परख : आगे जो पीछे था (मनीष पुष्कले) : प्रभात त्रिपाठी
पिछले वर्ष भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित चित्रकार मनीष पुष्कले के उपन्यास “आगे जो पीछे था” को पढ़ते हुए प्रभात त्रिपाठी ने अपनी डायरी में उसे कुछ इस तरह से दर्ज़...
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पिछले वर्ष भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित चित्रकार मनीष पुष्कले के उपन्यास “आगे जो पीछे था” को पढ़ते हुए प्रभात त्रिपाठी ने अपनी डायरी में उसे कुछ इस तरह से दर्ज़...
श्याम बिहारी श्यामल पत्रकार हैं. उपन्यास प्रकाशित हुए हैं. महाकवि जयशंकर प्रसाद के जीवन और उनके युग पर आधारित उनके उपन्यास की प्रतीक्षा है. ग़ज़लें भी लिखते हैं. पेश है...
अभिषेक अनिक्का द्विभाषी लेखक एवं कवि हैं जिनकी रूचि राजनीति, दर्शन, जेंडर अध्ययन और फिल्मों में है. अभिषेक ने अपनी पढ़ाई दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज एवं मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट...
हिंदी के कई महत्वपूर्ण कवि पेंटिग और अन्य ललित कलाओं में रूचि रखते हैं. उनकी कविताओं में ललित कलाओं के प्रभाव देखे जा सकते हैं. ऐसे कवियों की इस तरह...
डिजिटल माध्यम में हिंदी साहित्य को सुरुचि के साथ समृद्ध करने वालों में मनोज पटेल प्रमुखता से शामिल हैं. छोटे से कस्बे में अपने सीमित संसाधनों से विवादों और साहित्य...
तुषार धवल कवि, चित्रकार और अनुवादक के रूप में जाने जाते हैं पर मराठी साहित्य पर उनकी गहरी पकड़ का अंदाज़ा इस विद्वतापूर्ण आलेख को पढ़कर लगा. संत ज्ञानेश्वर और...
(Joan Miro की पेंटिग : Harlequin\'s Carnival)प्रचण्ड प्रवीर तरह-तरह से साहित्य और विचार को समृद्ध कर रहे हैं. उनका उपन्यास \'अल्पाहारी गृहत्यागी: आई आई टी से पहले\', कहानी संग्रह ‘Bhootnath Meets...
पिको अय्यर के नाम से ख्यात सिद्धार्थ पिको राघवन अय्यर खुद को विश्व नागरिक मानते हैं, हाँलाकि वे भारतीय मूल के ब्रिटेन में जा बसे अध्यापक माता पिता की संतान...
“खुद को ज़िंदा रखने के लिए इतने रतजगों के बाद उसे प्रेम से अधिक नींद की ज़रूरत है.”२१ वीं सदी की हिंदी कविता का युवा चेहरा जिन कवियों से मिलकर...
यहूदी मूल के महान डच दार्शनिक Baruch De Spinoza (२४ नवम्बर १६३२ - २१ फ़रवरी १६७७) अपने प्रसिद्ध क्रांतिकारी ग्रन्थ \'Ethics’ (१६७७)के कारण जाने जाते हैं. हिंदी में उनकी चर्चा...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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