फ़रवरी की कविता
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II ठहरी हुई फ़रवरी II
1
फ़रवरी आते-आते साल बासी हो जाता है.
ठंड के साथ उतरने लगता है ख़ुशियों का झीना पर्दा. पुराने ज़ख़्म साँस लेते. खड़खड़ाती आवाज़ से भरा कमरा. हुक्मरानो के फ़रमान बजबजाते. भीड़ ख़ुशी के नक़ाब फेंक रही. पैने दाँत चमक रहे. शिकारी और शिकार. पुरानी ख़बरें. नए ब्यौरे. फ़रवरी आते-आते नए साल के बधाई संदेशों पर फफूँद उग आती.
2.
उधेड़बुन.
फ़रवरी को इतना गर्म नहीं होना था. फ़रवरी में दिख रही मई-जून की झलक. बीच-बीच में ठंडी हवा के झोंके. जनवरी की याद. फ़रवरी बहुत जल्दी पार हो गए पुल सरीखा है. अभी इसकी कुछ और कहानियाँ होनी बाक़ी हैं.
अगली फ़रवरी तक उनकी तलाश करेंगे.
3.
फ़रवरी गुज़रने को है.
अख़बार में सौ साल पहले आज ही के दिन की ख़बर. इतिहास की चाल. जो इतिहास नहीं दर्ज किसी ख़बर में वह कविता के दरवाज़े खटखटाता. ज़ख़्मों की जड़े हमारी स्मृतियों तक गहरी. आज की फ़रवरी में सालों पुरानी फ़रवरी की ख़लिश. उदासी के पुल पार करते-करते थककर सो जाता हूँ. सपने में जून की तपती दोपहर में खड़ी फ़रवरी की शाम. अलविदा कह सपने से बाहर आता हूँ. जाने-पहचाने-अनजाने चेहरों के कारवाँ-दर-कारवाँ कई-कई पुलों पर चलते दिखते. थककर सोएँगे वे भी? यह सोचता पिछली फ़रवरियों के आग़ोश में अगली फ़रवरी के ख़्याल में डूब जाता हूँ. ख़ुद को खुशनसीब मानकर कि मेरी फ़रवरी में कविता भी है.
4.
ख़ुद के चेहरे को छूते हुए मैं कैलेण्डर देखता हूँ.
एक और दिन गुज़र गया. मुल्क की बुरी ख़बरें सुन सोचता हूँ किसी और ठाँव चला जाए. इस फ़रवरी यह मुमकिन नहीं. अगली फ़रवरी तक ख़्वाब देखता रहूँगा उस जगह की जहाँ बुरी ख़बरें न हों. कोई कान में फुसफुसाकर कहता तुमको पता है यह अगली फ़रवरी भी मुमकिन नहीं. ज़िन्दगी के ख़िलाफ़ धरती के हर कोने में जंग छिड़ी हुई. दौलत के बाज़ीगर बाज़ार में सनसनी फैलाते और गली-मोहल्लों में दरारें पड़ जातीं. बसन्त. सकल बन फूल रही सरसों. खुसरो सुनता हूँ और रोता हूँ उन लोगों के लिए जिनका मुल्क छीना जा रहा सरेआम. कोई ख़ुदा कोई ईश्वर अगली फ़रवरी तक का सफ़र आसान बना दे. ख़ुद को समेट लूँ या फैला दूँ. तेज़ रिंग टोन बन कर बजूँ कि दुनिया चौकन्नी हो जाए. बन-बन फूलती रहे सरसों.
आह फ़रवरी!
5.
फ़रवरी को गुज़रे कई दिन हो गए.
याद करते हुए ख़्याल आता यह फ़रवरी अब कभी नहीं होगी. न जानें कितने गुज़रे चुके फ़रवरी के महीने कायनात में बिखरे होंगे. कायनात के पैमाने पर क्या फ़रवरी, क्या मार्च. हमारे पैमाने पर फ़रवरी के माने हैं. तभी तो मार्च में फ़रवरी पर कविता लिखते हुए तमाम बीती फ़रवरियों का एहसास होता है. फ़रवरी में मौसमों की आवाजाही की बात. गुज़र चुके और आने वाले के बीच के क्षण. इस साल की फ़रवरी बीत गई. अगले साल मुलाक़ात हो शायद.

6.
मार्च भी गुज़रने को है.
फ़रवरी कब की जा चुकी है. गर्मी रोज़-ब-रोज़ बढ़ती जा रही. धूप तेज़. शाम आते-आते ठण्डी बयार. फ़रवरी को गए ज़्यादा दिन नहीं हुए. सुबह सोकर उठता हूँ थका हुआ. साल-दर-साल की आवाजाही में फ़रवरी को थकान नहीं होती होगी? कभी वह जुलाई या नवम्बर के साथ सुस्ताने बैठ जाए. जनवरी में ऐसी नींद सोए कि आने की सुध ही न रहे. फिर जनवरी के बाद कौन आएगा? एक महीना ख़ाली इन्सान क्या करेगा? झगड़े-फ़साद एक महीने के लिए रुक जाएँ. एक महीने दुनिया फ़रवरी का सपना देखे. सपने में देखे मई, जून. चिलचिलाती धूप. बारिश. सपने में गले मिलें उनसे भी जिनसे सदियों की शिकायतें हों.
7.
अप्रैल में फ़रवरी.
अप्रैल आते-आते नज़र को चटख धूप की आदत पड़ जाती है. मौसम का रोना रोए, या दुनिया का, या दुश्मनी निभा रहे दोस्तों का, या फ़रवरी के गुज़रने का. कोई ज़ख़्मों को बार-बार कुरेदता. चेहरा देख आईने बुझ जाते. कोई उम्मीद बर नहीं आती. सूरतें नज़र आती भी हैं तो बहुत दूर. ख़ुद को तैयार करूँ अगले महीनों के लिए. खिड़कियों, दरवाज़ों पर पर्दे टाँग दूँ. धूप तेज़ होगी धीरे-धीरे. दीवारों पर लगे जाले बाद में साफ़ करूँगा.
8.
मई में सुबह-सुबह उठ जाऊँ तो फ़रवरी मिल जाती है. सूरज थोड़ी देर बाद बताता आज की तारीख़. बेरहम कोई रियायत नहीं देता. आज की तारीख़. किसी ने राष्ट्रीय सुरक्षा का सिक्का हवा में उछाल दिया. आसमान चमकीले ग़ुबार में लिपट गया. सिक्का गिरता है और ज़मीन में दरारें पड़ जाती हैं. मई की तपिश में झुलसे हुए सायों का जुलूस सड़क पार करता. मैं फ़रवरी खोजता गलियों में भटकता. हर मोड़ पर मलबे. टुकड़ा-टुकड़ा छाँव. बिखरी ईंटों के बीच फुदक रही गौरैया. फ़रवरी के गुज़रने की ख़बर उसे भी है. यह मई है. मुल्क झुलस रहें. मैं फ़रवरी की आस में तुमको चिट्ठियाँ लिख रहा.
9.
फ़रवरी की बातों में मई भी गुज़र गई. रास्ते में आने वाले और दिन, महीने भी गुज़रेंगे. एक सड़क बताएगी सुकून का रास्ता. उस सड़क का रास्ता कौन दिखाएगा?
फ़रवरी आईने में है. आईने के सामने जून. मौसमों पर क़हर बरपा हुआ है. कोई चेहरों को वीरान कर जंगल के ख़त्म होने का जश्न मना रहा है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक सरहदें ही सरहदें. किन-किन लकीरों तले कुचली जाएगी फ़रवरी!
रुँधी आवाज़ में बार-बार पुकारती फ़रवरी. कोई ठहरेगा इंतज़ार में?
10.
जून घिसट-घिसट कर ख़ुद से गुज़र जाना चाहता है. कहीं बारिश. कहीं क़यामत. कहीं ज़मीन पर गिरता लहू सूखता ही नहीं. कोई कैसे कहे क़यामत का दिन कोई और. फ़रवरी की सूरत नज़र नहीं आती.
टूटी हुई फ़रवरियों का शाप इस सदी का पीछा नहीं छोड़ता. रुदन. और रुदन. मानसून के बादल कहीं अटक गए. सड़क पर टूट पड़ी लू. सुध-बुध खोया मैं कमरे में सुरक्षित हूँ. कविता की सुविधा. ज़िन्दा रहने की सुविधा. फ़रवरी के सपने देखने की सुविधा. यह झीना पर्दा ही सही बचाए रखना चाहता हूँ. बचा रहना चाहता हूँ. मुलाक़ात होगी फ़रवरी से.

11.
आँखें बन्द करता हूँ और गुज़रे दिन, महीने, साल तड़पने लगते हैं.
जुलाई बरस रही है. लगता है जून को गुज़रे एक ज़माना हो गया और फ़रवरी बस अभी-अभी ही तो गुज़री है.
नज़र फेरता हूँ और शहर-दर-शहर खंडहर दिखते हैं. आवाज़ें. हर तरफ़ से आती हुई आवाज़ें. यादों की ज़बान उग आई है. लगता है एक हाथ छूटा तो दूसरे हाथ ने थाम लिया. प्यार करने की कोशिश में हम लहूलुहान हो गए.
अगली फ़रवरी तक ज़ख़्म याद बन जाएँगे. तब रोएँगे इस जुलाई का रोना. किसी नदी किनारे बैठकर.
12.
अगस्त एक टूटा हुआ पुल है. पुल के बीचोंबीच लहलहाते पेड़ की शाख़ों पर बेचैन रूहें भीग रहीं. एक पत्ते से फिसलती दूसरे पर. दूसरे से तीसरे. यूँ फिसलते-फिसलते वे नदी से जा मिलेंगी.
पुल किनारे बैठ हम नदी को निहारते. नदी हमें. बचपन में बहाई काग़ज़ की कश्तियाँ कायनात घूमकर इसी किनारे आ रही हों. इस ख़्याल की मासूमियत पर तुम मुस्कराते. क्या सचमुच कोई कश्ती नहीं आ रही!
फ़रवरी की तलाश में एक कश्ती ख़्वाब में बहाएँगे.
13.
एक अदना शख़्स की ज़िन्दगी में एक महीना क्या कुछ मायने रखता है? कविता को जवाब पता है. अदना-सा जवाब. गहरा.
पर अदनापन मुझे डराता है. इस डर से मैं अगस्त के साथ चुपचाप बैठा रहा. देश-दुनिया की ख़बरें रात के सायरन की तरह बार-बार चौकन्ना करतीं. नींद तोड़तीं. पर ख़ुद को बचाए रखा. इस आस में कि एक दिन फ़रवरी देखूँगा.
14.
सितम्बर को विदा कहने का समय आ रहा. फ़रवरी के थोड़ा और क़रीब पहुँच गया.
एक महीना गुज़रता, एक आता. ख़बरें बनी रहतीं. जलते-बुझते ख़्वाबों की रूहें हवा में तैरतीं.
फूलों और रंगों की तलाश में हम दूर-दूर भटकते. एक फूल हर ख़्वाब के लिए. कोई यार के घर ख़ाली हाथ न जाए. डरता हूँ, अगर फ़रवरी के महीने में फ़रवरी न मिली तो! कोई फ़रेब नामुमकिन नहीं.
पर फ़रवरी तो मुमकिन है.
15.
दिन और रात यूँ ही गुज़र जाते. मैं हाथ मलता रहता. समय फिसलते-फिसलते दूर चला जाता. और जो दूर था वह सामने आ खड़ा होता. अजीब चाल समय की. गुज़रे हुए दिन कभी दूर लगते, कभी पास. जैसे अक्टूबर में लगता अभी तो गुज़री है फ़रवरी और अगली के आने में अभी वक़्त है. अपने ही ख़्याल पर मन मुस्कराता.
तुम्हारी दुनिया को मुबारक हो यह मासूम मुस्कान. अक्टूबर को मुबारक हो फ़रवरी.

16.
आज का दिन यह सोचते हुए गुज़रा कि तुम्हें कैसे प्यार करूँ. अक्टूबर में अक्टूबर बनकर. या नवम्बर दिसम्बर जनवरी की राह होते हुए फ़रवरी का इन्तज़ार बनकर. और अक्टूबर में न जाने कहाँ से थोड़ी जून और जुलाई भी आ जाती है.
तुम्हारे बदन की हसरत करते हुए सदियाँ गुज़ार दूँ. सदियों पहले मिली थी फ़रवरी. सदियों बाद भी मिलेगी क्या. जैसे ख़्वाब मिल जाते हैं.
अक्टूबर के अधूरे इंक़लाबों का ख़्वाब. उन ख़्वाबों से प्यार करूँ. लैला या फ़रहाद बनकर. दुआ करता कि ख़्वाबों को तितलियों के पंख मिल जाएँ और वे हर गली, हर गाँव, हर शहर, हर मुल्क में फैल जाएँ. हम अपनी लहूलुहान रूह के दर्द को महसूस करें. उसे ख़्वाबों की ज़रूरत है. हवा में तैरते ख़्वाबों को छू लें. अक्टूबर को महसूस करें. महसूस करें फ़रवरी को.
17.
कभी-कभी ऐसा लगता है कि नवम्बर सिर्फ़ यह जताने के लिए होता है कि अक्टूबर चला गया और दिसम्बर आने वाला है. एक रिमाइंडर.
कोई उड़ने वाले को याद दिलाए उसे ज़मीन पर बैठकर सुस्ताने की ज़रूरत है. कोई याद दिलाए ज़मीन पर पहली बार अपने पैरों पर चलने का वह पल. कोई याद दिलाए घास और पत्ते और गौरैया और कौवे और जुगनू और चील और हाथी और खिड़कियाँ और दोपहरें और कच्चे रास्ते और हमने बारिश में टूटकर प्यार किया. कोई याद दिलाए हमारे वजूद का पहला क्षण. कोई याद दिलाए कि हमारे होने या नहीं होने से बहुत फ़र्क़ पड़ता है और कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. कोई याद दिलाए ख़ुशियों और उदासियों के पल. कोई इश्क़ की याद दिलाए. कोई संगी-साथियों की. कोई उस नदी की याद दिलाए जिसके उस पार ज़िन्दगी की एक पोटली छूट गई थी. कोई उस उम्र की याद दिलाए जो हम मुकम्मल जी न सकें. कोई राजा को याद दिलाए वह मृत्यु से बच नहीं सकता. कोई याद दिलाए कि पृथ्वी की उम्र पिरामिडों से भी कहीं ज़्यादा है.
कोई याद दिलाए दिसम्बर.
कोई याद दिलाए फ़रवरी.
18.
यातनाओं का सिलसिला ख़त्म होगा कभी. थके हुए जिस्मों का कारवां धरती के पहले पेड़ की छाँव तले बैठेगा. छूटे हुए घर, नदी और पहाड़ याद आएंगे. दिलों की कड़वाहट आंसुओं में बह जाएगी.
यह उम्मीद है या प्रार्थना. या महज़ एक ख़्वाब.
जैसे नवम्बर में फ़रवरी का सपना.
19.
बहुत सारी शिकायतों, निराशाओं, उम्मीदों और सपनों को पोटली में बाँधकर आगे बढ़ने का वक़्त आ गया. साल का आख़िरी महीना है दिसम्बर− याद है न? बिलकुल याद है, जैसे याद फ़रवरी.
थकी हुई ज़बानों में हम अगले वक़्तों का इश्तहार पढ़ते. कोई लफ़्ज़ दिलासा नहीं देता. पर ज़िन्दगी नाउम्मीदी में भी जीने के रास्ते खोज लेती है. दोस्तों, अज़ीज़ों के चेहरों पर चिन्ता की वही लकीरें. आने वाले वक़्त न जाने क्या होगा. और कोई मजनूँ बन सोचता फ़रवरी तो आए, फिर आगे की देखेंगे.
हमारी निराशाओं से बड़ी है कायनात. अंधेरे से बड़ी होगी रोशनी की आमद. हम फिर भी टूटेंगे. बिखरेंगे. साये गहराएँगे और फट जाएँगे. इन अँधेरों में भी इश्क़ करेंगे. बार-बार. जैसे पहली बार. और हमारी रूहों में तड़पेंगी आज़ादी की धुनें. आने वाली फ़रवरी का संगीत.
20.
सबसे उदास करने वाला होता है दिसम्बर. लगता सब कुछ जल्दी-जल्दी बीत जाना चाहता. किसी को ठहरने के लिए कहना, मानो किसी प्राकृतिक नियम की मुख़ालिफ़त करना. चलते रहने की ऐसी आदत पड़ गई कि रुकना गुनाह है. हम ठहरने की गति भूलते जा रहे. भूलते जा रहे कि दिसम्बर दो कैलेण्डरों के बीच का ठहरा हुआ पड़ाव है. अब फ़रवरी आने में ज़्यादा वक़्त नहीं. तो दिसम्बर में ठहर जाते हैं.
सिर झुकाकर दुआ माँगेंगे उन तमाम पलों के लिए जो बीत गए, जो आने वाले हैं. दुआओं में वे तमाम हाथ होंगे जिन्होंने हमको थामा. कायनात उन हाथों में बरकत बख़्शे. और जो हाथ नेकी में नहीं उठे उन्हें सलाहियत दे. नेकी और भलाई की ज़रूरत हर शय को है.
दिसम्बर हिसाब-किताब के लिए नहीं ठहरने के लिए है. फ़रवरी के इन्तज़ार को महसूस करने के लिए है.

21.
कभी-कभी लगता है दिसम्बर एक शान्त संगीत है. आधी रात. वायलिन की उदास धुन. उम्मीदों से भरा एक और दिन, महीना और साल गुज़र गया. अब हम उन उम्मीदों को खोज रहे हैं. जैसे किसी अजनबी हो गए चेहरे पर खोजते हैं गुज़रे ज़माने का अपनापन. याद दिलाते बार-बार हम वही हैं. पर यह अजनबी परत कौन है, किसकी है.
इन्हीं कचोटते सवालों का महीना है दिसम्बर. एक और साल जुड़ गया धरती की उम्र में. सूरज थोड़ा और बूढ़ा हो गया. और इंसान.
हम दिसम्बर की गलियों में भटक रहे हैं. एक और गुज़र चुके साल की राख में आने वाले वक़्त की चिंगारियाँ खोजते हुए. और थोड़ी मिट्टी, हवा, पानी. जनवरी में लगाएँगे पौधे फ़रवरी के नाम.
यह महज़ एक ख़्वाब है. फ़िलहाल दिसम्बर है. साल गुज़र जाने से पहले बहुत कुछ याद करना है. उस फ़रवरी को भी जो गुज़र गई.
22.
दिसम्बर क्या करता होगा इतने सारे अलविदा संदेशों का. इंसान की ज़िन्दगी के साल-दर-साल गुज़र जाते हैं. अनगिनत विदाइयाँ. पर कुछ है जो ठहरा रहता है. अजीब डायलेक्टिक्स.
कहीं कुहरे में ढँका ठिठुर रहा दिसम्बर. कहीं दोपहर धूप की नींद सो रहा दिसम्बर. समय की चाल. सियासत की चाल. दिसम्बर को फिसल ही जाना है.
इस बीच हमने टाल दिए हैं अपने अलविदा संदेश. किसी फ़रवरी के आने तक.
23.
जनवरी एक रस्म की तरह आती है.
हमने सोचा था किसी नई शुरुआत का महाकाव्य लिखेंगे. पीर में डूबी धरती के लिए कोई नया सपना बुनेंगे. कैलेण्डर के साथ बदलेंगे दिन. मासूम ख्वाहिशें घर के हर कोने में तलाशती किसी अप्रत्याशित की सम्भावना. कहीं कुछ तो होगा अनदेखा अनछुआ जो मिल जाए तो न जाने क्या हो जाए. पर हर जगह मिलती एक नई बेचैनी. हर कोने थकी हुई एक उम्मीद. जनवरी को नाहक ही किसी ने ख़ास बना दिया. ज़हन में सपनों का खेल चलता.
जनवरी थककर बैठ गई. और नहीं चला जाता ऐसे. थककर बैठ गई धरती. फ़रवरी के आने में अभी वक़्त है.
24.
रह-रहकर कौंधता तुम्हारा चेहरा. एक पूरी उम्र गुज़ारकर भी हम अजनबी बने रहे. जैसे अजनबी बनी हुई जनवरी. बेहिसाब जनवरियाँ. जैसे बेहिसाब ज़ुल्म. एक-दूसरे को लानतें भेजते हमने परिचय की एक नई डोर बाँध ली. जनवरी को सुनाएँगे एक नया क़िस्सा. एक और उकताए हुए साल को काटने की और भी तरकीबें होंगी. फ़रवरी में खोजेंगे.
25.
जनवरी उन तमाम सड़कों सरीखी है जहाँ जाने का ख़्वाब देखा था.
जान-पहचान वालों के चेहरे देखता हूँ तो अपनी ढलती उम्र याद आती है. हम किन-किन मक़ामों से आगे बढ़ आए. थोड़ा-सा.
थोड़ा वहीं ठहरे हुए हैं. वहाँ ठहरे हुए अपने आज को याद कर रहे हैं. दिसम्बर में गुज़रा हुआ साल याद किया था. जनवरी में गुज़री हुई उम्र याद कर रहे हैं. आगे की फ़रवरी में सोचेंगे.
26.
किसी रोज़ वक़्त निकाल कर कहेंगे अपनी-अपनी ज़िन्दगियों के क़िस्से. उसी पेड़ के नीचे बैठकर जिसकी परछाईं में आज भी थककर खड़े हो जाते हैं. लू भरी दोपहरियों में उड़ती धूल. जनवरी कब की बीत चुकी होती है. इतनी ज़्यादा कि मई-जून में कोई जनवरी की बात भी नहीं करता.
क़िस्सों में हम खोजेंगे एक-दूसरे को. जैसे शाम को आवारगी करते हुए टकरा गए. अप्रत्याशित. कहीं मुस्कराते हुए फ़रवरी दिख जाएगी. या उसका अक्स. हवा सब कुछ बहा ले गई. क़िस्सा कहाँ शुरू हुआ और कहाँ ख़त्म. किसे ख़बर.
फ़रवरी अब थोड़ी ही दूर है. क़िस्से ख़त्म होने को बेताब क्यों हैं.
27.
फ़रवरी एक ख़बर-सी आई है. बेमतलब बहस की तरह.
सपने मेरी जेब से बाहर निकल सड़कों पर फिर रहे हैं. किसी रवायत की तरह आपस में उलझे हुए. वो इन्तज़ार था जिसका ये वो सहर तो नहीं.
अंतहीन रुदन और बग़ावत के बीच अनिश्चय में ठहरी हुई फ़रवरी.
28.
धरती और आकाश की मुट्ठियाँ रंगों से भरी हुई हैं. कुहरा. खिड़की से आती धूप. इंकार करते लोग. घोंसला बनाने की जगह ढूँढता गौरैया का जोड़ा. कोने में दुबकी छिपकली. दीवार. छलाँग लगाती बिल्ली.
छलाँग लगाता वक़्त. साल-दर-साल. महीना-दर-महीना.
फ़रवरी-दर-फ़रवरी.
(ऊपर की सभी तस्वीरें कवि द्वारा ही खींची गई हैं.)
| लोकेश मालती प्रकाश (देवरिया, उत्तर प्रदेश) कवि, लेखक व अनुवादक तमाम प्रगतिशील आन्दोलनों से जुड़ाव रहा है. कविताएँ व लेख विभिन्न पात्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित. एकलव्य द्वारा प्रकाशित ‘बस्ते में सवाल’ पिक्चर बुक ख़ासतौर पर बच्चों व किशोरों के लिए. एकलव्य संस्था के प्रकाशन कार्यक्रम में सम्पादकीय कामकाज के लिए पब्लिशिंग नेक्स्ट के एडिटर ऑफ़ द ईयर अवार्ड 2025 से सम्मानित. भोपाल में रह रहे हैं. |




स्मृतियाँ। बिंब। दृश्य। रूपक।
कुछ बेख़याली। कुछ सजगता।
इच्छाएँ। वानस्पतिक कामनाएँ।
कुछ जाग। कुछ नींद। कुछ स्वप्न।
कह देना। और कहने से रह जाना।
इनका अधूरापन। अतिरिक्त कहन।
कुछ मुश्किलें। कुछ आसानियाँ भी।
यहाँ से कुछ इसी तरह गुज़रना हुआ।
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लोकेश को बधाई।
अरुण का सुंदर ढंग
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