| आंद्रे बेते विवेक, संवाद और सामाजिक संरचना अजय कुमार |
भारत में जाति, वर्ग, सत्ता और असमानता की संरचना का गहन विश्लेषण करने वाले समाजशास्त्री आंद्रे बेते का 3 फरवरी 2026 को 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया. उनका जन्म सितंबर 1934 में चंदननगर (पश्चिम बंगाल) में हुआ, जो उस समय फ्रांसीसी शासन के अधीन था. फ्रांसीसी पिता और बंगाली माता के कारण वे सांस्कृतिक रूप से एक विशिष्ट भद्रलोक परंपरा से जुड़े रहे. प्रारंभिक शिक्षा चंदननगर, पटना और कोलकाता में हुई; उन्होंने सेंट जेवियर कॉलेज, कलकत्ता से स्नातक और कलकत्ता विश्वविद्यालय से मानवविज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त की. प्रारंभ में भौतिकी के छात्र रहे, पर एन.के. बोस के प्रभाव से मानवविज्ञान की ओर उन्मुख हुए.
कलकत्ता विश्वविद्यालय से मानवविज्ञान में ऑनर्स किया और उसी विश्वविद्यालय से एमएससी भी पूरी की. भारतीय सांख्यिकी संस्थान में एक शोध अध्येता के रूप में संक्षिप्त कार्यकाल के बाद, उन्होंने डिग्री पाठ्यक्रमों को पढ़ाना शुरू किया और कुछ ही समय बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विभाग खुला जो उस समय एक प्रमुख विभाग के रूप में उभर रहा था, इसलिए आंद्रे बेते वहाँ समाजशास्त्र के व्याख्याता के रूप में चले गए और एम.एन. श्रीनिवास के मार्गदर्शन में पीएचडी के लिए शोध कार्य शुरू किया, जो उस समय विभाग के प्रमुख थे. वे बंगाली और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में समान रूप से पारंगत थे. उन्हें यूरोपीय साहित्य, विशेष रूप से अंग्रेजी साहित्य का गहन ज्ञान था. आंद्रे बेते रवींद्रनाथ टैगोर के गीतों के अच्छे गायक भी थे.
आंद्रे बेते ने अपने अकादमिक शैक्षणिक कैरियर की शुरुआत सामाजिक स्तरीकरण, समानता एवं सार्वभौमिकता के प्रश्नों के विशेषज्ञ के रूप में की. 1990 से ही उन्होंने उदार दर्शन और गरीबी एवं सामाजिक अन्याय से उत्पन्न मुद्दों में गहरी रुचि लेना शुरू कर दिया था. वे पहले भारतीय समाजशास्त्री हैं जिन्होंने जॉन रॉल्स के सिद्धांतों की प्रासंगिकता को समझा और सकारात्मक भेदभाव संबंधी नीतियों की उलझन को सुलझाने के लिए उनके विचारों को रचनात्मक रूप से अपने अकादमिक कार्यो में लागू किया. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के समाजशास्त्र विभाग में पांच दशकों तक अध्यापन और शोध कार्य किया. समाजशास्त्र में उनके योगदान में सिद्धांत और विधियाँ, जाति, वर्ग और शक्ति, सकारात्मक कार्रवाई, सामाजिक असमानता, विचारधाराओं और बुद्धिजीवियों पर कई पुस्तकें शामिल हैं. उन्होंने भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष, नॉर्थ ईस्टर्न हिल विश्वविद्यालय के कुलाधिपति कोलकाता स्थित सामाजिक विज्ञान अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष और भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के अध्यक्ष सहित कई प्रशासनिक पदों पर कार्य किया.
आंद्रे बेते दिल्ली विश्वविद्यालय के दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में समाजशास्त्र के प्रोफेसर एमेरिटस रहे हैं. अपने लंबे और प्रतिष्ठित अकादमिक कैरियर में, उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, शिकागो विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अध्यापन कार्य किया है. वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स, रॉटरडैम के इरास्मस विश्वविद्यालय, बर्कले स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय और बर्लिन के इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी में भी समाजशास्त्र के प्रोफेसर एमेरिटस भी रह चुके हैं. कम उम्र में ही उन्हें भारत और विदेश के कई विश्वविद्यालयों से अनेक पुरस्कार और फैलोशिप प्राप्त हुईं. वे पहले नेहरू फेलो थे. यह भी उल्लेखनीय है कि समाजशास्त्र के क्षेत्र में उनके उच्च विद्वतापूर्ण योगदान को मान्यता देते हुए, 1992 में उन्हें ब्रिटिश अकादमी का फेलो चुना गया, यह एक ऐसा सम्मान है जो किसी भारतीय, विशेष रूप से समाजशास्त्री को शायद ही कभी मिलता हो. 2005 में, समाजशास्त्र के क्षेत्र में उनके योगदान और राष्ट्र के प्रति उनकी विशिष्ट सेवा को मान्यता देते हुए, उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. उसी वर्ष उन्हें भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया, जिससे उन्होंने जाति-आधारित आरक्षण बढ़ाने के प्रस्ताव के विरोध में 2006 में इस्तीफा दे दिया. उसी वर्ष, उन्हें राष्ट्रीय प्रोफेसर बनाया गया.
आंद्रे बेते भौतिक रूप से मेरे शिक्षक नहीं रहे लेकिन विचार रूप में वह हमारी बौद्धिक संरचना का हिस्सा थे. जब मैं अपने परास्नातक स्तर की कक्षाओं के लिए लखनऊ विश्वविद्यालय के लखनऊ स्कूल ऑफ़ सोशियोलोजी में गया तब मैंने भारतीय समाजशास्त्र की वैचारिक परिप्रेक्ष्यों को समझने के क्रम में कक्षाओं में शिक्षकों के माध्यम पहली बार उनके लेखन से परिचित हुआ. परास्नातक स्तर के अंतिम वर्ष में लघु शोध प्रबंध के दौरान गंभीरता के साथ आंद्रे बेते का लेखन और उनकी पुस्तकें जल्द ही मेरी शैक्षिक यात्रा का स्थायी और प्रेरक पड़ाव बन गईं.
भारतीय समाज की सामाजिक संरचना और आंद्रे बेते
बीसवीं शताब्दी के मध्य, विशेषकर 1950–60 के दशक में, भारतीय समाजशास्त्र अपनी विषय-वस्तु और पद्धति को लेकर गहरे संक्रमण के दौर से गुजर रहा था. प्राकृतिक विज्ञानों की तर्ज पर पद्धतिशास्त्रीय कठोरता गढ़ने की कोशिशें हो रही थीं, वहीं औपनिवेशिक मानवशास्त्र और पश्चिमी शास्त्रीय समाजशास्त्र के प्रभाव में भारतीय समाज को प्रायः एक स्थिर, आत्मपूर्ण और सांस्कृतिक रूप से समरूप व्यवस्था के रूप में समझा जा रहा था. इस बौद्धिक परिदृश्य में आंद्रे बेते ने एक वैकल्पिक समाजशास्त्रीय दृष्टि का प्रस्ताव किया-जो अमूर्त सांस्कृतिक संरचनाओं के बजाय जीवंत सामाजिक संबंधों, असमानताओं और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं पर केंद्रित थी. बेते किसी ‘महान सिद्धांत’ की खोज में नहीं थे, न ही वे समाज को किसी एक सर्वव्यापी नियम से बाँधना चाहते थे. उनका दृष्टिकोण तुलनात्मक, अनुभवजन्य और वेबेरियन परंपरा से प्रेरित था. वे यह समझना चाहते थे कि लोग वास्तव में कैसे जीवन जीते हैं, किस प्रकार संघर्ष करते हैं, और सामाजिक संस्थाएँ उनके जीवन-अवसरों को कैसे आकार देती हैं. उन्होंने समाजशास्त्र को एकल मार्क्सवादी या कार्यात्मक व्याख्याओं की सीमाओं से बाहर निकालते हुए बहुआयामी और वस्तुनिष्ठ अध्ययन पर बल दिया. उनके लिए समाजशास्त्र न तो वैचारिक आग्रहों का उपकरण था और न ही सांस्कृतिक गौरव-गान का मंच; वह सामाजिक यथार्थ की जटिलताओं को समझने की विधा था.
भारतीय समाजशास्त्र में जाति को लंबे समय तक केंद्रीय विश्लेषणात्मक श्रेणी माना गया है, किंतु आंद्रे बेते ने जाति के साथ-साथ वर्ग और सत्ता को समान रूप से महत्त्वपूर्ण मानते हुए भारतीय समाज की बहुस्तरीय संरचना को समझने का प्रयास किया. बेते का समाजशास्त्र भारतीय सामाजिक यथार्थ को न तो केवल सांस्कृतिक पदानुक्रम के रूप में देखता है और न ही मात्र आर्थिक निर्धारण के रूप में, बल्कि वह सामाजिक स्तरीकरण को ऐतिहासिक, संस्थागत और नैतिक संदर्भों में विश्लेषित करता है. इसलिए आंद्रे बेते का भारतीय समाजशास्त्र सैद्धांतिक, अनुभवजन्य और आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है. आंद्रे बेते भारतीय समाजशास्त्र के उन विरल विद्वानों में हैं जिन्होंने अनुभवजन्य शोध, सैद्धांतिक विवेक और नैतिक बोध तीनों को एक साथ साधने का प्रयास किया. उनका समाजशास्त्र न तो केवल वर्णनात्मक है और न ही किसी एक वैचारिक धारा का अनुकरण, बल्कि वह भारतीय समाज की जटिलताओं को समझने का एक संतुलित बौद्धिक प्रयास है. जाति, वर्ग, सत्ता, असमानता, आधुनिकता और संस्थागत परिवर्तन उनके अध्ययन के केंद्रीय विषय रहे हैं. औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक भारत में समाजशास्त्र के विकास के संदर्भ में बेते का योगदान विशेष महत्व रखता है. जहाँ एक ओर एम.एन. श्रीनिवास जैसे विद्वानों ने जाति और संस्कृतिकरण पर बल दिया, वहीं बेते ने वर्ग, सत्ता और असमानता के प्रश्नों को केंद्र में लाकर भारतीय समाजशास्त्र को एक व्यापक संरचनात्मक दृष्टि प्रदान की.[1]
आंद्रे बेते का समाजशास्त्रीय चिंतन शास्त्रीय समाजशास्त्र की परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है. मैक्स वेबर, कार्ल मार्क्स और एमिल दुर्खीम तीनों के विचार उनके लेखन में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से परिलक्षित होते हैं. वेबर से उन्होंने वर्ग, प्रतिष्ठा और सत्ता (class, status and power) की त्रिविमीय अवधारणा ग्रहण की, जबकि मार्क्स से असमानता और वर्ग-संघर्ष की अंतर्दृष्टि प्राप्त की.[2] हालाँकि बेते किसी भी विचारधारा के कट्टर अनुयायी नहीं हैं. वे मार्क्सवादी आर्थिक नियतिवाद और संरचनात्मक कार्यात्मकता दोनों की सीमाओं को रेखांकित करते हैं. उनके अनुसार समाजशास्त्र को न तो केवल उत्पादन संबंधों तक सीमित किया जा सकता है और न ही सामाजिक सहमति के सरलीकृत मॉडल से समझा जा सकता है.[3] इस प्रकार उनका दृष्टिकोण एक प्रकार का ‘critical empiricism’ कहा जा सकता है.
भारतीय समाजशास्त्र में जाति को लंबे समय तक केंद्रीय विश्लेषणात्मक श्रेणी माना गया. लुई दुमों (Louis Dumont) ने भारतीय समाज को मूलतः हायरार्किकल और होलिस्टिक बताया.[4] बेते इस दृष्टिकोण से असहमति प्रकट करते हैं. उनके अनुसार, जाति भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण आयाम अवश्य है, किंतु वह अकेला निर्णायक कारक नहीं है. बेते का एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप सांस्कृतिक तत्ववाद की आलोचना में भी निहित है. उन्होंने ‘Louis Dumont’ की उस व्याख्या से असहमति जताई जिसमें भारतीय समाज को मुख्यतः ‘शुद्धता’ और ‘अशुद्धता’ की श्रेणियों के आधार पर समझा गया था.
बेते का तर्क था कि भारतीय समाज बहुस्तरीय सिद्धांतों और हित-संबंधों से संचालित होता है; इसलिए इसे केवल सांस्कृतिक प्रतीकों के आधार पर नहीं समझा जा सकता. उनके अनुसार, भौतिक असमानताएँ, राजनीतिक संघर्ष और ऐतिहासिक परिवर्तन-ये सभी तत्व भारतीय समाज की व्याख्या के लिए अनिवार्य हैं. उन्होंने अपनी पुस्तक कास्ट, क्लास एंड पॉवर में बेते यह तर्क देते हैं कि आधुनिक भारत में वर्ग और सत्ता की भूमिका लगातार बढ़ी है. जाति सामाजिक पहचान और प्रतिष्ठा से जुड़ी है, जबकि वर्ग आर्थिक संसाधनों और अवसरों तक पहुँच को निर्धारित करता है. सत्ता इन दोनों के बीच सेतु का कार्य करती है और राजनीतिक तथा प्रशासनिक संस्थाओं के माध्यम से अभिव्यक्त होती है.[5] यह त्रिकोणीय विश्लेषण भारतीय समाज को समझने के लिए एक अधिक यथार्थपरक ढाँचा प्रदान करता है. बेते का यह तर्क एम.एन. श्रीनिवास के संस्कृतिकरण सिद्धांत की सीमाओं को भी उजागर करता है, जो सामाजिक गतिशीलता को मुख्यतः सांस्कृतिक अनुकरण के रूप में देखता है.[6]
उनकी प्रसिद्ध कृति ‘Caste, Class and Power’ भारतीय समाजशास्त्र में मील का पत्थर मानी जाती है. तमिलनाडु के एक गाँव पर आधारित इस अध्ययन में उन्होंने दिखाया कि जाति, वर्ग और सत्ता भले ही विश्लेषण की दृष्टि से अलग श्रेणियाँ हों, पर सामाजिक यथार्थ में वे गहरे अंतर्संबंधित आयाम हैं. आंद्रे बेते ने भारतीय समाज में जाति (Caste) और वर्ग (Class) के अंतर्संबंधों का गहन अध्ययन किया. उन्होंने दिखाया कि आधुनिक भारत में वर्ग संबंध कैसे उभरते हैं और जाति उनसे कैसे जुड़ी/अलग होती है. उन्होंने ग्राम समाज का सूक्ष्म अध्ययन किया उनकी प्रसिद्ध कृति कास्ट, क्लास एंड पॉवर-Caste, Class and Power) दक्षिण भारत के एक गाँव के गहन क्षेत्रीय अध्ययन पर आधारित है. इस अध्ययन ने भारतीय ग्रामीण समाज को समझने के लिए अनुभवजन्य (Empirical) और तुलनात्मक दृष्टि दी. आधुनिकता और सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में आंद्रे बेते ने यह स्पष्ट किया कि भारत में आधुनिकता पश्चिम की नकल मात्र नहीं है, बल्कि वह परंपरा और आधुनिकता के सह-अस्तित्व से बनती है. शिक्षा, नौकरशाही और लोकतंत्र को उन्होंने सामाजिक गतिशीलता के प्रमुख कारक माना. असमानता और सामाजिक स्तरीकरण के अपने सैद्धान्तीकरण में उन्होंने सामाजिक असमानता को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों में भी समझने पर जोर दिया.
समानता, मेरिट (merit) और अवसर की अवधारणाओं पर उनके लेख अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. आंद्रे बेते समाजशास्त्र में उदार मानवतावादी दृष्टिकोण के पक्षकार रहे है,आंद्रे बेते का समाजशास्त्र नैतिक विवेक, तर्क और संतुलन पर आधारित है. वे न तो अतिवादी मार्क्सवादी व्याख्याओं के समर्थक हैं और न ही सांस्कृतिक अतिरंजना के. भारतीय समाजशास्त्र की अकादमिक परंपरा का निर्माण प्रकिया में उन्होंने भारतीय समाजशास्त्र को वैचारिक परिपक्वता और वैश्विक संवाद से जोड़ा. आंद्रे बेते ने ग्रामीण क्षेत्र के अध्ययन को परिष्कृत विश्लेषण में परिवर्तित किया, उसने अपने पीछे कार्यों का एक ऐसा संग्रह छोड़ा है जो जाति, वर्ग और शक्ति के बारे में हमारी समझ को नया आकार देता है. ग्रामीण अध्ययनों से लेकर राष्ट्रीय बहसों तक, आंद्रे बेते ने दिखाया कि असमानता और सत्ता वास्तव में जमीनी स्तर पर कैसे काम करती हैं. इस अध्ययन ने उस धारणा को चुनौती दी कि भारतीय समाज को समझने के लिए केवल जाति ही पर्याप्त श्रेणी है. बेते ने स्पष्ट किया कि आर्थिक संसाधनों, राजनीतिक प्रभुत्व और सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रश्नों को साथ लेकर ही भारतीय समाज की जटिलता को समझा जा सकता है.
आंद्रे बेते का समाजशास्त्र
आंद्रे बेते का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान भारतीय समाज में जाति (Caste) और वर्ग (Class) के पारस्परिक संबंधों की व्याख्या है. उन्होंने यह स्पष्ट किया कि भारतीय समाज को केवल जाति-आधारित संरचना के रूप में देखना अपर्याप्त है. आधुनिक भारत में वर्गीय संरचनाएँ, आर्थिक संसाधनों तक पहुँच और राजनीतिक सत्ता के नए रूप उभर चुके हैं, जो जाति से पूर्णतः पृथक भी नहीं हैं और न ही पूरी तरह उससे आच्छादित. उनकी प्रसिद्ध कृति कास्ट, क्लास एंड पॉवर (Caste, Class and Power) इस संदर्भ में मील का पत्थर मानी जाती है, जिसमें उन्होंने दक्षिण भारत के एक गाँव का क्षेत्रीय अध्ययन करते हुए यह दिखाया कि किस प्रकार जाति, वर्ग और सत्ता एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं.[7] यह अध्ययन भारतीय ग्रामीण समाज को समझने के लिए एक बहु-आयामी ढाँचा प्रस्तुत करता है. आंद्रे बेते भारतीय समाजशास्त्र में अनुभवजन्य (Empirical) परंपरा के सशक्त प्रवक्ता रहे हैं. वे अमूर्त सिद्धांतों की अपेक्षा क्षेत्रकार्य अध्ययन (मैदानी अध्ययन), तथ्यात्मक विश्लेषण और तुलनात्मक पद्धति को अधिक महत्व देते हैं. उनका मानना है कि भारतीय समाज की विविधता को समझने के लिए सूक्ष्म स्तर (micro-level) के अध्ययन अनिवार्य हैं. इस दृष्टि से उनका कार्य एम. एन. श्रीनिवास की परंपरा से संवाद करता हुआ दिखाई देता है, किंतु आंद्रे बेते का जोर अधिक स्पष्ट रूप से वर्ग और सत्ता संबंधों पर है.
आंद्रे बेते के चिंतन का एक केंद्रीय विषय सामाजिक असमानता (Social Inequality) है. उन्होंने असमानता को केवल आर्थिक विषमता के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, सांस्कृतिक पूँजी और संस्थागत अवसरों के संदर्भ में विश्लेषित किया.[8] उनकी कृति ‘Inequality and Social Change’ तथा ‘The Idea of Natural Inequality and Other Essays’ में यह स्पष्ट होता है कि असमानता को “स्वाभाविक” या “जैविक” मानने की प्रवृत्ति किस प्रकार सामाजिक अन्याय को वैधता प्रदान करती है. बेते समानता और मेरिट (Merit) की अवधारणा पर भी गंभीर विमर्श करते हैं और यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या आधुनिक संस्थाएँ वास्तव में समान अवसर प्रदान करती हैं. आंद्रे बेते के अनुसार भारतीय समाज में आधुनिकता एक संकर प्रक्रिया (Hybrid Process) है, जिसमें परंपरा और आधुनिकता का सह-अस्तित्व दिखाई देता है. उन्होंने शिक्षा, विश्वविद्यालयों, नौकरशाही और लोकतांत्रिक संस्थाओं को सामाजिक परिवर्तन के प्रमुख वाहक के रूप में देखा.[9]
आगे चलकर उन्होंने जाति के परिवर्तित होते स्वरूप तथा कृषक समाज की सामाजिक संरचना पर अपने अनुसंधान को निरंतर विस्तार दिया. यह वैचारिक परिपक्वता उनकी पुस्तकों ‘कास्ट: ओल्ड एंड न्यू और स्टडीज इन अग्रेरियन सोशल स्ट्रक्चर’ में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है. इन कृतियों में उन्होंने भारतीय समाज की संरचनात्मक जटिलताओं को गहराई से विश्लेषित किया. साथ ही, समाजशास्त्र के सैद्धांतिक आयामों तथा विभिन्न देशों और सभ्यताओं के तुलनात्मक अध्ययन को भी उन्होंने अपनी रचनाओं में सुविचारित ढंग से प्रस्तुत किया, जिससे उनका कार्य व्यापक वैश्विक परिप्रेक्ष्य प्राप्त करता है. ‘स्टडीज इन अग्रेरियन सोशल स्ट्रक्चर’ ग्रामीण भारत की सामाजिक संरचना का विश्लेषण प्रस्तुत करती है. इसमें वे भूमि को केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा, शक्ति और सामाजिक वर्चस्व के स्रोत के रूप में देखते हैं. भूमिधारी और भूमिहीन वर्गों के बीच संबंध, कृषि श्रम की प्रकृति और ग्रामीण सत्ता-संरचनाओं के बदलते स्वरूप का उनका अध्ययन भारतीय ग्रामीण समाज की गतिशीलता को उजागर करता है.[10]
सामाजिक विषमता पर आधारित उनकी पुस्तकें- ‘इनइक्वेलिटी एमंग मेन’ और ‘द आईडिया ऑफ़ नेचुरल इनिक्वालिटी एंड अदर एसेज’ क्षेत्रकार्य पद्धति अनुभव पर आधारित साक्ष्य को प्रस्तुत करने के साथ ही मानव समाज में विभाजन और विभेद का सामाजिक सिद्धांत भी प्रस्तुत करती हैं. भारतीय लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं, भारतीय विश्वविद्यालयों के स्वरूप और उनकी संरचना पर भी उन्होंने विचारोत्तेजक पुस्तकें लिखीं. अपनी पुस्तक ‘इनइक्वेलिटी एमंग मेन‘ में बेते ने असमानता को मानव समाज की एक स्थायी विशेषता के रूप में देखा. विभिन्न सभ्यताओं की तुलना करते हुए उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि समाज असमानताओं को किस प्रकार वैधता प्रदान करते हैं. आधुनिक लोकतंत्र समानता का आदर्श प्रस्तुत करता है, परंतु व्यवहार में वह नई प्रकार की विषमताएँ भी उत्पन्न करता है. इसी संदर्भ में उनकी कृति ‘द बैकवर्ड क्लासेज इन कन्टेम्परेरी इंडिया’ आरक्षण, पिछड़े वर्गों और सामाजिक न्याय के प्रश्नों का विश्लेषण करती है. बेते का मानना था कि नीतियाँ अवसर उपलब्ध करा सकती हैं, परंतु सामाजिक सम्मान और वास्तविक समानता केवल प्रशासनिक उपायों से सुनिश्चित नहीं होती. इसके लिए सामाजिक चेतना, संस्थागत सुधार और नैतिक प्रतिबद्धता की आवश्यकता है.[11]
उनकी पुस्तक ‘यूनिवर्सिटीज एट द क्रॉसरोड्स’ उच्च शिक्षा के संकट, अकादमिक स्वतंत्रता और ज्ञान की सामाजिक भूमिका पर एक गंभीर समाजशास्त्रीय हस्तक्षेप है.[12] आंद्रे बेते का समाजशास्त्र एक उदार मानवतावादी दृष्टि से प्रेरित है. वे समाजशास्त्र को केवल सत्ता-संघर्ष या आर्थिक नियतिवाद तक सीमित नहीं मानते, बल्कि उसमें नैतिक विवेक, तर्कशीलता और संतुलन की आवश्यकता पर बल देते हैं. वे अतिवादी मार्क्सवादी या सांस्कृतिक नियतिवादी दृष्टिकोणों से सावधान रहने की सलाह देते हैं और समाजशास्त्र को एक संवादात्मक एवं विवेकपूर्ण अनुशासन के रूप में विकसित करते हैं. आंद्रे बेते ने भारतीय समाजशास्त्र को न केवल वैचारिक स्पष्टता प्रदान की, बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय अकादमिक मानचित्र पर भी स्थापित किया. वे भारतीय समाज की विशिष्टताओं को बनाए रखते हुए सार्वभौमिक समाजशास्त्रीय अवधारणाओं के साथ उसका संवाद स्थापित करते हैं. इस दृष्टि से उनका योगदान भारतीय समाजशास्त्र की परिपक्वता का प्रतीक है. इसलिए कहा जा सकता है कि आंद्रे बेते का समाजशास्त्रीय योगदान जाति, वर्ग, सत्ता, असमानता और आधुनिकता के संतुलित एवं वैज्ञानिक विश्लेषण में निहित है. उनका कार्य भारतीय समाज को समझने के लिए न केवल सैद्धांतिक उपकरण प्रदान करता है, बल्कि समाजशास्त्र को एक नैतिक और बौद्धिक अनुशासन के रूप में भी प्रतिष्ठित करता है.
ग्रामीण समाज का अध्ययन
आंद्रे बेते की समाजशास्त्रीय विशेषता उनकी क्षेत्रकार्य अनुभवजन्य पद्धति है. बेते ने भारतीय समाज में जाति, वर्ग और सत्ता के संबंधों को समझने के लिए तुलनात्मक और अनुभवजन्य (फील्डवर्क आधारित) दृष्टिकोण अपनाया. उनका सबसे प्रसिद्ध कार्य ‘कास्ट, क्लास एंड पॉवर’ है, जो दक्षिण भारत के एक गाँव (तंजौर या तंजावुर जिला, तमिलनाडु) में किए गए उनके क्षेत्रीय अध्ययन पर आधारित है. यह मूलतः उनकी पीएचडी थीसिस थी, जो एम.एन. श्रीनिवास के निर्देशन में लिखी गई थी. बेते ने दक्षिण भारत के तंजावुर जिले के एक गाँव का गहन अध्ययन करते हुए यह दिखाया कि किस प्रकार भूमि स्वामित्व, शिक्षा, प्रशासनिक पद और राजनीतिक भागीदारी सत्ता संरचना को प्रभावित करते हैं. उनका अध्ययन यह स्थापित करता है कि ग्रामीण समाज स्थिर नहीं है. परंपरागत जातिगत प्रभुत्व धीरे-धीरे वर्गीय और संस्थागत शक्ति में रूपांतरित हो रहा है. उदाहरण के लिए, उच्च जातियाँ केवल धार्मिक प्रतिष्ठा के आधार पर नहीं, बल्कि शिक्षा और नौकरशाही में प्रतिनिधित्व के माध्यम से भी अपना प्रभुत्व बनाए रखती हैं.[13] बेते की यह अनुभवजन्य दृष्टि भारतीय समाजशास्त्र को सैद्धांतिक अमूर्तन से निकालकर ठोस सामाजिक यथार्थ से जोड़ती है.
बेते ने लगभग दस महीनों तक एक गाँव (श्रीपुरम काल्पनिक नाम) में रहकर अध्ययन किया. उस समय अधिकांश मानवशास्त्री रिश्तेदारी, धर्म और रीति-रिवाजों पर ध्यान देते थे, लेकिन बेते ने वर्ग और सत्ता को भी विश्लेषण में शामिल किया. उनका मानना था कि समाजशास्त्र और सामाजिक मानवशास्त्र के मिलन भारतीय समाज को समझने के लिए आवश्यक है. वे विशेष रूप से मैक्स वेबरके “वर्ग, स्थिति और दल” के सिद्धांत से प्रभावित थे.
बेते ने भारतीय समाज के अपने अध्ययन में जाति, वर्ग और सत्ता को अहम आयाम मानते है. जाति के संदर्भ में उनका विश्लेषण है कि, भारतीय समाज में जाति एक पारंपरिक और धार्मिक रूप से मान्यता प्राप्त व्यवस्था रही है. यह जन्म पर आधारित और अपेक्षाकृत बंद (closed) प्रणाली है. तंजौर के गाँव में समाज ब्राह्मण, गैर-ब्राह्मण और आदि-द्रविड़ (पूर्व अछूत) समूहों में विभाजित था. बेते ने बताया कि जाति केवल धार्मिक या अनुष्ठानिक व्यवस्था नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक जीवन से भी जुड़ी है.
उन्होंने लुईस डुईमोंट (Louis Dumont) की पुस्तक होमो हायर्राकिकस (Homo Hierarchicus) की आलोचना करते हुए कहा कि भारतीय जाति व्यवस्था को एक समान और स्थिर प्रणाली के रूप में देखना सही नहीं है. वर्ग के संदर्भ में बेते का विश्लेषण है कि वर्ग उत्पादन के साधनों (जमीन, पूंजी आदि) के स्वामित्व पर आधारित होता है. यह जाति की तुलना में अधिक खुली व्यवस्था है. गाँव में भूस्वामी, किसान, बटाईदार और कृषि मजदूर जैसे वर्ग थे. एक ही व्यक्ति कई भूमिकाएँ निभा सकता था जैसे वह किसान भी हो सकता था और मजदूर भी. बेते ने स्पष्ट किया कि आधुनिक भारत में आर्थिक परिवर्तन ने वर्ग संबंधों को अधिक महत्त्वपूर्ण बना दिया है. सत्ता (Power) के संदर्भ बेते का विश्लेषण है कि सत्ता जाति और वर्ग से अलग लेकिन उनसे जुड़ी हुई व्यवस्था है. स्वतंत्रता के बाद वयस्क मताधिकार और पंचायती राज ने सत्ता संरचना को बदल दिया. पहले गाँव की सत्ता ब्राह्मणों के हाथ में थी, लेकिन बाद में गैर-ब्राह्मण जातियाँ राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हो गईं. इस प्रकार, सत्ता का आधार केवल जमीन नहीं रहा, बल्कि संख्या, राजनीतिक संगठन और दलगत रणनीति भी महत्वपूर्ण हो गए.

स्तरीकरण और असमानता
भारतीय समाज का सामाजिक स्तरीकरण और असमानता बेते के चिंतन का केंद्रीय विषय है. परिवर्तन और स्तरीकरण के संदर्भ में बेते का तर्क है कि भारतीय समाज स्थिर नहीं है. जाति, वर्ग और सत्ता के संबंध समय के साथ बदलते रहते हैं. परंपरागत समाज में जाति और वर्ग में अधिक संगति थी. आधुनिक काल में भूमि सुधार, शिक्षा, लोकतंत्र और राजनीतिक भागीदारी ने इन संबंधों को बदल दिया. जाति अब पूरी तरह धार्मिक नहीं रही; इसमें राजनीतिक और आर्थिक आयाम जुड़ गए हैं. वे असमानता को केवल आय या संपत्ति की विषमता तक सीमित नहीं मानते, बल्कि उसे सामाजिक प्रतिष्ठा, सांस्कृतिक पूँजी और संस्थागत अवसरों के व्यापक संदर्भ में देखते हैं.[14]
‘इनिक्वालिटी एंड सोशल चेंज’ में बेते तर्क देते हैं कि सामाजिक परिवर्तन के बावजूद असमानता समाप्त नहीं होती, बल्कि नए रूपों में पुनरुत्पादित होती रहती है. औद्योगीकरण, शहरीकरण और शिक्षा के विस्तार के बावजूद सामाजिक पदानुक्रम बना रहता है. ‘द आइडिया ऑफ़ नेचुरल इनक्वालिटी’ में वे उस वैचारिक प्रवृत्ति की आलोचना करते हैं जो असमानता को ‘स्वाभाविक’ या ‘जैविक’ मानकर उसे वैध ठहराती है.[15] यह आलोचना उदार लोकतांत्रिक समाजों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है.
समानता और असमानता के संदर्भ में अपनी पुस्तक ‘द आइडिया ऑफ़ नेचुरल इनक्वालिटी’–में बेते ने असमानता के विचार पर चर्चा की. उनका तर्क था कि सामाजिक असमानता को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता. लेकिन सकारात्मक भेदभाव (आरक्षण आदि) द्वारा इसे नियंत्रित किया जा सकता है. समानता एक आदर्श है, पर समाज में कुछ स्तर का स्तरीकरण हमेशा रहेगा.
बेते समानता और मेरिट की अवधारणाओं पर गंभीर विमर्श करते हैं. उनका तर्क है कि मेरिट को अक्सर सामाजिक संदर्भ से अलग करके देखा जाता है, जबकि वास्तव में वह सामाजिक विशेषाधिकारों से गहराई से जुड़ी होती है.[16]
आरक्षण नीति के संदर्भ में बेते का दृष्टिकोण संतुलित माना जाता है. वे सामाजिक न्याय की आवश्यकता को स्वीकार करते हैं, किंतु यह भी प्रश्न उठाते हैं कि नीतिगत हस्तक्षेप किस सीमा तक सामाजिक समरसता और संस्थागत दक्षता को प्रभावित करते हैं. आरक्षण नीति भारतीय लोकतंत्र की सबसे विवादास्पद नीतियों में से एक रही है. बेते इस प्रश्न को नैतिक और संस्थागत-दोनों स्तरों पर देखते हैं. वे सामाजिक न्याय के ऐतिहासिक औचित्य को स्वीकार करते हैं, किंतु यह भी तर्क देते हैं कि नीति-निर्माण में संस्थागत दक्षता और सामाजिक विश्वास को भी ध्यान में रखना आवश्यक है.[17]
मेरिट की अवधारणा पर उनकी आलोचना विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है. बेते के अनुसार, मेरिट को अक्सर सामाजिक संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया जाता है, जबकि वास्तविकता में शिक्षा, पारिवारिक पृष्ठभूमि और सांस्कृतिक पूँजी मेरिट के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाती हैं. इस प्रकार वे मेरिट को ‘सामाजिक रूप से निर्मित’ अवधारणा के रूप में देखते हैं. इस संतुलन के कारण उन पर कभी-कभी यथास्थितिवाद का आरोप भी लगाया गया है.
बेते के अनुसार भारतीय आधुनिकता पश्चिमी आधुनिकता की नकल नहीं है. यह परंपरा और आधुनिकता के सह-अस्तित्व से निर्मित एक संकर प्रक्रिया है.[18]
शिक्षा, विश्वविद्यालय, नौकरशाही और लोकतांत्रिक संस्थाएँ इस प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं. उनकी पुस्तक Universities at the Crossroads में उच्च शिक्षा के संकट, अकादमिक स्वतंत्रता और ज्ञान की सामाजिक भूमिका पर गंभीर विमर्श मिलता है.[19]
मानवतावादी समाजशास्त्र
बेते का समाजशास्त्र उदार मानवतावादी परंपरा से प्रेरित है. वे समाजशास्त्र को केवल सत्ता-संघर्ष का अध्ययन नहीं, बल्कि एक नैतिक बौद्धिक अनुशासन मानते हैं. तर्क, संवाद और सहिष्णुता उनके चिंतन के केंद्रीय मूल्य हैं. नस्ल और जाति पर बहस सम्बन्धी अपने सैद्धान्तीकरण में “नस्ल और जाति” में बेते ने जाति को नस्ल के बराबर मानने पर आपत्ति जताई. उनका मत था कि जाति एक सामाजिक श्रेणी है, नस्ल नहीं. समाजशास्त्र और सामाजिक मानवशास्त्र के बीच विभाजन को लेकर बेते का तर्क है कि समाजशास्त्र और सामाजिक मानवशास्त्र के बीच कृत्रिम विभाजन उचित नहीं है. पहले समाजशास्त्र “औद्योगिक समाजों” का और मानवशास्त्र “जनजातीय समाजों” का अध्ययन करता था. आज दोनों विषयों का लक्ष्य समान है सामाजिक संरचनाओं और संबंधों को समझना. वे तुलनात्मक पद्धति को समाजशास्त्र का सार मानते हैं. तुलना केवल भिन्नताओं की नहीं, समानताओं की खोज भी है.
आंद्रे बेते के समाजशास्त्र को व्यापक स्वीकृति मिली है, किंतु समकालीन समाजशास्त्रीय विमर्श में उनकी गंभीर आलोचनाएँ भी हुई हैं. विशेष रूप से दलित अध्ययन (Dalit Studies), एवं सबाल्टर्न अध्ययन (Subaltern Studies) और आलोचनात्मक समाजशास्त्र (Critiquel Sociology) से जुड़े विद्वानों ने उनके उदार मानवतावादी दृष्टिकोण की सीमाओं की ओर संकेत किया है.
आंद्रे बेते का कार्य भारतीय समाजशास्त्र की प्रमुख धाराओं के साथ निरंतर संवाद में रहा है. एम.एन. श्रीनिवास का संस्कृतिकरण सिद्धांत सामाजिक गतिशीलता को सांस्कृतिक अनुकरण के रूप में समझाता है, जबकि बेते इसे वर्गीय संसाधनों और संस्थागत अवसरों से जोड़ते हैं.[20] लुई दुमों की Homo Hierarchicus भारतीय समाज को मूलतः मूल्य-आधारित पदानुक्रम के रूप में प्रस्तुत करती है, परंतु बेते इस दृष्टिकोण को अत्यधिक समग्रवादी मानते हैं. उनके अनुसार भारतीय समाज में आधुनिक संस्थाओं के विकास के साथ-साथ व्यक्तिगत हित, वर्गीय प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक सत्ता की भूमिका बढ़ी है.[21] दीपंकर गुप्ता (2000) ने भी भारतीय समाज में जाति की बदलती भूमिका पर बल दिया है, जो बेते के तर्कों के निकट है.[22] इस प्रकार बेते का समाजशास्त्र भारतीय समाजशास्त्र को एक संक्रमणशील और बहुस्तरीय संरचना के रूप में देखने का आग्रह करता है.
दलित समाजशास्त्र ने भारतीय सामाजिक सिद्धांत को यह सिखाया है कि अनुभव स्वयं ज्ञान का स्रोत हो सकता है. इस दृष्टि से बेते के ‘दूरी बनाए रखने वाले’ समाजशास्त्र पर प्रश्न उठते हैं. गोपाल गुरु (2009) इसे सैद्धांतिक ब्राह्मणवाद की संज्ञा देते हैं, जहाँ सिद्धांत अनुभव से ऊपर रख दिया जाता है.[23] फिर भी यह कहना भी उचित होगा कि बेते अनुभव को नकारते नहीं हैं, बल्कि उसे व्यापक सामाजिक संरचना में स्थित करने का प्रयास करते हैं. उनका समाजशास्त्र नैतिक आक्रोश के बजाय विवेकपूर्ण आलोचना पर बल देता है. यह बहस भारतीय समाजशास्त्र की जीवंतता का प्रमाण है.
गोपाल गुरु (2009) का तर्क है कि भारतीय समाजशास्त्र में ‘नैतिक तटस्थता’ का आग्रह कई बार सामाजिक उत्पीड़न की ऐतिहासिक और अनुभवगत तीव्रता को धुंधला कर देता है. इस संदर्भ में बेते का विवेकशील और संतुलित दृष्टिकोण, दलित अनुभव की ‘नैतिक विरोध’ को पर्याप्त स्थान नहीं दे पाता. गुरु के अनुसार, सामाजिक सिद्धांत को उत्पीड़ित समुदायों के अनुभव से सीखना चाहिए, न कि केवल उन पर टिप्पणी करनी चाहिए. इसी प्रकार कांचा इलैय्या (1996) और आनंद तेलतुंबड़े (2010) जैसे चिंतकों का मानना है कि उदार समाजशास्त्र संरचनात्मक जातिगत हिंसा और बहिष्करण को अक्सर ‘सामाजिक जटिलता’ के रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे उसके राजनीतिक निहितार्थ कमजोर हो जाते हैं.
इस आलोचना के बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि बेते का उद्देश्य सामाजिक अन्याय को नकारना नहीं, बल्कि समाजशास्त्र को वैचारिक अतिवाद से बचाना है.[24] इसके आलवा कुछ विद्वानों का मत है कि बेते ने वेबर के सिद्धांत को भारतीय संदर्भ में पूरी तरह अनुकूलित नहीं किया. उनकी पद्धति कार्यात्मकता से बहुत दूर नहीं जा पाई. उन्होंने कोई स्पष्ट “स्कूल” या बौद्धिक परंपरा स्थापित नहीं की. फिर भी, भारतीय समाज में जाति, वर्ग और सत्ता के अंतर्संबंधों को समझने में उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है.
भारतीय समाजशास्त्र की नई दिशा
आंद्रे बेते ने भारतीय समाजशास्त्र को परंपरा के संग्रहालय से निकालकर जीवंत सामाजिक यथार्थ की ओर मोड़ा. उन्होंने यह स्थापित किया कि समाजशास्त्र का कार्य न तो समाज का महिमामंडन है और न ही उसकी निंदा, उसका दायित्व संस्थागत असमानताओं और जटिलताओं को स्पष्ट करना है. उनकी बौद्धिक विरासत हमें यह सिखाती है कि समाज को समझने के लिए पद्धतिशास्त्रीय कट्टरता या भावनात्मक आवेग पर्याप्त नहीं हैं. आवश्यक है- धैर्यपूर्ण विश्लेषण, अनुभवजन्य प्रमाणों के प्रति निष्ठा और नैतिक स्पष्टता.
आज जब वैश्विक और भारतीय समाज दोनों ही गहरे ध्रुवीकरण और असमानताओं से जूझ रहे हैं, बेते की दृष्टि और भी प्रासंगिक हो उठती है. वे हमें याद दिलाते हैं कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा केवल संवैधानिक संस्थाओं से नहीं, बल्कि संवाद, तर्क और नैतिक साहस से होती है. असमानताओं से भरे समाज में भी विवेक और संवाद को जीवित रखा जा सकता है- यही आंद्रे बेते की सबसे बड़ी बौद्धिक देन है.
आंद्रे बेते ने भारतीय समाजशास्त्र को एक नई दिशा दी. उन्होंने दिखाया कि जाति, वर्ग और सत्ता अलग-अलग नहीं, बल्कि परस्पर जुड़ी हुई व्यवस्थाएँ हैं. भारतीय समाज परिवर्तनशील है, स्थिर नहीं. तुलनात्मक और अनुभवजन्य अध्ययन सामाजिक वास्तविकता को समझने के लिए आवश्यक है. सामाजिक असमानता को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, पर उसे नियंत्रित और कम किया जा सकता है.
आंद्रे बेते समकालीन भारतीय समाजशास्त्र के उन प्रमुख विद्वानों में हैं जिन्होंने भारतीय समाज की जटिल संरचना को अनुभवजन्य अध्ययन, सैद्धांतिक संतुलन और उदार मानवतावादी दृष्टिकोण के माध्यम से समझने का प्रयास किया. उनका समाजशास्त्र न तो केवल वैचारिक अमूर्तन तक सीमित है और न ही मात्र विवरणात्मक; बल्कि वह जाति, वर्ग, सत्ता, असमानता और आधुनिकता जैसे केंद्रीय प्रश्नों का वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत करता है.
भारतीय समाजशास्त्र को वैश्विक अकादमिक संवाद से जोड़ने में बेते का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है. निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि आंद्रे बेते भारतीय समाजशास्त्र के उन विद्वानों में हैं जिन्होंने अनुशासन को बौद्धिक परिपक्वता, अनुभवजन्य कठोरता और नैतिक विवेक प्रदान किया. यद्यपि उनके दृष्टिकोण की सीमाएँ हैं, फिर भी उनका समाजशास्त्र आज भी भारतीय समाज को समझने के लिए एक अनिवार्य संदर्भ बना हुआ है.
संदर्भ:
[1]बेते, आंद्रे (1965), कास्ट, क्लास एंड पॉवर, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया प्रेस, बर्कले
[2]देखें वेबर, एम. (1948), फ्रॉम मैक्स वेबर: एसेज इन सोशियोलॉजी, न्यूयॉर्क: ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस एवं मार्क्स, कार्ल (1867)), कैपिटल ए क्रिटिक ऑफ़ पॉलिटिकल इकोनॉमी वोल्यूम-1
[3]बेते, आंद्रे (2002), इनक्वलिटी ऑफ़ सोशल चेंज, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली
[4]डूमोंट, लुईस (1970), होमो हायर्राकिकस, शिकागो निवर्सिटी प्रेस, शिकागो
[5]बेते, आंद्रे (1965), वही.
[6]श्रीनिवास, एम. एन. (1952),रिलिजन एंड सोसायटी एमोंग द कुर्ग्स ऑफ़ साउथ इंडिया, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस
[7]बेते, आंद्रे (1965), कास्ट, क्लास एंड पॉवर, यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया प्रेस, बर्कले
[8]बेते, आंद्रे (1969), सोशल इनिक्वालिटी सेलेक्टेड रीडिंग्स, पेंगुइन बुक्स
[9]देखें बेते, आंद्रे (1972), इनिक्वालिटी एंड सोशल चेंज, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस एवं बेते, आंद्रे (1983), द आईडिया ऑफ़ नेचुरल इनिक्वालिटी एंड अदर एसेज, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस
[10]बेते, आंद्रे (1974), स्टडीज इन अग्रेरियन सोशल स्ट्रक्चर, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस
[11]देखें बेते, आंद्रे (1977), इनइक्वेलिटी एमंग मेन,विली-ब्लैकवेल एवं, बेते, आंद्रे (1992), द बैकवर्ड क्लासेज इन कन्टेम्परेरी इंडिया, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस
[12]आंद्रे (2010), यूनिवर्सिटी एट द क्रॉस रोड्स, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस
[13]बेते, आंद्रे (Béteille, 1965) वही.
[14]बेते, आंद्रे (2002), वही.
[15]बेते, आंद्रे (1983), द आइडिया ऑफ़ नेचुरल इनक्वालिटी, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली
[16]बेते, आंद्रे (1991), सोसायटी एंड पोलिटिक्स इन इंडिया, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली
[17]बेते, आंद्रे (1991), वही.
[18]बेते, आंद्रे (2010), यूनिवर्सिटीज एट क्रॉसरोड्स, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली
[19]बेते, आंद्रे (2012), डेमोक्रेसी एंड इट्स इंस्टीट्यूशंस, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली
[20]देखें श्रीनिवास, एम. एन. (1952) एवं बेते, आंद्रे (2002), वही.
[21]देखें डूमोंट, लुईस (1970) एवं बेते, आंद्रे (2002), वही.
[22]गुप्ता, दीपांकर (2000), इंट्रोगेटिंग कास्ट: अंडरस्टैंडिंग हाइरार्की एंड डिफ़रेंस इन इंडियन सोसायटी, पेंगुइन बुक्स
[23]गुरु, गोपाल (2009), हयुमिलियेशन: क्लेम्स एंड कॉन्टेक्स्ट, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, दिल्ली
[24]देखें गुरु, गोपाल (2009), वही, इलैय्या, कांचा (1996), व्हाई आई एम नोट अ हिन्दू, साम्या, एवं तेलतुंबड़े, आनंद (2010), परसिस्टेंस ऑफ़ कास्ट, जेड बुक्स लन्दन
अजय कुमारअसिस्टेंट प्रोफ़ेसर समाजशास्त्र विभाग अम्बेडकर स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, लखनऊ. इमेल : ajaykbbau@gmail.com |


अजय कुमार

