सहजि सहजि गुन रमैं : कात्यायनी
(पेंटिग : Bernardo Siciliano : PANIC ATTACK II)कात्यायनी की कविताएँ प्रतिबद्ध और साहसिक हैं, इसलिए असरदार हैं कि उनमें समझौते नहीं हैं न रियायत बरती गयी है. वह वरिष्ठ ही नहीं...
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(पेंटिग : Bernardo Siciliano : PANIC ATTACK II)कात्यायनी की कविताएँ प्रतिबद्ध और साहसिक हैं, इसलिए असरदार हैं कि उनमें समझौते नहीं हैं न रियायत बरती गयी है. वह वरिष्ठ ही नहीं...
सैराट अब एक फ़िल्म भर नहीं है. इसे सिर्फ सिनेमा के तत्वों से नहीं समझा जा सकता. इसकी ‘सफलता’ की जड़ें दरअसल सदियों पुराने भारतीय समाज के विभाजन में हैं,...
ओम निश्चल ने पिछले डेढ़ दशक में प्रकाशित कविता-संग्रहों में से अपनी पसंद के संग्रहों के आधार पर डेढ़ दशक की कविताओं का एक लेखा-जोखा तैयार किया है. इसमें समकालीन...
मराठी फ़िल्म ‘सैराट’ पर संवाद के अंतर्गत आपने कल मराठी के शीर्षस्थ कथाकार, नाटककार तथा नाट्य समीक्षक जयंत पवार का मराठी में लिखा आलेख ‘प्रेक्षक का \'\'सैराट\'\' झाले असावेत?’ देखा/...
हिंदी के प्रारम्भिक लेखक हिंदी के साथ साथ मराठी भी जानते थे. भारतेंदु ने अपने नाटकों में मराठी का प्रयोग किया है. सरस्वती के महान संपादक महावीरप्रसाद द्विवेदी ने मराठी...
मराठी फ़िल्म ‘सैराट’ पर विष्णु खरे के आलेख से प्रारम्भ ‘वाद/विवाद/संवाद’ की अगली कड़ी में कथाकार कैलाश वानखेड़े का आलेख प्रस्तुत है. इससे पहले आपने मराठी/अंग्रेजी के फ़िल्म- आलोचक आर....
फ़िल्म मीमांसक विष्णु खरे की मराठी फ़िल्म ‘सैराट’ की विवेचना ने अब एक बहस का रूप ले लिया है. ‘सैराट’ के हिंदी ‘मायने’ से शुरू हुआ यह विवाद अब फ़िल्म...
हान कांग (Han Kang, जन्म November 27, 1970, साउथ कोरिया) को उनके उपन्यास ‘The Vegetarian’ के लिए 2016 के मैन बुकर इंटरनेशनल प्राइज के लिए चुना गया है. लेखिका ‘हान कांग’...
पेंटिग : bijay-biswalकविता के साथ लय का रिश्ता पुराना है, अक्सर छंद च्युत कविताओं में भी आंतरिक संगति रहती है. हर कविता की अपनी लय होती है. संभव है संदीप तिवारी...
वसु का कुटुम मृदुला गर्ग राजकमल प्रकाशन प्रा. लि. मूल्य-125 रुपए पृष्ठ-119 समीक्षावसु का कुटुम-21वीं सदी का कच्चा-चिट्ठा सुधा उपाध्याय मेरे हाथ पिछले दिनों मृदुला...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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