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समालोचन

Home » आपत्ति : रवि रंजन

आपत्ति : रवि रंजन

हरि भटनागर के हालिया प्रकाशित कहानी-संग्रह की चर्चा के बहाने आलोचक रवि रंजन ने समकालीन आलोचनात्मक विमर्शों की कसौटी पर इसकी कुछ चुनिंदा कहानियों को परखा है. यह आलेख न केवल इन कहानियों की सौंदर्यात्मक और वैचारिक विशेषताओं को उभारता है, बल्कि उत्तर-आधुनिक सिद्धांतों की व्यावहारिक संभावनाओं को भी स्पष्ट करता है. उत्तर-उपनिवेशवाद, उत्तर-संरचनावाद, अंतर्विषयक-स्त्रीवाद, इको-फेमिनिज़्म और विखंडनवाद जैसी वैचारिक धाराओं के संदर्भ में यह लेख एक गंभीर आलोचनात्मक आलेख का रूप ले लेता है. कहना न होगा कि आलोचना के इन प्रतिमानों में अभी भी संभावनाएँ शेष हैं. ऐसे में इस आलेख का महत्व और बढ़ जाता है. प्रस्तुत है.

by arun dev
December 28, 2025
in आलेख
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आपत्ति : रवि रंजन
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कथाकार हरि भटनागर की अनुभूति की संस्कृति
रवि रंजन

 

कथाकार हरि भटनागर की ‘अनुभूति की संरचना’ और ‘अनुभूति की संस्कृति’, दोनों ही उनके साहित्य की सामाजिक और अनुभवात्मक संरचना को समझने की अनिवार्य कुंजियाँ हैं. उनका कथाकार जब अपने अनुभवों को कलात्मक भाषा प्रदान करता है, तो वह अपने समय की ‘जीवंत अनुभूति’ का रचनात्मक द्रष्टा बन जाता है.

गौरतलब है कि रेमण्ड विलियम्स द्वारा ‘द लॉन्ग रेवोलुशन’ में बहुविध विवेचित ‘अनुभूति की संरचना ‘(स्ट्रक्चर ऑफ़ फीलिंग) की तुलना में ‘अनुभूति की संस्कृति’(कल्चर ऑफ़ फीलिंग) अपेक्षाकृत व्यापक और संस्थागत अर्थ की वाहक है और समाजशास्त्रीय शब्दावली में साहित्य केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति के बजाय एक सांस्कृतिक-सामाजिक व्यवस्था, एक सिग्निफिकेशन सिस्टम और एक ऐसा क्षेत्र (field) भी है जो नियम, परंपराएँ, विधाएँ, मूल्य, और वैधता की प्रक्रिया निर्मित करता है. साहित्यिक गतिविधि लेखक, पाठक, आलोचक, प्रकाशक, पाठ्यक्रम, पुरस्कार, पत्रिकाओं और अकादमिक संस्थानों की पूरी संरचना से संचालित होती है, यह पूरा तंत्र मिलकर साहित्य को एक सामाजिक संस्था का रूप देता है. वस्तुत: ‘अनुभूति की संस्कृति’ से यह निर्धारित होता है कि कौन-सी भावना किस रूप में व्यक्त की जाएगी, कौन-सी भावनाएँ स्वीकार्य हैं, कौन-सी नहीं, किन प्रवृत्तियों को उदीयमान माना जाएगा और किन्हें पतनशील.

इस विमर्श की रोशनी में विचारने पर हरि भटनागर हिंदी साहित्य के उन दुर्लभ रचनाकारों में से एक प्रतीत होते हैं, जिनकी कथा संरचना में भविष्य की अनुभूति की संस्कृति को प्रेरित-प्रभावित करने का माद्दा हो न हो, पर उसमें हमारे समय की ‘अनुभूति की संरचना’ बहुत हद तक आत्मसात हुई है. कथाकार होने के साथ वे हिन्दी की स्तरीय साहित्यिक पत्रिका ‘रचना समय’ के संपादक हैं, जिसमें हमारे समय की महत्त्वपूर्ण रचना-आलोचना आदि के प्रकाशन के साथ ही चेख़व, सार्त्र, बोउवार, टेरी ईगल्टन, देरिदा, लुकाच और अभी हाल में काफ़्का पर केन्द्रित विशेषांक में दुर्लभ सामग्री प्रकाशित हुई है.

 

2)

हरि भटनागर के ‘आपत्ति’ कहानी-संग्रह में आपत्ति, छाया, टर्की, पटेलन की नींद, घोंसला, किस्सा तोता बाई का, उफ़, गुनाह, डामर पिघलती सड़क पर एक छाया, जीप उड़ाते परिंदे, मोहम्मद और अग्नि परीक्षा शीर्षक कहानियाँ शामिल हैं, जिन पर अलग-अलग विचार करना यहाँ संभव नहीं है. इसलिए नमूने के तौर पर यहाँ उनकी तीन कहानियों की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत की जा रही है.

विवेच्य संग्रह की ‘आपत्ति’ कहानी एक गैर-मामूली रचना है. इसे पढ़ते समय लगता है कि यह एक साधारण-सी गली की कहानी है, पर धीरे-धीरे यह हमारे भीतर बैठी उदासीनता, करुणा और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध विद्रोह को कुरेदने लगती है. कहानी का केंद्र है एक आवारा सूअरनी, जिसे लेखक “सुअरिया” कहता है. वह भोजन के रूप में गली में फेंकी जानेवाली उच्छिष्ट चीज़ें खाकर गन्दगी का बोझ कम करती है और एक दिन कथावाचक से टकरा जाती है. वह उसके बगल के खाली प्लॉट में शरण लेकर बच्चों को जन्म देती है. कुत्तों की धमकी, घरवालों का गुस्सा, उसका नशेड़ी मालिक राजू – सबके बीच वह बस जीने की जुगत भिड़ाती रहती है.

कहानी ख़त्म होती है कुत्तों के हमले पर, जब सुअरिया खाना ढूंढने निकलती है. सबसे पहली जो उल्लेखनीय बात है वह यह कि बेहद सादगी से लिखी गई इस कहानी की भाषा में गजब की ताकत है. सुअरिया का मोटा पेट, चिकने पैर, लंबी थूथन, छोटी आँखें- ये सारे चित्र इतने जीवंत हैं कि पाठक उसे सचमुच देखने लगता है. जब वह बोलती है, तब भी भाषा बनावटी होने के बजाय बिल्कुल गली की है. उसकी हर बात में करुणा और मजबूरी एक साथ झलकती है. कहानी छोटी-छोटी घटनाओं से बनी है, कचरा फेंकना, टकराव, बच्चे जनना, कुत्तों का डर, राजू की हिंसा – पर ये सारी घटनाएँ एक-दूसरे से इस तरह जुड़ी हैं कि अंत तक आते-आते पाठक अश्रुपूरित हो जाता है.

उत्तर-उपनिवेशवादी नज़रिए से देखें तो ‘सुअरिया’ हमारे समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े समुदाय की उस औरत का अल्टर-ईगो है जिसे शहर ने ‘घुसपैठिया’ मान लिया है. गाय को बासी दाल दी जाती है, कुत्ते ब्रेड के टुकड़े छीन लेते हैं और ‘सुअरिया’ को सिर्फ़ उनसे बचा-खुचा जूठन मिलता है. यह ठीक वही पदानुक्रम है जो आज़ादी के बाद भी बना हुआ है. शहर का मध्यवर्ग खुद को ‘सभ्य’ मानता है, पर उसकी सभ्यता कचरे के ढेर पर टिकी है. सुअरिया जब कहानीकार के बगल के प्लॉट में घुसती है तो वह दरअसल शहर के ‘खाली’ दिखने वाले कोने पर अपना हक़ जताती है. ठीक वैसे ही जैसे अस्थायी बस्तियाँ बसाने वाले घुमंतू लोग करते हैं. कहानीकार का डर, उसकी पत्नी का गुस्सा, कुत्तों की हिंसा. ये सब मिलकर हमें याद दिलाते हैं कि ‘हमारा’ और ‘उनका’ फ़र्क़ आज भी कितना गहरा है.

‘आपत्ति’ पढ़ते ही मन में एक साथ कई सवाल उमड़ आते हैं. यह कहानी दरअसल हाशिए पर जीने वालों की कहानी है. सुअरिया कोई साधारण सूअरनी नहीं, वह उन तमाम जीवों-इंसानों की प्रतिनिधि है जिन्हें शहर ने ‘गंदा’, ‘अनचाहा’ और ‘घुसपैठिया’ आदि मान लिया है. गली में उच्छिष्ट भोजन के बंटवारे में मध्यवर्ग का सामाजिक व्यवहार अभिव्यक्त हुआ है. सुअरिया को पूजनीय गाय और आक्रामक कुत्ते के बाद सिर्फ बचा-खुचा उच्छिष्ट मिलता है, क्योंकि वह सबसे नीचे है. यह वही पदानुक्रम है जो आज भी हमारे शहरों में गरीब, दलित, प्रवासी और हाशिए की अस्मिताओं के साथ चलता है.

यह कहानी करुणा और निजी स्वार्थ के बीच फंसे मध्यवर्गीय मन को भी खोलती है. कहानी का वाचक सुअरिया को देखकर द्रवित होता है, उससे टकराने पर डरता है, फिर भी उसे शरण देता है. पहले गुस्सा करने वाली उसकी पत्नी और बेटी अंत में कहती हैं– इसे भगाओ मत. यह बदलाव बहुत सूक्ष्म है और इससे स्पष्ट होता है कि करुणा किसी आक्रामक नारे के बजाय, छोटी-छोटी स्थितियों में पैदा होती है. यही कहानीकार की अनुभूति की संस्कृति की विशेषता है.

मातृत्व का बलिदान यहाँ बहुत मार्मिक ढंग से उभरा है. सुअरिया प्रसव के दर्द से चीखती है, फिर भी बच्चों को अपना सारा दूध पिला देती है, खुद भूख से सूख जाती है और अंत में बच्चों को बचाने के लिए खुद ही बाहर निकल जाती है. उसका नशेड़ी मालिक राजू उसे पीटता है, बच्चों को बेचने की धमकी देता है– यह घरेलू हिंसा और निचले तबके की औरतों की मजबूरी का सटीक चित्र है. व्यंग्य भी कमाल का है. कुत्ते कहानीकार पर ‘नाइंसाफी’ का इल्ज़ाम लगाते हैं कि सुअरिया उनका हिस्सा चट कर रही है. यह ठीक वही तर्क है जो समाज में मज़बूत लोग कमज़ोरों के हक़ में आवाज़ उठाने वालों पर लगाते हैं.

इस रचना का यक्ष प्रश्न शीर्षक में ही छिपा है– ‘आपत्ति’. आपत्ति किस बात पर है? सुअरिया की चीखों पर, कुत्तों की हिंसा पर, राजू की क्रूरता पर, या हमारी अपनी ख़ामोशी पर? प्रकारांतर से हरि भटनागर चुपचाप यही पूछते हैं कि हमारी असली आपत्ति कहाँ होनी चाहिए.

सुअरिया का कथन, “मैं यहाँ आ डटी हूँ. यह मेरा मुकम्मल ठीहा हो गया”. यह कथन हिन्दी में ‘गुलदाउदी’ शीर्षक से अनूदित जॉन स्टाइनबेक की प्रसिद्ध कहानी ‘The Chrysanthemums’ की नायिका एलिसा एलेन की याद दिलाता है, जो अपनी सीमित दुनिया में किसी ठौर की चाहत रखती है. पर स्टाइनबेक की एलिसा जहाँ भावात्मक परित्याग से टूट जाती है, वहीं हरि भटनागर की ‘सुअरिया’ के स्वभाव में अंत तक एक ज़बरदस्त निडरता और जीवट है. कहानीकार मनुष्य और पशु, दोनों के व्यवहार में एक समान तनाव, भय और जिजीविषा दिखाता है.

यह वही दृष्टि है जो टॉलस्टॉय की कहानी ‘खोल्स्टोमर’ (Kholstomer) में दिखाई देती है, जहाँ घोड़ा मानव समाज पर टिप्पणी करता है. ‘आपत्ति’ का रचनाकार पशु-लोक को एक पैमाने की तरह रखता है, जिससे मानव–जीवन के विस्थापन की पीड़ा को अभिव्यक्ति मिलती है.

3)

विवेच्य संग्रह की ‘छाया’ एक ऐसी कहानी है जो शहरी गरीबी, पारिवारिक टूटन और मानवीय कमजोरियों को बहुत ही संवेदनशील तरीके से उकेरती है. कहानी का केंद्र राम हरख नामक एक बुजुर्ग किसान है,जो गांव छोड़कर शहर में बेटे नगीना के पास आता है, लेकिन बेटे की मौत के बाद बहू सितारा के साथ झुग्गी में रहने को मजबूर हो जाता है. कहानीकार यहाँ एक ‘स्लम’ की पृष्ठभूमि पर दुःख, शक और अनुचित इच्छाओं की छाया को चित्रित करता है, जो अंत में राम हरख की मौत के साथ ख़त्म होती है. यह कहानी हिंदी कहानी की यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाती है, जिसमें सामाजिक हक़ीक़त को सामने लाया जाता है, लेकिन कहानीकार का अंदाज मनोवैज्ञानिक भी है. विभिन्न साहित्यिक सिद्धांतों के आलोक में इस रचना को परखने की कोशिश करने पर पता चलता है कि ‘छाया’ न सिर्फ सामाजिक आलोचना है, बल्कि मानवीय अस्तित्व की गहराइयों को भी छूती है, जिससे यह एक बहुआयामी रचना बनती है.

कहानी की संरचना बहुत सधी हुई है और हर घटना एक-दूसरे से जुड़कर भावनात्मक चरमोत्कर्ष तक पहुंचती है. रचना की भाषा सरल है, लेकिन विवरणों में गजब की गहराई है– जैसे स्लम का नक्शा, चांदनी रात में जुगनुओं का चमकना या राम हरख की आंखों में छिपी व्यथा- ये तत्त्व कहानी को जीवंत बनाते हैं और विभिन्न पात्रों (जैसे पानवाले की रहस्यमयी आंखें) की विचित्र हरकत की ओर पाठक को चौकन्नी निगाह डालने के लिए बाध्य करते हैं. कथानक का क्रम क्लासिक है: राम हरख का शहर आना (उत्थान), नगीना की मौत (संघर्ष), सितारा पर शक (चरम) और अंत में राम हरख की मौत (समापन). लेकिन इस औपचारिक ढाँचे में कुछ कमियां भी नज़र आती हैं और कहानी कभी-कभी सोपओपेरा-सी लगती है. उदाहरण के लिए पानवाले के संवाद ज्यादा लंबे हैं, जो गति को थोड़ा धीमा कर देते हैं. फिर भी, अंतर्वस्तु और रूप का मेल कहानी को एकीकृत करता है और रचना का शीर्षक पूरे कथानक की छाया जैसी अनिश्चितता को दर्शाता है.

संरचनावादी नज़रिए से देखने पर ‘छाया’ कहानी में अन्तर्निहित द्वंद्व की ओर हमारा ध्यान जाता है- जहाँ अर्थ विरोधों से बनता है: गांव/शहर, बुढ़ापा/जवानी, करुणा/शक और पवित्रता/अनैतिकता. सितारा ‘अन्य’ का प्रतीक है. एक विधवा जो स्वतंत्र है, लेकिन समाज की नज़र में संदिग्ध. स्लम का वर्णन (नाला, कचरा, हैंडपंप) एक संरचनात्मक लघु ब्रह्माण्ड (‘माइक्रोकोसम’) है,जिनमें लेवी-स्ट्रॉस के मिथकों में आए वर्णन की तरह संसाधनों की कमी पदानुक्रम पैदा करती है. राम हरख का शक एक द्वंद्व है जो परिवार की संरचना को तोड़ता है और अंत में उसकी मौत कई द्वंद्वों का अस्पष्ट समाधान है. लेकिन कथा-संरचना यहाँ सीमित लगती है, क्योंकि मानवीकरण जटिल सामाजिक गतिशीलताओं को सरल बना देता है. हालांकि कहानीकार ने इसे यथार्थ से जोड़कर द्वंद्वों को जीवंत बनाया है.

स्त्रीवादी दृष्टि से ‘छाया’ विधवा के शोषण की कहानी है. सितारा मजबूत है. वह काम करती है, राम हरख की देखभाल करती है और मनचले लोगों के अनुचित प्रस्तावों को ठुकराती है. लेकिन समाज (पानवाला, मोटरसाइकिल वाला, बूढ़ी औरत) उसे यौन-इच्छा की पूर्ति के साधन की तरह देखता है. राम हरख का शक पितृसत्तात्मक है, जो विधवा को संदिग्ध मानता है और अंत में भांग पीकर रखा गया उसका अपना प्रस्ताव और उसकी निजी चाहत स्त्रियों का वस्तूकरण (थिन्गीफिकेशन या रेइफिकेशन) दर्शाता है. इकोफ़ेमिनिज्म के तहत सितारा प्रकृति की तरह है – मजबूत लेकिन शोषित. समाजशास्त्रीय शब्दावली में कहें तो कहानी में एजेंसी की कमी है, क्योंकि सितारा की आवाज़ प्रतिक्रियाशील होने के बावजूद उसकी दृढ़ता पितृसत्ता की आलोचना करती है.

उत्तर-उपनिवेशवादी लेंस से यह कहानी भारत के शहरीकरण को औपनिवेशिक विरासत के रूप में देखती है, जहाँ गांव से शहर की यात्रा विस्थापन का रूपक है. राम हरख ‘सबाल्टर्न’ है. हाशिए पर है, जहाँ स्लम ‘अन्य’ का स्थान है.

होमी भाभा की शब्दावली में कहें तो सितारा की स्वतंत्रता उपनिवेशवाद के बाद की ‘हाइब्रिडिटी’ दिखाती है, लेकिन शक की छाया औपनिवेशिक पदानुक्रम (शहर बनाम गांव) को बनाए रखती है. फ्रांसिस फैनन के मुहावरे में कहानीकार जाने-अनजाने उपनिवेशित मन की जांच करता है, जहाँ राम हरख का शक पहचान के संकट से उपजता प्रतीत होता है.

कुल मिलाकर ‘छाया’ हिंदी साहित्य में एक प्रभावशाली रचना है, जो यथार्थवाद को मनोविज्ञान से जोड़ती है. हरि भटनागर की कलात्मक सूक्ष्मता विभिन्न सिद्धांतों के आलोक में कहानी को पढ़ने से उभरती है– औपचारिक एकता, संरचनात्मक द्वंद्व, सामाजिक-आर्थिक असमानता, पितृसत्तात्मक दमन, उपनिवेशोत्तर हाशिया और अस्तित्ववादी रिक्तता. कहानी की कमजोरी भावुकता की अधिकता है, लेकिन यह समाज की ही प्रतिच्छाया है और कहानीकार को मानवीय कमजोरियों का गहन पर्यवेक्षक कलाकार साबित करती है.

उदारवादी स्त्रीवाद की दृष्टि से ‘छाया’ कहानी स्त्रियों के अधिकारों और स्वतंत्रता की कमी को उजागर करती है. सितारा एक विधवा है, जो नगीना की मौत के बाद घर चलाने के लिए कॉलोनी में झाड़ू-पोंछे और रोटी बनाने का काम करती है. यह उसकी आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक है. सितारा राम हरख की देखभाल करती है, घर संभालती है और लोगों के अनुचित प्रस्तावों (जैसे बूढ़ी औरत का रिश्ता या मोटरसाइकिल वाले की छेड़खानी) को ठुकराती है. वह कहती है, “मैं अब किसी पचड़े में पड़ने वाली नहीं. गृहस्थी बसाना गुलामी जैसा होगा.”

यह उसकी एजेंसी को दर्शाता है, जहाँ वह पितृसत्ता के बंधनों से मुक्त होना चाहती है. लेकिन समाज— पानवाला, पड़ोसी और राम हरख, उसकी स्वतंत्रता को संदेह की नज़र से देखते हैं. राम हरख का शक (“कहीं सितारा किसी गलत मंशा के अंदर न फँस जाए”) विधवा स्त्रियों पर पितृसत्ता द्वारा थोपे जाने वाले नैतिक बंधनों का उदाहरण है और उदार स्त्रीवाद इसकी आलोचना करता है कि कानूनी समानता के बावजूद सामाजिक पूर्वाग्रह स्त्रियों को बंधन में रखते हैं. कहानीकार यहाँ दिखाता है कि सितारा की मेहनत (अनपेड और पेड श्रम) परिवार को चलाती है, लेकिन उसकी आज़ादी पर पितृसत्ता की ‘छाया’ मंडराती रहती है, जो तमाम तरह के विकास के बावजूद स्त्रियों के अधिकारों की अपूर्णता का द्योतक है.

अंतर्विषयक स्त्रीवाद (Intersectional Feminism) का तर्क यह है कि लिंग (gender) के साथ-साथ जाति, वर्ग, धर्म, यौनिकता (sexuality) और विकलांगता जैसी पहचान के विभिन्न पहलू कैसे मिलकर उत्पीड़न और भेदभाव के अलग-अलग अनुभव बनाते हैं और यह किसी एक पहचान का योग मात्र नहीं होता. यह दृष्टि कहानी में सितारा की स्थिति को लिंग, वर्ग, उम्र और विधवा होने के चौराहे पर देखती है. किम्बर्ले क्रेंशॉ जैसे विचारकों की अवधारणा के तहत कहा जा सकता है कि सितारा की दुर्दशा एकललिंगी असमानता नहीं, बल्कि बहुस्तरीय है: वह गरीब है (स्लम) विधवा है (संदेह की शिकार) और स्त्री है (शोषण का लक्ष्य). बूढ़ी औरत का प्रस्ताव (“कब तक तू यूँ छूछी बैठी रहेगी”) विधवाओं पर थोपे गए ‘शादी के दबाव’ को दिखाता है, जो वर्गीय जरूरतों से जुड़ा है. राम हरख का शक अंतर्विषयक है. वह खुद बुजुर्ग और परनिर्भर है, लेकिन पितृसत्ता उसे स्त्रियों पर नियंत्रण का अधिकार देती है.

हरि भटनागर भारतीय संदर्भ में अमेरिकी स्त्रीवादी बेल हुक्स की तरह नस्ल/जाति को भी विमर्श का बिंदु बनाने की कोशिश करते हैं (हालांकि यह बिलकुल स्पष्ट नहीं है ), जहाँ स्लम की कामगार स्त्रियाँ बहुस्तरीय उत्पीड़न झेलती हैं. कहानी की ताक़त यह है कि सितारा इन स्थितियों में भी दृढ़ रहती है, लेकिन कमजोरी यह है कि उसकी एजेंसी सीमित है. वह राम हरख की मौत पर मातम करती है, जो उस पर पितृसत्ता द्वारा उसके अनजाने लादे गए भावनात्मक बोझ (इमोशनल बर्डन) को दर्शाता है. याद रहे कि सितारा का रुदन हमें शिद्दत से याद दिलाता है कि स्त्री होने के साथ ही बुनियादी रूप से प्रथमत: वह इंसान है.इसलिए पतित मानसिकता वाले बूढ़े ससुर की मृत्यु के बाद उसका रोना इंसानियत की जीत है और यह महर्षि वाल्मीकि के एक सुविख्यात श्लोक का स्मरण कराता है जिसमें कहा गया है कि कि मृत्यु के साथ ही वैर भी समाप्त हो जाता है:

मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम्
क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ॥

(वाल्मीकि रामायण:युद्धकाण्ड -111-17)

कुल मिलाकर, ‘छाया’ कहानी स्त्रीवादी सिद्धांतों की रोशनी में पितृसत्ता की ज़बरदस्त आलोचना प्रस्तुत करनेवाली समर्थ रचना प्रतीत होती है. कहानीकार सितारा को पीड़ित नहीं, बल्कि प्रतिरोधी बनाता है, जो स्त्रीवादी की वैचारिकी से जुड़ता है. लेकिन कहानी की सीमा यह है कि इसका अंत पुरुष-केंद्रित है (राम हरख की मौत पर सितारा का विलाप), जो एक सामाजिक वास्तविकता है और यह अबतक स्त्रियों को पितृसत्ता के शिकंजे से पूरी तरह आज़ाद नहीं होने दे रही है.

“छाया” कहानी को इकोफेमिनिज़्म (Eco-feminism) के नज़रिए से पढ़ते ही पूरा परिदृश्य बदल जाता है. इकोफेमिनिज़्म वह स्त्रीवादी चिंतनधारा है जो मानती है कि जिस तरह पितृसत्ता ने औरतों को दबाया है, ठीक उसी तरह पूँजीवादी-औद्योगिक व्यवस्था ने प्रकृति को भी दबाया, शोषित किया और ‘अन्य’ बना दिया है. अमूमन औरत और प्रकृति, दोनों को उपभोग की वस्तु, प्रजनन की मशीन और ‘गंदा’ माना गया है. ‘छाया’ कहानी में यह संबंध बहुत स्पष्ट और दर्दनाक ढंग से उभरता है.

कहानी की पूरी पृष्ठभूमि ‘गंदी बस्ती’ है. नाला, कीचड़, ठहरा हुआ बदबूदार पानी, कचरे का ढेर, पीपल का अकेला पेड़, उल्लू आदि. यह कोई प्राकृतिक सुषमा से भरपूर क्षेत्र नहीं है; यह पूँजीवादी दोहन की शिकार, कचरे में डूबी, बदबू मारती बजबजाती प्रकृति है. ठीक वही स्थिति है जिसे इकोफेमिनिस्ट वंदना शिवा ‘विकास’ के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों की ज़मीनों, जंगलों और नदियों की दुर्दशा बताती हैं.

सितारा और यह बस्ती एक ही शरीर जैसे हैं. दोनों को ‘गंदा’ कहा जाता है, दोनों पर लोग कचरा फेंकते हैं, दोनों को ‘साफ़’ करने की ज़िम्मेदारी औरतों की ही है (सितारा झाड़ू लगाती है, नाले पर झुकती है). जब सितारा काम पर जाती है तो कॉलोनियों की ‘साफ़-सुथरी’ दुनिया उसे इस्तेमाल करती है और वापस गंदी बस्ती में धकेल देती है, ठीक वैसे ही जैसे विकास प्रकृति को लूटकर कचरे का ढेर छोड़ जाता है.

फ्रांस्वा दॉबोन और ग्रेटा गार्ड सरीखे इकोफेमिनिस्ट विचारकों के अनुसार औरत का शरीर और पृथ्वी, एक ही तरह शोषित होते हैं. प्रजनन के लिए इस्तेमाल करो, दूध निकालो, फिर फेंक दो. नगीना की मौत के बाद सितारा अपना सारा शारीरिक और भावनात्मक श्रम राम हरख पर उड़ेल देती है. वह घर चलाती है, रोटी बनाती है, बुजुर्ग की सेवा करती है. लेकिन जैसे ही वह थोड़ी-सी स्वतंत्रता दिखाती है (काम पर जाना, हँसना, अपने पाँव खोलकर बैठना) वैसे ही समाज उसे ‘उपलब्ध’ मान लेता है. उसके ‘चाँदी जैसे चमकते पाँव’ देखकर राम हरख की आँखें ललचा उठती हैं. यह ठीक वही नज़र है जो जंगल को देखकर लकड़हारा या खनन कंपनी को ललचाती है. प्रकृति और सितारा दोनों ‘सुंदर’ होने की सज़ा भुगतते हैं.

भारतीय इकोफेमिनिज़्म में विधवा को अक्सर “बंजर ज़मीन” कहा जाता है. वह न प्रजनन कर सकती है, न उपजाऊ है, इसलिए उसका कोई मूल्य नहीं. कहानी में बूढ़ी औरत सितारा से कहती है: ‘कब तक तू यूँ छूछी बैठी रहेगी?’ यही भाषा किसान सूखी ज़मीन के लिए इस्तेमाल करते हैं. ‘छूछी पड़ी है, कुछ बोया नहीं जा रहा.‘ सितारा का जवाब है: ‘गृहस्थी बसाना गुलामी जैसा होगा’. यह एक बहुत बड़ा इकोफेमिनिस्ट बयान है. प्रकृति भी कह रही है कि मुझे ज़बरदस्ती फिर से ‘उपजाऊ’ बनाने की कोशिश मत करो, मुझे मेरी स्वतंत्रता लौटा दो.

नाला इस कहानी में बार-बार आता है. वह ठहरा हुआ है, बदबूदार है, कीचड़ से भरा है. औरतें उसी नाले के किनारे कपड़े धोती हैं, बर्तन माँजती हैं, बच्चों को शौच के लिए भेजती हैं,नहलाती हैं. यह ठीक वही प्रतीक है जिसका इस्तेमाल मारिया माइज़ ने अपनी किताब ‘इकोफेमिनिज्म’ ( Ecofeminism) में किया है: दूषित नदियाँ और दूषित स्त्री-शरीर, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. दोनों को ‘साफ़ करने’ का बोझ औरत पर ही डाला जाता है.

इस नज़रिए से देखने पर राम हरख का भांग खाकर सितारा के सामने अनुचित प्रस्ताव रखने की कोशिश और नाले के किनारे गिर पड़ना, आँखें खुली रह जाना, आँसू निकलना, लेकिन बोल नहीं पाना आदि पितृसत्तात्मक-पूँजीवादी व्यवस्था का अंत है जो प्रकृति और औरत दोनों को एक साथ कुचलकर खुद भी मर जाती है. सितारा ज़ोरों से रोती है. यह रोना सिर्फ़ राम हरख के लिए नहीं, बल्कि उस पूरे तन्त्र के लिए है जो उसे जीने नहीं देता.

‘छाया’ कहानी में प्रकृति और औरत एक ही तरह की ‘छाया’ में जी रही हैं— दोनों को ‘गंदा’ कहा जाता है, दोनों को इस्तेमाल किया जाता है, दोनों पर संदेह किया जाता है और दोनों ही अंत में चुपचाप विलाप करती हैं. इकोफेमिनिस्ट दृष्टिकोण से यह कहानी सिर्फ़ एक विधवा की कहानी नहीं, बल्कि उस पूरी पृथ्वी की कहानी है जिसका ‘विकास’ के नाम पर घर्षण और दोहन किया जा रहा है. सितारा और नाला, राम हरख और कचरे का ढेर, पानवाला और मोटरसाइकिल वाला— सब मिलकर एक ही सभ्यता की तस्वीर बनाते हैं, जो प्रकृति और औरत दोनों को कुचलकर खड़ी हुई है. इसलिए जब सितारा अंत में रोती है, तो वह सिर्फ़ अपने ससुर के लिए नहीं रोती— वह उस जंगल के लिए रो रही है जो कट गया, उस नदी के लिए रो रही है जो सूख गई और अपनी उस देह के लिए रो रही है जो कभी उसकी अपनी नहीं रही. यही इकोफेमिनिज़्म का सबसे गहरा और सबसे दर्दभरा संदेश है जो कला के स्तर पर ‘छाया’ कहानी में भी समाहित है.

इस कहानी को उत्तर-उपनिवेशवादी इकोफेमिनिज़्म (Postcolonial Ecofeminism) के नज़रिए से पढ़ना बेहद दिलचस्प अनुभव है. पोस्टकोलोनियल इकोफेमिनिज़्म वह सिद्धांत है जो उपनिवेशवाद की विरासत (जैसे अन्यीकरण, हाइब्रिडिटी और सांस्कृतिक वर्चस्व) को इकोफेमिनिज़्म के साथ जोड़ता है, जहाँ औरतों और प्रकृति के शोषण को एक ही सिक्के के दो पहलू माना जाता है. यह धारा वंदना शिवा और ग्रेटा गार्ड जैसी विचारकों से प्रेरित है और बताती है कि उपनिवेशवाद ने न सिर्फ़ भूमि और संसाधनों को लूटा, बल्कि औरतों को भी “प्रकृति” की तरह गुलाम बनाया. दोनों को “औपनिवेशित अन्य” (colonized other) के रूप में देखा गया. ‘छाया’ कहानी में यह सिद्धांत बहुत गहराई से उभरता है, जहाँ शहरी स्लम की पृष्ठभूमि पर ग्रामीण-शहरी विस्थापन, औरतों का शोषण और पर्यावरणीय गिरावट एक साथ जुड़ते हैं. कहानी राम हरख की है, जो गांव से शहर आता है, लेकिन बेटे की मौत के बाद बहू सितारा के साथ झुग्गी में फँस जाता है. यह उपनिवेशवाद के बाद के भारत की हक़ीक़त है, जहाँ ‘विकास’ के नाम पर ग्रामीण जीवन नष्ट होता है और स्त्रियाँ दोहरे शोषण की शिकार होती हैं.

‘पोस्टकोलोनियल इकोफेमिनिज़्म’ की मूल अवधारणा गायत्री स्पिवाक की “सबाल्टर्न” (subaltern) और वंदना शिवा की “मोनोकल्चर” से जुड़ती है, जहाँ हाशिए पर पड़े लोग (ख़ासकर स्त्रियाँ ) और भूमि दोनों, औपनिवेशिक ताकतों के शिकार हैं. ‘छाया’ कहानी में स्लम (‘गंदी बस्ती’) एक उपनिवेशित स्थान है- नाला, कीचड़, कचरे का ढेर. यह ठीक वैसी ही ‘बर्बाद भूमि’ है जो ब्रिटिश उपनिवेशवाद के बाद के “विकास मॉडल” (जैसे शहरीकरण और औद्योगीकरण) ने पैदा की है. राम हरख गांव छोड़कर शहर आता है क्योंकि “खेती-बाड़ी संभलती न थी”.  होमी के. भाभा की अवधारणा के तहत यह ग्रामीण भारत की ‘हाइब्रिडिटी’ है, जहाँ उपनिवेशी कृषि नीतियों ने भूमि को बंजर बना दिया और अब पूँजीवादी मॉडल पर विकसित महानगर इसे चूस रहे हैं. सितारा इस बस्ती की ‘प्रकृति’ है. वह झाड़ू लगाती है, बर्तन धोती है, रोटी बनाती है. उसका श्रम ठीक वैसा ही है जैसे आदिवासी औरतें जंगलों को बचाती हैं, लेकिन दोनों को “गंदा” माना जाता है. जब पानवाला कहता है “गंदी बस्ती”, तो यह उपनिवेशी नज़र है जो गरीब औरतों और प्रदूषित भूमि को एक साथ ‘अशुद्ध’ ठहराती है. सितारा की स्वतंत्रता (काम पर जाना) उसे संदिग्ध बनाती है, ठीक वैसे ही जैसे उपनिवेशवाद के बाद परंपरा और आधुनिकता के बीच फँससकर स्त्रियाँ ‘बदचलन’ करार दी जाती हैं.

कहानी में औरत और प्रकृति का शोषण एक साथ चलता है, जो ‘पोस्टकोलोनियल इकोफेमिनिज़्म’ की कुंजी है. सितारा विधवा है और समाज (राम हरख, पानवाला, मोटरसाइकिल वाला) उसे यौन-क्षुधा मिटाने के लिए ‘उपलब्ध’ मान लेता है. यह ठीक वैसा ही है जैसे उपनिवेशी शासक भूमि को ‘ख़ाली’ मानकर कब्जा करते थे. बूढ़ी औरत का प्रस्ताव (‘कब तक तू यूँ छूछी बैठी रहेगी’) विधवा को “बंजर ज़मीन” बनाता है, जो वंदना शिवा की ‘Staying Alive’ में वर्णित कृषि-उपनिवेशवाद से जुड़ता है. जहाँ औरतें और भूमि दोनों ‘उपजाऊ’ बनने के लिए दबाव में रहती हैं. सितारा का जवाब (‘एक के साथ जो सुख मिला, जरूरी नहीं दूसरा भी सुख दे’) प्रतिरोध है, जो उपनिवेशवाद के बाद की स्त्रियों की आवाज़ है— वे न तो पुरानी परंपरा मानती हैं, न नई पूँजीवादी गुलामी. लेकिन राम हरख का शक और अंत में भांग पीकर उसका सितारा के ‘चाँदी जैसे पाँव’ देखकर ललचाना पितृसत्ता और उपनिवेशी वर्चस्व का मेल है. वह सितारा को ‘ज़मीन’ की तरह कब्जाने की सोचता है, जैसे उपनिवेशक भूमि को कब्जाने के लिए तत्पर रहता है. नाला यहाँ प्रतीक है. ठहरा हुआ, बदबूदार, जो उपनिवेशी विकास ने पैदा किया है और सितारा उसी के किनारे ज़िन्दगी व्यतीत करती है – ठीक वैसी ही दूषित और शोषित.

कुल मिलाकर, ‘छाया’ कहानी पोस्टकोलोनियल इकोफ़ेमिनिज़्म के लेंस से देखने पर एक सामर्थ्यवान रचना प्रतीत होती है, जो बताती है कि उपनिवेशवाद की छाया में औरतें और प्रकृति एक साथ कुचली जा रही हैं. कहानीकार स्लम को एक उपनिवेशित शरीर बनाता है, जहाँ सितारा की ज़द्दोजहद हमें सोचने पर मजबूर करती है कि असली मुक्ति कब आएगी—जब स्त्रियों और भूमि दोनों को ‘अन्य’ मानना बंद होगा. यह कहानी हिंदी साहित्य में पर्यावरण-संकट और लैंगिक असमानता के मुद्दे को कमोबेश उजागर करती हुई समानता और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकसम्मत इस्तेमाल (सस्टेनेबिलिटी) की अपील करती है.

 

4)

इस संग्रह की अंतिम कहानी ‘अग्नि परीक्षा’ है, जो समकालीन हिन्दी कथा-संसार में एक अद्वितीय स्थान रखती है. वजह यह कि यह कहानी मनुष्य की अंतरात्मा, अपराधबोध या निजी मनोव्याकुलता की कथा नहीं, बल्कि कला, सत्ता, सौंदर्य और सांस्कृतिक नियंत्रण की भयावह राजनीति का रूपक है. यह कहानी एक ऐसे संसार को रचती है जहाँ शिल्प और सौंदर्य की सभी चमक दरअसल दमन की चमक है, और जहाँ कविता केवल भाव नहीं, बल्कि अनुशासन, वर्चस्व और सत्ता के आदेशों से निर्मित एक वस्तु है.

गौरतलब है कि उस ‘भवन’-विशेष में स्त्री देह केवल एक साहित्यिक विषय नहीं; यह सत्ता द्वारा सौंदर्य के एकतरफ़ा निर्माण का सबसे बड़ा संकेत है. इसमें स्त्री देह का सौंदर्य नहीं, सत्ता का नैतिक प्रतिमान छिपा है. सत्ता तय करती है कि कवि क्या देखेगा, कैसे देखेगा, किसे सुनेगा और किसे अनसुना कर देगा. कहानी में दिलचस्प तरीके से वर्णन है कि कैसे ऐशगाह में उपस्थित सात कवि इस संरचना के दास हैं; वे स्वतंत्र सृजनकर्ता नहीं, अनुशासन के पालनकर्ता हैं. उनका मौन इस बात का प्रमाण है कि कला का संसार यहाँ संवाद और रचनात्मकता पर नहीं, बल्कि आदेश और अनुशासन पर आधारित है. कहानी में धूलदास की एक विचित्र हिदायत का ज़िक्र है जो स्थिति को उजागर करता है—‘कवि एक-दूसरे से बात नहीं करेंगे. कोई हँसेगा नहीं. कविता बाहर नहीं ले जाई जाएगी.‘

यह सृजन का अनुशासन नहीं; यह सत्ता का अनुशासन है. यह कला को नियंत्रित करने की उस राजनीति की ओर संकेत करता है जहाँ विचार, भाषा और सौंदर्य को स्वतंत्र नहीं रहने दिया जाता, बल्कि उन्हें सत्ता के स्वाद के अनुसार ढाला जाता है. कहानी का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें लाभ-लोभ के व्याकरण से परिचालित कवि स्वयं भी इस दमन-संरचना का हिस्सा बन जाना चाहता है. वह अपनी स्वीकृति की राह में अपनी स्वतंत्रता, अपनी संवेदना और यहाँ तक कि अपनी कविता तक गिरवी रखने को तैयार दिखता है. कहानी के एक अंश में कवि का यह आंतरिक द्वंद्व बेहद तीव्र रूप में सामने आता है—‘मैंने सोचा, यदि भीतर प्रवेश मिल जाता तो शायद मैं भी उन सात में शामिल हो जाता.‘

यहाँ प्रवेश की इच्छा कोई उपलब्धि नहीं; यह आत्मविनाश का संकेत है. यह बताती है कि सत्ता-निर्मित सौंदर्य की चमक मोहक और भयावह दोनों हो सकती है. यही ‘अग्नि परीक्षा’ का सबसे बड़ा रूपक है. अग्नि वह नहीं जिसे पार कर नायक पवित्र होता है; वह ‘अग्नि’ आतंरिक है, जिसमें काव्य-सृजन की स्वतंत्रता और रचनात्मक संभावनाएं भस्म हो जाती हैं.

कहानी का व्यंग्य सूक्ष्म, पर आवेगपूर्ण है. धूलदास का स्त्री देह के अवयवों में ‘रस’ खोजने का आग्रह, कवियों पर लगाए गए नियम और ऐशगाह का वैभव—ये सब मिलकर एक ऐसे संसार की तस्वीर बनाते हैं जहाँ कला की आत्मा को मारकर उसका उपभोग किया जाता है. यह उपभोग भौतिक भी है और वैचारिक भी.हरि भटनागर का व्यंग्य किसी चुटीलेपन या सतही कटाक्ष का व्यंग्य नहीं; यह संरचनात्मक व्यंग्य है. जिसमें सत्ता की ‘सौंदर्यशास्त्र की राजनीति’ (Politics of Aesthetics) पूरी तरह उघड़ जाती है.

याद रहे कि फ्रैंकफर्ट स्कूल (एडोर्नो, बेंजामिन, ब्रेख्त, लुकाच, ब्लोच) द्वारा तैयार किए गए एक प्रमुख ग्रंथ ‘सौंदर्यशास्त्र और राजनीति’ (Aesthetics and Politics) में पूँजीवाद के तहत कला की भूमिका की पड़ताल करते हुए ज़ोर देकर कहा गया है ​​कि ‘बुर्जुआ’ कला में भी संभावित मुक्ति के तत्त्व होते हैं, जो कला में सरलीकृत राजनीतिक निर्देशों के ख़िलाफ़ और इसकी आलोचनात्मक शक्ति के लिए तर्क के साधन बनते हैं. एडोर्नो ने लिखा है कि उच्च कला और लोकप्रिय कला, दोनों ‘पूँजीवाद के कलंक’ को वहन करती है और दोनों में परिवर्तन के तत्त्व भी होते हैं.

संरचनावाद की दृष्टि से ‘ऐशगाह’ एक प्रकार का कोडित तंत्र है, एक संकेत-प्रणाली- जिसके भीतर सौंदर्य, रस, कविता, कलाकार, विषय और अनुशासन – सब कुछ पहले से निर्धारित और संरचित है. कहानी में सौंदर्य को एक विशिष्ट संरचना के भीतर बाँध दिया गया है; वह संरचना धूलदास द्वारा दी गई है, जिसके अनुसार “कविता का विषय स्त्री-देह ही होगा”. इस संरचना में स्त्री देह, कला का ‘स्वतंत्र विषय’ नहीं, बल्कि एक संकेत है; वह संकेत एक ऐसी सत्ता की ओर इंगित करता है जो अपने सौंदर्यशास्त्रीय मानकों को स्थिर कर चुकी है. यह स्थिरता ही संरचना है और कवि उसकी परिधि में स्थित एक तत्त्व. उसके लिए रस, सौंदर्य और विषय पहले से तय हैं. इस तरह कहानी एक ऐसे बंद तंत्र को रचती है जो संरचनावाद की उस अवधारणा को सत्यापित करता है कि अर्थ कभी व्यक्तिगत नहीं; वह संरचना द्वारा निर्मित होता है. लेकिन कहानी का पाठ वहीं ठहर नहीं जाता.

उत्तर-संरचनावाद का आग्रह है कि कोई भी संरचना स्थिर नहीं होती; वह अपने भीतर ही अंतर्विरोध, बहुविकल्प और विचलन को जन्म देती है. ‘अग्नि परीक्षा’ में यही विचलन कवि के मन में प्रवेश की इच्छा और भय के बीच पैदा होता है. वह कहता है, “यदि भीतर प्रवेश मिल जाता तो शायद मैं भी उन सात में शामिल हो जाता”. यह प्रवेश की इच्छा दरअसल उस संरचना को स्वीकार करने की इच्छा है जिससे उसके भीतर भय भी है. कवि का यह संकोच और चाह दोनों यह दिखाते हैं कि संरचना कलाकार को परिभाषित करती है, पर कलाकार भी संरचना के भीतर अपनी अनिश्चितता और विचलन के माध्यम से अर्थ को अस्थिर करता है. धूलदास की सत्ता स्थिर दिखती है, पर उसके भीतर भी विघटन के बीज विद्यमान हैं. सात कवियों की निस्तब्धता भी एक प्रकार की विसंगति पैदा करती है और कहानी का पूरा संसार अपने भीतर से ही अपनी संरचना को चुनौती देता रहता है.

यहाँ देरिदा का विखंडनवाद अपनी पूरी शक्ति से कथा को खोलना शुरू करता है. देरिदा के अनुसार कोई भी पाठ ‘मौजूद’ अर्थ नहीं देता; वह अपने भीतर अर्थ के स्थगन, दोहरेपन, विरोधाभास और फिसलन को समेटे रहता है. ‘अग्नि परीक्षा’ में ऐशगाह का वैभव और अनुशासन जितना स्पष्ट लगता है, उतना ही वह भीतर से अस्थिर है. काँच का दरवाजा – जिसमें से कवि बाहर से भीतर को देख सकता है, पर प्रवेश नहीं कर सकता; स्वयं एक ऐसे द्वैध-संकेत की तरह उभरता है जो खुलापन और बंदिश दोनों को एक साथ व्यक्त करता है. यह ‘द्वैध’ देरिदा की उस अवधारणा की याद दिलाता है कि हर संकेत अपने उलट अर्थ को भी साथ लेकर चलता है. ‘ऐशगाह’ जितना आकर्षक है, उतना ही भयावह; जितना सौंदर्य का केंद्र है, उतना ही दमन का भी. कविता जितनी मुक्त दिखती है, उतनी ही नियंत्रित. स्त्री देह जितनी सौंदर्य का स्रोत मानी जाती है, उतनी ही सत्ता की वस्तु बन जाती है.

देरिदा के विखंडन में सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व है अर्थ की स्थिरता का टूटना. कहानी में धूलदास द्वारा प्रस्तुत तथाकथित सौंदर्य-दर्शन स्वयं अपने भीतर विखंडित है. वह एक ओर रस की बात करता है, दूसरी ओर कवियों की स्वतंत्रता को समाप्त करता है,जिसके बगैर भरत,आनंदवर्धन,अभिनवगुप्त से लेकर पंडितराज विश्वनाथ की शब्दावली में कहें तो वह ‘सत्वोद्रेक’ असंभव है जो रस परिपाक की बुनियाद है. कहानी में धूलदास की सत्ता जितनी स्पष्ट है, उतनी ही नाजुक भी; उसका ‘रस-ज्ञान’ जितना निर्णायक लगता है, उतना ही उसके अपने अहंकार और वर्चस्व पर टिका हुआ है. धूलदास नाम भी बेहद व्यंजक है, क्योंकि इसे विखंडित करने पर पता चलता है कि वह बड़े राजनेताओं की चरणपादुका की धूल को ‘चरण रज’ मानते हुए अपने माथे पर लगाकर सांस्कृतिक साम्राज्य के शिखर पर आसीन है. अप्रत्यक्ष रूप में इस विखंडन से कहानी स्पष्ट करती है कि कोई भी सौंदर्यशास्त्र निरपेक्ष नहीं; वह सत्ता का उत्पाद भी है और उसका उपकरण भी. यही वह बिंदु है जहाँ कहानी केवल कला की राजनीति का आख्यान नहीं रहती; वह स्वयं पाठ की राजनीति का उदाहरण भी बन जाती है.

वस्तुत: ‘अग्नि परीक्षा’ कहानी जैक्स देरिदा के दार्शनिक ढांचे पर विचार के लिए बहुत उपयुक्त टेक्स्ट है. याद रहे कि विखंडन सिद्धांत (‘डिकंस्ट्रक्शन’) पाठों में स्थिर अर्थों, पदानुक्रमों और संरचनाओं को तोड़ता है. ऊपर अन्य कहानियों के विश्लेषण-क्रम में द्वंद्व विरोधों, ‘डिफरांस’ और ‘लोगोसेंट्रिज्म’ का जिक्र किया जा चुका है,लेकिन पाठ की गहराई में उतरकर गोताखोरी करने पर समझ में आता है कि कहानीकार के अनजाने में ही यह कहानी देरिदा के अनेक अतिसूक्ष्म विचारों—ट्रेस, अपोरिया, सप्लीमेंट, फार्माकॉन और हॉंटोलॉजी—को कैसे अपनाए हुए है. ये अवधारणाएं कहानी में सांस्कृतिक संस्थाओं, सौंदर्यशास्त्र और सत्ता की आलोचना को उजागर करती हैं और रचना को एक स्थिर रूपक के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसे पाठ के रूप में प्रस्तुत करती हैं जो अपनी नींवों को लगातार कमजोर करता रहता है और कला और समाज में अर्थ की अस्थिरता को दर्शाता है.

देरिदा की ‘अवशेष’ या ‘ट्रेस’ (Trace) की अवधारणा अनुपस्थित चीज़ों के बचे हुए निशान को संदर्भित करती है, जहाँ अर्थ कभी पूरी तरह उपस्थित नहीं होता,बल्कि हमेशा पहले के संकेतकों के अवशेषों से स्थगित होता रहता है. ‘अग्नि परीक्षा’ में कविता के अनिवार्य विषय के तौर पर स्त्री का शरीर—पितृसत्तात्मक और संस्थागत नियंत्रण का ‘ट्रेस’ है. यह रस (सौंदर्य सार) के केंद्र के रूप में कथित तौर पर ‘उपस्थित’ है, लेकिन यह एक अनुपस्थिति का ट्रेस है,क्योंकि कहानी के ‘आला अफ़सर’ की हिदायतनुमा सलाह के तहत स्त्री की स्वायत्तता, आवाज और वास्तविक अनुभव मिटा दिए जाते हैं और इसे केवल वस्तुबद्ध प्रशंसा तक सीमित कर दिया जाता है. धूलदास के नियम (“कविता का विषय स्त्री-शरीर की व्याख्या और उसकी प्रशंसा आदि) भारतीय काव्यशास्त्रीय मान्यताओं का अन्याथाकरण करते हैं, लेकिन ट्रेस एक फिसलन दिखाता है. शरीर प्रामाणिक सुंदरता का नहीं बल्कि सत्ता के थोपे जाने के भूत का संकेत करता है, जो प्रकारांतर से उत्तर-औपनिवेशिक भारत में औपनिवेशिक या कुलीन पदानुक्रमों को गूंज सिद्ध होता है.

इतना ही नहीं, कहानी में ‘यश:प्रार्थी’ कवि का अनकहा आंतरिक संघर्ष प्रतिरोध का ‘ट्रेस’ छोड़ता है. ऐशगाह में प्रवेश करने की उसकी तमन्ना और पूरी तरह शामिल न होने की हिचक (‘मैंने सोचा, अगर प्रवेश मिल जाए तो शायद मैं भी उन सात में शामिल हो जाऊं’) एक अनुपस्थित विद्रोह का ट्रेस है, जो कहानी को अनकहा के माध्यम से विखंडित करता है. यह देरिदा के ‘ऑफ ग्रामेटोलॉजी’(1967) में व्यक्त विचार से मेल खाता है कि लेखन ट्रेसों की एक प्रणाली है, जहाँ उपस्थिति (संस्थागत स्वीकृति) अनुपस्थित (रचनात्मक स्वतंत्रता) से कमजोर होती है. कहानी के अंत में मौन इसकी पुष्टि करता है, जिसके तहत कोई समाधान नहीं होने से कलात्मक मुक्ति का लगातार स्थगन ट्रेस होता है, जो विलासी संस्कृतिकर्मियों दवारा ‘ऐशगाह’ के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली सांस्कृतिक अकादमियों में कला को वस्तु बनाने की आलोचना करता है.

कवि समावेशन चाहता है, लेकिन ऐसे विचित्र माहौल में सच्ची रचनात्मकता के फलने फूलने की कोई संभावना न होने की वजह से वह एक ऐसी स्थिति का का सामना करता है जो अनुरूपता थोपती है. देरिदा’ अपोरियाज’ (1993) में ऐसे विरोधाभासी वातावरण की आलोचना करते हैं जहाँ कलात्मक ‘जीवन’ (रस) के लिए स्वायत्तता की ‘मृत्यु’ जरूरी हो. ‘अग्नि परीक्षा’ कहानी भारतीय सांस्कृतिक संस्थाओं में सामाजिक अपोरियाओं को दर्शाता है जहाँ संरक्षण (जैसे राज्य-प्रायोजित अकादमियां) अभिव्यक्ति को सक्षम करता है, लेकिन असहमति को दबाता है.

थोड़ी और गहराई से देखने पर इस कहानी में देरिदा की ‘अपोरिया’ आली धारणा लैंगिक प्रतिनिधित्व तक प्रसरित प्रतीत होती है. कहानी में धूलदास दवारा स्त्री-शरीर को सुंदरता का परम संकेतक बनाया जाता है, लेकिन इसकी थोपी गई केंद्रीयता एक गतिरोध पैदा करती है. वजह यह कि किसी की अतिशय प्रशंसा उसका वस्तुकरण करती है और वैकल्पिक विषयों (जैसे सामाजिक न्याय या ‘संकर’(हाइब्रिड) पहचानें, जैसा कि हरि भटनागर की अन्य कहानियों में भी है ) को बाहर करती है. यह देरिदा की ‘फैलोगोसेंट्रिज्म’ की आलोचना को प्रतिध्वनित करता है (पुरुष-केंद्रित लोगोस का विशेषाधिकार), जहाँ पाठ का गतिरोध पाठक को व्यग्र करता है कि क्या कला बिना खुद नष्ट हुए कभी सत्ता के चंगुल से बच सकती है? कहानी का अचानक मौन अंत इस अपोरिया को अपनाता है, समापन से इनकार करता है और पाठकों को व्याख्यात्मक अनिर्णय में धकेलता है.

देरिदा द्वारा ‘ऑफ ग्रामेटोलॉजी’ में बहुविध विवेचित ‘सप्लीमेंट’ एक ऐसी चीज़ है जो कथित पूर्णता को पूरा करने के लिए जोड़ी जाती है, लेकिन यह मूल की अंतर्निहित कमी को उजागर करती है. ‘अग्नि परीक्षा’ में ऐशगाह खुद ‘प्रामाणिक’ कला का सप्लीमेंट है: इसके शानदार पर्दे और कांच के दरवाजे कवियों की रचनात्मकता को सप्लीमेंट करते हैं, पूर्णता (संस्थागत मान्यता) का वादा करते हैं लेकिन लेखकीय स्वाधीनता की कमी उजागर करते हैं जिसके के बिना कारयित्री सत्वोद्रेक और भावयित्री भावोद्रेक असंभव है. धूलदास के नियम शास्त्रीय सौंदर्यशास्त्र को सप्लीमेंट करते हैं, लेकिन यह जोड़ मूल (जैसे रस-निष्पत्ति में भावनात्मक तीव्रता) को कमजोर करता है और दिखाता है कि ‘सप्लीमेंट’ ख़तरनाक ढंग से उस चीज़ को प्रतिस्थापित कर देते हैं जिसे वे बढ़ाने का दावा करते हैं.

इस धारणा का गहरा अनुप्रयोग दिखाता है कि कवि प्रणाली का सप्लीमेंट है. उसका संभावित प्रवेश सात कवियों को के बजाय उसे ‘पूर्ण’ करेगा, लेकिन यह कथित ‘ऐशगाह’ की उस बहुत बड़ी कमी उजागर करता है जिसके तहत बिना बाहर से आने वालों के समावेशन की लालसा रखनेवाली संस्था की सत्ता का अर्थ खो जाता है. यह पदानुक्रमों को उलट देता है—परिधि (महत्वाकांक्षी कवि) केंद्र (धूलदास) को सप्लीमेंट करती है और उसके अधिकार को ‘डिकंस्ट्रक्ट’ करती है. ‘अग्नि परीक्षा’ का पाठ(टेक्स्ट) रचते हुए सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ में कहानीकार इसका इस्तेमाल भारतीय साहित्य में पुरस्कार या संरक्षण जैसे सप्लीमेंटों की आलोचना के लिए करता है जो रचनात्मक पारिस्थितिकी में खालीपन को भरने का दावा करने के बावजूद कुलीनता को बनाए रखते हैं. विवेच्य कहानी के भोपाल-प्रेरित सेटिंग पर गौर करने से यह आंतरिक सच उजागर हुए बिना नहीं रहता. कुल मिलाकर ‘सप्लीमेंट’ इस प्रकार कहानी में सत्ता-संरचना के अनुकूलन के तहत कला की लगातार अपूर्णता को उजागर करता है.

‘मार्क्स के प्रेत’ (1993) में देरिडा की ‘हॉंटोलॉजी’ (ऑंटोलॉजी की तर्ज़ पर खिलन्दरे अंदाज़ में निर्मित एक शब्द ) कहती है कि वर्तमान को अनुपस्थित भविष्यों के साथ ही अतीत भी सताता है, जहाँ स्थगित न्याय भूतिया रूप से लौटता है. ‘अग्नि परीक्ष’ कहानी भी एक हद तक हॉंटोलॉजिकल है जिसमें कथित ‘ऐशगाह’ स्वतंत्र कला के प्रेत से आतंकित है, जो अनुपस्थित लेकिन कवि की इच्छा और सातों के मौन पर जोर देती है. इस कहानी का शीर्षक हर भारतीय भाषा में मौजूद रामोपाख्यान में सीता की अग्नि परीक्षा का स्मरण कराते हुए रचना को पौराणिक ‘ट्रेस’ से सताता है—आधुनिक समय में कला में ‘शुद्धता’ की शर्ते प्राचीन दमन को प्रतिध्वनित करती हुई लिंग और सत्ता के अनसुलझे अन्यायों का भूतिया अनुस्मारक प्रतीत होती हैं.

‘अग्नि परीक्षा’ कहानी प्रकारांतर से समकालीन भारत को औपनिवेशिकता और नवउदारवाद के प्रेतों से ग्रस्त बताती हुई आम जनता से प्राप्त कर के पैसे से परिचालित सरकारी अकादमियों में हाशिए की आवाजों (जैसे प्रगतिशील, स्त्रीवादी, अम्बेडकरवादी /दलित,आदिवासी साहित्य) को दबाने की रणनीति का पर्दाफ़ाश करती है. ऐसी संस्थाएँ समावेशन (इंटीग्रेशन) का वादा करती हैं, लेकिन न्याय स्थगित रखती हैं. कहानी के अंत का मौन हॉंटोलॉजिकल है. विद्रोह की अनुपस्थिति भविष्य के प्रतिरोध को भूतिया रूप से बुलाती हुई कला में दूरगामी प्रगति को डिकंस्ट्रक्ट करती है. विवेच्य कहानी संग्रहमें ‘अग्नि परीक्षा’ शीर्षक यह बहुअर्थी पाठ इस प्रकार एक भूतिया अभिलेख बन जाता है, जहाँ देरिदा का ‘मसीहाई’ न्याय (दूसरे के लिए खुलापन) एक स्थगित संभावना के रूप में बना रहता है.

कहना न होगा कि ‘अग्नि परीक्षा’कहानी लेखक के अनजाने ही देरिदा के दर्शन को अनुप्रयुक्त सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि जीवंत पाठकीय अस्थिरता के रूप में धारण किए हुए है. ये गहरे विचार कहानी के गहन अनिर्णय को उजागर करते हैं कि कला न तो पूरी तरह दमनकारी है न मुक्तिदायी, बल्कि अंतहीन स्थगन का स्थान है, जो पाठकों को सांस्कृतिक पदानुक्रमों में अपनी सहभागिता को ‘डिकंस्ट्रक्ट’ करने की चुनौती देता है. हरि भटनागर की सूक्ष्मता इसे एक उत्कृष्ट ‘डिकंस्ट्रक्टिव’ पाठ बनाती है.

उत्तर-उपनिवेशवादी आलोचना-दृष्टि से भी ‘अग्नि परीक्षा’ कहानी की संरचना अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रतीत होती है. कहानी में वर्णित कथित ‘ऐशगाह’ एक छोटा-सा सांस्कृतिक साम्राज्य है, जहाँ सौंदर्य का ‘मानक’ उस व्यक्ति द्वारा तय होता है जो सत्ता का केंद्र है. यह केंद्र एक प्रकार से उपनिवेशवादी केंद्र की तरह काम करता है. धूलदास अपने ‘स्वाद’ को सार्वभौमिक बनाता है; उसकी दृष्टि में अन्य सभी स्वाद, संवेदनाएँ और काव्यगत विविधताएँ अस्पृश्य या अवमान्य हैं. उसने एक प्रकार का सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित कर रखा है, जहाँ कवियों की भाषा, भाव, विषय और शैली सब कुछ उस ‘केंद्रित सत्ता’ के अनुसार ढलना आवश्यक है. यह स्थिति औपनिवेशिक केंद्र और परिधि के संबंधों का सटीक रूपक बन जाती है. कवि परिधि में हैं; धूलदास केंद्र में. केंद्र अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए अनुशासन, आकर्षण और नियंत्रित सौंदर्य—इन तीन हथियारों का प्रयोग करता है.

हरि भटनागर के कहानीकार की सबसे बड़ी ताक़त है, मनुष्य की कमज़ोरी को करुणा से देखना और उसकी करुणा को जीवन के सत्य के रूप में स्वीकार करना. वह जीवन की सच्चाइयों को सजाने या छुपाने के बजाय अपनी रचनाओं में गहरी अनुभूति को सरल भाषा में व्यक्त करते हैं. इसी संवेदनशीलता के कारण उनका साहित्य वैश्विक स्तर पर तुलनीय है—मोपासां की करुणा, चेख़व की मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मता, कामू की अस्तित्वगत बेचैनी और मार्केज़ की स्मृतियों की लय. इन सबकी थोड़ी-बहुत झलकियाँ इन कहानियों में भी यथास्थान अलग-अलग रूपों में दिखाई देती हैं.

 

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प्रोफ़ेसर रवि रंजन
मुजफ्फरपुर.

प्रकाशित कृतियाँ :   ‘नवगीत का विकास और राजेंद्र प्रसाद सिंह’, ‘प्रगतिवादी कविता में वस्तु और रूप’,. ’सृजन और समीक्षा:विविध आयाम’, ‘भक्तिकाव्य का समाजशास्त्र पदमावत’, ‘अनमिल आखर’ , ‘आलोचना का आत्मसंघर्ष’ (सं) वाणी प्रकाशन,दिल्ली (2011),  ‘साहित्य का समाजशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र: व्यावहारिक परिदृश्य’ (2012), ‘वारसा डायरी’(2022), ‘लोकप्रिय हिन्दी कविता का समाजशास्त्र’

प्रतिनियुक्ति : 2005 से 2008 तक सेंटर फॉर इंडिया स्टडीज़, पेकिंग विश्वविद्यालय,बीजिंग एवं नवम्बर 2015 से सितम्बर 2018 तक वारसा विश्वविद्यालय,पोलैंड में भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् द्वारा विज़िटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में प्रतिनियुक्त.

सम्प्रति: प्रोफ़ेसर एवं पूर्व-अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, मानविकी संकाय, हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद – 500 046
ई. मेल. :  raviranjan@uohyd. ac. in

Tags: 20252025 समीक्षाआपत्तिरवि रंजनहरि भटनागर
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दुःख की दुनिया भीतर है : नीरज कुमार
समीक्षा

दुःख की दुनिया भीतर है : नीरज कुमार

Comments 9

  1. अरुण आदित्य says:
    2 months ago

    रवि रंजन ने बहुत सारगर्भित समीक्षा की है। आलोचना की अलग-अलग युक्तियों का उपयोग करते हुए उन्होंने कहानियों के पाठ को जिस तरह उद्घाटित किया है, उससे कहानियों के अनेक संस्तरों में निहित संवेदना उभरकर सामने आ जाती है। इन कहानियों में अनुभूति की संरचना की पड़ताल करते हुए उन्होंने आदिकवि वाल्मीकि से लेकर रेमण्ड विलियम्स, जॉन स्टाइनबेक, टॉल्सटॉय, फ्रांस्वा दॉबोन और ग्रेटा गार्ड समेत अनेक साहित्यकारों-विचारकों के उद्धरणों का जैसा सटीक उपयोग किया है, वह रवि रंजन जी के अध्यवसाय और आलोचनात्मक विवेक का गवाह है।
    सार रूप में उन्होंने बहुत सुंदर बात कही है, “हरि भटनागर के कहानीकार की सबसे बड़ी ताक़त है, मनुष्य की कमज़ोरी को करुणा से देखना और उसकी करुणा को जीवन के सत्य के रूप में स्वीकार करना।”

    Reply
    • Leeladhar Mandloi says:
      2 months ago

      यह ऐसी पहली समीक्षा है जो हरि की कहानियां को अंतःतहों तक परिभाषित और विवेचित करती हैं।बहुत सारी अव्यक्त तत्वों-तथ्यों तक ले जाती इन कहानियों को नये सिरे से समझने
      की ज़मीन देती हैं।रवि जी को साधुवाद।हरि को बधाई।

      Reply
  2. राजशेखर रेड्डी says:
    2 months ago

    आधुनिक और उत्तर-आधुनिक आलोचना के सिद्धांत की कसौटी पर कैसे किसी रचना को परखा जाय, यह समझने में प्रोफ़ेसर रवि जी के निबंध सहायता करते हैं. भटनागर जी की छाया कहानी की इस निबंध में जो व्याख्या है वह कहानी को एक नया आयाम देती है.

    डॉ.राजशेखर रेड्डी, रिटायर्ड प्रोफ़ेसर, सिटी कॉलेज, विशाखापट्टनम.

    Reply
  3. राकेश बिहारी says:
    1 month ago

    हरि भटनागर की कहानियाँ हमारे समय की सामाजिक संवेदनाओं, वर्गीय तनावों और नैतिक द्वंद्वों को सूक्ष्म कलात्मकता के साथ दर्ज करती हैं। रवि रंजन जी ने आलोचना की सैद्धांतिकी पर इन कहानियों की गहन पड़ताल की है। कहानियों की ऐसी सिद्धांत सजग आलोचना कम पढ़ने को मिलती है।

    Reply
  4. तरुण भटनागर says:
    1 month ago

    इन कहानियों के मार्फ़त कई बातों को रवि रंजन ने उठाया है. वरिष्ठ कहानीकार हरि भटनागर का संग्रह आपत्ति पढ़ा जाना चाहिए. अनेक स्तरों पर कहानियों को जिस तरह से डिकोड किया है वह अद्भुत है. दोनों को बहुत बहुत बधाई.

    Reply
  5. Garima Srivastava says:
    1 month ago

    इस समय कहानी लेखन की कई समानांतर धाराएँ चल रही है,इसलिए कहानियों को परखने -पहचानने की दृष्टि भी एक नहीं हो सकती।हरि भटनागर की कहानियों पर यह सुव्यवस्थित लेख पहला ही पढ़ा है।हरि जी ने हिंदी कहानी लेखन को समृद्ध करने में वर्षों लगाए हैं।रवि रंजन जी का आलेख उनकी कहानियों को सुंदर ढंग से डी कोड करता है।लेखक ,आलोचक और समालोचन को खूब बधाई

    Reply
  6. ब्रज श्रीवास्तव says:
    1 month ago

    इतनी ही वस्तुनिष्ठ और गहन समीक्षा हरि भटनागर जी की कथा दृष्टि के फलक को सही तरह से विन्यस्त करती है। वैसे भी वह अपने समकालीनों में अध्यवसायी और अर्जित टूल्स का स्वाभाविक रुप से इस्तेमाल करने वाले विरल, अनूठे और अप्रतिम शिल्पी कथाकार है। आपत्ति कथा संग्रह में हर कहानी की सामाजिक पृष्ठ भूमि ऐसी ली गई है जिसे सिर्फ वह ही देख सके।अभिनंदन रवि रंजन जी। अभिनंदन हरि जी। अभिनंदन अरुण देव जी।

    Reply
  7. डाक्टर राधेश्याम सिंह says:
    1 month ago

    आलोचक ने कहानी आलोचना के सारे टूल्स का उपयोग कर कहानी संग्रह के हर कहानी का मर्म उद्घाटित कर दिया है।एक आलोचना पढ़ कर भी आप हरि भटनागर के कहानीकार का परिचय प्राप्त कर सकते हैं।वैसे तो अभी हरि जी का सर्वश्रेष्ठ आना बाकी है।उनके रचनात्मक जीवन को मेरी मंगलकामनाएं हैं।

    Reply
  8. Priti Jaiswal says:
    1 month ago

    आपत्ति है ही ऐसी। इसकी सभी कहानियाँ मजबूत हैं। असग़र वजाहत
    ने फ्लैप पर जो लिखा है, इकदम माकूल। समालोचना में इसकी तस्वीर देखी तो तुरंत किताब मंगायी। पढ़ने के बाद रवि रंजन की समीक्षा पढ़ी। रचनाकार, आलोचक और समालोचना के प्रति आभार।

    Reply

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