सिनेमा का सौन्दर्य-शास्त्र: रिज़वानुल हक़
सिनेमा विश्व की आधुनिक और सबसे लोकप्रिय विधा है. उसमें लगभग सभी ललित कलाओं का समावेश हो जाता है, अभिनय, कथा, कविता, गायन, वादन, वासक-सज्जा, केश-सज्जा आदि आदि और वह...
सिनेमा विश्व की आधुनिक और सबसे लोकप्रिय विधा है. उसमें लगभग सभी ललित कलाओं का समावेश हो जाता है, अभिनय, कथा, कविता, गायन, वादन, वासक-सज्जा, केश-सज्जा आदि आदि और वह...
फ़िल्म पाकीज़ा हिंदी सिनेमा के संवेदनशील अंकन, भावप्रवण अभिनय और कलात्मक दृश्य-विधान का उत्कर्ष है, इसमें किसी महाकाव्य जैसी गहराई है. पतनशील सामन्ती संस्कृति के मुहाने पर खड़ी नृत्य, संगीत...
हरि मृदुल ने ‘अमर उजाला’ के मुंबई ब्यूरो में विशेष संवाददाता रहते हुए चमकती फिल्मी दुनिया के अँधेरे और टूटन को भी करीब से देखा है, उनकी ये तीनों कहानियाँ...
अभिनेत्री साधना के जीवन पर आधारित प्रबोध कुमार गोविल की किताब ‘ज़बाने यार मनतुर्की’ का प्रकाशन बोधि ने किया है. प्रवीण प्रणव ने इसकी अच्छी समीक्षा लिखी है. पुस्तक : ज़बाने...
‘जब ज़ुल्फ़ की कालक में घुल जाए कोई राहीबदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता.’ ‘सहर से शाम हुई शाम को ये रात मिलीहर एक रंग समय का बहुत घनेरा है’प्रसिद्ध अभिनेत्री...
इसी कोरोना काल में ‘टॉम एंड जैरी’ के शिल्पकार जीन डाइच का ९५ वर्ष की अवस्था में १६ अप्रैल को निधन हो गया. ‘टॉम एंड जेरी’ की लोकप्रियता अभूतपूर्व थी,...
इरफ़ान और ऋषि कपूर ने इस कठिन कोरोना काल में एक-एक कर के हमसे विदा ले ली. एक एक्टर था एक हीरो. एक ने साधारण का सौन्दर्य रचा तो एक...
अभिनेता इरफ़ान ख़ान (७ जनवरी १९६७-२९ अप्रैल २०२०) अब नहीं रहे, उनकी प्रभावशाली आँखों का अभिनय, उनकी फ़िल्में बची रहेंगी. विदेशी फिल्मों में भी वे नज़र आते थे. कल बी....
सत्यजित राय (সত্যজিৎ রায়- २ मई १९२१–२३ अप्रैल १९९२) का आज स्मृति दिवस है. आज ही के दिन १९९२ में उन्होंने हम सबसे विदा ले लिया था. उनके पीछे उनकी चलचित्रों की...
\'ढोज्या में ढोज्या ते दीधेला घूँट, हवे माँझी झाँझरीने बोलवानी छूट.\'गुजराती भाषा की फिल्म ‘हेल्लारो’ को 66वें भारतीय फिल्म पुरस्कार समारोह में देश की सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के सम्मान से नवाजा...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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