भारत की उस सामाजिक जटिलता में निहित हैं जिसके विषय में डॉ. अम्बेडकर ने विस्तार से लिखा है. लेखक यह गोपनीय नहीं रखते कि दिनकर की कविता की कतिपय सीमाएं हैं. किंतु वे यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि उन सीमाओं के बावजूद दिनकर का काव्य  समाज की चेतना का एक वृहद अंश अपने भीतर समेटे हुए है. इसीलिए वह प्रबुद्ध वर्ग के साथ ही जनसाधारण के बीच भी लोकप्रिय है. अपने अनुभव से हम भी यह जानते हैं कि दिनकर  की ‘जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है’ जैसी न जाने कितनी काव्यपंक्तियाँ आज भी हिन्दी क्षेत्र में अनेक अच्छे-बुरे मौक़े पर वे लोग भी बोलते पाए जाते हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य का कभी क़ायदे से अध्ययन नहीं किया है.

यह दृष्टिकोण रवि रंजन की आलोचना को नैतिक शुद्धतावाद के पाश में बँधने से बचा लेता है. अज्ञेय के विषय में लेखक का विश्लेषण विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि यहाँ लोकप्रियता का प्रश्न सर्वथा विपरीत हो जाता है. अज्ञेय की कविता अलोकप्रिय नहीं है किंतु वह लोकप्रिय होने की आकांक्षा से भी पूर्णतः मुक्त प्रतीत होती है. यह तटस्थता आधुनिकता का ही एक स्वरूप है जो व्यक्तिगत अनुभवों और आत्म-चिंतन को सर्वोपरि मानती है. लेखक यहाँ प्रश्न करता है कि क्या ऐसी कविता का भी समाजशास्त्र संभव है जो स्वयं को समाज से पृथक रखती है. इसका उत्तर देते हुए कहा गया है कि यह दूरी भी स्वयं में एक सामाजिक स्थिति ही है जो विश्लेषण की अपेक्षा रखती है. अज्ञेय की कविता जिस मध्यमवर्गीय बौद्धिक एकांत से उत्पन्न होती है वह भी एक ऐतिहासिक अनुभव ही है. इस प्रकार लोकप्रियता और अलोकप्रियता दोनों ही सामाजिक अर्थ प्राप्त करते हैं.

इस किताब में लेखक की एक अहम रणनीति यह है कि यहाँ ‘उत्तर-आधुनिकतावाद’ से एक वाजिब दूरी बनाए रखते हुए, कविता को महज़ ‘भाषाई क्रीड़ा’ (Linguistic Play) समझने-समझाने के बजाय, उसे इंसानी एहसास की सामाजिक बनावट के रूप में स्वीकार किया गया है.लेखक का मानना है कि दुःख, भय, करुणा, अपमान और उम्मीद यहाँ मात्र व्यक्तिगत मनःस्थितियाँ नहीं हैं ,अपितु ये सामाजिक अनुभव हैं. रेमंड विलियम्स के अनुसार साहित्य इन्हीं अनुभवों को इतिहास का स्वरूप प्रदान करता है. लोकप्रिय कविता इन अनुभवों को सर्वप्रथम स्वर देती है क्योंकि वह प्रत्यक्षतः मनुष्य के जीवन से संबद्ध होती है. इसीलिए लेखक दुःख की श्रेष्ठ कविताओं को भावुकता के आरोप से मुक्त करते हुए उन्हें सामाजिक संवेदना का एक रूप मानते हैं.

जेंडर पर आधारित विश्लेषण भी इस कृति को वर्तमान आलोचना से गहराई से जोड़ता है. स्त्री-कविता की लोकप्रियता को लेखक न तो बाज़ार की युक्ति या ‘डिवाइस’ मानता है और न ही इसे अपने आप  प्रगतिशील कहता है. वह बतलाता है कि स्त्री-अनुभव का लोकप्रिय होना एक राजनीतिक घटना है क्योंकि इसने उन अनुभवों को सार्वजनिक पटल पर रखा जो शताब्दियों से ओझल थे. इस प्रसंग में लेखक सतर्क भी करता है कि किसी अनुभव का सार्वजनिक हो जाना ही उसे पूर्णतः स्वतंत्र नहीं कर देता. यहाँ मिशेल फूको की सत्ता और विमर्श वाली अवधारणा प्रभावी होती है. लोकप्रियता किसी विमर्श का विस्तार भी करती है और उस पर नियंत्रण भी रखती है. पुस्तक में कतिपय स्त्री-कविताओं का विश्लेषण एक बड़ी उपलब्धि है जहाँ लेखक स्त्री-अनुभव को न तो अतिरंजित करता है और न ही उसे नारों में परिवर्तित करने की माँग करता है. वह कविता में व्याप्त मौन स्मृतियों और विस्मृति की क्रिया को व्यवस्था के अन्याय के संदर्भ में पढ़ता है. यक़ीनन यह नज़रिया कविता के विश्लेषण को एक संवेदनात्मक गहराई प्रदान करता है.

४.

पुस्तक का अंतिम वैचारिक विस्तार लोकतंत्र और कविता के अंतर्संबंध पर केंद्रित है. लेखक स्पष्ट करता है कि लोकतंत्र मात्र चुनावी प्रक्रिया नहीं है बल्कि यह अनुभवों की दृश्यता का प्रश्न है. कविता उन अनुभवों को दृश्यमान बनाती है जिन्हें सत्ता अदृश्य रखना चाहती है. इस अर्थ में लोकप्रिय कविता लोकतंत्र का एक स्वरूप भी हो सकती है और उसका विकृत संस्करण भी. यहाँ भीड़ और जनता के बीच का अंतर निर्णायक हो जाता है. लोकप्रियता भीड़ एकत्र कर सकती है किंतु वह जनता का निर्माण भी कर सकती है. यही अंतर इस पुस्तक का केंद्रीय नैतिक प्रश्न है. शिशिर कुमार दास के निबंध के हिन्दी अनुवाद को परिशिष्ट के रूप में सम्मिलित करने से यह कृति और भी गंभीर हो गई है. प्रोफ़ेसर दास का यह आलेख साहित्यिक समाजशास्त्र की एक गहन समझ प्रस्तुत करता है जिसकी शुरुआत वे एक आत्मीय संस्मरण से करते हैं. बचपन में प्रतिबंधित साहित्य को गुप्त रूप से पढ़ने का उनका अनुभव उस सामाजिक संरचना को उजागर करता है जहाँ साहित्य को नैतिक और अनैतिक की श्रेणियों में विभाजित कर पाठकों की अभिरुचि पर पहरा बिठाया जाता है.

लेखक ने दर्शाया है कि कैसे एक ही पाठक एक ही समय में महाभारत जैसे महाकाव्य और ‘दस्यु मोहन’ जैसे जासूसी उपन्यासों का रसास्वादन कर सकता है जो पाठक की रुचि के लचीलेपन को सिद्ध करता है. मुद्रण तकनीक ने श्रोता को पाठक में परिवर्तित कर साक्षर और निरक्षर के मध्य जो प्राचीर खड़ी की और भारतीय लोकप्रिय साहित्य पर जो औपनिवेशिक प्रभाव पड़ा उसका भी यहाँ विस्तार से उल्लेख है. प्रोफ़ेसर दास ने उन आलोचकों के अहंकार पर भी प्रहार किया है जो लोकप्रियता को निम्न स्तर का मानते हैं. बुद्धदेव बोस और शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के दृष्टांतों से वे तर्क देते हैं कि व्यापक पहुँच किसी कृति को दोषपूर्ण नहीं बनाती. ‘देवदास’ जैसे उदाहरण से वे स्पष्ट करते हैं कि जो साहित्य जनमानस के हृदय का स्पर्श करता है उसे मात्र सस्ता मनोरंजन नहीं कहा जा सकता.

‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’ कोई सामान्य समीक्षा की किताब नहीं, अपितु हिन्दी आलोचना हेतु एक वृहद सैद्धांतिक चुनौती है. यह पुस्तक आलोचक से यह अपेक्षा करती है कि वह लोकप्रियता से भयभीत न हो किंतु उसके सम्मुख नतशिर भी न हो. सौंदर्यात्मक मूल्यों की उपेक्षा किए बिना कविता को उसके सामाजिक संदर्भों में पढ़ना रवि रंजन की आलोचनात्मक दृष्टि की विशिष्टता है. यह पुस्तक लोकप्रियता को मात्र उपभोग नहीं अपितु सामाजिक श्रम के रूप में देखती है. मार्क्स ने श्रम को मनुष्य और प्रकृति के बीच का सेतु कहा था. इस पुस्तक का लेखक वहीं से सूत्र लेकर कविता को मनुष्य और समाज के बीच का सेतु मानता है. इसीलिए उसका आग्रह है कि आलोचना करते समय हमें मात्र भाषा नहीं बल्कि कविता रचने की पृष्ठभूमि में निहित अध्यवसाय, ऐतिहासिक परिस्थितियाँ और जोख़िम को भी समझना चाहिए. यहाँ लोकप्रियता और मूल्य का संबंध पुनः जटिल हो जाता है. लेखक स्पष्ट कहता  है कि लोकप्रियता कोई ज़रूरी मूल्य नहीं है किंतु श्रेष्ठ कविता से उसका जन्मजात विरोध भी नहीं है. हिन्दी आलोचना प्रायः कबीर, तुलसी, गुप्त, दिनकर, बच्चन आदि को अपवाद बताकर लोकप्रियता को या तो पतन की पराकाष्ठा मान लेती है या फिर चाटुकारिता अथवा संकीर्ण गुटबाजी करने वाले लेखकों को महान घोषित कर देती है. इन दोनों अतियों  के प्रति सचेत करते हुए रवि रंजन याद दिलाते हैं कि साहित्यिक मूल्य ऐतिहासिक होता है और सामाजिक संघर्षों से निर्मित होता है. वाल्टर बेन्यामिन का यह कथन यहाँ सार्थक प्रतीत होता है कि प्रत्येक सांस्कृतिक दस्तावेज़ एक साथ सभ्यता और बर्बरता का दस्तावेज़ होता है.

लोकप्रियता और स्मृति का संबंध भी यहाँ महत्वपूर्ण है. लेखक बताता है कि लोकप्रिय कविता सामाजिक स्मृतियों का एक रूप है. वह उन अनुभवों को सुरक्षित रखती है जिन्हें औपचारिक इतिहास विस्मृत कर देता है. कवि दिनकर के शब्दों में

‘अंधा चकाचौंध का मारा
क्या जाने इतिहास बेचारा
साखी हैं जिनकी महिमा का
सूर्य चन्द्र भूगोल खगोल
क़लम आज उनकी जय बोल”.

मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन और शील जैसे कवियों की पंक्तियाँ अथवा लोकप्रिय न होने के बावजूद अज्ञेय की ‘असाध्य वीणा’ या अशोक वाजपेयी की ‘आश्वित्ज़’ जैसी कविताएँ  इसी स्मृति के उदाहरण हैं. किंतु यह भी सच है कि कई बार स्मृति तटस्थ नहीं होती.  वह सत्ता द्वारा विनियमित होती है. पर इत्मीनान की बात यह है कि कुछ ख़ुशामदी लेखकों की कविता भले इस नियंत्रण को स्वीकार करती हो, गंभीर लेखक सत्ता के क़रीब रहने के बावजूद उसे ललकारने में कोई कोताही नहीं करते. हिन्दुस्तान के पहले राष्ट्रपति डॉ.राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ अपने नज़दीकी सियासी रिश्ते के बावजूद ‘भारत का रेशमी नगर’ जैसी दसियों कविताओं और ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ कृति में कवि दिनकर रचित सैकड़ों पंक्तियाँ सत्ता की बखिया उधेड़कर रख देती हैं.

कहने का मतलब है कि कविता और सत्ता के संबंधों पर गहन चिंतन इस पुस्तक को साधारण आलोचना से कहीं आगे ले जाता है. कविता को यहाँ सत्ता के खिलाफ़ सियासी बयान के बजाय सत्ता की भाषा में विद्यमान दरारों की पहचान के रूप में रेखांकित किया गया है. अरुण कमल की कविता में विरूपता का सौंदर्य इसी पहचान से उत्पन्न होता है जो पाठकों में एक बेचैनी पैदा करता है. उदाहरण देकर यह बताना ज़रूरी नहीं है कि प्रतिरोध सदैव संगठित आंदोलन नहीं होता.  वह अनुभव के स्तर पर भी होता है और कविता इसी प्रतिरोध को लिपिबद्ध करती है. ग्राम्शी की ‘संभाव्य चेतना’ का तसव्वुर यहाँ बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाता है.

यह पुस्तक आलोचना की नैतिकता पर भी विचार करती है. इसमें सवाल उठाया गया है कि क्या आलोचक का कार्य मात्र चयन और अस्वीकार है या उसका कार्य समझना और संवाद स्थापित करना भी है. यहाँ आलोचक को एक न्यायाधीश नहीं, बल्कि एक मध्यस्थ के रूप में देखने पर बल है जो कविता और पाठक समाज के बीच सार्थक विमर्श को संभव बनाता है. यह कृति प्रमाणित करती है कि लोकप्रियता और उच्चतर काव्यमूल्य हरगिज़ एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. हिन्दी साहित्य का इतिहास सबूत है कि विभिन्न कालों में कैसे भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों की रचनाएँ सृजित हुईं हैं. आलोचना का कार्य इस अंतर को पहचानना है. यह किताब हरेक लोकप्रिय कविता को महान नहीं घोषित करती, किंतु यह अवश्य कहती है कि प्रत्येक महान कविता अलोकप्रिय हो यह ज़रूरी नहीं है. कारण यह है कि लोकप्रियता श्रेष्ठ कला का अनिवार्य गुण भले न हो उसका विरोधी गुण कदापि नहीं है. इसलिए आलोचना द्वारा हर तरह की कविता पर विचार किया जाना आवश्यक है.

पुस्तक के अंत में दिया गया रवि रंजन का साक्षात्कार समकालीन कविता का एक सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है. वे उतावलेपन और सपाटबयानी को मौजूदा काव्य-परिदृश्य की सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं. उनके अनुसार श्रेष्ठ कविता वह है जो विचार और संवेदना के मध्य संतुलन स्थापित करे और जिसमें काव्य-परंपरा की नकल के बजाय प्रतिध्वनि हो. आज जब बाज़ारवाद और उपभोक्ता संस्कृति मानवीयता का ह्रास कर रही है तब कविता का उत्तरदायित्व मार्क्स द्वारा कथित ‘मनुष्यता की मातृभाषा’ बनकर खड़ा होना है. कविता अब महज़ वर्ग संघर्ष की बात नहीं करती, बल्कि वह जात-पात, जेंडर और फ़िरक़ापरस्ती जैसे पेचीदा मुद्दों से लोहा ले रही है. सोशल मीडिया ने जहाँ कविता का प्रसार किया है वहीं त्वरित प्रशंसा की आकांक्षा ने गंभीर सृजन हेतु संकट भी उत्पन्न किया है.

बक़ौल मैनेजर पाण्डेय, ‘कविता को कालजयी होने से पूर्व कालजीवी होना पड़ता है’, और इसके लिए रचनाकार को एक कठोर सृजनात्मक अनुशासन की आवश्यकता होती है. थियोडोर अडोर्नो की संस्कृति उद्योग और वाल्टर बेन्यामिन के आभा की हानि जैसे सिद्धांतों के मध्य यह पुस्तक एक अनुपम संतुलन स्थापित करती है. यह बतलाती है कि लोकप्रिय कविता—चाहे वह दिनकर की हो अथवा नागार्जुन की—जब अपने भीतर सामाजिक श्रम और ऐतिहासिक स्मृतियों को संजोती है तब वह मात्र बाज़ारू उत्पाद न रहकर प्रतिरोध का उपकरण बन जाती है. रेमंड विलियम्स की ‘अनुभूति की संरचना’ के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि कविता उन अनकही भावनाओं को स्वर देती है जो अभी विधिवत विचार का स्वरूप ग्रहण नहीं कर पाई हैं. अंततः यह पुस्तक सिद्ध करती है कि कविता की सार्थकता उसकी लोकप्रियता के ख़तरों के बीच भी मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय की प्रत्याशा को जीवित रखने में है.

प्रोफ़ेसर रवि रंजन का यह अकादमिक उद्यम न केवल लोकप्रिय हिन्दी कविता के समाजशास्त्र को रोचक बनाते हुए अनेक अच्छी कविताओं की व्याख्या करता है, बल्कि एक अदद इंसाफ़-पसंद समाज के निर्माण का वैचारिक घोषणापत्र बनकर उभरता है. कई छोटे-बड़े मशहूर और गुमनाम अच्छे कवियों की चुनिन्दा कविताओं पर संजीदा और असरदार आलोचनात्मक टिप्पणियाँ इस किताब को साहित्य के सभी गंभीर पाठकों के लिए बामक़सद, क़ीमती, दिलचस्प और पठनीय बनाती हैं.

यह पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें 

डॉ. तबस्सुम बेगम

सेंटर फॉर डिस्टेंस एण्ड ऑनलाइन एजुकेशन
मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी
हैदराबाद.

ईमेल: tabassumhcu@gmail.com

Tags: 20262026 समीक्षातबस्सुम बेगमरवि रंजनलोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र
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