मैं कहता आँखिन देखी : सविता सिंह
हिंदी की महत्वपूर्ण कवयित्री सविता सिंह की रचनात्मकता में नारीवाद की भूमिका और इस विमर्श की वर्तमान अर्थवत्ता को लेकर रेखा सेठी ने यह लम्बी बातचीत की है.संवाद की यह...
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हिंदी की महत्वपूर्ण कवयित्री सविता सिंह की रचनात्मकता में नारीवाद की भूमिका और इस विमर्श की वर्तमान अर्थवत्ता को लेकर रेखा सेठी ने यह लम्बी बातचीत की है.संवाद की यह...
यायावर, जीवट से भरे प्रसिद्ध फोटोग्राफर कमल जोशी की आत्महत्या की ख़बर पर यकीन नहीं हो रहा है.उनसे कई मुलाकातें हैं. पहाड़ के जीवन को केंद्र में रखकर लिए गए...
समालोचन पर ही प्रकाशित शहादत ख़ान की कहानी ‘क़ुर्बान’ ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. भाषा और उसकी कसावट यह दोनों उनके पास हैं. कथा को विकसित करते...
वरिष्ठ रचनाकार नंद भारद्वाज हिंदी के साथ-साथ राजस्थानी भाषा में भी अपने रचनात्मक योगदान के लिए पहचाने जाते हैं. उनकी सृजनात्मक यात्रा और राजस्थानी परिवेश पर एकाग्र यह संवाद युवा...
२१ वीं शताब्दी की हिंदी कविता कवियों की धरती माटी का कविता विशेषांक प्रकाशित हो गया है. नई सदी की हिंदी कविता की शुरुआत मैंने २० वीं शताब्दी के आखिरी...
शिरीष ढोबले के नवीनतम कविता संग्रह ‘पर यह तो विरह\' पर चित्रकार अखिलेश की टिप्पणी और इस संग्रह से कुछ कविताएँ.____________देखना, खिलनाजीवन कई बार तज देता है अपनी गरिमा मृत्यु...
डिजिटल मीडिया किस तरह से एकतरफा और जजमेंटल बना दिया जाता है इसके कई हिंसक उदहारण हमारे समाने हैं. कुछ साल पहले इसी फेसबुक पर खुर्शीद अनवर की घेर कर...
राजेन्द्र यादव हिंदी पट्टी के सबसे प्रभावशाली संपादक रहे हैं. उनके संपादन में निकलती पत्रिका (हंस) हिंदी में आधुनिक रचनाशीलता, तीक्ष्ण वैचारिकता और तार्किक हस्तक्षेप का एक बेहद असरदार और...
कमबख्त इश्क और हाय रे मर्द की फितरत. औरत अगर अपना आसमान चाहे तो मर्द को मुश्किल और मर्द किसीऔर औरत से संजीदा हो तो माशूका को दिक्कत. तमाम कहानियाँ...
किसी समाज के स्वास्थ्य को गर जांचना हो तो उसके पर्यावरण को देखना चाहिए. अगर उसकी नदियाँ प्रदूषित हैं, वन नष्ट हो रहे हों. मछलियाँ मर रही हैं और पक्षी...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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