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Home » अपमान : कुमार अम्बुज

अपमान : कुमार अम्बुज

अपमान कोई आकस्मिक या अपने में स्वतंत्र घटना नहीं है. वह विभिन्न रूपों में, विभिन्न स्थलों पर घटित होता रहता है और प्रायः उन्हीं स्वरों पर गिरता है जिन्हें सत्ता पहले से चिह्नित कर चुकी होती है. यह सत्ता की एक सुविचारित रणनीति रही है. कुलपति द्वारा लेखक के सार्वजनिक अपमान के विरुद्ध रचनाकारों की सामूहिक प्रतिक्रिया ने न केवल सत्ता को असहज किया है, बल्कि उसकी अंतर्निहित असभ्यता की संरचना को भी दृश्य बनाया है. वरिष्ठ कवि कुमार अम्बुज के काव्य और कथा संग्रहों में अपमान की अंतर्निहित हिंसा और उसकी दीर्घ छाया की सजग पहचान और समझ आरंभ से ही उपस्थित रही है. यह दुर्भाग्यपूर्ण अवसर इस संचयन का कारण बना है. प्रस्तुत है.

by arun dev
January 18, 2026
in कथा, कविता
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अपमान : कुमार अम्बुज
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हमारे चारों तरफ़ बिखरे हुए
नाना प्रकार के अपमानों की शृंखला
__
कुमार अम्बुज

अपमान

वह नियमों में शामिल है और सड़क पर चलने में भी
सबसे ज़्यादा तो प्यार करने के तरीक़ों में
वह रोज़ी-रोटी की लिखित शर्त है
और अब तो कोई आपत्ति भी नहीं लेता
सब लोग दस्तख़त कर देते हैं
फिर उसे अलग से पहचानना मुश्किल होता जाता है

वह हमारे ख़ून में घुलनशील है और पानी के रंग का है
धीरे-धीरे हम उसके आदी होने लगते हैं
वह हर बारिश के साथ होता है और कई बार हम
आसमान की तरफ़ देखकर जैसे उसकी प्रतीक्षा करते हैं
आप देख सकते हैं यदि आपके पास चप्पलें या स्वेटर नहीं हैं
तो कोई आपको चप्पल या कपड़े नहीं देगा सिर्फ़ अपमानित करेगा
या बहुत बड़ा अभियान चलायेगा
और इतनी चप्पलें इतने चावल इतने कपड़े इकट्ठे हो जाएँगे
कि अपमान का एक उत्‍सव होगा

कहीं-कहीं वह बारीक़ अपठ्य अक्षरों में लिखा रहता है
और अनेक जगहों पर दरवाज़े के ठीक बाहर तख़्ती पर
ठीक से अपमान किया जा सके इसके लिए बड़ी तनख़्वाहें हैं
कुछ अपमान पैदा होते ही मिल जाते हैं कुछ न चाहने पर भी
और कुछ इसलिए कि तरक़्क़ी होती रहे

वह शास्त्रोक्त है
उसके होते रहने से वध भी हो जाता है
और हत्या का कलंक भी माथे पर नहीं लगता.

 

 

संस्कार

अब तुम अपमानित होते हो और मुस्‍कराते हो
यह यकायक नहीं है
यहाँ तक आने में तुमने कई बरस लिए हैं
उपदेशों, परिपत्रों, नियमों, ज़रूरतों और सुविधाओं ने
तुम्हें अनुभवी बनाया और शिक्षित किया
सबसे ज्‍़यादा उन्होंने जो ठीक तुम्हारे पास बैठते हैं
और अपमान को कभी अपमान नहीं कहते
बल्कि मौक़े-बेमौक़े तुम्हें समझाते हैं
कि ऐसे क्षणों में हिम्मत रखो
याद करो तुमने पहले भी कई बार सहनशीलता दिखाई है
इतनी कि मनुष्य को शोभा नहीं देती
मगर जीवन के ये बरस
मनुष्य की शोभा-यात्रा के नहीं जवाबदारियों के हैं

अब तुम खिले चाँद की तरफ़ नहीं देखते
सूखते जा रहे खेतों को, तालाबों को नहीं देखते
चिड़ियों और तोतों की उपेक्षा करते चले जाते हो
फुटपाथ पर उघाड़े बदन सोते या राह में मिलते
असहाय आदमी की तरफ़ निगाह भी नहीं उठती
मोटरसाइकिल पर तेज़ जाते बच्चे को तुम दे देते हो गाली
चमकते तारे तुम्हें पुकारते रह जाते हैं और तुम नशे के
दूसरे पहर में कुर्सी की पीठ पर सिर टिका देते हो
धीरे-धीरे तुमने इंद्रियों पर नहीं
अपनी व्यथाओं पर विजय पा ली है

तुम जान चुके हो
अपमान को कहीं सिद्ध नहीं किया जा सकता
तुम्हारा क्रोध पालतू जानवर की कूँ-कूँ में बदल रहा है
तुम्हारे पास अब हर धूर्तता के लिए एक चमकदार शब्द है
आईने के सामने भी तुम खड़े रहते हो अविचलित
अब तुम्हें धूल में स्वाद आने लगा है
कोई स्त्री जब तुम्हारे सामने ढलके आँचल से गुज़रती है
तुम सोचते हो यह उसकी अभिरुचि है
जिस आदमी की नाक से ख़ून बहता है तुम उसी पर गुर्राते हो
और एक दिन समझाते हो अपने बच्चों को
वक्‍़त आ चुका है कि उठ जाओ मान-अपमान से ऊपर
उन विचारों को अपने पास भी मत फटकने दो
जो तुम्हें सीधी राह से भटका देंगे अंधा बना देंगे
और यह भी नहीं देखने देंगे कि आख़‍िर तुम
कितना भला-चंगा जीवन गुज़ार रहे हो.

 

 

सहनशीलताः कुछ वाक्य

पृथ्वी, स्त्री, निर्धन और ग़ुलाम
इसके कुछ विचारणीय उदाहरण हैं.

यह हर उस कदम के ख़‍िलाफ़ होती है
जो उसी वक्‍़त ज़रूरी होता है.

इसके पक्ष में लोक कथाएँ हैं
और सर्वोच्च न्यायालय के कुछ निर्णय भी.

हर उदास चीज़ को चाहिए
कि वह चमकदार चीज़ों को बर्दाश्त करे.

इसे दीमक कहना धर्मग्रंथों, राजनीतिज्ञों
और प्रबंध निदेशकों का अपमान है.

आप पत्थर, लोहे या पेड़ से भी कुछ सीख सकते हैं,
हालाँकि आप पेड़, पत्थर या लोहा नहीं हैं.

 

 

बचाव

कई जगहें हैं जहाँ मैं फँस जाता हूँ
जैसे अभी शाम सात बजे के धूमिल प्रकाश में यहाँ बैठा हूँ पार्क में
और ख़ुद को नहीं बचा पा रहा हूँ सायंकाल के आसमान से
जो गिर रहा है ऊपर से दिन भर के अपमान की तरह
ऐसे ही परसों घिर गया था कविता के शब्दों से
जीवन में कभी-कभी हर कोई इस तरह घिर जाता है
कि अपना बचाव नहीं कर पाता

मैं बच नहीं सकता कि मैं चुंबनों को माया नहीं मानता
स्पर्श को और घास के फूलों को माया नहीं मानता
हर ग़लत पर मुझे क्रोध आता है और मेरे मुँह से निकलता है झाग
कभी लगता है जैसे मैं किसी दूसरे संसार में हूँ जहाँ
मारे जा चुके हैं मेरे पिता और घर पर पड़ोसियों की निगाह है
मैं अपनी माँ को नहीं बचा पाया
बहन पत्नी को नहीं और बच्चों को भी नहीं
और इस तरह ख़ुद को भी नहीं

मैं फँस गया हूँ किसी अजीब से युद्ध में
जो मेरे उस मित्र को भी नहीं दिखता
जो रोज़ मेरे घर आता है चाय पीता है
और विदा लेते हुए मुझे रोज़ गले लगाता है

मुझे बचाया भी नहीं जा सकता कि मेरे पक्ष में
सिर्फ़ मेरी गवाही है
जो बचा सकते हैं ख़ुद को भागकर या ज़मीन पर गिरकर
अभिनय से, ताक़त से, अपमानित होकर रिरियाकर
उनकी वजह से ही तो बात यहाँ तक आई है
कि दोहरी मुश्किल है : शिकारी होना होगा या शिकार
यह कोई याचना या तर्क नहीं
मौक़ा-ए-वारदात से एक सूचना है
जानता हूँ मैं ख़ुद को बचा नहीं सकता
लड़ाई में अकेला पड़ गया हूँ
लेकिन शर्मिन्दा नहीं हूँ
इसका भार मैंने दूसरे जीवितों पर भी छोड़ दिया है.

 

 

घास बनकर भी चैन नहीं

आज रात मैं मोज़ार्ट को सुनना चाहता था
और मल्लिकार्जुन मंसूर को
या इस अँधेरी रात को
जिसमें आवाज़ों का एक विशाल घर है

मनुष्य का साथ देती है उसकी आदिम प्रकृति
फिर उस पर एक सुबह टपकती है ओस
कुछ उड़ती पत्तियाँ ठहरती हैं उसके कंधों पर
वह कायान्तरित हो जाता है घास में
वहाँ उसे मिलते हैं छोटे-छोटे फूल, चीटियाँ और गुबरैले
इस तरह अपनी इस ज़‍िंदगी में वह
अकेला और उदास नहीं रहता

वह घास बनकर भी चैन से गुज़ार सकता था जीवन
मगर घास पर लगातार गिर रहा है ख़ून
भगदड़ में दब गये हैं चीटियाँ और फूल
गुबरैलों का पता नहीं क्या हुआ
और घास बनकर भी चैन नहीं

मैं नाना प्रकार अपमानित एक टूटा-फूटा मनुष्य
जो अपनी मरम्मत के लिए सुनना चाहता था संगीत
रहना चाहता था अँधेरी रात की अनाम आवाज़ों के साथ
अब यहाँ घास के मैदान में हूँ
जिस पर ख़ून के रंग की ओस गिरती है
जो सुबह की रोशनी में कुछ अजीब ढंग से चमकती है.

 

 

अपने भीतर छिपे असहमत के प्रति

मैं ज्ञात में भरोसा करता हूँ
और अज्ञात को लेकर मेरी उत्सुकता कभी कम नहीं हुई
लेकिन दुबारा कहूँगा कि मेरा विश्वास सिर्फ़ ज्ञात में है

वृक्षों ने मुझे कभी भला-बुरा नहीं कहा
बादल मुश्किलों में मेरे साथ कुछ दूर चले
चाँदनी रातों ने मेरा शिकार किया
और बार-बार इस धरती पर मुझे नये चंद्रमा दिए
नींद में से उठकर जब भी मैदान में आया
मैंने देखा तारे अपनी जगहों पर थे मुझे देखते थे
लोग मुश्किल में हुए तो उन्होंने शब्दों की तरफ़ भी देखा
तुम जानते हो यह मेरी ताक़त है

जिन्होंने मुझे अपमानित किया
और दग़ा किया मुझसे वे तुम्हारे जैसे ही थे
उनकी परेशानियों, आशाओं और लालच का मुझे अंदाजा है
मैं उन्हें क्षमा करते हुए अपनी ग़लतियों की तरफ़ भी देखता हूँ
और यह कोई देवत्व नहीं है, बेवकूफी तो कतई नहीं
बस यह एक रास्ता है थोड़ा ऊबड़खाबड़
जानता हूँ उन बीमारियों के बारे में
जो भीतर आँसुओं और ओस के जमने से पैदा हुईं है
मुझे दिखती है तुम्हारी दया, तसल्ली और ख़ुशी
मैं याद करता हूँ अपने खोये हुए लोगों को
और इस पल की बारूद से कठिन चट्टानों को उड़ाता हूँ
आख़‍िर आज की रात आत्महत्या न करने से ज्‍़यादा
बड़ी उम्मीद कोई क्या पैदा कर सकता है
जबकि समझने की कोशिश करने वालों के लिए
दुनिया उतनी ही कठिन है जितनी हज़ार साल पहले थी
अबूझ, मकड़ी के जालों से भरी, बंद दरवाज़ों के साथ
तलवार से अपनी उदारता का परिचय देती

यह एक फूल है जो मैं जवाब के तौर पर तोड़ता हूँ
लेकिन यह एक दिन में ही मुरझा जाता है
मैं ज्ञात में भरोसा करता हूँ लेकिन तुम्हारी ओट में
जो कुछ है उसे जानना चाहता हूँ
एक कवि ही सबसे ज्‍़यादा जानता है हर चीज़ का
उत्तर फूल नहीं हो सकते हालाँकि वे ख़ूबसूरत हैं
और यहीं पास में उगे हुए हैं

तुमसे मेरा एक संबंध और बनता हैः
अभी मेरी दिलचस्पी तुममें बनी हुई है.

 

 

शीर्ष बैठक

वह एक मुस्कराहट के साथ सभागार में प्रवेश करता है
उसने आते ही हर शख़्स को क़ब्‍ज़े में ले लिया है
कक्ष में बार-बार उसकी सिर्फ़ उसकी आवाज़ गूँजती है
वह विनम्र है लेकिन हर बात का उत्तर हाँ में चाहता है

धीरे-धीरे उसे घेर लिया है आँकड़ों ने
ग़ायब होने लगी है उसकी हँसी
वह चीख़ता हैः मुझे यह काम दो दिन में चाहिए
और ठीक अगले ही पल तानता है मुट्ठियाँ
मानो अब मुक्काबाज़ी शुरू होने को है

अचानक वह गिड़गिड़ाने लगता हैः
देखिए, आप तो मरेंगे ही, मुझे भी ठीक से नहीं रहने देंगे
फिर वह तब्दील हो जाता है एक याचक में
वातानुकूलित कक्ष में सब उसके माथे पर पसीना देखते हैं
दोपहर हो चुकी है और वह ग़ुस्से में है
अब वह किसी भी तरह का व्यवहार कर सकता है
उसके पास से विचार ग़ायब होने लगे हैं
उसकी अभिव्यक्ति चार-पाँच वाक्यों में सिमट गई है
‘मुझे परिणाम चाहिए’- एक मुख्य वाक्य है

उसकी कमीज़ पर चाय और दाल गिर गई है
लेकिन उसके पास इन बातों के लिए वक्‍़त नहीं है
वह कहता है चाहे बारिश हो या भूकंप
मुझे व्यवसाय चाहिए और और और
और और व्यवसाय चाहिए
इतने भर से क्या होगा कहते हुए वह अफ़सोस प्रकट करता है
फिर दुख जताता है कि उसे ही हमेशा घोड़े नहीं दिए जाते
और जो दिए गए हैं वे दौड़ते नहीं

वह अगला वाक्य चाशनी में डुबोकर बोलता है
लेकिन सख़्त हो चुकी हैं उसके चेहरे की माँसपेशियाँ
उसके शब्द पग चुके हैं अनश्वर कठोरता में
हालाँकि वह अपने विद्यार्थी जीवन में सुकोमल था
ख़ुश होता था पतंगों को, चिड़ियों को देखते हुए
वह फुटबॉल खेलता था और दीवाना था क्रिकेट का
लेकिन अब उससे कृपया खेल, पतंग
या पक्षियों की बातें भूलकर भी न करें
उससे सिर्फ़ असंभव व्यवसाय के वायदे करें
और अब उस पर कुछ दया करें
हड़बड़ाहट में आज वह रक्तचाप की गोली खाना भूल गया है

वह इस तरह अपमान से पेश नहीं आना चाहता
लेकिन बाजार और महत्वाकांक्षाओं ने
उसे एक अजीब आदमी में बदल दिया है
बाहर शाम हो चुकी है पश्चिम का आसमान गुलाबी हो रहा है
पक्षी घोंसलों की तरफ़ लौट रहे हैं और हवा में संगीत है
लेकिन वह अभी कुछ घंटे और इसी सभागार में रहेगा
जिसमें पाँच सुंदर कलाकृतियाँ लटकी हैं
मगर सब तरफ़ घबराहट फैली हुई है.

 

 

शरणस्थली और क़त्लगाह

जीवन में अगर अपमान है और चीख़ है
तो क्या बुरा है कि वह कविता में सुनाई दे
कोई दरवाज़ा है तो उसमें से गुज़रा जा सके
चुंबन है तो होठों पर उसका स्वाद हो
यह कविता की कला है लेकिन भाषा के साथ है
उसका एक काम यह भी हो सकता है
कि वह हमें दिन के मरुस्थल या रात की सुरंग के
पार ले जाये और किसी अजायबघर में छोड़ दे

इस बीच बाज़ारों की क्यारियाँ तुम्हें लुभाती है
अकादेमियों संस्‍थानों के परिसर तुम्हें पुकारते हैं
राजनेता और धर्माचार्य तुम्हें
झाड़ियों में ले जाने के लिये उद्यत हैं
इतिहास पर टुकड़ों में रोशनी गिरती है
और इन्हीं के बीच से होकर कविता का रास्ता है
जो कला भी है और भाषा भी

वहीं वह बंदूक भी है जो जब कविता में चलती है
तो ठीक उसी वक्‍़त जीवन में भी चलती है
वहाँ वे फूल भी हैं जो जीवन में खिलना चाहते हैं
तो खिलते हैं कविता में भी
वहीं वह स्पर्श है जो इंद्रियों को
एक साथ उल्लसित और मूर्छित करता है

चौराहे की भीड़ को चीरते हुये जब तुम सुबह-सुबह
गुज़रते हो तो कितने बेरोज़गार
तुम्हारी तरफ़ झपटते हैं उम्मीद से
और अपमानित होकर पीछे हट जाते हैं
यह दो-चार दिन पुरानी बात भी नहीं है
जब एक निरीह बच्चा अपना हाथ फैलाये
तुम्हारे सामने खड़ा था और तुम उसे झिड़क रहे थे
अकसर ही तुम्हारे घर की बाई
अपनी उतनी छोटी बेटी को एवज़ी में भेज देती है
जो बमुश्किल पहुँच पाती है सिंक की ऊँचाई तक

यदि तुम इस तंत्र का शिकार हो तब भी
तुमने उतनी दूर तक भी दौड़ नहीं लगायी है
जितनी बिल्ली को देखकर चूहा लगाता है
तुम जो कविता को शरणस्थली बनाते हो
जो कला भी है लेकिन हर बार
खुले में एक मोर्चा हो जाती है
और शरणस्थलियों को क़त्लगाह बनाती है.

 

 

खाते-पीते आदमियों का यक़ीन

करोड़ों लोग भुगत रहे हैं
ग़रीबी का अभिशाप
इस बात पर कौन खाता-पीता आदमी करेगा यक़ीन?

जो यक़ीन करते हैं वे कुछ कहते नहीं
चुपचाप कोशिश करते हैं जिंदा रहने की
उन्हें तो कई बार पता ही नहीं होता कि आप
ग़रीबी के बारे में आख़‍िर सोचते क्या हैं
और तुम्हारे सौभाग्य से उन्हें इससे कोई मतलब नहीं
कि तुम उन्हें अभागा कहते हो या कामचोर
जाहिल कहते हो कि असभ्य
जबकि सारे मौसम भी उनको अपमानित करते हैं
फिर भी वे दिन-रात कुछ न कुछ बीनते बनाते रहते हैं
लगातार पैदल चलते हैं और कम खाते हैं

सब कहेंगे ग़रीब तो अब कोई बचा ही नहीं है
जो गाँवों में है वह किसान है या मज़े में ले रहा है अनुदान
जबरन कॉलोनियों में रहता हुआ वह शहरों का सिरदर्द है
या फिर वह अपराधी है या गुण्डा या पापी या काहिल
जो सचमुच ज्‍़यादा ग़रीब रहा होगा वह मर चुका है कब का

अब कोई नहीं बचा है ग़रीब-
सिर्फ़ यही एक वाक्य है
जिस पर यक़ीन कर सकते हैं खाते-पीते लोग.

 

 

एक रात

जब एक अपमान याद आता है
तो कई अपमान याद आते हैं
और असहायताएँ
मोहपाश याद आते हैं
वे सब जो तुमसे बँधे हैं
और वे जिनसे तुम बँधे हो
निरीह आँखें याद आती हैं सूखे ओंठ
उमस, धूल, किनारे उगी झाड़‍ियाँ
बारिश के साथ चलती तेज़ हवाएँ
सामना करती अकेली कमीज़
और मरणांतक मुस्‍कराहट
जैसे बचाव की कोई उम्‍मीद
आकाश में सप्तऋषियों का
पथ देखते रहना याद आता है
और पुलिया के नीचे अचानक
किसी सरीसृप का तेज़ी से गुज़रना.

 

 

चुप्पी की वजह

वह चीखकर पूछता है तुम्हारा नाम क्या है
तुम्हारा घर, कहाँ है तुम्हारा पहचान पत्र?
तुम्हारे होने का सबूत?
तुम उसकी तरफ देखते हो खामोश आँखों से

तुम्हारी चुप्पी उस पर अपमान की तरह गिरती है
अपमान से आहत वह थर्ड डिग्री आजमाता है
तुम्हारा चेहरा खून से लथपथ है
लेकिन तुम एकदम खामोश
उसे लगता है जैसे तुम अपनी चुप्पी से
उसे धमका रहे हो कि कुछ भी कर लो
मैं कुछ नहीं बोलूँगा

तुम्हारे गुप्तांग क्षत-विक्षत हैं
तुम्हारे जबड़ों पर सूजन है मगर वे भिंचे हुए हैं
अब उसे यकीन हो जाता है तुम अपनी खामोशी से
उसे चिढ़ा रहे हो और मानो चीखते चले जा रहे होः
मुझे कुछ नहीं पता, मैं तुम्हें कुछ नहीं बताऊँगा

तुम्हारी यह चुप्पी ऊँची आवाज में बात करने की
आतंक और हिंसा की पर्यायवाची हो जाती है
आखिर तुम्हें मार दी जाती है गोली

जिन लोगों ने अपना नाम, पता, आधार कार्ड, वोटर आईडी
ख़सरा, खतौनी, राशन कार्ड, लाइसेंस, अंकसूची,  कर्फ़्यू पास
सब कुछ बताया था और अपना बेक़सूर होना भी
तुम्हारे सामने ही उन्हें आज सुबह
मार दी गई थी गोली.

 

कहानी 

पंचतंत्र

 

नौकरी करने, परिवार में रहने और प्रेम करने में अपमान होता ही है. दरअसल पूरे जीवन से ही अपमान का संबंध है. अपमान ही सच्ची आजीविका है. बिना अपमान के आप समाज में जीवित नहीं रह सकते. आप अपमान सहते हैं, इसके बदले ही आपको जीवन जीने का अवसर मिलता है. दिनचर्या में मौक़ा आने पर आप भी अपमान करते हैं. इससे अपमान रूपी जीवन या जीवन रूपी अपमान का एक चक्र पूरा होता है. अपमान करना, सहना, एक विद्या है. इसे सीखकर या बिना सीखे भी जीना पड़ता है. फ़र्क़ यह है कि जो इस विद्या को जान लेता है तो वह कुछ संतोष के साथ मर सकता है. लेकिन मरते समय हर एक आदमी को लगता यही है कि उसने अपमान किया कम, सहा ज्‍़यादा.

बहरहाल, यह सब सोचते हुए, जानते हुए भी मैंने बॉस से कहा-

‘‘सर, मैं यहाँ काम करने आता हूँ, गाली खाने नहीं. काम करूँगा लेकिन अपमान नहीं सहूँगा.’’

प्रेमिल उत्तर मिला-

‘‘अपमान कार्य-संस्कृति का अनिवार्य हिस्सा है.’’

बॉस स्पष्टवादिता के लिए प्रशिक्षित हैं. जबसे नौकरी की सुरक्षा ख़त्म हो गई है, उन्हें और अधिक स्पष्टवादी होने का निर्देश और साहस बाक़ायदा परिपत्र भेजकर दिया गया है.

मैंने इस बारे में घर से बाहर अपने आत्मीय दोस्त और घर में पत्नी से में बात की. दोस्त ने हँसते हुए बताया कि अपमान के भरोसे ही उसका जीवन कट रहा है. यह कोई चिंताजनक बात नहीं है. पत्नी ने कहा कि बरसों से वह अपमान के बदले ही रोटी-कपड़ा-मकान और बिस्तर की सुविधा ले रही है.

लेकिन मेरी तृष्णा और व्यग्रता शांत नहीं हुई. इसलिए शाम को दूसरे मोहल्ले में रह रहे पिता के पास जाकर बैठा. घुमा-फिराकर यह घटना बताई और अपमान-सिद्धांत पर अपनी बात रखी. उन्होंने पिता की तरह अक्खड़ और खड़ा जवाब दिया-

‘‘इसमें कुछ भी अस्वाभाविक नहीं. यदि अपमान नहीं सह सकते तो रोटी नहीं खा सकते. यह मानव-सभ्यता का इतिहास है. यही मनुष्य की जैविकता का रहस्य है. तुम हर महीने मुझे बारह हज़ार रुपये देते हो. यानी मैं चार सौ रुपये रोज़ के हिसाब से अपमान की ख़ुराक पर जीवित हूँ. तुम मेरे पास आते हो और नियमित बदतमीज़ी करते हो. और जिस दिन नहीं आते हो तो सिर्फ़ यह बताने के लिए कि उतनी ही राशि में, ज्‍़यादा अपमानित भी किया जा सकता है.’’

गहरी साँस लेकर फिर बोले-

‘‘तुम ध्यान दोगे तो देखोगे कि मनुष्यों के संसार की हर क्रिया में अपमान की क्रिया शामिल है. घरों में, गलियों में, चौराहों पर, सभाओं में, सदनों में टेलिविज़न पर, सिनेमा में, भाषणों में, किताबों में, उपदेशों में उन सबके लिए अपमान भरा पड़ा है जो स्वतंत्रताकामी और न्यायपूर्ण जीवन चाहते हैं. मनुष्य होने की इच्छा मात्र से अपमान की पात्रता हो जाती है. तुम मुझे एक भी महत्वपूर्ण क्रिया, कोई ऐसा सक्रिय महान वाक्य निकालकर दिखाओ जिससे किसी का अपमान न होता हो. न्‍याय में, हँसी में, पुरस्‍कार में, प्रशंसा में, प्रेम में. हर ऐसे शब्द में यदि एक के लिए सम्मान है तो उसीमें दूसरे का अपमान छिपा हुआ है. बल्कि उजागर है. चमकता हुआ.’’

मैं सोच में पड़ गया. लज्जित भी हुआ होऊँ शायद.
उन्होंने आख़‍ि‍र बात समाप्त करते हुए कहा –

‘‘जो अधिक अपमान कर सकता है, उससे उसकी ताक़त का पता चलता है. मेरा अनुभव है कि बीमार बुढ़ापा सर्वाधिक निर्बल होता है इसलिए सर्वाधिक अपमान सहता है. हर कोई इसलिए भी शक्तिशाली होना चाहता है ताकि वह कम अपमान सहे और ज्‍़यादा अपमान कर सके. परिवार मे, जीवन में या समाज में सत्ता पाने की कोशिश दरअसल व्यवस्थित, आधिकारिक और कानून-सम्मत अपमान कर सकने की आकांक्षा है. सारा धर्म, विज्ञान और राजनीति इसीमें जुटे हैं कि कम से कम व्यय में, अधिकतम लोगों का, अधिकतम अपमान, अधिकतम आसानी से किया जा सके. और अपमान करने, सहने को इतना नैतिक बनाया जा सके कि किसी को अपराध-बोध न हो. आगे नयी विधियों के साथ अपमान होगा. तकनीक भी मनुष्य को तरह-तरह से अपमानित करेगी. मानव-सभ्यता का यही भविष्य है.’’

पिता से बात करके मेरी जिज्ञासा काफी हद तक शांत हो गई. सच ही कहा है कि बुज़ुर्गों के पास पर्याप्त अनुभव और व्यावहारिक ज्ञान होता है. अपमान का भी. अब मैं अधिक इत्मीनान से नौकरी कर पा रहा हूँ. बॉस से झगड़ा ख़त्म हो गया है. मेरे आधिपत्य में काम करनेवाले कर्मचारी भी अब एकदम सतर्कता से काम करते हैं. वे जान चुके हैं कि अब मैं भी निडर होकर, पर्याप्त अपमान कर सकता हूँ. कंपनी की उत्पादन क्षमता के लिए मेरी गिनती उपयोगी लोगों में होने लगी है. नौकरी से निकाले जाने का ख़तरा पूरी तरह तो नहीं लेकिन काफी कुछ ख़त्‍म हो गया है. पत्नी, बच्चे भी मज़े में जी रहे हैं. मैं समझ गया हूँ कि कई बार चीज़ों के हल बहुत आसान होते हैं. हम व्यर्थ ही उन्हें जटिल बनाते हैं.

फिर उन्‍होंने एक बोधकथा की तरह कुछ सुनाया.
शायद मुझे चिढ़ाने के लिए.

”देखो, मनुष्‍य का आयुष्‍य हाथी के बराबर होता है. पूरे सौ वर्ष. पूर्ण स्‍वस्‍थ सौ साल. इसलिए शतायु होने का आशीर्वाद दिया जाता है. लेकिन जानते हो आदमी पिछले लंबे समय से सौ बरस का जीवन नहीं जी सका है. अपवाद छोड़ दो लेकिन यह एक साधारण नियम हो गया है कि कोई शतायु नहीं हो पाएगा. कितना भी आशीर्वाद दो लेकिन वह सौ के पहले ही चला जाएगा. क्‍यों? वह इसलिए कि आदमी को समाज और उसके परिजन मार डालते हैं. कैसे? अरे भाई, अपमान करके.
अनवरत अपमान करके.

यदि कम से कम परिजन ही उसका अपमान न करें तो वह स्‍वस्‍थ रूप से नब्‍बे के ऊपर तक निश्चित ही जीवित रह सकेगा. लगातार अपमान से ‘मल्टी ऑरगन फेल्युर’ हो जाता है. यही कारण है कि अब कोई किसी को शतायु होने का आशीर्वाद या शुभकामना देता है तो उसे वह वरदान नहीं, अभिशाप समझता है. फिर मुझे किंकर्त्‍तव्‍यविमूढ़ या उजबक की तरह खड़ा देखकर उन्‍होंने कहा- अब तुम जाओ.

पिछले महीने मेरी पदोन्‍नति हुई और आकर्षक वेतनवृद्धि मिली.
मैं बहुत ख़ुश था. ख़ुशी में मैंने पिता को बताया कि अब मैं आपको अठारह हज़ार रुपये हर महीने दे सकता हूँ. पिता ने मेरी तरफ़ कुछ अजीब ढंग से देखा-
‘‘नहीं. मेरे लिए बारह काफ़ी हैं. मैं पुराना आदमी हूँ. मेरी ज़रूरतें कम हैं. इतने में ही गुज़ारे की आदत पड़ गई है.’’
फिर अनावश्यक ही स्पष्ट करते हुए बोले-

‘‘ज्‍़यादा अपमान में मेरे लिए ज्‍़यादा मुश्किल होगी.’’

(रचनाकाल- 1997 से 2020. अनंतिम, अमीरी रेखा, उपशीर्षक तथा  मज़ाक़ संग्रहों से. किंचित अद्यतन.)

कुमार अम्‍बुज
13 अप्रैल 1957, ग्राम मँगवार, ज़‍िला गुना
लोकतांत्रिकता, स्वतंत्रता, समानता, धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न समाज के पक्षधर कुमार अम्बुज का जन्म 13 अप्रैल 1957 को जिला गुना, मध्य प्रदेश में हुआ. संप्रति वे भोपाल में रहते हैं.  किवाड़, क्रूरता, अनंतिम, अतिक्रमण, अमीरी रेखा और उपशीर्षक उनके छह प्रकाशित कविता संग्रह है. ‘इच्छाएँ और ‘मज़ाक़’ दो कहानी संकलन हैं. ‘थलचर’ शीर्षक से सर्जनात्मक वैचारिक डायरी है और ‘मनुष्य का अवकाश’ श्रम और धर्म विषयक निबंध संग्रह. ‘प्रतिनिधि कविताएँ’, ‘कवि ने कहा’, ‘75 कविताएँ’ श्रृंखला में कविता संचयन है. उन्होंने गुजरात दंगों पर केंद्रित पुस्तक ‘क्या हमें चुप रहना चाहिए’ और ‘वसुधा’ के कवितांक सहित अनेक वैचारिक पुस्तिकाओं का संपादन किया है. विश्व सिनेमा से चयनित फिल्मों पर निबंधों की पुस्तक शीघ्र प्रकाश्य. कविता के लिए ‘भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार’, ‘माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार’, ‘श्रीकांत वर्मा पुरस्कार’, ‘गिरिजा कुमार माथुर सम्मान’, ‘केदार सम्मान’ और वागीश्वरी पुरस्कार से सम्मानित.ई-मेल : kumarambujbpl@gmail.com
Tags: 20262026 कविताअपमानकुमार अम्बुज
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Comments 6

  1. जयप्रकाश सावंत says:
    1 month ago

    कुमार अंबुज की कविता हमारे व्यथित और अपमानित कर देनेवाले समय को शब्द देतीं हैं। संयोग से इनमें एक पंक्ति है, जो आजकल थोड़े बदलाव के साथ मेरे जैसों के लिए एक अलग तरह का अपमान ले आती रहती है :
    “मोटरसाइकिल पर तेज़ जाते बच्चे को तुम दे देते हो गाली”

    मैं जब घर के करीब का छोटा-सा भी रास्ता क्राॅस करने जाता हूं, अचानक कहीं से पहले न दिखी हुई मोटरसाइकिल बिल्कुल नज़दीक से तेज़ से निकल जाती है और गाली आती है, बूढ़े, दिखता नहीं है क्या…

    Reply
  2. रश्मि रावत says:
    1 month ago

    बहुत ही अच्छी और एकदम सच्ची कविताएं
    मान अपमान के अनेकानेक आयाम समकाल के विभिन्न जीवन प्रसंगों में जिस तरह आते हैं। वे मंजर धड़क रहे हैं शब्दों के अंदर से। मानरहित होना कभी ख़ामोश नहीं जाना चाहिए और यह क्योंकर जाता होगा, मुस्कराहट और विनम्रता के आवरण के पीछे कितनी धमक और कितनी सहनीयता छिपी है। यह उघाड़ते हुए कविताएं यह भी जानती हैं कि सामूहिक प्रतिरोध कितना अधिक जरूरी होता है। और यह भी जानती हैं कि किनके लिए वैयक्तिक – सामूहिक प्रतिरोध मौन में गुम होते हैं।

    Reply
  3. Braj Shrivastava says:
    1 month ago

    इस तरह एक प्रतिक्रियात्मक विचार अनेक कविताओं को मुमकिन करता है।हम देखते हैं कि जागृत कवि कुमार अंबुज अपनी संवेदनशीलता से बहुत असरदार अपूर्कव वित्त रचते हैं। यहाँ सभी कविताओं ने हमें संगत विचार वीथि में विचरण का अवसर दिया। यद्यपि इनमें सच हैं तथापि हमें कविता कला के बेहतर उत्स भी दिखाई देते हैं।

    Reply
  4. त्रिभुवन says:
    1 month ago

    अपमान करने वाली मन:स्थिति कोई क्षणिक आवेग नहीं। वह एक छोटी, तेज और समय लेकर पैनाई गई खुखरी है। उसकी धार दिखती कम और गहरे तक धंसती अधिक है। यह मन:स्थिति नियमों की जिल्द में बँधी प्रतीत होती है, शर्तों की भाषा में लिखी गई दिखती है, और ऐसे हस्ताक्षरों से वैध है कि उसे अलग से पहचानना लगभग अशिष्टता माना जाता है।

    कुमार अंबुज की इन कविताओं में अपमान इसी तरह प्रवेश करता है, खुलता है और विश्लेषित होता है। बिना शोर, बिना घोषणा, बिना किसी तरह भावुकता के। जैसे रक्त में घुलनशील कोई तत्त्व हो, जो पानी के रंग का हो और अपमान की हर बारिश, बौछार या बेशुमार तड़ातड़ के साथ लौट आए।

    कुमार अंबुज मानवीय देह वाले अमानवीय लोगों के भीतर अमानुषिकता की प्रवृत्तियों को पहचानने वाले दुर्लभ कवि हैं। उनकी कविता बताती है कि हम अपमान को सहना नहीं सीखते, हमें यह बहुत बेहतर तरीके से सिखाया-पढ़ाया और आत्मसात करवाया जाता है। उपदेशों, परिपत्रों, नियमावलियों और सुविधाओं की नर्म हथेलियाँ हमें इस अभ्यास तक लाती हैं कि अपमान पर मुस्कराया कैसे जाए। यह मुस्कराहट किसी विजय का चिह्न नहीं, यह हार की वह ऐसी सहज स्वीकार्यता है, जो संस्कार का रूप पा चुकी है।

    हमारे खेत सूखते हैं, तालाब मिटा दिए जाते हैं, वृक्षों को नेस्तोनाबूद किया जाता है, पक्षी अनुपस्थित होने लगते हैं और हम अपनी इंद्रियों पर नहीं, अपनी व्यथाओं पर विजय पा लेते हैं। यह विजय मनुष्य को शोभा नहीं देती, पर जीवन के इन वर्षों में शोभा नहीं, जवाबदेहियाँ माँगी जाती हैं। खेजड़ियाँ काटी जाती हैं और अपमानित होता पूरा रेगिस्तान ठुस-ठुस रोता है। कराहता है। आज अरावली से कहा जाता है कि तू सौ मीटर की है तो कल तय है कि हिमालय से भी यह कहा ही जाएगा। माँ को कहा है तो बेटा कैसे बचेगा? सत्ता के केंद्रीय कक्ष की अपसंस्कृति से उपजती अपमानकारिता मुस्कुराती है, गाती है और अठखेलियां करती है।

    अपमान अपमान नहीं, प्रशासनिक दक्षता, राजनीतिक कुशलता और संवैधानिक अनुशासन है। कहीं वह बारीक अपठ्य अक्षरों में छिपा है, कहीं दरवाज़े के बाहर लगी तख़्ती पर और कहीं क्रूर भाषा वाले संभाषणों में। उसे ठीक से घटित करने के लिए बड़ी-बड़ी तनख़्वाहें हैं, सुव्यवस्थित कक्ष हैं, वातानुकूलित सभागार हैं, विमान यात्राएँ हैं, चार्टर विमानों की सुविधाएँ हैं और कला-साहित्य-संगीत आदि के शीर्ष पर बिठाए गए सुकोमल शब्दों वाले व्याख्याकार हैं, जो चालाकी से दूसरों के धन पर अपने ही वर्ग के सौम्य कवियों पर गर्वीले अपमान की निकृष्ट बौछार करते हैं। कई बार प्रतीत होता है कि अपढ़ कुलपति के अपमान से अधिक अपमान तो हमारे ही भीतर के सुविख्यात सौम्य प्रतीत होते देवपुरुष बन चुके दान बांटते दिव्य लोग कर डालते हैं।

    शीर्ष बैठक में मुस्कान के साथ प्रवेश करने वाला व्यक्ति आँकड़ों से घिरते-घिरते चीख तक पहुँचता है, “मुझे परिणाम चाहिए” कि मानो कह रहा हो, सारी शक्तियां मुझमें हैं और मुझे समग्र राष्ट्र का साष्टांग प्रणाम चाहिए। और इस एक वाक्य में मनुष्यता के तमाम अवशेष समा जाते हैं। वह अपमान से पेश नहीं आना चाहता, पर बाज़ार और उच्चाकांक्षा उसे एक ऐसे मनुष्य में बदल देती है, जिसके शब्द कठोर हो चुके हैं और जिसके विचार अनुपस्थित।

    सहनशीलता यहाँ सुसंस्कार और राष्ट्रप्रेम है, वह हर उस कदम के विरुद्ध खड़ी होती है, जो उसी क्षण ज़रूरी होता है। असहनीयता की भावना और अपमान को बर्दाश्त न करना एक तरह की राष्ट्रविरोधी गतिविधि है। अब यह नई राष्ट्रीय व्यवस्था में एक रचनात्मक विशेषता है। लोककथाएँ उसके पक्ष में हैं, न्यायालयों के कुछ निर्णय भी। उदास चीज़ों से अपेक्षा की जाती है कि वे चमकदार चीज़ों को बर्दाश्त करें। और इस बर्दाश्त के नाम पर पृथ्वी, स्त्री, निर्धन और ग़ुलाम और उपकृत सब एक उदाहरण बन जाते हैं। जैसा कि कुमार अंबुज की कविता सीधे सरल तरीके से हमारे समय पर डाले जा रहे पर्दों को बेधती हुई अपमान के विविध रूप सामने लाती है।

    कवि इस बीच बचाव की कोशिश करता है, पर बच नहीं पाता। न वह चुंबनों को माया मान सकता है, न स्पर्श को। हर ग़लत पर उसे क्रोध आता है और यही क्रोध उसे अकेला कर देता है। विकल्प सिमटते हैं। शिकारी बनो या शिकार। यह कोई तर्क नहीं, यह मौक़ा-ए-वारदात से आई सूचना है। वह जानता है कि वह ख़ुद को नहीं बचा सकता, फिर भी शर्मिंदा नहीं है; उसने इस भार को दूसरे जीवितों पर भी छोड़ दिया है।

    यदि वह घास बनना चाहे तो भी चैन नहीं। घास पर ख़ून गिरता है, चीटियाँ और फूल भगदड़ में दब जाते हैं और सुबह की रोशनी में ओस कुछ अजीब ढंग से चमकती है। संगीत सुनने की इच्छा भी मरम्मत की तरह हो जाती है। प्रकृति की शरण भी अब सुरक्षित नहीं, अपमान वहाँ भी अपनी दीर्घ छाया फैलाए बैठा है। पैसा, पावर और पायलगावन कामना आ जाए तो अल्पप्रतिभ कवि भी असाधारण काव्य प्रतिभा को अपमानित करने का मौक़ा कहाँ छोड़ता है। अपमान हमारी भंगिमा में संकेतों की तरह बसता-रचता और हुलसता है।

    लेकिन अपमानों में भी सबसे बुरा अपमान उन लोगों का है, जो हमारे बीच से चले गए हैं। इस अपमानित देह, अपमानित लोक और अपमानित संस्कृति को छोड़कर। और फिर असहमति है। भीतर छिपी हुई, पर जीवित। ज्ञात में भरोसा रखते हुए अज्ञात की ओर देखना। क्षमा कोई देवत्व नहीं, ऊबड़खाबड़ नैतिक रास्ता है। आज की रात आत्महत्या न करना, यही सबसे बड़ी उम्मीद है। दुनिया समझने वालों के लिए आज भी उतनी ही कठिन है, जितनी हज़ार साल पहले थी। अबूझ, मकड़ी के जालों से भरी, उदारता दिखाती हुई तलवार के साथ।

    कविता कभी शरणस्थली बनती है, कभी क़त्लगाह। अपमानकारिता की जो बंदूक कविता में चलती है, वही जीवन में भी चलती है। चौराहों पर उम्मीद लिए झपटते बेरोज़गार लौट आते हैं। अपमानित। खाते-पीते लोग गरीबी पर यक़ीन नहीं करते; वे एक वाक्य गढ़ते हैं, “अब कोई ग़रीब बचा ही नहीं” और इस वाक्य से हिंसा को आराम मिल जाता है।

    रात में एक अपमान याद आता है तो कई अपमान एक साथ लौट आते हैं। अपमानों की स्मृति एक पुल बनती जाती है, जिसके नीचे भय सरक जाता है। और अंततः चुप्पी। वह चुप्पी जो पूछताछ में अपमान की तरह गिरती है, जो हिंसा को उकसाती है और जो अंततः गोली का कारण बनती है। जिन्होंने सब कुछ बताया था नाम, पता, पहचान; वे भी मारे गए थे।

    कुमार अंबुज की इन ग्यारह कविताओं का संयुक्त स्वर यही है: अपमान को सामान्य बना लेने की प्रक्रिया मनुष्यता को भीतर से निर्जीव करती है। सत्ता-प्रियता उसे नियम, संस्कार और सहनशीलता के रूप में वैध ठहराती है। कविता इस वैधता के विरुद्ध खड़ी है। नारे की तरह नहीं, उस धीमी, अनवरत लय में, जिसमें शब्द स्मृति बनते हैं और स्मृति प्रतिरोध। जहाँ अपमान सामान्य लगता है; वहीं से मनुष्य को दोबारा मनुष्य बनाने की यात्रा शुरू होती है।

    अगर कवि की कहानी को ही साथ ले लें और इसी संदर्भ में देखें तो वह इस कालखंड के गहरे ट्रैजिक बोध को रेखांकित करती है। कवि इस कहानी में स्वयं को ही अपमानकारी तत्त्व की तरह रखकर अपमान से उपजते अवसाद को इस तरह समझाता है कि वह रुलाते-रुलाते उद्वेलित करता है और झकझोर देता है। वे दिखाते हैं कि किस तरह हमारे आसपास से लेकर पूरे राष्ट्र तक अपमान का एक बादल बरस रहा है और इस अपमान की आवाज़ हर सीने में गूंज रही है। अब अपमान जैसे एक सर्वऋतु मानसून है; लेकिन सतत अपमानों की प्रक्रिया से गुजरा व्यक्ति जिस कुशलता से अपमान कर लेता है, वह जीवन में कभी अपमानित न हुआ व्यक्ति कदापि नहीं कर सकता। इसीलिए अपमान बहुत से लोगों के अभ्युदाय का मार्ग है।

    ये ग्यारह कविताएँ और एक कहानी दरअसल विनाश की ओर बदहवास भागते समय का ही नहीं, वासना में डूबते जा रहे एक लिजलिजे कालखंड की जुगुप्सा का रेखांकन भी हैं। अपमानकारिता वाली मन:स्थिति एक मनोज रूपड़ा को प्रभावित नहीं करती, वह कुछ या बहुत सारे लेखकों को भी प्रभावित नहीं करती, वह बताती है कि सत्ता शक्ति की चमकती त्वचा के नीचे मनुष्यता की कराह किस तरह गरिमाहीन रहकर भी असामान्य को सामान्य मान लेती है। कुमार अंबुज ने अपमानों के अपरिमित सुख में सत्ता शक्ति के इर्दगिर्द घूर्णन करते पतनशील चेहरों को नग्न और निर्वस्त्र किया है। नग्न भी, निर्वस्त्र भी!

    Reply
  5. Anonymous says:
    1 month ago

    सारी कविताएँ हमें सोचने पर विवश करती हैं । मुझे तो आजकल हर परिस्थितियों में , हर घटना पर , हर कहीं इसी तरह का माहौल नजर आ रहा है । सोच रही हूँ इस घटना में मनोज रूपड़ा की जगह कोई महिला होती तो और क्या गत होती ।

    Reply
  6. Balram Kanwat says:
    1 month ago

    इस विषय पर ऐसी कविताएं अकल्पनीय हैं, कुमार अंबुज जी के पास ही ऐसी दृष्टि है, उनकी सादा दिली और गहरी नजर का मेलजोल बहुत प्रभावित करता है।

    Reply

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