| नामवर सिंह का छात्र-जीवन रविभूषण |
हिन्दी भाषा-साहित्य के छात्रों, शोधार्थियों एवं अध्यापकों के साथ ही कवियों, लेखकों और आलोचकों के लिए भी यह जानना जरूरी है कि नामवर सिंह ने अपने छात्र-जीवन से ही साहित्य-मार्ग पर कैसे डग भरे. 1945 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की और इसी वर्ष एक कहानी ‘कहानी की कहानी’ शीर्षक से लिखी. तुलसी पर एक निबन्ध भी लिखा –
‘समाज के अग्रचेता : तुलसी’. उम्र उन्नीस वर्ष थी. इस निबन्ध में उन्होंने युग-प्रभाव से किसी भी कवि के वंचित न रहने की बात कही, सामंत-युग में गोस्वामी जी के पलने के कारण ‘ऊँच-नीच के भेद, स्त्री-स्वतंत्रता की निन्दा, कठोर वर्ण-व्यवस्था आदि बातों की परिधि से’ नहीं निकलने के आक्षेपों का उल्लेख कर यह लिखा-
‘‘वर्तमान भारतीय समाज का निर्माण शंकराचार्य, स्वामी दयानन्द तथा राजा राममोहन राय से कहीं अधिक गोस्वामी तुलसीदास ने किया है…! उन्होंने राम राज्य के स्वर्णिम स्वप्न में चातुवर्ण व्यवस्था को भी भारत के लिए कल्याणप्रद बताया. साथ ही सोशल डिसप्लीन पर प्रधानतया जोर दिया.’’1 यह निबन्ध ‘क्षत्रिय मित्र’ के जुलाई-अगस्त 1945 के अंक में प्रकाशित हुआ था. इसी वर्ष पिता नागर सिंह ने
‘‘जल्दबाजी में मेरी शादी तय कर दी. मैं घर से भाग आया. लेकिन पकड़ कर लाया गया. हाई स्कूल का इम्तिहान खत्म हुआ था और मेरी शादी कर दी गई. गाँव, मचखिया में यू.पी. से लगा हुआ बिहार का बॉर्डर है दुर्गावती नदी के किनारे बसा हुआ गाँव. वहीं मेरी शादी हो रही थी और मैं रो रहा था.’’2
पिता अपने गाँव जीयनपुर के बगल के गाँव आवाजापुर में लोअर प्राइमरी स्कूल में शिक्षक थे.
‘‘नामवर जी ने ‘अ आई’ की पढ़ाई इसी स्कूल में की. सूर्योदय के कुछ देर बाद वे वर्णमाला की किताब, स्लेट और दिन का खाना बस्ते में डाल कर आवाजापुर के लिए चलते और पढ़ाई करके सूरज डूबने के बाद घर लौटते.’’3
चौथी कक्षा में दाखिला घर से तीन मील की दूरी पर माधोपुर स्कूल में लिया क्योंकि पिता का तबादला इसी स्कूल में हो गया था. ‘
‘पिता के साथ वे माधोपुर में ही रहकर पढ़ाई करने लगे. अपना घर और गाँव हमेशा के लिए छूट गया.’’4
माधोपुर स्कूल के मतउल्ला खाँ पिता के पीटने पर उन्हें बचाते थे. इस स्कूल के शिक्षक धर्मदेव सिंह के व्यक्तित्व ने उन्हें प्रभावित किया. 1936 में जब जवाहरलाल नेहरू बगल के गाँव कमालपुर आए थे, धर्मदेव सिंह ने उनकी सभा में नामवर सिंह को जाने को प्रेरित किया. उस समय उनकी उम्र दस वर्ष थी.
“चौथी कक्षा के छात्र नामवर जी स्कूल से चार मील पैदल चलकर नेहरू की सभा के लिए कमालपुर गए. लेकिन सभा स्थल रामलीला मैदान में जब पहुँचे, तब तक नेहरू की सभा समाप्त हो चुकी थी.’’5
गाँव से तीन मील की दूरी के गाँव कमालपुर में 1937 में पाँचवीं कक्षा में पढ़ने के लिए आए. नामवर जी का ‘साहित्यिक संस्कार’ उनके पिता के मित्र कामता प्रसाद विद्यार्थी के घर आने-जाने से हुआ. कामता प्रसाद विद्यार्थी को उन्होंने ‘धर्म पिता जैसा’ कहा है. पिता नामवर जी को लेकर अक्सर विद्यार्थी जी के यहाँ जाया करते थे. विद्यार्थी जी के
‘‘घर में काम करने वाले रसोइया-नौकर सब चमार थे…. विद्यार्थी जी कहते थे – जात-वात कुछ नहीं होती. मन में पड़ी ये गाँठें तोड़ो. … उन्होंने मुझसे कहा – तुम क्या पहनते हो, खादी पहननी चाहिए. मैं सात-आठ बरस का था तबसे खादी ही पहनने लगा.’’6
विद्यार्थी जी हेतमपुर के स्वाधीनता सेनानी थे. उनके यहाँ नामवर सिंह ने ‘सैनिक’ और ‘आज’ पत्र के साथ सस्ता साहित्य मंडल की किताबें देखीं. टाल्सटाय के ‘माई कन्फेशन’ का अनुवाद पढ़ा. नेहरू की ‘मेरी कहानी’, ‘विश्व इतिहास की झलक’ और गाँधी की आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ पढ़ी.
नामवर सिंह के साहित्यिक-संस्कार के निर्माण में आवाजापुर की साहित्यिक मंडली की महत्वपूर्ण भूमिका है.
‘‘वहाँ एक छोटी-सी लाइब्रेरी थी. जयचंद सिंह और श्यामनारायण गुप्त साहित्यिक रूचि के दोस्त थे. दोनों ही मिडिल एडवांस की तैयारी कर रहे थे. रीतिकालीन काव्य-संवेदना का माहौल था. ठाकुर बलराज सिंह, सूबेदार सिंह, ठाकुर रामगति सिंह सवैया और घनाक्षरी लिखते गाते थे. अमरेश भट्ट मुसलमान थे. उनसे द्विजदेव का ‘काव्य-कुसुमाकर’ लेकर पढ़ा.’’7
छठी कक्षा में पढ़ते समय दस वर्ष की उम्र में इंग्लैंड पर हिटलर की जीत को लेकर एक कविता लिखी. उपनाम रखा ‘पुनीत’. उस कविता की अंतिम पंक्ति है –
‘‘चढ्यो बरतानिया पर हिटलर ‘पुनीत’ ऐसे
जैसे गढ़ लंक पर पवन सुत कूदि गौ.’’8
पाँचवीं-छठी कक्षा से ही नामवर सिंह ने ब्रजभाषा में कविता लिखना आरंभ किया. काव्य-रचना का आरंभ वीर रस से हुआ और सातवीं कक्षा में श्रृंगार रस की ओर मुड़े- ‘‘आस दुइ मास प्रिय मिलन अवधि की है/उमगे उरोज रहै कंचुकी मसकि मसकि.’’ यह 33 वर्णों की घनाक्षरी है, जिसका अधिक प्रयोग रीतिकालीन कवि जसवन्त सिंह ने किया था. मिडिल स्कूल के हेडमास्टर पं. राम अधार मिश्र ने कापी में लिखी यह कविता देखकर ‘कंचुकी’ का अर्थ पूछा था और नाराज हो कर पिता नागर सिंह से ‘शादी-वादी’ करा देने की बात भी कही थी. स्कूल में डिप्टी साहब आने वाले थे. हेडमास्टर ने उनके स्वागत में एक कविता लिखने को कहा. छात्र कवि ‘पुनीत’ ने डिप्टी साहब के स्वागत में एक कविता लिख कर अपने हेड मास्टर का क्रोध खत्म किया. 1940 की मिडिल परीक्षा में इतिहास में अनुत्तीर्ण होने के कारण नामवर सिंह फेल हो गए क्योंकि शिवाजी पर ही इतना लम्बा लिखा कि दूसरे सवाल को पूरा नहीं कर सके. 1941 में पुनः मिडिल की परीक्षा दी और प्रथम श्रेणी से पास हुए.
पिता की इच्छा थी कि टीचर्स ट्रेनिंग कर बेटा प्राइमरी स्कूल में शिक्षक हो जाय, पर अपने मित्र विद्यार्थी जी के कहने पर उन्होंने नामवर सिंह का नामांकन बनारस के हीवेट क्षत्रिय स्कूल में जुलाई 1941 में सातवीं कक्षा में करा दिया. उत्तर प्रदेश के एक रजवाड़े भिंगा के राजा उदय प्रताप सिंह ने अपने एकमात्र पुत्र की मृत्यु से मर्माहत होकर क्षत्रिय समुदाय में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए बनारस में 1909 ईसवी में हीवेट क्षत्रिय स्कूल की स्थापना की. तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर ‘हीवेट’ के नाम पर ‘ हीवेट क्षत्रिय स्कूल’ स्थापित हुआ, जो बाद में ‘उदय प्रताप कॉलेज’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ. जुलाई 1941 में नामवर सिंह, सातवीं कक्षा के छात्र के रूप में बनारस आए. इसी वर्ष 2 फरवरी को रामचन्द्र शुक्ल दिवंगत हो गये थे. पाँचवीं-छठी कक्षा में पढ़ते हुए ब्रजभाषा में नामवर सिंह कविताएँ लिखा करते थे.
“भोजपुरी भाषी होते हुए भी ब्रजभाषा में कविताएँ लिखने का कारण यह था कि उन दिनों ब्रज में ही कविताएँ पढ़ने-सुनने को मिलीं. दूसरी बात कि उन दिनों विद्यालयों के बीच अन्त्याक्षरी की प्रतियोगिताएँ हुआ करती थीं.उनमें अपने विद्यालय की ओर से मैं भाग लिया करता था. तो उस बहाने बहुत सारी कविताएँ याद रखनी पड़ती थीं. उनमें कोर्स के बाहर की ढेर सारी कविताएँ रहती थीं. कोर्स के बाहर की ये कविताएँ इस तरह याद हो गई थीं.”9
आवाजापुर गाँव के ठाकुर जयचन्द सिंह के जरिये उनका सम्पर्क बिहारी, रत्नाकर तथा रीतिकाल के अन्य कवियों से हुआ था. ग्यारह-बारह वर्ष की अवस्था में वे ब्रजभाषा में लिखने लगे थे. बनारस आने के बाद उन्हें मालूम हुआ कि कविता खड़ी बोली में लिखी जाती है.
“अब मुझे भी अपनी वे कविताएं बेकार की चीज लगीं. वे तुकबन्दियाँ तो अभ्यास के लिए थीं. मैंने उनमें से कई फाड़ कर फेंक दीं.”10
हीवेट क्षत्रिय स्कूल में जुलाई 1941 में नामांकन के मात्र कुछ महीने बाद ‘क्षत्रिय मित्र’ पत्रिका में खड़ी बोली की उनकी पहली कविता ‘दीवाली’ प्रकाशित हुई. दूसरी प्रकाशित कविता थी – ‘सुमन, रो मत, छेड़ गाना.” इसी वर्ष त्रिलोचन से परिचय हुआ. अगस्त या सितम्बर 1941 में उनके छात्रावास में त्रिलोचन जी को भाषण और काव्य-पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था. स्कूल परिसर में
“मुख्य द्वार के पास प्राचीन छात्र-भवन था. उसमें ‘क्षत्रिय मित्र’ नाम की पत्रिका का नया-नया कार्यालय स्थापित हुआ था. उस पत्रिका के सम्पादक शम्भुनाथ सिंह थे.”11
स्वास्थ्य-लाभ के लिए शम्भुनाथ सिंह के बाहर जाने के बाद ‘क्षत्रिय-मित्र’ का सम्पादकीय दायित्व त्रिलोचन जी को सौंपा गया था. नामवर सिंह उनसे मिले. त्रिलोचन जी ने उन्हें लिखने-पढ़ने की सलाह दी. वे उम्र में दस वर्ष बड़े थे. नामवर सिंह चौदह वर्ष के थे और त्रिलोचन चौबीस वर्ष के. उनकी प्रेरणा से उन्होंने किताबें – गोर्की की ‘आवारा की डायरी’ का इलाचन्द्र जोशी का अनुवाद और निराला की ‘अनामिका’ खरीदीं.
छात्र-जीवन में नामवर सिंह को “स्कूल नामक संस्था के साथ-साथ बिरादरी की भी संस्थाओं का बोध हुआ.’ क्षत्रिय महासभा’ नामक संस्था के जलसे में वे कभी नहीं गए. स्कूल में हेड मौलवी, हेड पंडित और अंग्रेज प्रिंसिपल को छोड़ कर सभी क्षत्रिय थे. जे पी सिंह पहले भारतीय प्रिंसिपल थे. इस स्कूल में केदारनाथ सिंह और पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह भी छात्र थे.
“हमारे इस स्कूल में एक रॉयल विंग था. वहाँ राजकुमारों का अपना अलग कमरा होता था. हम प्रजाजन एक कमरे में चार होते थे. इस हॉस्टल में मैं छह बरस रहा. यहाँ फौजी जीवन था, कड़ा अनुशासन था. रोज पी. टी. होती थी. हाथ-मुँह धोकर रोज मेस में खाना खाने पंक्तिबद्ध होकर जाते थे. पढ़ाई के बाद दोपहर का भोजन होता. सुबह का नाश्ता कमरों में ही मेज पर सजा रहता. आधी छुट्टी के बाद फिर पढ़ाई शुरू हो जाती थी. पूरी छुट्टी चार बजे होती थी. खेलों के घंटे में कमरे में कोई न रहता था. शाम को संध्या भवन में प्राणायाम, व्यायाम करना, उसके बाद शाम का खाना होता और नौ बजते न बजते रोशनी बुझा दी जाती. सीधा मेन स्विच ऑफ कर दिया जाता और लालटेन जलाने की भी इजाजत न होती.”12
स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे. शनिवार को डिबेट होती थी. सांस्कृतिक कार्यक्रम के दिन विशेष प्रकार का भोजन बनता था. दूध सस्ता था.
“जलेबी-बालूशाही के साथ जम कर दूध पीते थे. वहाँ पर सात-आठ घोड़े भी थे. राजस्थान के मेजर मान सिंह घुड़सवारी सिखाते थे. शनिवार की शाम पढ़ाई नहीं होती थी. तीन बजे लाइन-हाजिर होना पड़ता. मैदान में दौड़ होती.”13
छात्रावास का जीवन अनुशासित था. स्कूल मेंपढ़ाई सस्ती थी.फीस बहुत कम थी- आठ आने, एक रुपया.वह भी माफ हो जाती थी. पिता जी प्रतिमाह पन्द्रह रुपये भेजते थे, जिसमें आराम से काम चल जाता था.
बनारस आने के एक महीने के भीतर ही नामवर सिंह का शिवदान सिंह चौहान, शमशेर बहादुर सिंह और अन्य साहित्यकारों से परिचय हुआ. वे कवि सम्मेलनों में जाने लगे थे. 1942 के आन्दोलन के समय वे आठवीं कक्षा के छात्र थे. उन दिनों उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन के बारे में जाना, उसके बारे में शिक्षा प्राप्त की. बनारस के उनके स्कूल में गर्मी, दशहरे और जाड़े की छुट्टियाँ होती थीं. इन छुट्टियों में वे गाँव आया करते थे. गाँव में होने वाले शादी-ब्याह के कार्यक्रमों, नाच-गान आदि से उन्हें कोई मतलब नहीं था.
“मेरा साथ किताबों से था… मैं अपनी किताबें लिए अलग पढ़ा करता था. उपन्यास पढ़ने का शौक मुझे बहुत कम था. कुछ कविता की किताबें हुआ करती थीं – पुरानी-नई. इस तरह से पढ़ा करता था. किताबें मेरा जीवन साथी हैं, यह मेरे बचपन के एकान्त ने मुझे सिखा दिया था.”14
नामवर सिंह ने अपने स्कूल और कॉलेज के कई अध्यापकों का बार-बार स्मरण किया है, उनकी प्रशंसा की है. क्षत्रिय स्कूल और उदय प्रताप कॉलेज के ठाकुर मार्कण्डेय सिंह उन्हें हमेशा याद रहे. वे ‘बहुत अच्छे अध्यापक’ थे. ठाकुर मार्कण्डेय सिंह की उन पर गहरी छाप पड़ी. उन्हें वागाडम्बर या वाग्जाल पसंद नहीं था.
“पढ़ाते हुए जो पहला संस्कार हमारे मन पर पड़ा, वह था विचारों की स्पष्टता, भाषा की स्पष्टता, वागाडम्बर से बचना… वो रामचन्द्र शुक्ल की भाषा को पसन्द करते थे, प्रेमचन्द की भाषा को आदर्श मानते थे. कठिन-से-कठिन, जटिल-से-जटिल को सुलझा करके कहने की अद्भुत क्षमता थी उनमें.”15
जे.पी. सिंह (जगदीश प्रसाद सिंह) नामवर सिंह के प्रिंसिपल थे, अंग्रेजी के अध्यापक थे. उनके बारे में यह कहा जाता था कि वे बीएचयू के वाइस चांसलर डॉ. राधाकृष्णन से अच्छी अंग्रेजी बोलते हैं. उन्होंने ‘गोल्डेन ट्रेजरी’ पढ़ाई थी. उनके पढ़ाने का ढंग अनूठा था. कविता याद हो जाती थी.
‘‘यह भी कविता को किस तरह पढ़ना चाहिए, रिसाइट कैसे करना चाहिए एप्रीशिएट कैसे करना चाहिए, समझाना कैसे चाहिए. इतनी अच्छी कविता पढ़ानेवाला आदमी हमें दूसरा नहीं मिला. तो कविता में एक अन्तः प्रवेश और आस्वाद यह हमें जे.पी. साहब से ही मिला.”16
प्रिंसिपल जे.पी. सिंह ने नामवर सिंह जब आठवीं कक्षा के छात्र थे, उनकी खड़ी बोली का एक सवैया, तान के सोता रहा जल चादर, वायु से खींचा जगा गया कोई’ पत्रिका में प्रकाशित किया था. बिहारी दोहों को पढ़ते हुए नामवर सिंह को जलचादर शब्द मिला था. इस सवैये को जब नामवर सिंह पढ़ते थे, तो उनके प्रिंसिपल ‘साथ-साथ उसे गाते थे.’
स्कूल जीवन में नामवर जी को ‘गढ़ने’ का श्रेय मार्केण्डेय सिंह, जे.पी.सिंह और त्रिलोचन शास्त्री को है. संस्कृत के अध्यापक पंडित विजय शंकर मिश्र और इतिहास के अध्यापक, प्रोफेसर, हीरालाल सिंह को भी उन्होंने याद किया है. प्रिंसिपल जे.पी. सिंह ने ‘अंग्रेजी में गहरी रूचि’ पैदा की थी और अंग्रेजी के एक अध्यापक तारा प्रताप सिंह ने उन्हें ‘शुद्ध व्याकरण की दृष्टि से और ‘बामुहावरा’ अंग्रेजी लिखना सिखाया.
‘‘साहित्य की रूचि तो जे.पी. सिंह में थी लेकिन तारा प्रताप सिंह आज कल के जमाने के मुहावरे में इ.एल.टी. (इंग्लिश लैंग्वेज टीचिंग) वाले थे. करेक्ट इंग्लिश, उसकी दीक्षा उन्होंने दी थी.”17
1940 के दशक के स्कूलों के अध्यापक कुछ और थे. फिर ‘हीवेट क्षत्रिय स्कूल’ कोई सामान्य स्कूल नहीं था. अध्यापक छात्रों को निर्मित करते थे. उन दिनों स्कूलों में अंग्रेजी में इतिहास की अच्छी किताबें छात्रों को पढ़ने को मिलती थीं. इतिहास के अध्यापक हीरालाल सिंह से नामवर सिंह ने दो अच्छी बातें सीखने का उल्लेख किया है – अच्छी अंग्रेजी के लिए हिस्ट्री की किताबें पढ़ना जरूरी है और
‘‘उद्धरण कैसे देना चाहिए, यह पोलिटिकल साइंस की किताबों से पता चलेगा… हिन्दी वालों को उद्धरण देना नहीं आता… किसी उद्धरण को इतना लम्बा लिखने की जरूरत नहीं होती. बल्कि उसका जो महत्वपूर्ण मुहावरा है, फ्रेज है, उसे संगतिपूर्ण ढंग से रखा जाए, समझने वाले समझ जाएँगे.’’18
हीराला सिंह इतिहास के अलावा पोलिटिकल साइंस से भी एम.ए.थे. वे ‘‘कोर्स के अलावा दूसरी किताबें देते थे पढ़ने के लिए और हमलोगों को पढ़ने के लिए उकसाते थे.’’19
नामवर सिंह ने ‘प्रतिभा’ को कभी जन्मजात नहीं माना. सब कुछ मिहनत है, श्रम है. उन्होंने ‘प्रतिभा’ को ‘निन्यान्बे प्रतिशत ‘परस्पिरेशन’ कहा है. ‘हिन्दी में अनुवाद करें तो पसीना है.’
‘‘मैंने अनुभव किया है कि मेहनत ही सबसे बड़ी प्रतिभा है. निरन्तर अधिक से अधिक पढ़ते रहना, मेरा ख्याल है कि वह मेहनत ही गुणात्मक परिवर्तन से प्रतिभा बन जाती है. जो परिश्रम है, उसका एक बिन्दु पर पहुँचते ही गुणात्मक परिवर्तन होता है और उसी तरह वह मेहनत या व्यवसाय प्रतिभा बन जाती है. ऐसा मेरा ख्याल है… मेरे भौतिकवादी मन को यह एनोलोजी ज्यादा ठीक मालूम होती है. जन्मजात प्रतिभा नाम की चीज मेरी समझ से परे है. इसलिए मैंने मेहनत से उसका विकास किया है, अर्जित किया है. यह एक तरह की खेती है. उसे जितना जोतोगे, उतनी ही अच्छी फसल काटोगे.’’20
आज बिना जोते फसल काटने में लगभग सब लगे हैं. दो-चार पुस्तकों का संक्षिप्त सारांश प्रस्तुत करना समीक्षा-कर्म माना जा रहा है और ऐसी ‘समीक्षा’ को प्रकाशित करने वाले कुछ सम्पादक सबको समीक्षक, आलोचक घोषित करने में लगे हैं. नामवर सिंह ने अपने छात्र-जीवन में कितना गहन, व्यापक अध्ययन किया था, इसे हम उस समय उनकी लिखी गयी समीक्षाओं, रचनाओं से समझ सकते हैं. उनके छात्र-जीवन को 1936-37 से लेकर उनके रिसर्च करने की अवधि 1956 (‘पृथ्वी राज रासो की भाषा’) या 1952 (‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग) तक देखें, तो यह समय लगभग अठारह-बीस वर्ष का है- स्कूली शिक्षा से लेकर एम.ए. और पी-एच.डी. की उपाधि प्राप्त करने तक.
‘छायावाद’ (1954) और ‘आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ’ उनकी बाद की दो आलोचना-पुस्तकें हैं. स्कूल में पढ़ते समय उन्होंने ‘समाज के अग्रचेता : तुलसी’ (क्षत्रिय-मित्र, जुलाई-अगस्त 1945) निबन्ध लिखा. निबन्ध मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद प्रकाशित हुआ था, पर तैयारी पहले से थी. छात्र-जीवन में, स्कूल में नामवर सिंह ने कितना अधिक पढ़ रखा था, इसका अनुमान इस निबन्ध को पढ़ कर किया जा सकता है. तुलसी पर लिखने से पहले वे ‘मानस’ तथा ‘कवितावली’ का गंभीर अध्ययन कर चुके थे. तुलसी का ‘अग्रचेता’ होना ‘‘उनके अतीत एवं वर्तमान की सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक आदि परिस्थितियों, समस्याओं का विशद गंभीर एवं सूक्ष्म अध्ययन तथा चिन्तन का परिणाम है.’’21
छात्र-जीवन में लिखे गये नामवर सिंह के सभी निबन्धों में हम उनके ‘विशद गंभीर एवं सूक्ष्म अध्ययन तथा चिन्तन’ को सहज ही देख सकते हैं. स्कूल में पढ़ते हुए वे मार्क्सवाद का अध्ययन भी कर रहे थे. तुलसी वाले इस निबन्ध में नामवर सिंह ने ‘साहित्य एवं समाज के एक शाश्वत द्वन्द्व’ की बात कही है और इसे किसी भी युग के लिए सत्य माना है. तुलसी पर लिखते हुए वे उन्नीसवीं सदी के दार्शनिक-चिन्तक जॉन स्टुअर्ट मिल (20.5.1806-8.5.1873) और जर्मन दार्शनिक नीत्शे (15.10.1844-25.8.1900) को उद्धृत करते हैं. तुलसी के संबंध में दसवीं में पढ़ने वाले छात्र की यह राय थी कि
‘‘न वे जॉन स्टुअर्ट मिल की तरह व्यक्तिवाद के एक छोर पर हैं, न नीत्शे की तरह राज्य के एक छोर पर. यहाँ भी गोस्वामी जी समन्वयवादी हैं.’’22
मिल और तीत्शे की ही नहीं, मार्क्स और लेनिन की भी इस निबन्ध में उन्होंने चर्चा की. वे ‘राज्यतंत्र’ (ऑटोक्रेसी) से भी सुपरिचित थे, ‘वर्ग-संघर्ष’ से भी. वे इसी निबन्ध में ‘साहित्य’ को ‘राष्ट्र की संस्कृति का प्राण’ बता रहे थे और संस्कृति को चिरन्तन. नामवर सिंह के इस पहले निबन्ध ने ही यह बता दिया था कि हिन्दी में एक गंभीर आलोचक का जन्म हो रहा है. यह 1945 का वर्ष था.
नामवर सिंह का त्रिलोचन शास्त्री से संबंध छात्र-जीवन से ही बना. 1941 में बनारस आने से उनका संबंध स्थापित हुआ.
‘‘सन 1941 में त्रिलोचन जी से जो संबंध-सूत्र स्थापित हुआ, वह थोड़े-बहुत अन्तराल के साथ जीवन भर बना रहा.’’23
त्रिलोचन को उन्होंने अपना ‘अभिभावक’ और ‘गुरु’ कहा है.
‘‘मैं आज जो भी हूँ, उन्हीं का प्रसाद है. मुझे उन्होंने साहित्य में उँगलियाँ पकड़ कर चलना सिखाया है और यह इतना बड़ा ऋण है कि उन पर कभी एक पूरी पुस्तक लिख कर ही अंशतः उऋण हुआ जा सकता है.’’24
त्रिलोचन पर उन्होंने पुस्तक तो नहीं लिखी, ‘आलोचना’ नवंबर 82 (जुलाई-सितम्बर 1987) को त्रिलोचन-विशेषांक बनाया. त्रिलोचन शस्त्री की सलाह पर खड़ी बोली में कविताएँ लिखना आरंभ किया. उनकी प्रेरणा से ही निराला की ‘अनामिका’ खरीदी और छायवादी कवियों से जुड़े. नामवर सिंह ने स्वीकारा है कि ‘‘साहित्य का क-ख-ग मैंने उनसे ही सीखा.’’25
नामवर सिंह 1944 में जब हाईस्कूल की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, त्रिलोचन उनके कमरे में ‘तारसप्तक’ लेकर आये थे. ‘तारसप्तक’ का प्रकाशन उसी समय हुआ था और इस संकलन के बारे में त्रिलोचन ने उन्हें काफी बताया था. ‘तारसप्तक’ पढ़ने के बाद नामवर सिंह को उसमे ‘रस नहीं आया’ था. त्रिलोचन ने समझाया – ‘‘आपने अभी बोधपूर्वक प्ढ़ा है…. आप इसे भाव पूर्वक पढ़िए.’’26
नामवर सिंह के निर्माण में बनारस की बड़ी भूमिका है. 1940 और 50 के दो दशक एकाध वर्ष छोड़कर उनके बनारस के दशक हैं. हरीश त्रिवेदी को यह सुनने को मिला था कि
‘‘जब नामवर बनारस के स्कूल में पढ़ते थे, तो उनके एक अध्यापक ने कहा कि इस बालक में शंकराचार्य की प्रतिभा है.’’27
क्षत्रिय स्कूल एक जाति-विशेष के छात्रों-अध्यापकों का स्कूल था. अनुशासन कड़ा था और स्कूल में कोई छात्र-संगठन नहीं था. दसवीं पास करने के बाद 1946 में जब नामवर सिंह ग्यारहवीं कक्षा में पहुँचे, तब उन्होंने स्कूल में पहला छात्र-संगठन बनाया. छात्र-जीवन में वे कम्युनिस्ट पार्टी से परिचित हो चुके थे, प्रगतिशील लेखक संघ का सदस्य बन चुके थे. उनके हिन्दी अध्यापक मार्कण्डेय सिंह प्रगतिशील लेखक संघ की बनारस इकाई के उपाध्यक्ष थे. नन्द दुलारे वाजपेयी अध्यक्ष और अमृत राय सेक्रेटरी थे. अमृत राय बनारस आकर स्टडी सर्कल चलाने के लिए उनके स्कूल में ‘शाम को चुपके-चुपके आते थे’ और कुछ ‘बुकलेट दे जाया करते थे’. नामवर सिंह ने छात्र-जीवन में ही कम्युनिस्ट साहित्य भी पढ़ा था. मार्क्स-एंगेल्स को न सही, पर वे कम्युनिस्ट पार्टी की पत्रिकाओं से ‘लोक युद्ध’ से परिचित थे. स्कूल में छात्र-संगठन बनाने के बाद जो हड़ताल की गयी, उसका हिन्दी में पर्चा नामवर सिंह ने लिखा था,
‘‘जिसमें लफ्फाजी बहुत थी, जोश-वोश था, जिसका हमारे प्रिंसिपल साहब ने काफी मजाक बनाया, पढ़ कर सुनाया सबके सामने. हमने बहुत दौड़-धूप की, संगठन किया था. उसमें जो कक्षा में पहली दसों पोजीशन आने वाले लोग थे… सबने गाँधी टोपी पहनकर फोटो खिंचाई थी, उनको कॉलेज से निकाला गया. मैं बीमार पड़ कर कहीं डिस्पेंसरी थी, उसमें पड़ा था… उन दस लोगों में मार्कण्डेय सिंह भी थे, जो बाद में दिल्ली में लेफ्टिनेंट गवर्नर बने.’’28
प्रगतिशील साहित्य और कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ने के पहले नामवर बनारस के लेखक-संघ की गोष्ठियों में जाने लगे थे, वहाँ कविताएँ भी सुनाने लगे थे. सक्रियता साहित्य में थी और थोड़ी-बहुत ही सही, राजनीति में भी. बनारस का वातावरण ‘साहित्यिक-राजनीतिक गहमागहमी’ से भरा था. नामवर सिंह ने 1942 के आन्दोलन में ‘बाकायदे भाग लेने’ की बात कही है. ‘‘विद्यार्थी था, आठवीं का. कॉलेज बंद हो गया था. वह जुलूस हमने निकाला था. कचहरी पर झंडा फहराने गये थे तो कॉलेज बन्द कर दिया गया था. बनारस शहर से पैदल चल कर और कमर बराबर पानी भरे धान के खेतों से होते हुए अगस्त के महीने में अपने घर पहुँचा था और 16 तारीख हमारे थाना धानापुर में झंडा फहराया गया था.’’29
दो
1943 में नामवर सिंह नौवीं कक्षा के छात्र थे. पाठ्यक्रम में प्रेमचन्द की कहानी ‘वज्रपात’ थी. स्कूल में उर्दू के अध्यापक अजहा अली फ़ारूकी विशेषतः नाटक के अध्यापक थे. साहित्यिक गतिविधियों में नामवर अधिक भाग लेते थे. स्कूल के वार्षिक दिवस के लिए ‘वज्रपात’ कहानी का नाट्य-रूपान्तर किया गया और अजहा इली फ़ारूकी ने नादिर शाह की भूमिका के लिए नामवर सिंह को कहा. ‘‘मुझे वह रोल दिया गया था तो मैंने उसे किया…. एक बार मैंने भी अभिनय किया और उसके बाद कान पकड़ ली.’’30 बचपन में उन्होंने भिखारी ठाकुर का ‘बिदेसिया’ नाटक देखा था, जिसमें भिखारी ठाकुर स्वयं स्त्री की भूमिका में थे. नामवर सिंह के चाचा बाबू चन्दन सिंह को ‘निकरूआ’ कहा जाता था. वे गाते थे और नेटुआ नाचता था. विद्यार्थी जीवन में नाच-गान देखने-सुनने की मनाही थी. बनारस में रामलीला देखी थी, 1950-51 में धर्मवीर भारती को ‘उसने कहा था’ के नाट्य-रूपान्तरण में लहना सिंह का रोल करते और विजयदेव नारायण साही को ‘वजीरा’ के रोल में देखा था. उन्होंने केवल एक बार मंच पर अभिनय किया.
काशी आने के बाद 1941 में ही ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ नामक संस्था के बारे में जाना और उससे जुड़े. काशी में ‘हंस’ के सम्पादक शिवदान सिंह चौहान थे. शमशेर और त्रिलोचन भी थे. ‘‘हमलोग स्कूल में पढ़ते हुए भी उस संस्था के सदस्य थे. उसमें जाते थे. बहुत दिनों तक सक्रिय रहे उसमें.’’31 प्रगतिशील लेखक संघ से उनका संबंध छात्र-जीवन से 1941 से ही बना रहा है. उन दिनों काशी में ठाकुर प्रसाद सिंह ने एक साहित्यिक संस्था का गठन किया था. ‘युवक साहित्यिक संघ’ उनके द्वारा स्थापित संस्था थी. बनारस से बाहर जब ठाकुर प्रसाद सिंह की नियुक्ति हुई उन्होंने इस संस्था को नामवर सिंह को संभालने को कहा. उस समय पार्टी की अन्दरूनी लड़ाइयों के कारण प्रगतिशील लेखक संघ अधिक सक्रिय नहीं था. नन्द दुलारे वाजपेयी भी सागर जा चुके थे. ‘‘तो त्रिलोचन जी और हम ‘युवक साहित्य संघ’ को प्र.ले.सं. के उद्देश्यों के अनुसार चलाने लगे. बाद में जब प्र.ले.सं. पुनर्जीवित हो गया तो हम पुनः उसे चलाने लगे. और फिर से काशी में प्र.ले.सं. की गोष्ठियां होने लगीं.’’32
हाई सकूल में वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े थे और बाद में बी.ए. के दौरान वे काशी को कुछ अन्य संस्थाओं से भी जुड़े. 1948 के लगभग आचार्य नरेन्द्र देव की प्रेरणा से एक साहित्यिक संगठन – ‘नव संस्कृति संघ’ बना. काशी विद्यापीठ से ‘जनवाणी’ पत्रिका निकलती थी. उसमें नामवर सिंह के कुछ निबन्ध प्रकाशित हुए थे. दिसम्बर 1949 की ‘जनवाणी’ में ‘संस्कृति का तात्पर्य’ और जनवरी 1950 को ‘जनवाणी’ में रामचन्द्र शुक्ल पर एक ‘सख्त लेख’ ‘हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल’ प्रकाशित हुआ था. उस समय प्रगतिशील लेखक संघ संकट-ग्रस्त था. नामवर सिंह ‘नव संस्कृति संघ’ के कुछ समय तक सचिव रहे. बाद में प्रगतिशील लेखक संघ जब सक्रिय हुआ, वे इसे छोड़कर उसमें आ गए.
नामवर सिंह ने स्वीकारा है कि उनके आलोचक बनने में प्रगतिशील लेखक संघ की बड़ी भूमिका है. सातवीं-आठवीं कक्षा में पढ़ते हुए ही वे इससे जुड़ चुके थे. ‘‘मैं यदि प्रगतिशील लेखक संघ के सम्पर्क में न आया होता तो आलोचक न होता…. सन् 1945 तक मैं केवल कविताएँ ही लिखता था. न आलोचना लिखी थी, न उसे लिखने की इच्छा थी…. तय कर लिया था कि आलोचना नहीं लिखूँगा. आलोचना बेकार का काम है. पढ़ने-वढ़ने के लिए ठीक है, लेकिन आलोचना लिखने की चीज है, यह मैं तब सोच भी नहीं सकता था. गोष्ठियों में लोग मुझसे कविता सुनाने के लिए ही कहते.’’33 प्रगतिशील लेखक संघ की गोष्ठियों से उन्होंने बहुत कुछ सीखा. स्वीकारा है कि इन गोष्ठियों ने उनका ‘रूपान्तरण’ किया. गोष्ठियों मो होने वाली बहसों, वहाँ पढ़ी गई रचनाओं पर होने वाली वैचारिक चर्चा का, पठित लेखों का उन पर प्रभाव पड़ा. दृष्टि बदल गयी. वे बाँस फाटक पर की मार्क्सवादी किताबों की दुकान के साथ ‘हंस’ पत्रिका के प्रभाव को भी स्वीकारते हैं. कविता के स्थान पर क्रमशः आलोचना-कर्म प्रमुख होता गया. कविता लिखने का क्रम 1951 तक जारी रहा. त्रिलोचन के माध्यम से गोष्ठियों में आना-जाना बढ़ा था. कभी-कभार नागरी प्रचारिणी सभा भी जाते थे.
मुक्तिबोध से उनकी पहली भेंट छात्रावस्था में ही, 1946 में काशी में हुई थी. ‘हंस’ के एक अंक में मुक्तिबोध की ‘बबूल’ कविता और नामवर सिंह की भी एक कविता एक साथ प्रकाशित हुई थी. हाई स्कूल में पढ़ते हुए ही वे कवि-सम्मेलनों में जाने लगे थे. उदय प्रताप कॉलेज में सब उन्हें ‘कवि जी’ कहते थे. हाई स्कूल में ‘चॉइस ऑफ प्रोफेशन’ पर उनसे एक लेख लिखवाया गया था. ‘‘मैंने लिखा था कि मैं टीचर बनूँगा. मेरे मन में बहुत बड़ा सपना था अध्यापक बनने का.’’34 कोर्स में लगी ‘गोल्डेन ट्रेजरी’ में से कीट्स (31.10.1795-23.2.1821) की एक कविता ‘ला बेल दाम सां मर्सी’ (जोसेफ एपलियार्ड द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक साहित्यिक पत्रिका ‘द इंडिकेटर’ के 10 मई 1820 के अंक में प्रकाशित एक गाथा गीत) का छन्दोबद्ध अनुवाद किया. उस समय नामवर सिंह ग्यारहवीं कक्षा के छात्र थे. आठवीं कक्षा में उन्होंने महादेवी का कविता-संग्रह ‘रश्मि’ पढ़ा था. छात्र-जीवन में उन्हें प्रसाद का ‘आँसू’ पूरा याद था. ‘‘महादेवी और प्रसाद तब मेरे प्रिय कवि थे. बाद में जब मैं बी.ए. में आया तब निराला की तरफ मेरा ध्यान आकृष्ट हुआ.’’35 छात्रावस्था में ही उन्होंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता ‘उर्वशी’ का अनुवाद त्रिलोचन जी के कहने पर किया. त्रिलोचन जी ने बंगला सीखने की सलाह दी थी. बंगला पुस्तक से ही अक्षर सीखना शुरू करने को कहा था. नामवर सिंह ने ‘उर्वशी’ के अपने अनुवाद को अच्छा नहीं माना है. उसे एक ‘प्रैक्टिस’ कहा है.
1945 में उन्होंने मैट्रिक और 1947 में आई.ए. की परीक्षा पास की. बी.ए. में बीएचयू के आर्ट्स कॉलेज में नाम लिखाया. इस समय तक वे कवि-रूप् में ख्यात हो चुके थे. गद्य-लेखन की शुरूआत कर दी थी. उदय प्रताप कॉलेज के कई शिक्षकों की उन्होंने मुक्त कंठ से प्रशंसा की है. वहाँ पंडित विजय शंकर मिश्र ने उन्हें इंटर में संस्कृत पढ़ाई थी. कोर्स में ‘कुमार सम्भव’ का पाँचवाँ सर्ग था, जिसे पढ़ने के बाद ‘सम्पूर्ण कालिदास को पढ़ने के लिए मन बेचैन हो उठा.’ पंडित विजय शंकर मिश्र ने उनमें संस्कृत-काव्य में रुचि पैदा की.
‘‘संस्कृत व्याकरण का भी सुदृढ़ आधार प्रदान किया. पाठ्यक्रम में निर्धारित पुस्तक तो आप्टे की ‘ए गाइड टू संस्कृत कम्पोजीशन’ थी, किन्तु पंडित जी ‘अष्टाध्यायी’ के मूल सूत्रों के द्वारा ही व्याकरण का मर्म समझाते थे. संस्कृत में जो थोड़ी-बहुत गति है, उसका सारा श्रेय उन्हीं पंडित जी को है.’’36
अपने अध्यापक मार्कण्डेय सिंह को अपने गद्यकार और आलोचक व्यक्तित्व के निर्माण का उन्होंने श्रेय दिया है.
‘‘कहते थे कि विशेषण अच्छे गद्य के दुश्मन हैं. विशेषणों से भाषा लद्धड़ बनती है. एक से अधिक विशेषण एक साथ कभी नहीं इस्तेमाल करना चाहिए. एक विशेषण भी बहुत आवश्यक होने पर ही इस्तेमाल करो. वे लम्बे वाक्यों के भी घोर शत्रु थे. कहते थे कि संशिलष्ट और संकर वाक्य नहीं लिखने चाहिए.’’37
नामवर सिंह ने मार्कण्डेय सिंह को ही अपने गद्य का ‘प्रथम प्रेरणा स्रोत’ मानते हुए यह कहा है कि उनके लिए ‘सरल शब्द ही भाषा के प्राण’ हैं. स्कूल के दिनों में कॉलेज मैगजीन के लिए कविताओं के अतिरिक्त गद्य में उन्होंने केवल दो चीजें लिखीं. कॉलेज के सबसे पुराने चपरासी जिन्हें सब ‘बचऊ’ कहते थे, पर एक रेखाचित्र और इंटर में पढ़ते समय गर्मी की छुट्टियों में पुरी जाने के बाद एक यात्रा-वृत्तान्त. उनके जीवन में न यादें थीं, न सुधियाँ और न प्रेम, इसलिए उन्होंने प्रकृति-परक कविताएँ अधिक लिखीं. कवि-गोष्ठियों और कवि-सम्मेलनों में वे मधुर ढंग से कविताएँ पढ़ते थे. जब वे एम.ए. प्रथम वर्ष के छात्र थे, लखनऊ विश्वविद्यलाय में अन्तर्विश्वविद्यालय कविता-प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए विश्वविद्यालय की ओर से उन्हें और रामदरश मिश्र को भेजा गया था.
छात्र-जीवन में नामवर सिंह ने केवल पढ़ाई की, जो बाद में भी अबाध गति से जारी रही. उस समय तक न पान खाने का शौक था, न सिनेमा देखने का. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में बी.ए. में दाखिला लेने के बाद वे संकटमोचन मन्दिर के पास के महेंद्रवी लॉज में रहते थे. ‘‘पचास-साठ लड़के उन दिनों उस लॉज में रहा करते थे. मैं रोज गंगा स्नान करता और उसके बाद संकटमोचन मंन्दिर जाता था. उन दिनों मेरा यह प्रतिदिन का रूटीन था.’’38
1946 में उन्होंने अज्ञेय को आमंत्रित कर भाषण कराया था. उस समय वे ग्यारहवीं कक्षा में थे और छात्र-संघ के साहित्य-सचिव भी थे.
1947 में नामवर सिंह उदय प्रताप कॉलेज में बारहवीं कक्षा के विद्यार्थी थे. निराला का पहला दर्शन उसी समय उन्होंने काशी में किया था. मैदागिन पर टाउन हॉल में निराला की स्वर्ण जयंती का मुख्य आयोजन हुआ था. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की ओर से भी निराला जी का अभिनन्दन हुआ था. उस समय विभाग में नन्द दुलारे वाजपेयी लेक्चरर थे और आचार्य केशव प्रसाद मिश्र विभागध्यक्ष थे. उस आयोजन में निराला के मुख से नामवर सिंह ने ‘राम की शक्ति-पूजा’ सुनी थी. ‘‘ ‘हर धनुभंग को उठा हस्त’ पढ़ते हुए निराला जी के दाहिने हाथ का ऊपर उठना और स्वरों का वह अनोखा आरोह-अवरोह मैं आज तक नहीं भूला हूँ.’’39
उस समय कविता पर पहला पुरस्कार उन्होंने निराला के हाथों प्राप्त किया था. वे वर्ष भर में प्रकाशित साहित्य का लेखा-जोखा भी ले रहे थे. ‘आज’ अखबार के दिसम्बर 1947 के अंक में उनका लेख वर्ष भर के प्रकाशित साहित्य का लेखा-जोखा लेते हुए छपा था. कई वर्षों तक प्रत्येक वर्ष के साहित्य पर वे लेख लिखते रहे. सातवीं-आठवीं कक्षा से बी.ए. तक उन्होंने जितनी कविताएँ लिखीं, उतने निबन्ध नहीं लिखे. उनकी कविताएँ ‘क्षत्रिय मित्र’, ‘हंस’, ‘समाज’, ‘पारिजात’ और ‘जनवाणी’ में प्रकाशित होती रही थी. ‘राजर्षि’ (क्षत्रिय मित्र; सितम्बर 1945), ‘विद्रोही जयप्रकाश’ (समाज, 6 फरवरी 1947) और आदित्य-पुरूष गाँधी (समाज, 13 मई 1948) उनके छात्र-जीवन की कविताएँ हैं. छात्रावस्था में अच्छी पुस्तकें पढ़ने की उनकी ललक में त्रिलोचन शास्त्री और उनके अध्यापकों की भी भूमिका रही है.
बी.ए.में जब उन्होंने दुबारा ‘तार सप्तक’ पढ़ा, तब उन्हें मुक्तिबोध अच्छे लगने लगे थे और कविताओं की भीतरी गूंज वे समझने लगे थे. साहित्य को आरंभ से ही उन्होंने गंभीरता से लिया. प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ने के कारण वे मार्क्सवादी हो चुके थे, पर कम्युनिस्ट पार्टी के नजदीक उन्हें रूस्तम सैटिन और पी सी जोशी लाए. ‘‘पी सी जोशी नेहरूवादी थे, इसलिए बाद में उनको हटा भी दिया गया. वी टी रणविवे एक्स्ट्रीम लेफ्ट लाइन के थे. मैं स्वभावतः पी सी जोशी और रूस्तम सैटिन वाली लाइन का था. मैं इसी लाइन को अंत तक मानता रहा हूँ. मैं एक्स्ट्रीम लेफ्ट का कभी नहीं रहा.’’40
नामवर जब बी. ए. के छात्र भी नहीं थे, त्रिलोचन ने ‘धरती’ (1946) की एक प्रति उन्हें भेंट की थी. इंटरमीडिएट करने के बाद पिता ने बी. ए. की पढ़ाई के लिए साफ शब्दों में पैसा न देने की बात कही. नामवर सिंह के शिक्षक मार्कण्डेय सिंह ने उन्हें पत्र लिखकर अपने पूर्व छात्र बनारस के एक्साइज कमिश्नर से मिलने का सुझाव दिया. उनका सुझाव था कि कॉलेज-स्कूल के संस्थापक उदय प्रताप सिंह देव की जीवनी लिखो क्योंकि उनकी जन्मशती आने वाली थी. नामवर जी को जीवनी लिखने का काम मिल गया, जिससे प्रत्येक महीने नियमित रूप से एक निश्चित रकम प्राप्त हो जाती थी. ‘‘बी.ए. की पढ़ाई के लिए एक तरह की छात्रवृत्ति का काम चल गया.’’41 बी. ए. में नामवर सिंह ने टॉप किया था, जिससे उन्हें ‘विश्वविद्यालय की स्कॉलरशिप मिल गई’ एक शुभ चिंतक के पत्र से मुख्यमंत्री के विशेष फंड से हर महीने पचास रुपये मिलने लगे थे. ‘‘कॉलेज से पचीस रुपये मिल जाते थे तो एम.ए. में देने के लिए धन्नाशाह हो गया. पचहत्तर रुपये बहुत होते थे.’’42
एम. ए. के आरंभिक वर्ष में लिखे गये उनके दो लेख – ‘संस्कृति का तात्पर्य’ (जनवाणी, दिसम्बर 1949) और 12 पृष्ठों का निबन्ध ‘हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल’ (जनवाणी, जनवरी 1950) महत्वपूर्ण लेख हैं. डॉ. राजबली पाण्डेय ने उन्हें बी. ए. में ‘कल्चर’ पढ़ाया था. इस निबन्ध में, इसकी भाषा में, जिसे हम ‘नामवरी भाषा’ कह सकते हैं, के कुछ लक्षण दिखाई देते हैं. ‘‘किसी से संस्कृति का अर्थ पूछने में भी असंस्कृत होने का भय है’, ‘सांस्कृतिक निर्माण के लिए जितनी सचेत प्रयत्न-बुद्धि-विलास होगा, उतना ही सांस्कृतिक ह्रास होगा.’ नामवर सिंह की संस्कृति दृष्टि अथवा संस्कृति-संबंधी चिन्तन पर यह लेख विस्तार से प्रकाश डालता है. इस निबन्ध में उन्होंने ‘विभाजित भारत में एक सांस्कृतिक फासिज्म’ के खड़े होने की बात कही है.
1949 में वे 23 वर्ष के थे और हाल में ही उन्होंने बी.ए. किया था. उनकी चिन्ता दूसरी थी. संस्कृति का ‘बौद्धिक विवेचन’ उनके लिए मानी नहीं रखता था. ‘‘जीवन से तो सिद्धांत निकलता है, फिर सिद्धांत से किया निकलेगा – अधिक से अधिक एक-दो और सिद्धांत.’’43 उनके लिए ‘संस्कृति क्या है’, का प्रश्न उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना महत्वपूर्ण ‘बाधक तत्वों को दूर करना है’. आज जो लोग ‘धर्म’ और ‘संस्कृति’ को एक कर विकृति उत्पन्न कर रहे हैं, उन्हें नामवर सिंह का यह निबन्ध अवश्य पढ़ना चाहिए. ‘‘आज ‘संस्कृति’ के साथ ‘धर्म’ को सम्बद्ध करना प्रतिक्रियावादी मनोवृत्ति और प्रवंचना है.’’44 इस लेख में उन्होंने संस्कृति और शिक्षा के संबंध पर भी विचार किया और वर्तमान शिक्षा को ‘भावयित्री प्रतिभा का विकास’ करने वाला माना, ‘कारयित्री प्रतिभा का नहीं’. संस्कृति के अनेक विशेषणों में से एक ‘जन’ का उल्लेख कर ‘जन संस्कृति’ की बात की और इसके प्रयोक्ताओं के बहुसंख्यक वर्ग की संस्कृति के तीन केन्द्र – व्यक्ति, समुदाय (वर्ग) और समाज माने. उन्होंने संस्कृति को ‘व्यक्ति की सामाजिक तथा समाज की वैयक्तिक अभिव्यक्ति’ माना, जिससे उनके गंभीर विचार और चिंतन का पता चलता है.
बी. ए. में पढ़ते हुए ही उनहोंने अंग्रेजी के निबंधकार चार्ल्स लैम्ब को पढ़ा था, जिन्हें ‘निबंधों का राजकुमार’ कहा जाता है. नामवर सिंह ने चार्ल्स लैम्ब के निबंधों में ‘गुलेरी जी के निबंध जैसा प्रसंग-गर्भत्व’ देखा था. उन्होंने आलोचनात्मक निबंधों के अतिरिक्त गैर आलोचनात्मक निबंध पढ़े भी और लिखे भी. मराठी निबंधकार नरहरि विष्णु गाडगिल का मराठी से हिन्दी में अनुवाद ‘हजार बरस पीछे’ और सियाराम शरण गुप्त का निबंध-संग्रह ‘कुछ’ पढ़ रखा था.
‘‘एक दिन मुझे ऐसा लगा कि यह गद्य की ऐसी विधा है, जिसमें हाथ आजमाया जा सकता है. यह भी सोचा कि निबंध-लेखन द्वारा अपनी भाषा कुछ सँवरेगी और ठीक से गद्य लिखना सीख सकूँगा. मैंने करीब इक्यावन निबंध लिखे. तय हुआ कि तीन अलग-अलग खंडों में पुस्तकाकार छपेंगे. पहला संकलन 1951 में ‘बक़लम खुद’ नाम से प्रकाशित हुआ.’’45
तीन
एम.ए. में नामवर सिंह ने 1950 में कुल 50 निबन्ध लिखे थे, जिनकी अपनी एक अलग सुगंध है. 17 निबन्धों का एक संग्रह 1951 में प्रकाशित हुआ. पहले नामवर सिंह का विचार हिन्दी में एम.ए. करने का नहीं था. उन्होंने प्राचीन भारतीय इतिहास में एम.ए. करना सोचा था, पर डॉ. अल्टेकर के जो बी.एच.यू. में प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रोफेसर और अध्यक्ष थे उनके पटना में के. पी. जायसवाल इंस्टीट्यूट के निदेशक होकर चले जाने के कारण नामवर सिंह ने अपना इरादा बदला और एम.ए. हिन्दी में दाखिला लिया. उस समय केशव प्रसाद मिश्र हिन्दी विभागाध्यक्ष थे. एम.ए. की पढ़ाई के समय ही नामवर सिंह ने आलोचनात्मक निबन्धों से भिन्न इक्यावन निबंध लिखे थे. ‘बकलम खुद’ शीर्षक त्रिलोचन का दिया हुआ है. इन निबंधों को लिखते समय वे चार्ल्स लैम्ब के निबंधों से प्रभावित थे, पर ये निबंध न तो लैम्ब से प्रभावित हैं, न हजारीप्रसाद द्विवेदी के ललित निबंधों से. निबंध का यह सर्वथा नूतन मार्ग है, जिसे ‘नामवर मार्ग’ भी कह सकते हैं. हिन्दी में ‘बकलम खुद’ के निबंध जैसे निबंध न पहले लिखे गये, न बाद में. नामवर सिंह को शेष निबंधों के प्रकाशन में कोई रूचि नहीं रही. इस पुस्तक का समर्पण’ और भूमिका भी लीक से हटकर है. पुस्तक के समर्पण का शीर्षक है ‘… के कर-कमलों में’, ‘सबसे पहले अपनी लोकप्रिय सरकार’, ‘इसके बाद समस्त देव-मंडल सहित ईश्वर को’, ‘फिर विद्यावारिधि, साहित्यानुरागी, प्रजा हितकारी, भोजावतार, सकल-गुण-विधान श्रीमान महाराजाधिराज श्री… को, ‘साथ-साथ धर्म रक्षक, कला मर्मज्ञ, कलि कुबेर प्रसिद्ध दानवीर सेठ श्री… को’, ‘अब पाठ्य-पुस्तकों के सदस्यों को; ‘अतिरिक्त सामान्य समीक्षकों को’ ‘और भी आदरणीय और प्रिय साहित्यकार मित्रों को, ‘पुनश्च-दीमकों और झींगुरों को, ‘अन्त में-कल्पना की उस लजीली लता को- जिसके सुरभि-तरंगित फूल मेरे प्राणों के स्वर बन गए ‘सबसे पहले नहीं नहीं’ अपने पूजनीय माता-पिता को नहीं’, ‘अन्त में- उस सहस्रमूर्ति, सहस्रपद, सहस्रसिर, सहस्त्र उरु, सहस्रबाहु परन्तु एक हृदय वाले जनता-जनार्दन को भी नहीं, कर ‘जनार्दन के लिए समर्पण’ को ‘स्वयं आत्म दान’ का.46
त्रिलोचन शास्त्री ने ‘पुस्तक-परिचय’ में इसे ‘निर्वैयक्तिक वैयक्तिकता द्वारा व्यक्ति-व्यंजक निबंधों की ओर मौलिक प्रयास’ और ‘संयत व्यंग्य का प्रतिमान’ कहा. इसमें ‘जनता की जय का उद्घोष संघर्ष की प्रेरणा’ और ‘अभियान की आकांक्षा’ देखी.47 इन निबंधों को पढ़कर यह सोचा भी नहीं जा सकता कि इसी निबंध-लेखक ने ‘हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल’ (जनवाणी, जनवरी 1950) निबंध भी लिखा होगा. ‘बकलम खुद’ के प्रकाशन के साथ जगदीश भारती के ‘साहित्य सहकार’ से नामवर जी का कविता-संग्रह ‘नीम के फूल’ भी प्रकाशित होने वाला था, जो नहीं हो सका. दोनों पुस्तकें एक साथ छपनी थीं.
नामवर सिंह का छात्र-जीवन एम.ए. करने के बाद उनके रिसर्च करने तक है क्योंकि ‘रिसर्चर’ या शोध-छात्र भी छात्र ही होता है. 1951 में एम.ए. में नामवर सिंह ने प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त किया था. बी.ए. करने के पहले ही 1948 में उनके पुत्र विजय प्रकाश सिंह का जन्म हुआ था. 1953 में बी.एच.यू. के हिन्दी विभाग में उनकी अस्थायी नियुक्ति हुई थी. ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’ पर हजारीप्रसाद द्विवेदी के निर्देशन में उन्होंने पी-एच.डी. की.
‘‘फरवरी 1956 के अंतिम सप्ताह की एक शाम टहलते हुए पण्डित जी ने कुछ खिन्न स्वर में कहा कि ‘तुम्हारे साथ के सभी छात्र अपनी ‘थीसिस’ जमा करने जा रहे हैं. उस स्वर का अर्थ स्पष्ट था. किन्तु समय कहाँ था? उन्होंने हिम्मत बँधाने के लिए कहा – ‘सारा काम कर ही रखा है. लिखने के लिए तुम्हारे पास एक महीने का समय बहुत है. परीक्षित ने तो सात दिन में ही स्वर्ग जीत लिया था.’ उसके बाद न रात रात रही, न दिन दिन. जाने कहाँ की ताकत आ गई? 31 मार्च 1956 को मैंने छपी-छपाई ‘थीसिस’ गुरूदेव के चरणों में हस्ताक्षर के लिए रख दी. छपी-छपाई इसलिए कि टंकण में बहुत-झमेले थे. ऐसा श्रम जीवन में किसी पुस्तक पर नहीं किया. कभी नहीं. लेकिन यही वह पुस्तक है, जिसे पूरी करने के बाद दुबारा पलटकर कभी देखा भी नहीं.’’48
1956 में नामवर सिंह डॉक्टर बने. ‘पृथ्वीराज रासो की भाषा’ का प्रकाशन-वर्ष 1956 है. वे 1953 से अध्यापक थे इसलिए इस निबंध में उनके छात्र-जीवन को 1953 की नियुक्ति के पहले के समय तक देखा गया है. नामवर जी ने अपने छात्र-जीवन में दो संस्कार (‘दोहरे संस्कार’) पाने की बात कही है. विद्यार्थी जी से प्राप्त राजनीतिक चेतना, जिसने उनके ‘सामाजिक सरोकारों को बनाए रखा’ और दूसरे
“क्षत्रिय स्कूल से चल कर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय तक साहित्य के अध्ययन से भाषा और काव्य के बारे में गुरुजनों से जो दृष्टि मिली, ये दोनों चीजें कहीं-न-कहीं परस्पर पूरक रूप में आधार का काम करती रही. इन्होंने दोनों तथ्यों को साथ लेकर चलने की प्रवृत्ति पैदा की.’’49
जुलाई 1953 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में नियुक्त होने के पहले नामवर सिंह रिसर्च स्कॉलर के रूप में छात्र ही थे. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने राजपूतों के गोरखपुर के कॉलेज महाराणा प्रताप कॉलेज में हिन्दी के अध्यक्ष पद पर जाने का एक प्रस्ताव दिया, जिसे नामवर सिंह ने नहीं स्वीकारा.
‘‘मैंने कहा कि पंडित जी मैं तो आपके चरणों में रह कर कुछ सीखना चाहता हूँ…. मैं अभी अध्यापक होने की बजाय रिसर्च करना चाहता हूँ और अध्यापक मैं किसी कॉलेज में नहीं होना चाहता, मै तो किसी विश्वविद्यालय में होना चाहता हूं.’’50
पण्डित केशव प्रसाद मिश्र 1941 से 1950 तक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे थे. एम.ए. प्रथम वर्ष में 1950 में उन्होंने नामवर सिंह को पढ़ाया था. उनकी सेवा-निवृत्ति के पश्चात शान्ति निकेतन से हजारीप्रसाद द्विवेदी विभागाध्यक्ष के रूप में आए. एम.ए. अंतिम वर्ष में उन्होंने नामवर सिंह को पढ़ाया. 1950 में नामवर सिंह ने रामचन्द्र शुक्ल पर जो निबंध लिखा था उसे पढ़ कर यह विश्वास नहीं होता कि यह एम.ए. में पढ़ने वाले किसी छात्र का लिखा हुआ है. ‘हिन्दी समीक्षा और आचार्य शुक्ल’ निबंध में उन्होंने शुक्ल जी को ‘पुनरुत्थान युग की परिस्थितियों की उपज’ माना और यह लिखा कि इन परिस्थितियों ने ही ‘‘राजनीति में महात्मा गाँधी, कविता में रवीन्द्र नाथ ठाकुर, जयशंकर प्रसाद, आदि को उत्पन्न किया.’’51
यह एक युग-सापेक्ष और समय-सापेक्ष दृष्टि थी. इस निबंध में नामवर सिंह ने ‘समीक्षा’ को ‘स्तुति’ और ‘निन्दा’ से परे माना है. मार्क्सवादी समीक्षा को ‘वर्तमान युग की पूर्ण समीक्षा-पद्धति’ न मान कर ‘एक दृष्टिकोण मात्र’ माना. शुक्ल जी के प्रति श्रद्धा-भाव और उपेक्षा-भाव को ‘एकांगी’ कहा. वैज्ञानिक दृष्टि की बात की और शुक्ल जी का ‘सभ्य विश्लेषण’ आवश्यक माना. इस निबंध में वे ‘सम्पूर्ण और सकल समीक्षा पद्धति’ की आवश्यकता बताते हैं. समीक्षा के संबंध में यहाँ नामवर सिंह की अपनी एक सुस्पष्ट दृष्टि है. पाँच वर्ष पहले तुलसी पर लिखते हुए नामवर सिंह ने ‘युग के समाज और साहित्य के द्वन्द्व’ की बात कही थी, जो इस निबंध में भी कही गयी है. शुक्ल जी को उन्होंने पहले ‘सहृदय’ माना, ‘पीछे समीक्षक’. कवि होने के कारण उनकी काव्य-मर्मज्ञता का उल्लेख किया. इस निबंध में नामवर सिंह समीक्षा के अर्थ-धर्म-कर्म पर भी प्रकाश डालते हैं. शुक्ल जी की समीक्षा-पद्धति उनके अनुसार ‘‘एक सैद्धान्तिक भित्ति पर स्थित है और यह भित्ति है उनका अभिव्यक्तिवादी जीवन-दर्शन.’’52
इस निबंध पर विस्तार से विचार करने का इस लेख में कोई औचित्य नहीं है. यहाँ सिर्फ यह बताना जरूरी है कि कितने अधिक बौद्धिक श्रम से चिंतन-विचार-युक्त यह निबंध उन्होंने लिखा था. बाद में उन्होंने स्वीकारा है कि यह निबंध कठोर है.शुक्ल जी की ‘समीक्षा-पद्धति के कुछ सुसम्बद्ध सूत्र’ उन्होंने बताये. उनके ‘जीवन-दर्शन तथा समीक्षा-सिद्धान्त के उपादान कारणों का विश्लेषण’ किया. शुक्ल जी पर लिखते हुए नामवर जी उस समय की समानान्तर दो विरोधी विचारधाराओं – ‘स्थूल नैतिकतावादी’ और ‘औपनिषदिक वेदान्ती’ का उल्लेख कर पहली धारा में शुक्ल जी का निर्माण और दूसरी धारा में उनके काम करने को देखते हैं. उनके अनुसार ‘नए युग के बीच आचार्य कुछ उलंग दिखाई पड़े.’’53 युग के अनुकूल शुक्लजी की सीमाओं को समझते हुए भी नामवर जी की शिकायत यह रही कि ‘‘उन्होंने गतिशील और द्वन्द्वात्मक सामाजिक पीठिका का ध्यान नहीं रखा.’’54
नामवर सिंह ने वर्षों बाद चिन्तामणि भाग 3 और रामचन्द्र शुक्ल रचनावली का आठ खण्डों में सम्पादन भी किया. शुक्ल जी पर यह गंभीर लेख उन्होंने बी.ए. में पढ़ते हुए लिखा था. ‘जनवाणी में प्रकाशित होने के पहले यह निबंध उन्होंने 1949 में शुक्ल-जयंती के अवसर पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की हिन्दी समिति में पढ़ा था. उस समय वे बी.ए. के ही छात्र थे और उनकी उम्र मात्र बाईस वर्ष थी. छात्र-जीवन में ही उन्होंने ‘1950 की हिन्दी कविता’ (समाज, मई 1950), ‘हिन्दी कविता के पिछले दस वर्ष’ (आलोचना 4, जुलाई 1952), निबंध लिखे. परशुराम चतुर्वेदी की पुस्तक ‘उत्तरी भारत की संत’परम्परा’ (‘आलोचना’ का प्रवेशांक, अक्टूबर 1951) और ‘दूसरा सप्तक’ की समीक्षा (‘हंस’, जनवरी 1952) के साथ शचीरानी गुर्टू की पुस्तक ‘महादेवी वर्मा: काव्य कला और जीवन-दर्शन’ की समीक्षा (आलोचना 2, जनवरी 1952) की. ‘आलोचना’ के ‘इतिहास अंक’ (1952) में ‘इतिहास के प्रती नया दृष्टिकोण’ लिखा. इनमें से कुछ निबंध एम. ए. करने के बाद के हैं.
जुलाई 1950 में हजारीप्रसाद द्विवेदी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय आए. पाँच वर्ष पहले 1945 में नामवर सिंह द्विवेदी जी का ‘सहज भाषा’ पर भाषण नागरी प्रचारिणी सभा में सुन चुके थे वे उनके निबंधों से सुपरिचित थे. द्विवेदी जी के पहले गुरु के रूप में उन्होंने पण्डित केशव प्रसाद मिश्र का बार-बार स्मरण किया है.
‘‘सन् 1949 से 50 तक उनके चरणों में बैठने का अवसर मुझे मिला था…. एम.ए. में वह ‘कामायनी’ पढ़ाते थे, भाषा-विज्ञान और अपभ्रंश भी…. मूलतः संस्कृत के पण्डित थे…. उनकी विधिवत् पढ़ाई हाई स्कूल तक ही हुई थी, लेकिन उनकी स्वाध्याय से अर्जित ज्ञान-सम्पदा आश्चर्य जनक थी. उनकी ही मिली प्रेरणा से मैंने ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योगदान’ नाम से एम.ए. के लिए लघु शोध-प्रबन्ध तैयार किया.’’55
केश्वर प्रसाद मिश्र ‘‘एक साथ संस्कृत के पण्डित, भाषा विज्ञान के विद्वान और अपभ्रंश के गहन अध्येता थे. हिन्दी में भक्ति काल, रीतिकाल और छायावाद के मर्मज्ञ थे.’’56
इनसे नामवर सिंह ने अपभ्रंश पढ़ा था. नामवर सिंह ने उनके कहने पर ही लघु शोध प्रबंध में अपभ्रंश लिया था. केशव प्रसाद मिश्र ने कहा था – ‘‘देखो, अब अपभ्रंश पढ़ाने वाला कोई नहीं मिलेगा. इसलिए तुम ‘स्पेशलाइज कोर्स’ में अपभ्रंश लो.”57
नामवर सिंह ने इनसे ही शब्द-विवेक पाया. उनके मुख से ही पहली बार पतंजलि का यह कथन सुना – ‘‘एकः शब्दः सम्यक् ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्ग लोके च कामधुक् भवति’. शब्द के प्रति नामवर जी में जो एक श्रद्धा-भाव है, उसका श्रेय उन्होंने पणिद्र केशव प्रसाद मिश्र को दिया है. उनकी सेवा-निवृत्ति के पश्चात् उन्होंने उन पर एक व्यक्ति-चित्र ‘आचार्य केशव प्रसाद मिश्र’ शीर्षक से लिखा. (‘आज’, 7 दिसम्बर 1950) एम.ए. में अपने दूसरे अध्यापक के रूप में उन्होंने रीतिकाव्य के प्रमुख विद्वान पण्डित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र को याद किया है.
‘‘यदि गुरु के रूप में पंडित विश्वनाथ जी न मिले होते तो रीति काव्य-परम्परा की अनेक भाषिक रूढ़ियों की जानकारी से वंचित ही रह जाता. किशोरावस्था के ब्रजभाषा काव्य के अकाल परिचय को उन्होंने प्रत्यभिज्ञान में परिणत कर दिया, जो ओ चलकर बहुत काम आया.’’58
नामवर सिंह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हजारीप्रसाद द्विवेदी के ‘पहला अग्रश्रवा’ थे. वे केशव प्रसाद मिश्र के अंतिम और हजारी प्रसाद द्विवेदी के पहले शिष्य थे. केशव प्रसाद मिश्र ने कहा था – ‘‘तुम्हारे बाद मैं शिष्य नहीं बनाऊँगा.’’ उनके कारण ही नामवर सिंह ने अपभ्रंश पढ़ा, पहला लघु शोध-निबंध लिखा और भाषा-विज्ञान की ओर प्रवृत्त भी हुए. ‘‘द्विवेदी जी के सम्पर्क में आने से पहले ही आचार्य केशव प्रसाद मिश्र के चरणों में बैठ कर मैंने जाना कि साहित्य की एक मात्र परम्परा रामचन्द्र शुक्ल वाली ही नहीं है, तुलसी को देखने की और भी दृष्टि हो सकती है.’’59 केशव प्रसाद मिश्र ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में मनाई गई निराला की स्वर्णजयंती के अवसर पर निराला को ‘आधुनिक कविता का भवभूति’ कहा था, ‘राम की शक्ति पूजा’ की भाषा को भवभूति की भाषा की तरह बताया था, कालिदास को व्यंजना और निराला को ‘अभिधा’ का कवि’ कहा था. कालिदास की परम्परा में पंत-प्रसाद को और भवभूति की परम्परा में निराला को रखा था. यह सब सुनकर नामवर जी के ‘‘मन में यह संस्कार बना कि दूसरी परम्परा भी है…. केशव जी… दोनों परम्पराओं को समान आदर देते थे. दोनों के अंतर को समझना है, दोनों को अलग करना है, अलग करते हुए दोनों को सम्मान देना मैंने केशव जी से सीखा.’’60 क्या ‘दूसरी परम्परा की खोज’ पुस्तक पर विचार के क्रम में या दूसरी परम्परा के संबंध में नामवर जी की दृष्टि को किसी ने उनके इस कथन से जोड़कर देखने की कोशिश की है?
अपभ्रंश-संबंधी नामवर जी का जितना काम है, उतना किसी अन्य आलोचक का नहीं. ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग’ पुस्तक 1952 में प्रकाशित हुई. यह पुस्तक नामवर सिंह ने ‘गुरुवर आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को समर्पित’ की. संस्कृत, पाली, प्राकृत के विद्वान पी. एल. वैद्य (परशुराम लक्ष्मण वैद्य) ने पुस्तक की भूमिका में इसे ‘उत्तम कृति’ मान कर ‘भाषा शास्त्रियों, विशेषतः स्वतंत्र भारत की राष्ट्रभाषा हिन्दी के विद्वानों को इसे पढ़ने के लिए आह्वान’ किया. ‘‘इस पुस्तक का बीजारोपण मई 1951 ई. में काशी विश्वविद्यालय की एम.ए. परीक्षा के लिए प्रस्तुत निबंध के रूपमें हुआ था. पीछे वह निबंध भाषा और साहित्य-संबंधी कुछ परिशिष्टों के साथ मार्च 1952 ई. में प्रकाशित हुआ.’’ (द्वितीय संस्करण की भूमिका)
बिहार राष्ट्र भाषा परिषद्, पटना के संस्थापक-निदेशक आचार्य शिवपूजन सहाय ने परिषद् के प्रथम व्याख्यान के लिए हजारीप्रसाद द्विवेदी को आमंत्रित किया था. इस व्याख्यान माला के लिए द्विवेदी जी ने ‘हिन्दी साहित्य का आदिकाल’ विषय का चयन किया, जिसके केन्द्र में चन्द वरदायी की कृति ‘पृथ्वीराज रासो’ थी. नामवर सिंह एम.ए. कर चुके थे. केशव प्रसाद मिश्र के बाद हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रोत्साहन से नामवर जी ने अपभ्रंश पर कार्य किया. द्विवेदी जी ने नामवर सिंह को पी-एच.डी. का विषय दिया – ‘पृथ्वी राज रासो की भाषा’. वे चाहते थे कि नामवर अपभ्रंश पर काम करें. ‘‘पंडित जी ने कहा कि भाषा विज्ञान पढ़ाने वाला केशव जी के बाद अब कोई है ही नहीं. वे रिटायर भी हो गए, दिवंगत भी हो गए. भाषा विज्ञान पर काम करोगे तो इस नाते विश्वविद्यालय में तुमको मैं तुरन्त अध्यापक नियुक्त कर सकता हूँ क्योंकि भाषा-विज्ञान पढ़ाने वाला कोई आदमी नहीं है.”61 न हजारी प्रसाद द्विवेदी के बिहार राष्ट्र भाषा परिषद्, पटना में दिये गये व्याख्यान के कारण ‘पृथ्वी राज रासो’ का एक प्रकार से ‘भाग्योदय’ हुआ. द्विवेदी जी नामवर सिंह को पीएच.डी. का विषय ‘पृथ्वी राज रासो की भाषा’ दे चुके थे, पर इस कृति का वैज्ञानिक विधि से सम्पादित कोई संस्करण नहीं था. इसके अभाव में भाषा-विचार को लेकर ‘दबी जबान’ से नामवर जी ने अपने गुरु के सामने शंका प्रकट की, तो उन्होंने सुनीति कुमार चाटुर्ज्या से परामर्श करने को कहा. रिसर्च स्कॉलर के रूप में उन्हें छात्रावास मिल चुका था. 7 अगस्त 1951 की डयरी में नामवर सिंह ने लिखा कि यह उनके ‘छात्रावास-जीवन का आरंभ है.’ वे डे-छात्रावास के कमरा नं.72 में आये थे.
‘‘बी.ए. और एम.ए. विश्वविद्यालय के ‘घेरे से बाहर’ रह कर किए. अब रिसर्च-स्कॉलर के रूप में ‘घेरे के भीतर रहना पड़ा.’’62 लगभग एक वर्ष के बाद उन्होंने 7 जुलाई 1952 को डे-छात्रावास छोड़कर प्रो वाइस चांसलर के पास न्यू होस्टल नं.3 के बड़े कमरों के लिए अर्जी दी. एम.ए. करने के कुछ महीने बाद दिसम्बर 1951 में आचार्य पद्म नारायण ने नागरी प्रचारिणी सभा में ‘पृथ्वी राज रासो’ पर बोलने को आमंत्रित किया. उन्हें रिसर्च फेलोशिप मिली थी. उन दिनों भी कार्यालय में कागज अटका रहता था. 17 जनवरी 1952 की डायरी में नामवर लिखते हैं –
‘‘आज भी दोनों वक्त फाका. मेस बंद है. खाने को पैसे नहीं. भीख माँगने का साहस नहीं. निराश होकर सेंट्रल ऑफिस ‘फेलोशिप’ वाले कागज का पता लगाने गया. देखा, वैसे ही लटक रहा है. जी हुआ – ऑफिस में दियासलाई लगा दूँ. सात महीने से कागज झूल रहा है. यह है लाल फीते की करामात. वाह रे पूंजीवादी व्यवस्था का ढाँचा! कोई भूखों मरे और कोई ऑफिस में फाइलों को खिसकाते हुए जिन्दगी काटे.’’63
1951 के एम.ए. के फर्स्ट क्लास फर्स्ट का यह हाल था उन दिनों. बी.एच.यू. में अध्यापक की विधिवत् नियुक्ति के पहले वे छात्रों को पढ़ा भी रहे थे. 31 जुलाई 1952 से उन्होंने एम.ए. में अपभ्रंश का अध्यापन भी आरंभ किया.
चार
एम.ए. के लघु शोध-प्रबंध ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग’ पर जब नामवर सिंह कार्य कर रहे थे, उनका ध्यान इटली के प्रसिद्ध भारतविद्, भाषा शास्त्री एल.पी. (लुइगी पिओ) तेस्सितोरी (13.12.1887-13.11.1919) के कार्यों पर गया था. तेस्सितोरी ने ‘इंडियन एंटिक्वेरी’ में धारावाहिक रूप से 1914 के अप्रैल, मई, सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर, 1915 के जनवरी से जुलाई तक के सात अंकों और 1916 के जनवरी तथा जून के अंकों (कुल 16 अंकों) में पश्चिमी राजस्थानी के व्याकरण पर विचार किया था. उनकी पुस्तक है ‘नोट्स ऑन द ग्रामर ऑफ द ओल्ड वेस्टर्न राजस्थानी विद स्पेशल रेफरेंस ट्रू अपभ्रंश एण्ड ट्रू गुजराती एण्ड मारवाड़ी’. तेस्सितोरी ने राजस्थानी चारण साहित्य का ऐतिहासिक सर्वे भी किया था. तेस्सितोरी के पुरानी राजस्थानी से जुड़े निबंधों की ओर नामवर सिंह का ध्यान आरंभ में ही हो गया था, लघु शोध-प्रबंध ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग’ पर काम करते हुए, उसी समय इसके अनुवाद की आवश्यकता उन्हें महसूस हुई. ‘पुरानी राजस्थानी’ (1955) तेस्सितोरी के राजस्थानी भाषा और साहित्य पर किये गये शोध-कार्य का अनुवाद है. इसके पहले किसी भी भारतीय भाषा का ऐतिहासिक व्याकरण नहीं लिखा गया था. नामवर सिंह ने इसे ‘‘राजस्थानी का ही नहीं, बल्कि भारतीय आर्य भाषा के ऐतिहासिक व्याकरण की बुनियाद’ कहा है. अनुवाद करने का विचार छात्र-जीवन में आया था, पर पुस्तक प्रकाशित हुई उनके अध्यापक होने के बाद. एम.ए. का लघु शोध-प्रबंध, तेस्सितोरी की पुस्तक का अनुवाद और पृथ्वी राज रासो की भाषा को पढ़ने से ही नामवर सिंह के श्रम, अध्यवसाय, कार्य के प्रति गंभीरता का पता लगेगा. अप्रैल 1952 में वे द्विवेदी जी का परिचय-पत्र लेकर कलकत्ता में सुनीति बाबू से मिले थे. सुनीति बाबू द्विवेदी जी के इस मत से सहमत थे कि ‘पृथ्वी राज रासो’ में ‘संयोगिता – पृथ्वीराज-प्रसंग’ प्रमुख है. इसलिए इसी ‘समय’ के आधार पर ग्रंथ की भाषा का विश्लेषण करने में कोई अनौचित्य नहीं है.‘‘64
‘पृथ्वी राज रासो’ ढाई हजार पृष्ठों का महाकाव्य है, जिसमें कुल 69 ‘समय’ (सर्ग या अध्याय) है. ‘पृथ्वी राज रासो’ के ऐतिहासिक पक्ष पर कर्नल टाड, डॉ. बूलर, डॉ. मारिसन, पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा, मुंशी देवी प्रसाद, डॉ. दशरथ शर्मा आदि, साहित्यिक पक्ष पर श्याम सुन्दर दास, हजारी प्रसाद द्विवेदी, मोतीलाल मेनारिया, उदय नारायण तिवारी, डॉ. बिपिन बिहारी त्रिवेदी और भाषिक विश्लेषण पर ‘बीम्स, होर्नले, श्यामसुन्दर दास, मोहन लाल विष्णुलाल पांड्या, मथुरा प्रसाद दीक्षित, मुनि जिन विजय, अगरचन्द नाहटा, कविराज मोहन सिंह के कार्यों का नामवर सिंह ने ‘पृथ्वी राज रासो : भाषा और साहित्य’ की ‘प्रस्तावना’ के आरंभ में ससम्मान उल्लेख किया है और यह माना है कि ‘‘इतने दीर्घ तथा व्यापक प्रयत्न के बावजूद बहुत-सी समस्याएँ अभी सुलझाने को शेष रह गई है.’’65
भाषा-संबंधी समस्या को नामवर सिंह ने ‘एक तरह से पहली और आधारभूत समस्या’ कहा है क्योंकि ‘‘भाषा ही वह पहली दीवार है, जिसे पार करके पृथ्वी राज रासो तक पहुँचा जा सकता है.’’66 पृथ्वीराज रासो की भाषा पर जॉन विलियम बीम्स (21.6.1837‘24.5.1902) और होर्नले (14.11.1841-12.11.1918) का काम महत्वपूर्ण है. नामवर सिंह ने बीम्स की ‘स्टडीज इन द ग्रामर ऑफ चंद वरदायी’ और होर्नले के ‘जोड़ियन ग्रामर’ का गंभीर अध्ययन किया था. बीम्स ने ‘रासो’ की भाषा को पुरानी पश्चिमी हिन्दी या पुरानी राजस्थानी का मिश्रण मान कर उसे ‘पिंगल’ भाषा कहा है और होर्नले ने चंद की भाषा के लिए ‘पुरानी पश्चिमी हिन्दी’ का प्रयोग किया है. 19वीं शताब्दी में रासो की भाषा पर कार्य करने वाले ये दो प्रमुख विदेशी भाषा वैज्ञनिक थे. हिन्दी में डॉ. बिपिन बिहारी त्रिवेदी ने ‘चंदवरदायी और उनका काव्य’ (1952) के पाँचवें अध्याय में पृथ्वीराज रासो की भाषा का ‘ऐसा ही विस्तृत विवरण’ किया था, जो हिन्दी में किया गया पहला कार्य था.
‘‘हिन्दी में इतने विस्तार से रासो की भाषा का विवेचन अभी तक नहीं किया था…. डॉ. त्रिवेदी के भाषा-संबंधी कार्य की विशेषता यह है कि उन्होंने रासो में प्राप्त फ़ारसी और अरबी के शब्दों की लम्बी सूची दी है. यह शब्द-सूची अकारादि क्रम से नहीं दी गई है और न उन शब्दों का पूरा संदर्भ ही दिया गया है.’’67
भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से डॉ. त्रिवेदी का कार्य ‘बीम्स के कार्य को आगे बढ़ाने की ओर से उदासीन’ है. नामवर सिंह के पहले रासो का भाषा-संबंधी अध्ययन ‘पृथ्वी राज रासो की एक ही परम्परा की प्रतियों पर आधारित’ था, जिसे सामान्यतः ‘बृहत् रूपान्तर’ कहा जाता है. नामवर सिंह ने ‘पृथ्वी राज रासो’ की चार परम्पराएँ निश्चित कर, इन सभी परम्पराओं की प्राप्त प्रतियों का उल्लेख किया – बृहत रूपान्तर की लगभग 33, मध्यम की 11, लघु की 5 और लघुतम की 2. उदयपुर के महाराजा अमर सिंह द्वितीय (सं. 1755-67 वि.) के राज्यकाल में तैयार की गई हस्तलिखित प्रति (उदयपुर प्रति) को ‘आधार मान कर विभिन्न परम्पराओं अथवा रूपान्तरों की तुलनात्मक तालिका’ प्रस्तुत की.
अक्टूबर 1952 में नामवर सिंह पृथ्वी राज रासो की पांडुलिपियों की तलाश में बीकानेर की यात्रा पर निकल पड़े थे. “जगह अपरिचित, रास्ता अनजाना, रहने के लिए ठौर-न-ठिकाना. उन दिनों शोध-यात्राओं के लिए आजकल की तरह किसी छात्रवृत्ति की भी व्यवस्था न थी. फिर भी संयोग से सारी समस्याएँ सुलझ गईं. बीकानेर अनायास ही बनारस जैसा हो गया.’’68 वहाँ उस समय शोधार्थी नामवर सिंह के तीन हफ्ते बीते. भाषा वैज्ञानिक अध्ययन के लिए रासो की प्राचीनतम पाण्डुलिपियों में से ‘धारणोज की लघूतम रूपान्तर वाली प्रति’ को आधार माना गया है, जिसका प्रतिलिपि काल सं.1660 वि. (1610 ईस्वी) है. यह अब तक की प्राप्त प्रतियों में प्राचीनतम मानी गयी है. नामवर जी ने इसके अतिरिक्त ‘नागरी प्रचारिणी सभा में सुरक्षित बृहत् रूपान्तर’ की उस प्रति से भी सहायता ली, जिसका ‘प्रतिलिपि-काल सम्पादकों के अनुसार सं. 1640 या 42 है.’ इन दोनों पाण्डुलिपियों के आधार पर अध्ययन के लिए रासो के मुख्य तथा केन्द्रीय भाग ‘कनवज्ज समय’ का पाठ तैयार किया गया है.’’69 बृहत् ‘कनवज्ज समय’ में कुल 2553 छंद है. और लघुतम की छन्द-संख्या 346 है. लघुतम के ‘कनवज्ज समय’ में 30 गद्य-वार्ताएँ भी हैं.
‘‘बृहत् में वार्ताओं के लिए कहीं-कहीं ‘वचनिका’ शब्द का भी प्रयोग किया गया है, किन्तु लघुतम में सर्वत्र ‘वार्ता’ शब्द ही व्यवहृत है.70
‘कनवज्ज समय’ पृथ्वीराज रासो का 61वाँ समय हैं, जिसे ‘प्रधान केन्द्रीय समय’ माना जाता है. धीरेन्द्र वर्मा ने इसे ‘रासो का प्रधान केन्द्रीय समय’ कहा है. नामवर सिंह ‘रासो’ में इस ‘समय’ का वही स्थान मानते हैं, जो तुलसी के ‘रामचरित मानस’ में ‘अयोध्याकाण्ड’ का है. ‘कनवज्ज समय’ के लघुतम रूपान्तर (346 छंद) के पाठ को आधार बनाकर उन्होंने पृथ्वीराज रासो की भाषा का अध्ययन किया है. ध्वनि-विचार, रूप-विचार, वाक्य-विन्यास और शब्द-समूह की दृष्टि से किया गया यह अध्ययन आज भी रासो की भाषा को समझने के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. नामवर सिंह में भाषा की परख-शक्ति आरंभ से थी. रासो के किसी छंद में व्यंजन द्वित्व को देखकर उसकी भाषा को ‘डिंगल’ कहने वालों पर उनकी टिप्पणी है – ‘‘ये भाषा शास्त्री केवल शब्द को भाषा समझते हैं.’’71
नामवर सिंह की जन्मशती के अवसर पर हिन्दी के शोधार्थी और उनके शोध-निदेशक ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग’ और ‘पृथ्वी राज रासो की भाषा’ को, जो अब ‘पृथ्वी राज रासो : भाषा और साहित्य’ शीर्षक से प्रकाशित है, एक बार देखने-समझने और पढ़ने का कष्ट करें, 1936-37 से 1952-53 तक के उनके छात्र-जीवन को देख-समझ कर कुछ प्रेरणा ग्रहण करें, जिससे हिन्दी का अकादमिक जगत थोड़ा ठीक हो सके.
संदर्भ
- प्रारम्भिक रचनाएँ, सम्पादक भारत यायावर, 2013, पृष्ठ 69
- जीवन क्या जिया, सम्पादक आशीष त्रिपाठी, 2021, पृष्ठ 21
- जीअनपुर के नामवर जी, सुरेश शर्मा, नामवर के विमर्श; सुधीश पचौरी, 1995, पृष्ठ 26
- वही, पुष्ठ 26
- वही
- जीवन क्या जिया, पृष्ठ 29
- जीअनपुर के नामवर जी, वही, पृष्ठ 27
- वही
- जीवन क्या जिया, वही, पृष्ठ 84
- वही, पृष्ठ 85
- आमने सामने, 2019, पुष्ठ 197
- जीवन क्या जिया, वही, पृष्ठ 30-31
- वही, पृष्ठ 31
- बात बात में बात, 2006, पृष्ठ 92
- वही, पृष्ठ 27
- वही, पृष्ठ 28
- वही, पृष्ठ 95-96
- वही, पृष्ठ 96
- वही
- वही, पृष्ठ 97
- प्रारम्भिक रचनाएँ, पृष्ठ 69
- वही, पृष्ठ 71
- आमने सामने, पृष्ठ 198
- जीवन क्या जिया, पृष्ठ 260
- आमने सामने, पृष्ठ 201
- वही
- नामवर की महत्ता; बहुवचन 50 (जुलाई-सितम्बर 2016) पृष्ठ 331
- बात बात में बात, पृष्ठ 99
- वही, पृष्ठ 101
- जीवन क्या जिया, पृष्ठ 180
- वही, पृष्ठ 157
- वही, पृष्ठ 153
- वही, पृष्ठ 155
- बात बात में बात, पृष्ठ 104
- जीवन क्या जिया, पृष्ठ 89-90
- वही, पृष्ठ 92-93
- वही, पृष्ठ 93
- आमने सामने, पृष्ठ 184-85
- वही, पृष्ठ 163
- वही, पृष्ठ 190
- बात बात में बात, पृष्ठ 93
- वही
- प्रारम्भिक रचनाएँ, पृष्ठ 75
- वही, पृष्ठ 77
- जीवन क्या जिया, पृष्ठ 94
- प्रारम्भिक रचनाएँ, पृष्ठ 165-70
- वही, पृष्ठ 6 पर उद्धृत
- पृथ्वी राज रासो: भाषा और साहित्य, 1997, पृष्ठ xi
- बात बात में बात, पृष्ठ 31
- वही, पृष्ठ 94
- प्रारम्भिक रचनाएँ, पृष्ठ 80
- वही, पृष्ठ 84
- वही, पृष्ठ 87
- वही, पृष्ठ 91
- जीवन क्या जिया, पृष्ठ 95
- वही
- आमने सामने, पृष्ठ 275
- जीवन क्या जिया, पृष्ठ 95
- बात बात में बात, पृष्ठ 31
- वही
- आमने सामने, पृष्ठ 129
- जीवन क्या जिया पृष्ठ 321
- वही, पृष्ठ 325
- पृथ्वी राज रासो: भाषा और साहित्य, 1997, पृष्ठ x
- वही, पृष्ठ 16
- वही, पृष्ठ 17
- वही, पृष्ठ 20
- वही, पृष्ठ xi
- वही, प्रथम संस्करण की भूमिका
- वही, पृष्ठ 40
- वही, पृष्ठ 265
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17 दिसम्बर 1946 को बिहार प्रान्त के मुज़फ्फ़रपुर जिले के गाँव चैनपुर-धरहरवा के एक सामान्य परिवार में जन्मे रविभूषण की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के आसपास हुई. बिहार विश्वविद्यालय के लंगट सिंह कॉलेज से हिन्दी ऑनर्स (1965) और हिन्दी भाषा-साहित्य में एम.ए. (1967-68) किया. भागलपुर विश्वविद्यालय से डॉ. बच्चन सिंह के निर्देशन में छायावाद में रंग-तत्व पर पी-एच.डी. (1985) की. नवम्बर अक्टूबर 2008 में राँची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन. समय और समाज को केन्द्र में रखकर साहित्य एवं साहित्येतर विषयों पर विपुल लेखन. ‘चित्त में वित्त का वास’, ‘प्रबुद्ध वर्ग का घातक मौन’, ‘फ़ासीवाद की दस्तक’, ‘बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी’ ‘वैकल्पिक भारत की तलाश’, ‘कहाँ आ गये हम वोट देते-देते’ और ‘रामविलास शर्मा का महत्व’ पुस्तकें आदि प्रकाशित. |



