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Home » मैं बरबाद होना चाहती हूँ : रीना सिंह

मैं बरबाद होना चाहती हूँ : रीना सिंह

मलिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मला उद्ध्वस्त व्हायचंय’ का हिंदी अनुवाद राजकमल ने प्रकाशित किया है, जिसमें उनके वैवाहिक जीवन की यातनाएँ और कवि-राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में नामदेव ढसाल के अंतर्विरोध तीखे ढंग से सामने आते हैं. इस पुस्तक की चर्चा रीना सिंह कर रही हैं.

by arun dev
February 21, 2026
in समीक्षा
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मैं बरबाद होना चाहती हूँ : रीना सिंह
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मैं बरबाद होना चाहती हूँ
व्यक्तिगत की व्याप्ति
रीना सिंह

 

मलिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मला उद्धवस्त व्हायचंय्’ मराठी में सन् 1984 में प्रकाशित हुई थी. हाल ही में इस आत्मकथा का हिंदी अनुवाद सुनिता डागा ने ‘मैं बरबाद होना चाहती हूँ’, शीर्षक से किया है.

जब मलिका अमर शेख ने यह आत्मकथा लिखी उस समय उनकी आयु मात्र सत्ताईस वर्ष की थी. इतनी अल्पायु में वैवाहिक जीवन की असहनीय वेदनाओं, अपमानों और विखंडित स्वप्नों का जो नग्न सत्य उन्होंने शब्दों में उकेरा, वह न केवल निजी जीवन का उद्घाटन है, बल्कि स्त्री-अस्तित्व के गहरे द्वंद्व का दस्तावेज भी है. उनके लेखन में कहीं भी संकोच, आवरण या आत्मदया का स्वर नहीं है. वे आरंभ में ही स्वीकार करती हैं कि—

“जीवन को सम्पूर्णतः प्रगट करना उस जीवन को सहने-भोगने की अपेक्षा अधिक दुष्कर कार्य होता है. बावजूद इसके, हर स्तर पर साधारण-सी मैं, केवल एक स्त्री के रूप में, अपने जीवन के सभी द्वार-खिड़कियाँ खोलने के लिए तैयार हुई; इसे एक बेवकूफ़ाना साहस कहिए या और कुछ… आखिरकार लिखना-कहना कभी-कभी इतना अपरिहार्य हो उठता है कि सामने दर्शक या पाठक हो या न हो, कोई फर्क नहीं पड़ता है. सब कुछ खुद-ब-खुद खुलता जाता है.”

कथा के केंद्र में हैं उनके पति—नामदेव ढसाल, जिनका व्यक्तित्व जितना ऊर्जस्वी और आंदोलनधर्मी था, उतना ही जटिल और विघटनकारी भी. दलित पैंथर आंदोलन के सूत्रधारों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही. आंदोलन का उत्थान और फिर उसका विघटन—इन दोनों स्थितियों का मानसिक आघात उनके जीवन पर पड़ा, और उसका प्रतिफल निजी जीवन में दिखाई दिया. जिस क्रांतिकारी ऊर्जा से उन्होंने समाज को झकझोरा, उसी ऊर्जा का एक अंधेरा पक्ष घर के भीतर मल्लिका के हिस्से आया—हिंसा, उपेक्षा, बेवफाई, आर्थिक अस्थिरता और भावनात्मक शोषण.

यहाँ प्रश्न उठता है, क्या यह केवल एक पुरुष का पतन है? या प्रेम और सत्ता के द्वंद्व की कथा?

मलिका ने उन्नीस वर्ष की आयु में विवाह का निर्णय लिया. यह वही उम्र है जहाँ प्रेम जीवन का केंद्र बन जाता है और विवेक भावनाओं के आगे पराजित हो जाता है. उस अवस्था में समूचा संसार एक व्यक्ति में सिमट जाता है. परिवार, करियर, भविष्य. सब कुछ उस प्रेम के सम्मुख गौण हो जाता है. परंतु विवाह के बाद जब वही प्रेमी बदल जाता है. या उसका दूसरा चेहरा सामने आता है. तब स्त्री भीतर से चूर-चूर हो जाती है. वह उस पुरुष में अपने पुराने प्रेमी को खोजती रहती है. उन्नीस वर्ष की कोमल आयु में प्रेम को जीवन का केंद्र मान लेने का निर्णय आगे चलकर मलिका के लिए पीड़ादायक सिद्ध हुआ. प्रेम, जो आरंभ में समर्पण और स्वप्न था, विवाह के बाद असमानता, उपेक्षा और हिंसा में रूपांतरित होता गया.

दो भिन्न पारिवारिक संस्कारों का टकराव भी इस त्रासदी का एक कारण रहा. जहाँ मलिका ने अपने माता-पिता के संतुलित दांपत्य का आदर्श देखा था, वहीं नामदेव के जीवन में अस्थिर पारिवारिक अनुभवों की छाया थी. नामदेव ने एक अस्थिर पारिवारिक परिवेश देखा था शराब, पर स्त्री संबंध, और मौन स्वीकृति. आर्थिक स्तर पर भी विषमता थी. मलिका अपेक्षाकृत सुरक्षित परिवेश से आई थीं, जबकि नामदेव संघर्षशील जीवन से. आर्थिक, सामाजिक और मानसिक स्तरों की असमानता ने भी संबंधों को और जटिल बनाया. यह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, दो संस्कारों का मिलन था. और अंततः टकराव भी.

नामदेव केवल पति नहीं थे; वे एक आंदोलनकारी व्यक्तित्व थे. दलित पैंथर आंदोलन के निर्माण में उनकी केंद्रीय भूमिका रही. उन्होंने दलित अस्मिता के लिए लेखन और संघर्ष दोनों किए.लेकिन आंदोलन का उत्थान और फिर उसका पतन—इन दोनों स्थितियों ने नामदेव के भीतर गहरा मानसिक द्वंद्व पैदा किया. जब कोई व्यक्ति अपनी ही आँखों के सामने अपने स्वप्न को टूटते देखता है, तो उसका असर निजी जीवन पर भी पड़ता है. मलिका ने राजनीति का आंतरिक चेहरा देखा—समझौते, जातिगत आग्रह, सत्ता के लिए झुकना, नैतिक विचलन. एक ऐसे परिवार से आने के कारण जहाँ जाति का आग्रह नहीं था, उनके लिए यह अनुभव और अधिक कष्टदायक था कि झूठे जाति-अभिमान के कारण मनुष्य अपने प्राण तक दाँव पर लगा देता है.

मलिका का कथ्य केवल निजी जीवन की कथा नहीं; यह पितृसत्तात्मक संरचना की परतें खोलता है. वे देखती हैं कि राजनीति, आंदोलन और पुरुष-अहंकार किस प्रकार निजी संबंधों को प्रभावित करते हैं.

आत्मकथा में ऐसे प्रसंग आते हैं जहाँ पत्नी का अस्तित्व ही प्रश्नांकित हो जाता है. शारीरिक हिंसा, मानसिक उत्पीड़न, बेवफाई, यहाँ तक कि पत्नी की गरिमा को दाँव पर लगा देने की मानसिकता. ये सब स्त्री की अस्मिता को झकझोर देने वाले प्रसंग हैं.

ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि मलिका अंत तक उस संबंध में क्यों बनी रहीं? क्या यह सामाजिक दबाव था? अहम ? या वह बालसुलभ आकांक्षा कि “वह फिर पहले जैसा हो जाएगा”? यही मलिका का आंतरिक द्वंद्व है—मार, अपमान, बेवफाई और उपेक्षा सहते हुए भी वह उसी व्यक्ति के स्नेह की आकांक्षा क्यों करती है? क्या यह प्रेम है? भावनात्मक निर्भरता? या अपने ही निर्णय को सही सिद्ध करने की जिद?

ऐसे अनेक प्रश्न हैं, जो इस आत्मकथा के पाठ के पश्चात् भी अनुत्तरित ही रह जाते हैं और पाठक-मन में दीर्घकाल तक प्रतिध्वनित होते रहते हैं.

मलिका जी ने विवाहोपरांत स्वयं को एक स्वाभिमानी पत्नी के रूप में प्रतिष्ठित किया. उन्होंने अपने वैवाहिक जीवन की दरारों को कभी मायके की चौखट तक नहीं पहुँचने दिया. न उन्होंने सहायता की याचना की, न ही अपने दाम्पत्य के अंतर्विरोधों को पारिवारिक चर्चा का विषय बनने दिया. मानो उन्होंने अपने दुःख को निजी गरिमा का आवरण ओढ़ा दिया हो—एक ऐसी गरिमा, जो टूटते हुए भी सार्वजनिक स्वीकार से इंकार करती है. यह प्रसंग हमें सोचने को विवश करता है कि क्या स्वाभिमान और संवाद परस्पर विरोधी हैं? क्या स्त्री का आत्मगौरव उसे सहयोग माँगने से रोकता है? अथवा समाज ने उसे यह विश्वास दिला दिया है कि सहनशीलता ही उसकी सबसे बड़ी मर्यादा है?

मलिका की कथा इन प्रश्नों का प्रत्यक्ष उत्तर नहीं देती, परंतु वह पाठक के भीतर एक गहरा विमर्श अवश्य जगा देती है—कि न्याय की मांग करने वाली स्त्री को पहले अपने मौन की परंपरा से भी संवाद करना होगा.

जिस मलिका ने अपने वैवाहिक जीवन के मात्र दस वर्षों में ही अपनी समस्त वेदनाओं को समाज के सम्मुख निर्भीकता से उद्घाटित कर दिया, वही अंततः किस अनिवार्यता, किस अदृश्य बंधन से बँधकर जीवन-पर्यंत उसी संबंध में अवस्थित रही—यह प्रश्न सहज ही मन को मथता है.

स्त्रियाँ जिस पुरुष-सत्ता या पितृसत्तात्मक व्यवस्था की शिकायत करती हैं, उसके पोषण में उनका योगदान भी कम नहीं रहा है. विडंबना यह है कि जो स्त्री स्वयं अपने पति के अत्याचार की पीड़ा झेल चुकी होती है, वही सास बनकर अपनी बहू से उसी सहनशीलता की अपेक्षा करती है. उसे अपने पुत्र का पौरुष, चाहे वह हिंस्र ही क्यों न हो, गौरव का विषय प्रतीत होता है. वह अनजाने ही उस पौरुष को पुष्ट करती है, जिसने कभी उसके अपने अस्तित्व को भी आहत किया था.

“मारता है तो क्या हुआ, प्रेम तो करता है”—ऐसे वाक्य हमारे सामाजिक मानस में कितनी गहराई से जमे हैं, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है. हिंसा को प्रेम के साथ जोड़ देने की यह प्रवृत्ति स्त्री-अस्मिता के क्षरण का सबसे सूक्ष्म और घातक रूप है.

मलिका के जीवन का केंद्र नामदेव थे; किंतु नामदेव के जीवन में मल्लिका कभी केंद्र नहीं बन सकीं. उनके लिए केंद्र में था—दलित समाज का संघर्ष, आंदोलन की आकांक्षा और कविता का ताप. एक कवि और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उनका व्यक्तित्व व्यापक था, परंतु पति और पिता के रूप में वही विस्तार संकुचित हो जाता है. मलिका ने अपने जीवन में जिन दो निकटतम पुरुषों—पिता और पति—को देखा, उनकी सकारात्मक प्रवृत्तियाँ वह आत्मसात न कर सकीं. जबकि साहस, स्वाभिमान और संघर्ष की संभावनाएँ उनके स्वभाव में अंतर्निहित थीं, फिर भी जीवन-परिस्थितियों ने उन्हें धीरे-धीरे असहायता की ओर ढकेल दिया.

यह आत्मकथा इस सत्य को उद्घाटित करती है कि पुरुष-सान्निध्य की तीव्र आकांक्षा किस प्रकार स्त्री के आत्मबल को क्षीण कर सकती है. सहचर्य की कामना स्वाभाविक है, परंतु जब वही अस्तित्व का एकमात्र आधार बन जाती है, तब स्त्री का स्वत्व निर्बल पड़ने लगता है. मल्लिका की कथा केवल व्यक्तिगत वेदना का आख्यान नहीं, अपितु उस सामाजिक संरचना का दर्पण है, जहाँ प्रेम, पौरुष और अधिकार की संकल्पनाएँ परस्पर उलझी हुई हैं. यह आत्मकथा हमें विवश करती है कि हम स्त्री-अस्तित्व की उस द्वंद्वात्मक स्थिति को समझें, जहाँ वह विद्रोह भी करती है और उसी व्यवस्था में बँधी भी रहती है.

एक प्रश्न बार-बार उभरता है—जब मलिका शिक्षित, प्रतिभाशाली और स्वाभिमानी थीं, तब वे आर्थिक रूप से लंबे समय तक निर्भर क्यों रहीं? उन्होंने नौकरी बाद में की, वह भी परिस्थितियों से विवश होकर. आरंभ में उन्होंने अपने स्वप्न, अपनी रचनात्मकता, यहाँ तक कि अपने आभूषण तक नामदेव के आंदोलन और आकांक्षाओं पर न्योछावर कर दिए. वे स्वयं एक सशक्त कवयित्री थीं, किंतु उन्होंने अपने अस्तित्व को उनके सपनों में विलीन कर दिया.

मलिका स्वयं इन प्रश्नों से जूझती हैं. वे अपने पति को ही पूर्णतः खलनायक सिद्ध नहीं करतीं; बल्कि यह स्वीकार करती हैं कि हर मनुष्य किसी न किसी क्षण में खलनायक हो सकता है. यही आत्मस्वीकृति इस आत्मकथा को मात्र आरोप-पत्र नहीं रहने देती, बल्कि उसे मानवीय जटिलताओं का दस्तावेज बना देती है.

इस आत्मकथा में स्त्री-विमर्श का एक महत्त्वपूर्ण आयाम उभरता है—स्त्री की भावनात्मक निर्भरता और उसकी आत्म-परिभाषा का संकट. प्रेम में संपूर्ण अस्तित्व अर्पित कर देने वाली स्त्री विवाह के बाद जब वही प्रेम नहीं पाती, तो भीतर से विखंडित हो जाती है.

यह आत्मकथा केवल जीवन-वृत्तांत नहीं, अपितु स्त्री-अस्तित्व का घोषणापत्र है. यह संदेश देती है कि स्त्री अपनी सत्ता की खोज बाह्य सहारों में नहीं, अपने अंतराल में करे. संपूर्ण सामाजिक संरचना पर पुरुष-वर्चस्व का आरोप लगाना सरल है, किंतु उससे भी अधिक आवश्यक है कि स्त्री अपने अंत:करण में झाँके और अपनी स्थितियों को सुदृढ़ बनाने का साहस अर्जित करे.

स्त्री की शक्ति केवल किसी एक पुरुष के इर्दगिर्द व्यय होने के लिए नहीं है. उसका संवेदन-संसार व्यापक है—वह समाज की वेदना को समझ सकती है, दूसरों के जीवन को आलोकित कर सकती है. वह केवल किसी संबंध की परिधि नहीं, बल्कि स्वयं एक केंद्र है. प्रश्न उठता है—क्या स्त्री का अस्तित्व पुरुष के बिना शून्य है? क्या वह मात्र सहारे की प्रतीक्षा में निर्मित प्राणी है? समाज ने निस्संदेह कुछ नियम और मर्यादाएँ गढ़ी हैं, किंतु यदि पुरुष उन सीमाओं को लांघकर अपनी पृथक सत्ता निर्मित कर सकता है, तो स्त्री क्यों नहीं?

वास्तव में भय स्त्री की सबसे बड़ी बेड़ी है—वह भय जो बचपन से उसके मन में रोप दिया जाता है कि बिना पुरुष-सहारे उसका जीवन अधूरा है. जबकि सृष्टि का संतुलन समानता पर आधारित है, आश्रय पर नहीं. स्त्री और पुरुष सह-अस्तित्व के आधार हैं, परंतु कोई भी किसी के बिना अपूर्ण नहीं. स्त्री को करुणा की प्रतीक बनकर संसार से न्याय याचना करने की अपेक्षा अपनी शक्ति का उद्घोष करना होगा. उसे अपनी नियति स्वयं लिखनी होगी. रोदन और प्रतिशोध की परंपरा उसे मुक्त नहीं करती; वह केवल आत्मविनाश का मार्ग प्रशस्त करती है. कितनी ही स्त्रियाँ आज भी अत्याचार सहकर केवल प्रतिशोधवश संबंधों में बँधी रहती हैं—न स्वयं सुखी, न दूसरे को सुखी होने देती हैं. यह स्थिति मुक्ति नहीं, दासता का ही परिवर्तित रूप है.

स्त्री की प्रतीक्षा भी एक प्रश्न है—क्यों वह जीवनपर्यंत किसी ऐसे पुरुष की राह देखती रहे, जो अपने पारिवारिक सुख में रत है? प्रतीक्षा का यह तप यदि आत्मनिर्माण में परिवर्तित हो जाए, तो वही शक्ति का साधन बन सकता है.

यह आत्मकथा केवल पति की आलोचना नहीं करती; वह स्त्री-मन की जटिलता को भी उजागर करती है. नामदेव जब भी थोड़ा-सा स्नेह दिखाते, मल्लिका पिघल जातीं. वे स्वयं प्रश्न करती हैं—“क्या यही प्रेम है?” मार, अपमान, धोखा—सब सहकर भी उसी गोद में सिर छिपाने की आकांक्षा क्यों? यह प्रेम है, निर्भरता है, या एक भावनात्मक आदत?

सबसे भयावह प्रसंग वह है जहाँ पत्नी की गरिमा तक दाँव पर लगा दी जाती है. ऐसे क्षणों में स्त्री का आत्मसम्मान किस स्तर तक आहत होता होगा, इसकी कल्पना ही कंपा देती है. मलिका गरीबी, मारपीट, मानसिक और शारीरिक पीड़ा से गुजरती हैं—फिर भी संबंध से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पातीं.

यह आत्मकथा युवा स्त्रियों के लिए एक चेतावनी भी है—प्रेम में करियर, शिक्षा और आत्मनिर्भरता को तिलांजलि देने के निर्णय कितने हृदयविदारक हो सकते हैं. आज जब परिस्थितियाँ बदल रही हैं, तब भी भावनात्मक आवेग अनेक स्त्रियों को उसी मार्ग पर ले जाता है.

इक्कीसवीं सदी में भी यदि स्त्री को केवल ‘देह’ या ‘पराश्रित सत्ता’ के रूप में देखा जाएगा, तो समाज स्वस्थ नहीं बन सकेगा. स्त्री और पुरुष समान आधार हैं—परंतु समानता का अर्थ निर्भरता नहीं, बल्कि आत्मसत्ता है. समय आ गया है कि स्त्री निरीहता का आवरण त्यागे और आत्मविश्वास की दीप्ति धारण करे. अधिकार याचना से नहीं, आत्म-संवर्धन और साहस से प्राप्त होते हैं. उसे समाज से न्याय माँगने की अपेक्षा अपने अस्तित्व की सार्थक छवि स्वयं निर्मित करनी होगी—एक ऐसी छवि जो अनुकरणीय हो, करुणा नहीं, सम्मान की अधिकारी हो.
अंततः मलिका लिखती हैं—

“मैं पूरे मन से चाहती हूँ कि मेरी इस आत्मकथा से कम-से-कम किसी एक स्त्री को तो उसका खोया हुआ चेहरा ढूँढ़ने में मदद मिले. उसका मौजूदा घुटन भरा बन्दिशों का संसार हिचकोले खाने लगे. फिर चाहे इसके लिए आलोचक अपनी कलम से तथा समूची पुरुष सभ्यता अपनी दृष्टि से मेरी बलि भी दे दे मुझे कोई आपत्ति नहीं है.”

महिलाओं की आत्मकथाएँ अक्सर विपरीत परिस्थितियों पर विजय की कहानियों के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं. लेकिन शेख़ अपनी पुस्तक का अंत कुछ भिन्न ढंग से करती हैं

“एक पराजित और असफल मन की है यह यात्रा. साथ में कोई न था. सोचा, कुछ समय आप सबकी सोहबत में रह लूँ, आपसे बतिया लूँ. मैंने कुछ देर के लिए अपना मुखौटा उतारा है… केवल इतना ही…”

इस प्रकार यह आत्मकथा केवल निजी त्रासदी नहीं, बल्कि स्त्री-अस्तित्व की जटिल, विडंबनापूर्ण और प्रश्नाकुल यात्रा का सशक्त दस्तावेज बन जाती है—जहाँ पराजय भी एक प्रकार की साहसिक स्वीकृति है.

यह पुस्तक यहाँ से प्राप्त करें 

रीना सिंह
सह प्राध्यापकआर. के. तलरेजा महाविद्यालय, उल्हासनगर
जि. थाना, महाराष्ट्र
reenasingh1305@gmail.com
Tags: 20262026 समीक्षामैं बरबाद होना चाहती हूँरीना सिंह
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Comments 1

  1. Bajrang Bihari says:
    52 minutes ago

    रीना सिंह ने इस आत्मकथा की बड़ी सावधानी से सम्यक समीक्षा की है।
    वे ठीक ही कहती हैं कि नई स्त्री को अपना स्वत्व, अपनी अस्मिता दाँव पर लगाकर किसी पुरुष के प्रति समर्पित होने से बचना है।

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