काँवड़ यात्रा
परिघटना से परिणति तकराजाराम भादू

हिन्दी में समाज-विज्ञान में मौलिक लेखन बहुत कम होता है- यह अहसास लगभग पूरे हिन्दी परिदृश्य में तारी है. अक्सर कहा जाता है कि हिन्दी में ईपीडब्ल्यू (इकानामिक एंड पॉलिटिकल वीकली) और सेमिनार जैसी पत्रिकाएं नहीं है. हिन्दी प्रकाशक भी लंबे समय तक साहित्य के ही प्रकाशक बने रहे. ग्रंथ शिल्पी (श्यामबिहारी राय द्वारा संचालित) शायद ऐसा एकमात्र प्रकाशन था जो हिन्दी में साहित्येतर किताबें छापता था. लेकिन उसकी पहुँच भी इतिहास और सैद्धांतिक किताबों के अनुवाद तक सीमित रही और उनमें से कई अनुवादों को लोग अच्छा नहीं मानते थे. एक समय गौतम नवलखा द्वारा निकाली सांचा पत्रिका अंग्रेजी पत्रिकाओं जैसी स्तरीय थी. पहल (सं. ज्ञानरंजन) ने आरम्भ से ही साहित्येतर लेखन को भी अहमियत दी, किन्तु उन्हें भी प्रायः अनुवादों पर निर्भर रहना पड़ा. तद्भव में अखिलेश ने शुरू से ही यह नीति रखी कि वे हिन्दी में लिखे समाज वैज्ञानिक लेखन को ही पत्रिका में जगह देंगे. उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से आग्रह करके लिखवाया और उसके बहुत अच्छे नतीजे सामने आये.
समयान्तर को पंकज बिष्ट ने हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप रूपाकार देकर उसे समय-सापेक्ष सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक लेखन को समर्पित किया. मासिक पत्रिका सब लोग (सं. किशन कालजयी) का भी इस संदर्भ में उल्लेख होना चाहिए. तदनंतर सीएसडीएस से अभयकुमार दुबे के संपादन में प्रतिमान शुरू हुई और राजकमल प्रकाशन ने सामाजिकी (सं. बद्री नारायण) निकालना आरम्भ किया. बेव पत्रिका समालोचन का रुख तो आरंभ से ही हर क्षेत्र में चिंतन और सृजन के प्रति समावेशी रहा है. इधर हिन्दी के करीबन सभी महत्वपूर्ण प्रकाशकों ने साहित्येतर किताबों को अहमियत देना शुरू कर दिया है. इसका सुफल है कि समाज विज्ञानों के क्षेत्र में अंग्रेजी का वर्चस्व टूट रहा है तथा इन विषयों में हिन्दी में मौलिक और गंभीर लेखन के लिए जरूरी वातावरण बनने लगा है. यह संक्षिप्त विवरण मैं ने उस परिप्रेक्ष्य की ओर संकेत देने के लिए प्रस्तुत किया है जिसमें सामाजिक अध्येता नरेश गोस्वामी की मूलतः हिन्दी में लिखी किताब काँवड़ यात्रा: लोकधर्मिता का नेपथ्य (सेतु प्रकाशन) सामने आयी है.
हरिद्वार से गंगा जल लाने के लिए की जाने वाली काँवड़ यात्रा पिछले तीन दशकों के दौरान उत्तराखण्ड, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली एनसीआर में वार्षिक परिघटना बन चुकी है. नवें दशक के आरम्भ तक यह लगभग एक अल्प ज्ञात उपक्रम थी. इसके क्रमिक विकास, विस्तार और प्रभाव का नरेश गोस्वामी ने इस सांस्कृतिक अध्ययन में वस्तुपरक विश्लेषण किया है. वे बताते हैं कि कैसे इसमें श्रद्धालुओं की संख्या क्रमशः बढ़ती चली गई और इसकी परिणति एक विशाल जन- परिघटना में हो गयी. व्यक्ति केन्द्रित आस्था अब एक सामुदायिक प्रदर्शन है जो विराट सार्वजनिक दृश्य की निर्मिति करती है. काँवड़ यात्रा के अध्येता इस परिघटना को एथनोग्राफिक विवरणों, लोकधर्मिता व शास्त्रोक्त धार्मिकता के द्वंद्व, शहरी नागरिकता की परिधि पर रहने वाले समूहों के सामाजिक-आर्थिक प्रोफाइल तथा काँवड़ यात्रियों के नैतिक प्रतिरोध आदि जैसे आयामों के तहत समझने का प्रयास करते रहे हैं. नरेश इन अध्ययनों को संज्ञान में लेते हुए इस परिघटना के शक्ति संरचनाओं से सहसंबंध और कुछ नये बनते समीकरणों की भी टोह लेते हैं.
काँवड़ यात्रा में समय के साथ आये बदलावों के फलस्वरूप धर्म का एक अनुष्ठान सार्वजनिक स्थानों तथा सड़कों पर आ गया है. इसमें सिर्फ काँवड़ यात्रियों की ही भूमिका नहीं रह गयी है बल्कि इसका एक व्यवस्थित आयोजन तंत्र बन गया है जिसमें स्थानीय नेता, पारंपरिक अभिजन समूहों से लेकर नव-धनिक वर्ग और छोटे-बड़े व्यवसायी समूह शामिल रहते हैं. इस क्रम में यह आयोजन स्वत: स्फूर्त आस्था से आगे एक प्रबंधित प्रदर्शन बन गया है.
इस रूपान्तरण की पृष्ठभूमि में झांकते हुए नरेश गाँव में आये परिवर्तन की ओर जाते हैं और पाते हैं कि वहाँ खेती अब जीवन यापन का मुख्य आधार नहीं रह गयी है. गाँव में कई किस्म के आधुनिक बदलाव आये हैं लेकिन लोगों की लोकतांत्रिक चेतना में कोई खास इजाफा नहीं हुआ है. वहाँ मोबाइल और मीडिया ने जैसा वातावरण निर्मित किया है उसके चलते गाँव का आदमी ग्रामीण दुनिया से कम और काल्पनिक दुनिया से ज्यादा जुड़ गया है. पिछली सामाजिकता से विच्छिन्नता ने एक अस्थिर सामाजिकी को जन्म दिया है जिसमें वैश्विक बाजार का हिस्सा बनना सबलीकरण की प्रक्रिया में शामिल है. किन्तु सब लोग तो इस प्रक्रिया का हिस्सा हो नहीं हो सकते हालांकि मध्यवर्ग की संख्या तो वहाँ बढ़ती जा रही है. इस अध्ययन का फोकस दिल्ली का विस्तारित क्षेत्र व एनसीआर इलाका है. उसमें संदर्भित गाँव भी इसी कैचमेंट एरिया में स्थित हैं.
पिछले दशकों में धार्मिक पुनरुत्थान और अनुष्ठान बढ़ते गये हैं. हिन्दुत्ववादी शक्तियों का जोर प्रदर्शनकारी धार्मिक आयोजनों के उभार पर ज्यादा रहा है. दूसरे पक्ष की राजनीति भी स्थानीय स्तर पर इनका विरोध नहीं कर पाती और रक्षात्मक रूप से इनमें शामिल होती है. काँवड़ प्रसंग भी इसी व्यापक लोक वृत्त का हिस्सा है. धीरू भाई सेठ के हवाले से नरेश बताते हैं कि काँवड़ के इस संदर्भ-लोक में अन्तर्जातीय संबंधों का ही नहीं, बल्कि उसका धार्मिक संदर्भ भी तिरोहित हो गया है.
उक्त परिक्षेत्र में आजीविका के पारंपरिक स्रोतों से वंचित हुए लोगों के जीवन में दिल्ली एक जरूरी विकल्प बनता गया है. नये शहरी समाज का मध्यवर्ग अपनी पहुँच बढ़ाने के लिए धार्मिकता में विनियोग करता है क्योंकि यह उन्हें सार्वजनिक स्पेस में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का अवसर देता है. काँवड़ में भागीदारी को यह अध्ययन गुमनामी, बेरोजगारी और हाशिये पर पडे युवाओं के सामूहिक प्रतिकार के रूप में भी देखता है. जो लोग इसकी यात्रा के प्रबंधन से जुड़े हैं वे अपनी इस धार्मिकता में विरेचन के क्षण पाते हैं.
काँवड़ यात्रा को आस्था और पर्यटन का एक सबाल्टर्न संस्करण कहा जा सकता है. एक ओर यह जन-सामान्य के सचेत धार्मिकीकरण की प्रक्रिया है तो दूसरी तरफ धर्म के लोकवृत्त, बाजार और राजनीति के मध्य त्रिकोणीय संक्रिया है जिसको हिन्दू धर्म को एकाश्मिक रूप देने की ओर प्रवृत्त किया जा रहा है. इस क्रम में नरेश गोस्वामी द्वारा विश्व हिन्दू परिषद् की एकात्मकता यात्रा (1983), रथयात्रा (1990), एकता यात्रा (1991), जनादेश यात्रा (1993), सुराज रथयात्रा (1996), राष्ट्रभक्ति की तीर्थयात्रा (1997) और सुरक्षा यात्रा (2006) की राजनीतिक पृष्ठभूमि को प्रस्तुत किया गया है. किन्तु जेफ्रेला के अनुसार, काँवड़ की तीर्थयात्रा राजनीतिक यात्रा का प्रतिरूप नहीं है. उसकी एक विशिष्ट सांस्कृतिक जमीन है जो लोक-परंपरा की स्मृति में निहित है. जबकि जेम्स जी. लोक्टफेल्ड काँवड़ के संगठित यात्रा के रूप में उभार को हिन्दुत्व की सहवर्ती घटना मानते हैं. उनके अनुसार हिन्दुत्व की एक प्रमुख रणनीति सार्वजनिक अनुष्ठानों को लोकप्रिय बनाने की थी ताकि भारत के सार्वजनिक स्पेस पर हिन्दुओं की दावेदारी सिद्ध की जा सके.
काँवड़ यात्रा के प्रसंग में नरेश धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा की जटिलता पर भी चर्चा करते हैं.
आशीष नंदी एक लेख में कहते हैं कि सेकुलरवाद साधारण धार्मिक लोगों से नफरत करता है. वह धार्मिक परंपराओं में उपलब्ध सहिष्णुता का उपयोग नहीं करना चाहता. त्रिलोकीनाथ मदन की मान्यता है कि भारत में धार्मिकता अंततः सेकुलर दायरे को अपने अंदर समेट लेती है. इसलिए इन समाजों में सेकुलरवाद का कोई स्वायत्त आधार नहीं बन पाता और वह इस क्षेत्र के बृहत्तर समाज से जुड़ेने के बजाय मुट्ठी भर लोगों का स्वप्न बनकर रह जाता है. जबकि सेकुलरवाद का एक और पक्ष एक धर्म-बहुल राज्य में सामाजिक सह-अस्तित्व की अनिवार्यता को इसका विधेयक तत्व मानता है.
अध्ययन में माना गया है कि सेकुलर विमर्श सिर्फ अंग्रेजी तक सीमित रहा और यह जनसाधारण तथा स्थानीय परंपराओं से असंपृक्त रहा. फलत: छोटी पहचानों की बैचेनी काँवड़ जैसी वृहत परिघटनाओं में समायोजित हो रही हैं.
काँवड़ के इतिहास विषयक अध्ययनों का जायजा लेते हुए नरेश गोस्वामी लोक्टफेल्ड की स्थानिक प्रतिस्थापन की अवधारणा का उल्लेख करते हैं जिसमें किसी एक तीर्थ को अन्यत्र प्रतिरोपित कर दिया जाता है. इस तरह हम काशी (बनारस) के अन्य रूप-दक्षिण काशी व शिवाकाशी, उत्तरकाशी एवं गुप्त काशी आदि तथा प्रयाग की तर्ज पर उसके देवप्रयाग, नंदप्रयाग व कर्णप्रयाग (उत्तराखण्ड में) आदि जैसे प्रतिरूप देख सकते हैं. लोक्टफेल्ड के हिसाब से हरिद्वार की काँवड़ वैद्यनाथ, देवघर की काँवड़ यात्रा का प्रतिस्थापित रूप है. अध्येता विकास सिंह सचेत करते हैं कि धर्म की लोक-प्रचलित अभिव्यक्ति को हिन्दू राष्ट्रवाद अथवा कट्टरता की अभिव्यक्ति मानने की गलती नहीं की जानी चाहिए. उनके अध्ययन का सरोकार धार्मिक परिघटना की बाहरी संरचना के बजाय उसकी आंतरिकता से है.
रीमा बोस ने सांस्कृतिक मानवशास्त्र और मणीन्द्र नाथ ठाकुर ने सीमांत समुदायों के हस्तक्षेप के रूप में इस परिघटना का विश्लेषण किया है. काँवड़ यात्रा के बदलते स्वरूप के पीछे डिजिटल तकनीक की व्यापक भूमिका है जो रोमांच और आनंद के अवसर लेकर आती है. काँवड़ की परिघटना को नरेश ने धार्मिकता के इर्दगिर्द उभरे प्रबंधन तंत्र, सेवा समितियों, जनसंपर्क आदि की अनौपचारिक राजनीतिक अन्तर्क्रिया के जरिए समझने का प्रयास किया है. वे मानते हैं कि काँवड़ को महज हिन्दुत्ववादी राजनीति की परियोजना नहीं कहा जा सकता. यह यात्रा जिस सामाजिक स्पेस में संभव होती है उसे एकाश्मिक या समरूप नहीं कहा जा सकता. इसी तरह काँवड़ लाने वाले श्रद्धालुओं और शिविर का प्रबंध करने वाले समस्त प्रबंधकों तथा कार्यकर्ताओं को हिन्दुत्व की श्रेणी में रखना अतिसरलीकरण होगा.
अगले अध्याय में वे हिन्दू धर्म के दो स्तरीय युग्म-संस्कृतनिष्ठ और संस्कृतेतर के रिश्तों का विवेचन करते हैं जिन्हें हम प्रायः शास्त्र और लोक का द्वंद्व कहते रहे हैं. लोकधर्म भी सांस्कृतिक चेतना की एक संरचना है. विभिन्न विचार-सरणियों से गुजरते हुए नरेश पाते हैं कि लोकधर्म किसी समूह के कुछ निश्चित व्यवहार और विश्वासों पर आधारित होता है. इसमें जादू, अतार्किक विश्वास, प्रकृति के साथ निकटता, इहलौकिक दृष्टिकोण तथा मुक्तिदाता और संकटमोचक व्यक्तित्व की आराधना जैसे तत्व प्रबल होते हैं. उनके अध्ययन क्षेत्र में काफी संख्या प्रवासी आबादी की है जो एक साथ दो परिवेशों में रहती है और वस्तुतः लोक का ही विस्तार है. एम. एन. श्रीनिवासन ने संस्कृतिकरण की अवधारणा प्रस्तुत की थी जिसमें हिन्दू जाति, आदिवासी अथवा अन्य समूह की निम्न जातियों द्वारा उच्च जाति के रीति-रिवाजों का अनुसरण किया जाता है. हिन्दुत्व की शक्तियों द्वारा इस प्रक्रिया को समरूपीकरण की ओर प्रवृत्त किया जा रहा है जिसमें हिन्दू धर्म की अन्तर्निहित बहुलताओं को आच्छादित किया जा रहा है. हिन्दू धर्म की बहुलताओं को नष्ट किये बिना हिन्दुत्व अपनी राजनीतिक परियोजना में सफल नहीं हो सकता. हिन्दू समुदाय के अधीनस्थ वर्गों द्वारा सचेष्ट सामाजिक गतिशीलता को हिन्दू धर्म के मानकीकरण से जोडने की प्रवृत्ति को भी लक्षित किया जा सकता है.
हिन्दू धर्म की मूलतः बहुदेववादी है जिसमें श्रुति और स्मृति परंपराएं सक्रिय रही हैं. हिन्दू धर्म के संहिताकरण के प्रयास प्राच्य विद्या ( इंडोलोजी ) के तहत किये गये थे. तदनंतर मिशनरियों द्वारा आदिवासियों के धर्मांतरण के प्रतिकार में हिन्दू चेतना सक्रिय हुई और पुनरुत्थान का सिलसिला शुरू हुआ. पहले हिन्दू धर्म आस्थाओं, परंपराओं तथा सम्प्रदायों के एक विकेन्द्रित ढांचे की तरह था. सामाजिक-धार्मिक सुधार आन्दोलनों के भी एक हिस्से में हिन्दू धर्म की एकाश्मिक कल्पना थी. इस संदर्भ में नरेश गोस्वामी ज्योतिर्मय शर्मा के संदर्भ से हिन्दू धर्म के चार उन्नायकों- दयानंद सरस्वती, अरविन्द घोष, विवेकानन्द तथा विनायक वीर सावरकर में विलक्षण संगति देखते हैं. भारत में मध्य वर्ग का सतत विस्तार हुआ है जो सांस्कृतिक पूंजी का नियंता होता है. इसी के समानांतर चलती संस्कृतिकरण की बहुमुखी प्रक्रिया है और दलित एवं आदिवासी भी उसके दायरे में आ गये हैं. इस दौरान हिन्दू धर्म का एक नया विन्यास गढ़कर उसकी रीपैकेजिंग की गयी है जिसे संस्कृति के वैकल्पिक माडल की तरह परोसा जा रहा है.
एक और अध्याय में नरेश गोस्वामी अपने अध्ययन परिक्षेत्र को सीमांत के रूप में देखते हैं जिसके सामुदायिक-स्थानिक स्पेस में राज्य की नागरिक संस्थाओं का ढांचा बहुत प्रभावशाली नहीं होता. इस दृष्टि से दिल्ली के अधिकतर नागरिक सीमान्त के नागरिक कहे जा सकते हैं. उन्हें संजीब मुखर्जी का पद सबाल्टर्न नागरिक समाज इस संदर्भ में मौजूं लगता है जिसमें दलित और वंचित समुदाय भी शामिल होते हैं. धार्मिक अनुष्ठान उनके लिए सामूहिक अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करते हैं. असल में, संविधान में जिस तरह के अधिकार-सम्पन्न नागरिक की कल्पना की गयी है, वैसा नागरिक जमीन पर नहीं मिलता.
दिल्ली कोई बहुत नियोजित शहर नहीं रहा, उसकी आबादी की विभिन्न श्रेणियों को नरेश तालिकाओं में दर्शाते हैं. मास्टर प्लान में दिल्ली शहर का निर्माण करने वाली श्रमशक्ति के लिए आवास के कोई प्रावधान नहीं किये गये थे. नतीजतन उन्हें जहाँ जगह मिली, परिधि पर बसते गये. काँवड़ के धार्मिक उपक्रम ने उन वाशिंदों को सत्ता-संरचनाओं की ओर बढ़ने का एक प्रवेश द्वार प्रदान किया, जहाँ से वे अपनी आधारभूत समस्याओं को लेकर भी आवाज उठा सकते थे. नरेश ने अपने फील्डवर्क से अर्जित तथ्यों के आधार पर लोक- धार्मिकता और सत्ता-राजनीति के बीच निर्मित होते सहसंबंध को प्रस्तुत किया है.
दिल्ली में अध्ययन परिक्षेत्र के निवासी अनधिकृत बस्तियों की अनिश्चितता से धीरे- धीरे नियमितीकरण की अवस्था में पहुंचे हैं. शहरीयत और ग्रामीणता के संधिस्थल में वे नागरिकता के बीच झूलते रहे और मध्यवर्गीय से अधिक मध्यवर्ती रहे. उनके बीच एक ऐसी मिश्रित आबादी रहती है जिसे न सम्पन्न माना जा सकता है और न ही झुग्गी-झोंपडियों के वाशिंदों की तरह निपट साधनहीन व निर्धन कहा जा सकता है. पार्थ चटर्जी की शब्दावली में यह नागरिक की बजाय राजनीतिक समाज रहा है जिन्होंने संपर्कों का एक अनौपचारिक तंत्र विकसित किया है. शहर के कथित नागरिक समाज के लिए यह दिल्ली अनिच्छित शहर रहा है जबकि गरीब लोग शहर का अपरिहार्य अंग होते हैं.
न्याय तंत्र इस सबाल्टर्न अर्वनिज्म को लेकर निर्मम रहा है और उसके निर्णयों के फलस्वरूप दिल्ली की कई आबादियां उसके नक्शे से साफ हो गयीं. इस प्रसंग में नरेश काँवड़ समितियों द्वारा निभाई जन-सशक्तिकरण की भूमिका को रेखांकित करते हैं. ऐसी समितियों के इर्दगिर्द विभिन्न जातियाँ भी गोलबंद हुई हैं और एक दबावकारी संरचना के रूप में सक्रिय हुई हैं. उनके बैनर- पोस्टर उनकी सामूहिक शक्ति के विज्ञापन- पट का काम करते हैं और राजनीतिक शक्तियों को आकर्षित करते हैं.
काँवड़ यात्रा के उभार का यह अध्ययन तब और दिलचस्प हो जाता है, जब पता चलता है कि हरिद्वार के इतिहास और दिल्ली-एनसीआर की परंपराओं में इस यात्रा की प्राचीनता के प्रमाण नहीं मिलते हैं. इस सिलसिले में नरेश कई दस्तावेजों को खंगालते हैं. काँवड़ यात्रा के संदर्भ में दो अंग्रेज यात्रियों- रेजिनाल्ड हैबेर (1828) तथा बयार्ड टेलर (1855)- के वृतान्तों से इसके उन्नीसवीं सदी में प्रचलित होने के साक्ष्य मिलते हैं. लेकिन इसके बाद 1980 के दशक तक सार्वजनिक स्पेस में काँवड़ का कोई खास जिक्र नहीं मिलता.
निष्कर्षत: लोक-धर्मिता की एक अभिव्यक्ति के रूप में यह यात्रा लोकस्मृति में विन्यस्त थी, परन्तु आठवें दशक के बाद, विशेषकर नये दशक में इसका पुनराविष्कार हुआ है. इसके अन्त: सूत्र स्थानीय राजनीति में खुलते हैं. पुस्तक की भाषा और प्रवाह इसकी गवाही देता है कि मूलतः हिन्दी में लिखी ऐसी किताब कितनी जीवंत हो सकती है. प्रस्तुत शोध- अध्ययन बहुत संरचनात्मक नहीं है, यह किसी संस्थान या समूह की पहल नहीं है, एकल अध्ययन की अपनी सीमाएँ हैं. निश्चित रूप से इस अध्ययन में आये गाँव (जो महानगरीय परिधि में हैं. ) से दूरस्थ गाँव की स्थितियां भिन्न होंगी. बहरहाल, इस सांस्कृतिक अध्ययन का स्वागत होना चाहिए.
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| राजाराम भादू 24 दिसम्बर, 1959 भरतपुर (राजस्थान) समकालीन जनसंघर्ष’, ‘दिशाबोध’, ‘महानगर’ पत्र-पत्रिकाओं का संपादन. ‘कविता के सन्दर्भ’ (आलोचना); ‘स्वयं के विरुद्ध’ (गद्य-कविता), ‘सृजन-प्रसंग’ (निबन्ध), धर्मसत्ता और प्रतिरोध की संस्कृति आदि कृतियाँ प्रकाशित. rajar.bhadu@gmail.com |




नरेश जी ने यह महत्वपूर्ण काम किया है। जिस परिघटना को नकार कर आगे बढ़ने का चलन है, उसमें गहरे उतर कर काम करना और लोक-पक्ष का समूचा दस्तावेज़ तैयार करना श्रमसाध्य भी है।
Naresh Goswami ने सचमुच अछूते विषय को अध्ययन के लिए चुना और उसे समग्रता में देखने-समझने का काम किया है। लाख ग्लोबलाइजेशन हो गया हो, समाज और उसकी आंतरिक गतियों की स्थानीयता का नगण्यीकरण नहीं होना चाहिए।कोई गौर से देखेगा, अंतरंग पड़ताल करेगा तभी सुधार के सूत्र निकल कर आयेंगे। धर्म और उसके उपयोग दुरुपयोग कहीं नहीं जाने वाले।
राजाराम मोहन राय और दयानंद सरस्वती, पेरियार, ज्योतिबा फुले और अम्बेडकर जैसे विचारकों-सुधारकों के हस्तक्षेप की आवश्यकता बनी रहेगी। सूचना और शिक्षा के नये तूफ़ानों के इस दौर लॉजिकल और एविडेंस बेस्ड समाजशास्त्रीय अध्ययनों के आधार पर ही परिवर्तन की पहल सम्भव है।
नरेश भाई को बहुत बधाई।
राजाराम भादू जी ने बहुत अच्छी चर्चा की है। समालोचन बड़ा काम कर रहा।
हिंदी में समाज विज्ञान में स्तरीय और मौलिक काम बहुत कम है।नरेश जी की यह पुस्तक अपने आप में मील जा पत्थर साबित होगी, ऐसा विश्वास है।उनको हार्दिक शुभकामनाएं।