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Home » फ़रवरी की कविता : अदनान कफ़ील दरवेश

फ़रवरी की कविता : अदनान कफ़ील दरवेश

अदनान कफ़ील दरवेश की कविताओं में इसी दुनिया-जहान के मुड़े-तुड़े, तीखे-नुकीले और रिसते हुए घाव हैं. प्रतिकार का एक सजग, उठा हुआ हाथ है. साथ ही उस जगह की दैनंदिनी भी जो धीरे-धीरे अपने ही लोगों के लिए बेगानी होती जा रही है. प्रस्तुत कविताओं के ‘फ़रवरीपन’ में भी यह अनुभूति लगातार बनी रहती है, एक चुभती हुई उपस्थिति की तरह. यहाँ फ़रवरी की आहट है, उसका सूक्ष्म शृंगार है. कामना है. और प्रेम की अपनी यातनाएँ भी.

by arun dev
February 24, 2026
in कविता
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फ़रवरी की कविता : अदनान कफ़ील दरवेश
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फ़रवरी की कविता
अदनान कफ़ील दरवेश

 

 

 

फ़रवरी-1

फ़रवरी की नर्म धूप ने
मेरे कोट में
सुनहले फूल टाँक दिए
और बसंती हवाओं ने मुझपर
सुगंध की दबीज़ चादर डाल दी
जब मैं तड़के एक सुबह
अपनी आँखें और क़लम बंद कर रहा था

मैं एक पत्ते की मानिंद हवा में झूमने को
बेक़रार हो उठा
मैं बोगनवेलिया के काग़ज़ी-क़िरमिज़ी फूलों की तरह,
एक दीवार से लिपट जाना चाहता था
मैं चाहता था एक गुलाब की तरह खिलना
गेंदे की तरह फूलना
और सदाबहार की तरह चटकना

मैं फूलों से ढका हुआ एक पुल,
तुम्हारे साथ दौड़ते हुए पार करना चाहता था

एक दिन अपनी फूलों की साइकिल पर,
फूलों का ताला डाल
उसे हरी दूब की अमानत में सौंपकर
सरसों के पीले खेतों में
यूँ ही गुम हो जाना चाहता था मैं

मैं चाहता था एक पेड़ के साये में,
तुम्हारे साथ
देर शाम तक खड़े होना
जिससे
झरते
रहें
थोड़ी-थोड़ी देर पर
ढेर सारे सूखे पत्ते और नाज़ुक फूल

मैं एक गीत गाना चाहता था
जब सूरज अपने पूरे शबाब पर हो
लेकिन तभी मेरे कान से
बहने लगा ख़ून
मेरे दिल में उठा हौल
और पूरी तरह रुँध गया मेरा गला.

 

 

 

फ़रवरी-2

जब फ़रवरी की एक रात में
नील बरस रहा था
मैं एक पत्थर की तरह चुपचाप साकित पड़ा था
तुमने मुझे एक पेड़ की तरह धीरे-धीरे गढ़ा
जिसपर टपकती रही सारी रात ओस

उस ख़ुश्बू को मैं कैसे भूल सकता हूँ
जो उठती रही सारी रात,
मेरी ही आत्मा की अंजान तहों से !

मैं कैसे भूल सकता हूँ
उस आधी रात के
ओस से भी हल्के चुम्बनों को !

 

 

 

फ़रवरी-3

यह शाम का समय था
और हमारे चारों ओर उगे थे
फूल ही फूल
हर रंग के फूलों से सुगंधित थी हवा

हर फूल यहाँ
एक दूसरे फूल के उगने के लिए
एक ख़ाली जगह की तरह था

जगह-जगह लताओं ने
मटरगश्ती की थी
हरे-भरे रास्तों से उठती थीं खोई हुई धुनें
पेड़ों ने ख़ूब सारी नमी और ख़ुश्बू का दुकूल किया था

यह रंगों की बारिश का ही मौसम था
हर दिन के लिए हम चुन सकते थे
कोई एक ख़ास रंग

फूलों की बेहद नाज़ुक पंखुड़ियों पर भी खिले थे
पानी के कई-कई फूल

सबकुछ एक फूल की ओट में आ गया था जैसे
शाम भी एक फूल की तरह खिली थी
लेकिन उस शाम को भी बीत जाना था

अधिक तो नहीं !
बस उस फ़रवरी की शाम जितना ही तो
मैंने चाहा था
एक संक्षिप्त जीवन.

 

 

 

फ़रवरी-4

फ़रवरी की इस रात में
पिछली फ़रवरियों की भी रातों की कोमलता है

यह सब अनायास नहीं है
कि सारे पेड़
ख़ामोश खड़े सुन रहे हैं
मेरी आत्मा में बजता हुआ
संतूर…

 

 

 

फ़रवरी-5

जब फ़रवरी के सुनहले दिन
ख़ुश्बुओं से शराबोर थे
मेरा दिल एक पत्थर की तरह टूट रहा था
मैं हर दिन का अख़बार छुपा देना चाहता था
मैं नहीं चाहता था इसे फूल सुनें
हवा सुने
या सुनें इसे ये मदहोश पेड़.

जब देश में उत्तर से पूर्वोत्तर तक
तमाम राजनेता
नफ़रत की राजनीति में
गले-गले डूब रहे थे
मैं सोच रहा था
क्या उन्हें नहीं दिखता क़ुदरत का यह उल्लास !
क्या उनके लिए ये दिन नहीं हैं थोड़े भी ख़ास ?

वे बसंत को कुचल देना चाहते थे
क्योंकि बसंत उनके लिए
हमेशा से ही
एक साज़िश की तरह था.

 

फ़रवरी-6

मैंने कहा— फ़रवरी ! फ़रवरी !
किरंजी, नारंजी फूलों ने कहा— फ़रवरी ! फ़रवरी !
किरमिज़ी और कासनी फूलों ने कहा— फ़रवरी ! फ़रवरी !
सफ़ेद, पीले और उन्नाबी फूलों ने कहा— फ़रवरी ! फ़रवरी !

तुमने कही प्यार की बात
हाथों में गहे हाथ
डोले नव-पल्लव पात-पात
विकल-विकल ये दिन-रात
प्रेम के बाज़ ने लगाया घात.

 

 

 

फ़रवरी-7

फ़रवरी फूलों से लदी गाड़ी
आसमान के चक्कर से पहिये
दिनों की तीलियों पर चुरमुराती
चलती चली जा रही है मुझसे दूर

क्या इस गाड़ी में
हमारे लिए थोड़ी-सी भी जगह नहीं ?

 

 

 

फ़रवरी-8

अट्ठाइस दिनों की इस फ़रवरी में
सारे ही मौसम तो थे
सर्दियाँ थीं
लेकिन ऐसी नहीं कि बर्दाश्त के बाहर हों
गर्मियाँ थीं
लेकिन ऐसी नहीं कि बेहाल हों
बरसातें थीं
लेकिन ऐसी नहीं कि सड़कों पर पानी जमा हो

यह एक ऐसा महीना था
जिसमें हर मौसम की एक याद बसी थी
उनकी भी, जिन मौसमों के हमने
एकसाथ सपने देखे.

 

 

 

फ़रवरी-9

इसे बारिश कहना ज़्यादती होगी
क्योंकि ये फुहारें थीं भीनी
मेरे कोट पर पानी के अनगिनत बोसे थे
मुझे लगा सर्दियाँ फिर से लौट आईं
मैंने झट से छाता ताना,
जो नहीं था
मुझे याद आया
मेरे सर पर तो फ़रवरी का आसमान
एक छाते की तरह
पहले से तना था.

 

 

 

फ़रवरी-10

यह फ़रवरी की एक ख़ुश्क रात है
कम्बल से बाहर हैं मेरे पैर
जैसे हैसियत से अक्सर बाहर चली जाती है मेरी ज़बान
अनुभव का एक संसार मेरी करवटों में दफ़्न है
जिसे मैं फ़िलवक़्त नहीं उटकेरना चाहता
लेकिन होंठों से गर्म मेरे कान
मुझे किसी आवाज़ पर
मुतवज्जेह करना चाहते हैं
लेकिन वह आवाज़ मुझे बिल्कुल सुनाई नहीं दे रही
जबकि गली के नुक्कड़ से उठती चली आ रही है
इस रात की ख़ामोशी में
एक कुत्ते के भौंकने की आवाज़…

 

 

 

फ़रवरी-11

इस फ़रवरी में
एक और उम्मीद टूट गयी
एक नौकरी लगते-लगते रह गयी
जूतों में दो-दो सूराख़ हो गए
मेरी बयाज़ कहीं गिर गयी
एक ट्रेन छूट गयी
एक कविता मुझसे खो गयी
एक सपने में मेरा पैर अटक गया

फिर भी इस फ़रवरी से मुझे कोई शिकायत नहीं
आख़िर वह एकसाथ किस-किस का ख़याल रखती.

 

 

 

फ़रवरी-12

साल का पहला महीना
जनवरी को नहीं
बल्कि फ़रवरी को होना था
आख़िर बिना बसंत के आये
कोई साल
शुरू भी कैसे हो सकता है ?

 

 

 

फ़रवरी-13

नशेब में मोरनियों का झुण्ड
विचर रहा था
झाड़ियों में कुछ बैंजनी रंग के
जंगली फूल खिले थे

और दिन इतना मेहरबान
इतना मेहरबान
इतना मेहरबान था
कि फ़रवरी की धूप भी
फूल की तरह खिली थी…

 

 

 

फ़रवरी-14

यूँ तो यह पूरा महीना ही
फ़रवरी ने
प्रेम के नाम कर दिया था
लेकिन चौदह तारीख़ का ख़ास महत्व था
यह उसे मनाने वालों से अधिक
न मनाने देने वालों का दिन था

ज़ाहिर है मेरा नाम
विधर्मियों और मनाने वालों की ही लिस्ट में था
इसलिए मैं पूरा दिन घर से बाहर भी नहीं निकला.

 

 

 

फ़रवरी-15

फ़रवरी के सितार पर
यकायक बज पड़ा था
राग बसंत
जब पीली पगड़ियों और पीले फूलों से भर चुकी थी
औलिया की दरगाह
जहाँ कोमल ऋषभ में,
उतर आया था दिन
और तीव्र मध्यम में,
सिमट आयी थी शाम
साथ ही शुद्ध गंधर्व में,
बिखर गया था रात का जादू

उस दिन इबादत
ख़ुश्बू का ही दूसरा नाम था.

 

 

फ़रवरी-16

फ़रवरी की सुब्हें इतनी हल्की, इतनी उजली
जैसे सफ़ेद मुलायम पंखें हों
इन्हें सुब्हें कहना भी ज़्यादती लगती
आख़िर पंखों को कोई सुब्हें कैसे कह सकता है ?

 

फ़रवरी-17

फ़रवरी में एक मज़ार तोड़ दी गयी
एक बस्ती जला दी गयी
एक बूढ़े को थप्पड़ों पर तौल दिया गया
घरेलू हिंसा को हड्डियाँ टूटने तक की छूट दे दी गयी
एक मुल्क को नक़्शे से मिटा दिया गया
ख़ुदकुश हमले में नमाज़ियों के परखच्चे उड़ गए
एक काफ़िर को ज़िंदा जला दिया गया

एक संप्रभु राष्ट्र के प्रधानसेवक ने
अपने ही किसानों का भविष्य
सबसे ताक़तवर देश के सामने
मुफ़्त में गिरवी रख दिया

दुनिया एक युद्धविराम के बाद
अगले युद्ध की तैयारी में शिद्दत से जुट गई

इस सारी हिंसा के जवाब में
बसंत ने बस इतना किया
कि पूरे भूमण्डल को
फूलों से ढक दिया
क्या यह उसकी भरपाई का जुदागाना अंदाज़ था
या उसका गहन अपराधबोध ?

 

 

फ़रवरी-18

डहेलिया के रंग-बिरंगे फूलों से
क्यारियाँ ढकी थीं
लगता था जैसे बसंत
सिर्फ़ इनपर ही उतरा है
लेकिन बसंत उस क्यारी में भी उतरा था
जहाँ एक फूल अभी स्वप्न से टूट कर
धरती पर आने के लिए बेक़रार था…

 

 

फ़रवरी-19

फ़रवरी ! फ़रवरी ! मुझे झूला झुलाओ
फ़रवरी ! फ़रवरी ! मुझे पंखा डुलाओ
फ़रवरी ! फ़रवरी ! मुझे उड़ना सिखाओ
फ़रवरी ! फ़रवरी ! मुझे सुगंध से नहलाओ
फ़रवरी ! फ़रवरी मुझे रंगों की बारिश दो
फ़रवरी ! फ़रवरी ! मुझे सुंदर सपने दिखाओ

फ़रवरी ! मेरे पास आओ, मेरे पास आओ
मुझे प्रेम-कविता लिखना सिखाओ !

 

 

फ़रवरी-20

मैंने क़लम कान पर नहीं रखा
मैंने कोई भेस नहीं बनाया
मैंने लेख नहीं लिखा
मैंने किताब नहीं पढ़ी
मैं रोता नहीं रहा
मैंने बुरे सपने नहीं देखे
मुझे पहली बार डर नहीं लगा
मैं पूरी रात कविता लिखता रहा
क्योंकि ये फ़रवरी की रात थी.

 

अदनान कफ़ील दरवेश
बलिया (उत्तर प्रदेश)

ठिठुरते लैम्प पोस्ट तथा नीली ब्याज़ कविता संग्रह राजकमल से प्रकाशित.
कविताओं के अंग्रेज़ी,  स्पेनिश, मराठी, कन्नड़, बांग्ला तथा उड़िया अनुवाद प्रकाशित हुए हैं.

‘भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार’ (2018), ‘रविशंकर उपाध्याय स्मृति कविता पुरस्कार’ (2018), ‘वेणुगोपाल स्मृति कविता पुरस्कार’ (2019-2020) से सम्मानित
thisadnan@gmail.com

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Comments 1

  1. ब्रज श्रीवास्तव says:
    36 minutes ago

    फरवरी पर अदनान की उम्दा कविताओं को पढकर सुखद लगा कि इस विषय पर इतने कोणों से देखकर व्यंजित किया जा सकता है।

    Reply

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