साहित्य में भ ट क ते हुए
अशोक वाजपेयी
साहित्य में भटकते हुए पचहत्तर बरस हो गये हैं. यह एक भटकते हुए आदमी का वक्तव्य है. उम्मीद है कि थोड़ी देर में आपको कुछ भटका सकूँगा. अगर पहले से ही भटकते रहे हैं तो कुछ देर मेरे साथ भटकने का अनुग्रह करेंगे ऐसी उम्मीद करता हूँ.
जिन लोगों की पहले से तय मंज़िल होती है, उस मंजिल तक पहुँचने की उनकी कोशिश सीधे रास्ते की होती है, जिन्हें पहले से पता है कि उन्हें ज़िन्दगी में क्या -कुछ-कैसे करना है उनके लिए साहित्य बहुत सहायक या उपयोगी नहीं हो पाता. वे साहित्य से दूर रहते हैं और साहित्य भी उनसे दूर ही. साहित्य उन्हें ‘शुभास्तु ते पन्थानः’ कहकर मंगल कामना करता है, ‘दूरात् प्रणम्य’ मानकर छोड़ देता है.
साहित्य भटकने का परिसर है- उसमें चलना, चलते रहना अभीष्ट होता है, कहीं पहुँचना नहीं. इस भटकने के कई मुक़ाम होते हैं पर कोई मंज़िल नहीं. यह एक तरह की विपथगामिता है- विपथ होना अकसर विरथ होना भी होता है: ‘रावण रथी, विपथ रघुवीरा’. यह भी कह सकते हैं कि साहित्य में चलना-भटकना ही मंजिल है. इस बेमंज़िल भटकने के कुछ पहलू हैं जिन पर अब विचार करते हैं.
- कमसामानी : यात्रा पर कम पाथेय रखकर निकलना पहले भी आदर्श माना जाता रहा है. भटकने में बहुत बोझ सिर या कन्धों पर रखकर निकलना कठिन होता है, उसमें तो कमसामानी ही ज़रूरी और व्यावहारिक है. भटकने के दौरान कुछ-न-कुछ मिलता ही रहता है- सामान अगर भौतिक रूप से उतना नहीं तो मानसिक रूप से बहुत.
- गुमनामी : भटकने में कमसामानी का एक अर्थ गुमनामी भी होता है. आप अपने नाम का बोझ भी उतार देते हैं. उसकी कोई दरकार नहीं रह जाती. जो लोग, प्राणी, चरित्र, प्रसंग आदि आपको भटकने के दौरान मिलते हैं उन्हें ज़्यादातर आपके नाम-धाम जानने की कोई उत्सुकता नहीं होती. बल्कि कई बार आप अपनी गुमनामी में, उनसे तादात्म्य में उनके नाम धारण करते चलते हैं. जीवन में आप कई नाम धारण नहीं कर पाते. अगर करेंगे तो इसे कोई दुश्चक्र या षड्यन्त्र समझा जा सकता है या उससे जोड़ा जा सकता है. साहित्य में आप नये-नये नाम, सहज भाव से, धारण करते, छोड़ते रहते हैं. हबीब तनवीर के एक नाट्यगीत में प्रश्न पूछा गया है: ‘गुमनामी अच्छी है या कि नामवरी?’
- अनहोनी : भटकने में जब-तब अनहोनी घटती रहती है. चूंकि आप पहले से निर्धारित मार्ग पर नहीं चल रहे होते हैं, भटकने में अप्रत्याशित घटता रहता है. साहित्य आपको अप्रत्याशित की रमणीयता का अनुभव कराता है. जो भी अप्रत्याशित या अनहोना साहित्य के वन में घटता या सामने आता है, अपनी सचाई लेकर आता है. साहित्य में तो झूठ भी सच होता है- झूठ वास्तविक लगता है. याद कर सकते हैं कि पिकासो ने कहा है: ‘आर्ट इज़ ए लाइ व्हिच टेल्स ट्रूथ’ अर्थात् ‘कला ऐसा झूठ है जो सच कहता है.’ याद करें आल्बेयर कामू के उपन्यास ‘दि आउटसाइडर’ की पहली पंक्ति जो कुछ यह है कि ‘मेरी माँ कल मर गयी या शायद परसों.’ या फ्रांज़ काफ्का की कहानी ‘मेटामॉर्फि़सिस’ की शुरूआत जिसमें उसका चरितनायक एक सुबह उठने पर पाता है कि वह एक कीड़े में बदल गया है.
महाभारत में गीतोपदेश के बाद, जब अर्जुन के संशय मिट चुके हैं और युद्ध शुरू होने को है, शंखनाद हो चुका है, अर्जुन अपने धनुष की प्रत्यंचा तानकर उस पर एक बाण लगा चुके हैं तो उसके रथ के एक अश्व पर एक चिड़िया आकर बैठ जाती है, पंख फैलाये, नाराज़ और बेचैन और कहती है कि तुम किस तरह के प्रभु हो जो मनुष्यों को एक-दूसरे को मारने को उकसा रहे हो- छोटे पक्षियों के घोंसले नष्ट करने जा रहे हो. अर्जुन गीता का सहारा लेकर उस चिड़िया को युद्ध की ज़रूरत के बारे में आश्वस्त करने की कोशिश करते हैं जो कृष्ण से इस बात का इसरार कर रही है कि वे युद्ध कहीं और जाकर करें ताकि उसके नवजात बच्चे सुरक्षित अपने घोंसले में पल-बढ़ सकें. अपने आग्रह का कोई प्रभाव पड़ते न देख वह हताश उड़ जाती है. अर्जुन अपना पहला बाण छोड़ते हैं जो शत्रु को बेधने के लक्ष्य से भटककर सिर्फ एक हाथी की भारी घण्टियों को बिखेर देता है. भयानक सत्यानाश युद्ध में बदस्तूर होता रहता है. युद्ध की समाप्ति पर, अठारह दिनों बाद, कृष्ण अर्जुन के साथ उस वृक्ष तक जाते हैं जहाँ उस चिड़िया का घोंसला था. हाथी की भारी घण्टी के नीचे से चिड़िया, चिड़ा और उनके बच्चे पंख फड़फड़ा कर उड़ जाते हैं.
- अनचिन्हार : कबीर ने ‘सबद’ की महिमा में कहा है- ‘ताते अनचिन्हार मैं चीन्हा.’ भटकने में ऐसे कई मुक़ाम, अनुभव, लोग, छवियाँ आप से मिलते हैं जो इर्दगिर्द, आसपास, पुरा-पड़ास में हैं जिन्हें हम चीन्ह नहीं पाये- जिन्हें हम अनचिन्हार छोड़े हुए थे और अब चीन्ह पा रहे हैं. साहित्य एक तरह से आपको ‘दूसरा’ जीवन देता है जो आपके जीवन के नज़दीक ही था पर जिसे आप साहित्य के बताये-चेताये बग़ैर पहचान नहीं पाते.
- पगडण्डियाँ : भटकने से सीधी राह भले न मिलती हो, पगडण्डियाँ बहुत मिलती हैं. कुछ तो पहले से होती हैं और कुछ आपके चलने-भटकने से बनती हैं. कुछ-कुछ वैसे ही जैसे जब उस्ताद अमीर ख़ाँ अपने गायन से गहरे उतरते हैं, मानो पानी में, सीढ़ी-दर-सीढ़ी तो सभी सीढ़ियाँ पहले से बनी नहीं होतीं- कुछ उनके गहरे उतरने से बनती जाती हैं. संसार की अनेक महान् कृतियाँ, जैसे ‘महाभारत’, ‘ओडेसी’, ‘दान किहोते’, ‘वार एण्ड पीस’, शेक्सपीयर के नाटक भटकने की गाथाएँ हैं- भटकने से बनती पगडण्डियों की कथा भी.
- सरहदें : भटकने में आप बार-बार किसी-न-किसी सरहद पर पहुँचते हैं. लगता यह है कि अब आगे नहीं जाया जा सकता. साहित्य में ये सरहदें और शक्तियाँ बताती हैं- ज़्यादातर धर्म, नैतिकता, राजनीति, समाज, बाज़ार, क़ानून आदि. लेकिन साहित्य ऐसा वन-प्रान्तर होता है जिसमें सरहदें छेंकती-रोकती नहीं, पार कराती हैं. निराला की पंक्तियाँ हैं- ‘जानता हूँ, नदी-झरने, जो मुझे थे पार करने, कर चुका हूँ, हँस रहा यह देख, कोई नहीं भेला’ ऐसी सरहदें जो अपने अतिक्रमण का न्योता दें, साहित्य में ही होती हैं. महान कृतियाँ पुष्टि या सत्यापन से नहीं, अतिक्रमण से सम्भव होती हैं. ‘महाभारत’ धर्मयुद्ध की अनिवार्यता और उसकी अन्ततः विफलता-निरर्थकता का काव्य है. धर्म से प्रेरित कविता भी अपना मर्म और सत्व धर्म के अतिक्रमण से ही पाती है.
- संगसाथ : आप अकसर अकेले ही भटकते हैं पर आपको ऐसे ही और भटकनेवालों का संगसाथ भी मिलता रहता है. आप कुछ देर उनके साथ भी रमते-ठहरते-भटकते हैं. थोड़ी देर के लिए सही, भटकनेवालों की, संगसाथ की एक बिरादरी भी बन जाती है. आप उनसे, वे आपसे कुछ साझा करते हैं. साहित्य साथ का, साझेदारी, हिस्सेदारी का दूसरा भाव है.
- सतह से उठान : भटकना हमें यह भी जताता है कि सतह से ऊपर भी उठा जा सकता हैं. सतह हमारी अनिवार्य अनुल्लंघ्य सीमा नहीं है. हम यह समझ पाते हैं कि जो है इसके पीछे कुछ और भी है. वह कई बार अनहोना है, अनचिन्हार है. पर हम उसमें धँसकर उससे ऊपर उठ सकते हैं. सच और सचाई सीधी बातें नहीं हैं और न ही सीधे मिल जाती हैं. वे एक या एक सी भी नहीं है. वे अनेक हैं- बहुतेरी हैं, वे एकतान नहीं हैं, एकरस भी नहीं. वे हमेशा अदम्य रूप से बहुवचन हैं- साहित्य जब कभी एकवचन होने की कोशिश करता है, वह अपने जीवत्व और सत्व से, अपने होने की बुनियादी प्रतिज्ञा से, अपने ‘सहित’ भाव से विश्वासघात करता है.
- पीर पराई : साहित्य के वनांचल में भटकते हुए बस बात का, इस सचाई का, हर क़दम और मुक़ाम पर, गहरा-तीख़ा अहसास होता है कि संसार में, सृष्टि में, समूचे ब्रह्माण्ड में बहुत दुख है, पीड़ा है. साहित्य वह विधा है, जैसे कि नरसिंह मेहता का वैष्णव जन, जो ‘पीर पराई’ जानता है. अपनी पीर भर नहीं, ‘पीर पराई’. वह अपनी पीर और पराई पीर को, अपने को और परायों को, जोड़कर देख-समझ पाता है. यह विवेक भी भटकनेवाले में जाग सकता है कि ‘पीर पराई’ का इतना विस्तार, इतनी व्यापकता है कि उसे अपनी पीर को अतिरंजित नहीं करना या उससे आक्रान्त नहीं होना चाहिये.
- जीने की चाहत : भटकते हुए हमें यह समझ में आता है, दिखायी देता है कि जीने की चाहत सिर्फ मनुष्य की वृत्ति नहीं है. प्रकृति में पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, नदी-जंगल-पर्वत आदि सभी में जीने की चाहत होती है. जिजीविषा सार्वभौम है. जीवन को लेकर जो पवित्रता का भाव भारतीय परम्परा में है, वह इसी जीने की चाहत का अध्यात्म है. साहित्य आदर्शतः जीने की चाहत उद्दीप्त करता है.
- धीरज और प्रतीक्षा की लय : हमारा समय तेज़ गति, अधीरता और प्रतीक्षा न कर पाने का समय है. उसके बरक़्स साहित्य में भटकने का अर्थ होता है धीरज रखना, प्रतीक्षा करना. भटकने का सच्चा आनन्द तो भागने-दौड़ने, पगडण्डी छोड़कर मुख्य मार्ग पर आकर कहीं पहुँच जाने से नहीं मिलता. साहित्य की असली लय धीरज और प्रतीक्षा की लय होती है. जो जल्दी में होते हैं वे उपभोक्ता होते हैं, रसिक नहीं. उन्हें अख़बार मोहते हैं: वे साहित्य के पाठक नहीं हो पाते.
- लुका-छिपी का खेल : भटकने के दौरान हमारे साथ लगातार लुका-छिपी का खेल चलता रहता है. कुछ अकस्मात् लुक-छिप जाता है, हमें रहस्य के अँधेरे में मानो फेंक देता है. कई बार लगता है कि हम अकेले नहीं हैं, कोई और हमारे साथ है, हमक़दम है जो दीखता नहीं पर साथ चलता लगता है. हमारे समय में रहस्य और विस्मय ऐसे भाव हैं जो, एक तरह से, मानव-व्यापार से बाहर कर दिये गये लगते हैं. विज्ञान से ऐसा आतंक का स्थापित कर दिया है कि सब कुछ ज्ञेय है, देर-सबेर हर रहस्य भेदा जा सकता है. हमें अब हिंसा-हत्या-युद्ध के विश्वव्यापी होने पर कोई अचरज नहीं होता. साहित्य में भटकना हममें रहस्य और विस्मय का पुनर्वास करता है.
- विपुलता और कमकहनी : भटकने से कुछ और होता हो या न होता हो, जीवन-जगत की अपार विशाल जटिल विपुलता का सामना, अनुभव और बोध ज़रूर होते हैं. उनकी असीम सुषमा, उनके अद्भुत सौन्दर्य का. यह अदम्य विपुलता साहित्य के लिए बड़ी चुनौती होती है: हर युग में रही है. उनके रहते हम यह पहचान सकते हैं कि इस विपुलता को पूरी तरह से साहित्य में सहेज और विन्यस्त कर पाना सम्भव नहीं है, कभी सम्भव नहीं हुआ. साहित्य से जीवन-जगत् हमेशा बड़े हैं, थे और रहेंगे. वे हमेशा असाध्य और विशाल हैं, रहेंगे. इसलिए इस विशालता-विपुलता के सन्दर्भ में साहित्य हमेशा कम-कहनी है. इस कमकहनी में एक तरह की अनिवार्य विफलता और अपर्याप्तता की नैतिक आभा होती है.
- समय के पार आवाजाही : भटकते तो हम दिये हुए समय में ही हैं, पर साहित्य में अनेक समय एक साथ होते हैं. हम कभी तेरहवीं शताब्दी में, कभी पहली, कभी बीसवीं शताब्दी में पहुँच जाते और वहाँ रम सकते हैं. हम अपने भौतिक रूप से दिये और नियत समय के पार चले जाते हैं. यह बहुसमयता, चलते-चलते किसी और समय में दाखि़ल हो जाने का सुयोग, भटकने का विशेष उपहार होता है. आप इसकी शिनाख़्त कर पाते हैं कि मनुष्य ने साहित्य में अपनी मनुष्यता के कितने संघर्ष, मनुष्य बने रहने की कितनी कोशिशें की हैं और यह भी कि इतने सारे समय में साहित्य मनुष्य का सहचर, साक्षी और प्रमाण रहा है.
- बे-अदबी : ऐसा तो हो नहीं सकता कि आपको भटकने में कहीं-न-कहीं, कभी-न-कभी सत्ता का सामना न करना पड़े. उसकी कई अभिव्यक्तियों, छवियाँ और प्रसंगों का, बन्दिशों-प्रक्रियाओं-दबावों का अनुभव आपको होगा. साहित्य इस सन्दर्भ में हमेशा ही प्रतिसत्ता होता है. हम यह भी आसानी से जान-समझ सकते हैं कि साहित्य सत्ता के सन्दर्भ में हमेशा, गांधी जी का एक पद उधार लें, सविनय अवज्ञा होता है. अदब की बेअदबी. इस समय एक आज्ञाकारी प्रश्नहीन समाज बनाने का दुश्चक्र चल रहा है. ऐसे में साहित्य अवज्ञाकारी संरचना है.
- सच, झूठ, सचझूठ : तुलसीदास ने अपने एक पद में यह कहा है कि इस संसार के बारे में कुछ लोग कहते हैं कि वह सच है, कुछ कहते हैं कि वह झूठ है और कुछ के अनुसार वह सचझूठ है. उनके अनुसार ये तीनों ही भ्रम हैं और तीनों का परिग्रह कर ही आप अपने को पहचान सकते हैं. साहित्य में ये तीनों भ्रम सक्रिय और मौजूद रहते हैं और वह इस पर कोई फ़ैसला नहीं देता कि संसार अन्ततः क्या है. इसलिए भी कि साहित्य संसार के अनुराग से उपजता है और अकसर तरह-तरह से, उससे प्रसन्न और प्रभावित होकर, असन्तुष्ट और क्षुब्ध होकर, निराश और दुखी होकर, उसकी क्रूरता-उदासीनता-उपेक्षा का प्रश्नांकन कर, उसका गुणगान ही करता है.
- साधारणता का अनन्त : भटकते हुए, जहाँ से हमने शुरूआत की थी और जहाँ अनेक मुक़ामों पर ठहरते-रमते, अन्त में हम पहुँचेंगे, हमें लगेगा कि निपट साधारण, धूसर और बहुरंगी साधारणता हमें लगातार घेरे रही है. कहीं उसकी सुन्दरता, कहीं उसका विद्रूप, कभी उसकी मलिनता, कभी उसकी उज्ज्वलता, कहीं उसकी लघुता तो कहीं उसका विराट्– जीवन, सचाई और साहित्य कुल मिलाकर साधारणता का अनन्त हैं. हम साधारण से, साधारण में, साधारण तक ही भटकते हैं. भटकना अपने साधारण होने और बने रहने को पहचानना है.
- कारवानियाँ : भटकना भले अकेले होता है पर हम एक कारवाँ में भी, चाहे-अनचाहे, शामिल होते हैं. यह आलम हमें अकेला नहीं छोड़ता, हरदम साथ रहता है. मीर का एक शेर याद आता है:
आलम के साथ जायें चले किस तरह न हम
आलम तो कारवाँ है हम कारवानियाँ
मई 2025 में फ़ारबस गुजराती सभा मुम्बई के अन्तर्गत दिये गये बलवन्त पारेख व्याख्यान का लिखित रूप
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अशोक वाजपेयी ने छह दशकों से अधिक कविता, आलोचना, संस्कृतिकर्म, कलाप्रेम और संस्था निर्माण में बिताये हैं. उनकी लगभग 50 पुस्तकें हैं जिनमें 17 कविता-संग्रह, 8 आलोचना पुस्तकें एवं संस्मरण, आत्मवृत्त और ‘कभी कभार’ स्तम्भ से निर्मित अनेक पुस्तकें हैं. उन्होंने विश्व कविता और भारतीय कविता के हिन्दी अनुवाद के और अज्ञेय, शमशेर, मुक्तिबोध, भारत भूषण अग्रवाल की प्रतिनिधि कविताओं के संचयन सम्पादित किये हैं और 5 मूर्धन्य पोलिश कवियों के हिन्दी अनुवाद पुस्तकाकार प्रकाशित किये हैं। अशोक वाजपेयी को कविताओं के पुस्तकाकार अनुवाद अनेक भाषाओं में प्रकाशित हैं. अनेक सम्मानों से विभूषित अशोक वाजपेयी ने भारत भवन भोपाल, महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, रज़ा फ़ाउण्डेशन आदि अनेक संस्थाओं की स्थापना और उनका संचालन किया है. उन्होंने साहित्य के अलावा हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, आधुनिक चित्रकला आदि पर हिन्दी और अंग्रेजी में लिखा है. फ्रेंच और पोलिश सरकारों ने उन्हें अपने उच्च नागरिक सम्मानों से अलंकृत किया है. दिल्ली में रहते हैं. |




आज अशोक वाजपेई का अद्भुत आलेख पढ़ा
साहित्य परिसर की यह भटकन आंख खोल देने वाली है
जितनी बार पढूं, मन की मुंडी आँखें खुलती जाती हैं
आभार आप दोनों का !
अशोक जी का गद्य एक विचारक का गद्य है, जो राहों को अन्वेषित करना चाहते हैं, उनके लिए यह विचार काम का है. भटकना भले अकेले होता है पर हम एक कारवाँ मेंं भी, चाहे-अनचाहे, शामिल होते हैं. आज हम जिस तरह चाहे-अनचाहे एक दिशा में हाँके जा रहे हैं, वहाँ तो हम आप एकदम से अकेले खड़े कर दिए गए हैं…. इस विचार से सोचने को कई बिंदु उभरते हैं और वह बिंदु सही दिशा में जाने का एक विकल्प देता है.
अशोक जी राहों के अन्वेषी हैं और उन्होंने अपनी पगडंडियों का स्वयं निर्माण किया है। वे एक व्यक्ति नहीं, जीवंत संस्था हैं। उनके पास गद्य और पद्य की सम्मोहक भाषा का वैभव है, जो उनकी नई संवेदना को सूचित करता है। मैंने उनके काव्य – संचयन ‘विवक्षा’ की समीक्षा लिखी थी — “स्मृतियों का कोलाज”। अभी उन्होंने मंडला में रजा फाउंडेशन के कार्यक्रम में कविता के अरण्य में भटकने के लिए मुझे भी बुलाया था। उनकी मौलिक निष्पत्तियां ध्यानाकर्षक हैं। आज वे हिन्दी के सम्मानित संरक्षक हैं।
अत्यन्त समृध्द करने वाली तहरीर। अपने लिए एक सीख मैंने चुनी है, जिसपर लगातार काम करने की मुझे ज़रूरत है। हालाँकि उसे सीख नहीं कहना चाहिए…वह भटक कर किसी पगडण्डी पर गिरी एक गहरी पारम्परिक सोच है, जिसे
आत्मसात करना एक कठिन आध्यात्मिक उद्यम होगा।
एक संशय भी है लेकिन। चुपचाप गुनने को उसे।
“भटकने में जब-तब अनहोनी घटती रहती है. चूंकि आप पहले से निर्धारित मार्ग पर नहीं चल रहे होते हैं, भटकने में अप्रत्याशित घटता रहता है”, ऐसे ही, आज सुबह भटकते हुए इस आलेख तक पहुँच गया, सुबह सार्थक हो गयी! धन्यवाद
शायद अरस्तू ने कहा था कि अफ़लातून के साथ चलकर किसी निश्चित जगह पहुँचने के बजाय मैं सुकरात के साथ भटकना पसंद करूँगा ।
अशोक जी के साथ भटकना भी वैसा ही आनंद है।और यह लेख भटकने का “गाइड बुक” ! साहित्य में दो बिंदुओं की सबसे छोटी दूरी कभी भी सरल रेखा नहीं होती।कमसामानी कितना अच्छा ढला शब्द है!
श्री अशोक वाजपेयी ने इस वय तक बहुत कुछ पढ़ा, सीखा, लिखा और सुना । समझने का गुण १५ वर्ष की आयु में विन्यस्त हो रहा था । शास्त्रीय गायन सुनने सुदूर निकल पड़ते ।
इस आलेख में कई शीर्षक बनाकर अपने ही नहीं पाठकों के लिए सीखना लिखा । ऐसा कुछ लिखा ‘जो अख़बार पढ़ते हैं वे साहित्य नहीं पढ़ सकते । एक जगह हवन के बाद ॰॰॰ प्रस्थान जैसा कुछ लिखा । ग़ज़ब की प्रस्तुति ।
अशोक वाजपेयी जी के इस अद्भुत लेख को पढ़ते हुए मुझे अहमद मुश्ताक का एक शेर याद आ रहा था: है यूं ही घूमते रहने का मज़ा ही कुछ और / ऐसी लज्जत न पहुँचने में न रह जाने में। जैसे यह शेर याद रह गया वैसे ही यह लेख समय समय से, कभी पूरा, कभी अपने किसी टुकड़े के साथ याद आता रहेगा। आखिर को हमें भटकना ही तो पसंद है।
परत दर परत मनोवैज्ञानिक पड़ताल करता लेख …..
समालोचन पर श्री अशोक वाजपेयी का आत्मचिंतन ‘ साहित्य में भटकते हुए ‘ साहित्य, कला और समग्रतः जीवन में भटकने और उस भटकाव के सुफल का चिन्तन है। सिर पर बोझ हो और नाना झमेलों से वास्ता बना रहे, तो यह भटकाव निरर्थक ही होगा। अशोक जी अपनी अविराम यात्रा के विभिन्न फलितार्थों के साथ जहां हमें ला छोड़ते हैं, वहीं से हमारे असल भटकाव की शुरुआत होती है। शर्त यह है कि क्या हम इसके लिए तैयार हैं? तुलसी,कबीर,काफ़्का आदि के उद्धरणों और अपने देखे, पाये सच को एक सूत्र देते हुए वे जीवन को जिन जिन समयों में ले जाते हैं और उसे वर्तमान की प्रश्नहीनता से जोड़ते हैं, वस्तुतः इसे भी समझने की जरूरत है और अपने को उपभोक्ता से नागरिक बनाने की जिम्मेवारी भी।
इस चिंतन को प्रस्तुत करने के लिए समालोचन को बधाई।
अशोक वाजपेई का यह आलेख पढ़ना एक नये और अद्भुत अनुभव से गुजरने की तरह है। यह पूरा आलेख एक लम्बी कविता है – एक अनुभवसिक्त गद्य में लिखी हुई ‘अनभैय सांचा ‘ का बयान करती हुई लम्बी कविता। “साहित्य भटकने का अनुभव है।” और ” साहित्य अप्रत्याशित की रमणीयता का अनुभव कराता है।” – इस आलेख में कुछ ऐसे गद्य के टुकड़े हैं जो साहित्य और जीवन के रागपूर्ण संबंधों की नयी व्याख्या करते हैं।
सुकरात, प्लेटो और अरस्तू ये तीन नाम मिलकर प्राचीन यूनानी दर्शन के इतिहास की एक सबसे शानदार गुरु शिष्य तिकड़ी बनाते हैं। अरुण कमल जी ने जो कथन उद्धृत किया है उसी से मुझे याद आया कि स्टीव जॉब्स ने भी सुकरात पर एक बहुत अच्छी बात कही है – I would trade all of my technology for an afternoon with Socrates. इसी तरह सुकरात के प्रश्नांकित करने वाले मन, उसकी अतृप्त खोज और उसकी अदिश भटकन को एक बार जॉन स्टुअर्ट मिल ने भी कुछ यूँ समझा और बयां किया था – It’s better to be a Socrates dissatisfied than a pig satisfied.
अनदेखी अनजान लीकों पर चलते हुए, नई बनाते हुए, भटकते हुए, जहाँ धीरज और प्रतीक्षा की लय है, पीर पराई है और अंत में कहीं न पहुँचना – यह जीवन और सृष्टि में हर बार हमेशा घटित होगा, वही आविष्कार है, वहीं सुकरात है।
वह अफलातून नहीं होगा जिसे एक पूर्व निश्चित रिपब्लिक लिखना है, एक सिटी स्टेट का यूटोपिया गढ़ना है।
ऐसी अनगिन चीजों को अनावृत करता, उन्हें देखने की नई ज्योत्सनाएँ उत्सर्जित करता, उनके परिमंडल को अनजानी उत्सुकताओं से भरता है , अशोक बाजपेई जी का यह रम्य गद्य।
जो जल्दी में होते हैं वे उपभोक्ता होते हैं, रसिक नहीं. उन्हें अख़बार मोहते हैं: वे साहित्य के पाठक नहीं हो पाते.
साहित्य सत्ता के सन्दर्भ में हमेशा, गांधी जी का एक पद उधार लें, सविनय अवज्ञा होता है. अदब की बेअदबी. इस समय एक आज्ञाकारी प्रश्नहीन समाज बनाने का दुश्चक्र चल रहा है. ऐसे में साहित्य अवज्ञाकारी संरचना है.
शानदार मनोभाव। शुक्रिया अशोक जी।
बहुत सुंदर व पठनीय गद्य है। साहित्य और कलाओं का विराट उद्देश्य जीवन के इसी भटकाव और अन्वेषण में निहित है। आलेख में भारतीय दर्शन के दृष्टांत इसकी प्रतिपुष्टि करते हैं, उनके कारण यह अधिक ग्राह्य हो जाता है। इस संदर्भ में मुझे वॉल्टर बेंजामिन की ‘flaneur’ की अवधारणा और कैथलीन रूनी की ‘शहरी घुमक्कड़ी ‘ की व्याख्याएँ स्मरण हो आती हैं।
अशोक जी का भटकना एक दिशासूचक की तरह है, बहुतों को राह दिखानेवाला।
साहित्य में रहते हुए, रमे हुए अशोक जी अपने ही शब्द माध्यम से कितना कुछ छू पाते हैं ।यह उनकी बहुल संवेदनशीलता, रुचियों और सरोकारों का साक्ष्य है ।
कुछ है -जो बहुत कुछ से बहुत मायनों में विशेष, महत्त्वपूर्ण और कभी कभी तो उन्हीं का खोजा हुआ होता है ।उस कुछ में कला, संगीत,युवा सृजनघर्मियों से उनकी मित्रता , व उनकी कला वउनके साहित्यिक गुणों की सराहना विख्यात है ।
एक जीवन में अनेकों जीवन जीते अशोक जी जीवन को सादगी के साथ कैसे महत्त्वपूर्ण बनाया जा सकता है के साक्ष्य हैं ।एक जीवन में कितना कुछ संभव है , जीवन कितना सक्रिय हो सकता है यह अशोक जी किंजीवन गति व चलन से हम देखते हैं ।
उनका यह लेख कितने कम शब्दों में सच, भ्रम व सत्य को स्पर्श करता है ।