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सहजि-सहजि गुन रमैं : अमित उपमन्यु

अमित की कविताएँ हिंदी कविता की बनावट और बयान में नया कुछ जोड़ती हैं. यह नया समकालीन है. मध्यवर्गीय नागरिक मन उत्तर औपनिवेशिक और बेलगाम पूंजीवादी  समय में जिसे तरह के...

मीमांसा : क्या कुछ भी नया घटित नहीं हो रहा

रिचर्ड लेवन्टिन (तुलनात्मक जीव विज्ञान) और रिचर्ड लेविनास (जनसंख्या विज्ञान) हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैं. संयुक्त रूप से लिखे गए Biology under the Influence (२००८) नामक अपनी पुस्तक में लेखक...

सहजि- सहजि गुन रमैं : प्रांजल धर

प्रांजल धरमई १९८२ .  ज्ञानीपुर, गोण्डा (उत्तर प्रदेश)जनसंचार एवं पत्रकारिता में परास्नातक.  देश की सभी प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ, समीक्षाएँ, यात्रा वृत्तान्त और आलेख  राष्ट्रकवि दिनकर की जन्मशती के...

परख : पीढ़ियों की जुगलबंदी

कभी के बाद अभी (विनोद कुमार शुक्‍ल), मैं वो शंख महाशंख (अरुण कमल), अमीरी रेखा (कुमार अम्‍बुज) और खत्‍म नहीं होती बात (बोधिसत्‍व) की समीक्षा के बहाने वरिष्ठ समीक्षक ओम...

सहजि – सहजि गुन रमैं : उमराव सिंह जाटव

हिंदी कविता के एक हिस्से में वंचना और बेईमानी पर तीव्र प्रतिवाद है. यह प्रक्षेत्र  कविता  में अपनी स्मृतिओं के सहारे अपने समय के  यथार्थ परख रहा है. ये कविताएँ...

बोली हमरी पूरबी : मलयाली कविताएँ

:: मलयालम :: के. सच्चिदानन्दन :कवि, अनुवादक एवं आलोचक श्री के. सच्चिदानन्दन का जन्म 28 मई 1946 को हुआ. वे अंग्रेजी के प्रोफेसर रहे है तथा एक लम्बे समय तक साहित्य...

रंग राग : अखिलेश के चित्रों की लिपि

अखिलेश (1956, इंदौर) भारत के बड़े चित्रकारों में शुमार हैं. पारम्परिकता, बारीक़ बुनावट,   ताज़गी और रंगों के साथ भावनाओ की जुगलबंदी उनकी कुछ विशेषताएं हैं. राकेश श्रीमाल का अखिलेश...

सहजि – सहजि गुन रमैं : शंभु यादव

पेटिग : Salvador Daliशंभु यादव सामंती समाज और पूंजीवादी संस्कृति पर अपनी कविताओं से चोट करते हैं. यह खट खट देर तक गूंजती रहती है. वे ख़ास के बरक्स आम की असहायता को...

परिप्रेक्ष्य : कान्हा विवाद पर राजेश जोशी और निरंजन श्रोत्रिय

राजेश जोशी 11 निराला नगर , भदभदा रोड , भोपाल 462003प्रिय भाई,कान्हा में शिल्पायन के सान्निध्य शीर्षक से आयोजित कविता समारोह पर विष्णु खरे की द्विअर्थी-अश्लील शीर्षक वाली हास्यास्पद और...

परिप्रेक्ष्य : गणेश पाण्डेय : कविता की पृथ्वी

वाद विवाद से संवाद की ओर जाना होता है पर जब विवाद व्यक्तिवाद के जंगल में हिस्र हो जाए और आरोप – प्रत्यारोप के पीछे ईर्ष्या, कुंठा और ‘ठिकाने लगाने...

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