हमने ‘अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे’ नहीं उठाये
रविभूषण
यह एक विचित्र संयोग है कि मुक्तिबोध (13 नवम्बर 1917-11 सितम्बर 1964) की ही नहीं स्वाधीन भारत की भी महान कविता ‘अंधेरे में’ के प्रकाशन का अर्धशती वर्ष और बहुमत प्राप्त कर भाजपा के केंद्र में सत्तासीन होने का वर्ष एक ही है 2014. ‘अंधेरे में’ कविता की व्याख्या और आलोचना निरंतर जारी है. इस कविता के विविध पक्षों और मुक्तिबोध पर नए-नए ढंग से विचार अब भी हो रहा है. पिछले वर्ष प्रणय कृष्ण की पुस्तक ‘मुक्तिबोध साहित्य का ‘गति-पथ’ (साहित्य भंडार, प्रयागराज, 2024) आई और अभी समकालीन कवि ज्योति शोभा का लेख ‘मुक्तिबोध और दोस्तोयेव्स्की : अंधेरा और आस्था’ हिंदी की नई वेब पत्रिका ‘सम्मुख’ (चंदन पांडेय ) में 4 नवंबर को प्रकाशित हुआ है. दोस्तोयेव्स्की (11 नवंबर 1821 से 9 फरवरी 1881) का अंतिम और आठवां उपन्यास ‘ब्रदर्स करमाजोव’ (एलिशा) धारावाहिक रूप से ‘द रसियन मैसेंजर’ में जनवरी 1879 से नवंबर 1880 तक प्रकाशित हुआ था. ‘ब्रदर्स करमाजोव’ का नायक ‘एलेक्सी फ्योदोरोविच करमाज़ोव (एलोशा)’ है. दोस्तोयेव्स्की ने एलिशा को ही नायक बताया है.
‘अंधेरे में’ कविता के काव्यनायक को श्रीकांत वर्मा ने ‘बेचैन, खंडित,व्यग्र हिंदुस्तान कहा है’.‘अंधेरे में’ की पृष्ठभूमि का भी महत्व है. रचना महत्वपूर्ण है, पर रचना की पृष्ठभूमि या उसके प्रेरक तत्वों पर भी विचार की जरूरत है. ‘अंधेरे में’ कविता के प्रेरक तत्वों और उसकी पृष्ठभूमि पर विस्तार से विचार कम हुआ है.
इस कविता की पृष्ठभूमि में अधिसंख्य आलोचकों ने नागपुर के एँप्रेस मिल गोलीकांड को याद किया है. नागपुर एँप्रेस मिल की स्थापना भारतीय उद्योगपति जमशेदजी टाटा (3 मार्च 1839-19 मई 1904) ने 1 जनवरी 1877 को की थी. ब्रिटिश भारत में 1 जनवरी 1877 का महत्व इसलिए है कि ब्रिटिश संसद द्वारा ‘रॉयल टाइटल्स अधिनियम 1876’ के पारित होने के बाद रानी विक्टोरिया (24 मई 1819-22 जनवरी 1901) को ‘भारत की महारानी’ घोषित किया गया. 1 जनवरी 1877 को भारत के वायसराय लॉर्ड लिटन ने दिल्ली के ‘कोरोनेशन पार्क’ में दिल्ली दरबार आयोजित किया था जिसका उद्देश्य महारानी विक्टोरिया को ‘कैसर-ए-हिंद’ (भारत की साम्राज्ञी) घोषित करना था. इस घोषणा के बाद ही ब्रिटिश ताज के शासन को आधिकारिक मान्यता मिली.
1 जनवरी 1877 के दिल्ली दरबार का ऐतिहासिक महत्व है क्योंकि इसी के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से सत्ता ब्रिटिश सरकार को हस्तांतरित की गई. उस समय को समझने के लिए एकमात्र प्रमुख स्रोत ब्रिटिश राज के नौकरशाह इतिहासकार जेम्स तलबोएस व्हीलर (दिसंबर 1824-13 जनवरी 1897) की पुस्तक ‘द हिस्ट्री ऑफ द इंपीरियल असेंबलेज ऐट दिल्ली, हेल्ड ऑन द फर्स्ट जनवरी 1877’ है. इस पुस्तक का प्रकाशन भी 1877 में ही हुआ.
नागपुर के एम्प्रेस मिल का नामकरण विक्टोरिया के ‘एम्प्रेस ऑफ इंडिया’ बनने के सम्मान में किया गया था. जमशेदजी टाटा की कंपनी ‘द सेंट्रल इंडिया स्पिनिंग वीविंग एँड मैन्युफैक्चरिंग कंपनी’ के नाम से 15 लाख की पूंजी से आरंभ की गई थी इस कंपनी की ओर से 107 पृष्ठों की एक पुस्तक 1927 में प्रकाशित हुई “ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ़ द एम्प्रेस मिल्स नागपुर स्टार्टेड वर्क फर्स्ट जनवरी 1877, गोल्डन जुबली, फर्स्ट जनवरी, 1927” एम्प्रेस मिल की नागपुर में पाँच इकाइयाँ थी. एम्प्रेस मिल में मजदूरों ने 1956 में एक बड़ी हड़ताल की. मिलों में प्रबंधन ने तालाबंदी की. श्रमिकों के विरोध -प्रदर्शन और हड़ताल के समय मुक्तिबोध ‘नया खून’ के लिए रिपोर्टिंग करने हेतु वहाँ मौजूद थे. वहाँ मजदूरों पर लाठी चार्ज हुआ, उन पर गोलियां चलाई गईं. इस गोली कांड को मुक्तिबोध ने अपनी आंखों से देखा था. नागपुर रेडियो में मुक्तिबोध के सहकर्मी रहे अनिल कुमार ने अपने स्मृति लेख (मोतीराम वर्मा की पुस्तक ‘लक्षित मुक्तिबोध’ में) में यह लिखा है कि ‘अंधेरे में’ कविता की पृष्ठभूमि एम्प्रेस मिल के गोली कांड से संबंधित है. मुक्तिबोध के साथ वहाँ उस समय ‘नवभारत’ के रिपोर्टर शैलेंद्र कुमार भी थे.बाद में “शैलेंद्र को अनुमान हुआ, मुक्तिबोध के भीतर गोलीकांड को लेकर कोई संवेदनात्मक प्रतिक्रिया चल रही है. संभवतः वह कविता का रूप ले ले. मुक्तिबोध से उन्होंने कहा ‘महागुरु’, कविता लिखोगे? मुक्तिबोध मौन रहे. उनके भीतर गंभीरता पसर गई थी. शैलेंद्र एकटक मुक्तिबोध का मुंह ताकते रहे … कुछ क्षण सोच कर मुक्तिबोध ने उत्तर दिया-“ठहरो, थोड़ा पकने दो” (1)
‘अंधेरे में’ कविता का बीज इस घटना के बाद पड़ा और कविता मुक्तिबोध के भीतर कई वर्ष तक पकती रही. उनके सामने स्वाधीन भारत था. अनिल कुमार के कुरेदने पर पता चला ‘कविता अण्डर रिपेयर’ पड़ी है. मुक्तिबोध ने उसे ‘एक टीन की पेटी’ में डाल रखा था. उन्होंने कहा “फर्स्ट राइटिंग में क्या होता है, अनिल कुमार कि जो हम कहना चाहते हैं न, वह पहले झटके में छूट जाता है. रिपेयर के लिए जब उठाते हैं, तो रूप ही बदल जाता है. संश्लिष्टता के कारण लंबाई आ जाती है, गहराई भी” (2) स्वाधीन भारत में मुक्तिबोध केवल सत्रह वर्ष जीवित रहे. उनके सामने लोकसभा के केवल तीन चुनाव (1952, 1957, 1962) हुए थे.
‘अँधेरे में’ कविता का बीज-वपन नागपुर में हुआ और कविता पूरी हुई राजनादगाँव में. 10 जून 1958 को उन्होंने दिग्विजय कॉलेज, राजनांदगाँव में हिन्दी के लेक्चरर पद के लिए साक्षात्कार दिया था. लगभग 18 वर्ष पहले उन्होंने 1940-41 में एम. ए. कर लेक्चरर बनने का सपना देखा था. नागपुर विश्वविद्यालय से 50 के दशक के आरंभ में उन्होंने एम. ए. किया था. 18 जुलाई 1958 को वे दिग्विजय कॉलेज में हिंदी के लेक्चरर नियुक्त हुए. लेक्चरर बनने से पहले वह हिंदी के प्रमुख कवि और चिंतक और आलोचक के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे. मुक्तिबोध केवल कवि नहीं हैं. उनके कवि रूप पर जितना अधिक विचार हुआ है, उतना उनके अन्य रूपों (आलोचक, कहानीकार, निबंधकार, उपन्यासकार, पत्रकार, स्तंभकार और चिंतक-विचारक) पर नहीं.
‘अंधरे में’ कविता की पृष्ठभूमि में नागपुर के एम्प्रेस मिल के गोलीकांड के बाद कहीं अधिक महत्त्व उनकी पुस्तक ‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ पर मध्य प्रदेश सरकार द्वारा लगाई गई पाबंदी का है. ‘अंधेरे में’ कविता की कुछ पंक्तियां इस घटना से निश्चित तौर पर जुड़ी हुई हैं,जिधर शायद ध्यान नहीं दिया गया है. हरिशंकर परसाई (22 अगस्त 1924-10 अगस्त 1995) की मुक्तिबोध से घनिष्ठ आत्मीयता थी. मुक्तिबोध जबलपुर के जिस स्कूल में शिक्षक थे, उसी में बाद में परसाई भी शिक्षक रहे. 1956 में मध्य प्रदेश नया प्रांत बना. सरकार ने विद्यार्थियों के लिए पाठ्य-पुस्तकें तैयार करने का निर्णय लिया. प्रकाशक रघुवीर सिंह खन्ना को “1961 में मध्य प्रदेश के हायर सेकेंडरी कक्षाओं के स्कूली पाठ्यक्रम के लिए द्रुत पठन के अंतर्गत भारत के इतिहास और संस्कृति पर एक पुस्तक प्रकाशित करने का काम मिला था. पुस्तक लिखने के लिए उन्होंने परसाई से चर्चा की. परसाई ने मुक्तिबोध का नाम सुझाया.”(3)
२
1962 के आरंभ में परसाई राजनांदगांव आए थे. मुक्तिबोध और उनके बीच उस समय की राजनीति के संबंध में काफी बातें हुईं थीं. मुक्तिबोध और परसाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा भारतीय जन संघ को ‘भारत के लिए बहुत बड़ा खतरा’ मानते थे. उस समय आर एस एस और भारतीय जन संघ इतिहास को विकृत करने और शिक्षण संस्थानों को अपने मनोनुकूल करने की सामर्थ्य नहीं रखते थे. देवी शंकर अवस्थी (5 अप्रैल 1930-13 जनवरी 1968) ने अपने छात्र जीवन में ही ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की घातक कूटनीति’ (1951/52) पर विचार किया था और 1954 में भारतीय जनसंघ को ‘अत्यंत प्रतिगामी संस्था’ कहकर यह लिखा था-“उसने भारतीय राजनीतिक चेतना में एक बड़े खतरनाक तत्व को जन्म दिया है, वह तत्व है, अप्रत्यक्ष रूप से अधिनायक तंत्र में आस्था उत्पन्न करना.” इसके पहले विजयदेव नारायण शाही (7 अक्टूबर 1924-5 नवंबर 1982) ने 3 फरवरी 1948 की डायरी में (गांधी की हत्या के बाद) यह लिखा था -“क्या इन शोक सभाओं में आंसू बहा-बहा कर वे भूल जाना चाहते हैं कि फासिस्ट सांप्रदायिकता का एक भयंकर देशव्यापी षड्यंत्र अपना जाल फैला रहा है? समस्त प्रगतिशील शक्तियों के लिए यह एक चुनौती है. मुझको तो दिख रहा है कि देश डांवाडोल है. आज हमें आगे बढ़कर हिंदू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से टक्कर लेनी चाहिए.” (4) पुनः 9 अक्टूबर 1948 की डायरी में शाही ने पूंजीपतियों के आगे नेहरू के ‘मत्था’ टेकने और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य के कांग्रेस में घुसने और दिन प्रतिदिन कांग्रेस के अधोगति प्राप्त रहने के बारे में लिखा.
मुक्तिबोध और परसाई की समान चिंताओं पर दोनों की जन्मशती बीत जाने के कई वर्ष बाद भी आलोचकों और ‘विशेषज्ञों’ ने अधिक विचार नहीं किया है. राजनांदगांव में 1962 में परसाई और मुक्तिबोध दोनों की पाठ्यक्रम की पुस्तक के संबंध में यह “राय थी कि समकालीन घटनाक्रम की दक्षिणपंथी व्याख्याएँ खतरनाक हो सकती है….”(5)
‘कामायनी : एक पुनर्विचार’ के प्रकाशन में परसाई की बड़ी भूमिका थी और वह प्रकाशक खन्ना की ओर से भारतीय इतिहास और संस्कृति पर हाई स्कूल के विद्यार्थियों के लिए पाठ्य पुस्तक लिखने का प्रस्ताव लेकर मुक्तिबोध के पास आए थे. परसाई चाहते थे कि “वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसी पुस्तक लिखी जाए जिससे विद्यार्थी भारतीय संस्कृति और इतिहास को सही-सही समझ सकें.” (6)
मुक्तिबोध ने पारिश्रमिक को ध्यान में रखकर यह कार्य अपने हाथ में ले लिया. इसके पहले, वे दो पाठ्य पुस्तक (सामाजिक अध्ययन और भूगोल की) तैयार कर चुके थे. 1962 तक भारतीय जनसंघ भारतीय राजनीति में प्रमुख नहीं था, पर वह धीमी गति से ही सही आगे बढ़ रहा था. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक शाखा के रूप में 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई थी. जिस समय कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी भी भारतीय जनसंघ को बड़ी शक्ति के रूप में नहीं देख रही थी, उस समय मुक्तिबोध ने “नागपुर में रहते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्य-शैली को नजदीक से देखा था और वे उस संस्था के भविष्य की शक्ति का आकलन कर रहे थे.” (7)
‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ (1962 ) पुस्तक की तैयारी में मुक्तिबोध ने रात-दिन श्रम किया. “दिग्विजय कॉलेज की लाइब्रेरी से उन्होंने किताबें जुटायीं और उनके अध्ययन में जुट गए. दिन-रात एक कर नोट्स लेते थे. पुस्तकों के कितने ही अंशों की प्रतिलिपियां कीं. उनके संदर्भ नोट किये. घटनाओं को कालक्रम में संजोने की योजना बनाई.” (8)
शान्ता मुक्तिबोध ने विनोद शर्मा को एक बातचीत में बताया-“कितनी मेहनत की थी उन्होंने, उसके पीछे. रात-दिन घर कागज से भरा रहता. कितनी किताबें पढ़ते. लिखते,फिर फाड़ते, फिर लिखते, फिर फाड़ते.” (9)
मुक्तिबोध ने 500 पृष्ठों की पुस्तक तैयार की. विद्यार्थियों की पाठ्य पुस्तक के लिए यह पृष्ठ संख्या कहीं अधिक थी. प्रकाशक खन्ना परेशान हुए. उन्होंने परसाई से बात की और परसाई ने मुक्तिबोध से. परसाई ने इस पुस्तक का संपादन किया और पूरी पुस्तक डेढ़ सौ पृष्ठों की हो गयी. ‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ का प्रकाशन जुलाई 1962 में हुआ. पुस्तक की पैंतीस हजार प्रतियां छपी थीं. मध्य प्रदेश के हाई स्कूल के विद्यार्थियों की संख्या कहीं अधिक थी.
3
मुक्तिबोध के इतिहास-चिंतन और इतिहास- दृष्टि पर आज अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि यह चिंतन संप्रदायवादी तत्वों के इतिहास की समझ का विरोधी है. वह अपने समय में ‘संप्रदायवादी शक्तियों के वर्चस्व’ को देख रहे थे. ‘ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में शुद्ध रक्तवादी सांप्रदायिक दृष्टि की प्रधानता’ को समझ रहे थे. संप्रदायवाद नहीं फैले, इसके लिए जरूरी है सम्यक् शिक्षा -दीक्षा, वैज्ञानिक चिंतन और औद्योगीकरण. हिंदी प्रदेश में इन तीनों में से एक भी संभव नहीं हुआ और आज हिंदी प्रदेश संप्रदायवादियों का गढ़ है. मुक्तिबोध के लिए शिक्षा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. ‘विद्या-दान’ से अधिक महत्व ‘दृष्टि-दान’ का था. “विद्यार्थियों को दृष्टि प्रदान करनी होगी. अपना हृदय विशाल करके उनके सामने रखना होगा, अपना सारा जीवन-विवेक, अपने सारे जीवनानुभव का निचोड़ उनके सामने रखने से ही संभवतः कुछ काम हो सकता है. यह दृष्टि-दान विद्यार्थी की पात्रता पर भी निर्भर है… शिक्षा के क्षेत्र में जहाँ-जहाँ भी जो-जो असंगतियां और त्रुटियां हैं उन्हें दूर करने के लिए संगठित रूप से प्रयत्न करने होंगे-चाहे वे पाठ्य पुस्तकों के संबंध में हों, पाठ्यक्रम के संबंध में हों तथा ऐसी ही दूसरी बातें हों.” (10)
‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ पुस्तक का प्रकाशन जुलाई 1962 में हुआ. हायर सेकेण्डरी के लिए मुक्तिबोध ने यह पुस्तक तैयार की की थी. भारत के इतिहास के बडे काल-खंड-प्राचीन युग से लेकर आधुनिक युग को एक पुस्तक में समेटना आसान काम नहीं था. इस पुस्तक का आज भी अध्ययन जरूरी है. इसमें हम उनके गहन अध्ययन, चिंतन-मनन, विवेचन- विश्लेषण को देखते हैं. ‘मध्य प्रदेश शासन के स्कूली शिक्षा विभाग की पाठ्य-पुस्तक समिति’ के समक्ष कई प्रकाशकों द्वारा प्रकाशित पुस्तकें प्रस्तुत की गयीं थीं, जिनमें “जांच-परख के बाद-मुक्तिबोध की पुस्तक स्वीकृत हुई.”
अन्य प्रकाशकों का दुःखी और निराश होना स्वाभाविक था. जिन अन्य लेखकों ने पुस्तक तैयार की थी, उनकी इतिहास-दृष्टि भिन्न थी. भारत के इतिहास-लेखन पर कई विचारधाराए आरंभ से ही रही हैं. स्वाधीन भारत में दक्षिणपंथी विचारधारा और प्रगतिशील विचारधारा की टकराहट हुई. पुस्तक प्रकाशन के पहले ‘युगधारा’ अखबार ने पुस्तक की प्रशंसा की थी, पर स्वीकृत हो जाने के बाद वह पलट गया. प्रकाशक, लेखक और दक्षिणपंथी संगठन (आरएसएस,बीजेपी) की जो त्रयी विरोध में बनी, उसमें मुख्य भूमिका भारतीय जनसंघ और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों-व्यक्तियों की थी. पुस्तक-प्रकाशन के मात्र एक महीने बाद 31 अगस्त 1962 को जबलपुर के नागरिकों की एक सभा महावीर वाचनालय में श्री व्योहार राजेंद्र सिंह जी के सभापतित्व में हुई, जिसमें वक्ताओं ने माध्यमिक शिक्षा परिषद की पाठ्य पुस्तक समिति द्वारा स्वीकृत हिंदी और अंग्रेजी पाठ्य पुस्तकों में भारतीय संस्कृति और इतिहास को तोड़-मरोड़ कर छपे गलत तथ्यों का वक्ताओं ने घोर विरोध किया.” (11)
पाठ्य पुस्तक समिति के समक्ष मुक्तिबोध की पुस्तक के अलावा दो और पुस्तकें-‘स्वर्ण पुष्प’ और अंग्रेजी की पुस्तक ‘ग्रेट पर्सनेलिटीज’ प्रस्तुत की गई थी. मुक्तिबोध की पुस्तक स्वीकृत हुई थी. राज्य भर में पुस्तक की बिक्री से प्रकाशक से बड़ा लाभ था, जिससे अन्य प्रकाशक वंचित हो रहे थे. मुक्तिबोध की पुस्तक के खिलाफ विरोध आरंभ हुआ.
‘भारतः इतिहास और संस्कृति’ राजनैतिक इतिहास की पुस्तक नहीं है. मुक्तिबोध ‘राजनैतिक प्रक्रिया’ से कहीं अधिक ‘सांस्कृतिक प्रक्रिया’ को महत्व देते थे. “संस्कृति समाज की मूल जीवन-दायिनी शक्ति है, राजनैतिक शक्ति से भी अधिक भारतीय समाज इसका प्रमाण है. राजनैतिक दासता सदियों रही; पर संस्कृति की शक्ति के कारण यह जाति जीवित रही और विकास करती गयी.” (12)
मुक्तिबोध ने ‘भारतीय संस्कृति’ में ‘समन्वय की प्रक्रिया’ को महत्वपूर्ण माना और ‘सांस्कृतिक समन्वय की शक्ति’ पर ध्यान दिया. वे किशोरों के लिए ‘सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की जानकारी’ आवश्यक मानते थे. “इससे वे इस देश की परंपरा को सही ढंग से समझ सकेंगे. उनकी भावनाओं का विस्तार होगा और वह उदारता का दृष्टिकोण अपना सकेंगे.” (13)
31 अगस्त 1962 से जबलपुर से शुरू हुआ यह विरोध एक महीने के भीतर ही मध्यप्रदेश के अनेक हिस्सों में फैल गया. मात्र दस दिन बाद 10 सितम्बर 1962 को मध्यप्रदेश जनसंघ कार्यकारिणी की बैठक में इस पुस्तक को पाठ्यक्रम से हटाने की माँग की गयी. भारतीय जनसंघ के तीन संस्थापक सदस्यों (श्यामा प्रसाद मुकर्जी, बलराज मधोक और दीन दयाल उपाध्याय) में से एक दीनदयाल उपाध्याय (25 सितम्बर 1916-11 फरवरी 1968) राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के चिन्तक और संगठनकर्ता थे. 1937 में ही वे संघ के सम्पर्क में आये थे, आजीवन उसके प्रचारक रहे. श्यामा प्रसाद मुकर्जी ने उनके बारे में कहा था- “अगर मेरे पास दो दीनदयाल होते, तो मैं भारत की राजनीति का नक्शा बदल देता.”
दीनदयाल उपाध्याय 1951 से 1967 तक भारतीय जनसंघ के महासचिव थे. उन्होंने मुक्तिबोध की पुस्तक के खिलाफ जारी बयान में पुस्तक को ‘लेखक के विकृत मस्तिष्क की उपज’ कहा और यह माना कि “पुस्तक पढ़ने के बाद छात्रों में जीवन के श्रेष्ठतम मूल्यों के प्रति निष्ठा के स्थान पर अनास्था ही उत्पन्न होगी” और “पुस्तक विभिन्न मतावलंबियों की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने वाली है.” (14) पुस्तक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन राज्यव्यापी था. जबलपुर और भोपाल में ही नहीं रायपुर, दुर्ग और राजनांदगांव तक यह विरोध-प्रदर्शन फैल चुका था. विरोध में पर्चे बांटे गये. “रायपुर में जनसंघ ने मुक्तिबोध के विरुद्ध प्रस्ताव पास किया और उन पर तरह-तरह के आरोप लगाए गए. दुर्ग में पर्चे बांटे गए. उसके बाद राजनांदगांव में उन्हें बहुत सताया गया. दीवारों पर ‘मुक्तिबोध मुर्दाबाद’ के नारे लिखे जाते थे. उनके संघी छात्र ही उन्हें घेरते थे और उन्हें शारीरिक क्षति पहुंचाने की भी कोशिश की.” हरिशंकर परसाई से श्याम सुंदर शर्मा की इस बातचीत को ‘मैं अधूरी दीर्घ कविता’ में उद्धृत किया गया है. (15)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अंग्रेजी साप्ताहिक पत्र ‘ऑर्गेनाइजर’ के संपादक केवल राम रतन मल मलकानी (के आर मलकानी -19 नवंबर 1921-27 अक्टूबर 2003) के समय इस पत्र में मुक्तिबोध के विरोध में एक लेख लिखा गया और उनके विचारों पर आक्रमण भी किया गया. मलकानी ऑर्गेनाइजर के 35 वर्ष तक संपादक रहे (1948-1983) और जिस समय उनके पत्र में मुक्तिबोध के खिलाफ लिखा गया, उस समय वे (1961-62) हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के ‘फेलो’ थे. पुस्तक और उनके खिलाफ किए गए प्रदर्शन और आंदोलन ने उनके “भीतर भय और असुरक्षा की भावना पैदा कर दी थी. वे बेहद उत्तेजित थे …इस पूरे कांड को व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखकर वह बहुत त्रस्त थे. कहते थे यह नंगा फ़ासिज़्म है. लेखक को लोग घेरें, शारीरिक क्षति की धमकी दें. इधर सरकार सुनने तक को तैयार नहीं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जा रही है. गला दबाकर आवाज घोंटी जा रही है.” (16)
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‘अंधेरे में’ कविता की पृष्ठभूमि पर विचार के क्रम में ‘भारतः इतिहास और संस्कृति’ पर आज अधिक विचार की जरूरत है. राजेश जोशी ने इस कविता को ‘स्वाधीनता के बाद के समय या नेहरू युग का ही क्रिटिक नहीं’ माना है. (17) अपने लेख में राजेश जोशी ने मध्य प्रदेश सरकार द्वारा मुक्तिबोध की पुस्तक को प्रतिबन्धित किये जाने का उल्लेख करते हुए यह लिखा है-
“तात्कालिक घटनाओं का मुक्तिबोध की मनःस्थिति पर क्या प्रभाव पड़ा, इसकी खोज-खबर लेने से ज्यादा महत्त्वपूर्ण यह है कि मुक्तिबोध ने किस तरह घटनाओं के अर्थ और अभिप्रायों और उनसे जन्म लेती आशंकाओं को हमारे जनतंत्र के स्वरूप में विन्यसत आशंकाओं के मेटाफर में रूपांतरित करके एक बड़े अर्थ की सृष्टि की.” (18)
प्रतिबन्धित किये जाने के बाद मुक्तिबोध ने निश्चित रूप से ‘अंधेरे में’ कविता में कुछ संशोधन किया या जोड़ा होगा, जिसका कोई पुष्ट प्रमाण हमारे पास नहीं है. मुक्तिबोध अपनी प्रत्येक कविता की काट-छांट करते थे. नेमिचन्द्र जैन ने ‘अंधेरे में’ का संभावित रचनाकाल 1957 से 1962 तक माना है और यह लिखा है कि “इसका अंतिम संशोधन 1982 में हुआ.” (19)
आज जब दक्षिणपंथी शक्तियां तूफान मचाए हुए हैं तो ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’ पर अवश्य ध्यान देना चाहिए, विचार भी करना चाहिए.‘अंधेरे में’ कविता की कई पंक्तियां प्रतिबंधित की जाने वाली घटना के बाद ही लिखी गई हैं,इसका कोई पुष्ट प्रमाण हमारे पास नहीं है, पर उस घटना से कविता की कुछ पंक्तियां निश्चित रूप से जुड़ी हुई हैं. रमेश मुक्तिबोध और जयप्रकाश से की गई बातचीत के बाद भी मुझे यह पता नहीं लगा है कि इस लंबी कविता का कौन-कौन अंश कब-कब लिखा गया.
पहली बार हरिशंकर परसाई ने ही ‘अंधेरे में’ कविता को पुस्तक को प्रतिबंधित की जाने वाली घटना से जोड़ा. “‘अंधेरे में’ कविता का यही रचना काल है. उन दिनों मुक्तिबोध बहुत आशंका ग्रस्त थे. छोटी-छोटी बात उन्हें विचलित कर देती थी. चाबी जिस जेब में रखी होने की उन्हें याद थी अगर वह उस जेब में नहीं है, तो वे ऐसे सशंकित हो उठते थे जैसे कोई बड़ा षड्यंत्र उन्हें घेर रहा है. उन दिनों वे बहुत उत्तेजित होकर घंटों बहुत जोर से बोलते रहते थे. गले की नसें तनी हुई, साफ दिखती थी. कनपटी लौकती थी, दम भर आता था और वे ‘डबल स्ट्रांग’ चाय की मांग करते थे.”(20)
मुक्तिबोध की ‘ भारत : इतिहास और संस्कृति’ पुस्तक मौलिक नहीं है. उन्होंने जिन विद्वानों के ग्रंथों से सहायता ली थी उनका उल्लेख भी बाद में किया है. समग्र पुस्तक के लिए लिखी गई ‘भूमिका’ में उन्होंने लिखा-“यह ग्रंथ मौलिक नहीं है. जहाँ से जो मिला, लिया. दृष्टिकोण यही रखा की वस्तुस्थिति की समग्रता, जो हमारे जीवन को बनाती है उसे न छोड़ा जाये. उस समग्र ही के दृष्टिकोण से इतिहास-रचना, की जाय.” (21)
पुस्तक को प्रतिबन्धित करना सामान्य घटना नहीं थी. स्वाधीन भारत की पहली प्रतिबन्धित पुस्तक ब्रिटिश लेखक, उपन्यासकार और व्यंग्यकार ऑब्रे मेनन (22.4.1912- 13.2.1989) की ‘रामा: रीटोल्ड’ (1954) है, जो रामायण का एक पुनर्कथन है. व्यंग्यात्मक एवं धर्मनिरपेक्ष कथन. जवाहरलाल नेहरू ने 1955 में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप में प्रतिबंधित किया था. मुक्तिबोध की पुस्तक स्वाधीन भारत में, हिंदी की पहली प्रतिबंधित पुस्तक है. विधायकों का जो प्रतिनिधि-मंडल मुख्यमंत्री के पास पुस्तक को प्रतिबंधित करने की मांग लेकर गया था उसमें जनसंघ के साथ कांग्रेस के ही विधायक नहीं थे, कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक शाकिर अली भी थे. खंडवा से कांग्रेस के निर्वाचित विधायक भगवंत राव मंडलोई (15 दिसंबर 1892 -3 नवंबर 1977) तब मुख्यमंत्री थे. वे दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे और इस पद पर 12 मार्च 1962 से 29 सितम्बर 1963 तक थे. खान शाकिर अली खान (1904-1978) को ‘शेर-ए -भोपाल’ भी कहा जाता था. वे भोपाल के श्रमिक आंदोलन के नेता थे. एक्टिविस्ट, पत्रकार और ट्रेड यूनियनिस्ट भी थे. वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य अध्यक्ष भी थे. भोपाल को नए मध्य प्रदेश की राजधानी बनाने में उनकी बड़ी भूमिका थी. भोपाल विधानसभा से वे चार बार (1957, 1962, 1967 और 1972 ) निर्वाचित हुए थे. भोपाल के हमीदिया रोड पर उनके नाम पर अस्पताल है. 1952 में उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की राज्य शाखा का गठन किया था. मुक्तिबोध क्षुब्ध और तनाव ग्रस्त इसलिए भी थे कि कम्युनिस्ट पार्टी ने भी इस प्रतिबंध का विरोध नहीं किया था. “इस मुद्दे को लेकर लेखक बिरादरी के बीच भी किसी तरह की बेचैनी नहीं थी, जबकि मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का था, और सीधे रचनाकर्म की स्वतंत्रता से जुड़ा था.” (22)
इस घटना के बाद भोपाल में कम्युनिस्ट पार्टी के आमंत्रण पर उनके कार्यालय में जब मुक्तिबोध ने “पार्टी के मजदूर कार्यकर्ताओं और कुछ बुद्धिजीवियों और उर्दू शायरों के समक्ष कविता पाठ किया तब ध्यान से कविताएँ सुनने के बाद शाकिर अली ने खेद प्रकट कर इस मसले (प्रतिबंध) को विधानसभा में उठाने का आश्वासन दिया.” (23)
पुस्तक के खिलाफ हुई जबलपुर की पहली नागरिक-सभा के मात्र बीस दिन बाद पुस्तक पर पाबन्दी लगा दी गयी. उस समय केन्द्र और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी. 13 मई 1962 को राधाकृष्णन (5 सितम्बर1888-17 अप्रैल 1975) राष्ट्रपति हो चुके थे, जवाहर लाल नेहरू (14 नवम्बर 1889- 27 मई 1964) प्रधानमंत्री थे. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री भगवन्त राव मंडलोई थे और राज्यपाल थे वहाँ 14 जून 1957 से 10 फरवरी 1965 तक, भारत की संविधान सभा के सदस्य रह चुके हरि विनायक पाटस्कर (15 मई 1892 से 21 फरवरी 1970) राज्यपाल के आदेश और उनके नाम से 19 सितम्बर 1962 को मध्य प्रदेश शासन का राजपत्र (असाधारण) प्राधिकार से प्रकाशित (क्रमांक (154) भोपाल, बुधवार, दिनांक 19 सितम्बर 1962, भाद्र 28, शके 1884) हुआ, जिसमें जनसुरक्षा कानून के अन्तर्गत पुस्तक के विक्रय, वितरण, प्रसार, मुद्रण और प्रकाशन पर राज्य में पाबंदी लगा दी गयी. सरकार कांग्रेस की थी, फिर वह ‘अलोकतान्त्रिक और प्रतिक्रियावादी’ कैसे हुई? क्या इसके पीछे ‘फासीवादी दुष्प्रचार का सुनियोजित अभियान’ नहीं था? उस समय लोकसभा और मध्य प्रदेश विधानसभा में भारतीय जनसंघ की क्या स्थिति थी. लोकसभा के तीन चुनाव (1952, 1957, 1962) संपन्न हो चुके थे. जिसमें भारतीय जनसंघ धीमी गति से ही आगे बढ़ रहा था. पहले लोकसभा चुनाव में उसके 3, दूसरे में 4 और तीसरे में 14 प्रत्याशी जीते थे. वोट प्रतिशत भी बढ़ रहा था. 1952 में वह 3.06,1957 मैं 5.97 और 1962 में 6.44 प्रतिशत था.
1957 के दूसरे लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश से भारतीय जनसंघ के 21 प्रत्याशी थे, जिनमें से एक भी चुनाव नहीं जीत पाया. 6 प्रत्याशियों की जमानत भी जब्त हुई थी. उस समय मध्य प्रदेश में जनसंघ को 13.96 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे. 1962 के तीसरे लोकसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ को मध्य प्रदेश से तीन सीटें मिली थीं-देवास से हुकुमचन्द, खरगौन से रामचंद्र बड़े और मंदसौर से उमाशंकर त्रिवेदी. मध्य प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस के बाद भारतीय जनसंघ दूसरे प्रमुख स्थान पर था. 1957 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 232 सीट प्राप्त हुई थी और भारतीय जनसंघ को मात्र 10. उस समय भारतीय जनसंघ के 133 प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे. 1962 में स्थिति भिन्न थी. कांग्रेस की 90 सीट घट गई और वह 142 पर सिमट गयी. दूसरी ओर भारतीय जनसंघ की 31 सीट बढ़ गई और उसके विधायकों की संख्या 41 हो गयी. वोट प्रतिशत बढ़कर 16.66 हो गया. संभव है इन संख्याओं एवं आंकड़ों का महत्व न हो. यह जानना जरूरी है कि राज्यपाल हरि विनायक पाटस्कर ने “मुक्तिबोध से डेढ घण्टे बात की, उनकी बात ध्यान से सुनी. उनकी दलीलों से वे सहमत भी हुए. लेकिन इस मामले में कुछ भी करने से अपनी असमर्थता प्रकट की. कहा कि ‘मैं क्या कर सकता हूँ.’ (24)
राज्यपाल प्रशासनिक निर्णय नहीं ले सकते थे. यह अधिकार राज्य सरकार को था. इसके बाद मुक्तिबोध और परसाई मुख्यमंत्री निवास पहुंचे. “बाहर पोर्टिको के पास दोनो घण्टे भर खड़े रहे.” मुख्यमंत्री के बाहर निकलने पर मुक्तिबोध उनसे जब बात करने आगे बढ़े “मुख्यमंत्री ने तीखी नजरों से देखा. अभी मुक्तिबोध ने बात शुरू ही की थी कि मुख्यमंत्री ने बेरुखी से कहा-‘उसमें अब कुछ नहीं हो सकता.’ मुक्तिबोध ने इसरार किया-‘पर आप मेरी बात तो सुन लीजिए.’ मुख्यमंत्री ने दो टूक कहा-‘मेरे पास इतना वक्त नहीं है.’ मुझे जरूरी काम है.” रमेश मुक्तिबोध और राजेश जोशी द्वारा सम्पादित ‘तुममें मैं सतत् प्रवाहित’ में हरिशंकर परसाई के संस्मरण से ये पंक्तियां जयप्रकाश ने मुक्तिबोध की जीवनी ‘मैं अधूरी दीर्घ कविता’ के दूसरे खण्ड में उद्धृत की हैं.(25)
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मुक्तिबोध के कवि-कर्म पर जितना अधिक विचार हुआ है, उतना उनके आलोचना-कर्म पर नहीं और जितना उनके आलोचना-कर्म पर विचार किया गया है, उतना उनकी इतिहास दृष्टि पर नहीं. 1960 के दशक में जब यह सब घट रहा था, चौथे लोकसभा चुनाव (1967) के बाद नामवर सिंह ने इस चुनाव में स्वतंत्र पार्टी और भारतीय जनसंघ की जीत और राजाओं- जागीरदारों के राजनीति में एक बारगी प्रवेश से पैदा ख़तरे की चिंता ‘आलोचना’ के संपादकीय में प्रकट की थी. ‘आलोचना’ के उसी अंक में रामविलास शर्मा ने लिखा था “भारत में यदि फासिस्ट तानाशाही कायम होती है, तो इसकी जिम्मेदारी सबसे पहले वामपंथी पार्टियों पर होगी और इन वामपंथी पार्टियों में सबसे ज्यादा कम्युनिस्ट पार्टी पर.” 1960 का दशक की हिंदी कविता का महत्वपूर्ण दशक है.
यह शोध का विषय है कि मुक्तिबोध ने जिस तरह उस समय ‘अभिव्यक्ति के ख़तरे’ की पहचान की थी, क्या और किसी कवि ने की? उन्होंने नेहरू के समय में ही आसन्न संकट और फासीवाद की पहचान इसलिए भी की क्योंकि उनके साथ हादसा हुआ था, पुस्तक प्रतिबंधित करने से पहले सरकार ने उन्हें स्पष्टीकरण का कोई अवसर नहीं दिया था और उनके विरुद्ध शिक्षा विभाग ने भी कोई कदम नहीं उठाया था. शिक्षा मंत्री डॉ. शंकर दयाल शर्मा (19अगस्त 1918-26 दिसम्बर 1999) थे, जो बाद में देश के नवें राष्ट्रपति हुए. मुक्तिबोध को तब लगा “मेरी पुस्तक के विरोध में सरकार का यह क्रोध यह सूचित करता है कि मध्य प्रदेश में विवेक चेतना से प्रेरित अभिव्यक्ति के दिन गये. वैज्ञानिक शास्त्रीय दृष्टि की अभिव्यक्ति अब यहाँ अपराध घोषित हुई है, हो सकती है,आगे भी.” (26)
मुक्तिबोध की इतिहास-दृष्टि संघियों की इतिहास-दृष्टि के विपरीत है. यह एक वैज्ञानिक इतिहास दृष्टि है, जो उन्होंने कुछ इतिहासकारों और इतिहास शास्त्रियों से प्राप्त की थी. राज्यपाल को लिखे अपने पत्र में उन्होंने अपनी पुस्तक पर आलोचकों की आपत्तियों का उल्लेख करते हुए यह लिखा था कि प्रसिद्ध इतिहासकारों के जो ग्रंथ एम. ए., बी. ए. में पढ़ाए जाते हैं वहीं से उन्होंने विचार लिए हैं. “विभिन्न इतिहासकारों के विचारों को ही मैंने अपने शब्दों में प्रस्तुत किया है.” (27)
मुक्तिबोध ने इस पत्र में डॉ सुनीति कुमार चाटुर्ज्या, के. एम. पणिक्कर, राधा कुमुद मुकर्जी, डॉ. बी. जी. गोखले और डॉ. बी.एन. लूनिया की पुस्तकों का नामोल्लेख कर यह लिखा-
“मैंने किसी प्रकार का जातीय या वर्गगत विद्वेष फैलाने की दुर्भावना से यह पुस्तक नहीं लिखी, मेरा उद्देश्य तो भारत की सामासिक संस्कृति का साधारण परिचय विद्यार्थियों को देना था, जिससे भारत के एकीकरण में उनका सक्रिय सहयोग प्राप्त हो सके.” (28)
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान परिषद (एनसीईआरटी) की स्थापना 1 सितंबर 1961 को हुई थी. जिसका उद्देश्य ‘शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को सलाह और सहायता देना’ था. संभवतः इसी के बाद जबलपुर और नागपुर दोनों स्थानों से प्रकाशन कार्य करने वाले रघुवीर सिंह खन्ना को स्कूली पाठ्यक्रम के लिए पुस्तक प्रकाशित करने का काम मिला था. जुलाई 1962 में पुस्तक प्रकाशित हुई. अभी परसों 11 नवंबर को रोमिला थापर ने जे एन यू में ‘हिस्ट्री फॉर द यंग : व्हाइ एँड हाउ’ पर लेक्चर के क्रम में यह कहा है कि विद्वानों के लिए स्कूल के विद्यार्थियों के लिए पाठ्य-पुस्तक कठिन नहीं है, पर यह कठिन कार्य-भार है. मुक्तिबोध की इतिहास पुस्तक पर लिखते हुए अब रोमिला थापर के इस लेक्चर को अवश्य सुनना चाहिए.
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने आरंभ से ही अपने को सांस्कृतिक संगठन कहा है. उसके अनुसार भारतीय संस्कृति हिन्दू संस्कृति है. स्वाधीन भारत में उसने 1952 में गोरखपुर में अपना स्कूल ‘सरस्वती शिशु मंदिर’ खोला. उसके राष्ट्रीय संगठन ‘विद्यामन्दिर’ की स्थापना 1977 में हुई. उसने 1946 में ही कुरुक्षेत्र में ‘श्रीमद् भगवद् गीता विद्यालय’ का गठन किया. अब उसका अन्तरराष्ट्रीय विद्यालय भी है. एक दशक पहले ‘विद्या भारती’ द्वारा संचालित 12 हजार विद्यालय थे, जिसमें छात्रों की संख्या लगभग 32 लाख थी. मुक्तिबोध की पुस्तक ‘भारतः इतिहास और संस्कृति’ के प्रकाशन के पहले आर एस एस ने कई विद्यालय खुल चुके थे. मुक्तिबोध की पुस्तक पर आरोप लगाया गया कि वह ‘नैतिकता तथा भद्रता के विरुद्ध’ हैं. मुक्तिबोध ने राज्यपाल को लिखे पत्र के साथ 15 पृष्ठों का जो ‘संक्षिप्त स्पष्टीकरण’ भेजा था, उसमें उन्होंने लिखा था
“मुझे यह गहरी शंका है कि आन्दोलनकर्ता भारतीय इतिहास-क्रम को साम्प्रदायिक दृष्टिकोण से पुनर्रचित करना चाहते हैं. वे उसके स्वाभाविक विकास के स्वरूप को, फासिस्ट, शुद्ध रक्तवादी, आर्यवादी दृष्टिकोण से झुठलाना चाहते हैं…. वह इतिहास की ऐसी पुनर्रचना चाहते हैं, जिसमें उनके शुद्ध रक्तवादी,आर्यवादी, जातिवादी, साम्प्रदायिक- सांस्कृतिक दृष्टि को समर्थन मिल सके. यह एक भयानक प्रवृत्ति है, जिससे हर बुद्धिजीवी को, धर्मनिरपेक्ष राज्य को, वैज्ञानिक दृष्टि के अभ्युदय को, लोकतंत्र वादी विचारधारा को, मानव समानता के सिद्धांत और आदर्श को तथा भारतीय संस्कृति के स्वरूप को बहुत बड़ा खतरा है.” (29)
मुक्तिबोध को उसी समय यह लग गया था कि भारत की सामासिक संस्कृति ख़तरे में है. प्रश्न पाठ्य पुस्तक की सामग्री का था. दक्षिणपंथी शक्तियां भारत के इतिहास और संस्कृति को हिंदूवादी दृष्टि से देख रही थीं. सवाल बालकों, छात्रों के ‘मस्तिष्क की उर्वरा भूमि’ में बीज-वपन का था. यह शोध का विषय है कि 1962 के पहले क्या किसी इतिहासकार ने पाठ्य पुस्तक की सामग्री पर, भारत के इतिहास और संस्कृति पर मुक्तिबोध की तरह सोचा था या किसी ने ऐसी पाठ्यपुस्तक तैयार की थी, जैसी मुक्तिबोध ने की? मुक्तिबोध के इतिहास चिंतन या इतिहास दृष्टि पर आज कविता से कहीं अधिक विचार करने की जरूरत है क्योंकि यह चिंतन इतिहास की संप्रदायवादी दृष्टि के विरुद्ध है.
आज नेहरू का जैसा विरोध आर एस एस, भाजपा और नरेंद्र मोदी करते हैं, उसे मुक्तिबोध ने 1962 में ही भाँप लिया था-“विद्यार्थियों को अच्छे संस्कार देने के लिए ही आए दिन संप्रदायवादी तत्वों के घर पर और सभाओं में पंडित नेहरू पर आक्रमण किए जाते हैं, पंडित नेहरू की (Discovery of India) निंदा की जाती है, यह कहकर कि पंडित नेहरू भारतीय संस्कृति को नहीं जानते. शायद, इसीलिए संप्रदायवादी तत्व विद्यार्थी परिषद जैसी संस्थाओं को पनपाते हैं.” (30)
मुक्तिबोध के प्रशंसक, आलोचक और विशेषज्ञ उनके ऐसे कथनों पर अधिक ध्यान क्यों नहीं देते? मुक्तिबोध अपने समय में ‘सम्प्रदायवादी शक्तियों के वर्चस्व’ के साथ-साथ ‘ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में शुद्ध रक्तवादी सांप्रदायिक दृष्टि की प्रधानता’ भी देख रहे थे. सम्प्रदायवाद नहीं फैले इसके लिए जरूरी है सम्यक् शिक्षा-दीक्षा, वैज्ञानिक चिंतन और औद्योगीकरण, जो हिंदी प्रदेश में नहीं हुआ. नतीजा सामने है. हिंदी प्रदेश हिंदुत्ववादियों, संप्रदायवादियों और सांप्रदायिक तत्वों का गढ़ बन चुका है. क्या ‘अंधेरे में’ कविता में इस गढ़ और मठ को तोड़ने की बात मुक्तिबोध ने नहीं की है?
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मुक्तिबोध ने ‘भारतीय संस्कृति के वास्तविक स्वरूप’ को बहुत बड़ा खतरा की बात कही है. यह खतरा किससे था? आर एस एस को छोड़कर यह खतरा किसी से भी नहीं था. आर एस एस की साम्प्रदायिक समझ और दृष्टि की पहचान मुक्तिबोध ने 1962 में ही कर ली थी. संघ के इतिहासकारों ने इतिहास की अपने ढंग से व्याख्या की है. क्या आज भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय भारत की सामासिक संस्कृति के विकास के लिए कार्यरत है? मुक्तिबोध जब यह लिख रहे थे केंद्र और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय इन दोनों जगह में भाजपा की सरकार है. मुक्तिबोध ने ‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ में जैन तथा बौद्ध धर्म वाले अध्याय में ‘ब्राह्मण -प्रभुत्व -संपन्न व्यवस्था को चुनौती’ देने वाले ‘व्रात्य-गण’ पर विचार किया है. ‘व्रात्य’ वर्ण-संकर जातियों से उत्पन्न …’उग्र विचारों’ का प्रतिनिधित्व करने वाले थे. आर्यों का इनके प्रति अनादर भाव था. ‘व्रात्य’ विचारधारा ब्राह्मण विचारधारा और वैदिक परंपरा से अलग थी. “तत्कालीन पुरोहित वादी धर्म के लिए यह विचार समाज में उथल-पुथल मचा देने वाले थे, उसके लिए वे क्रांतिकारी थे.” (31)
आज ‘व्रात्य’ की अधिक चर्चा नहीं होती है. जो ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणवादी परंपरा तथा वेद और वैदिक परंपरा के विरोधी हैं उनमें भी बहुत कम लोगों का ध्यान इस समय ‘व्रात्य’ पर जाता है. आज भी जेनेदिक प्रकाशन द्वारा 1964 में प्रकाशित प्राचीन भारत के प्रसिद्ध इतिहासकार राधा कृष्ण चौधरी की पुस्तक ‘ द व्रात्याज इन ऐनशिएँट इंडिया’ सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. यह पुस्तक ‘चौखंभा संस्कृत स्टडीज वॉल्यूम 38’ के तहत प्रकाशित हुई थी. मुक्तिबोध ने की पुस्तक में ‘आर्य सभ्यता का आरंभ’,‘उत्तर वैदिक काल’ और ‘जैन तथा बौद्ध धर्म’ पर स्वतंत्र अध्याय हैं.
हिंदी प्रदेश में आज कर्मकांड कम नहीं है. कर्मकांड, अंधविश्वास और रूढ़ि पालन की व्रात्यों ने आलोचना की है. व्रात्यों ने ‘त्याग और करुणा को, इंद्रिय और आत्म शुद्धि को, सदाचार और प्रेम को, धर्म का मुख्य लक्षण’ माना है. आज सर्वत्र आर एस एस फैला हुआ है. आनंद तेलतुंबडे ने अभी हाल के अपने एक लेख (जनसंदेश टाइम्स, 30 सितंबर 2025 में अनूदित) में ‘आर एस एस की उत्पत्ति के जातिगत आयाम’ पर विचार किया है. उन्होंने इस संगठन को ‘दलित लामबंदी’ के विरुद्ध मानकर यह लिखा है कि नागपुर के चित पावन और देशस्थ ब्राह्मणों की चिंता में केवल हिंदू धर्म नहीं था, सामाजिक नियंत्रण के खोने का भी भय था.
हेडगेवार ने 1922-23 के भाषणों में जातिगत विभाजन को राष्ट्र को कमजोर करने से जोड़ा था. तेलतुम्बड़े आर एस एस के जन्म के पीछे ‘दोहरे खतरों से निपटने की रणनीति’ देखते हैं और यह मानते हैं कि इसने ‘संभावित जाति-क्रांति को रोकने की कोशिश की.” ब्राह्मणवाद के विरुद्ध सदैव आवाज़ें उठती रही हैं, पर व्रात्य-सभ्यता अथवा उनके दर्शन पर अधिक ध्यान नहीं दिया जाता.
व्रात्यों ने वैदिक कर्तव्यों का पालन नहीं किया. इनका उल्लेख ‘अथर्ववेद’,‘महाभारत’,‘अर्थशास्त्र’, ‘मनुस्मृति’ ‘आपस्तंब’ में है. व्रात्यों के सामाजिक जीवन और इतिहास पर भीमराव अंबेडकर (14 अप्रैल 1891-6 दिसंबर 1956) ने ‘शुद्र और प्रतिक्रांति’ में विचार किया है. मगध का उत्थान और उसकी सामाजिक सांस्कृतिक भूमिका व्रात्यों से, व्रात्य-सभ्यता से जुड़ी हुई है. भारत के बाहर व्रात्य पर कार्य जारी है. जर्मन भारतविद जैकब विल्हेम हाउ (4.4.1881-18.2.1962) की पुस्तक ‘Der vratiya’,1927 में प्रकाशित हुई थी. प्राचीन भारत के अध्ययन-लेखन में व्रात्य की मौजूदगी सदैव रहेगी. स्टॉकहोम विश्वविद्यालय में, धर्म के इतिहास पर कार्यरत क्रिस्टोफर ए एफ एँड होलम का लेख ‘रिसेंट स्टडीज ऑन द एनसिएँट इंडियन व्रात्य’ (इलेक्ट्रॉनिक जर्नल ऑफ़ वैदिक स्टडीज, वॉल्यूम 24, संख्या एक, 2017) यह बताता है कि किस तरह व्रात्यों पर नया अध्ययन जारी है.
पश्चिम में वैदिक साहित्य में व्रात्य-संस्कृति पर काम करने वालों में इटली की यूनिवर्सिटी आफ कैगलिअरी में संस्कृत की 56 वर्षीय प्रोफेसर तिजियाना पौनटिल्लो प्रमुख हैं. उन्होंने क्रिस्टीना बिगनामी, मौरेनो डोरे और एँलेना मोरेनो के साथ ‘द वौलेटाइल वर्ल्ड ऑफ सावरेंटी : द व्रात्या प्रॉब्लम एँड किंगशिप इन साउथ एशिया.’ तीन वर्षों के रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत संपादित की है (2015). यहाँ यह उल्लेख भी जरूरी लग रहा है कि 28 जून से 2 जुलाई 2015 तक छह दिनों का बैंकॉक (थाईलैंड) में जो 16 वां विश्व संस्कृत सम्मेलन हुआ था, उसमें ‘व्रात्या कल्चर इन वैदिक रिसोर्सेज’ पर पढ़े गए पेपर्स में से कुछ का चयन कर तिजिआना पौन टिल्लो ने मौरेने डोरे और इलिनोइस यूनिवर्सिटी में भाषा विज्ञान और संस्कृत के एमेरिटस प्रोफेसर हाँस हेनरिक हॉक के साथ मिलकर पुस्तक संपादित की ‘व्रात्या कल्चर इन वैदिक सोर्सेज : सिलेक्टेड पेपर्स’(2016).
व्रात्य-परंपरा या व्रात्य-संस्कृति पर यह सब लिखना अकारण नहीं है क्योंकि इस समय हिंदी में ब्राह्मणवाद के विरोधी इस ओर ध्यान नहीं देते. मुक्तिबोध ने अपनी पुस्तक में थोड़ा ही सही, इस पर विचार कर इतिहास को उसकी समग्रता में देखा. उन्होंने अपने पर हुए आक्रमण को अपनी इतिहास-दृष्टि पर आक्रमण माना. “यह हमला असल में भारत के मान्य इतिहासविदों पर है जिन्होंने संकुचित राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक भावधारा से हटकर शुद्ध रक्तवाद और आर्य श्रेष्ठता के सिद्धांत की उपेक्षा कर, उस सिद्धांतों को असंगत समझ भारतीय इतिहास का वास्तविक विकास-क्रम और वास्तविक विकास स्वरूप प्रस्तुत किया.” (32) उन्होंने ‘भारत के समस्त सद्भावनापूर्ण व्यक्तियों से अपील’ की कि “वे केवल इस संप्रदायवाद की निंदा करके ही रह न जाएँ,वरन वास्तविक मानवतावादी, मानव सामानतावादी, विश्ववादी दृष्टि का, हमारी पिछड़ी हुई जनता में प्रचार और प्रसार करें,तभी वह इस संप्रदायवादी आप्लावन से बच सकेंगे और जनता को बचा सकेंगे.” (33)
1964 के बाद देश में खतरा बढ़ता ही जा रहा है. 2014 के बाद अब यह खतरा सर्वत्र है. हमने हस्ताक्षर अभियान चलाया, बार-बार कहा कि लोकतंत्र और संविधान ख़तरे में है,फासीवाद आ चुका है,पर इसे नष्ट करने के लिए क्या हमने सचमुच ख़तरे उठाये? मुक्तिबोध ‘आदमी से कविता की ओर’ (क. प. सारथि) गये, कविता से आदमी की ओर नहीं. आज ‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ के गंभीर पाठ की अधिक जरूरत है क्योंकि आर एस एस और भाजपा भारत के इतिहास और संस्कृति का ‘हिंदुकरण’ करने के लिए रात दिन कार्यरत हैं. मुक्तिबोध ने राज्यपाल को लिखे पत्र के साथ दिए ‘संक्षिप्त स्पष्टीकरण’ में यह लिखा था-“आज सबसे मुश्किल बात यह है कि धर्म के वास्तविक स्वरूप का लोप होकर उसका स्थान संप्रदायवाद ने और जातीय अहंकार ने ले लिया है.” ( 34)
‘अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे’ की बात ‘अंधेरे में’ कविता में है. उसके पहले उन्होंने अपनी पुस्तक पर लगाई गई पाबंदी से ‘प्रांत और देश के लिए तीन सबसे बड़े ख़तरे पैदा’ होने की बात कही है. हिंदी में ‘एकेडेमिक फ्रीडम’ की बात संभवतः सबसे पहले मुक्तिबोध ने ही कही है. आज हम सब जिन खतरों के बीच हैं, मुक्तिबोध ने 63 वर्ष पहले उन खतरों के बारे में हमें बताया था, सावधान भी किया था. भारतीय संविधान में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ हमारा मौलिक अधिकार है. मुक्तिबोध ने ‘लेखक के विचार स्वतंत्रता और लेखन स्वतंत्रता के लिए खौफनाक खतरा’ की बात कही और ‘एकेडेमिक फ्रीडम’ पर की जा रही चोट से ‘अध्ययन तथा अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता के ख़तरे के साथ वैज्ञानिक दृष्टि को खतरा’ के साथ ‘इतिहास-शास्त्र के निजी वैज्ञानिक क्षेत्र में सांप्रदायिक दृष्टि के हस्तक्षेप’ से उत्पन्न ख़तरे को सामने रखा. ‘सांप्रदायिक पौराणिक दृष्टि का औचित्य-स्थापन’ बिना ‘ऐतिहासिक घटनाओं की पुनर्रचना’ के संभव नहीं है.
1962 में किसी भी राज्य में भारतीय जनसंघ का दबदबा नहीं था. सत्ता सीन होने के बाद ही ‘ऐतिहासिक घटनाओं की पुनर्रचना’ संभव थी. मुक्तिबोध की इतिहास पुस्तक से आर एस एस और भारतीय जनसंघ को आपत्ति थी क्योंकि यह एक सही इतिहास विवेक से जुड़ी थी. दूसरी ओर इतिहास-विज्ञान को सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों और पौराणिक दृष्टि के अनुकूल बनाने वाली शक्तियां थीं. मुक्तिबोध ने जिस तरह 1962 में ही इन शक्तियों की पहचान की थी, वैसी पहचान क्या उसे समय किसी और ने की? वह बार-बार ख़तरे की बात कर रहे थे. ‘खतरा’ शब्द से जुड़े अन्य शब्द हैं भय और आतंक. मुक्तिबोध की कविता में ‘ख़तरे’ शब्द की आवृत्ति कई बार है. जो केवल शब्दावृति नहीं है. यह आवृत्ति तत्कालीन स्थिति से संबंधित है. वे ‘भारतीय इतिहास के स्वरूप पर कुठाराघात’ होते देख रहे थे, ‘उग्र दक्षिणपंथी शक्तियों के बढ़ते हुए कदमों से खतरा’ बता रहे थे. उन्होंने राज्यपाल को दिए अपने पत्र के साथ ‘संक्षिप्त स्पष्टीकरण’ में कहीं भी आर एस एस और भारतीय जनसंघ का उल्लेख नहीं किया है, पर अनेक स्थलों पर ‘संप्रदायवादी तत्व’ और ‘दक्षिणपंथी शक्तियों’ का उल्लेख किया है.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य श्री पाद अमृत डांगे (10.10.1899-22.5.1991) कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया के उस समय चेयरमैन थे. मुक्तिबोध ने उन्हें पहला पत्र अंग्रेजी में लिखा था और दूसरा पत्र हिंदी में. दूसरे पत्र में उन्होंने लिखा “दक्षिणपंथी उग्र सांप्रदायिकता या धर्मवाद इतिहास के शास्त्रीय क्षेत्र में जोर आजमाना चाहता है.” (35) इस पत्र में भी उन्होंने तीन ख़तरे गिनाए हैं और यह विचार करने को कहा है कि आप “लेखकीय स्वतंत्रता को अर्थात एकेडमिक फ्रीडम को मिटने नहीं देंगे, साथ ही शास्त्र और विज्ञान के क्षेत्र में, सांप्रदायिक मनोवृतियों को उभरने नहीं देंगे. इतिहास एक शास्त्र है एक विज्ञान है.” (36)
७
‘अंधेरे में’ कविता के पहले मुक्तिबोध के यहाँ कई बार अंधेरे का जिक्र है. 1962 के बाद यह अधिक है. उन्होंने अपने समय की भयावहता को अपनी पुस्तक को प्रतिबंधित किए जाने के बाद कहीं अधिक लक्षित किया. पाबंदी की मांग करने वालों में भारतीय जनसंघ, कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक और अन्य लोग थे. राजनीतिक दलों में ये तीन दल ही प्रमुख थे, जो एक साथ थे. ‘अंधेरे में’ कविता का संबंध क्या ‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ पर लगाए गए प्रतिबंध से नहीं जोड़ा जा सकता? क्या ‘अंधेरे में’ की कुछ पंक्तियां सितंबर 1962 के बाद नहीं लिखी गई हैं ? क्या अंधेरे में कविता के छठे खंड की यह पंक्तियां –
“अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे
उठाने ही होंगे.
तोड़ने होंगे ही मठ और गढ़ सब.”(37)
‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ को प्रतिबंधित करने के पहले लिखी गई हैं? नहीं. यह पंक्तियां उस घटना विशेष के बाद लिखी गई हैं. उस घटना के बाद ‘अंधेरे में’ कविता में निश्चित रूप से कुछ कांट -छांट की गई है, जिसका कोई प्रमाण किसी के पास नहीं है. श्रीकांत वर्मा ने मुक्तिबोध की कविताओं को उनका इतिहास कहा है. पुस्तक को प्रतिबंधित किए जाने की घटना सामान्य घटना नहीं थी. विनोद तिवारी ने अपने लेख ‘मुक्तिबोध हाजिर हो! ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’ पर एक नोट’ (38) में ‘ओरांग-उटांग’ कविता का सीधा रिश्ता ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’ से न मानकर यह लिखा है कि “अपने समय और परिवेश की जिस भयावता को मुक्तिबोध अपनी तमाम कविताओं में रच रहे थे, वह समय, उस परिवेश का एक रिश्ता जरूर ही उपर्युक्त पुस्तक से है.” यह रिश्ता सितंबर 1962 के बाद की कविताओं से है क्योंकि पुस्तक 1962 में ही छपी और प्रतिबंधित भी हुई. अभी तक ‘अंधेरे में’ कविता के कुछ अंशों या पंक्तियों को भी उससे जोड़कर देखने का अधिक प्रयत्न नहीं किया गया है.
स्वाधीन भारत के 17 वर्ष (1947 से 1964) सामान्य वर्ष नहीं हैं. 1962 तक देश में जो 13 पुस्तकें प्रतिबंधित की गई थीं उनमें हिंदी की कोई पुस्तक नहीं थी. पुस्तकों पर पाबंदी लगाना उसे प्रतिबंधित करना सामान्य घटना नहीं है. इसका सीधा संबंध लोकतंत्र और संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों में से ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ से है. भारत के संविधान ने मौलिक अधिकार के तहत अनुच्छेद 19 (1) (a) के अंतर्गत अपने नागरिकों को ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का अधिकार प्रदान किया गया है, जो लोकतंत्र के परिचालन के लिए अत्यावश्यक है. स्वाधीन भारत में नेहरू के समय में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर कुछ व्यक्तियों को कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा था. संविधान का पहला संशोधन 1951 में हुआ था, जिसमें भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19 (1) (a) पर ‘उचित प्रतिबंध’ लगाए गए थे. 10 मई 1951 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों में कुछ बदलाव किए. (संविधान प्रथम संशोधन) अधिनियम 1951)
स्वाधीन भारत में आँब्रे मेनन के साथ 1955 में ही रॉबर्ट डब्ल्यू टेलर की पुस्तक ‘द डार्क अर्ज’ 1953 ‘बेहद गहरी मनोवैज्ञानिक सामग्री’ के कारण प्रतिबंधित की गई थी.
मजरूह सुल्तानपुरी (1 अक्टूबर 1919 से 24 मई 2000) ने 1949 में बम्बई में मिल-मजदूरों की एक सभा में जो कविता पढ़ी थी उसमें नेहरू की आलोचना थी. नेहरू को ‘कॉमनवेल्थ का दास’ और ‘हिटलर का चेला’ कहा गया था. बंबई की सरकार ने उनके खिलाफ वारंट जारी किया था और वे 2 साल जेल में रहे थे. वे 1945 में प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य बन चुके थे. मुंबई के गृह मंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें क्षमा मांगने को कहा था. उन्होंने क्षमा नहीं मांगी. मजरूह जिगर मुरादाबादी (6 अप्रैल 1890 से 9 सितंबर 1960) के शिष्य थे. (देखें, फिल्म संगीत के इतिहासकार मानेक प्रेमचंद की पुस्तक ‘मजरूह सुल्तानपुरी : द पोएट फॉर ऑल रीजंस’ 2021 ) प्रसिद्ध भारतीय पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार रोमेश थापर (1922-1987) की कम्युनिस्ट विचारधारा की पत्रिका ‘क्रॉस रोड्स’ (27 अप्रैल 1949 से शुरू) कांग्रेस विरोधी थी. नेहरू की आलोचना के कारण मद्रास सरकार ने इसे प्रतिबन्धित किया था और इसका वितरण मद्रास राज्य में रोक दिया गया था. अमेरिकी इतिहासकार और भारत विद् स्टेनली अलबर्ट बोलपर्ट (23 दिसम्बर 1927-19 फरवरी 2019) ने गाँधी की हत्या के बाद 376 पृष्ठों का उपन्यास ‘नाइन आवर्स टू रामा’ (1962) लिखा था, जिस पर कनाडाई अमेरिकी फिल्म-निर्देशक मार्क रॉबसन (4 दिसंबर 1913-20 जून 1978) ने इसी शीर्षक से फिल्म बनाई. रॉबसन इस फिल्म के निर्माता और निर्देशक थे. अमेरिकी पटकथा लेखक नेल्सन गिडिंग (15 सितम्बर 1919-2 मई 2004) ने इस फिल्म की पटकथा लिखी थी. यह फिल्म गुप्त रूप से भारत में शूट की गई थी, जिसे रिलीज होने पर प्रतिबंधित कर दिया गया. कुछ पुस्तकों और व्यक्तियों का और उल्लेख किया जा सकता है, पर इसकी तुलना मुक्तिबोध की पुस्तक को प्रतिबन्धित किये जाने से नहीं की जा सकती.
8
मुक्तिबोध ने अपने समय में कट्टरता, साम्प्रदायिकता और फासीवादी शक्तियों की सही पहचान कर, स्पष्ट शब्दों में ‘ख़तरे उठाने’ की बात कही थी, जिसपर हमने अधिक ध्यान देना जरूरी नहीं समझा. मुक्तिबोध मार्क्सवादी थे. उन्होंने अपने समय में भावी खतरों को पहचान कर हमें सावधान किया था. प्रमुख घटना एक थी, जिससे उन्होंने भारत के भविष्य का अनुमान किया. आज हम सब खतरों से घिरे हुए हैं. यह खतरा कदम कदम पर है. दो-तीन महीने पहले जम्मू कश्मीर प्रशासन ने अनुच्छेद 370 को हटाये जाने की पांचवीं वर्षगाँठ पर एक साथ पचीस किताबों को प्रतिबन्धित किया है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आज जो हमला हो रहा है, वह पिछले 11 वर्ष से भाजपा के सत्तासीन होने के बाद का हमला है. आर एस एस की प्रतिक्रियावादी विचारधारा तभी उफनती है, जब उसकी राजनीतिक शाखा ‘पावर’ में रहती है. भारतीय इतिहास को लेकर उसके द्वारा की गयी ‘हिन्दू साम्प्रदायिक’ व्याख्या के मुख्यतः दो बिंदु हैं :- प्राचीन काल में भारत की सभ्यता शिखर पर थी और 12वीं शताब्दी के बाद मुसलमानों के शासनकाल में देश का पतन हुआ. ये दो बिंदु हिंदू गौरव और मुसलमान घृणा से जुड़े हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने केरल के कोल्लम के समीप अमृतापुरी में ‘माता अमृतानंद मयी’ की साठवीं वर्षगांठ (सितंबर 2013) के अवसर पर भारत के अतीत के पुनर्जीवित होने और भविष्य में भारत के अपने पारंपरिक मूल्यों एवं आध्यात्मिकता के आधारों पर ‘विश्वनेता’ बनने की बात कही थी. उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद बार-बार जोर-जोर से यह कहा जा रहा है कि “भारत मोदी के नेतृत्व में विश्व गुरु बनने की राह पर है.” बीजेपी हो या जनसंघ सब की विचारधारा आर एस एस की विचारधारा है. आरएसएस साझा विरासत और साझा संस्कृति के विरुद्ध है. उसकी इतिहास दृष्टि विभेदकारी, सांप्रदायिक और मुस्लिम विरोधी है.
एक समय पी.एम.ओक की अधिक चर्चा होती थी. ओक (2 मार्च 1917-4 दिसंबर 2007) की किताब है “ताजमहल : द ट्रू स्टोरी : द टेल ऑफ़ ए टेंपल वैंडेलाइज्ड” इस संघी इतिहासकार के अनुसार ताजमहल का असली नाम “तेजोमहालय शिवमंदिर” है. यह इतिहासकार मुस्लिम शासकों द्वारा बनाए गए सभी स्मारकों को हिंदू राजाओं द्वारा निर्मित बताता है. वैज्ञानिक दृष्टि और वैज्ञानिक चिंतन का विरोधी है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ. इसे फारसी विद्वान, लेखक और वैज्ञानिक अलबरूनी (973 से1048) से भी परहेज है क्योंकि वह वैज्ञानिक- चिंतक था. उसकी पुस्तक ‘किताब -उल -हिंद’ में भारतीय संस्कृति,धर्म, विज्ञान और समाज का व्यापक विवरण है.
मुक्तिबोध के आलोचक उनके इतिहास-चिंतन एवं सांस्कृतिक- चिंतन पर अधिक विचार करने की जरूरत नहीं महसूस करते. ‘अंधेरे में’ कविता का पहला शीर्षक था ‘अंधेरे में: आशंका के द्वीप’ जिसे केदारनाथ सिंह ‘रिटेन’ किए जाने के पक्ष में रहे हैं ‘जस का तस’. 1 मार्च 1964 को दिल्ली की साहित्यिक गोष्ठी में इस कविता का पाठ हुआ था, जहाँ उस समय आग्नेष्का सोनी भी उपस्थित थीं. उन्होंने 13 मार्च 1964 को मुक्तिबोध को पत्र लिखा- ‘आशंका के द्वीप का पाठ’ 1 ता. को यहाँ की साहित्यिक गोष्ठी में हुआ. (39) इस गोष्ठी में प्रभाकर माचवे ने “नागपुर वगैरह की संस्मृतियों सामने लाकर, कुछ biographic प्रसंगों से व्याख्या करने की कोशिश की” थी, जो आग्नेष्का को ठीक ही ‘अप्रासंगिक’ लगा था. ‘अंधेरे में’ कविता की थोड़ी भी जीवनीपरक व्याख्या एकदम गलत है, पर इस कविता पर विचार के क्रम में मुक्तिबोध की पुस्तक को प्रतिबंधित किए जाने की घटना और स्वाधीन भारत की विविध घटनाओं का उल्लेख गलत नहीं है. ‘अंधेरे में’ स्वाधीन भारत की ‘महा गाथा’ है. जिसकी कभी कोई सरलीकृत व्याख्या नहीं हो सकती. इक्कीसवीं सदी की एक चौथाई की विदाई के समय इस कविता को पढ़ते हुए हम आज के समय से भी विमुख नहीं हो सकते. कविता के कई पाठ एक साथ संभव हैं, जिसमें एक समय पाठ भी है. 9दिसम्बर 1963 के पत्र में आग्नेष्का सोनी को यह कविता भेजने की मुक्तिबोध ने अपनी इच्छा प्रकट की-“बहुत लंबी है आप ऊब जाएँगी. अप्रकाशित है वह… कोई पत्रिका ऐसी नहीं, जो उसे छापे… उसमें एक आशंका है, अँधेरी आशंका का वातावरण है- कहीं हमारे भारत में ऐसा-वैसा न हो.”
मुक्तिबोध की आशंका सच साबित हुई. भारत आज की तरह कभी इतना अंधकार मय नहीं था. आज का भारत मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता की आशंकाओं के वातावरण से अनेक गुना अधिक है. आज कहीं अधिक भय, आतंक और असुरक्षा है. आर एस एस इतिहास के पुनर्लेखन में कामयाब नहीं हुआ है, पर हिंदी प्रदेश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की भी पाठ्य पुस्तकें बदली जा रही हैं. इतिहास का संप्रदायीकरण हो रहा है. 1977-78 में जनता पार्टी की सरकार में भारतीय जनसंघ प्रमुख घटक था. उसे और अब भाजपा को भी ‘विविधता में एकता’ की ‘भारतीय संस्कृति’ से कभी मतलब नहीं रहा है. मार्क्सवादी इतिहासकारों-रोमिला थापर, रामशरण शर्मा, इरफ़ान हबीब, डी. एन. झा, सतीश चंद्र, बिपिन चंद्र आदि के इतिहास लेखन के सदैव विरुद्ध रहा है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ. सहमत (सफदर हाशमी मेमोरियल ट्रस्ट ) ने 2002 में ‘इतिहास का पुनर्लेखन और संघ परिवार’ शीर्षक से एक पुस्तिका जारी की थी. 21वीं सदी के भारत पर नहीं तो हिंदी प्रदेश पर बहुत ‘अंशों में’ आर एस एस का कब्जा हो चुका है.
‘अंधेरे में’ कविता के प्रेरक तत्व बहुत अधिक मानी नहीं रखते,पर यह सच है कि एँप्रेस मिल की घटना न होती और पुस्तक को प्रतिबंधित न किया गया होता तो ‘अंधेरे में’ कविता का रूप वर्तमान रूप से निश्चित तौर पर कुछ भिन्न होता. आठ खंडों में विभाजित कविता आठ खंडों में ही विभाजित रहती और अनेक पंक्तियां तब भी रहतीं यह कहना कठिन है. ‘अभिव्यक्ति के ख़तरे’ उठाने की जो बात कही गई है, वह कविता में तब नहीं रहती, यह सच है. ये पंक्तियां निश्चित रूप से 1962 में मुक्तिबोध की पुस्तक ‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ को प्रतिबंधित किए जाने के बाद लिखी गई हैं. ‘कल्पना’, ‘चांद का मुंह टेढ़ा है’, ‘मुक्तिबोध रचनावली’ और अशोक वाजपेयी द्वारा संपादित ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ में ‘अंधेरे में’ कविता के चार प्रारूप हैं, जो सदानंद शाही द्वारा संपादित ‘साखी’ पत्रिका के मुक्तिबोध अंक (26) में हैं,पर संभवतः अभी तक इनमें हुए परिवर्तन, परिवर्धन और संशोधन पर विचार नहीं हुआ है. ‘अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे’ उठाने की बात छठे खंड के अंत में कही गई है. इसके पहले तीसरे खंड में वह ‘प्रोसेशन’ है, जिसके बैण्ड- दल में कर्नल, ब्रिगेडियर,जनरल, मार्शल, सेनापति, सेनाध्यक्ष के साथ कई प्रकांड आलोचक, विचारक, जगमगाते कविगण, मंत्री, उद्योगपति, विद्वान ही नहीं शहर का हत्यारा कुख्यात डोमाजी उस्ताद भी है. कविता के चौथे खंड में ‘मार्शल लॉ’ का जिक्र है जो ‘जन क्रांति के दमन निमित्त’ है. इसी खंड में ‘सिरफिरा पागल’ अपने सिरफिरेपन को छोड़कर कई बार स्वयं से यह सवाल करता है “अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया!!” और “मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम !!” आठवें खंड (अंतिम खंड) में ‘रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध’ और ‘नपुंसक भोग-शिरा- जालों में उलझे’ लोगों की बात कही गई है. ‘अंधेरे में’ कविता में जिस ‘मार्शल लॉ’ का जिक्र है, उसका एक स्पष्ट कारण है
“मानो मेरे कारण ही लग गया
मार्शल लॉ वह,
मानो मेरी निष्क्रिय संज्ञा ने संकट बुलाया
मानो मेरे कारण ही दुर्घट
हुई यह घटना.” ( 40)
आज की भारतीय स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है ? क्या केवल आर एस एस,भाजपा, नरेंद्र मोदी ? क्या हम सब रंच मात्र भी इस वर्तमान स्थिति के जिम्मेदार नहीं हैं? क्या हिंदी के कवि, लेखक, साहित्यकार,पत्रकार, संपादक, विचारक,चिंतक, बुद्धिजीवी, संस्कृति कर्मी आदि की आज की स्थिति लाने में तनिक भी भूमिका नहीं है? क्या हमने सचमुच ‘अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे’ उठाए? नरेंद्र अच्युत दाभोलकर (1 नवंबर 1945-20 अगस्त 2013) तर्कवादी और अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति (एम ए एन एस) के संस्थापक थे,मराठी भाषी थे, भाकपा नेता और शिवाजी की जीवनी ‘शिवाजी कौन होता’ के लेखक गोविंद पानसारे (26 नवंबर 1933-20 फरवरी 2015) वचन-दर्शन और साहित्य के विद्वान, तर्कवादी विचारक, कन्नड़ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और लेखक एम. एम. (मल्लेसप्पा मदिवलप्पा) कलबुर्गी (28 नवंबर 1938-30 अगस्त 2015) और कन्नड़ भारतीय पत्रकार,कन्नड़ साप्ताहिक पत्रिका ‘लंकेश’ की संपादक गौरी लंकेश (29 जनवरी 1962-5 सितंबर 2017) ने ‘अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे’ उठाकर अपने प्राण दे दिए.
क्या हमने सचमुच सही अर्थों में अभिव्यक्ति के ‘सारे’ ना सही, थोड़े भी ख़तरे उठाये ? मुक्तिबोध क्या केवल अपने से ही इन खतरों को उठाने के साथ-साथ ‘मठ और गढ़’ तोड़ने की बात कर रहे थे या वह हमें भी संबोधित कर रहे थे. इन पंक्तियों के ‘ही’ शब्द का दो बार प्रयोग हुआ है-‘उठाने ही होंगे’ और ‘तोड़ने ही होंगे’. ‘ही’ की द्वी आवृत्ति का विशेष अर्थ है. इन पंक्तियों में ‘ही’ और ‘होंगे’ पर थोड़ा रुकें. ‘होंगे’ में वर्तमान के साथ ही भविष्य का भी कार्य संकेत है. ख़तरे नहीं, ‘सारे ख़तरे’ उठाना जरूरी है, क्योंकि समय बहुत बीत गया है. हमें ‘मठ’ और ‘गढ़’ तोड़ने चाहिए थे,पर हममें से बहुतों ने अपने-अपने ‘मठ’ और ‘गढ़’ बना लिए.
९
मुक्तिबोध के निधन के साठ-एकसठ वर्ष बीत चुके. आज मुक्तिबोध की जन्म-तिथि है. हम उन्हें कैसे याद करें? कब तक कहते रहेंगे, बार-बार जपते रहेंगे ‘अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे उठाने ही होंगे.’ आज देश के जो हालात हैं उसके लिए कमोबेश हम सब भी दोषी हैं. हिंदी प्रदेश के मतदाताओं ने ही सांप्रदायिक शक्तियों को सत्ता सौंपी है. क्या आज हिंदी का अधिसंख्य कवि-लेखक पुरस्कृत- सम्मानित होने के लिए ‘लालायित’ न सही, बेचैन और सक्रिय नहीं है? ‘अंधेरे में’ की ये पंक्तियां -‘अब तक क्या किया, जीवन क्या जिया’ और ‘मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम.’ क्या हमें बेचैन नहीं करतीं? संकल्प -शक्ति और कर्म-शक्ति सदैव प्रमुख रहेगी. अभिव्यक्ति के ख़तरे ‘उठाने वाले आज भी हैं और कल भी रहेंगे, सदैव रहेंगे’. मुक्तिबोध ने ‘सारे ख़तरे’ उठाने की बात कही थी, जो हमने अब तक नहीं उठाये, पर इसका यह अर्थ भी नहीं है कि अब भी नहीं उठाएँगे.
संदर्भ सूची
(1) जयप्रकाश, गजानन माधव मुक्तिबोध की जीवनी ‘मैं अधूरी दीर्घ कविता’, खंड 2, सेतु प्रकाशन,2024,पृष्ठ 91-92
(2)‘लक्षित मुक्तिबोध’ में प्रकाशित अनिल कुमार का स्मृति- लेख,जयप्रकाश द्वारा उद्धृत,वही, पृष्ठ 92
(3) ‘मैं अधूरी दीर्घ कविता’, वही, पृष्ठ 409
(4) ‘निबंधों की दुनिया’, वाणी प्रकाशन, 2007, पृष्ठ 167-68
(5)‘मैं अधूरी दीर्घ कविता’, वही, पृष्ठ 409
(6)वही, पृष्ठ 409-10
(7)वही, पृष्ठ 422
(8)वही, पृष्ठ 410)
(9)‘अक्षर पर्व’: देशबंधु रचना उत्सव (साहित्य वार्षिकी, 1997)‘मैं अधूरी दीर्घ कविता’ में उद्धृत, पृष्ठ 410
(10) ‘छत्तीसगढ़ में मुक्तिबोध’, संपादक-राजेंद्र मिश्र, राजकमल प्रकाशन, 2014, पृष्ठ 284
(11)भारत : इतिहास और संस्कृति, राजकमल प्रकाशन, चौथा परिवर्धित संस्करण, 2009 परिशिष्ट दो, पृष्ठ 235
( 12)वही, पाठ्य पुस्तक के रूप में प्रकाशित संस्करण की भूमिका, पृष्ठ 13
(13) वही, पृष्ठ 14
(14) ‘मैं अधूरी दीर्घ कविता’ खंड 2 में उद्धृत, पृष्ठ 417
(15) वही,पृष्ठ 418
(16)हरिशंकर परसाई, ‘मुक्तिबोध : एक संस्मरण’, मुक्तिबोध रचनावली, खंड 4, राजकमल प्रकाशन, तीसरा संस्करण, सितंबर 1998, पृष्ठ 416
(17)‘अंधेरे में’ की आधी सदी’ हमारे समय में मुक्तिबोध, संपादक ए. अरविंदाक्षन, वाणी प्रकाशन, 2019, पृष्ठ 169
(18) वही
(19)मुक्तिबोध रचनावली, खण्ड 2, राजकमल प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1980, पृष्ठ 389.
(20)परसाई रचनावली-4, वही, पृष्ठ 416
(21) भारत : इतिहास और संस्कृति, वही, पृष्ठ 11
(22) ‘मैं अधूरी दीर्घ कविता’, खंड दो, पृष्ठ 420
(23) वही, पृष्ठ 436
(24) ‘मैं अधूरी दीर्घ कविता’,खंड दो, पृष्ठ 434
(25) वही
(26)भारत : इतिहास और संस्कृति, वही, पृष्ठ 245
(27) वही, पृष्ठ 249
(28) वही
(29) वही,पृष्ठ 251
(30) वही, पृष्ठ 261
(31)भारत : इतिहास और संस्कृति, वही, पृष्ठ 47
(32) वही, पृष्ठ 263
(33) वही
( 34) वही, पृष्ठ 259
(35) वही,पृष्ठ 319
(36)वही
(37) मुक्तिबोध रचनावली,खंड 2, राजकमल प्रकाशन, नवंबर 1980, पृष्ठ 380
(38)‘अनहद’, वर्ष 7,अंक 7,मार्च 2017, पृष्ठ 324 से 332
(39)‘मेरे युवजन मेरे परिजन’, राजकमल प्रकाशन, 2007, पृष्ठ 352
(40)मुक्तिबोध रचनावली, खंड दो, वही,पृष्ठ 365
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‘फ़ासीवाद की दस्तक’, ‘बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी’ ‘वैकल्पिक भारत की तलाश’, ‘कहाँ आ गये हम वोट देते-देते’ और ‘रामविलास शर्मा का महत्व’ पुस्तकें आदि अभी तक ९ पुस्तकें प्रकाशित. |

17 दिसम्बर 1946 को बिहार प्रान्त के मुज़फ्फ़रपुर जिले के गाँव चैनपुर-धरहरवा के एक सामान्य परिवार में जन्मे रविभूषण की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के आसपास हुई. बिहार विश्वविद्यालय के लंगट सिंह कॉलेज से हिन्दी ऑनर्स (1965) और हिन्दी भाषा-साहित्य में एम.ए. (1967-68) किया. भागलपुर विश्वविद्यालय से डॉ. बच्चन सिंह के निर्देशन में छायावाद में रंग-तत्व पर पी-एच.डी. (1985) की. नवम्बर अक्टूबर 2008 में राँची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन. समय और समाज को केन्द्र में रखकर साहित्य एवं साहित्येतर विषयों पर विपुल लेखन.


मुक्तिबोध को समझने की दिशा में नयी दृष्टि देता बहुत ही विचारोत्तेजक लेख, रवि भूषण सर के चिंतन का दायरा विस्तृत है जो इस लेख में स्पष्ट नजर आता है, आज के अराजकतावादी समय में मुक्तिबोध की प्रासंगिकता नि:संदेह बढ़ जाती है ,और इस तरह के गंभीर चिंतन और लेखों की भी। इस तरह की सामग्री निरंतर सामने लाने के लिए समालोचन को साधुवाद और बधाई 💐
नवल जी की ‘मुक्तिबोध : ज्ञान और संवेदना’ पुस्तक में ‘अँधेरे में’ कविता का जो विश्लेषण किया गया है उसके साथ रविभूषण जी के इस आलेख को पढ़ने पर उस कविता के पाठकीय अभिग्रहण का वृत्त पूरा हो जाता है.
साधुवाद.
महत्वपूर्ण। संग्रहणीय लेख। ‘अंधेरे में’ की पृष्ठभूमि और अन्य समकालीन संदर्भों को जाहिर करता यह लेख पठनीय है। प्रतीत होता है, ‘अंधेरे में’ को सबसे पहले विष्णुचन्द्र शर्मा ने ‘कवि’ में छापा था 1956 – 57 में। आज संविधान विशेषज्ञ कनक तिवारी जी ने लिखा है कि यह कविता उन्होंने 23 साल की उम्र में दिग्विजय कॉलेज राजनांदगांव में रानीसागर तालाब किनारे शाम को मुक्तिबोध के मुंह से नवम्बर 1963 में अकेले श्रोता के रूप में सुना था।
उन कठिनाइयों का आभास इस आलेख में सहज ही मिलता जाता है जिनका सामना मुक्तिबोध करते रहे अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के लिए। वे उस भविष्य को देख रहे थे जिसमें हम जी रहे हैं। कितना कुछ गंवा दिया हमने। हमने, यानी उन लोगों ने भी, जिन्हें मुक्तिबोध की चिंताओं के साथ खड़ा होना था और निरंतर उस जुलूस को आगे बढ़ने से रोकना था जो अब हमारे विश्वविद्यालयों को, शिक्षा संस्थानों को फूंक चुकी है, रौंद चुकी है।
अब हालत यह है कि सार्थक अभिव्यक्ति के लिए उस परिवेश से मुक्ति आवश्यक हो चुकी है जो विश्वविद्यालयों के भीतर पसर चुका है। सार्थक अभिव्यक्तियां अब जैसे उसकी दहलीज़ के बाहर ही संभव हों। कैसी विडंबना है। जिसे फैंटेसी कहा गया उसका चित्र आज के क्रूर यथार्थ के सामने सहज स्वाभाविक लगता है।
रविभूषण जी को ढेर सारी बधाई!
समालोचन को उनसे अधिक बधाई! अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने के लिए!
तथ्यों और विचारों से भरा रविभूषण जी का यह लेख मुक्तिबोध की कविता ‘ अंधेरे में’ और उनकी पुस्तक ‘भारत: इतिहास और संस्कृति’ को समझने की दृष्टि तो देता ही है, कई महत्त्वपूर्ण प्रश्नों के प्रति जागरूक करता है. वैसे भी रविभूषण जी का हर लेख ‘इनसायक्लोपीडिया’ है।
मुक्तिबोध की कविता अँधेरे में पर यह आलेख मेहनत से लिखा गया है । मुक्तिबोध की विचार प्रक्रिया उनके नागपुर में एम ए करते हुए सघन दृष्टिकोण को ठोस ज़मीन तैयार करती है ।
यह लेख जटिल किंतु विस्तृत रूप से प्रकाशित किया है । मुक्तिबोध का मानसिक संतुलन बनाए रखना उनके जीवट का प्रमाण है । २०१३ से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरेदारी है ।
स्वतंत्रत चेतना के व्यक्तियों के लिए लेख संबल प्रदान करता है