आलेख

कालजयी : कफ़न : रोहिणी अग्रवाल

कफ़न प्रेमचन्द की आखिरी कहानी है. यह मूल रूप में उर्दू में लिखी गयी थी. ‘जामिया मिल्लिया इस्लामिया’ की पत्रिका ‘जामिया’के दिसम्बर, १९३५ के अंक में यह प्रकाशित हुई, इसका...

नामवर सिंह की पुस्तक ‘कहानी नई कहानी’: राकेश बिहारी

पार्श्व में हजारीप्रसाद द्विवेदी : समालोचननामवर सिंह की आलोचना–पुस्तक ‘कहानी नयी कहानी’, हिंदी कहानी को समझने के लिए आधार-ग्रन्थ की तरह है. नामवर सिंह ने इसे एक दशक (१९५६-१९६५) की...

विनोद कुमार शुक्ल का कवि-कर्म: रवीन्द्र के. दास

फोटो साभार; शाश्वत गोयल   विनोद कुमार शुक्ल जितने बड़े उपन्यासकार हैं उतने ही बड़े कवि भी. विष्णु खरे ठीक ही कहते हैं-‘उनकीकविता वह जलप्रपात है जिसमें सबकी आवाज़ों का...

मनीषा कुलश्रेष्ठ : परम में उपस्थित वह अनुपस्थित

मनीषा कुलश्रेष्ठ के पाँच कहानी संग्रह (बौनी होती परछांई, कठपुतलियाँ, कुछ भी तो रूमानी नहीं, केयर ऑफ स्वात घाटी, गंधर्व – गाथा), तीन उपन्यास (शिगाफ़, शालभंजिका, पंचकन्या) और माया एँजलू...

प्रेम के असम्भव गल्प में: आशुतोष दुबे

प्रेम के असम्भव गल्प में: आशुतोष दुबे

‘प्रेम के असम्भव गल्प में’ कवि आशुतोष दुबे का लिखा गद्य है, उनकी कविताओं की ही तरह भाषा के सौन्दर्य और लयात्मकता से भरपूर. भाषा में लिखने की शुरुआत प्रेम...

परख : फाँस (संजीव): राकेश बिहारी

वरिष्ठ कथाकार संजीव का उपन्यास ‘फाँस’ भारतीय कृषक समाज की वर्तमान दारुण दशा पर केन्द्रित है. बड़ी संख्या में किसानों की आत्महत्या पूरे तंत्र पर सवालिया निशान है. समस्या जितनी...

विष्णु खरे : साहित्य अकादेमी का क्रांतिकारी संकल्प

२३/१०/२०१५ को साहित्य अकादेमी के कार्यकारी मंडल ने लेखकों - कलाकारों के विरोध प्रदर्शन के बीच अपना प्रस्ताव पारित किया. वरिष्ठ लेखक–आलोचक विष्णु खरे इस प्रस्ताव को अकादमी के इतिहास...

वीरेन डंगवाल : विष्णु खरे

रात नही कटती? लम्बी यह बेहद लम्बी लगती है ?इसी रात में दस-दस बारी मरना है जीना हैइसी रात में खोना-पाना-सोना-सीना है.ज़ख्म इसी में फिर-फिर कितने खुलते जाने हैंकभी मिलें...

हिंदी में कामकाज: राहुल राजेश

हिंदी में कामकाज: राहुल राजेश

हिंदी केवल साहित्य की भाषा नहीं है वह कामकाज की भी भाषा है, हिंदी के समक्ष जब हम चुनौतियों की चिंता करें तब हिंदी की इस भूमिका को भी गम्भीरता...

भूमंडलोत्तर कहानी (८) : नीला घर (अपर्णा मनोज) : राकेश बिहारी

भूमंडलोत्तर कहानियों के चयन और आलोचना के क्रम में इस बार अपर्णा मनोज की कहानी ‘नीला घर’ पर आलोचक राकेश बिहारी का आलेख- ‘नीला घर के बहाने’समालोचन प्रस्तुत कर रहा...

Page 34 of 38 1 33 34 35 38

फ़ेसबुक पर जुड़ें