समीक्षा

प्रचण्ड प्रवीर : ऋजुता का ही विस्तार हैं सारी वक्रताएँ : आनन्द वर्धन द्विवेदी

प्रचण्ड प्रवीर के ‘उत्तरायण’ में मकर, कुम्भ, मीन, मेष, वृष, मिथुन तथा ‘दक्षिणायन’ में कर्क, सिंह,कन्या, वृश्चिक संक्रांति तथा धनु शीर्षक से कहानियां संकलित है. इधर प्रवीर ने  उपनिषदों को...

मैनेजर पाण्डेय : ‘बतकही’ से ‘साधना’ तक : रविभूषण

मैनेजर पाण्डेय : ‘बतकही’ से ‘साधना’ तक : रविभूषण

अस्सीवें में पहुंच रहे मैनेजर पाण्डेय अपने लेखन में नियमित हैं. इधर पांच वर्षों में मेरे देखने में उनकी पांच किताबें प्रकाशित हुईं हैं- ‘लोकगीतों और गीतों में १८५७’, ‘मुग़ल...

राजा, जंगल और काला चाँद (तरुण भटनागर) : उमेश गोंहजे

कथाकार तरुण भटनागर का उपन्यास, ‘राजा,जंगल,और काला चाँद’ आधार प्रकाशन से २०१९ में प्रकाशित हुआ था, जो ४१ अध्यायों में विभक्त है. इनके नाम दिलचस्प और मानीख़ेज़ हैं जैसे- राजा...

पहल का कहानी विशेषांक : सूरज पालीवाल

हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता में ज्ञानरंजन द्वारा संपादित ‘पहल’ का योगदान शानदार है, वह कई दशकों से साहित्य और विचार की महत्वपूर्ण पत्रिका बनी हुई है.  इस विकट समय में...

समकालीन हिंदी कविता ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (ओम निश्चल) : शुभा श्रीवास्तव

प्रसिद्ध लेखक-आलोचक ओम निश्चल की इसी वर्ष प्रकाशित ‘आलोचनानुशीलन’ की पुस्तक ‘समकालीन हिंदी कविता ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (1980-2020) \'विजया बुक\' प्रकाशक से छपी है जो  सदी के अंतिम बीस वर्षों की...

मैनेजर पाण्डेय : शब्द, साधना और आलोचना : सुधि शंकर

मैनेजर पाण्डेय : शब्द, साधना और आलोचना : सुधि शंकर

वरिष्ठ आलोचक प्रो. मैनेजर पाण्डेय आगामी २३ सितम्बर को अपने जीवन के अस्सीवें वर्ष में प्रवेश कर रहें हैं. आलोचक के रूप में वह हिंदी आलोचना में पिछले पांच दशकों...

परख : शकुंतिका (भगवानदास मोरवाल) : कुबेर कुमावत

शकुंतिका : भगवानदास मोरवालपहला संस्करण : २०२०राजकमल प्रकाशन प्रा. लि.१- बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली- ११०००२मूल्य : पेपरबैक - ६५ हार्ड बैक- २९५   वरिष्ठ कथाकार भगवानदास मोरवाल के राजकमल...

कला की जगहें : सीरज सक्सेना

कलाकार, कवि, गद्यकार सीरज सक्सेना (३० जनवरी १९७४, मध्य-प्रदेश) सिरेमिक, वस्त्र, पेंटिंग, लकड़ी और ग्राफिक कला जैसे विभिन्न माध्यमों में २२ वर्षों से सक्रिय हैं. उन्होंने इंदौर स्कूल ऑफ आर्ट्स...

देवनागरी जगत की दृश्य संस्कृति (सदन झा) : शुभनीत कौशिक

देवनागरी जगत की दृश्य संस्कृति (सदन झा) : शुभनीत कौशिक

समीक्षा कृति से संवाद करती है, और उसके प्रति रुचि पैदा करती है, वह न तो पुस्तक-परिचय है न उसका प्रचार. संवाद के लिए विषय-वस्तु और पृष्ठभूमि से परिचय आवश्यक...

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