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सबद – भेद : अपने साक्षात्कारों में नागार्जुन : श्रीधरम

‘जनता मुझसे पूछ रही है क्या बतलाऊँ,जनकवि हूँ मैं साफ़ कहूँगा क्यों हकलाऊँ.\'हिंदी, मैथिली, संस्कृत, और बांग्ला में रचने वाले जन कवि नागार्जुन (३० जून १९११-५ नवंबर १९९८) की आज...

कथा- गाथा : मुस्कराती औरतें : मैत्रेयी पुष्पा

मानसिक, शारीरिक और अनुकूलित हिंसा के ये तीनों रूप आपको परिवार रूपी संस्था में स्त्री के प्रति एक साथ देखने को मिलते हैं. इसमें सबसे खतरनाक है हिंसा का अनुकूलित...

सबद – भेद : भारतेंदु और भाषा की जड़ें : बटरोही

राजनीतिक युद्ध पहले विचारों  के रणक्षेत्र में लड़े जाते हैं और यह लड़ाई भाषा से शुरू होती है. औपनिवेशिक भारत में खासकर आज के हिंदी भाषी क्षेत्रों में भाषा और शिक्षा...

रंग- राग : मौलिकता का आग्रह : अखिलेश

(Clicked By  Rafique Shah)प्रसिद्ध चित्रकार अखिलेश  हिंदी के अनूठे लेखक हैं. कलाओं पर उनका विशद लेखन हैं. अभी इसी वर्ष राजकमल प्रकाशन से ‘देखना’ शीर्षक से लेखकों और कलाओं पर...

फेसबुक (कहानी ) जयश्री रॉय

सोशल मीडिया आभासी है पर यथार्थ में वास्तविक हस्तक्षेप करता है. कहानी की गीतिका जीवन के तमाम कटु-तिक्त अनुभवों से होती हुई प्रौढ़ता की दहलीज पर फेसबुक पर एक अकांउट...

प्रेमशंकर शुक्ल : राग अनुराग

मानव सभ्यता ने जीवन को सुगम बनाने के लिए भाषाओं का निर्माण किया. भाषा ने कविता लिखी. प्रेम, मृत्यु, भय, सूर्य, नदी, पहाड़, प्रकृति, ईश्वर ये सब कविता में आकर...

काज़ुओ इशिगुरो : एक अभिनव किस्सागो : श्रीकांत दुबे

2017 के नोबल पुरस्कार से सम्मानित 62 वर्षीय ब्रिटिश लेखक काज़ुओ इशिगुरो (Kazuo-Ishiguro) के \'द रिमेन्स ऑफ़ द डे\' और \'नेवर लेट मी गो\' पर आधारित दो फिल्में भी बनी...

मैं कहता आँखिन देखी : प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी

संस्कृत भाषा का नाम लेते ही हमारे सामने एक शास्त्रीय पर पुरातनपंथी भाषा आ खड़ी होती है जिससे अब केवल धार्मिक अनुष्ठान भर सम्पन्न होते हैं. हम भूल चुके हैं...

बाज़ार और टेलर मास्टर : नवनीत नीरव

प्रज्ञा की कहानी ‘मन्नत टेलर्स’ को केंद्र में रखकर कथा - आलोचक राकेश बिहारी की विवेचना ‘बाज़ार की जरूरत और उसके साइड इफ़ेक्ट्स’ पर नवनीत नीरव की यह टिप्पणी. बाज़ार और टेलर मास्टर ...

सबद – भेद : प्रेमचंद : अरुण माहेश्वरी

प्रेमचंद (३१ जुलाई १८८०–८ अक्टूबर १९३६) गुलाम भारत में पैदा हुए और गुलाम भारत में ही मर गए पर उनका लेखन आज़ाद था. हर तरह की आज़ादी के लिए उन्होंने...

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