मैं कहता आखिन देखी : नामवर सिंह
वरिष्ठ आलोचक प्रो. नामवर सिंह हिंदी के बेहतरीन वक्ताओं में से हैं. उनके सम्बोधन के सम्मोहन से हम सब परिचित हैं. इधर बातचीत की सूक्ति शैली में उनके कुछ रोचक...
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वरिष्ठ आलोचक प्रो. नामवर सिंह हिंदी के बेहतरीन वक्ताओं में से हैं. उनके सम्बोधन के सम्मोहन से हम सब परिचित हैं. इधर बातचीत की सूक्ति शैली में उनके कुछ रोचक...
प्रख्यात कवि और कला-समीक्षक हेमंत शेष की कहानियों का संग्रह 'रात का पहाड़' वाग्देवी प्रकाशन से प्रकाशित है. उनकी कहानियाँ, उनकी कविताओं की भाँति, भाषागत प्रौढ़ता और व्यंजना से समृद्ध...
चर्चित कथाकार प्रेमचंद सहजवाला का नया उपन्यास - नौकरीनामा बुद्धू का नमन प्रकाशन, दिल्ली से शीघ्र प्रकाशनाधीन है. उपन्यास के इस अंश में कार्यालयी राग अनुराग और उसकी सीमा का दिलचस्प चित्रण है.उपन्यास...
अनीता भारती9 फरवरी, 1965 दिल्ली.दिल्ली विश्वविधालय से एम.ए. बी.एड. मासिक पत्र अभिमूकनायक का संपादन.दलित समाज सुधारक तथा चिंतक गब्दूराम बाल्मीकि पर एक पुस्तिकादलित, स्त्री-लेखन और उसके सवालों पर विभिन्न...
प्रेमचंद (३१ जुलाई,१८८० - ८ अक्टूबर, १९३६ )\"हमारी कसौटी पर वही सहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वधीनता का भाव हो, जीवन की सच्चाइयों का प्रवेश हो- जो हम...
मनीषा कुलश्रेष्ठ26 अगस्त 1967, जोधपुरएम. फिल. (हिन्दी साहित्य), विशारद ( कथक)पाँच कहानी संग्रह (बौनी होती परछांई, कठपुतलियाँ, कुछ भी तो रूमानी नहीं, केयर ऑफ स्वात घाटी, गंधर्व – गाथा) दो...
राजेश खन्ना अब हमारे बीच नहीं हैं. सितारे हमारे बीच से कहीं जाते नहीं. उनकी चमक सदिओं सदिओं बनी रहती है. पत्रकार लेखक वेद उनियाल ने राजेश खन्ना के विविध जीवन...
कवयित्री कथाकार वन्दना शुक्ला ने बहसतलब -२ (साहित्य का भविष्य) को आगे बढाते हुए सिलसिलेवार ढंग से साहित्य और कविता के समक्ष चुनौतिओं को रखा है और यथा सम्भव उनके...
साहित्य के भविष्य को लेकर बहसतलब आयोजन - २ में हिंदी कविता की दशा और दिशा पर वरिष्ठ लेखक और कवि मोहन श्रोत्रिय का आलेख, जो कविता की पहुंच की...
कविता ::भूमिकाएं जहां से शुरू होती हैं हिंदी कविता अपने कथ्य की संप्रेषणीयता और शिल्प की कलात्मकता में किसी भी विकसित भाषा की...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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