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Home » इस धुंध में हितैषी कोई नहीं : कुमार अम्‍बुज

इस धुंध में हितैषी कोई नहीं : कुमार अम्‍बुज

2025 में जब लास्लो क्रास्नाहोर्काई को नोबेल पुरस्कार मिला, तब उनके उपन्यास Satantango पर आधारित बेला तार की लगभग सात घंटे लंबी फिल्म भी चर्चा में आ गई. जिसके बारे में सूसन सौन्टैग ने कहा था कि वे इस फिल्म को जीवन भर देखते रहना चाहेंगी. इसका विध्वंसात्मक सम्मोहन ही कुछ ऐसा है. इस फिल्म को देखना और लिखना आसान नहीं है. विश्व सिनेमा की अपनी चर्चित श्रृंखला में कुमार अम्बुज ने इस फिल्म का समानांतर पाठ प्रस्तुत किया है. यह दुनिया भले ही अब बाहर न दिखाई देती हो, पर जैसे उसने हमारे भीतर स्थायी जगह बना ली हो. एक तरह का कबाड़ जो हमारे भीतर फैलता चला गया है. इसका शीर्षक आज की राजनीति का भी एक सटीक रूपक लगता है. कुमार अम्बुज ने गद्य को जिस ऊँचाई पर पहुंचा दिया है, वह अपने आप में एक आकर्षण है. इसके निर्देशक बेला तार इसी जनवरी में हमसे विदा हो गए. यह अंक उनके प्रति आभार व्यक्त करने का भी एक विनम्र प्रयास है. होली के अवसर पर यह विशेष अंक प्रस्तुत है. आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी.

by arun dev
March 2, 2026
in फ़िल्म
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इस धुंध में हितैषी कोई नहीं : कुमार अम्‍बुज
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इस धुंध में हितैषी कोई नहीं

दुष्‍टता का परिक्रमा नृत्‍य


कुमार अम्‍बुज

पूर्वाभास

 

(एक)

इस वक्‍़त इस गाँव में अजीब, रहस्यमयी आवाज़ें उठती हैं.
अलसुबह में सुबह होने की आहटें. मद्धिम ध्‍वनियाँ. घंटियों की. किसी के बेआवाज़ चलने की. चुप्‍पियों की. निर्जनता की. बारिश की. नींद में कुछ टूटने की. सपनों की. गोपनीय सरसराहट की. कीचड़ में अलसायी हलचल की. आवाज़ें ही आवाज़ें. उदासी और कोहरे में से निकलकर आतीं पेचीदा पराध्‍वनियाँ. अश्रव्य. ये धर्मस्‍थलों से उठती हैं. या देह में संचित धीमी कराहों से. अनिद्रा में आवासित भ्रम से. अज्ञात दिशाओं से. लगता है सब तरफ़ से. अदृश्‍य कंपन से. और कहीं नहीं से.

यह रोज़ाना का दोहराव है. कोई लंबा शॉट. उबाऊ. क्‍लांत. आशा रहित. अब मैं यहाँ से दूर चला जाऊँगा. शहर में जाकर चौकीदार बन जाऊँगा. किसी हॉस्‍टल में काम कर लूँगा. बस, दो रोटी और सिर छिपाने की जगह मिल जाए. वहाँ जीवन कुछ हद तक तो दिलचस्‍प होगा, उसकी सुंदरता सुबह-शाम की खिड़की में से गुज़रते हुए देखूँगा. अभी तो जीवन मुझे गुज़रते हुए देख रहा है. मर्मर और फुसफुसाहट से भरी इस अर्धपारदर्शी सुबह में.
इस खुले में. बारिश में. कीच में.

पत्ते हिलते हैं तो शीत की पवनचक्‍की चलती है. निर्धनता की लक्ष्‍मण रेखा से कीलित यह गाँव. हम यहाँ से बाहर नहीं जा सकते. इंतज़ाम ऐसा है कि निर्धन अपनी ध्‍वस्‍त जगहों पर बने रहें. बाक़ी अपनी जगह पर. अपनी-अपनी हदों में. ग़रीबी-अमीरी की प्रत्‍येक संधिरेखा पर पुलिस तैनात है. भेद इतना साफ़ है कि ग़रीबों के नाम, पते, परिचय पत्र कुछ देखने की ज़रूरत नहीं. पुलिस को दूर से ही दरिद्र पहचान में आ जाते हैं. बिना काग़ज़ देखे ही वह उन्‍हें गिरफ़्तार कर लेती है. उनका बचा-खुचा नाकुछ भी ज़ब्‍त करके, उन्‍हें भूख और सीलन से भरी उन्‍हीं बस्तियों में वापस धकेल दिया जाता है जिनसे निज़ात पाने के लिए वे वहाँ से निकले थे.

रिश्‍वत देकर केवल उनके काम होते हैं जिनका रुपया पुलिस हज़म नहीं कर सकती. ग़़रीब पैसा खोकर भी शिकायत नहीं कर सकते. वे बस एक उजाड़ से दूसरे उजाड़ की तरफ़ यात्रा करते हैं. एक दरिद्रता से दूसरी दरिद्रता की तरफ़. एक हिमपात से दूसरे हिमपात की ओर. आशा के वाहन में बैठकर निराशा की दिशा में. सुविचारित व्‍यवस्‍था है. और यहाँ हमेशा की तरह बारिश हो रही है. रास्‍तों पर कीचड़ बढ़ता ही जाता है. राह के बीच में कहीं-कहीं रुका पानी अपनी क़ैद भरी उदासी में चमकता है. उसी मटमैले दर्पण में स्‍याह आसमान भी अपना चेहरा देखता रहता है.

Satantango से एक दृश्य

(दो)

सामूहिक कृषि फ़ार्म का मज़दूर भुगतान में मिले सारे रुपये लेकर, इस नरकग्राम से भाग जाना चाहता है. एक दूसरा उसमें अपनी हिस्‍सेदारी चाहता है. कि तुम मुझे आधा पैसा दो. हिस्‍सा करने में ज़रा सी देरी से भी गहरा अविश्‍वास पैदा होता है. धोखे के काम में जो ईमानदार नहीं वह मनुष्‍य कहलाने लायक़ नहीं. और इधर आकर, इस लैम्‍प की रोशनी में पैसा बाँटो. पारदर्शिता के लिए रोशनी ज़रूरी है. जो लूट में बेईमानी करता है वह पतित है. याद रखो, पैसे की गंध मरे हुए लोगों को भी आती है. वे क़ब्र से उठकर अपना पैसा माँगने आ सकते हैं. फिर मैं तो जीवित हूँ. जल्‍दी करो. इससे पहले क‍ि वे ज़मींदार, फॉर्म मैनेजर या गुंडा- उन्‍हें जो भी कहो, यहाँ आ धमकें. उनके मरने की अफ़वाह झूठी है. अमीर आततायी मुश्किल से मरते हैं.

उन्‍होंने जानबूझकर अपने मरने की ख़बर फैलायी है ताकि हम यहाँ निश्चिंत रहें और वे हमें धर दबोचें. इसलिए जल्‍दी करो. पैसे की खनक उन्‍हें हमारा पता बता देगी. वे अचानक प्रकट हो सकते हैं. पैसे की आहट मात्र साहूकारों को चैतन्‍य कर देती है. शिथ‍िल आदमी भी यकायक तेजस्‍वी और सक्रिय हो जाता है. और कुछ लोग तो पैसा बनाने के जादूगर होते हैं. उनके पास पैसे से पैसा बनाने की इच्‍छा होती है. इच्छाशक्ति ही कीमियागरी है. और उनके पास बंदूक़ भी है. पैसा और हथ‍ियार- ये दो चीज़ें हों तो फिर और ज़्यादा पैसा कमाने की अक्‍़ल भी आ ही जाती है.

और सोचो, हम हर तरह से विपन्न लोग हैं. इन गुंडों से बचना मुश्किल होगा. हम भागकर कहाँ जाएँगे? वे हमें बर्फ़ के नीचे से भी खोद निकालेंगे. वे ध्रुवीय भालुओं की तरह हैं. यों भी बलशालि‍यों का पैसा हज़म करना आसान नहीं. अपच. मलबंध. और वमन. कुल मिलाकर मनी-पॉइज़निंग हो सकती है. धन के मामले में कोई किसी का विश्‍वास नहीं कर पाता. निकटतम रिश्‍तों में भी नहीं. लो, सिगरेट पिओ, और भागने की योजना बनाओ. यह मत सोचो कि भाड़ में जाए पैसा. याद रखो, मुट्ठी में पैसा हो तो आसानी से कोई तुम्‍हारी मुट्ठी नहीं खोल सकता. पैसे से जो ख़ुशी मिलती है वह और किसी चीज़ से नहीं मिल सकती. दुनिया में कोई भी जगह इस जगह से बेहतर होगी. क्‍या हुआ जो बारिश है, कीचड़ है और राह लंबी है. पैसे के लिए कीच में सफ़र करना ही पड़ता है. फिर एक चमचमाती दुनिया हमारे सामने होगी. पैसे बाँटो और चलो. अभी अँधेरा है, धुंध है लेकिन उजाले की आशा है. यक़ीन रखो, उधर हमारा जैसा भी पुनर्जन्‍म होगा वह इस जनम से तो अच्‍छा ही होगा.

 

पक्‍की ख़बर है कि वे दोनों कभी मरे ही नहीं थे. और अब वे आ रहे हैं. वे जो तुम सबको काम पर लगाकर गए थे. ठेके पर. कि सामूहिकता में खेती करो, मज़दूरी मिलेगी. और तुम दो लोग, सबका पैसा लेकर यहाँ से रफ़ू चक्‍कर होना चाह रहे हो. बिना यह सोचे कि तुम्‍हारे लिए संसार में कोई दूसरी जगह भला कहाँ सुरक्षित हो सकती है. सभ्‍यता का नियम मत भूलो : दरिद्रों का विस्‍थापन भी दरिद्रता में ही होता है. या एक चक्‍करदार रास्‍ते से घूमकर वे वापस वहीं आ जाते हैं, जहाँ से चले थे. यही उनका परिक्रमा पथ है. यही शैतान का नाच है.
छह क़दम आगे, छह क़दम पीछे.
टैंगो नृत्‍य. चक्राकार.

उधर वे दोनों ख़राब मौसम में भी तूफ़ानी चाल से चले आ रहे हैं. उन्‍हें अपना पैसा वसूलना है. उन्‍हें आशंका हो चुकी है कि कुछ मज़दूर उनका पैसा लेकर भाग सकते हैं. वे हवाओं की दिशा में चल रहे हैं. उनकी रफ़्तार इतनी तेज़ है कि पीछे छूटी हुई जगह में पत्‍ते उड़े चले आते हैं. जैसे आँधी में. ये दो जन पैसे की दिशा में यात्रा कर रहे हैं. उन्‍हें कोई नहीं रोक सकता. मगर पुलिस रोक सकती है. पुलिस से बड़ा कहीं कोई नहीं. और फिर यह तो गुप्‍तचर विभाग है. उनके आगे तुम दो लफ़ंगे एकदम मामूली हो. तुम्‍हारी पूरी जन्‍मपत्री पुलिस के पास है. अब तुम यहाँ से आगे नहीं जा सकते. तुम्‍हारे परि‍चय पत्र संदिग्‍ध हैं. तुम घुमंतु प्रजाति के हो. बंजारे हो. चोर हो. बेरोज़गार हो. अब तुम्‍हारे जीवन का निर्णय जाँच अधिकारी की मर्ज़ी पर है. फाइल कह रही है कि अपराध ही तुम्‍हारी आ‍जीविका है. तुम हमेशा झगड़ा-फ़साद करते हो. आदतन. तुम क़ानून के लिए ख़तरा हो.

अब हमें तुम अपने बाप-दादाओं का हवाला मत दो कि वे अच्‍छे आदमी थे. यहाँ मामला तुम्‍हारा है, तुम्‍हारे पितामह का नहीं. हमारे सामने दयनीय मत बनो. ऐसा अभिनय हम रोज़ाना देखते हैं. हम क़ानून हैं. हमारे पास एक हज़ार अतिरिक्‍त इंद्रियाँ हैं. तुम मुश्किल से पकड़ में आए हो. तुम ऐसी आदमजात हो कि स्‍वतंत्रता मिले तो अराजक हो जाती है. तुम जैसे शोहदों के लिए बंधन अनिवार्य है. तुम्‍हें यहाँ से छूटना है तो तुम्‍हारे सामने केवल दो विकल्‍प हैं: पहला- हमारे लिए मुख़बिरी करो. दूसरा- कोई विकल्प नहीं. यानी सींखचों में पड़े रहो. यदि तुम पहला विकल्‍प चुनोगे तब भी रहोगे तो अपराधी ही लेकिन हमारे साथी बनकर रहोगे.

Satantango से एक दृश्य

(तीन)

अब हम बढ़े हुए आत्‍मविश्‍वास के साथ आगे बढ़ सकते हैं. हमारी चक्रवाती चाल देखो. तुम हमें गुंडे समझते हो लेकिन अब हम पुलिस की तरफ़ से भी हैं. लाओ, पिछला पैसा लाओ. तुम भाग नहीं सकते. और आगे भी तुम्‍हें काम करना पड़ेगा. मज़दूरी जो हम तय करें उतनी. वरना हम तुम्‍हारे साथ वही करेंगे जो पुलिस कर सकती है. बल्कि हम कुछ ज्‍़यादा कर सकते हैं. वह क़ानून से बँधी है, हम नहीं. पैसे के मामले में हमसे दग़ा करोगे तो कठोर सबक सिखाएँगे. हम तुम्‍हारे दसों दरवाज़ों में बम लगा सकते हैं.
मनुष्‍य क्‍या है? महज़ दस द्वारे का पींजरा.
हम पूरे पिंजरे में बम लगा देंगे.

हम भी जानते हैं कि यह मनहूस इलाक़ा है. हमें मजबूरी में यहाँ आना पड़ता है. इस तरफ़ की तमाम कर्कश आवाज़ें हमें भी अच्‍छी नहीं लगतीं. टुन-टुन की. टन-टन की. एक-दूसरे से टकराने की. घर्षण की. सूँ-सूँ करती हवा की. हम भी चाहते हैं कि हर वह आवाज़ जो हमें पसंद नहीं, बंद होना चाहिए. जैसे तुम्‍हारे घिघियाने की. किसी भी तरह के प्रतिवाद की. यह शराबख़ाना हमारा है. रास्‍ते में पड़नेवाली हर चीज़, हर सहूलियत हमारे लिए है. और तुम हमसे पैसे नहीं माँग सकते. पैसा माँगनेवालों को हम गोली से उड़ा सकते हैं. और हर उस चीज़ को, जो ऐसी कुछ आवाज़ करे जो हमें अच्‍छी न लगे. और जो हमारे रिवॉल्‍वर को भी पसंद न आए.

फिलहाल हमारी चिंता यह है कि कोई बदमाश किसान माल-असबाब, रुपया लेकर, गाँव से ग़ायब न हो जाए. यदि हमें पैसा न वसूलना हों तो हम इस बदनसीब मौसम में, इस बदनसीब कीचड़ भरे रास्‍ते पर चलकर, इस बदनसीब गाँव में क्‍यों आना चाहेंगे. पैसा कहीं की भी यात्रा करा सकता है. यही हमारे जीवन का दर्शन है. पैसा है तो जीवन है. लेकिन हमें कुछ भरोसा है कि उनमें भागने की हिम्‍मत नहीं होगी. वे ऐसे मज़दूर हैं कि ग़ुलाम हैं. नष्‍ट होती जगह भी उनसे नहीं छोडी जाएगी. आग लग जाएगी तब भी वे वहीं बैठे रहेंगे. किसी कोने में. छत से रेत या बारिश गिर रही होगी तो वे किसी दूसरे, तीसरे, चौथे या सातवें कोने में बैठ जाएँगे. हमारे पैसे की रक्षा करना ही उनके जीवन का सार है. हमें उनके संस्‍कारों पर यक़ीन है. वे रोएँगे, चीखेंगे, चिल्‍लाएँगे, बद्दुआ देंगे लेकिन जब वे देखेंगे कि दूसरे लोग कुछ नहीं कर पा रहे हैं तो वे भी सिर झुकाकर अपना सब कुछ हमें सौंप देंगे.

हमें यक़ीन है कि उबले आलू खाते हुए, शीत में ठिठुरते वे हमें गाँव में ही मिलेंगे. अभी तक हमारे आतंक भरे विश्‍वास की छाया में ही वे सुख से रहते आए हैं. वे बचपन से ही शेखचिल्लियों की तरह सपने देखकर जीवन बिताने के आदी हैं. उस सुख की तलाश में जो उनके जीवन में कभी नहीं आ सकता. और कभी आएगा भी तो बग़ल से गुज़र जाएगा क्‍योंकि वे एक-दूसरे को पहचानते नहीं. और कभी किसी तरह वह मिल भी जाए तो उनके किसी काम का नहीं. अधिक सुख उन्‍हें अकाल, असमय मार देगा. दो जून का अपर्याप्‍त भोजन ही उनका पर्याप्‍त जीवन है. फिर दरी और कंबल. कभी पड़ोस में परगमन. बस, उनके लिए इतनी ख़ुशियाँ पर्याप्‍त हैं. इतनी ही सहनीय हैं. लेकिन चलो, चलते रहो. हो सकता है हमारे आने की कुछ भनक उन्‍हें लग गई हो. कभी-कभी उम्‍मीद के ख़िलाफ़ भी कुछ घट सकता है. इससे पहले कि वे कहीं भागने का विचार मन में लाएँ, हमें वहाँ पहुँचना होगा. अप्रत्‍याशित. फिर उनका सब कुछ हमारा है. स्त्रियाँ भी. वे मना नहीं कर सकते. निर्धनता मूक दास बना देती है. इसमें हम क्‍या कर सकते हैं? हम ख़ुद तो निर्धन नहीं हो सकते. लेकिन उफ़, यह बारिश. यह राह कीचड़ की है. पैसा कीचड़ है. जीवन कीचड़ है. किसी खरल में जीवन, पैसा और कीचड़ एक साथ पीस दिया गया है. त्रिफला अवलेह. इनमें कौन-सी चीज़ किस अनुपात में है, समझना नामुमकिन है.
बस, चलते रहो.

कितने भी समय के बाद भी वापस लौटो, इस गाँव में कुछ नहीं बदलता. जैसे यहाँ कोई स्‍थगन आदेश है. हर बार वही लोग, वैसे ही लोग. कुछ इधर-उधर हो जाते हैं तो वैसे ही कुछ लोग उनकी जगह ले लेते हैं. सब एक दूसरे पर अविश्‍वास करते हुए. मगर एक-दूसरे के सहारे. ये घर ज्‍़यादा उजड़े हैं या ये आदमी? ये उजड़े घरों में आदमी हैं या ये उजड़ गए आदमियों के घर हैं? कौन प्रत्‍यय हैं, कौन उपसर्ग. कौन विशेषण, कौन संज्ञाएँ? जबकि उन्‍हें सर्वनाम से ही हाँका जा सकता है. इनके लिए यही व्‍याकरण सम्‍मत है. यह गाँव दिन-रात धुंध में रहने के लिए अभिशप्‍त है. सूर्य भी इस धुंध के समक्ष निस्‍तेज है. चंद्रमा का तो कुछ पता ही नहीं चलता. रोशनी इतनी कि चीज़ों में बस इतना फ़र्क़ दिखने लगे कि वे अलग नामों से पहचानी जा सकें- ज़मीन, आसमान, आदमी, जानवर, कपड़े, बर्तन और कीचड़.
बारिश कभी-कभी बंद होती हुई दिखती है.
बंद होती नहीं है.

Satantango से एक दृश्य

(चार)

और यह मैं. इस गाँव का डॉक्‍टर. सब पर निगाह रखने की जवाबदारी भी मुझे साथ में दी गई है. इसलिए तुम सबकी दिनचर्या अपने रोज़नामचे में दर्ज करना पड़ती है. जब तुम चौंके थे. उदास हुए थे. जब तुम खिड़की से बाहर कुछ देखने की कोशिश कर रहे थे. अँगड़ाई ले रहे थे. जब तुमने भात माँगा था. जब तुम असंतोष व्‍यक्‍त कर रहे थे. हर चीज़ का अभिलेख रखना पड़ता है. तुम्‍हारे प्रेम का. व्‍याभिचार का. डर, लोभ और इच्‍छाओं का. यह भी कि तुम जीवन से कितना डरते हो. और मृत्‍यु से कितना. नया क़ानून है कि वह लोगों की संवेदनाओं, विचारों और क्रियाओं को आंकड़ों में बदल दे. अचूक. ताकि वक्‍़त-ज़रूरत उपलब्‍ध हो सके. तुम मुझे रोक नहीं सकते. यह सरकारी काम-काज में व्‍यवधान होगा. हालाँकि मैं ख़ुद परेशान हूँ लेकिन जिम्‍मेदारी से भाग नहीं सकता. रात में सोते समय भी लट्टू जलाकर रखता हूँ. कि अचानक हुए किसी खटके को, मंद्र द्रुत स्‍वरों को, हरकत को एकदम दर्ज कर सकूँ. ऋतुओं को. दृश्‍य को. अदृश्‍य को. हर गतिविधि को.
कोई गतिविधि नहीं है तो उसे भी.

यह गाँव आफ़त है. यहीं सीलन और गंदगी से अटा हुआ यह मेरा घर. आधा ढह चुका है. बाक़ी ढहने को है. याद करना मुश्किल है कि यहाँ किस पहर बारिश नहीं होती. इतनी बार बारिश होती है कि बार-बार लिखना होता है- बारिश. मैं पर्यावरण के संकट का भी ‘डाटा’ लिखता हूँ और रहवासियों का भी. ख़तरा कहीं से भी हो सकता है. दरअसल यह इतना उबाऊ और थका देनेवाला काम है कि शराब न हो तो संसार में कोई भी इस काम को कर नहीं सकता. इसलिए पीता रहता हूँ. अपने स्‍वास्‍थ्‍य का जोख़ि‍म उठाकर भी जिम्‍मेदारी उठाता हूँ. दर्पण देखता हूँ तो सोचता हूँ कि मेरा यह मोटापा भी दुनिया की अजीब शै है. मेरे मरने पर भी यह ख़त्‍म न होगा.

यहाँ सब दूर बारिश है मगर पीने के पानी का संकट है. ख़ुद मुझे इसके लिए मेहनत करना पड़ती है. यहाँ प्‍यास सब जगह पसरी है. ढहते गलियारों में. साँवली धुंध में. मोमबत्ती से उठते प्रकाश स्‍तंभों में. कामनाओं में. उनकी परछाइयों में. वासनाओं में. यह भी प्‍यास है. शरीर की ज़रूरत है. काम की पुकार उठती है. बुढ़ापा निराशाजनक उत्‍तर है. मेरी इच्‍छा और अक्षमता. दोनों वास्‍तविक हैं. और इस विपन्‍न गाँव में हर सुख की एक मामूली क़ीमत है. लेकिन हर कोई यहाँ एक-दूसरे से पूछता है- पैसा? कहाँ है पैसा? यहाँ आम्रपाली भी भूख का शिकार है. उसका एक घर है. बच्‍चे हैं. वे सब शीत में न जाने किसकी राह तकते हैं. और इन्‍हीं हालात में वे दो तड़ीपार, मज़दूरों से पैसा वसूलने आ रहे हैं. पाई-पाई का हिसाब लेने. एक उम्‍मीद है कि जब इन गुंडों, मुख़बिरों को पैसे मिल जाएँगे तो शायद वे इन स्‍त्रि‍यों के पास भी चले आएँ. पैसे की ऊष्‍मा उन्‍हें इनकी याद दिला देगी. इस बस्‍ती में ऐसा ही अर्थशास्‍त्र है. अभी तो बर्फ़ीली हवाएँ चल रही हैं.

यह डॉक्‍टर शीतग्राम के खुले में घूम रहा है. इसे ब्राण्‍डी कब तक बचाएगी. इसके लिए कामेच्‍छा भी मानो सदि‍च्‍छा है. एक स्‍त्री इसे शीत से बचा सकती है लेकिन यह इतना अभागा है कि इसके पास उसे देने के लिए एक छदाम तक नहीं है. अन्‍यथा दो जन का जीवन बच सकता है. दरअसल यह आदमी इस जीवन से थक गया है. चलते हुए इसके पाँव बर्फ़ीले कीचड़ में धँस जाते हैं. ज़रा-सी दूरी भी इसके लिए एक डगमगाती, मुश्किल राह हो चुकी है. यह किसी भी क्षण गिर सकता. धड़ाम. तब भी इसकी देह पर यह अविनाशी बारिश निर्विकार गिरती रहेगी. यह गाँव एक कठिन देश है. यहाँ अनचाही मृत्‍यु सबकी प्रतीक्षा करती है.
यह मृत्‍यु प्रदेश है. कालग्राम.

Satantango से एक दृश्य

(पाँच)

इस अभावग्रस्‍त आबादी में भी और कुछ मिले न मिले, शराब की दुकान मिल जाती है. सबसे राहत की बात कि शराबख़ाने में कोई न कोई आदमी बात करने के लिए मिल जाता है. उतना ही विद्वान, उतना ही उत्‍सुक, जितना मदिरालय में आप किसी से उम्‍मीद रख सकते हैं. कि अब आपकी बड़बड़ाहट सुननेवाला कोई है. अपनी पीड़ा कह सकने का वातावरण है और श्रोता भी. भला और क्‍या चाहिए. वक्‍़त की मकड़ी अपना जाला बुनती रहती है.
चुपचाप. आकर्षक. मारक.

यहाँ दुर्दांत मौसम जीवन की हर मुलायम चीज़ को धीरे-धीरे कठोर बना देता है. धुंध से भरी कठोरता कपड़ों तक में समा जाती है. जैसे इसी कोट को देखो. यह पहले ऐसा न था, सुकोमल था. सब तरफ़ से लचीलापन, उदारता, कोमलता ख़त्‍म हो रही है, यह कोट इसका प्रत्‍यक्ष उदाहरण है. कठोर हो गईं चीज़ें धीरे-धीरे टुकड़ों में टूटकर बिखरने लगती हैं. पहले भीतर से. फिर बाहर से. यह समय भी ऐसा है. अनवरत एक ही मौसम अपना असर छोड़ता है. फिर बाहर की बारिश भीतर भी होने लगती है. दिन-रात. अंदरूनी अंगों तक पहुँचती हुई. अब अंतरंग और बहिरंग- सब बारिश की ज़द में हैं. ऐसे में वाइन का एक गिलास ही आदमी की कुछ सच्ची सहायता कर सकता है.

बादल गरज रहे हैं, जैसे तोपें. मानो बमवर्षक विमान. इस गाँव पर क्या पहले से कोई कम मुसीबतें हैं, जो बारिश ने भी युद्ध छेड़ दिया है. कोई निजात नहीं. चारों तरफ़ इस युद्ध में हो रहे विनाश के अवशेष दिखते हैं. और युद्धोपरांत का कीचड़. शराबख़ाना संचार-केंद्र है. ताज़ा समाचार है कि वे दोनों वापस आ ही गए हैं. सिवान तक. तुम समझते थे कि वे कहीं मर-खप गए हैं. लेकिन तुम अफ़वाहों के साथ कब तक ख़ुश रह सकते हो? वे कुल दो हैं. लेकिन सब पर भारी हैं. उन्हें पैसा चाहिए. तुम्‍हारे ख़ून-पसीने का पैसा है तो क्‍या. वे पुलिस की ताक़त के साथ आए हैं. इसलिए उनकी लूट नियमानुसार है. तुम उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते. वे बदमाश हैं लेकिन इस गाँव के मालिक हैं. मैंने ख़ुद उन्‍हें देखा है. अब क्‍या, क्‍यों, कैसे आदि सवालों का अर्थ नहीं बचा. तुमने शराब बेचकर बहुत कमाई कर ली. अब गल्‍ले में रखा पूरा पैसा देना होगा. हफ़्ता. चौथ. शांति कर. जो भी समझो. देना पड़ेगा. काउंटर के पीछे दीवार पर लगी यह सुंदर कलाकृति भी तुम्‍हारी मदद नहीं कर सकती. उन्‍हें सौंदर्यबोध से कोई मतलब नहीं. वे वसूली अभियान पर हैं.
उनका कोई परिहार नहीं.

अब तुम माथा पीटो या क्रोध में उन्‍मत्‍त होकर अपना सामान फेंको. मगर कोई उपाय कारगर नहीं होगा. यहाँ कोई बैंक नहीं. तिजोरी नहीं. घर में ऐसी संदूक़ या ऐसी चीज़ नहीं जिसकी ओट में पैसा छिपा सको. ब्‍लाउज़, अंतरंग वस्‍त्र भी सुरक्षित जगह नहीं. वहाँ उनके हाथ जा सकते हैं. वे यहाँ सज्‍जनता का परिचय देने नहीं आए हैं. और हाँ, उन्‍हें शराब चाहिए. औरत चाहिए. तुम उन्‍हें दुत्‍कार नहीं सकते. मार नहीं सकते. उनकी शिकायत नहीं कर सकते. जहाँ शिकायत कर सकते थे, वे उन्‍हीं की ताक़त लेकर आए हैं. वे मूर्ख नहीं, अनुभवी बदमाश हैं. स्‍त्री और धन में से वे पहले धन को ही चुनेंगे. बाक़ी चीज़ें फिर अपने आप उपलब्‍ध हो जाएँगी. जब तक तुम विनम्र हो, वे भी विनम्र हैं. लेकिन वसूली के प्रति संकल्पित. उन्‍हें तुम लक्ष्‍य से भटका नहीं सकते.

यह गाँव शापग्रस्‍त है और वे एकदम सुबह देवदूत की तरह प्रकट होंगे. त्रासदायक ख़ुद को देवदूत कहते हैं जिन्‍हें आप सहज रूप से अपना समग्र समर्पित कर देते हैं. गाली-गलोच देवभाषा हो गई है. यह क़त्‍ल की रात है. रास्‍तों के गढ्ढों और कीचड़ की क्‍या बिसात कि उन्‍हें रोक सकें. आधी रात हो चुकी है. सुबह काली रोशनी आएगी. तब तक खा-पी लो. नींद पूरी कर लो. या आपस में बहस उलझे रहो. झगड़ा करो. या चुपचाप ठर्रा पीते रहो. मिट्टी में से उनके आने की दुर्गंध उठना शुरू हो गई है. मकड़ी अपना विशाल जाला पूरा कर चुकी है. बि‍ल्‍लियाँ, कुत्‍ते बेचैन घूम रहे हैं.
वे मृत्‍युगंध को इंसानों से पहले सूँघ सकते हैं.

Satantango से एक दृश्य

(छह)

भय, आशंका.
किसी अप्रत्‍याशित से भरी कोहरे में लिपटी सुबह. नोनखाई दीवारों से पलस्‍तर के टुकड़े गिर रहे हैं. दीवारें और अधिक नग्‍न हो रही हैं. किसी के पास अपनी दुरवस्था छिपाने के लिए कुछ नहीं है. एक युक्ति यह हो सकती है कि पैसा जंगल में गढ्ढा खोदकर छिपा दो. जैसे दफ़न कर रहे हो. कम से कम उन दो नामुरादों के हाथ तो नहीं लगेगा. जो आदमी यह युक्ति बता रहा है वह बच्‍चा जानकर तुम्‍हें बरगला रहा है कि पैसों को ज़मीन में गहरे गाड़ने से पैसों का पेड़ उग आएगा. कहानी पुरानी है. धोखा नया है.
बारिश और तेज़ हो गई है.

एक निराश मन किसी आततायी को न मारे सके तो असवाद में अपनी बिल्‍ली को तो मार ही सकता है. भीतर खीझ और ग़ुस्‍से का एक परनाला है. फिर वह ख़ुद को भी मार डालता है. इस तरह जीवन का अंत अनेक घटनाओं की शृंखला है. लंबी प्रक्रिया. एक सिलसिला. उनका आपस में संबंध है, भले ही वह अबूझ लगता है. फिर हर कोई अपने अंधविश्‍वासों से उसकी व्‍याख्‍या कर सकता है. क्‍या कोई अपने प्रिय पालतू को इसलिए मारता है कि उसके परिजन, परिचित उसकी मनोदशा का कुछ अंदाज़ा लगा सकें? पूर्व चेतावनी की तरह. उसने जीवित रहते हुए शायद यही कोशिश की थी लेकिन असफलता हाथ लगी. अप्राकृतिक मृत्‍यु की स्याह पृष्‍ठभूमि में आसपास प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा है. ये पेड़, रास्‍ते, धुँधला आसमान और अनश्‍वर धुंध. यह जगह अबूझधाम है.

 

हवा में बारूद की गंध आ रही है.
लगता है वे दो दुर्जन एकदम क़रीब आ गए हैं. गंध तीव्रतर हो रही है. जैसे किसी कारख़ाने से ज़हरीली गैस रिस रही है. लोगों के दिमाग़ पर असर होने लगा है. वे अस्थिर हो रहे हैं. एक ही बात बीसियों बार दोहराई जा रही है. लंबी बड़बड़ाहट. तब याद दिलाना पड़ता है कि बस करो- यह शराबख़ाना है, कोई पर्यटन स्‍थल या वेश्‍यालय नहीं. बेचारे लोग अच्‍छे हैं मगर ज्‍़यादा शराब उन्‍हें गड़बड़ बना देती है. उदाहरण के लिए यह मेरा पति. यह अकेला दो आदमियों के बराबर काम कर सकता है. मेहनती है. सीधा-सच्‍चा बैल. लेकिन ये दो तड़ीपार उसका पैसा भी छीन लेंगे. ये दो दुष्ट जो दिन-रात नशे में डूबे रहते हैं. पैसे की ख़ातिर लड़कियाँ उनके सामने टिडि्डयों की तरह उछलती हैं. अब इस कीच में, इस चंडूख़ाने में, इन लुटेरों के आने की आशंका में आदमियों, सुअरों और कुत्‍तों की ज़‍िंदगी एक-सी लगने लगी है.

जो गतिशील नहीं होता, वह एक दिन सड़ने लगता है. इस गाँव की यही हालत है. कुछ नहीं में से केवल कुछ नहीं पैदा हो सकता है. शेष बचता है असंगत जीवन. बेतुकापन. जो खाने में, पीने में, नाच में और फिर अनागत मुसीबत के इंतज़ार में दिखाई देने लगता है. अब उठती निगाह में आशा है या दुख, अंतर करना मुश्किल है. यहाँ सुख या शांति हासिल नहीं होगी. यहाँ टैंगो नाच चल रहा है. कुछ क़दम आगे बढ़ भी गए तो उतने ही क़दम वापस पीछे जाना होगा. आकाश पर अतार्किकता के अभिशाप से बने बादल आच्‍छादित है. इस बारिशमय, कीचमय क्षेत्र में इतना गतिहीन उजाड़ है कि मकड़‍ियाँ जाले बुन सकती हैं. कहीं भी.
इंसान के दिमाग़ों में भी.

 

समाहार

Satantango से एक दृश्य

(एक)

 

संसार में हर शोषक हर जगह शोषण के ख़िलाफ़ भाषण देता है. लेकिन यहाँ वह ध्‍यान रखेगा कि गाँव में अभी-अभी एक बच्‍ची ने आत्‍महत्‍या की है. यह तकलीफ़ और आक्रोश का समय है. इसलिए पहली कोशिश है कि वह सबको सहमत करके, कुछ लोकप्रिय तरीक़े से उगाही का वातावरण बनाए. जो सबकी कमाई हड़प लेना चाहता है वह सबसे ज्‍़यादा दुख प्रकट करेगा. कहेगा कि वह बहुत संवेदित है. व्यथित है. सदमे में है. इस असामयि‍क निधन के असहनीय शोक में वह शरीक है. और उसके पास अपनी पीड़ा व्‍यक्‍त करने के लिए शब्‍द नहीं हैं. पीड़ि‍त परिवार उसका अपना है. और वह संताप की खाई में गिर गया है. उसका दुख इतना ज्‍़यादा है कि आँसू सूख गए हैं. गला भर आया है. और रुँध गया है. फिर भी वह बोलता जाता है. भरोसा रखो, हम सब इस दुख से एक साथ उबरेंगे. पुलिस जाँच करेगी और दोषी को सज़ा मिलेगी. लेकिन हम सबको भी मिलकर यह सोचना चाहिए कि ऐसी दुर्भाग्‍यपूर्ण दुर्घटना आख़िर कैसे घट गई. हालाँकि कुछ अराजक और विरोधी लोग मुझ पर ही आरोप लगा सकते हैं. लेकिन मैं पीछे हटनेवाला नहीं हूँ, आप लोगों की तकलीफ़ के साथ खड़ा हूँ. आपका साथी हूँ.

विचारणीय प्रश्‍न यह ज़रूर रहेगा कि दिवगंत बच्‍ची रात भर भीषण बारिश में, सर्द हवाओं में कहाँ भटकती रही? इसकी जवाबदार तो बच्‍ची ही थी. अन्यथा कौन? और तुम सब लोग शराब के नशे में धुत होकर नाच-गाने में व्‍यस्‍त थे. सोचो, तुमने उसे अकेला और उपेक्षित छोड़ दिया था. मैं तुमको, इसकी माँ को, इसके नन्‍हे भाई को जवाबदार नहीं ठहराना चाहता लेकिन फिर बताओ कि और कौन इसके लिए उत्‍तरदायी होगा? तुम मानोगे नहीं लेकिन सोचो, तुम सब अपराधी हो. एक बच्‍ची अकेलेपन का, अवसाद का शिकार होकर मर गई और पूरा गाँव मधुशाला में नाचता रहा. निश्चित ही तुम सब हत्‍यारे हो. यह गाँव क़त्‍लगाह है. या फिर मान लो कि यही नियति थी. इसे टाला नहीं जा सकता था. होनी थी सो हो गई. फिर किसी को क्‍या दोष देना? तुम कहोगे कि हम तो बेक़ुसूर हैं. ग़ाफ़‍िल हो सकते हैं लेकिन बेगुनाह हैं. तो फिर जान लो कि तुम ग़ाफ़िल होने के अपराधी हो. इस उथल-पुथल में, संकट भरे समय में, बेसुध और लापरवाह होना सबसे बड़ा गुनाह है. तुम सभी गुनहगार हो. और उसकी माँ भी, जो बच्‍ची का ध्‍यान नहीं रख सकी. यह मैं कह रहा हूँ जो तुम सबका शुभचिंतक हूँ. तुम्‍हारा अपना हूँ.

विडंबना यह है कि तुम ख़ुद को निष्‍पाप समझते हो और गाँव को बूचड़ख़ाना बना देते हो. लगता है तुम ख़ुद अपने ख़िलाफ़ षडयंत्र करते हो. मेरी बातें कठोर लग सकती हैं लेकिन सत्‍य सदैव निष्‍ठुर होता है. ख़ासकर जब तुम्‍हारा अपना प्रतिनिधि सत्‍य वचन कहता है तो तुमको बुरा लग सकता है. मगर तुम किसी चमत्‍कार की आशा कैसे कर सकते हो जब तुम ख़ुद अपना उद्धार नहीं चाहते. तुम काहिल हो, उस पर भी नशेड़ी. तुम निष्क्रिय होने की हद त‍क नपुंसक हो. इसलिए पतित होकर अपराधी हो. कायर होकर अपराधी हो. तुम खर्राटे लेकर बेफ़‍िक्र सोते हो. तुम्‍हें कौन जगा सकता है. तुम स्‍वयं अपने दुर्दिनों के निर्माता हो. तुम जीवित दिखते हो लेकिन मरे हुए हो. इसलिए अभावग्रस्‍तता बनी रहती है. तुम्हारे अच्‍छे दिन कभी नहीं आते और दुर्दशा अमर हो जाती है. इसलिए यहाँ हरेक घर, हर दीवार, प्रत्‍येक दुकान जर्जर है. एक भी खिड़की का काँच साबुत नहीं है. टूटा-फूटा ही यहाँ एक मात्र विशेषण है. कुछ साफ़-सुथरा नहीं. देखो, दीवारों से झरता हुआ चूना और पानी. देखो, हर चीज़ जीर्ण-शीर्ण है. तुम्‍हारे सपने तक टूट-फूट गए हैं. सब तरफ़ अभाव, निर्धनता, विसंगति है. क्‍योंकि तुम लोगों का महान आलस्‍य चिरायु है.

अब आगे ध्‍यान से सुनो. दुख से उबरो. जीवन का सामना करो. और सबसे पहले हमारा हिसाब चुकता कर दो. यह शामिल, कम्‍युनिटी फ़ार्म है. यह हम सबका है. याद रखो हम सब मालिक हैं और श्रमिक भी. तुम मिलकर अपने ही खेतों में काम करते हो. एक-दूसरे के प्रति उत्‍तरदायी और अधिकार संपन्‍न होकर. सबकी मज़दूरी पहले से तय है. ज्‍़यादा काम करो तो ज्‍़यादा कमाई होगी. वैसे भी यहाँ तुम फ़ालतू और बेरोज़गार नहीं घूम सकते. ठीक तुम्‍हारे पाँव के नीचे रोज़गार है. तुम्‍हें सामूहिकता में काम करना है और कोई नुक्‍़सान न हो इसकी सामूहिक जवाबदारी भी लेना है. तुम्‍हारी यही शपथ है.

मैं जानता हूँ, तुम अच्‍छे मनुष्‍य हो. लगनशील हो. ईमानदारी से मेहनत करते हो. पैसे-धेले का ह‍िसाब साफ़ रखते हो. सार्वजनिक हित के लिए तुम अपने निजी नफ़ा नुक्‍़सान की चिंता नहीं करते. शामिल समृद्धि में यकीन करते हो. मैं भरसक कोशिश करूँगा कि तम सबका ध्‍यान रखूँ. तुम जो कमाई करके दोगे, वह हम सभी के लिए संपन्‍न्‍ता लाएगी.
अब जाओ, कल से काम पर लग जाओ.
भविष्‍य के सपनों में खो जाओ.
जाओ.

Satantango से एक दृश्य

(दो)

वह तुम सब पर झूठे आरोप लगाता रहा. तुमको ही तुम्‍हारी दुर्दशा का जिम्‍मेदार ठहराता रहा. तुम उसका कपट जानकर भी चुप बने रहे. तुम सचमुच अपराधी हो. तुमने इतना लंबा, ऊब भरा भाषण चुपचाप, स्‍वीकार भाव से सुना जैसे तुम वाकई मुजरिम हो. जैसे वह अलौकिक उपदेश था. दरअसल तुमने अपनी असहायता, संघर्षविहीनता को अपनी जीवन शैली बना लिया है. तुम बलशाली हो लेकिन अपने शोषक से नहीं लड़‍ते. आपस में लड़ते हो. या उधार में शराब पीकर सामूहिक संताप करते हो. फिर अपने ही गले में रस्‍सी बाँधकर उसे पकड़ा देते हो जो तुम्‍हें पशु समझता है. ग़रीब से हर अमीर एक दार्शनिक की तरह बात करता है. और उसे ग़रीब बने रहने का अमर दर्शन समझाता है.

अब यही बेहतर होगा कि तुम यह गाँव छोड़ दो. तुम कुछ लोग ही सही, रात में गठरी बाँधो, ठेला उठाओ और बँधुआ मज़दूर होने की बजाय, यहाँ से कहीं और चले जाओ. इससे पहले कि अगली सुबह हो और वह कुछ नया हंगामा करे, यहाँ से भागो. हालाँकि तुम्‍हें मुश्किल होगी क्‍योंकि हर काल में तुम्‍हारी गठरी के पीछे एक चोर लगा रहता है. मगर कोशिश तो करो. नयी जगह के लिए सफ़र शुरू करो. लोकगीत तुम्‍हें सांत्‍वना देंगे. स्‍मृतियों में ले जाएँगे. रुलाएँगे. टीस उठेगी जो हृदयहीन नगरों में कुछ काम न आएगी. यह धनोपार्जन में भी काम न आएगी. लेकिन सोचो कि तुम एक जाल से निकलने की कोशिश कर रहे हो. तुम जान रहे हो कि शायद अब इधर वापस लौटना न हो. यह बिछोह तुम्‍हें कवि बना रहा है. तड़प से भरा मनुष्‍य. तुम्‍हारे शब्‍द मार्मिक हुए जा रहे हैं. यह प्रेमिका से होनेवाले बिछोह से भी अधिक दारुण है. यह भूमि से वियोग है. पहला होगा वह कवि जिसकी छूटी होगी ज़मीन. वही हुआ होगा हर जगह का शरणार्थी. बढ़े चलो.
मंजिल का पता नहीं. सफ़र लंबा है.
क्‍या यह कभी पूरा होगा?

Satantango से एक दृश्य

हमें अपने गाँव को छोड़ना ही था. सोचो, जिस जगह शराबख़ाना भी घाटे का व्‍यापार हो जाए, वहाँ की अर्थव्‍यवस्‍था कैसी होगी. जब शराबघर का मालिक गालियाँ बकने लगे तो दरिद्रता के सूचकांक का पता आसानी से चल जाता है. हम वहाँ कैसे रुक सकते थे, जहाँ लोग किसी मतिभ्रम में रहने लगें. मिथ्‍याभास से ग्रस्‍त. हैलुसिनेशन के शिकार.

अनंत यात्रा करके यहाँ इस नये नगर में आ गए हैं. विचित्र है कि विस्‍थापितों को रहने के लिए, वहाँ से विस्‍थापित हो चुके लोगों के ख़ाली घर मिलते हैं. तुम अपना गाँव छोड़कर आए हो. वे अपना गाँव छोड़कर चले गए हैं. वैसी ही किसी आशा में जिसके शिकार होकर तुम यहाँ चले आए हो. विभाजन, पलायन के बाद सबको आवास मिलता है- एक-दूसरे का आवास. सब सोचते हैं कि नयी जगह वाक़ई कोई नयी जगह होती है. बेहतर. कि शायद यहाँ कुछ कम नरक, कुछ ज्‍़यादा स्‍वर्ग हो. यानी कुछ कम दुख. जीवन असमाप्‍त मरीचिका है. मगर अंत में हर घर में, हर उजाड़, हर आबादी में एक उलूक तुम्‍हारी प्रतीक्षा में, अपनी विशाल आँखें मटकाता हुआ मिलता है.

तुम यहाँ तक इकट्ठा आए हो. उन गुंडों से दूर चले आए हो. संचित पैसों का बँटवारा भी तुमने कर लिया है. मगर इस परदेस में तुम सब धीरे-धीरे अलग हो जाओगे. अपनी लिप्‍सा, ईर्ष्‍या और लोभ से संचालित होकर तुम्‍हारे सबके रास्‍ते भिन्‍न हो रहे हैं. तुम एक अपरिचित प्रदेश में हो. तुम्‍हें एक साथ बाँधकर रखनेवाली कोई चीज़ यहाँ नहीं है. और अभी तुम्‍हें बिखरकर रहना सीखना है. तुम्‍हारे नये, पुराने घाव उभर आएँगे. तुम्‍हारे पाँव किसी एक जगह रुक नहीं सकते. तुम्‍हें प्रतीत होने लगा है जैसे तुम एक अविराम भूडोल में फँस गए हो. दिन-रात के समय का भान समाप्‍त हुआ. रात दिन में नहीं बदल पा रही है.
और दिन रात हुए चले जा रहे हैं.

नयी जगह पहुँचकर क्‍या नया समय आ जाता है? क्या बेहतर की प्रतीक्षा में बुरा वक्‍़त भी आ सकता है? तब मकड़ी भी अपने ही जाले में उलझ जाती है. बारिश फिर शुरू गई है जबकि पिछली बारिश ठीक तरह से गई भी नहीं थी. अभूतपूर्व कोहरा एक बार फिर हर चीज़ को ढाँपने के लिए फैलता चला जा रहा है. यह सुअरों, बिल्‍लि‍यों और कुत्‍तों का शहर नहीं है. देखो, ये घोडे़ हैं. यहाँ घुड़दौड़ होती रहती है. भागमभाग. यहाँ अश्‍व-शक्ति का वर्चस्‍व है. वही आदमी के काम करने की इकाई हो गई है. यहाँ आदमियों को भी घोड़ों की तरह रहना पड़ता है. और यह शहर घोड़ों की वधशाला है.

 

बीमार, मरणासन्‍न डॉक्‍टर पीछे गाँव में छूट गया है. वह पैदल यात्रा के लायक़ नहीं था. लेकिन वह वहाँ भी मर जाएगा. भूख से. अकेलेपन से. शीत से. पाले से. मगर किस-किस की परवाह की जा सकती है? अपनी ख़ुद की जान बच जाए यही बहुत है. जीने की विवशता में आदमी एक‍ दिन इस क़दर समझौता कर लेता है कि रोज़ अपमानित होता है और रात को गहरी नींद सोता है.

 

Satantango से एक दृश्य

(तीन)

तुम मुझसे कितनी दूर तक भाग सकते हो?
और वह भी मेरे पैसे लेकर.

देखो, मैं तुम्‍हारा शुभचिंतक हूँ. तुम्‍हें खोजता हुआ यहाँ तक आ गया हूँ. वापस लौटो. वहाँ हमारी सामूहिक ज़मीन तुम्‍हारी राह देख रही है. याद रखो कि अपने ही कर्म हमें पुरस्‍कृत कर सकते हैं और दं‍डित भी. निज कृत कर्म सुन भोग भ्राता. फिर तुम किसी दूसरे पर अत्‍याचार का आरोप कैसे लगा सकते हो? जो चीज़ जिसके लिए संसार में है ही नहीं, वह कैसे उसे मिल सकती है? लेकिन लोग समझाने पर भी समझते नहीं. न जाने किसलिए इधर-उधर भटकते हैं. व्‍यर्थ पलायन करते हैं. तुम अपना घर, अपनी धरती इसलिए छोड़ आए कि तुम्‍हें संदेह है कि मैं तुमसे सारे पैसे छीन लूँगा. सोचो, ऐसा होता तो तुम अब तक ज़िंदा कैसे रहते आए हो. तुम हमें हृदयहीन लुटेरा समझते हो जबकि हम तुम्‍हारे पालनकर्ता हैं. लेकिन तुम धोखा दोगे तो मुझे क्रोध आ सकता है. आखिर मैं भी काम, क्रोध, मद, लोभ से बना हुआ एक मनुष्‍य ही हूँ. और आदमी के भीतर सहनशीलता की भी एक सीमा होती है. और उदारता का मतलब ख़ुद लुट जाना नहीं हो सकता.

जब लोग उपदेश, दया, प्रेम, ममता से नहीं समझते तो फिर बारूद की ज़रूरत पड़ती है. ताक़तवर आदमी यों ही हिंसा नहीं करता, उसे मजबूर किया जाता है. उसकी पूँजी का, उसके भरोसे का, उसकी संपत्ति का नुक्‍़सान होगा तो फिर वह गोली चलाने के लिए विवश हो जाएगा. तुम मुझसे प्रेम कर सकते हो लेकिन मुझसे इस तरह मोल-भाव नहीं कर सकते. द्रोह नहीं कर सकते. यह ठीक आचरण नहीं. यह परंपरा नहीं है. यह अच्‍छा संस्‍कार नहीं. मैं तुम्‍हारा संरक्षक हूँ लेकिन कोई पैगम्‍बर या ईश्‍वर नहीं हूँ. इसलिए जो मुझे त्रास देगा, मेरे हितों के ख़िलाफ़ जाएगा, उसे मैं ठीक कर सकता हूँ. तुम मुझे धमकी दोगे तो समझ लो कि यह ऐसा ही है जैसे तुम निहत्‍थे होकर शस्त्रधारी देवता को चुनौती दे रहे हो.
सत्‍ता के सूर्य से आँखें मिलाओगे तो अंधे हो जाओगे.

 

नहीं. नहीं. हम तुमसे भागकर कहाँ जाएँगे?
तुम्‍हारे अलावा संसार में और है कौन, जो हमें अपना समझता हो. हमें लगा कि शायद तुम हमसे नाराज़ हो और हमें अनाथ, बेकाम छोड़कर चले जाओगे इसलिए हम घबराकर गाँव छोड़कर चले आए कि पेट भरने के लिए कहीं न कहीं तो जाकर काम करना होगा.

अब बातें मत बनाओ. तुम लोगों को शर्म आना चाहिए. तुम्‍हारे पीछे-पीछे मुझे बारिश में भीगते हुए यहाँ तक आना पड़ा. मैं शहर से कीचड़ का समुद्र पार करता, भूख-प्‍यास की परवाह न करता हुआ यह सोचकर गाँव आया था कि तुम सब मेरे अपने हो और तुम कामचोर चुपचाप गाँव से भाग निकले. मैंने तुम्‍हें काम दिया और तुमने छल किया. पैसे का धोखा. यह असहनीय है. तुम बेवुक़ूफ़ लोग, पैसा लेकर कहाँ जा सकते हो? बल्कि एक दिन तुम इसी पैसे की ख़ातिर आपस में चाकूबाज़ी करोगे और मारे जाओगे. विडंबना है कि तुम मुझे, अपने सच्‍चे मित्र को दुश्‍मन समझते हो. तुम विश्‍वासघात करोगे तो कैसे काम चलेगा. मैं उदारमना हूँ. तुम्‍हें कई बार माफ़ किया है. इस बार भी क्षमा कर दूँगा. मैं हमेशा तुम्‍हारी तुमसे ही हिफ़ाज़त करता आया हूँ. अब भी करूँगा. बस, वापस अपने काम पर चलो.

और अच्‍छी तरह समझ लो कि तुम मेरी निगाह से ओझल नहीं हो सकते. मैं तुम्‍हें पाताल से भी खोज लाऊँगा. तुम मेरे प्‍यारे जन हो लेकिन याद रखो कि मेरे बिना तुम कुछ नहीं. तुम्‍हें खेतों में फिर से काम शुरू करना होगा. इसी में तुम्‍हारी समझदारी होगी और यही वफ़ादारी. शामिल ‘सहायता कोष’ में से मैं तुमको अभी कुछ पैसा दे दूँगा. फिर अगली फ़सल पर तुम वापस कर देना. यह कोष हम सबका है. मैं केवल तुम्‍हारी तरफ़ से इसे संचालित करता हूँ. अब फ़ालतू सवाल मत पूछो. संदेह मत रखो. काम पर चलो.

क्‍या?? तुम्‍हारी ज़ि‍द है कि पहले तुम्‍हारे पुराने काम का हिसाब कर दूँ. ठीक है, मैं तुम सबको पैसा दूँगा. अभी दूँगा. लेकिन फिर तुम्‍हारे लिए सामूहिक फ़ार्म के दरवाज़े बंद हो जाएँगे. लो, तुम ये अपने पैसे लो और जहाँ सींग समाएँ, वहाँ दफ़ा हो जाओ. जो मुझ पर विश्‍वास नहीं करता बल्कि पैसे माँगता है, वह मेरा भरोसेमंद आदमी नहीं रह जाता. अब आगे से तुम्‍हारा काम बंद. तुम लोगों ने मुझ पर यक़ीन न करके ‘सामूहिकता की भावना’ का नाश कर दिया है. अब हम मिलकर भला कैसे काम कर सकते हैं? मैंने तुम्‍हारे लिए सुंदर योजना बनाई थी. तुम साल भर काम करके अच्‍छा ख़ासा पैसा कमा सकते थे मगर तुमने अविश्‍वास में पैसे माँगकर सब कुछ चौपट कर दिया. मैं दूसरे मज़दूरों को ले आऊँगा.
यह दुनिया बेरोज़गारों से कभी ख़ाली नहीं होती.

 

(चार)

पासे उलटे पड़ गए हैं. बँधुआ किसानों में घबराहट फैल गई है. वे गिड़गिड़ाने लगे हैं कि भाई, तुम ग़लत समझ रहे हो. हम सचमुच तुम पर भरोसा करते हैं. ये अपने पैसे वापस ले लो. हम भी समझते हैं कि तुम्‍हारे पास पैसे नहीं होंगे तो तुम खेतों पर काम कैसे शुरू कराओगे. हम ख़ुशी से ये पैसे तुम्‍हें दे रहे हैं. यह तुम्‍हारे ही हैं. हमें फिर मिल जाएँगे. हम तुम पर‍ भरोसा न करेंगे तो किस पर करेंगे? तुम मालिक हो. रक्षक हो. हमें ले चलो, जहाँ चाहो. हम तैयार हैं.

विपन्‍न के मन में हर संकट में एक काँपती हुई आभासी लौ, अचानक किसी अज्ञात जगह स्थापित दीप में प्रज्‍ज्‍वलित हो जाती है.

अच्छा, ठीक है. उधर, बाहर खड़ी लॉरी में बैठ जाओ. तुम्‍हें वापसी यात्रा में पैदल नहीं चलना पड़ेगा. मैं गाड़ी लेकर आया हूँ. इतना ख़याल कौन रख सकता है? वही, जो तुम्‍हें प्‍यार करता है. लेकिन तुम्‍हारी हरकतों से सबक लेकर मैं तुम्‍हें अलग-अलग जगहों पर, अलग-अलग खेतों में काम दूँगा. तुम लोग इकट्ठा रहने लायक़ नहीं. तुम गड़़बड़ी कर सकते हो. अब मैं जहाँ भेजूँ, वहाँ काम करोगे. तुमने विश्‍वासघात किया है लेकिन मैं तुम्‍हें रोज़गार दूँगा. नहीं, मुझे धन्‍यवाद मत दो. मैं सदैव ही तुम्‍हारा हितैषी हूँ. मगर तुम में से एक यह आदमी दग़ाबाज़ है. पागल है. यह अपने दुर्भाग्‍य को प्राप्‍त होगा. इसकी दुर्गति होगी.

Bela Tarr

भाइयो! यहाँ आकर मैंने फिर से विचार किया और मेरा फ़ैसला है कि तुम लोगों में से जिन्‍होंने ‘कम्‍युनिटी फ़ार्म’ में काम करने से मना किया, उनमें से किसी पर भी अब पूरा भरोसा नहीं किया जा सकता. वे द्रोही हैं. मैं सुनिश्चित करूँगा कि पुलिस उनसे निबटे. उन पर कठोर धाराएँ लगें. और वे जेल जाएँ. कौन-से अपराध में? जो पुलिस चाहेगी, उस अपराध में. एक-एक पर अनेक धाराएँ. एक से छूटोगे तो दूसरी धारा में गिरफ़्तार कर लिए जाओगे. इनके नामों के आगे टाइप करो- व्‍याभिचार. राजद्रोह. जासूस. केस बनाओ. टाइप राइटर की आवाज़ गूँज रही है. खट खट. खटाखट. तुम मज़दूर होकर, बेगार होकर भी अपनी औक़ात भूल गए थे. अब ऐसा उदाहरण बनाएँगे कि तुम्‍हारी हरकतें किसी और के लिए उदाहरण न हो सकें. ज्‍़यादा विचारक बनोगे तो तुम्‍हें इस पुल से नदी में छलाँग लगाना होगी. जिन्‍हें वाक़ई ग़लती का अहसास है और जो शरण चाहते हैं उनके नामों के आगे लिखो- ‘ख़तरनाक मगर सत्‍ता के लिए उपयोगी.’
जो जब तक उपयोगी है, हमारा है. फिर ईश्‍वर का.
चाहे फिर वह हमारा प्रिय डॉक्‍टर ही क्‍यों न हो.

 

जी हाँ. बता ही चुका हूँ कि मैं यहाँ डॉक्‍टर हूँ. सरकारी आदमी. अभी बीमार हूँ. मरणासन्‍न. मेरी सारी इंद्रियाँ अशक्‍त हो रही हैं. बावजूद इसके मैं अपनी रिपोर्ट लिख रहा हूँ. एक-सी बातें. एक-सा जीवन. मेरे इस ध्‍वस्‍त कमरे में भी कुछ भी नहीं बदलता. इस गाँव में भी लोग अपने-अपने घरों में बंद हैं. जैसे नज़रबंद. बिस्‍तरों में दुबके हुए. या नींद में. या छत की तरफ़ घूरते हुए. कोई हादसा हो तब भी बाहर नहीं निकलते. वे समझते नहीं कि मुसीबतों से बचना है तो उन्‍हीं से सामना करना होगा. इसलिए मुझे भी अपने कमरे से बाहर निकलना होगा. इस ठंड से भरे गुब्‍बारे में. इसी राह पर जीवन है, इसी राह में मृत्‍यु. और इस कीचड़ में कमल नहीं खिल सकता.
सरकंडे उग सकते हैं.

अब यह वैसी ही सुबह है जैसी कथा के प्रारंभ में थी. लेकिन इतनी सुबह ये चर्च की घंटियाँ इतनी तेज़ क्‍यों बज रही हैं? लगता है किसी पागल के हाथ में घंटी आ गई है. पागल हमेशा ख़तरे की, धर्म की घंटी लगातार बजा सकता है. फिलहाल, इसे अनसुना करो और आगे बढ़ो. इस भीषण सर्दी से बचो. और इस शीत भरी बरसात से. कई बार पता नहीं चलता कि कहाँ से आवाज़ें आ रही हैं. सुबह की धुंध भरी नींद में घंटियों की व्‍यग्रता बढ़ती चली जा रही हैं. क्‍या ये चर्च में बजाई जा रही हैं? लेकिन पिछले युद्ध में तमाम धर्मस्‍थलों की मीनारें तो ध्‍वस्‍त हो चुकी थीं.
फिर??

Movie- Satantango/ शैटनटैंगों, 1985, Director- Bela Tarr/ बेला तार

 

कुमार अम्‍बुज

लोकतांत्रिकता, स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न समाज के पक्षधर कुमार अम्बुज का जन्म 13 अप्रैल 1957 को जिला गुना, मध्य प्रदेश में हुआ. संप्रति वे भोपाल में रहते हैं.  किवाड़, क्रूरता, अनंतिम, अतिक्रमण, अमीरी रेखा और उपशीर्षक उनके छह प्रकाशित कविता संग्रह है. ‘इच्छाएँ और ‘मज़ाक़’ दो कहानी संकलन हैं. ‘थलचर’ शीर्षक से सर्जनात्मक वैचारिक डायरी है और ‘मनुष्य का अवकाश’ श्रम और धर्म विषयक निबंध संग्रह. ‘प्रतिनिधि कविताएँ’, ‘कवि ने कहा’, ‘75 कविताएँ’ श्रृंखला में कविता संचयन है. उन्होंने गुजरात दंगों पर केंद्रित पुस्तक ‘क्या हमें चुप रहना चाहिए’ और ‘वसुधा’ के कवितांक सहित अनेक वैचारिक पुस्तिकाओं का संपादन किया है. विश्व सिनेमा से चयनित फिल्मों पर निबंधों की पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य. कविता के लिए ‘भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार’, ‘माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार’, ‘श्रीकांत वर्मा पुरस्कार’, ‘गिरिजा कुमार माथुर सम्मान’, ‘केदार सम्मान’, वागीश्वरी पुरस्कार तथा कुसुमाग्रज सम्मान से सम्मानित.ई-मेल : kumarambujbpl@gmail.com

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Comments 1

  1. Nawal Sharma says:
    43 minutes ago

    बेहतरीन ….

    Reply

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समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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