समीक्षा

शर्मिष्ठा और उपन्यास : कौशल तिवारी

मिथकीय पात्रों पर आधारित उपन्यासों का हिंदी में पाठक वर्ग है. अंग्रेजी भाषी पाठकों में तो इसकी मांग रहती ही है, देवदत्त पटनायक, अमीश त्रिपाठी आदि इसके लोकप्रिय लेखक हैं....

लमही का हमारा कथा-समय : कीर्ति बंसल और शुभा श्रीवास्तव

विजय राय के संपादन में लमही का ‘हमारा कथा समय’ तीन अंको में फैला हुआ है, लगभग १७५ आलेखों वाले इस महाविशेषांक की इधर चर्चा है. २००० में वर्तमान साहित्य...

आख्यान-प्रतिआख्यान (२): चंचला चोर (शिवेन्द्र) : राकेश बिहारी

नई सदी के हिंदी उपन्यासों की अर्थवत्ता और सार्थकता के आकलन के स्तम्भ  ‘आख्यान-प्रतिआख्यान’ की इस दूसरी कड़ी में युवा कथाकार शिवेन्द्र के चर्चित उपन्यास ‘चंचला चोर’ का मूल्यांकन प्रस्तुत...

स्मरण में है आज जीवन : सूरज पालीवाल

भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित ‘स्मृतियों का बाइस्कोप’ शैलेंद्र शैल के स्मरणों का संग्रह है जिसमें आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ, इन्द्रनाथ मदान, कवि कुमार विकल, पहल के संपादक ज्ञानरंजन और...

परख : आईनासाज़ (अनामिका) : अर्पण कुमार

वरिष्ठ लेखिका अनामिका का उपन्यास \'आईनासाज़\'  इस वर्ष राजकमल प्रकाशन से छप कर आया है. इसको देख-परख रहें हैं अर्पण कुमार.आईनासाज़ का आईना                ...

चन्द्रकान्ता (सन्तति) का तिलिस्म : अनुत्तरित प्रश्न : प्रचण्ड प्रवीर

देवकीनन्दन खत्री द्वारा रचित उपन्यास ‘चन्द्रकान्ता सन्तति’ हिंदी में अब एक क्लैसिक की हैसियत रखता है. आलोचना ने जिसे शुरू में तिलस्मी कहकर उपेक्षित किया उसी ने बाद में इसके...

कहीं अधिक बड़े सच का लिबास है ‘श्रीवन’ का पागलपन : विनोद शाही

श्रीवन विक्रम मुसफ़िरप्रकाशक : आधार प्रकाशन एस.सी.एफ. 267सेक्टर-16 पंचकूलामूल्य: 150विक्रम मुसाफ़िर (जन्म 7 सितम्बर, 1981, शिमला) के उपन्यास \'श्रीवन\' की समीक्षा आलोचक विनोद शाही ने लिखी है. ऐसा कभी कभी होता...

परख : वैधानिक गल्‍प (चन्दन पाण्डेय) : श्रीकान्‍त दुबे

राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित कथाकार चन्दन पाण्डेय का उपन्यास ‘वैधानिक गल्प’ इसी पुस्तक मेले में लोकार्पित हुआ है. इस उपन्यास पर यह पहली समीक्षा श्रीकान्‍त दुबे द्वारा आपके लिए. धधकते वर्तमान...

परख : तुमड़ी के शब्द (बद्री नारायण) : सदाशिव श्रोत्रिय

राजकमल से प्रकाशित बद्री नारायण के नवीनतम कविता संग्रह \'तुमड़ी के शब्द\' की समीक्षा सदाशिव श्रोत्रिय कर रहें हैं.                               बद्री नारायणतुमड़ी के शब्दों  का अंतर्लोक              ...

दक्षिणायन (प्रचण्ड प्रवीर) : वागीश शुक्ल

दक्षिणायन (प्रचण्ड प्रवीर) : वागीश शुक्ल

कथाकार गैब्रिएल गार्सिया मार्खे़ज़ ने मेंदोजा से बातचीत में यह स्वीकार किया है कि उनके उपन्यासों में एक भी पंक्ति ऐसी नहीं है जो वास्तविकता पर आधारित न हो. लातीन...

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