| ‘अंधेरे में’ और नामवर सिंह कृष्ण समिद्ध |
मुक्तिबोध की कविता “अँधेरे में” को समझना भारतीय आलोचना के इतिहास की सबसे कठिन परीक्षा है. नामवर सिंह ने अपने दो आलेखों के माध्यम से इस परीक्षा को दो बार दिया, पहली बार संवेदना से और दूसरी बार वैचारिकी से. उनके दो आलेख पहला “अँधेरे में : परम अभिव्यक्ति की खोज” और दूसरा “अँधेरे में : पुनश्च” सिर्फ मुक्तिबोध की समीक्षामात्र नहीं हैं, बल्कि स्वयं नामवर सिंह की आलोचना के विकास की भी कथा हैं.
पहला आलेख संवेदना का नामवर, दूसरा आलेख विचार का नामवर और दोनों आलेख मिलकर बनाते हैं द्वंद्व का नामवर, जो मुक्तिबोध की तरह “अँधेरे में” खोज करता है, पर अंततः अपने ही बनाए अर्थों में उलझ जाता है और नामवर सिंह की आलोचना अंधेरे में रह जाती है.
पहले आलेख “अँधेरे में : परम अभिव्यक्ति की खोज” में नामवर सिंह के निष्कर्ष अपने दूसरे आलेख में घोषित ‘कविता के नए प्रतिमान’ के विपरीत और विरोधाभासी हैं. पहले आलेख में वे ‘अँधेरे में’ को एक “आत्म-निर्वासन की नाटकीय दृष्टांत कथा” के रूप में देखते हैं. नामवर आगे कहते हैं
“अँधेरे में अस्मिता की खोज दरअसल परम अभिव्यक्ति की खोज है.” यह कथन सुंदर है. मगर वह परम अभिव्यक्ति क्या है और वह क्या खोज कर देती है, इस पर नामवर लगभग अंत तक चुप रहते हैं, ज्यादा नहीं बोलते. इस खोज के उद्देश्य को लगभग अंत में बस दो पैरा में निपटा देते हैं. नामवर कहते हैं कि ‘कवि मुक्तिबोध के लिए अस्मिता की खोज व्यक्ति की खोज नहीं बल्कि अभिव्यक्ति की खोज है.” (संदर्भ-1)
आगे, उसी पैरा में बात बढ़ाते हुए नामवर कहते हैं कि यह अभिव्यक्ति की खोज ‘कविता के बारे में कविता’ है (संदर्भ-2), जिसका परिणाम अगले पैरा में ‘कथ्य के अनुरूप ‘काव्य-भाषा’ का निर्माण’ (संदर्भ-3) बताते हैं. इस प्रकार, पहले आलेख में नामवर सिंह की नजर में ‘अंधेरे में’ एक काव्य शास्त्रीय खोज है. इस आलेख में क्रांति शब्द केवल तीन बार आया है, जो कविता में क्रांति के स्वप्न की घटना के लिए है, मगर कविता के उद्देश्य के रुप में क्रांति को कहीं भी चिह्नित नहीं किया गया है.
दूसरे आलेख में अपनी इस बात को बदलकर वे कहते हैं कि अभिव्यक्ति ‘केवल शब्दों की अभिव्यक्ति ही नहीं बल्कि कर्म की भी अभिव्यक्ति है, पूर्वापर संदर्भ से स्पष्ट है कि यहाँ ‘अभिव्यक्ति’ से अभिप्राय कविता भी है और क्रांति भी’ (संदर्भ-4). दूसरे आलेख में नामवर जी ने कविता के नए प्रतिमान के रुप में आत्मपरक के बदले जिस वस्तुपरक कविता का विकल्प दिया है, पहले आलेख में इसकी कहीं चर्चा नहीं है.
विचित्र बात यह है कि दूसरे आलेख को लिखने का कारण अन्य समीक्षकों की समीक्षा से हिंदी साहित्य में फैले अंधकार को दूर करना बताते हैं, मगर अपने पहले आलेख के अंधकारों पर कुछ नहीं बोलते. उदाहरण के लिए उन्होंने यह भी नहीं बताया कि ‘अंधेरे में’ को पहले आलेख में “अस्मिता या अभिव्यक्ति की खोज” या ‘कविता के बारे में कविता’ (संदर्भ-5) कहना गलत था या दूसरे आलेख में उसे ‘अभिव्यक्ति से अभिप्राय क्रांति है’ या “पोस्टर ही कविता है” (संदर्भ-6) कहना गलत था. विचारों में बदलाव कोई गलत बात नहीं है, स्वाभाविक प्रक्रिया है, आलोचना और आलोचक के विकासशील होने की प्रक्रिया है. पर इस विपरीत बदलाव के किसी क्रमिक विकास का कारण नामवर नहीं बताते हैं, यह गलत है.
दूसरे आलेख के अंत में नामवर अस्पष्ट रुप से स्वीकार करते हैं “यह विडंबना अवश्य देखता हूँ कि जिस आत्मपरक काव्य-सिद्धांत का खंडन मैंने किया, उसी का मुझे समर्थक बताया जाता है… इसे दृष्टिदोष कहने की अपेक्षा अपनी वाणी की दीनता चीन्हकर चुप रह जाना ही श्रेयस्कर है.” (संदर्भ-7)
यहाँ पर नामवर सिंह प्रतिमान में अंतर दिखने का कारण वाणी की दीनता को बताते हैं, आलेख के अपने स्थापित प्रतिमानों की कमी को नहीं. लगभग व्यंग्य में ही कही गयी यह आत्मस्वीकृति एक आलोचक के आत्म-संदेह को प्रकट करती है. वह कम से कम इतना तो स्वीकार करते हैं कि उन्होंने जो प्रतिमान निर्मित करने का दावा किया था, वह पूर्ण रूप में उभर नहीं सका. इसलिए उन्हें ‘पुनश्च’ कहना पड़ता है दूसरे आलेख में, जो उनकी आलोचना की अपूर्णता की मौन स्वीकृति है. नामवर सिंह इस बात को समझ रहे थे कि पहले लेख में उनकी आलोचना उनके उन कुछ मापदंडों से विपरीत है, जिसकी चर्चा वे दूसरे आलेख के अंत में कविता के नए प्रतिमान के रुप में करते हैं.
नामवर सिंह के दूसरे आलेख “अँधेरे में : पुनश्च” में उनका लहजा बदल चुका है. यह अब कविता की भाषा, रचना, प्रतीक और फैंटेसी की कलात्मकता पर केंद्रित आलेख नहीं रहता, बल्कि कविता की राजनीतिक व्याख्या की ओर मुड़ जाता है. वे यह मानने लगते हैं कि ‘अँधेरे में’ केवल कवि के भीतर की आत्म-यात्रा नहीं, बल्कि पूरे समय की राजनीतिक दुविधा और क्रांतिकारी चेतना का रूपक है. आखिर नामवर सिंह की वैचारिक स्थापनाओं में इन विपरीत बदलावों का कारण क्या है? नामवर सिंह की वैचारिकी में यह कोर्स करेक्शन क्यों दिखता है?
दरअसल नामवर सिंह की आलोचना में पहला सबसे बड़ा दोष आवश्यक नए सिद्धांत के सृजन का अभाव है, वे दूसरे के सिद्धांतों के व्याख्याकार की तरह कार्य करते हैं, जैसे कविता के नए प्रतिमान के सिद्धांत का आधार मुक्तिबोध की ‘आत्मपरक कविता की विशेषताओ के आधार बने सौंदर्य-परिभाषा (संदर्भ-8) के अपूर्णता’ के विचार पर आधारित है. इस सृजनात्मकता के अभाव में उनकी आलोचना में एक दूसरी प्रवृत्ति उत्पन्न हुई.
नामवर सिंह के कई आलोचना आलेखों में यह दूसरी प्रवृत्ति भी पहचानी जा सकती है कि उनकी आलोचना प्राय: दूसरे आलोचकों की सृजनात्मक आलोचना की खंडनात्मक प्रत्यालोचना होती है, वह सृजनात्मक आलोचना नहीं होती है. यह सही है कि आलोचना में खंडनात्मक प्रत्यालोचना एक अनिवार्य घटक की तरह होती है. मगर आलोचना का मूल आधार केवल खंडन के होने से आलोचना में एक आधारभूत विसंगति होती है कि आलोचना मूल रचना पर आधारित होने की जगह मूल रचना की आलोचना अर्थात द्वितीय स्रोत पर आधारित हो जाती है. इस विसंगति के कारण नामवर सिंह की आलोचना एक अदृश्य पाठेतर विरोधाभास में फँस जाती है और प्रस्तावित मौलिक रचना के बजाए उसकी द्वितीयक आलोचना की आलोचना हो जाती है. ये दो विसंगतियाँ नामवर सिंह की आलोचना के डिजाईन में हैं.
पहले आलेख के बाद नामवर सिंह पर रुपवादी होने का आरोप लगा था. जिसकी चर्चा वे द्वितीय संस्करण की भूमिका में करते हैं, जिसमें वे 12 जनवरी, 1969 के साप्ताहिक हिंदुस्तान में ‘प्रायदृष्टि’ स्तंभ के अंतर्गत नेमिचंद्र जैन की समीक्षा ‘कविता के प्रतिमानों की खोज’ की चर्चा करते हैं और बताते हैं कि “ नेमि जी को जो बात बहुत अजीब लगी वह है, ‘मार्क्सवादी नामवर सिंह का सर्वथा रूपवादी आलोचना- दृष्टि की ओर क्रमशः झुकाव’ “ (संदर्भ-9).
द्वितीय संस्करण की संपूर्ण भूमिका इस आरोप के स्पष्टीकरण की तरह है और संभवतः यह दूसरा आलेख इसी ‘स्पष्टीकरण की मनोदशा’ में लिखा गया है. इसी खंडनात्मक प्रतिक्रिया का ही परिणाम है कि दूसरे आलेख में वे अधिक राजनीतिक आलोचना का चयन करते हैं, जो उन पर लगे रुपवादी होने के आरोपों के बचाव की तरह कार्य करता है, मगर यह मनोदशा उनको अंतत कविता से दूर ले जाती है. इस तरह की राजनीतिक सापेक्ष आलोचना को मुक्तिबोध ने अपने आलेख ‘समीक्षा की समस्याएँ’ में आलोचना के दोष के रूप में देखा था “किसी ज़माने में प्रयोगवादी कविता प्रगतिवाद के अधिक निकट थी. किन्तु प्रगतिवादियों ने उसकी खूब उपेक्षा की. जो अपने से भिन्न है, वह अपना विरोधी भी है, जो काव्य के अपने माने हुए ढाँचे में जमा हुआ नहीं है, वह ग़लत भी है, असुन्दर भी है, प्रतिक्रियावादी है. इस प्रकार का सोच-विचार समीक्षकों की मानव-यथार्थ से दूरी-लम्बे-चौड़े फ़ासले- सूचित करता है.” (संदर्भ-10)
मुक्तिबोध अपने आलेख ‘वस्तु और रूप : तीन’ में राजनीति और कविता के संबंध और स्पष्ट करते हैं
“किन्तु, यह बात सत्य है कि वे (उनकी कविता) प्रगतिवादी ढाँचे की नहीं हैं, न उनकी तत्त्व- व्यवस्था विशुद्ध सामाजिक-राजनैतिक है, यद्यपि ये सामाजिक-राजनैतिक तत्त्व, बेमालूम तरीक़े से, उनमें मिले हुए हैं.” आगे मुक्तिबोध कहते हैं “मुझे प्रतीत हुआ कि काव्य में मनुष्य की सामाजिक-राजनैतिक इयत्ता ही प्रकट नहीं होनी चाहिए (किन्तु उसको काटकर नहीं फेंका जा सकता, जैसा कि आजकल हो रहा है), किन्तु पूर्ण मनुष्य के दर्शन, मानव-जीवन के सभी पक्षों के दर्शन होने चाहिए, स्पन्दनशील वैविध्यपूर्ण महान् गुणों से युक्त साहसिक मानव जीवन की प्रतिष्ठा होनी चाहिए.”(संदर्भ-11)
कविता में राजनीति का विचार के रुप में प्रवेश गलत है, कविता में उसके आने का रास्ता कविता के यथार्थ में है. इसलिए कविता में ‘सामाजिक-राजनैतिक इयत्ता ही प्रकट नहीं’ करने की वकालत करनेवाले मुक्तिबोध को नामवर सिंह जबरन राजनीतिक क्रांतिकारी कवि कहते हैं, तो निसंदेह इसका आधार मुक्तिबोध की कविता नहीं बल्कि नामवर पर लगे रुपवादी होने के आरोप की प्रतिक्रिया भर है.
इस प्रतिक्रिया का उदाहरण है कि नामवर सिंह मुक्तिबोध की रोमांटिकता को क्रांतिकारी रोमांटिकता कहते हैं, ताकि वह विचारधारा से टकराए नहीं. वे इसे गोर्की के शब्दों में क्रांतिकारी रोमांटिकता या “वीरत्व-व्यंजक रोमांटिकता”(संदर्भ-12) कहते हैं. यह आलोचना का सायास राजनीतिककरण सा है और तर्क की जगह जोश और भावना का इस्तेमाल किया जा रहा है, मानो नामवर बचाव की मुद्रा में हों.
‘क्रांतिकारी रोमांटिकता’ की अवधारणा आकर्षक और जोशीली है, लेकिन इसकी आलोचना दो स्तरों पर की जा सकती है. पहला यह कि रोमांटिकता की मौलिक अवधारणा ही विरोधाभासी है, जिसमें यथार्थ की समस्या का समाधान भावनात्मक और व्यक्तिवादी तरीके से स्वप्न और कल्पना में खोजा जाता है. मुक्तिबोध की रोमांटिकता के बचाव में नामवर कहते हैं कि मुक्तिबोध के इस (“मृत-दल की शोभा यात्रा”) स्वप्न में शेले की-सी कुहरिलता नहीं है क्योंकि उसमें समाज की उत्थानशील शक्तियों के अनुरूप ही ‘भावना-तत्त्व विचार-तत्त्व’ से समानतः दीप्त (संदर्भ-13) है और उनमें कई रोमांटिक कवियो वाली ‘छद्म भावनाएँ’ नहीं है. यह बचाव भी रोमांटिकता का अवमूल्यन ही है क्योंकि इसमें एक तरह का स्वीकार है कि रोमांटिकता यथार्थ नहीं है, इसलिए इसे सामाजिक यथार्थ और विचार से दीप्त होना चाहिए. अब तक प्रगतिशील काव्य संस्कार में रोमांटिकता के टर्म को बहुत गलत रुप में समझा गया है. मुक्तिबोध को भी रोमांटिकता की गलत अवधारणा को थोड़ा भान था “प्रतिक्रिया युग में हम देख पाते हैं कि यथार्थवादी रोमांटिक के प्रति द्वेषभाव रखता है, परन्तु यह ग़लत है. मनुष्य की प्रकृति में क्या रोमांस का स्थान नहीं है? रोमांस तो प्रवहमान जीवन धारा का सेल्फ़-एसर्शन है.”
आगे मुक्तिबोध कहते हैं कि रोमांस बसंत की तरह ‘नव जीवन’ का स्रोत होता है. यहाँ कहा जा सकता है कि मुक्तिबोध रोमांस को जीवन के एक यथार्थ के रुप में देख रहे हैं. मगर नामवर सिंह की रोमांटिकता की समझ मुक्तिबोध के इस आंशिक बोध से पीछे जाने की तरह है. नामवर सिंह की समझ में रोमांस स्वतंत्र यथार्थ नहीं है, एक स्वप्न है जिसका अन्य यथार्थ से दीप्त होना आवश्यक बताया गया है. नामवर सिंह की यह समझ ‘यथार्थवादी के रोमांटिक के प्रति द्वेषभाव’ की तरह है. रोमांटिक होना कल्पना और स्वप्न में विचरण करना नहीं है. रोमांटिक होना भी जीवन का एक यथार्थ है. इसलिए मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ का रोमांटिक होना एक ‘रचनात्मक यथार्थ’ है, जो एक त्रासद सामूहिक यथार्थ से उत्पन्न रचनात्मक प्रक्रिया है, जो नए सामूहिक यथार्थ के निर्माण के लिए आवश्यक है. मगर नामवर ऐसा न कहकर इसे वीरत्व-व्यंजक रोमांटिकता कहते हैं और ‘अंधेरे में’ कविता का अवमूल्यन करते हैं.
दूसरी बात दुष्प्रचारित रोमांटिकता का एक दोष व्यक्तिवादी होना बताया जाता है, मगर ‘अंधेरे में’ केवल व्यक्तिवादी रचना नहीं है, कविता का “मैं” भी स्थिर नहीं है, यह “व्यक्ति का मैं” नहीं है, बल्कि बदलता हुआ, टूटता-बिखरता और पुनः संयोजित होता हुआ “सामूहिक-मैं” है, इसलिए कविता के एक चरित्र में कई चरित्रों का समूह समाहित है. जैसा कि मुक्तिबोध कहते हैं “सच तो यह है कि स्वयं के मनोभावों की कविता प्रत्यक्षतः व्यक्ति की होने से जन-विरोधी नहीं हो जाती, बशर्ते कि वे मनोभाव समाज के बीच में रहकर स्वाभाविक हुए हों.”(संदर्भ-14)
इस वीरत्व-व्यंजक रोमांटिकता स्थापना का दूसरा दोष नामवर सिंह की आलोचना की अलोकतांत्रिक भाषा में है. नामवर सिंह का यह कहना कि “यदि किसी को यह स्वप्न कुहरिल दिखाई पड़े तो समझना चाहिए कि ह्रासोन्मुख शक्तियों के आतंक के कारण उसकी आँखें चौंधियाई हुई हैं” और वे यह मान लेते हैं कि जो इस कविता को भ्रमित या अस्पष्ट माने, वह अंधकार से आतंकित है. यहाँ इसका अर्थ है कि आलोचना की असहमति को नामवर वर्गशत्रुता या वैचारिक अंधता मान लेते हैं. यह आलोचना की लोकतांत्रिक संभावना के विरुद्ध जाती है.
नामवर सिंह की आलोचना का तीसरा सबसे बड़ा दोष यथार्थ की अपूर्ण समझ है, जो उपर्युक्त दोनों दोषों का मूल उद्गम है. नामवर सिंह ने ‘कविता के नए प्रतिमान’ का लक्ष्य मुक्तिबोध द्वारा चिह्नित “छद्म भावनाएँ” (संदर्भ-15) के शिकार रोमांटिक कवियों के प्रति विरोध को माना है. मगर ‘छदम भावानाएँ’ की तरह ‘छदम ज्ञान’ एवं ‘छद्म या अपूर्ण यथार्थ’ की समझ भी एक समस्या होती है, जो नामवर सिंह की आलोचना में है और ‘छदम भावानाएँ’ से अधिक खतरनाक परिणाम देती है.
यदि हम दोनों आलेखों को मिलाकर पढ़ें तो हमें दिखता है कि दोनों आलेख मिलकर भी ‘अँधेरे में’ व्यक्त यथार्थ की पूर्ण व्याख्या नहीं दे पाते. मुक्तिबोध का ‘अंधेरा’ केवल व्यवस्था का अंधकार नहीं है, बल्कि मनुष्य के भीतर का ज्ञानशास्त्रीय (epistemic) अंधेरा भी है. ‘अंधेरे में’ का यथार्थ नामवर सिंह वाला एक रेखीय निश्चित यथार्थ नहीं है, क्योंकि ‘अँधेरे में’ न तो केवल ‘परम अभिव्यक्ति की खोज’ है, न केवल ‘क्रांतिकारी रोमांटिकता’, वह इन दोनों के बीच एक अंधकारमय सेतु है, इन दोनों के बीच का द्वंद भी नहीं है, संक्रमण है.
मुक्तिबोध का काव्य संसार सतत असंतुलन और प्रश्नाकुलता से बना है. नामवर सिंह की यथार्थ की समझ इस ‘गतिशीलता’ को नहीं पकड़ पाती है. दोनों आलेख में समस्या यह है कि कविता के बहुल यथार्थ की जटिलता और गतिशीलता को स्थिर वैचारिक सरलता में रूपांतरित कर दिया गया है. यह छायावादी कविता के उस दोष के समान है, जिसकी चर्चा नामवर सिंह ने ही अपने आलेख ‘अनुभूति की जटिलता और तनाव’ में किया है “यदि उस समय (छायावाद काल) अंतर्जगत् में कोई दुविधा पैदा होती थी तो उसे काल्पनिक स्वप्नों की स्वर्णाभा से आच्छादित कर दिया जाता था और यदि बहिर्जगत् के यथार्थ से मन का मेल नहीं बैठता था तो उस यथार्थ को भी आदर्शोन्मुख दिशा में मोड़कर संतोष प्राप्त कर लिया जाता था. यदि प्रसाद के समान उस युग में किसी के मन में हृदय और बुद्धि के बीच द्वंद् पैदा हुआ तो अंततः बुद्धि को दबाकर हृदय के स्तर पर एक सामरस्य ढूँढ़ लिया जाता था. कविता में इस प्रवृत्ति का परिणाम हुआ अनुभूति का सरलीकरण.” (संदर्भ-16)
अनुभूति के सरलीकरण की तरह ही नामवर सिंह के दूसरे आलेख में यथार्थ का सरलीकरण की समस्या है. इसलिए नामवर सिंह के दोनों आलेखों में वर्णित यथार्थ की समझ तथा ‘अंधेरे में’ कविता में वर्णित यथार्थ और वास्तविक यथार्थ का एक तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है.
2.
यथार्थ का नव-सिद्धांत
“वास्तविक यथार्थ” क्या है? यह मनुष्य के ज्ञान का सबसे पुराना और सबसे स्थायी प्रश्न रहा है. अधिकांश ज्ञानशास्त्र द्वारा यथार्थ को एक स्थिर और निश्चित दृष्टिकोण से देखा, नापा या परिभाषित किया गया है. यथार्थ को या तो परम (Absolute) कहा गया या अनुभवगत (Empirical) या फिर चेतन का विस्तार (Phenomenal). किन्तु क्या यथार्थ वास्तव में इतना स्थिर और सरल है? क्या वह कभी पूर्ण या निष्कर्षात्मक रूप में हमें प्राप्त होता है? क्या हमारी भाषा में यथार्थ को व्यक्त करने की क्षमता है? यथार्थ की सम्यक् अवधारणा के लिए एक नवीन सिद्धांत की आवश्यकता अनुभव होती है. प्रस्तुत आलेख में इसी यथार्थ की व्याख्या हेतु एक समग्र सिद्धांत की खोज का प्रयास निहित है.
क) यथार्थ के अध्ययन की पहली समस्या यह है कि यथार्थ कोई स्थिर तथ्य नहीं होता है. यथार्थ का अध्ययन करने में सबसे बड़ी गलती यही होती है कि मनुष्य उसे स्थिर मानकर देखना चाहता है. मनुष्य का ज्ञान प्रायः स्थिर वस्तुओं, परिभाषाओं और रूपों की ओर आकर्षित होता है क्योंकि स्थिरता में ही उसे सुरक्षा और नियंत्रण का भ्रम मिलता है. हमारे ज्ञान की पूरी संरचना स्थिरता की सुविधा पर टिकी है, जिसमें वस्तुओं, घटनाओं, अर्थों, शब्दों और विचारों को हम ऐसे पकड़ना चाहते हैं जैसे वे किसी क्षण में रुक गए हों. मगर हम जिस यथार्थ को अपने वर्णन का विषय बनाते हैं, वह गतिशील यथार्थ का एक हिस्सा होता है, जिसके पीछे भी यथार्थ होता है और जिसके आगे भी एक यथार्थ होगा. उदाहरणार्थ, जब हम कहते हैं कि “यह वृक्ष यथार्थ है”, तो हम उस वृक्ष को एक स्थिर रूप में देखते हैं. पर क्या वह सचमुच स्थिर है? वह हर क्षण सूर्य की दिशा, वायु की गति, जल के प्रवाह और भीतर के रासायनिक परिवर्तन से गुजर रहा है. हम जो स्थिर वृक्ष देखते हैं, वह क्षणिक स्थिरता का भ्रम है. हमारा कोई भी कथ्य एक ‘गतिशील चीज’ का हिस्सा होता है, मगर उसका ‘अध्ययन स्थिर’ होता है.
कथ्य का अर्जित अध्ययन केवल किसी एक दिए गए समय का स्थिर ज्ञान बनकर रह जाता है और जब तक हम कथ्य के यथार्थ को परिभाषित करते हैं, तब तक यथार्थ उस परिभाषा से आगे बढ़ चुका होता है. इसलिए कथ्य के वर्तमान यथार्थ को पकड़ना काफी नहीं होता है, बल्कि यथार्थ को उसकी गतिशीलता में पकड़ना आवश्यक होता है, जिससे कथ्यगत यथार्थ का इतिहास और भविष्य के विकल्प के संकेत मिले.
ख)यथार्थ की दूसरी जटिलता उसकी व्यक्तिपरकता और सामूहिकता के द्वैत में निहित है. यह अभी 814 करोड़ मानव-चेतनाओं, अनगिनत अनुभवों, स्मृतियों और दृष्टियों का संयोग है, जो एक ही समय पर व्यक्तिगत भी है और सामूहिक भी. परंतु इसका अध्ययन सदैव व्यक्तिगत होता है- एक व्यक्ति के एक भाषा और एक दृष्टि के भीतर सीमित, भले ही व्यक्ति की दृष्टि या भाषा के निर्माण की प्रक्रिया भी सामूहिक ही होती हो. यहाँ एक गहरा ज्ञानशास्त्रीय विरोधाभास उपस्थित होता है कि “यथार्थ” सामूहिक है, पर उसकी व्याख्या निजी. इस विरोधाभास को सुलझाने का उपाय यह नहीं कि हम सामूहिकता को पूरी तरह ग्रहण करने का दावा करें क्योंकि वह असंभव है.
ग)तीसरी समस्या यह है कि यथार्थ की गति की सबसे बड़ी शत्रु हमारी भाषा है. हमारे अध्ययन का माध्यम भाषा होती है और भाषा समाज द्वारा तय किए गए अर्थों में स्थिर रहती है, जबकि यथार्थ का अर्थ निरंतर बदलता रहता है. परिणामतः यथार्थ की गति और भाषा की जड़ता के बीच एक असंगति उत्पन्न होती है. इसलिए यथार्थ को उसकी गतिशीलता में पकड़ने का अर्थ केवल अनुभव को व्यक्त करना नहीं है, बल्कि भाषा की सीमाओं को तोड़ना भी है. यथार्थ की गतिशीलता को समझने के लिए हमें भाषा को भी प्रक्रियात्मक बनाना होगा, जहाँ अर्थ स्थिर न रहें, शब्द स्थिर न रहें और वाक्य स्थिर न रहें बल्कि निरंतर खुलते, टूटते और पुनर्निर्मित होते रहें. कला, कविता और दर्शन इसी संघर्ष की उपज हैं, वे भाषा को ‘सार्थक अस्थिरता’ में ले जाते हैं. स्थिर भाषा, मृत यथार्थ की भाषा है. इसलिए, यथार्थ का अध्ययन केवल तथ्यों का अध्ययन नहीं है, वह भाषा के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया भी है.
घ)चौथी समस्या यह है कि हमारा मूल्यांकन अब तक के अर्जित ज्ञान पर निर्भर करता है और यही कारण है कि वह अज्ञात और विस्तृत यथार्थ को पूरी तरह समझने में अक्षम रहता है. मनुष्य का ज्ञान एक प्रतिमान (paradigm) के भीतर काम करता है. हर युग अपने ज्ञान का एक ढाँचा या प्रतिमान निर्मित करता है, एक ऐसा बौद्धिक ‘घर’, जिसके भीतर सोचने, समझने और सत्य को परिभाषित करने की सीमाएँ तय हो जाती हैं. परंतु जब यथार्थ इस प्रतिमान से आगे निकल जाता है, तब वही ज्ञान का सही ढाँचा अपूर्ण और गलत ज्ञान देता है और एक नए प्रतिमान का जन्म आवश्यक होता है. थॉमस कुहन ने विज्ञान के इतिहास में इसी को प्रतिमान विस्थापन (paradigm shift) कहा था. यथार्थ की गतिशीलता को समझने का पहला कदम अपने ज्ञान-प्रतिमान की सीमाओं को पहचानना है. जो व्यक्ति अपने प्रतिमान को सत्य मान लेता है, वह यथार्थ को उसकी गति में नहीं, उसकी कैद में देखता है. नए यथार्थ को हम तभी समझ पाते हैं जब पुराना प्रतिमान टूटता है और नया प्रतिमान स्थापित होता है एवं फिर वह नया प्रतिमान भी टूटने लगता है. इसलिए यथार्थ का अध्ययन स्थिर प्रतिमान के भीतर नहीं, बल्कि प्रतिमान-भंग की प्रक्रिया में किया जाना चाहिए. अर्थात् जो ज्ञान का ढाँचा अपने प्रतिमान को अस्थिर कर सके, वही यथार्थ की गति को देख सकता है.
उपरोक्त समस्याओं के आधार पर इस अध्ययन में एक नवीन सैद्धांतिक प्रस्ताव है, जिसे “प्रक्रियात्मक यथार्थ का सिद्धांत” कहा जा सकता है. यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि कुल मिलाकर यथार्थ कोई स्थिर वस्तु नहीं है, बल्कि बनने की प्रक्रिया है. यथार्थ का हर क्षण अपने पूर्व क्षण का परिणाम और अगले क्षण का कारण है. यह सतत बनने की प्रक्रिया न पूर्ण है, न समाप्त है, यह अनवरत प्रवाह है, संक्रमण है, जिसमें ‘अस्तित्व’ और ‘संभावना’ एक-दूसरे में घुलते हैं, इस दृष्टि को ही “प्रक्रियात्मक यथार्थवाद” (Procedural Realism) कहा जा सकता है. “प्रक्रियात्मक यथार्थवाद” के अनुसार यथार्थ कोई जड़ वस्तु नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया या एक होती हुई सत्ता (Becoming Reality) है. यथार्थ को समझने के लिए हमें उसे स्थिर परिणाम की तरह नहीं, बल्कि एक गतिशील निर्माण-प्रक्रिया की तरह पढ़ना चाहिए.
मगर समस्या यह है कि यथार्थ को उसकी गतिशीलता में पकड़ना एक अति कठिन काम है. यथार्थ की यह गतिशीलता उसे पकड़ने के हर प्रयास को संकट में डाल देती है. मनुष्य का मस्तिष्क स्थायित्व की आकांक्षा रखता है, पर यथार्थ परिवर्तन की प्रक्रिया में जीता है. “प्रक्रियात्मक यथार्थवाद” में “अध्ययन” केवल तथ्य-संग्रह नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया-पठन (Reading of Process) बन जाता है. इसलिए य़थार्थ को इसकी गतिशीलता में पकड़ने के लिए तीन समझ आवश्यक है.
पहली समझ यह है कि यथार्थ कभी भी संपूर्ण रूप से पकड़ में नहीं आता. यह बहु-अनुभवों से निर्मित, परिवर्तनशील और अनंत है. व्यक्ति या व्यक्ति के समूह के द्वारा यथार्थ के अध्ययन की क्षमता सीमित और अपूर्ण है. यथार्थ को पकड़ने का हर प्रयास एक नया अधूरापन और एक नया प्रश्न जन्म देता है. हर अधूरापन नई पूर्णता की दिशा में प्रेरित करता है. यदि यथार्थ पूर्ण होता, तो उसमें परिवर्तन की कोई संभावना न होती. अस्थिरता ही यथार्थ की स्थिरता है, असली स्थायी पहचान है. और यही अपूर्णता साहित्य में व्यक्त यथार्थ की असली स्थिति है, इसे “अपूर्णता का यथार्थवाद” (Realism of Incompleteness) कहा जा सकता है. “अपूर्णता का यथार्थवाद” के अनुसार यथार्थ का हर ज्ञान, हर अध्ययन और हर भाषा में अपने भीतर के अधूरेपन को स्वीकार किया जाना चाहिए. अपूर्णता के यथार्थवाद में यथार्थ की पहली समझ एक अधूरी शुरुआत होती है, जो आगे व्यापक यथार्थ तक निरंतर चलनेवाली प्रक्रिया है.
अपूर्ण यथार्थ की गतिशीलता का अर्थ केवल परिवर्तन नहीं, बल्कि अपूर्णता की सृजनात्मकता भी है. अपूर्णता ही विकास की शर्त है. मनुष्य का ज्ञान, कला और समाज ये सब इसी अधूरेपन से जन्म लेते हैं. इसलिए यथार्थ की अपूर्णता को दोष नहीं, बल्कि ऊर्जा का स्रोत मानकर करना चाहिए.
दूसरी आवश्यक समझ यह है कि यथार्थ की गतिशीलता की पहचान यथार्थ की ‘प्रक्रिया की पहचान’ में निहित है. इसका तात्पर्य यह है कि वैज्ञानिक ज्ञान को सत्यापित करने के लिए केवल एक यथार्थ का प्रमाण अपर्याप्त है, जो गलत निष्कर्ष तक ले जाता है. इसलिए हमें सामूहिक यथार्थ का अध्ययन करना होगा. सामूहिक यथार्थ का तात्पर्य विकास के क्रम में यथार्थ के क्रमिक रुपों के समूह से है. यथार्थ को समूह में देखने की इस दृष्टि को “सामूहिक यथार्थ की अवधारणा” कहा जा सकता है. यथार्थ की प्रक्रिया को समझने के लिए अध्ययन के विषय को समझने का तरीका यह नहीं है कि हम किसी एक क्षण का फोटोग्राफ लें, बल्कि यह कि हम क्षणों के बीच के ‘संक्रमण’ को देखें, जहाँ यथार्थ एक रुप से दूसरे रुप में परिवर्तित होता है. वास्तविक यथार्थ वहाँ है जहाँ यह परिवर्तन घटित होता है, जहाँ एक विचार दूसरे में बदलता है, जहाँ एक व्यवस्था टूटकर दूसरी बनती है, जहाँ एक व्यक्ति अपने भीतर कुछ छोड़कर कुछ नया बन जाता है. यथार्थ का अध्ययन ‘स्थिर वस्तुओं’ से अधिक वस्तु की ‘संक्रमणों की घटनाओं’ में संभव होता है, इसलिए यथार्थ का अध्ययन हमेशा सामूहिक यथार्थ का अध्ययन होता है.
परंपरागत ज्ञानशास्त्र (epistemology) यथार्थ का अध्ययन दो स्तरों पर करता है-(क) वस्तु को पहचानना और (ख) उसकी व्याख्या करना. पर “प्रक्रियात्मक यथार्थवाद” तीसरा स्तर जोड़ता है-(ग) उस वस्तु के होने की प्रक्रिया को अनुभव करना. उदाहरणार्थ, यदि हम किसी समाज का अध्ययन करें, तो हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि “समाज क्या है?” बल्कि “समाज कैसे बनता है?” यह “कैसे” ही वह केंद्र है जहाँ यथार्थ की गति प्रकट होती है. वस्तु के होने की प्रक्रिया सामूहिक यथार्थ के अध्ययन से समझी जा सकती है.
तीसरी आवश्यक समझ यह है कि सामूहिक यथार्थ के अध्ययन में कम से कम तीन समय-बिंदु पर यथार्थ को उसके तीन रुपों में समझा जा सकता है. यथार्थ अपने अतीत से आता है, वर्तमान में रूप लेता है और भविष्य में फैल जाता है. हर गतिशील यथार्थ की प्रक्रिया समय के भीतर स्पष्ट होती है. किन्तु समय स्वतंत्र मापन इकाई नहीं है, बल्कि बदलता अस्तित्व है. अर्थात्, जो कुछ भी अस्तित्व में है, वह समय के कारण नहीं, बल्कि समय के रूप में है और क्योंकि कोई भी समय या काल स्वतंत्र इकाई नहीं है, वर्तमान, अतीत और भविष्य की बीच की संयुक्त इकाई है. मगर अखंडित संयुक्त समय इकाई को देख पाना मानव क्षमता के बाहर है. इसलिए यथार्थ की गति को समझने के लिए यथार्थ को उसके तीन समय-बिंदु पर बाँटकर समझना चाहिए और इन तीन समय-बिंदु के बीच के संबधों को समझने से समय की संयुक्त इकाई और यथार्थ की गति समझ में आ जाती है– पहला समय-बिंदु यथार्थ का उद्भव (Genesis) है, वह क्षण जब कुछ बनने लगता है, दूसरा समय-बिंदु यथार्थ का विकास (Expansion) है, वह अवस्था जब वह रूप ग्रहण करता है और तीसरा समय-बिंदु यथार्थ का रूपांतरण (Transformation) है, वह बिंदु जहाँ वह कुछ नया बन जाता है. ये तीनों अवस्थाएँ कभी पूर्णतः अलग नहीं होतीं, वे एक-दूसरे में गुंथी रहती हैं.
अब इन समझ के साथ यथार्थ को उसकी गतिशीलता में कैसे अध्ययन करें? इस अध्ययन के लिए प्रक्रियात्मक यथार्थवाद-पद्धति (method) के पाँच स्तर होगें-
पहला अनुभव-भंग स्तर,
दूसरा संबंध-संविधान स्तर,
तीसरा काल-प्रवाह स्तर,
चौथा रूपांतरण-संयोग स्तर और
अंतिम साक्षी-विलय का छिपा स्तर.
पहला अनुभव-भंग स्तर (The Level of Experiential Break) में स्थिर यथार्थ के भ्रम को तोड़ यथार्थ के होने की प्रक्रिया की ओर देखना होगा.
दूसरे संबंध-संविधान स्तर (The Level of Relational Constitution) में उसे अन्य तत्वों से जुड़े हुए रूप में समझना होगा, सामूहिक यथार्थ के तौर पर देखना होगा.
तीसरा काल-प्रवाह स्तर (The Level of Temporal Flux) मे सामूहिक यथार्थ को समय में पढ़ना होगा और समय के साथ उसका परिवर्तन.
चौथा रूपांतरण-संयोग स्तर (The Level of Transformative Integration) में यथार्थ के अंतर्निहित विरोधों, परिवर्तनों, गतियों, उनके एकीकरण और रूपांतरणों को समझता है.
पाँचवां साक्षी-विलय का छिपा स्तर (The Hidden Level of Witness-Immersion) है, जिसमें अध्ययनकर्ता की भूमिका को देखना होगा क्योंकि अध्ययनकर्ता स्वयं भी उस प्रक्रिया का हिस्सा बन जाता है क्योंकि उसके देखने का क्षण भी समझे हुए यथार्थ का एक हिस्सा होता है.
इस प्रकार गतिशील यथार्थ को समझने के लिए हमें “स्वायत्त सत्ता” की जगह “परस्पर-सत्ता” (inter-being) की धारणा अपनानी होगी. यथार्थ एक नहीं, अनेक भी नहीं हैं- यह एक वृहद यथार्थ श्रृंखला की एक कड़ी मात्र है. इसलिए यथार्थ एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें नैतिकता और सौंदर्य स्वरूप भी स्थिर नहीं रह सकता. ‘सत्य’, ‘न्याय’ या ‘सौंदर्य’ कोई पूर्ण रूप नहीं हैं, वे निरंतर विकसित होने वाले प्रतिमान हैं, ये सारे प्रतिमान परिस्थिति, अनुभव और परिवर्तन के साथ रूपांतरित होते हैं. यहाँ नैतिकता, न्याय या सौंदर्य सापेक्षवाद नहीं, बल्कि प्रवाहवाद (Flowism) है, जो कहता है कि सभी प्रतिमान जीवन की तरह अपने समय, प्रक्रिया और प्रसंग में अर्थ पाते हैं और उसी के अनुसार बदलते रहते हैं. इसका अर्थ यह है कि मनुष्य का अस्तित्व किसी अंतिम उद्देश्य में नहीं, बल्कि निरंतर बनने की प्रक्रिया में है. जीवन का अर्थ किसी लक्ष्य में नहीं, बल्कि चलन (Movement) में है.

3
उपरोक्त नए सिद्धांत के आलोक में ‘अंधेरे में’ का पुनर्पाठ
इन नए प्रक्रियात्मक प्रतिमानों पर देखा जाये तो स्पष्ट होगा कि मुक्तिबोध एक सहज कवि नहीं है. लंबी कविता का मूल्यांकन लघु कविता के मापदंडों से परे होता है. लंबी कविता का विस्तार उसके हर शब्द को अपने संदर्भ से और शाब्दिक अर्थ से बाहर ठेलता रहता है. इसलिए कविता के अंत में भले ही चरित्र कहता है कि
“खोजता हूँ पठार… पहाड़… समुंदर
जहाँ मिल सके मुझे
मेरी वह खोई हुई परम अभिव्यक्ति”
(संदर्भ-17)
मगर कविता के हर दृश्य में वह चरित्र अपनी जानी हुई परम अभिव्यक्ति से दूर जाने के लिए प्रयासरत है. वह गुहा-परम-अभिव्यक्ति-पुरुष को कभी दरवाजे से लौटा देता है और कभी उससे भागता रहता है. गुहा-परम-अभिव्यक्ति-पुरुष की परम अभिव्यक्ति कि वह ‘शिखर पर जाये’ को साफ मना कर देता है कि वह शिखर पर नहीं जायेगा.
प्रक्रियात्मक यथार्थवाद के अनुसार यथार्थ कोई जड़ वस्तु नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया या एक होती हुई सत्ता (Becoming Reality) है. ‘अंधेरे में’ कविता में भी मुक्तिबोध के लिए यथार्थ किसी एक क्षण का निष्कर्ष नहीं, बल्कि अनवरत खोज का तनाव है, ऐसा तनाव जिसमें कवि, समाज और चेतना तीनों अपने होने की प्रक्रिया में हैं. ‘अँधेरे में’ मूलत: प्रक्रिया की कविता है, यहाँ कोई एक “यथार्थ” नहीं, बल्कि सतत परिवर्तनशील यथार्थों का समूह है. कविता का आरंभ होता है —
“ज़िंदगी के….
कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार”
(संदर्भ-18)
यह आरंभ यथार्थ की पहली प्रक्रिया ‘उद्भव’ (genesis) का क्षण है, यहाँ कवि अनुभव के भीतर एक हलचल महसूस करता है. यह अदृश्य “कोई एक” यथार्थ का आरंभिक रूप है, जो अभी परिभाषित नहीं, पर उपस्थित है मगर अभी रूप नहीं ले पाया है.
“वह नहीं दीखता… नहीं ही दीखता,
किंतु, वह रहा घूम
तिलस्मी खोह में गिरफ़्तार कोई एक…”
(संदर्भ-19)
यथार्थ की दूसरी प्रक्रिया विकास (Expansion) कविता के मध्य भागों में खुलती है. यहाँ कवि के आत्मीय अनुभव सामाजिक रूपक में परिवर्तित होते हैं. “तालाब में उभरता चेहरा”, “लाल मशाल”, और “रक्तालोक-स्नात पुरुष” ये सब यथार्थ के विस्तार के प्रतीक हैं. यहाँ मुक्तिबोध का “मैं” अब केवल व्यक्ति नहीं रह जाता, बल्कि वह उस समूह की खोज करता है जिससे उसका आत्म जुड़ा है. यह विस्तार वस्तुतः संबंधात्मक यथार्थ की पहचान है, जहाँ व्यक्ति और समाज के बीच की दूरी धुंधली हो जाती है-
“वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पाई गई मेरी अभिव्यक्ति है,
पूर्ण अवस्था वह
निज-संभावनाओं, निहित प्रभावों, प्रतिभाओं की…”
(संदर्भ-20)
कविता में यथार्थ के विकास का चरम वहाँ है जब तीसरे अंक में दो बजे रात के अंधकार में कवि किसी प्रोसेशन (जुलूस) को देखता है. यह दृश्य कवि के अवचेतन और सामाजिक चेतना के संगम पर घटता है. वह कहता है —
“घना व डरावना अवचेतन ही
जुलूस में चलता .
क्या शोभा यात्रा –
किसी मृत्यु-दल की?”
(संदर्भ-21)
यहाँ मुक्तिबोध सामाजिक यथार्थ की दृश्यता को एक स्वप्नवत् प्रतीक-प्रक्रिया में बदल देते हैं. जुलूस में पत्रकार, मंत्री, कवि, आलोचक, उद्योगपति और यहाँ तक कि अपराधी भी सम्मिलित हैं. यह “प्रोसेशन” समाज के सामूहिक अवचेतन का दृश्य है, जो एक गहरे सामूहिक संकट का प्रतीक है. यहाँ व्यक्ति का आत्मनिर्वासन समाज के आत्मनिर्वासन में संक्रमित हो रहा है.
“अँधेरे में” कविता में यथार्थ की तीसरी प्रक्रिया ‘रूपांतरण’(Transformation) तब आता है जब कवि अपनी सीमाओं से टकराता है, जब वह कहता है:
“…ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धांतवादी मन,
अब तक क्या किया?
जीवन क्या जिया!!”
(संदर्भ-22)
यहाँ व्यक्ति अपनी निष्क्रियता, अपने बौद्धिक स्वार्थ और आत्म-संरक्षण की प्रवृत्तियों से मुठभेड़ करता है. यह आत्मालोचन नहीं, बल्कि रूपांतरण की प्रक्रिया की शुरुआत है. यथार्थ अब बाहरी नहीं रह जाता. कवि का चरित्र स्वयं यथार्थ के भीतर प्रवेश करता है और अपनी आत्मा को ही प्रयोगशाला बना लेता है. यह रूपांतरण केवल आत्म-प्रकाश का नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना के पुनर्जन्म का है.
मगर इस रुपांतरण के बाद भी कविता समाप्त नहीं होती है, बल्कि चलती रहती है क्योंकि इस रुपांतरण के बाद भी जो यथार्थ प्राप्त हुआ है, वह अपूर्ण है. इसलिए ‘अंधेरे में’ कविता को परम अभिव्यक्ति की तलाश की कविता कहना हिंदी आलोचना और नामवर सिंह की ऐतिहासिक भूल है. यह अंधेरे में कविता का दूर्भाग्य है कि आलोचना की अपूर्णता ने इसे परम अभिव्यक्ति की तलाश की कविता के रुप में प्रचारित किया है, जबकि कविता में काव्य-चरित्र को पहले पृष्ठ से अपनी परम-अभिव्यक्ति का पता है, जो गुहा पुरुष के रुप में है. कविता के छठे अंक में ही परम अभिव्यक्ति में रुपांतरण के बाद भी कविता चलती रहती है क्योंकि प्राप्त परम-अभिव्यक्ति भी यथार्थ को व्यक्त कर पाने में असमर्थ है, इसलिए परम-अभिव्यक्ति परम नहीं है. इसलिए पुन: प्रक्रिया शुरु हो जाती है और अंतिम पंक्ति में इस तलाश के जारी रहने की घोषणा करता है. इसलिए कविता का मूल उद्देश्य ‘परम-अभिव्यक्ति’ प्राप्त करना नहीं है, बल्कि ‘निरंतर तलाश की अपूर्ण प्रक्रिया’ में लगे रहना है. इसे ‘अंधेरे में ’ कविता के प्रथम चरित्र के कवि, मृत कलाकार और गुहा पुरुष के जटिल रूपांतरण की प्रक्रिया से इस पूरी प्रक्रिया की अपूर्णता को समझा जा सकता है.
मुक्तिबोध की कविता का नायक (प्रथम पुरुष) अपनी “परम अभिव्यक्ति” की तलाश में निरंतर परिवर्तनशील यात्रा से गुजरता है. आरंभ में वह अपने ज्ञात अनुभवों की सीमा से बाहर निकलना चाहता है, पर “गुहा-पुरुष” से भागता रहता है. गुहा-परम-अभिव्यक्ति-पुरुष की परम अभिव्यक्ति कि वह ‘शिखर पर जाये’ को साफ मना कर देता है कि वह शिखर पर नहीं जायेगा. चौथे अंक में ‘मार्शल लॉ’ के अनुभव उसे कर्म के लिए जाग्रत करते हैं. पाँचवें अंक में उसे यह बोध होता है कि अब आत्मसंघर्ष का समय नहीं, बल्कि क्रिया का समय है “यह न समय है, जूझना ही तै है.(संदर्भ-23)” इसके बाद गाँधी सी आकृति उसे एक शिशु दे देती है. इसके बाद प्रतीकात्मक रूप से ‘शिशु’ का ‘सूरजमुखी फूल’ और फिर ‘वज़नदार राइफ़ल’ (संदर्भ-24) में बदल जाना, सृजन से संघर्ष में रूपांतरण को दर्शाता है. जब वह भागकर कमरे में कलाकार के शव के पास पहुँचता है, यहाँ रायफल प्रथम चरित्र के पास है और परिचित कलाकार के शव के भौंहों के बीच गोली लगने से मृत्यु हुई है.
वह घटनास्थल पर पकड़ लिए जाने के बाद भी रिहा कर दिया जाता है. रिहा होने के बाद उसे वहीं भौंहों के नीचे संगीन मारने का दर्द हो रहा है और कलाकार की मौत भौंहो की बीच गोली लगने से हुई है. स्पष्ट है कि हत्यारा प्रथम चरित्र और मृतक कलाकार एक ही है. यह पूरी प्रक्रिया प्रतीक है कि प्रथमपुरुष ने अपने भीतर के कलाकार को यानी अपने पुराने ‘स्व’ को—मार डाला है. अब प्रथमपुरुष का रुपांतरण हो चुका है. वह स्वयं गुहा-पुरुष के नियंत्रण में है.
छठे अंक तक प्रथम पुरुष आत्मकायांतरण से गुजरता है. जो पहले परम-अभिव्यक्ति द्वारा शिखर पर जाने के आदेश को इनकार कर रहा था, वही अब कहता है- “अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे”(संदर्भ-25) और जन्म सूमह का नेतृत्व करने लगता है. इस बिंदु पर वह वही स्वर ग्रहण करता है जिसे गुहा-पुरुष पहले कह चुका था. सातवें अंक में वह अनुभव करता है-
“मेरे ही विवेक-रत्नों को लेकर,
बढ़ रहे लोग अँधेरे में सोत्साह.
किन्तु मैं अकेला
बौद्धिक जुगाली में अपने से दुकेला.”
(संदर्भ-26)
किंतु अभिव्यक्ति के सभी खतरे उठाने के बाद भी उसका आत्मद्वंद समाप्त नहीं होता. इसलिए सातवें और आठवें अंक में “परम अभिव्यक्ति” मिलने के बाद भी उसकी खोज जारी रहती है. यह बौद्धिक एकाकीपन का क्षण है. काव्य चरित्र परम अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने के बाद समाज को नेतृत्व दे रहा है, मगर उसके अंदर संशय अकेलापन के रुप में है. गुहा-पुरुष की परम अभिव्यक्ति मृत कलाकार के बिना अधूरी है.
‘अंधेरे में’ का प्रथम प्रकाशन कल्पना के नवम्बर, 1964 अंक में ‘आशंका के द्वीप अँधेरे में’ शीर्षक से हुआ था और इसका संभावित रचनाकाल भी 1957 से 1962 माना जाता है. 1959 ई में श्रीकान्त वर्मा को लिखे एक पत्र में मुक्तिबोध कहते हैं कि “ पिछले एक-डेढ वर्ष में मैंने चार लम्बी लम्बी कविताएँ लिखी हैं. वही मेरी उपलब्धि है….असल में, वे जीवन की उलझनों के समग्र चित्र है.” (संदर्भ-27)
मुक्तिबोध के शब्दों में ये कविताएँ जीवन की उलझनों का चित्र हैं. इस प्रकार प्राप्त ‘परम-अभिव्यक्ति’ भी परम नहीं है, बल्कि उसके बाद भी उलझन बनी रहती है और ‘परम-अभिव्यक्ति’ की तलाश जारी रहती है और कविता की अंतिम पंक्ति भी इस तलाश के अधूरे रहने की घोषणा करती है. अंधेरे में “परम अभिव्यक्ति” की नहीं “परम उलझन” की कविता है.
‘अँधेरे में’ कविता का स्वरूप अत्यधिक विस्तारित है और यह अकारण नहीं है. इस विस्तार का क्या अर्थ है कविता में? यह विस्तार एक ओर कविता को गहराई प्रदान करता है, लेकिन दूसरी ओर यह पाठकों को यथार्थ की अपूर्णता और गतिशीलता का अनुभव कराता है. यह विस्तार एक प्रक्रिया है, जो यह दर्शाती है कि वास्तविकता कभी स्थिर, सरल और स्पष्ट नहीं होती, बल्कि हमेशा बदलती रहती है. इसलिए परिणाम से अधिक महत्वपूर्ण उसकी प्रक्रिया है. इस ‘निरंतर तलाश की अपूर्ण प्रक्रिया’ को समझने के लिए कविता को प्रक्रियात्मक यथार्थवाद के के पाँच स्तरों पर देखना होगा.
पहला अनुभव-भंग स्तर में स्थिर यथार्थ के भ्रम को तोड़ कर यथार्थ के होने की प्रक्रिया की ओर देखा जाता है. परंपरागत अध्ययन में हम किसी वस्तु या घटना को जैसी वह है वैसी देखकर उसकी व्याख्या करते हैं. पर गतिशीलता में यथार्थ को समझने के लिए हमें देखना होगा कि वह कैसे हो रहा है, उसके होने और बदलने की प्रक्रिया क्या है?
उदाहरण के लिए जब हम “नदी” को देखते हैं, तो हम कहते हैं कि यह नदी है. पर यदि हम उसकी गतिशीलता में अध्ययन करें, तो हमें देखना होगा, वह किन स्रोतों से निकलती है, किन मिट्टियों को छूती है, कहाँ विलीन होती है और हर क्षण उसका प्रवाह किन परिवर्तनों से गुजरता है. यह दृष्टि हमें बताती है कि नदी केवल बहता जल नहीं है, वह मिट्टी, पत्थर, वर्षा, ऋतु, वाष्प और समय का संबंध-जाल (web of relations) है. इसलिए पहला कदम है, वस्तु की जड़ता को नहीं, उसके होने की प्रक्रिया को देखना.
‘अंधेरे में’ कविता में मुक्तिबोध का कवि “देखने की स्थिरता” के पार जाता है, वह जो दिखाई नहीं देता, उसे अनुभव की प्रक्रिया में घटित होते हुए कविता के विस्तार में पकड़ता है. कविता के आरंभिक दृश्य में “ज़िंदगी के कमरों में अँधेरे लगाता है चक्कर कोई एक लगातार…” (संदर्भ-28) है, यहाँ कविता में “अंधेरे में चक्कर लगाना” दरअसल समाज की उस सामूहिक अंधता का संकेत है जहाँ व्यक्ति आत्मचिंतन की प्रक्रिया में अपनी सीमाएँ तोड़ता है. यह अनुभव-भंग का क्षण है और कवि के भीतर की जड़ता, आत्म-अंधकार, और सामाजिक चेतना की स्थिरता टूटती है. “फूले हुए पलस्तर का गिरना” या “दीवाल पर चेहरा बन जाना” ये संकेत हैं कि यथार्थ अब स्थिर वस्तु नहीं रहा, वह स्वयं को उजागर करने की प्रक्रिया बन चुका है. इस स्तर पर मुक्तिबोध यथार्थ के स्थायित्व को नहीं, बल्कि उसके होने की गति को दिखाते हैं.
दूसरे संबंध-संविधान स्तर यथार्थ को “अकेले” नहीं, बल्कि उसके संबंधों के ताने-बाने में समझता है और उसे सामूहिक यथार्थ के तौर पर देखता है. मुक्तिबोध के यहाँ यथार्थ संबंधों के ताने-बाने में खुलता है. “अंधेरे में” की केंद्रीय चेतना कवि का आत्मसंवाद वस्तुतः एक सामाजिक संवाद है. कविता में ‘पागल’, ‘कवि’, ‘कलाकार’, ‘जनता’ आदि के रुप में प्रथम चरित्र लगातार पांतरित होते रहते हैं. पागल कभी कवि का रूप ले लेता है, कवि कभी जनता का और जनता कभी मृतात्माओं के रूप में लौटती है. कवि कहता है-
“वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पाई गई मेरी अभिव्यक्ति है…
…मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव…”
(संदर्भ-29)
यह “रहस्यमय व्यक्ति” केवल कवि का दूसरा रूप नहीं है, वह समाज के सामूहिक विवेक, नैतिकता और दबे हुए चेतन का प्रतीक है. “जो मुझे तिलिस्मी खोह में दिखा था” (संदर्भ-30) वह दरअसल जनता का चेहरा है, जो कवि के भीतर की आत्मा में बसी हुई है, परंतु जिसे देखने का साहस कवि खो चुका है.
संबंध-संविधान स्तर पर मुक्तिबोध का यथार्थ “आंतरिक” और “बाह्य” का समन्वय बन जाता है. भीतर का द्वंद “मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से…”(संदर्भ-31) बाहर की सामाजिक भय-संरचनाओं से जुड़ा है. भीतर का अपराध-बोध “मर गया देश, अरे, जीवित रह गए तुम !!” (संदर्भ-32) बाहर के राजनीतिक पतन से जुड़ता है. यहाँ कवि अपने “मैं” और “हम” के बीच का संबंध रचता है. वह अपने एकल या व्यक्तिगत यथार्थ में बहुल या सामूहिक यथार्थ देखता है.
तीसरा काल-प्रवाह स्तर यथार्थ को समय की गति में पढ़ता है और समय के साथ उसमें परिवर्तन को समझता है. समय यहाँ केवल “कालक्रम” नहीं, बल्कि “अस्तित्व की गतिशीलता” है, जहाँ हर वस्तु अपने बनने, विकसित होने और रूपांतरित होने की प्रक्रिया में है. इसलिए किसी भी वस्तु के प्रामाणिक ज्ञान के लिए निम्नतम आवश्यकता है कि उसे कम से कम उसके तीन समय-बिंदुओं में पढ़ा जाय और ये तीन समय-बिंदु उद्भव (Genesis), विकास (Expansion) और रूपांतरण (Transformation) हैं. उद्भव वह क्षण है, जब कुछ बनने लगता है. विकास वह अवस्था है, जब वह रूप ग्रहण करता है. रूपांतरण वह बिंदु है, जहाँ वह कुछ नया बन जाता है. जब हम इन तीनों समय-बिंदु को जोड़कर देखते हैं, तब हमें यथार्थ के “प्रवाह” या प्रक्रिया का ज्ञान होता है कि यथार्थ कहाँ से आया, अभी क्या है और किस दिशा में जा रहा है. इन तीन समय-बिंदु के माध्यम से सामूहिक यथार्थ की अध्ययन प्रक्रिया से वस्तुनिष्ठ आत्मपरक विशलेषण संभव है, इसलिए इस प्रक्रिया को वस्तुनिष्ठ आत्मपरक पद्धति (Objective Subjective Method) भी कहा जा सकता है.
“अंधेरे में” का पूरा ढाँचा एक आंतरिक समय-यात्रा है. यह रैखिक समय नहीं है, बल्कि वह तरल, प्रवाही समय है जिसमें स्मृति, स्वप्न, यथार्थ और भविष्य एक-दूसरे में विलीन हैं. कविता के विभिन्न दृश्य “तालाब की श्वेत आकृति”, “रहस्यमय प्रोसेशन”, “मॉर्शल-लॉ” और “बरगद के नीचे पागल” ये सभी अलग-अलग काल-बिंदुओं के प्रतीक हैं. इनका अनुक्रम किसी कथा-क्रम में नहीं, बल्कि विचार-प्रवाह में घटित होता है. यहाँ यथार्थ तीन समय-बिंदुओं में मौजूद है. पहला ‘उद्भव’ है, जहाँ चेतना पहली बार अंधकार को पहचानती है “वह नहीं दीखता… नहीं ही दीखता,/ किन्तु, वह रहा घूम”(संदर्भ-33).
दसरा ‘विकास’ है, जब कवि आधी रात के अंधकार में किसी प्रोसेशन (जुलूस) को देखता है “घना व डरावना अवचेतन ही जुलूस में चलता”.
तीसरा ‘रूपांतरण’ है, जहाँ चेतना अपने भीतर से “गुहा” में उतरकर आत्म-बोध और क्रांति की संभावना पहचानती है “तेजस्क्रिय रेडियो एक्टिव रत्न भी बिखरे (संदर्भ-34)… विचारों की रक्तिम अग्नि के मणि वे”(संदर्भ-35) . मुक्तिबोध के यहाँ “अंधेरा” समय का स्थायित्व नहीं, बल्कि उसका संक्रमण है.
‘अंधेरे में’ कविता में घटना का कालक्रम साधारण या एक रेखीय नहीं है, यह एक अनुभवजन्य समय है, जिसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य के अनुभव एक साथ आते हैं.
“तिलिस्मी खोह में देखा था एक बार
आखिरी बार ही.”
(संदर्भ-36)
अंत में अभिव्यक्ति पुरुष को गुहा में देखने की बात हो रही है. अभिव्यक्तिपुरुष पहले दृश्य में गुहा में था और दूसरे दृश्य में दरवाजे से लौट कर गया है. इस अर्थ में दूसरा दृश्य पहले दृश्य से पहले की घटना है और एक स्म़ृति है, जो पहले घट चुका है. कविता में कई बार अलग-अलग दृश्य-घटना के बाद स्वप्न के भंग होने की बात की गयी है. अत: कविता की घटनाएं यथार्थ में घटे क्रम के अनुसार नहीं है, बल्कि चरित्र की स्मृति के अनुसार पहले या बाद में है. इसलिए एक स्वप्न की तरह कविता में समय एक रेखीय गति में नहीं है, घटना की यादृच्छिकता से पहला प्रभाव यह होता है कि कविता में घटना का क्रम महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि कहनेवाले की भावनाओं का क्रम महत्वपूर्ण है.
इसका दूसरा प्रभाव है कि कहनेवाले की मानसिक दशा असमान्य है और भावनाओं की प्रमाणिकता बचाने हेतु स्मृतिदोष उत्पन्न करना अनिवार्य है. दूसरे प्रभाव का बाई प्रोडक्ट यह भी है कि पाठक के सामने यथार्थ एक रहस्य की तरह खुलता है और पाठक बार बार कविता के यथार्थ से अस्वाभाविक होकर कविता पर सहज विश्वास नहीं करता है और भावनात्मक रुप से प्रभावित न होकर कविता की बौद्धिक जाँच करने को हमेशा विवश होता रहता है.
चौथा रूपांतरण-संयोग स्तर यथार्थ के अंतर्निहित विरोधों, परिवर्तनों, गतियों, उनके एकीकरणों और रूपांतरणों को समझता है. यह पद्धति हमें स्थिर और अंतिम निष्कर्ष नहीं देती, बल्कि एक निरंतर प्रश्नशील दृष्टि प्रदान करती है. यथार्थ का केवल उद्भव नहीं होता, बल्कि जन्म से ही उसके भीतर विपरीतता और विरोध भी पल रहे होते हैं, जो उसे बदलते और पुनः रचतें हैं. विरोध प्रक्रिया का नैतिक इंजन है. जब हम किसी वस्तु, विचार या सामाजिक संरचना का अध्ययन करते हैं, तो हमें यह देखना होता है कि उसमें कौन-से विरोध अंतर्निहित हैं जो उसे बदलने की दिशा में ले जा रहे हैं.
‘अंधेरे में’ का अंधेरा एक प्रश्नशील गर्भ की तरह काम करता है, जिसमें यथार्थ के अंतर्निहित विरोधों, परिवर्तनों, गतियों का एकीकरण और रूपांतरण संभव होता है. यह “अंधेरा” उस समय चरम पर पहुँचता है, जब कविता के अंत में कवि “खोह” में उतरता है —
“पाता हूँ निज को खोह के भीतर,
विलुब्ध नेत्रों से देखता हूँ द्युतियाँ,….
अकेले में किरणों की गीली है हलचल
गीली है झिलमिल!!”
(संदर्भ-37)
यह केवल आत्म-खोज नहीं है, बल्कि विरोधों के एकीकरण की प्रक्रिया है. कवि समझता है कि जो खोह के भीतर था, वही बाहर के यथार्थ को बदल सकता है. “ओ मेरे आदर्शवादी मन…” “पागल” जो गाता है, वही कविता का नैतिक केंद्र बन जाता है. यहीं पर मुक्तिबोध का यथार्थ अपने सर्वोच्च रूपांतरण-संयोग को प्राप्त करता है. यथार्थ अब केवल अंधेरा नहीं, बल्कि अंधेरे से फूटता हुआ प्रकाश है, वह “प्रकाश” जो स्थिर नहीं, बल्कि निरंतर बनने की प्रक्रिया में है.
पाँचवाँ साक्षी-विलय स्तर प्रक्रियात्मक यथार्थवाद पद्धति में एक छिपा हुआ स्तर है, जिसमें यथार्थ और अध्ययनकर्ता दोनों एक-दूसरे को गढ़ते हैं. अध्ययनकर्ता भी अध्ययन की प्रक्रिया का हिस्सा होता है क्योंकि उसके देखने का क्षण भी यथार्थ के अध्ययन का एक हिस्सा होता है. जब कोई अध्ययनकर्ता या कलाकार दुनिया को देखता है, तो वह केवल ‘देख’ नहीं रहा होता बल्कि वह यथार्थ को पुनर्गठित कर रहा होता है. यथार्थ और अध्ययनकर्ता, दोनों एक-दूसरे को गढ़ते हैं और ज्ञान देने वाला एवं ज्ञेय दोनों का संगम होता है. “मुक्तिबोध ने इस कविता के माध्यम से आधुनिक मनुष्य की अस्मिता की खोज को नाटकीय रूप दिया है.” (संदर्भ-38)
नामवर सिंह केवल लेखक की मंशा को देख रहे हैं और यह नहीं देख पा रहे कि ‘लेखक की मंशा’ ‘लेखक के लेखन को’ कैसे बदल रही है. जैसे लेखक का ‘कलात्मक यथार्थ अर्थात यथार्थ से उत्पन्न कल्पना’ ‘अंधेरे में’ कविता के यथार्थ को प्रभावित करती है. ऐसी कल्पना लेखक की मंशा के तौर पर यथार्थ में हस्तक्षेप करती है. रचनाकार की भूमिका पर मुक्तिबोध कहते हैं “विशिष्ट को सामान्य करने के हेतु कवि-मन वेदनात्मक उद्देश्य से प्रेरित होकर निरन्तर भाव-संशोधन और भाव-सम्पादन करता रहता है. यह कवि की आन्तरिक क्रिया का एक अंग है.” (संदर्भ-39)
मुक्तिबोध की कविता में काल्पनिकता और वास्तविकता का विलय बार-बार दिखता है. जैसे तॉल्सतॉय जैसे महान लेखक का उल्लेख, गाँधी सी आकृति का होना और उनके “सितारों के बीच-बीच घूमते व रुकते पृथ्वी को देखते” के दृश्य कविता में एक काल्पनिक रूपक या फैंटसी हैं. ये फैंटसी मुक्तिबोध की मंशा के तौर पर कविता में यथार्थ के आत्मपरक रुप को जन्म देती हैं.

4.
नामवर सिंह के नए प्रतिमान में नया क्या है?
अब इन समझ के साथ नामवर सिंह के आलेख में वर्णित यथार्थ और उनके “कविता के नए प्रतिमान” के तुलनात्मक अध्ययन से कई बातें स्पष्ट होती हैं. नामवर सिंह का दूसरा आलेख पहले का विपर्यास है, न कि विकास. अगर दोनों आलेखों को एक साथ करके पढ़ा जाये तो पहले आलेख में वे मुक्तिबोध के ‘अँधेरे में‘ को व्यक्ति के आत्म निर्वासन की कविता कहते है और दूसरे आलेख में हर आत्म संघर्ष में राजनीतिक और ऐतिहासिक संघर्षों को दिखाते हैं, पर दोनों आलेखों के विपरीत निष्कर्षों के बीच के संबंध या प्रक्रिया को नहीं पकड़ पाते. यह सीमित आलोचना यथार्थ के एक “रूप” को तो पहचानता है, पर उसके दूसरे “रुप” में “रूपांतरण” की प्रक्रिया को नहीं देखता है. इसलिए नामवर यथार्थ को एक “स्थिर सत्य” के रूप में पकड़ते हैं, जबकि मुक्तिबोध की कविता में यह “परिवर्तनशील” है.
यदि मुक्तिबोध की समग्र दृष्टि पर गौर करें, तो वे स्वयं इन दोनों नामवरों के बीच कहीं खड़े दिखाई देते हैं. मुक्तिबोध का “अँधेरा” न केवल आत्मा का है, न केवल बाह्य सत्ता का-वह दोनों के बीच का पुल है, संक्रमण है. उनकी कविता में “व्यक्ति की मुक्ति” और “समाज की मुक्ति” एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि परस्पर-निर्भर हैं.
दोनों आलेखों का विरोधाभास स्वयं नामवर सिंह के आत्म-द्वंद का परिणाम है. इसलिए पहला नामवर मुक्तिबोध की तरह ‘अभिव्यक्ति के खतरे’ उठाता है, जबकि दूसरा नामवर मुक्तिबोध में ‘विचार के प्रमाण’ खोजता है. यानी पहले आलेख का आलोचक सर्जक के साथ है, दूसरे का आलोचक विचारधारा के प्रहरी की तरह उसके ऊपर खड़ा है. नामवर सिंह जो ‘अभिव्यक्ति के खतरे उठाने’ की बात करते हैं, अंततः स्वयं अभिव्यक्ति के खतरे से बचने लगते हैं और कविता को सुरक्षित वैचारिक व्याख्या में रख देते हैं.
आलोचना के दोनों आलेख का यह अंतर किसी विकासशील प्रक्रिया का हिस्सा होता, तो यह विकासशील आलोचना की उचित दिशा होती. मगर नामवर सिंह दूसरे आलेख में पहले आलेख की कही बातों का खंडन करते हैं, तब यह उनके दोनों आलेखों का अंतर्विरोध बन जाता है. वो दोनों आलेखों में कविता के अलग-अलग बिंदु के यथार्थ को सही पकड़ रहे हैं, पहले आलेख में ‘अँधेरे में’ को अस्मिता की परम अभिव्यक्ति कहना सही है क्योंकि कविता कई बिंदु पर ऐसी है. दूसरे आलेख में “अँधेरे में” को युग की सामूहिक चेतना और राजनीतिक-वैचारिक यथार्थ की अभिव्यक्ति कहना सही है, कविता कई बिंदु पर ऐसी भी है.
पहले में नामवर का रुझान आत्मगत यथार्थवाद की ओर है, दूसरे में वे सामाजिक यथार्थवाद की ओर बढ़ते हैं. पहले लेख में कविता एक “वैयक्तिक नाट्य द्वंद” है, दूसरे में वही कविता “ऐतिहासिक द्वंद” का रूप लेती है और व्यक्ति अब अकेला नहीं, “जन-यूथ” में विलीन है. कविता में अलग-अलग समय बिंदु पर दोनों तरह की स्थितियाँ सही हैं और इनकी पहचान नामवर सिंह ने सही ही की है.
मगर आलोचना में अंतर्विरोध तब पैदा होता है, जब पहले आलेख की बात का खंडन दूसरे आलेख में चुपचाप करते हैं, तो कविता के उन हिस्सों को गलत पाठ करते हैं, जिसका सही पाठ पहले आलेख में किया गया था. नामवर सिंह ‘अंधेरे में’ कविता में व्यक्त यथार्थ की गतिशीलता को पकड नहीं पाये, इसलिए परस्परविरोधी व्याख्या के शिकार हो गये. वे यथार्थ की “गतिशील टुकड़ो” की पहचान अंतिम स्थिर सत्य के रुप में गलत पहचानते है और उनकी “अपूर्णता” को नहीं समझते हैं. वे कविता की अंतिम-अटल व्याख्या की ओर झुकते हैं, यहीं उनकी आलोचना थोड़ी “समापनवादी” हो जाती है, जो मुक्तिबोध के मूल भाव के विरुद्ध है. यहाँ इस बात को भी चिह्नित करना आवश्यक है कि तमाम आलोचना के बावजूद उनका पहला आलेख कविता के अधिक करीब है, बनिस्पत दूसरे आलेख के. नामवर का पहला आलेख दूसरे की तुलना में गतिशील है, मगर दूसरा आलेख “अंतिम अर्थ” की तलाश में “अपूर्णता के यथार्थ” को स्थिर कर देता है. वह कविता को “समाप्त प्रक्रिया” की तरह पढ़ता है, जबकि मुक्तिबोध का “अँधेरा” निरंतर गतिमान है.
यहाँ एक प्रश्न यह भी है कि नामवर सिंह के इस “नए प्रतिमान” में वास्तव में नया है? क्या उन्होंने प्रगीतात्मक या आत्मपरक कविता की आलोचना के नाम पर एक वैकल्पिक काव्य-दृष्टि प्रस्तुत की है, या केवल मुक्तिबोध-केंद्रित व्याख्या को “नया प्रतिमान” घोषित कर दिया है? इन प्रश्नों की भी पड़ताल आवश्यक है.
कविता के नए प्रतिमान का प्रश्न नई कविता की आलोचना के प्रतिमानों की तलाश से जुड़ा है. जैसा कि विजयदेव नारायण “साही ने कहा है, “समूची नई कविता को ठीक-ठीक देखने के लिए नई कविता के प्रतिमान की जरूरत नहीं है, बल्कि कविता के नए प्रतिमान की जरूरत है.” नामवर सिंह आगे जोड़ते हैं “झंखने और खीजने की बात तो यह है कि उन्होंने (समकालीन आलोचकों ने) उल्टा रुख अपनाया और पुराने प्रतिमानों के आधार पर नई कविता को जाँचना चाहा. नई कविता की आलोचना में प्रायः पुराने प्रतिमान क्यों इस्तेमाल किए गए, यदि इसकी जाँच की जाए तो साफ मालूम होगा कि जिन्हें हम ‘पुराने प्रतिमान’ कहते हैं, वे वस्तुतः पुराने ‘संस्कार’ हैं. इस दृष्टि से आज नए से नए प्रतिमान के लिए सबसे बड़ी चुनौती छायावादी संस्कार हैं”. (संदर्भ-40) मगर नामवर सिंह भी यही गलती करते हैं और मुक्तिबोध की कविता का मूल्यांकन अपने पुराने काव्य संस्कार ‘अपूर्ण प्रगतिशीलता‘ से करते हैं.
दूसरे आलेख में कथित ‘कविता के नए प्रतिमान’ का पहला दोष आत्मपरक बनाम वस्तुपरक की कृत्रिम विभाजन है. यह विभाजन मूलतः उन्नीसवीं सदी के यथार्थवाद बनाम रोमांटिसिज़्म की पुरानी बहस का पुनरावर्तन है, जो नामवर सिंह के पुराने प्रगतिशील काव्य संस्कार वाला दोष है. आधुनिक कविता में आत्म और समाज का यह भेद इतने सरल रूप में नहीं है. नामवर सिंह कविता की दुनिया को दो कठोर श्रेणियों में बाँट देते हैं – पहला आत्मपरक (प्रगीतात्मक, लघु, रोमांटिक) है और दूसरा वस्तुपरक (लंबी, नाट्यविन्यस्त, सामाजिक) है. नामवर सिंह कहते हैं कि “मुक्तिबोध की लंबी कविताओं को ध्यान में रखने के कारण ही मुझे कविता के नए प्रतिमानों की आवश्यकता महसूस हुई.” वे मुक्तिबोध का यह उद्धरण देते हैं “….अगर साहित्य की सौंदर्य मीमांसा करनी हो तो आपको दृष्टि केवल आत्मपरक कविता वह भी आजकल की कविता तक ही सीमित नहीं करनी चाहिए.” (संदर्भ-41) यहाँ केवल ‘आत्मपरक कविता…. तक ही सीमित नहीं’ से का मतलब नामवर जी आत्मपरकता के निषेध लेते हैं और उसकी जगह पर वस्तुपरकता की वकालत करते हैं. अगर मुक्तिबोध के पिछले उद्धरण वाले लेख को अंत तक पढ़ा जाये, तो नामवर सिंह का यह निष्कर्ष गलत है. मुक्तिबोध का यह उद्धरण केशव का है और ‘एक साहित्यिक की डायरी’ के ‘तीसरा क्षण’ कथात्मक-आलेख से है, जो वसुधा नवम्बर 1958 में प्रकाशित हुआ था. यह आलेख लेखक और उसके मित्र केशव के बीच बातचीत के रुप में है और बातचीत का विषय ‘स्व-पक्ष’ और ‘वस्तु-पक्ष’ दोनों के तादात्म्य पर है. इस बातचीत के निष्कर्ष पर लेखक केशव को कहता है “इसीलिए व्यक्तिगत ईमानदारी का सम्बन्ध काव्य-सम्बन्धी मनोभूमिका से अधिक है. यदि यह मनोभूमिका आत्मपरक और वस्तुपरक अर्थात् उन दोनो से समन्वित जीवनपरक दृष्टि से तैयार की गयी है तो उस कवि का क्या कहना. वह निसन्देह समृद्ध करती है.” (संदर्भ-42)
स्पष्ट है कि मुक्तिबोध आत्मपरकता और वस्तुपरकता के समन्वय की बात कर रहे हैं, न कि आत्मपरकता के बरक्स वस्तुपरकता को खड़ा कर रहें हैं, जैसा नामवर सिंह कह रहे हैं. यहाँ नामवर सिंह अपनी सुविधानुसार मुक्तिबोध के विचार का एक हिस्सा लेते है और शेष हिस्सों को छोड़ देते हैं और अपने अनुकूल एकतरफा निष्कर्ष निकाल लेते हैं.
आगे नामवर जोड़ते हैं “आत्मपरक प्रगीत……में वस्तुजगत् की समझदारी के स्थान पर केवल अनुभूति की ईमानदारी का आग्रह किया जाता है. इन कविताओं पर निर्मित काव्य सिद्धांत की एकांगिता और अपर्याप्त दिखाने के लिए…. इसके विपरीत मुक्तिबोध की लंबी कविताओं के रूप में मैंने काव्य के उन मूल्यों पर बल दिया, जो अपनी दृष्टि में सामाजिक और वस्तुपरक हैं और आज के ज्वलंत एवं जटिल यथार्थ को अधिक-से-अधिक समेटने के प्रयास में कविता को व्यापक रूप में नाट्य-विन्यास प्रदान कर रहे हैं.”(संदर्भ-43)
मगर जिस मुक्तिबोध की लंबी कविताओं के आधार पर नामवर सिंह आत्मपरक कविता के विरोध में वस्तुपरकता की वकालत करते हैं, वही मुक्तिबोध कहते हैं “कला, चाहे वह यथार्थवादी कला ही क्यों न हो, एक आत्मपरक प्रयास है. यह उसकी विशेषता है, बहुत बड़ी विशेषता . कला न केवल एक आत्मपरक प्रयास है, वरन् उसकी अपनी एक सापेक्ष स्वतन्त्रता है.” (संदर्भ-44)
एक जगह मुक्तिबोध इस बात को विस्तार देते हैं कि “सच बात तो यह कि आत्मपरक रूप से विश्वपरक, जगत्परक होने की लम्बी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति ही कला है-अभिव्यक्ति कौशल के क्षेत्र में और अनुभूति अर्थात् अनुभूत वस्तु तत्त्व के क्षेत्र में.” (संदर्भ-45)
इसलिए जब नामवर कहते हैं कि मुक्तिबोध की लंबी कविताओं को ध्यान में रखकर नए प्रतिमानों के रुप में वस्तुपरक कविता सिद्धांत की बात करते हैं, तो वे मुक्तिबोध की आलोचना और कविता का एकतरफा और गलत पाठ करते हैं. मुक्तिबोध आत्मपरक और वस्तुपरक दोनों से समन्वित जीवनपरक दृष्टि की बात करते हैं. बात यह है कि आत्मपरक बनाम वस्तुपरक का विभाजन ही कृत्रिम है. आत्मपरक बनाम वस्तुपरक कोई पृथक प्रवृति नहीं है, बल्कि एक ही प्रक्रिया के दो सिरे हैं. कलाकार में आत्मपरकता और वस्तुपरकता के जिस तादात्म्य की बात मुक्तिबोध करते हैं, यह एक जटिल प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया की ही पहचान ऊपर प्रक्रियात्मक यथार्थ के सिद्धांत अंतर्गत वस्तुनिष्ठ आत्मपरक पद्धति (Objective Subjective Method) के रुप में किया गया है. मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता इसी वस्तुनिष्ठ आत्मपरक की अपूर्ण प्रक्रिया है.
मुक्तिबोध की कविता “वस्तुगत यथार्थ” से जुड़ते हुए भी “आत्मिक द्वंद” से मुक्त नहीं होती. इसलिए मुक्तिबोध को “वस्तुपरक” कह देना स्वयं मुक्तिबोध की जटिलता का सरलीकरण है, अवमूल्यन है. आत्मपरकता और वस्तुपरकता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं. जैसा कि मुक्तिबोध कहते हैं “आत्मपरक ईमानदारी और वस्तुपरक सत्यपरायणता का संवेदनात्मक योग अन्तःकरण में ही होता है. और यदि वह अन्तःकरण में न हो, तो ऐसी स्थिति में आत्मपरक या वस्तुपरक सत्यपरायणता, दोनों एक दिखावा-भर हैं. असल में, इस प्रकार का अन्तर करना प्रसंगत है. ईमानदारी के भीतर ही दोनों का अर्थ व्याप्त होना चाहिये.” (संदर्भ-46) मुक्तिबोध के अनुसार रचनाकार की ईमानदारी के लिए आत्मपरकता और वस्तुपरकता दोनों आवश्यक है. इस लिहाज से नामवर इस आंतरिक संक्रमण को सामाजिक बनाम व्यक्तिगत के पुराने चौखटे में रखकर उसकी शक्ति को सीमित कर देते हैं, जो मुक्तिबोध की नजर में रचनाकार की ईमानदारी के विपरीत है.
उनके नए प्रतिमान का दूसरा दोष है कि वे ‘नए प्रतिमान’ की कोई ठोस परिभाषा नहीं देते हैं. नामवर सिंह बार-बार “नए प्रतिमान” की आवश्यकता पर बल देते हैं, परंतु वे कहीं भी इन प्रतिमानों की सैद्धांतिक परिभाषा और भाषिक आकार प्रस्तुत नहीं करते. नामवर सिंह स्वयं कहते हैं कि “केवल नए प्रतिमानों की प्रतिष्ठा पर्याप्त नहीं है. प्रतिमानों को सूत्रबद्ध करने के जो खतरे हैं, उनकी ओर तो संभवतः बहुत-से जागरूक लेखकों का ध्यान है किंतु प्रतिमान-चर्चा में अंतर्निहित सूत्रबद्धता की अनिवार्यता की ओर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है. एक ही प्रतिमान के नाम पर यदि भिन्न आलोचक एक ही कृति का मूल्यांकन करते हुए भिन्न निष्कर्षों पर पहुँचते हैं तो इसका यही अर्थ है कि वे सभी एक ही कृति को नहीं पढ़ रहे . कृति का स्वरूप निश्चित रूप से सबके सामने भिन्न-भिन्न है, क्योंकि उनकी पाठविधि या पढ़ने के तरीके भिन्न-भिन्न हैं. इसलिए कविता के मूल्यांकन के संदर्भ में पद्धति के बिना प्रतिमानों की चर्चा निरर्थक है.” (संदर्भ-47) अंतर्निहित सूत्रबद्धता की अनिवार्यता की बात करने वाले नामवर सिंह ने स्वयं यह गलती दोहरायी है, जब उन्होंने आत्मपरकता के सौंदर्यशास्त्र को तो चुनौती दी, पर उसके विकल्प वस्तुपरक काव्यशास्त्र की अंतर्निहित सूत्रबद्धता प्रस्तुत नहीं की. वे मुक्तिबोध की कविताओं को उदाहरण के रूप में लेते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि इस नए प्रतिमान की विशेषताएँ क्या होगी?
क्या यह कविता की लंबाई पर आधारित है? क्या यह केवल सामाजिक यथार्थ पर आधारित है? क्या यह भाषा और रूप की नवीनता पर आधारित है? जवाब में नामवर सिंह आलोचना में कविता करने लगते हैं और मुक्तिबोध की कविता के दो पद-समूह उछाल देते हैं- ” आज तो पोस्टर ही कविता है.” और “नहीं होती, कहीं भी खतम कविता नहीं होती”. यह दोनों एक अभिधात्मक वक्तव्य है, सैद्धांतिक में अंतर्निहित सूत्रबद्धता नहीं. उन्होंने यह नहीं बताया कि यह “सत्-चित्-वेदना” किस प्रकार काव्य-भाषा को परिवर्तित करती है? किस हद तक वह सौंदर्यबोध से भिन्न होकर “सत्यबोध” में रूपांतरित होती है? क्या कविता की सामाजिकता ही उसकी सौंदर्यात्मकता का मापदंड बन जाती है? क्या पोस्टर ही कविता होती है और कैसे? वे कहते हैं कि नई कविता को आत्मपरकता से परे जाना चाहिए, परंतु यह नहीं बताते कि यह “परे जाना” किस भाषा-रूप में प्रकट होगा. फलतः उनका प्रतिमान “मुक्तिबोध के आदर्श” की व्याख्या बनकर रह जाता है, न कि स्वतंत्र आलोचनात्मक ढाँचा. नामवर सिंह के नए प्रतिमान की सैद्धांतिक अधूरेपन के दोष से ग्रस्त है.
इसलिए ‘कविता के कथित नए प्रतिमान’ का तीसरा दोष ‘रूप और भाषा की अवहेलना‘ है. नामवर सिंह की आलोचना मुख्यतः विषय-केन्द्रित है, वे कविता की विचार-संरचना, सामाजिक दृष्टि और दार्शनिक आशय पर तो खूब लिखते हैं, परंतु रूप, लय, भाषा और प्रतीक के स्तर पर उनका विवेचन अत्यंत सीमित है. मुक्तिबोध की कविता की सबसे बड़ी शक्ति उसकी भाषिक जटिलता और अभिव्यक्तिगत विस्फोट है और वाक्य-विन्यास, प्रतीक-श्रृंखला और अंतःसंवाद की भित्तियों में कविता का सौंदर्य निहित है, जिसे नामवर सिंह वैचारिक अतिरेक में सपाटबयानी तक कहने की भूल कर बैठते हैं.
इसलिए नामवर सिंह जब कहते हैं कि मुक्तिबोध ने “बिंबवादी काव्य-भाषा के दायरे को तोड़कर सपाटबयानी आदि अन्य क्षेत्रों में कदम रखने का साहस” दिखाया तो वे एक बड़ी भूल करते हैं. मुक्तिबोध की भाषा कभी ‘सपाट’ दिखती अवश्य है, मगर सपाटबयानी नहीं है, वह बहुस्तरीय, जटिल और अंधकार में डूबी भाषा है. “सपाटबयानी” कहना उनके यथार्थ के प्रयोगवादी रचनाशास्त्र का अवमूल्यन है.
इन अंतर्विरोधों के कारण ही नामवर सिंह कृत कविता के नए प्रतिमान मुक्तिबोध के संघर्षशील चेतना को स्वीकार तो करते हैं, पर उसकी संभावना के विस्तार से बचते हैं. उनका मुक्तिबोध “सुरक्षित मुक्तिबोध” है, वह जो सामाजिक उत्थान की बात तो करता है, पर ‘क्रांति के लिए तय व्यवस्था का विद्रोही’ नहीं बनता. यही कारण है कि नामवर का “नया प्रतिमान” अंततः मुक्तिबोध के क्रांतिकारी स्वप्न का सौंदर्यीकरण बनकर रह जाता है, न कि उसका विस्तार. इसलिए यह कहा जा सकता है कि नामवर सिंह के “कविता के नए प्रतिमान” एक “पुरानी आलोचना की नई भाषा” भर हैं. मगर नामवर सिंह की आलोचना अपने अंतर्विरोध में ही सबसे अधिक सत्य है, उससे ही उनकी आलोचना के विषय का और उनकी भी आलोचना का अंधेरा स्पष्ट होता है और उससे ही आगे के प्रश्न दिखते हैं एवं आगे की आलोचना को संभावना बनाती है.
कुल मिलाकर नामवर सिंह का “कविता के नए प्रतिमान” हिंदी आलोचना की महत्वपूर्ण परंतु अपूर्ण परियोजना है. उनकी आलोचना वैचारिक रूप से एकांगी और रूपगत विश्लेषण से शून्य है. ‘अंधेरे में’ के भाषा-प्रयोग की संरचना और विशेषता की पहचान नामवर सिंह नहीं कर पाते हैं. इसलिए उनका दृष्टिकोण प्रेरणात्मक तो है, पर सैद्धांतिक नहीं और भाषा के स्तर पर व्यावहारिक तो एकदम नहीं. परिणामतः,“नए प्रतिमान” का विचार अंततः एक घोषणा बनकर रह जाता है, कोई व्यवहारिक सिद्धांत नहीं.
5.
नए भाषा की तलाश
इसलिए सबसे अनिवार्य प्रश्न अब भी शेष है कि ‘अंधेरे में’ कविता की भाषा को कैसे समझा जाये? कविता में भाषा का स्वरूप कैसा हो? प्रक्रियात्मक-गतिशील यथार्थ के अध्ययन की सबसे बड़ी समस्या है कि अध्ययन का औज़ार यानी भाषा स्वयं स्थिर है. भाषा समाज द्वारा निर्मित स्थिर अर्थ–संरचना है, जिसमें शब्दों के अर्थ तय हैं, सीमित हैं और साझा समझ पर टिके हैं. लेकिन यथार्थ स्थिर नहीं है, वह एक निरंतर प्रवाह है, जहाँ अर्थ जन्म लेते हैं, मिटते हैं और फिर नए रूप में उभरते हैं. इसलिए यथार्थ को उसकी गति में पकड़ना केवल “अनुभव” को लिख देना नहीं है, यह भाषा की सीमाओं को तोड़ने का प्रयास भी है. कवि जब यथार्थ को उसके प्रवाह में व्यक्त करना चाहता है, तो वह केवल कविता को नहीं रचता बल्कि भाषा को भी बदलता है.
इस समस्या से मुक्तिबोध भी जूझ रहे थे, 1944 ई. में ‘तारसप्तक’ के आत्म-वक्तव्य में बकौल मुक्तिबोध “मेरी कविताओं के प्रान्त परिवर्तन का कारण है यही आन्तरिक जिज्ञासा. परन्तु इस जिज्ञासु वृत्ति का वास्तव (ऑब्जेक्टिव) रूप अभी तक कला में नहीं पा सका हूँ. अनुभव कर रहा हूँ कि वह उपन्यास द्वारा ही प्राप्त हो सकेगा . वैसे काव्य में जीवन के चित्र की- यथा वैज्ञानिक ‘टाइप’ की उद्भावन की, अथवा तीव्र विचार की, अथवा शुद्ध शब्द-चित्रात्मक, कविता हो सकती है. इन्हीं के प्रयोग मैं करना चाहता हूँ.” (संदर्भ-48)
मुक्तिबोध ने उपन्यास तो नहीं लिखा. मगर यह सोचा जा सकता है कि मुक्तिबोध ने जीवन के “परम-उलझन” को कहने के लिए कविता की भाषा में उपन्यास के गुण डालने के लिए प्राप्त भाषा में कई प्रयोग किये. उनकी चार प्रकाशित लंबी कविताएँ ‘ब्रह्मराक्षस’, ‘अंधेरे में’, ‘चांद का मुंह टेढा है’ और ‘चंबल की घाटी में’ और एक अप्रकाशित कविता ‘एक प्रदीर्घ कविता’ को औपन्यासिक काव्य के तौर पर देखा जा सकता है. 1944 ई. से चले रहे मुक्तिबोध के प्रयोग की भाषा की परिपक्वता 1960 ई. के पास ‘अंधरे में’ कविता में दिखती है.
औपन्यासिकता ने मुक्तिबोध की काव्य-भाषा को गतिशील बनाया, जिसमें गतिशील यथार्थ को भाषा में कह पाना संभव हुआ. रूसी विचारक मिखाइल बाख्तिन ने औपन्यासिकता को साहित्य का सबसे “लोकतांत्रिक” रूप बताया. उनके अनुसार उपन्यास वह विधा है जो भाषा की बहुवाचकता (polyphony) को संभव बनाती है, जहाँ अनेक स्वरों, दृष्टियों और वर्गीय-सांस्कृतिक भाषाओं का सह-अस्तित्व होता है.
औपन्यासिक काव्य-भाषा की प्रविधि का मूल इस विचार में निहित है कि कविता अब एक “संवादात्मक यथार्थ” (Dialogic Reality) को भाषा में उपस्थित करती है. जब यह औपन्यासिक गुण कविता में प्रवेश करता है, तो काव्य-भाषा अपनी एकल ध्वनि से बाहर निकलती है. यह परिवर्तन केवल शैलीगत नहीं, बल्कि काव्य-दृष्टि का मूलभूत पुनर्गठन है, जहाँ कविता अब एक आत्ममुग्ध वक्तव्य न होकर, संघर्षरत यथार्थ का जीवित संवाद बन जाती है. इस प्रविधि का उद्देश्य यह नहीं कि यथार्थ को “चित्रित” किया जाए, बल्कि यह दिखाना है कि यथार्थ कैसे निरंतर भाषा के भीतर निर्मित होता है, टूटता है, पुनः बनता है. इसलिए यह प्रविधि स्थिर नहीं, प्रक्रियात्मक है. “अंधेरे में” कविता की भाषा में यह संवादात्मक यथार्थ अत्यंत सघन रूप में उपस्थित है.
कवि का ‘मैं’ केवल एक वक्ता नहीं, बल्कि अनेक सामाजिक और मानसिक आवाज़ों का संगम बन जाता है. कविता रैखिक नहीं है; दृश्य, स्वप्न, चेतना और बाह्य-यथार्थ के बीच लगातार आवागमन होता है. जैसे “भागता मैं दम छोड़, घूम गया कई मोड़, चौराहा दूर से ही दीखता, वहाँ शायद कोई सैनिक पहरेदार…” (संदर्भ-49)
यह स्ट्रीम ऑफ कॉन्शसनेस जैसी प्रविधि औपन्यासिक संरचना का लक्षण है.
इस प्रक्रिया में भाषा कभी एकल नहीं होती, उसमें हमेशा कई सामाजिक भाषाएँ सह-अस्तित्व रखती हैं. जब कवि इन विविध भाषिक प्रवृति को कविता में शामिल करता है, जैसे लोक, प्रशासनिक, तकनीकी, धार्मिक या राजनीतिक भाषा तब काव्य-भाषा एक जीवित सामाजिक प्रक्रिया बन जाती है. “सैनिक प्रशासन”, “मारो गोली”, “मॉर्शल लॉ”, “पत्रकार” और “मंत्री” जैसे शब्द कविता को ‘सामाजिक भाषिकता’ प्रदान करते हैं.
औपन्यासिक कविता रैखिक संरचना को अस्वीकार करती है. वह यथार्थ की जटिलता को दिखाने के लिए वाक्य-विन्यास की असंगति, अधूरे वाक्यों और विखंडन का प्रयोग करती है. यह केवल शैलीगत प्रयोग नहीं, बल्कि वैचारिक बयान है क्योंकि यथार्थ स्वयं अब अधूरा, विखंडित और संघर्षरत है. औपन्यासिकता कविता में आत्मचेतना लाती है और कविता अपनी भाषा, अपने अर्थ, यहाँ तक कि अपने अस्तित्व पर भी प्रश्न करती है. मुक्तिबोध का ‘अंधेरे में‘ की भाषा इसी आत्म-संदेह का चरम रूप है. “हर बार सोच और हर बार अफसोस, हर बार फिक्र के कारण बढ़े हुए दर्द…” (संदर्भ-50)
यह कविता का ‘अँधेरा’ कोई प्रतीकात्मक स्थिरता नहीं, बल्कि वह भाषिक और मानसिक प्रक्रिया है जिसमें कवि की चेतना समाज, सत्ता और स्वयं के भीतर संघर्षरत और गतिशील रहती है.
दरअसल प्रक्रियात्मक यथार्थ की गतिशीलता भाषा में तभी व्यक्त हो सकती है, जब कविता और भाषा के प्रतिमान अस्थिर रहें. भाषा का अस्थिर प्रतिमान एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें भाषा का पुराना प्रतिमान टूटता है, नया प्रतिमान स्थापित होता है एवं फिर वह नया प्रतिमान भी टूटने लगता है. इसलिए गतिशील सामूहिक यथार्थ का वर्णन स्थिर भाषा-प्रतिमान के भीतर नहीं, बल्कि निरंतर भाषा-प्रतिमान-भंग की अवस्था में संभव है. अर्थात् जो कविता-सिद्धांत अपने प्रतिमान को अस्थिर कर सके, वही भाषा और कविता यथार्थ की गति को देख सकता है.
निरंतर भाषा-प्रतिमान-भंग वाली काव्य-भाषा कैसी होगी? वैसी भाषा, जो अर्थ को “स्थिर अर्थ” न बनाए, बल्कि “अर्थ की प्रक्रिया” बना दे, उसके स्थिर रुप का त्याग कर दे और ‘प्रक्रियात्मक भाषा’ बना दे. “प्रक्रियात्मक भाषा” में केवल पुराने अर्थों का संकेत नहीं होता, बल्कि नए अर्थों का निर्माण होता है. हर शब्द किसी स्थायी बिंदु पर न ठहरे, बल्कि अपने अगले अर्थ की दिशा में बढ़ता रहे. ऐसी भाषा यथार्थ के समान ही अधूरी, अस्थिर और परिवर्तनशील होती है. मुक्तिबोध की औपन्यासिक काव्यभाषा भी इसका एक उदाहरण है. मुक्तिबोध ने भाषा की गतिशीलता के लिए कई प्रयोग किये थे. उन्होंने ‘एक साहित्यिक की डायरी’ के रुप में कहानी और आलेख के मेल से कथात्मक-आलेख लिखने का प्रयोग किया था. इन प्रयोगों ने मुक्तिबोध की काव्यभाषा को भी गतिशील और बहुवचन बनाया. इसलिए जब मुक्तिबोध ‘अंधेरे में’ लिखते हैं “ज़िंदगी के कमरों में अँधेरे लगाता है चक्कर कोई एक लगातार…” तो यहाँ “अँधेरा” कोई स्थिर प्रतीक नहीं है. वह अर्थ के कई स्तरों पर खुलता और बदलता है, कभी भय है, कभी चेतना की सीमाएँ, कभी आत्मा की छाया और कभी समाज के नीतिगत अंधकार के रुप में. पाठक अँधेरे को कैसे अनुभव करता है?
एक युवा पाठक इसे अपने करियर की अनिश्चितताओं के रूप में देख सकता है. एक बुजुर्ग पाठक इसे जीवन के अंत की ओर बढ़ने वाली यात्रा के प्रतीक के रूप में देख सकता है. पाठक की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में अँधेरा कई सांस्कृतिक अर्थों को समेटे हुए है, जैसे ध्यान, साधना और अनन्त शांति. पश्चिमी संदर्भ में यह अक्सर भय, अनिश्चितता और नकारात्मकता से जोड़ा जाता है. पाठक को अपने संदर्भ में कविता को समझने का विकल्प कविता में प्रतीकों के कारण संभव होता है. यहाँ कविता की भाषा निश्चितताओं में नहीं अनिश्चितताओं में बात को रखती है.
भाषा में जितना कहा जाता है, उससे अधिक उसमें अनकहा कथ्य होता है. यह “अनकहा” ही अर्थ की गति को बनाता है. कविता के भीतर जो स्फुटता, अस्पष्टता या ‘अधकहा’पन है,वह त्रुटि नहीं, बल्कि नयी भाषा और अर्थ की प्रक्रिया का अपरिहार्य हिस्सा है. जब मुक्तिबोध कहते हैं—
“कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति .
कौन वह दिखाई जो देता,
नहीं जाना जाता !!” (संदर्भ-51)
तो यह ‘अस्पष्टता’ ही कविता को प्रक्रियात्मक बनाती है. चेहरों का अनपहचाना रह जाना यथार्थ की अनंतता का संकेत है. कविता इस ‘अनपहचाने’ को पहचानने का संघर्ष है और यही इसका सौंदर्य है. इसलिए प्रक्रियात्मक कविता में “अनकहा मौन” उतना ही सक्रिय तत्व है जितनी “भाषा”. कवि वह है जो कहे गए और अनकहे के बीच संवेदना की धारा भाषा में प्रवाहित रख सके.
इसलिए प्रक्रियात्मक भाषा को हम ‘क्रियात्मक भाषा’ के रुप में देख सकते हैं, जो केवल अर्थ ही नहीं कहती बल्कि ‘अर्थ निर्माण की क्रिया’ भी करती है. ‘अर्थ निर्माण की क्रिया’ के कई स्तर पर हो सकते हैं, जैसे नए अर्थ का निर्माण, नए विचार का निर्माण या नयी कहन का निर्माण. उदाहरण के तौर पर ‘अंधेरे में’ की भाषा प्रतिरोध की क्रिया करती है. मुक्तिबोध की भाषा ‘प्रतिरोधी भाषा’ है, जो भाषा स्थापित मान्यताओं और संरचनाओं को चुनौती देती है. ‘तार सप्तक’ के दूसरे संस्करण के लिए लिखे गये अप्रकाशित दूसरे आत्म-वक्तव्य में मुक्तिबोध अपनी काव्यभाषा के स्रोत के बारे में बताते हैं “मानव-सम्बन्धों की इस गिरावट के ज़माने में, मेरी कविता की सारी इमेजरी- बिम्ब-माला- विकसित हुई. उसमें घने और काले, लाल और नीले, जामूनी और बैंगनी रंग हैं. इन कविताओं में से अधिकांश अप्रकाशित हैं. यह इमेजरी कहाँ से कैसे पैदा हुई, यह कहना मुश्किल है. केवल इतना कहना चाहूँगा कि मनुष्य-सम्बन्धों की भीषण गिरावट के बीच, मनुष्य-दीप्ति के जो प्रकाशमान दृश्य मेरे सामने आये, उन्हीं के सहारे मेरा जीवन आगे बढ़ता रहा.” (संदर्भ-52)
आगे मुक्तिबोध जोड़ते हैं “यद्यपि, आगे के वर्षों में धीरे-धीरे मेरी कविता के काले रंग घुलने लगे, किन्तु मेरी इमेजरी बढ़ती ही गयी. विषय भी विभिन्न और विस्तृत होते गये. यहाँ तक कि सन् 52-53 के आगे मेरी कविताओं ने अपना रूपाकार बढ़ा लिया.” (संदर्भ-53)
यही उस समय-अवधि का आरंभ था, जिस अवधि में ‘अंधेरे में’ लिखा गया था. आगे मुक्तिबोध जोड़ते हैं “वास्तविकता तो यह है कि आज के ज़माने में मेरे लिए मुख्य प्रश्न कॉंन्टेंट की कमी और शिल्प के आधिक्य का नहीं, वरन् कॉन्टेंट के अतिरेक और शिल्प की अपर्याप्तता का है. इसीलिए, मेरी मुख्य समस्या यह है कि कॉन्टेंट के वैविध्य को किस प्रकार समेटा जाये, किस प्रकार उसे रूपबद्ध किया जाये .” (संदर्भ-54)
इस शिल्प की अपर्याप्तता की समस्या के समाधान के लिए जिस काव्य-भाषा का विकास मुक्तिबोध ने किया, वही ‘अंधेरे में’ कविता की भाषा है. इसलिए ‘अँधेरे में’ कविता की भाषा अपने आप में एक ‘क्रियात्मक भाषा’ है, जो पाठक को उस मानसिक स्थिति में ले जाती है, जिसमें कवि खुद को पाता है और पाठक को उन नए अर्थों में भी ले जाती है, जिसे कवि ने भी नहीं सोचा था.

6.
कविता पर पुनर्विचार : कविता एक ज्ञान-पद्धति
यहाँ ‘कविता के स्वरूप की समझ’ पर पुनर्विचार आवश्यक है. परंपरागत रुप से कविता को भाषा के सुंदरतम क्रम वाली रचना मानते हैं, जिसका एक पूर्ण अर्थ होता है. मगर कविता पूर्ण नहीं है, वह एक अपूर्ण भाषिक घटना या प्रक्रिया है. वह भाषा और चेतना के बीच घटित होती है. कविता तभी होती है जब लेखक और पाठक भाषा के माध्यम से उसमें प्रवेश करते हैं और भाषा की कहन से आगे तक जाते हैं. इसलिए कविता का अस्तित्व भाषा के घटित होने में है. कविता की भाषा अब ‘कथ्य की भाषा’ नहीं, बल्कि ‘भाषा में अनुभव की संरचना’ है. यह स्थिति हमें कविता की संरचना, सृजन और आलोचना तीनों को पुनर्परिभाषित करने के लिए बाध्य करती है.
दरअसल इतिहास में कविता के साथ विचित्र घटना यह हुई है कि आरंभिक ग्रीक दर्शन से लेकर संस्कृत परंपरा में दर्शन औऱ गंभीर चिंतन का माध्यम पहले कविता ही हुआ करती थी, मगर बाद में धीरे-धीरे गंभीर वैचारिकी का माध्यम कविता के स्थान पर गद्य होने लगा. धीरे-धीरे यह परंपरा बन गई और काव्य के दार्शनिक-वैचारिकी स्वरूप को हाशिये पर डाल दिया गया. परिणामस्वरूप कविता में गंभीर चिंतन और राजनीतिक कथ्य को एक बाहरी हस्तक्षेप और अस्वाभाविक स्थिति के रूप में देखा जाने लगा. इस बदलाव ने कविता में गंभीर चिंतन और समकालीन राजनीति की अभिव्यक्ति को सीमित और संदेहगत कर दिया.
मगर कविता को केवल भावात्मक या सौंदर्यपरक विधा तक सीमित कर देना आधुनिकता की सबसे बड़ी ज्ञानशास्त्रीय (एपिस्टेमिक) त्रुटि है. यह वही क्षण था जब ज्ञान ने अपनी सबसे सक्षम विधा की बहुलता का प्रयोग सीमित कर दिया. कविता की दार्शनिक क्षमता गद्य के मुकाबले अलग है, कविता सत्य को प्रतीक, रूपक और लय में खोलती है और उसे विस्तार देती है, जबकि गद्य उसे तर्क और विश्लेषण में रखता है एवं उसको संश्लिष्ट करता है और अंततः संक्षिप्त या सीमित करता है. ‘प्रक्रियात्मक यथार्थ’ को व्यक्त करने में भाषा के विभिन्न रुपों में सबसे सक्षम विधा गद्य नहीं कविता है.
इसलिए कविता को केवल भावनात्मक और सौंदर्यपरक विधा मानना एक ऐतिहासिक निर्मिति (historical construct) मात्र है, कविता की स्वाभाविक स्थिति नहीं है. कविता केवल “अभिव्यक्ति का रुप” नहीं है, बल्कि “सत्य या यथार्थ के वैकल्पिक उद्घाटन का माध्यम” भी है. वह प्रतीक, रूपक और सौंदर्य के माध्यम से विचार को उस बहुलता में ले जाती है जहाँ गद्य नहीं पहुँच पाता. गद्य सत्य को परिभाषा और तर्क में बाँधता है, जबकि कविता सत्य को उसके बहुवचन रूपों (plural forms) और अपूर्णताओं (incompletenesses) में उजागर करती है. इसलिए ‘प्रक्रियात्मक यथार्थ’ के तहत यथार्थ की गति को पकड़ने में सबसे सक्षम विधा कविता है.
निश्चित ही इस बहुवचन दृष्टि के भीतर जोखिम भी हैं. जब कविता अर्थ की स्थिरता छोड़ देती है, तो वह कभी–कभी शून्यता या निरर्थकता की ओर जा सकती है. भाषा की प्रक्रियात्मकता का अतिरेक पाठक को विस्थापित भी कर सकता है. पर यह जोखिम ही कविता का नैतिक मूल्य है, क्योंकि जो भाषा तय अर्थ के अंत को स्वीकार करती है, वही नए अर्थ की संभावना रचती है. स्थिरता में सुरक्षा है, पर प्रक्रिया में स्वतंत्रता. इसलिए ‘प्रक्रियात्मक भाषा’ कई जोखिम उठाती है, पहला जोखिम अर्थ के विघटन का, दूसरा जोखिम पाठक की असुविधा का और अंतिम जोखिम स्वयं अपनी सीमाओं के पार जाने का. यही उसका अस्तित्वगत साहस है, जो उसका आस्तित्व-भंग कर सकती है.
इस जोखिम और साहस का उदाहरण मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता है और इसी जोखिम के कारण वह अपने समय से आगे जाती है, अपने शब्दों से आगे जाती है और कवि मुक्तिबोध से भी आगे जाती है. बात यह है कि यथार्थ किसी भी वैचारिकी से अधिक प्रमाणिक और वैज्ञानिक होता है. हर वैचारिकी अपनी स्थापनाओं की सीमा से सीमित रहता है, मगर यथार्थ नहीं. लेखक अगर अपने यथार्थ को ईमानदारी अर्थात आत्मपरक और वस्तुपरकता के तादात्मय से व्यक्त करता है, तो वह किसी भी विचारधारा और सिद्धांत से व्यापक लेखन करता है. यही कारण है कि मुक्तिबोध की काव्यगत ईमानदारी उन्हें वैचारिकी सीमितता से बचा गयी. इसलिए मार्क्सवादी होते हुए भी मुक्तिबोध की कविता मार्क्सवाद की तत्कालीन सीमा से बाहर भी स्वतंत्र विचरण करती है और यह काव्यगत स्वतंत्रता और कविता की आत्मनिर्भर वैचारिकता ही कविता की असली ताकत है.
दूसरी तरफ नामवर सिंह भी मुक्तिबोध की तरह मार्क्सवादी वैचारिकी को सही मानते थे, मगर नामवर सिंह का दूसरा आलेख वैचारिकी की सीमा में सीमित हो जाता है क्योंकि वे यथार्थ को वैचारिकी के माध्यम से देखने का प्रयास करते हैं और खंडित यथार्थ को पकड़ पाते हैं. वस्तुपरकता पर नामवर सिंह का अतिरिक्त आग्रह के कारण ऐसा हुआ.
इसका थोड़ा दोष गद्य माध्यम को भी जाता है. यहाँ हम रोमांटिक होकर कह सकते हैं, कि कविता की बहुलता मुक्तिबोध को एकपक्षीय होने से बचा लेती है, गद्य की स्पष्टता नामवर सिंह को एकपक्षीय बना देती है. एकपक्षीयता और स्पष्टता गद्य का स्वभाव है और बहुलता और अस्पष्टता कविता का स्वभाव.
इसलिए कविता में भाषा केवल माध्यम नहीं होती, स्वयं एक अदृश्य विषय की तरह काम करती है और कथ्य के अर्थ को अस्थिर रखती है. यह भाषा-प्रयोग का दोष नहीं, बल्कि ज्ञानशास्त्रीय रणनीति है. जैसे ‘अँधेरे में’ की पंक्तियों में जो अस्थिरता है, जिसमें मुक्तिबोध जानबूझकर भाषा को विखंडित और अस्थिर करते हैं, ताकि अर्थ स्थिर न हो. कभी दृश्य बदलता है और कमरे से जंगल, जंगल से प्रोसेशन, प्रोसेशन से आत्मस्वप्न. यह गति केवल कथा नहीं है, यह भाषा की गति है. हर दृश्य अगले में समा जाता है, कई शब्द अपने अर्थ को खोकर नए अर्थ में पुनर्जन्म लेता है. यही “सार्थक अस्थिरता” प्रक्रियात्मक यथार्थ की कविता की आत्मा है. यह ‘अर्थ का बहुवचन’ पाठक को आमंत्रित करता है कि वह अनुभव के उस स्तर पर जाए, जहाँ व्यक्तिगत भावनाएँ और सामाजिक वास्तविकताएँ एक-दूसरे में घुलमिल जाती हैं और कथ्य विषय का अकथ्य और स्थिर भाषा का अस्थिर रुप कुछ नए में रूपांतरित हो जाये. इस तरह की प्रक्रियात्मक भाषा कविता को एक ज्ञान शास्त्रीय प्रक्रिया बना देती है, जो ज्ञान को विकसित करने की परंपरागत वैज्ञानिक विधि का एक विकल्प देती है. एक तरह से प्रक्रियात्मक भाषा वाली कविता ज्ञान का मल्टीवर्स है.
कविता की असली शक्ति यह है कि वह विचार या कथ्य को केवल कहती नहीं, बल्कि उसमें विस्तार करती है, विकल्प सुझाती है और निर्माण भी करती है. कविता केवल सौंदर्य, अलंकार या भावुकता नहीं है, वह सत्य का वैकल्पिक उद्घाटन है. दर्शन जहाँ सत्य को संकल्पना में पकड़ना चाहता है,वहाँ कविता उसे प्रतीक, रूपक और छवि में अचिंतित रुप में अनकहा प्रकट करती हमें बताती है कि ज्ञान या यथार्थ केवल दार्शन, वैचारिकी और वैज्ञानिक परिभाषाओं में नहीं, बल्कि यथार्थ और उसके भाषिक के अनुभव में भी रचा जा सकता है. कविता केवल कहती भर नहीं है, रचती भी है. इसीलिए कविता केवल कला नहीं है, वह ज्ञान का एक विशेष माध्यम और रुप है. है. कविता विचार का एक एस्थेटिक-एपिस्टेमिक मोड (aesthetic-epistemic mode) है, जिसमें यथार्थ की बहुलता के मध्य संबंध को समझने की भाषिक-प्रक्रिया कविता को ‘भाषा में अनुभव की संरचना’ के साथ-साथ एक सम्पूर्ण ज्ञान-प्रणाली के रूप में विकसित करती है, जहाँ कविता यथार्थ को व्यक्त करने के साथ ही संभव-यथार्थ की संकल्पना ( Hypothesis) की तरह काम करती है.
संदर्भ
(1) पृ.-228, नामवर सिंह, अँधेरे में: परम अभिव्यक्ति की खोज, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974 (2005).
(2) पृ.-228, नामवर सिंह, अँधेरे में: परम अभिव्यक्ति की खोज, कविता के नए प्रतिमान, राजकमल प्रकाशन,1974.
(3)पृ.-229, नामवर सिंह, अँधेरे में: परम अभिव्यक्ति की खोज, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974 (2005).
(4) पृ.-247, नामवर सिंह, ‘अँधेरे में’ : पुनश्च, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974 (2005).
(5) पृ.-228, नामवर सिंह, अँधेरे में: परम अभिव्यक्ति की खोज, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974.
(6) पृ.-251, नामवर सिंह, ‘अँधेरे में’ पुनश्च, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974. एवं चाँद का मुँह टेढ़ा है, मुक्तिबोध रचनावली : दो / 285
(7) पृ.-251, नामवर सिंह, ‘अँधेरे में’ पुनश्च, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974.
(8) पृ.-250, नामवर सिंह, ‘अँधेरे में’ पुनश्च, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974. एवं पृ.- 82, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, तीसरा क्षण, एक साहित्यिक की डायरी, मुक्तिबोध रचनावली-4, राजकमल प्रकाशन,1986.
(9) पृ.-11, नामवर सिंह, द्वितीय संस्करण की भूमिका, कविता के नए प्रतिमान,द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974.
(10) पृ.-129, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, समीक्षा की समस्याएँ, मुक्तिबोध रचनावली-5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1980.
(11) पृ.-108, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, वस्तु और रूप : तीन, मुक्तिबोध रचनावली-5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1980.
(12) पृ.-252, नामवर सिंह, ‘अँधेरे में’ पुनश्च, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974.
(13) पृ.-252, नामवर सिंह, ‘अँधेरे में’ : पुनश्च, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974 (2005).
(14) पृ.-64, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, ‘प्रगतिशीलता’ और मानव-सत्य, मुक्तिबोध रचनावली-5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1980.
(15) पृ.-252, नामवर सिंह, ‘अँधेरे में’ : पुनश्च, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974 (2005).
(16) पृ.-175-76, नामवर सिंह, अनुभूति की जटिलता और तनाव, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974 (2005).
(17) पृ.-416, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में, मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(18) पृ.-375, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(19) पृ.-375, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में, मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(20) पृ.-377, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(21) पृ.-384, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(22) पृ.-389, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(23) पृ.-394, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(24) पृ.-400, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019.
(25) पृ.-407, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019.
(26) पृ.-409, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019.
(27) पृ.-359, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध रचनावली-6, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1986.
(28) पृ.-375, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(29) पृ.-377, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(30) पृ.-379, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(31) पृ.-379, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(32) पृ.-389, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(33) पृ.-375, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(34) पृ.-393, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(35) पृ.-393, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(36) पृ.-415, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(37) पृ.-393, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(38) पृ.-221,नामवर सिंह, अँधेरे में: परम अभिव्यक्ति की खोज,कविता के नए प्रतिमान,द्वितीय संस्करण,राजकमल प्रकाशन,1974 (2005).
(39) पृ.-94-95, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, वस्तु और रूप : एक, मुक्तिबोध रचनावली-5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1980.
(40) पृ-27-28, नामवर सिंह, कविता क्या है? और कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974.
(41) पृ.-250, नामवर सिंह, ‘अँधेरे में’ पुनश्च, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974. एवं पृ.-
82, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, तीसरा क्षण, एक साहित्यिक की डायरी, मुक्तिबोध रचनावली-4, राजकमल,प्रकाशन,1986.
(42) 114, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, तीसरा क्षण, एक साहित्यिक की डायरी, मुक्तिबोध रचनावली-4, राजकमल प्रकाशन,1986.
(43) पृ.-250, नामवर सिंह, ‘अँधेरे में’ पुनश्च, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974.
(44) पृ.-360, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, रचनाकार का मानवतावाद, मुक्तिबोध रचनावली-5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1980.
(45) पृ.-349, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, नयी कविता की अन्तःप्रकृति: वर्तमान और भविष्य, मुक्तिबोध रचनावली-5, राजकमल प्रकाशन,1980.
(46) पृ.-169-70, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, समीक्षा की समस्याएँ, मुक्तिबोध रचनावली-5, राजकमल प्रकाशन,1980.
(47) पृ-35, नामवर सिंह, कविता के नए प्रतिमान, कविता के नए प्रतिमान, द्वितीय संस्करण, राजकमल प्रकाशन, 1974.
(48) पृ.-271, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, आत्म-वक्तव्य : एक, तारसप्तक (1944), मुक्तिबोध रचनावली-5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1980.
(49) पृ.-388, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(50) पृ.-381, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(51) पृ.-376, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, अंधेरे में मुक्तिबोध समग्र-2, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2019
(52) पृ.-273, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, आत्म-वक्तव्य दो, दूसरे संस्करण के लिए लिखा गया किन्तु अप्रकाशित वक्तव्य, मुक्तिबोध रचनावली-5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1980.
(53) पृ.-274, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, आत्म-वक्तव्य दो, दूसरे संस्करण के लिए लिखा गया किन्तु अप्रकाशित वक्तव्य, मुक्तिबोध रचनावली-5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1980.
(54) पृ.-275, मुक्तिबोध, सं.-नेमिचन्द्र जैन, आत्म-वक्तव्य दो, दूसरे संस्करण के लिए लिखा गया किन्तु अप्रकाशित वक्तव्य, मुक्तिबोध रचनावली-5, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली,1980.
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कृष्ण समिद्ध (जन्म,1986) 2004 से आलोचना, कविता और फ़िल्म-नाटक निर्देशन के क्षेत्र में सक्रिय. वर्ष 2013 में लघु फ़िल्म ‘सिटी ऑफ़ ड्रीम्स’ का निर्देशन. नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, भारंगम 2025 और मिनर्वा 2025 में चयनित नाटक ‘स्माल टाउन ज़िंदगी’ का निर्देशन एवं नाट्य रूपांतरण लेखन.


श्रमसाध्य काम किया है तुमने! तुम्हारे गद्य में लयात्मकता है।
बहुत मेहनत और अध्ययन के बाद आपने जिस तरह नामवर जी की नोटिस ली है। नामवर जी को लेकर किसी एक लेख में इतनी असहमतियां मुश्किल से ही मिलेंगी । संदर्भों के साथ आपकी कहने की शैली का क्या कहना ! हार्दिक बधाई…
नामवर, मुक्तिबोध और यथार्थ का वैज्ञानिक विश्लेषण करता यह आलेख सोच की जड़ता को तोड़ता नए क्षितिज की ओर ध्यान खींचता है। कृष्ण के निम्न निष्कर्ष गंभीरता और ध्यान मांगते हैं –
अंधेरे में “परम अभिव्यक्ति” की नहीं “परम उलझन” की कविता है…
मुक्तिबोध आत्मपरक और वस्तुपरक दोनों से समन्वित जीवनपरक दृष्टि की बात करते हैं… ‘अस्पष्टता’ ही कविता को प्रक्रियात्मक बनाती है. चेहरों का अनपहचाना रह जाना यथार्थ की अनंतता का संकेत है. कविता इस ‘अनपहचाने’ को पहचानने का संघर्ष है…मार्क्सवादी होते हुए भी मुक्तिबोध की कविता मार्क्सवाद की तत्कालीन सीमा से बाहर भी स्वतंत्र विचरण करती है और यह काव्यगत स्वतंत्रता और कविता की आत्मनिर्भर वैचारिकता ही कविता की असली ताकत है….कविता में भाषा केवल माध्यम नहीं होती, स्वयं एक अदृश्य विषय की तरह काम करती है और कथ्य के अर्थ को अस्थिर रखती है. यह भाषा-प्रयोग का दोष नहीं, बल्कि ज्ञानशास्त्रीय रणनीति है. जैसे ‘अँधेरे में’ की पंक्तियों में जो अस्थिरता है, जिसमें मुक्तिबोध जानबूझकर भाषा को विखंडित और अस्थिर करते हैं, ताकि अर्थ स्थिर न हो.
कृष्ण सम्मिध्द का आलेख खासा पोलेमिकल है। कृष्ण सम्मिद्ध सक्षम कवि हैं , फिल्मकार हैं और एक लंबी तैयारी के साथ इस फील्ड में आये हैं। हिन्दी आलोचना ऐसे तमाम लोगों से समृद्ध होगी।
कृष्ण पटना विश्वविद्यालय में इतिहास के छात्र थे। खासकर सबाल्टर्न स्टडीज स्ट्रीम की अध्येता इतिहासकार पापिया घोष से प्रभावित थे।
आलेख में बहुत ही महात्वाकांक्षी उड़ानें हैं , एकदम नयी थेअरी प्रस्तावित करने का साहस तक उठाया है । उनको ढ़ेर सारी शुभकामनाएं।