सहजि सहजि गुन रमैं : अनिल त्रिपाठी
Adeela Sulemanअनिल त्रिपाठी सहजता से सामाजिक – राजनीतिक विद्रूपता को अपना काव्य – मूल्य बनाते हैं. उनकी कविताओं मे वैचारिक चेतना लगातार सक्रिय रहती है. जोर-शोर से कहे जाते रहे...
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Adeela Sulemanअनिल त्रिपाठी सहजता से सामाजिक – राजनीतिक विद्रूपता को अपना काव्य – मूल्य बनाते हैं. उनकी कविताओं मे वैचारिक चेतना लगातार सक्रिय रहती है. जोर-शोर से कहे जाते रहे...
केदारनाथ की आपदा की पृष्ठभूमि में लिखी इन कविताओं में अभी भी वह अनुत्तरित प्रश्न मौजूद है कि इस विपदा के पीछे कितना मनुष्य है कितनी प्रकृति. ______________एक जंगल काफल...
चर्चित उपन्यासकार रणेन्द्र के दूसरे उपन्यास गायब होता देश की समीक्षा युवा कवि अनुज लुगुन की कलम से..संकट, संघर्ष और आधुनिकताअनुज लुगुन एक समय था जब शहर ,गलियों, गाँवों, चौराहों में...
रणेन्द्र का पहला उपन्यास, ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ भारत के आदिवासी समुदाय के समक्ष संकट और उनके संघर्ष का आख्यान है, इस उपन्यास में रणेन्द्र ने इतिहास से बाहर ही...
हिंदी के वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा (१९४८, मुंगेर) की पहली कविता ‘जनता का आदमी’ १९७२ में ‘वाम’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी, ५० साल की अवस्था में उनका पहला (और...
मनुष्य के पक्ष की कविताएँ ब्रज श्रीवास्तव की सद्य प्रकाशित कविता पुस्तक” घर के भीतर घर’’ में एक कविता है- जिसकी अंतिम पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-“आश्वित्ज़ कई जगहों पर है,बेरहमी...
हिंदी की नई रचनाशीलता का क्षेत्र ‘सीकरी’ से बाहर का क्षेत्र है अब. आशीष पहाड़ के रहने वाले हैं, उनकी कविताओं में उनका अपना अनुभव तो है ही उसे अभिव्यक्त...
स्वप्न समयसविता सिंहराधाकृष्ण प्रकाशन प्रा.लि.7/31, अंसारी मार्गदरियागंज, नई दिल्लीमूल्य 250 रूपयेस्त्री-मन की सुकोमल वीथियों से गुज़रते हुएओम निश्चलसविता सिंह का नाम हिंदी कविता में जाना पहचाना है. अब तक उनके तीन...
प्रसिद्ध कथाकार और तद्भव के यशस्वी संपादक अखिलेश (१९६० : सुल्तानपुर-उ.प्र) का यह दूसरा उपन्यास है- उनके तीन कहानी संग्रह (आदमी टूटता नहीं, मुक्ति, शापग्रस्त और अंधेरा) और एक उपन्यास...
बच्चों को सुनाने के लिए हम ‘बड़ों’ के पास एक गीत तक नहीं है. हमारी हिंदी कविता ने तो अपने प्रक्षेत्र से बच्चों को निर्वासित ही कर दिया है. बच्चे...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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