बामियान में तालिबान
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बामियान की बुद्ध मूर्तियों को तोड़ने का इल्ज़ाम जिस पर है, उसकी असलियत
बामियान के सैयद मिर्ज़ा हुसैन एक मामूली सीधे सरल गरीब अफ़गान नागरिक हैं जो साइकिल मरम्मत करने का काम करते हैं. लेकिन इतिहास उन्हें बामियान की विलक्षण बुद्ध मूर्तियों को नष्ट करने वाले के रूप में प्रस्तुत करता है.
2001 में बामियान की नायाब विशालकाय बुद्ध प्रतिमाओं (35 और 55 मी ऊंची) को ध्वस्त करने के बारे में दुनिया भर का मीडिया उनसे बात करता रहा है. हाल में अफ़गानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद सैयद मिर्ज़ा हुसैन के साथ प्रकाशित हुई बातचीत के कुछ उद्धरण:
“अब यहां बाज़ार लगा करता है और हम अक्सर सामान खरीदने यहां आते हैं. यह पुराने सिल्क रूट पर स्थित है और एक समय यहां तालिबानी लड़ाकुओं का अड्डा हुआ करता था.”
“जब भी मैं उस घटना के बारे में सोचता हूं तो बहुत उदास होता हूं और मन पर गहरी निराशा हावी हो जाती है. इधर से जब-जब भी गुजरता हूं मैं बहुत असहज हो जाता हूं.”
सैयद मिर्ज़ा हुसैन के इन उद्वेगों के अपने कारण हैं- उन्हें इतिहास हमेशा एक ऐसे इंसान के रूप में याद करेगा जिसने बुद्ध की दो विशाल प्रतिमाओं को नष्ट करने में अग्रणी भूमिका निभाई. अब वे मूर्तियां तो अस्तित्व में नहीं हैं पर इस बर्बर कृत्य के गवाह हैं दूर से ही दिख जाने वाली तोप के गोलों से बनी और बारूद भरने के लिए बनाए गए बड़े-बड़े सुराख. ये सुराख सिर्फ पहाड़ में ही नहीं है बल्कि हुसैन की आत्मा में भी हैं (ऐसा वे बार-बार दुहराते हैं).
तब हुसैन एक 25-26 साल के नौजवान थे और उन्हें अन्य हजारा नागरिकों के साथ तालिबान लड़ाकों ने पकड़ लिया और एक बेहद घिनौना और भयंकर काम सौंपा. वे उन्हें बंदूक की नोंक पर पकड़ कर बुद्ध की प्रतिमा के पास ले गए और यह हुक्म दिया कि बारूद लगा कर इन दोनों प्रतिमाओं को उड़ा देना है. जाहिर है ऐसा फरमान न मानने का नतीज़ा एक और सिर्फ एक ही था- अपनी जान गंवाना.
“अब तो बामियान में बहुत व्यस्त बाजार है लेकिन तालिबान के पहले वाले शासन में यह एक तरह का भुतहा और वीरान सा शहर था.”, वे कहते हैं.
हुसैन के साथ हजारा समुदाय के नौजवान वहां बड़ी संख्या में कैद किए गए थे. उन दिनों को याद करते हुए वे बताते हैं कि जब मुझे उन्होंने पकड़ा इस बुरी तरह से पिटाई की कि मुझे लगा अब मैं जिंदा नहीं बचूंगा. 24 घंटे बाद जब मुझे होश आया तो मालूम हुआ कि जिंदा बच गया हूं.
तालिबानियों को लगता था की बुद्ध की प्रतिमाएं मूर्ति पूजकों की संस्कृति का प्रतीक हैं और वे पूरी दुनिया को बताना दिखाना चाहते थे कि उनके कट्टर इस्लामी राज में मूर्ति पूजा करना सबसे भयानक गुनाह है. तालिबान लड़ाकों ने हुसैन और उसके एक साथी को पहाड़ की चोटी पर ले जाकर प्रतिमा के नीचे लटकाया और कहा कि जगह-जगह इस प्रतिमा में छेद करो जिसमें डायनामाइट डाल कर विस्फोट किया जा सके. हुसैन याद करते हैं कि उनके साथ ऊपर से लटकाया गया दूसरा नौजवान इस हादसे से इतना डर गया कि लटके-लटके ही उसके दिल की धड़कन रुक गई. हुसैन ने उसके ऊपर अपना कंबल डाल कर जैसे तैसे उसकी कब्र बनाई और दफन किया.
हुसैन को अफ़सोस है कि आज यह शर्मनाक घटना बार-बार याद करने के लिए और लोगों को बताने के लिए वे जिंदा क्यों बचे हुए हैं.

“हमें बहुत अपराध बोध महसूस होता है और बहुत ग्लानि होती है कि दुनिया की एकदम नायाब प्रतिमाएं जो हमारी शान हुआ करती थीं, उन्हें हमने खुद अपने हाथों से नष्ट कर दिया. इन प्रतिमाओं को देखने के लिए पूरी दुनिया से लोग आते थे लेकिन जिन पर हमें नाज़ था वह हमारे हाथों ही नेस्तनाबूद कर दी गईं.”
“जब भी मैं इस घटना को याद करता हूं तो शर्म से गड़ जाता हूं और लगता है कि मैं जिंदा क्यों बच गया. मुझे भी उन्होंने उस समय ही उन्होंने क्यों नहीं मौत के घाट उतार दिया. उसके बाद से कोई पल ऐसा नहीं बीतता जब मेरे मन में अपने किए बिना का दंश नहीं चुभता… पर मैं उस हालात में कर भी क्या सकता था? यदि मैं उनकी कही बात नहीं मानता तो मेरा सर कलम करने में वे पल भर भी न लगाते.”
(अनेक प्रमुख समाचार स्रोतों में प्रकाशित सामग्री से उद्धृत)
2015 में बीबीसी ने बामियान जाकर मिर्ज़ा से बात की और विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी. उसने बताया कि तब बामियान में कोई स्थानीय आबादी नहीं थी, वहां सिर्फ और सिर्फ तालिबानी थे. उन्होंने भारी हथियारों और टैंक के साथ बुद्ध प्रतिमाओं पर हमला किया पर वे उसे तोड़ नहीं पाए. उसके बाद उन्होंने फैसला किया कि डायनामाइट से इन प्रतिमाओं को उड़ा दिया जाए और इस काम के लिए कैद कर रखे गए 25 स्थानीय युवाओं को लगाया गया. हुसैन उन 25 लोगों में शामिल थे. उन का कहना है कि हमें यह काम इसलिए सौंपा गया क्योंकि वहां और कोई आबादी थी ही नहीं. और हम इस हमले में यदि मारे भी जाते तो हम यानी तालिबानियों के दुश्मन ही मारे जाते, उससे उन को क्या फ़र्क पड़ता था.
यहां यह जानना जरूरी है कि बामियान इलाके में पारंपरिक रूप से शिया मुस्लिम रहते थे जबकि तालिबान सुन्नी मुस्लिमों का साम्राज्य चाहता है. यही कारण है कि 1999 के मध्य में जब तालिबान ने बामियान इलाके पर कब्जा किया तो वहां के स्थानीय निवासी या तो सुरक्षित स्थानों पर भाग गए या तालिबानी दरिंदगी का शिकार हुए.
“तालिबानी अपने साथ कई ट्रकों में गोला बारूद भरकर ले आए. बुद्ध मूर्तियों के पास पहुंचकर उन्हें पकड़े गए स्थानीय लोगों की पीठ पर लादा गया और मूर्तियों तक पहुंचाया गया. यदि पकड़े गए स्थानीय लोगों में से कोई बीमार या घायल होता या गोला बारूद ले जाने में सक्षम नहीं होता तो उसे वहीं गोली मार दी गई और लाशों को सड़क किनारे फेंक दिया गया. बुद्ध की मूर्तियों तक विस्फोटकों को पहुंचाने में वे तीन दिनों तक लगे रहे. फिर नजदीक की मस्जिद से अल्ला हू अकबर के उद्घोष के साथ डायनामाइट को चार्ज किया गया पर काम बना नहीं, चिंगारी, धुआं और बारूद की गंध जरूर पूरे इलाके में छा गई.”
इस अभियान का नेतृत्व कर रहे तालिबानी कमांडरों को लगता था कि वह न सिर्फ़ मूर्तियों को बल्कि पूरी पहाड़ी को विस्फोटकों से नेस्तनाबूद कर देंगे. पर हर संभव मेहनत करने के बाद भी वे सिर्फ मूर्तियों के पांव नष्ट कर पाए. इसके बाद वे शहर जाकर साबुन और आटे की लोई की तरह के नए विस्फोटक लेकर आए और दिन में कई बार विस्फोट करते रहे. उन्होंने पकड़े गए स्थानीय लोगों को मूर्ति में जगह-जगह छेद करके डायनामाइट भरने के काम पर लगाया और बदले में उन्हें खाने के लिए थोड़े से चावल और इक्का-दुक्का रोटी दे दी जाती. बर्फीली सर्दी में भी उन्हें ओढ़ने के लिए पतला सा कंबल दिया गया था. मिर्ज़ा हुसैन अपनी बातचीत में यह बताते हैं कि जब तालिबानी कमांडरों से यह काम नहीं हो पाया तो दूसरी भाषा बोलने वाले कुछ विदेशी इंजीनियरों को वहां पकड़ कर लाया गया और उनके निर्देश पर मूर्तियां तोड़ी जा सकीं. उन्हें यह नहीं मालूम कि वे बाहरी लोग कौन थे लेकिन उनके पहनावे और बोलचाल से पक्का मालूम होता था कि वे दूसरे देश से आए थे.
“मूर्तियों को तोड़ने में सफलता हासिल करने पर तालिबानियों ने खूब जश्न मनाया, हवाई फायर किए, नारे लगाए और डांस किया और नौ गायों को हलाल किया.”

बामियान की बुद्ध मूर्तियों के लिए जी जान लगाने वाले कैसा महसूस करते हैं
जेमार्यालाई तार्जी अफगानिस्तान के पुरातत्व के सबसे बड़े विशेषज्ञों में शुमार किए जाते हैं. वे अफगानिस्तान के आर्कियोलॉजी एंड प्रिजर्वेशन आफ हिस्टॉरिकल मॉन्यूमेंट्स के निदेशक और आर्कियोलॉजी इंस्टीट्यूट के महानिदेशक के पद पर भी रहे हैं. बामियान की मूर्ति कला पर उनके काम को पूरी दुनिया में सराहा गया. लेकिन अपने देश में गृह युद्ध और हिंसा के माहौल को देखते हुए वे अफगानिस्तान छोड़कर फ्रांस चले गए. बाद में अफगानिस्तान लौटकर वे बामियान में ध्वस्त बुद्ध प्रतिमाओं को फिर से पुनर्जीवित करने और अब तक गुमनामी में रही तीसरी बुद्ध प्रतिमा को खोज निकालने के प्रयास में लगे रहे.
बामियान के पुनरुद्धार को लेकर उनका एक लेख “अफ़गान मैगज़ीन” के अगस्त 2004 के अंक में छपा था जिसे फ्रेंच से अंग्रेजी में नादिया तार्जी ने अनुवाद किया था. उस लेख के संपादित अंश यहां प्रस्तुत हैं:
“1967 में जब मेरे फ्रेंच प्रोफेसर ने बामियान के बौद्ध पुरावशेषों पर काम करते हुए डॉक्टरेट करने के लिए कहा तब से इस शांत घाटी में मेरी रुचि बढ़ गई. सच्चाई यह है कि तब तक मैं कभी बामियान की तरफ गया भी नहीं था और वहां की सुंदर प्रतिमाओं के बारे में जो कुछ भी जानता था वह तस्वीरों के माध्यम से ही जानता था.
वहां पहुंचने के पहले मैं इस भुलावे में था कि मैं तो बामियान के बारे में सब कुछ जानता हूं. लेकिन जब पहली बार मैं उन पहाड़ियों की क्लिफ (दीवार की तरह खड़ी सीधी चट्टान) के सामने जाकर खड़ा हुआ तो अवाक रह गया. यह पुराने सिल्क रूट का मैनहटन था और मैं वहां उसके सामने ठगा सा खड़ा था.
वहां पहुंचकर आमने-सामने से देखने पर यह एहसास हुआ कि तस्वीरों को देखकर इन अद्वितीय और शानदार कलाकृतियों के विस्तार, भव्यता और इन्हें बनाने वाले कलाकारों की दृष्टि का अनुमान लगा पाना संभव नहीं. मैं पूरी तरह से उनकी सुंदरता की गिरफ्त में आ गया, वहां पहुंचकर कोई भी सम्मोहित हुए बिना भला कैसे रह सकता था. 1967 की गर्मियों के इन हफ़्तों की निस्तब्धता मेरे मन में आज भी ज्यों की त्यों बसी हुई है. दुनिया और अपने समय के श्रेष्ठ कलाकारों ने जिस समर्पण भाव से इन प्रतिमाओं का निर्माण किया उनके सामने खड़े होकर आप सिर्फ सम्मान में सिर झुका सकते हैं उन्हें शुक्रिया कह सकते हैं.
बामियान जाकर मैंने अपने अंदर प्रेरणा का संचार महसूस किया और एक आर्कियोलॉजिस्ट की पूरी प्रोफेशनल यात्रा में वह मेरे साथ निरंतर बनी रही. उस दिन मेरे मन में यह विचार आया कि इस नीरव और पवित्र जगह को सुरक्षित रखना उसका नाम रोशन करना मेरा दायित्व है- और यही वह स्थान है जहां एक दिन मैं राख बन कर धरती में मिल जाऊंगा.
1973 में जब मैं आर्कियोलॉजी एंड कंजर्वेशन ऑफ हिस्टोरिकल मॉन्यूमेंट्स का महानिदेशक बना तब मेरी ये भावनाएं और मुखर होने लगीं. इन पहाड़ियों की चोटी और खड़ी दीवारों के ऊपर से बामियान ने शहर, किले, स्मारक और अद्वितीय बुद्ध की विशालकाय प्रतिमाएं तो देखी ही हैं, भारत और चीन को जोड़ने वाले सिल्क रूट से गुजरने वाले तीर्थ-यात्रियों, विद्वानों, सैनिकों, गुलामों और यहां तक कि राह में पड़ने वाली हर चीज को तहस-नहस करते हुए बर्बर लुटेरों तक को देखा है- संतोष की बात यह रही कि अधिकांश मौकों पर इन पुरातात्विक नगीनों को किसी ने नुकसान नहीं पहुंचाया.
इसके बाद अज्ञानता का दौर आया और अतिवादियों ने इन प्रतिमाओं पर हमले कर दिए. मुगल सल्तनत के बादशाह औरंगजेब (1658-1707) अपनी तोपों के गोलों के लिए टारगेट के तौर पर बामियान की बुद्ध प्रतिमाओं का इस्तेमाल करता था लेकिन इस कट्टर मूर्ति भंजक के हमलों को झेलते हुए बामियान के बुद्ध घायल भले हुए हों लेकिन इतिहास के चेहरे पर डटकर गर्व से खड़े रहे. जो कोई भी पास जा कर उन्हें देखता था उसे यही महसूस होता था ये अजर अमर हैं और किसी इंसान के बस की बात नहीं कि इन्हें मिटा सके. जब जब भी मजहबी कट्टर राजनीति में हस्तक्षेप करते हैं नतीजा बहुत हताश करने वाला ही होता है- ऐसा ही बामियान की विशालकाय बुद्ध प्रतिमाओं पर कब्ज़ा जमाने के बाद देखने में आया. उनको पहुंचाया गया नुकसान सिर्फ बामियान या अफगानिस्तान की शर्म नहीं है बल्कि संपूर्ण मानवता की शर्मिंदगी का सबब है. इन प्रतिमाओं के विध्वंस के बाद खाली पड़े ताखेनुमा स्थान इतिहास की किताब के अनश्वर पृष्ठ हैं जिन्हें आने वाली पीढ़ियां अपनी धरोहर मानती रहेंगी.
23 सालों के बाद जब 2002 में मैं अफगानिस्तान फिर से लौटा तो वहां के हालात देखकर मुझे रोना आ गया, यह मेरे जीवन का सबसे विचलित करने वाला समय था. बामियान पहुंच कर जब दूर से देखा तो ऊपर से ढंके होने के कारण पहली नजर में मुझे बिल्कुल समझ नहीं आया कि इन दोनों गहरे ताखेनुमा स्थानों से वृहदाकार बुद्ध प्रतिमाएं अनुपस्थित हैं. पर आभास तो हो ही गया… मेरी हिम्मत नजदीक से जाकर इस अनर्थकारी ध्वंस को देखने की नहीं पड़ी. अगले दिन सुबह मैंने जहां रात में रुका था वहां की छत से कैमरे को जूम करके इस अकल्पनीय सर्वनाश को देखा.
मेरे सामने एक खामोश महाआपदा खड़ी थी… उसी तरह जैसे पूरी बामियान घाटी खामोश थी.
यह सब देख कर मैं अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया और देर तक बामियान के न रहने पर मातम मनाता हुआ रोता रहा. सुबह के बाद से मुझ में न तो किसी बात का उल्लास रहा न दर्द- बस पूरे मन पर खालीपन की एक चादर फैल गई. अब जब भी तालिबान के किए कृत्यों के बारे में सोचता हूं तो मेरे पास सिर्फ यही जवाब होता है कि उनके कामों पर हम नहीं बल्कि इतिहास अपना फैसला सुनाएगा. जहां तक मेरी अपनी बात है मेरे दिल दिमाग पर लगे जख्म हमेशा-हमेशा के लिए नासूर बन कर रिसते रहेंगे.
मैं 1000 फीट लंबे लेटे बुद्ध की जिस प्रतिमा की खोज में हूं यदि उसे ढूंढ निकालने में कामयाब भी हो गया तो क्या मुझमें खोई हुई उम्मीद वापस लौट आयेगी…या मेरे खंडित स्वाभिमान की भरपाई हो जायेगी? नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं होने वाला. यदि कामयाबी मिली भी तो होगा सिर्फ यह कि बामियान वासियों और मेरे दिल की व्यथा पर मरहम की एक लेप चढ़ जायेगी- मैं भी तो 1967 से खुद को बामियान का गर्वीला वासी मानता हूं.”
बामियान की बुद्ध मूर्तियों के ध्वंस से क्षुब्ध एक फिल्मकार की सृजनात्मक प्रतिक्रिया
बुद्ध शर्म से ढेर हो गए (Buddha Collapsed out of Shame) प्रतिष्ठित ईरानी फिल्मकार मोहसिन मखमलबाफ की अठारह साल की (2007 में, जब फ़िल्म बनाई थी) की बेटी हाना मखमलबाफ की पहली फीचर फ़िल्म है जिसे बामियान के वास्तविक लोकेशन पर शूट किया गया है. इस बहुप्रशंसित फ़िल्म में तालिबानी शासन में धार्मिक कट्टरता के चलते अफ़गान लड़कियों को शिक्षा से बलपूर्वक दूर रखने की नीति को बामियान की बुद्ध मूर्तियों को नष्ट करने की पृष्ठभूमि में एक रूपक की तरह दिखाया गया है.
यह बख्ते नाम की एक छोटी लड़की के जीवन की एक दिन की कथा कहती है. अपने पड़ोसी बच्चे अब्बास को स्कूल जाते देख बख्ते भी उसकी तरह स्कूल जाकर नई-नई मजेदार बातें सीखना चाहती है पर साधनहीनता और गरीबी के चलते मुश्किल आती है. जैसे तैसे वह इस संकट से पार पा लेती है पर असल अड़चन तालिबानी लड़ाकों की नकल करते बच्चे हैं जो बख्ते के स्कूल जाने के सपने को चकनाचूर कर डालते हैं. वे उसे स्कूल के रास्ते में बुद्ध की मूर्ति के सामने घेर कर मार डालते हैं.
इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट का एक अंश
ऊपर आसमान में एक हेलीकॉप्टर उड़ रहा है. कुछ बच्चे बुद्ध की पैरों के पास लेट कर डंडों से बनाई हुई अपनी बंदूक से बुद्ध के पैरों पर गोलियां चलाने का अभिनय करते हैं. तभी मूर्ति के सामने से बख्ते नदी की तरफ जाती हुई दिखाई देती है जहां लड़कियों का स्कूल है. घात लगाकर लड़के उस पर हमला करने की फिराक में हैं. जब वह सामने आती है तो एक लड़का दौड़ कर उसके पास जाता है और सामने खड़ा होकर उसका रास्ता रोक लेता है.
तालिब लड़का – हम तुम्हें आगे नहीं जाने देंगे, तुम काफ़िर हो. आगे एक कदम भी न बढ़ाना, काफ़िर…
वह आवाज लगा कर दूसरे लड़कों को भी बुला देता है. लड़के वहां पहुंच कर अपने-अपने हाथ में लिए डंडे अड़ा कर बख्ते का रास्ता रोक लेते हैं और बंदूक की तरह डंडे उसकी तरह तान लेते हैं.
तालिब लड़का- हम तालिबान हैं. तुम जा कहां रही हो?
बख्ते- स्कूल.
तालिब लड़का- स्कूल में जाकर क्या करती हो?अपनी बांहें ऊपर उठाओ. बुद्ध की तरफ़ मुंह करो.
बख्ते के हाथ में कॉपी थी, वह उसे थामे थामे ही अपनी बांहें ऊपर कर लेती है. लड़के अपनी बंदूकें बख्ते के माथे से लगा देते हैं. बख्ते बुद्ध की मूर्ति की ओर मुंह कर लेती है,पीठ लड़कों की तरफ़ रहती है.
तालिब लड़का- तुमने मुट्ठी में क्या पकड़ा हुआ है?
बख्ते- मैंने स्कूल जाने के लिए एक कॉपी खरीदी है. वहां जाकर मुझे पढ़ना है,लतीफे सीखने हैं.
तालिब लड़का- लड़कियों के लिए स्कूल नहीं बन हैं. उनका स्कूल जाना गुनाह है. अपनी कॉपी मुझे दे दो.
गुस्से में वह बख्ते से उसकी कॉपी छीन लेता है. वह डर कर अपनी बांहें ऊपर किए खड़ी रहती है. तालिब लड़का कॉपी वहां खड़े अन्य लड़कों को थमा देता है. कॉपी से पन्ने फाड़ कर वे कागज़ के जहाज बना कर उड़ाने लगते हैं. बख्ते मुश्किल से खरीदी कॉपी के फटे पन्नों का यह हस्र देख कर विचलित हो जाती है पर असहाय होकर खड़ी रहती है. वह सिर्फ़ यह कर सकती थी कि उड़ते पन्नों की ओर देखने से परहेज कर ले,उसने किया वही. लड़के पन्ने फाड़ फाड़ कर बुद्ध की मूर्ति पर कागज़ से बनी मिसाइल चलाते रहे.
बख्ते की ललाट पर तालिब लड़का अपनी बंदूक रख देता है. वह बुरी तरह से घबरा जाती है.
तालिब लड़का- देखें तुम्हारी मुट्ठी में क्या है?
बख्ते- लिपस्टिक है. मेरे पास कलम खरीदने के पैसे नहीं थे इसलिए मैं घर से लिपस्टिक उठा लाई.
तालिब लड़का- तुम पापी हो. लिपस्टिक काफ़िर औरतें लगाती हैं. हम तुम्हें पत्थर मार-मार कर कत्ल कर देंगे.
इसके बाद वह बख्ते के सिर पर बंदूक लगाए लगाए धकेलते हुए उसे बुद्ध की मूर्ति के बगल में ले जाता है. बाकी सभी लड़के अपनी बंदूक बख्ते की ओर ताने रहते हैं. ऊंचाई पर बैठे एक लड़के ने कागज़ की बनी मिसाइल बख्ते की ओर फेंकी. तालिब लड़का बख्ते को बड़ी अभद्रता के साथ कभी इधर तो कभी उधर खींचता है.
तालिब लड़का- देखो,यह बुद्ध है. हमने कागज़ की मिसाइलों से इसको तहस नहस कर डाला. इधर देखो,यह बुद्ध का सिर है. यह उसकी आंखें हैं. तुम्हारा वजूद क्या है,तुम तो उसके एक नाखून से भी छोटी हो.
यह कहते हुए वह बख्ते को अपनी ओर घसीटता है. तालिब लड़का और दूसरे लड़के सब अपनी बंदूकें बख्ते की ओर ताने रहते हैं.
तालिब लड़का- लड़कों,जा कर बुद्ध के अंगूठे का नाखून ढूंढ कर ले आओ.
लड़के सभी दिशाओं में जाकर मूर्ति के टूटने से निकले टुकड़ों को इकट्ठा करते हैं.
तालिब लड़का- अल्लाह से दुआ करो कि तुम्हें माफ़ कर दे …और आइंदे से उसका हुक्म मानो.
कब्र खोदते लड़कों को व्यस्त देख बख्ते फिर से घेरा लांघ जाती है .इससे वे लडके इतना क्रोधित हो जाते हैं कि हाथ में पत्थर लेकर बख्ते पर टूट पड़ते हैं.
तालिब लड़का – इस लड़की को पकड़ कर कब्र के गड्ढे में डाल दो.
गड्ढा खोदती लड़के वैसा ही करते हैं. वहां इकट्ठा दूसरे लड़कों के हाथ में पत्थर थे,वे बख्ते पर उन्हें बरसाने को तैयार थे.
बख्ते- खुदा के वास्ते मुझे छोड़ दो… मैं स्कूल जा रही थी. मुझे पत्थर मारने वाला खेल बिल्कुल पसंद नहीं है. मेरे कपड़े गंदे हो जायेंगे.
बोलते बोलते सहमी हुई बख्ते की आंखों से आंसू बह कर नीचे गिरने लगे. तालिब लड़का कागज़ का एक थैला बख्ते के सिर पर रख देता है. कागज़ में बने छेदों से बख्ते देखती है कि कुछ लड़के उसके ऊपर बंदूक तान रहे हैं और कुछ अपने हाथ में पकड़े पत्थरों को उसपर फेंकने को तैयार हो रहे हैं.
तालिब लड़का- गुनहगार को पानी दो.
बख्ते अपने सिर से कागज़ का थैला हटा देती है पर पल भर में ही लड़के उसे फिर से वहीं रख देते हैं.
तालिब लड़का- अपना सिर नंगा नहीं करो…तुम्हारे केश काले हैं.
लड़के अपने हाथ में ली बाल्टी से पानी गिराते हैं, बख्ते सिर पर रखे थैले में बने छेद से पानी पी लेती है.
तालिब लड़का- पानी पी लो. प्यासे रहकर मरना नहीं चाहिए.
दूर से अब्बास के पाठ याद करने की आवाज सुनाई देती है. बख्ते को यह सुन कर उम्मीद बंधती है. इधर-उधर देख कर वह अब्बास को ढूंढने की कोशिश करती है.
बख्ते- अब्बास… तुम कहां हो अब्बास?
तालिब लड़का बख्ते के चेहरे पर पानी फेंक देता है और मुंह बंद करने के लिए उसके अंदर कागज़ ठूंसने की कोशिश करता है.
लड़की बख्ते के हाथ पकड़ लेते हैं और उसका चेहरा ढंक कर झाड़ियों के पीछे छुप जाते हैं.
अब्बास अपना पाठ याद करते हुए चहलकदमी करता दिखाई देता है.
अब्बास – ए बी सी डी ई
बख्ते – (झाड़ियों के अंदर से चिल्ला कर बोलती है) अब्बास, मैं यहां हूं.
अब्बास – बख्ते, कहां हो तुम?मुझे दिखाई नहीं दे रही हो.
लड़के बख्ते के मुंह पर अपनी हथेलियां रख देते हैं जिससे उसकी आवाज बाहर न जाए.
तालिब लड़का- हमें अमेरिका के लिए दूसरा वियतनाम बनाना है.

तालिब लड़का बख्ते को धकियाता हुआ गुफा के अंदर ले जाता है. वहां उसे तीन दूसरी लड़कियां दिखाई देती हैं और उनके सिर पर भी उसी तरह के कागज के थैले डाले हुए थे.
वह उन लड़कियों को आपस में बात करते हुए देखता है तो डांटते हुए अब ऐसा करने से मना करता है. बख्ते सहित सभी को दोनों हाथ ऊपर करने का हुकुम देकर वह आराम करने चला जाता है.
बख्ते को जब यह तसल्ली हो जाती है कि तालिब लड़का वहां से चला गया तो अपने सिर का थैला निकाल कर अलग रख देती है और लड़कियों से बात करने लगती है.
बख्ते – (एक लडकी से) कौन हो तुम?
लड़की 1 – जमीलेह
बख्ते – अपने सिर के ऊपर से कागज हटाओ. मुझे देखने दो तुम्हारी शक्ल कैसी है.
लड़की 1 – अपना सिर बाहर निकालते हुए मुझे डर लग रहा है.
बख्ते – डर? किससे डर लग रहा है?
लड़की 1 – लड़कों से.
बख्ते – भला क्यों?
लड़की 1 – वे मुझे बगैर सिर ढके देख लेंगे तो पत्थरों से वार कर मार डालेंगे.
बख्ते – (आगे बढ़कर उसके पास तक जाती है और सिर से कागज़ का थैला निकालकर नीचे फेंक देती है) वे लडके लड़ाई लड़ाई खेल रहे हैं. तुमने तो वैसा कुछ किया भी नहीं, फिर उन्होंने तुम्हें पकड़कर यहां इस गुफा में कैद क्यों किया?
लड़की 1 – मेरी आंखों की वजह से.
बख्ते – क्या खराबी है तुम्हारी आंखों में?
लड़की 1 – लड़के कहते हैं कि मेरी आंखें भेड़ियों की आंखों जैसी हैं.
बख्ते – इसका क्या मतलब हुआ?
लड़की 1 – इसका मतलब यह हुआ कि ये आंखें बहुत सुंदर हैं.
उन तीनों में जो सबसे छोटी थी उस लड़की के साथ एक बकरी थी. वह बड़े कुतूहल से उसकी आंखों को निहारती है. वह अपने सिर के ऊपर रखा हुआ कागज का थैला निकालकर नीचे फेंक देती है. उसकी बकरी उस थैले को आनन-फानन में खा भी जाती है.
छोटी लड़की- कौन कहता है कि तुम्हारी आंखें बहुत सुंदर हैं? मेरी आंखें देखो, वह ज्यादा सुंदर हैं.
बख्ते – (छोटी लड़की से) तुम तो अभी बहुत छोटी हो. तुम्हें भला कौन पकड़ कर ले जाएगा.
छोटी लड़की- पकड़ा इसलिए कि मैं बहुत सुंदर हूं. और इसलिए भी कि मैंने होंठों पर लिपस्टिक लगाई हुई थी.
बख्ते – पर अभी तो तुम्हारे होठों पर कोई लिपस्टिक नहीं है. किसने पोंछ दिया?
छोटी लड़की- और किसने? इन्हीं लड़कों ने पोंछ दिया.
बख्ते – तुम्हें लिपस्टिक पसंद है?
छोटी लड़की- हां,खूब पसंद है.
बख्ते – मैं तुम्हारे होठों पर और गालों के ऊपर लिपस्टिक लगा दूंगी. तब तुम खूब सुंदर दिखोगी.
बख्ते अपने ठहरे से वितरित निकालती है और छोटी लड़की के होठों पर और गालों पर लगा देती है. उसके बाद चेहरे के करीब जाकर बड़े प्यार से उन्हें निहारती है.
बख्ते – कितनी प्यारी लग रही हो.
किसी लड़की अब भी च्यूइंग गम चुभलाए जा रही है.
बख्ते – तुम्हें किस जुर्म में उन्होंने पकड़ लिया?
लड़की 3- (च्यूइंग गम चुभलाते हुए) मैं स्कूल जा रही थी और मेरे मुंह में च्यूइंग गम था, इसलिए. लड़कों ने मुझे रोका और पकड़ लिया.
बख्ते – पर च्यूइंग गम चुभलाना कोई गुनाह थोड़े ही है.
लड़की 3- च्यूइंग गम के रैपर पर एक फुटबॉल खिलाड़ी की तस्वीर थी. (कागज पर बनी वह तस्वीर वह बख्ते को दिखलाती हैं)
बख्ते – पर ज्यादा च्यूइंग गम मत चुभलाया करो.
लड़की 3- मुझे बहुत तेज भूख लगी थी, क्या करती?
बख्ते – चलो, आओ हम सब मिलकर यहां से भाग चलें.
लड़की 3- मुझे तो बहुत डर लग रहा है. तुम जाओ और जाकर पुलिस को बुला कर लें आओ, वही हम लोगों को आजाद करेंगे.
दोनों अन्य लड़कियों को साथ लेकर बकरी के साथ बख्ते गुफा से बाहर भाग जाती है.

तालिब लड़का अपनी लकड़ी की बंदूक से अब्बास को मार कर गिरा देता है. अब्बास जमीन पर गिर जाता है. डर कर बख्ते वहां से दूर भागती है. शोर करते हुए बाकी लड़के उसका पीछा करते हैं.
तालिब लड़का – देखो, वो भाग गई. उसे मार डालो.
लड़के – वह बच न पाए. उसका कत्ल कर दो.
बख्ते पेड़ों के पीछे भागती है. लड़के उसका पीछा करते हैं. अब्बास चीखता हुआ जमीन से उठता है और बख्ते को दौड़ाते लड़कों के पीछे भागता है.
अब्बास – मर जाओ बख्ते जिससे वे तुम्हें आज़ाद कर दें.*
बख्ते भागते हुए कुछ मजदूरों के पास पहुंचती है जो कटाई के बाद पौधों से गेंहू अलग कर रहे हैं.
बख्ते – बचाओ… देखो, ये लड़के मुझे कत्ल करना चाहते हैं.
मजदूर – बच्चों, इस लड़की को छोड़ो. जाओ, अपना खेल खेलो.
मजदूर की बातों को अनसुना करके लड़कों का झुंड बख्ते को चारों ओर से घेर कर खड़ा हो जाता है. मजदूर अपने काम में मगन हो जाते हैं. खुद को चारों ओर से घिरा पा कर बख्ते बुरी तरह से डर जाती है.
बख्ते- मुझे लड़ाई वाला खेल बिल्कुल पसंद नहीं है.
तालिब लड़का- (खुद को अमेरिकी के रूप में प्रस्तुत करता है) तुम एक आतंकवादी हो. हम तुम्हें अपनी गुफ़ा में जाने की इजाज़त कैसे दे सकते हैं. हम तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ेंगे. सामने आओ, तुम्हें मरना ही होगा.
बख्ते असहाय होकर ठिठक जाती है…इस अंतहीन खेल से वह आजिज़ आ चुकी है.
बख्ते – मुझे लड़ाई वाला खेल बिल्कुल पसंद नहीं है.
अमेरिकी की भूमिका में खुद को प्रस्तुत करता हुआ तालिब लड़का अपने हाथ का डंडा गुस्से में कांपता हुआ बख्ते की तरफ दिखाता है – वह उसे मार डालना चाहता है.
तालिब लड़का- तुम एक आतंकवादी हो. हम तुम्हें अपनी गुफ़ा में जाने की इजाज़त कैसे दे सकते हैं. हम तुम्हें जिंदा नहीं छोड़ेंगे. सामने आओ, तुम्हें मरना ही होगा.
बख्ते को जब बचाव का कोई रास्ता नहीं दिखाई देता तो हताश होकर समर्पण की मुद्रा में अपने बांहें ऊपर हवा में उठा देती है.
तभी अब्बास की आवाज सुनाई देती है- मर जाओ बख्ते जिससे वे तुम्हें आज़ाद कर दें.*
लड़के की बंदूक से गोली निकलकर बख्ते को छलनी कर देती है और वह अचेत हो कर जमीन पर गिर पड़ती है… ठीक इन्हीं पलों में बुद्ध की विशालकाय प्रतिमाओं में विस्फोट होता है वे देखते देखते धूल उड़ाती हुई धराशायी हो जाती हैं.
बुद्ध के पैरों के पास बैठे लड़ाके यह सब देख कर खुशी से चिल्लाने झूमने लगते हैं.
* सचमुच में मरने को नहीं मरने का नाटक करने को कहता है.
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![]() यादवेन्द्र का जन्म 1957 आरा, बिहार में हुआ, बनारस, आरा और भागलपुर में बचपन और युवावस्था बीती और बाद में नौकरी के लगभग चालीस साल रुड़की में बीते. जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले 1974 के छात्र आंदोलन में सक्रिय भागीदारी. नुक्कड़ नाटकों और पत्रकारिता से सामाजिक सक्रियता की शुरुआत. 1980 से लेकर जून 2017 तक रुड़की के केन्द्रीय भवन अनुसन्धान संस्थान में वैज्ञानिक से निदेशक तक का सफर पूरा किया. कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञान सहित विभिन्न विषयों पर प्रचुर लेखन. विदेशी समाजों की कविता, कहानियों और फिल्मों में विशेष रुचि-अंग्रेजी से कई महत्वपूर्ण अनुवाद. २०१९ में संभावना से ‘स्याही की गमक’(अनुवाद) प्रकाशित. साहित्य के अलावा यायावरी, सिनेमा और फोटोग्राफी का शौक. |
यह फ़िल्म मैंने कुछ साल पहले देखी थी। ईरान का सिनेमा क्या कमाल करता है! उस पर यादवेंद्र जी का बहुत अद्भुत आलेख। रोंगटे खड़ी करती है यह फ़िल्म और यह आलेख। अद्भुत प्रस्तुति .. वाह।
कभी-कभी विचित्र पागलपन लगता है ये सब। समय के इस दौर में विज्ञान ने हमें चाँद पर पहुँचा दिया लेकिन तब भी उस चाँद को अलग-अलग धर्मों के लोग अपनी आस्था के प्रतीकों में देखते हैं। लगभग हर चरण में सभ्यता का इतिहास बर्बरता का भी इतिहास रहा है। धर्म के नाम पर किया गया यह कृत्य सबसे बड़ा अधर्म है।
यादवेन्द्र जी को पढ़ना सोच की नई खिड़कियां खोलता है, यह आलेख भी अपवाद नहीं है, सूचनाओं और विचार का शानदार सिंक्रोनाइजेशन.
ओह बख्ते
कितना कुछ झेल रहे हैं मासूम लोग, इस धर्म की अफीम के कारण
यह आलेख कुमार अंबुज के आलेखों से ज्यादा प्रभावी है