| लफ़्फ़ाज़ व्यूह-रचना और आलोचनात्मक विवेक नरेश गोस्वामी |

अगर पिछले दस वर्षों की कुछ सबसे अहम और स्मरणीय कहानियों की फ़ेहरिस्त बनाई जाए तो उसमें योगेंद्र आहूजा की कहानी ‘लफ़्फ़ाज़’ निर्विवाद रूप से शामिल की जाएगी. कपट, छल, धूर्तता, प्रवंचना तथा नैतिक और वित्तीय बेईमानी जैसी प्रवृत्तियों का सामाजिक-राजनीतिक स्थापत्य अनावृत्त करती यह कहानी न केवल हमारे बहुमुख, ग्रंथिल और अक्सर पकड़ से छूट जाने वाले सार्वजनिक यथार्थ की अक्कासी करती है बल्कि डेमागॉगी की अवधारणा और उसके विमर्श को भी समृद्ध करती है.
तीन साल पहले जब मैंने यह कहानी पहली बार पढ़ी थी तो मैं लंबे समय तक इस पशोपेश में रहा था कि इस कहानी का गुरुत्व केंद्र कहाँ स्थित है? यह भी कि इसके मुख्य चरित्र को बहरूपिया माना जाए या अनेक व्यक्तित्वों की एक मिश्रित-संघनित इकाई? अभी पिछले दिनों लफ़्फ़ाज़ के अंग्रेजी अनुवाद के लोकार्पण पर आयोजित चर्चा में योगेंद्र आहूजा ने यह कहा कि उनकी यह कहानी किसी चरित्र के बजाय उसके लक्षणों के इर्दगिर्द बुनी गई है.
एक)
लफ़्फ़़ाज़ एक व्यक्ति नहीं है. अगर कहानी के सारे प्रसंगों को छल की एक श्रृंखला माना जाए तो हर घटना के पीछे अलग-अलग लफ़्फ़़ाज़ हैं. कहानीकार की कल्पना का मौलिक उन्मेष यह है कि उसने अलग-अलग घटनाओं को अंजाम दे रहे लफ़्फ़़ाज़ों को एक छवि में समाहित कर दिया है. मेरे ख़याल में इस युक्ति के बग़ैर यह कहानी उस इच्छाधारी यथार्थ को डीकोड नहीं कर सकती थी जो लफ़्फ़़ाज़ के इतने रूपों और उसकी बेशुमार तरक़ीबों में व्यक्त हुई है. एक तरह से यह कहानी एक वृहत्तर, अनुभूत लेकिन साथ ही बिखरे हुए या अकेंद्रित सार्वजनिक यथार्थ को एक जगह और फ्रेम में लाने का प्रयत्न करती है. ग़ौरतलब हैं कि लफ़्फ़़ाज़ की पेशबंदी, चालें, तरक़ीबें और चालाकियाँ यथार्थ के मॉडल पर आधारित है. वह यथार्थ के प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल करते हुए अपने हित साधता है. वह जानता है कि लोगों को ठगने के लिए उसे यथार्थ की छवियों और अंशों का ही इस्तेमाल करना होगा. वह अपनी हर योजना में इसलिए सफल हो पाता है क्योंकि पीडि़त अपने दुसह्य यथार्थ से बचना चाहते हैं. पीडि़त उस पर इसलिए यक़ीन करते हैं कि वह उन्हें यथार्थ की चोटों, उससे पैदा होने वाले दुखों से उबार लेगा. इस अर्थ में लफ़्फ़़ाज़ एक तेज़-तर्रार मनोवैज्ञानिक होता है.
दरअसल, लफ़्फ़़ाज़ के पास वह नज़र है जो मानवीय कार्य-व्यापार की किसी भी प्रदत्त स्थिति में अपने इच्छित लक्ष्य को वेधने की क्षमता रखता है. यह कोई सामान्य क्षमता नहीं है. वह जानता है कि लोगों को अपनी समस्याओं और वंचनाओं का समाधान चाहिए. इस तरह, वह उनके दुखों के प्रबंधन और प्रोसेसिंग से अपना सुख तैयार करता है. वह अपने शिकार को उसकी मनोवांछित दुनिया का सपना दिखाता है. यह एक जाना-माना मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि तनाव और अभाव में जी रहा व्यक्ति अपनी मुक्ति के किसी भी सुझाव या प्रस्ताव को बहुत जल्द स्वीकार करता है.
लफ़्फ़़ाज़ का पूरा खेल इसी युक्ति के इस्तेमाल पर टिका है. वह अपने हाथों ठगे जाने वाले व्यक्ति के भीतर यह भरोसा पैदा करता है कि वह उसके संकटों को दूर कर देगा.
ज़ाहिर है कि अपने मक़सद को हासिल करने के लिए लफ़्फ़़ाज़ हर बार नए चेहरे के साथ उपस्थित होता है. प्रस्तुत कहानी में उसके कम से कम दस चेहरों की निशानदेही की जा सकती है. लेकिन, ग़ौर करें कि वह इन चेहरों के संयोजन से अनंत छवियाँ बना सकता है. एक जगह वह बैंक के मैनेजर को अपने वाग्जाल में फंसाकर पैसों की ठगी करता है. दूसरी जगह भीड़ को हिंसा के लिए उकसाता है. तीसरी जगह अमन और शांति का पैरोकार बन जाता है.
दो)
लफ़्फ़़ाज़ : दस चेहरे
1. उसके चेहरे पर मुस्कराहट यकलख़्त आती थी, यकलख़्त जाती थी. खटाक से मुस्कराना, खटाक से सीरियस. यह इतना डरावना लगता था कि कोई भी काँप जाये. उसके पास बेशुमार लफ्ज़ थे, लफ्ज़ ही लफ्ज़, जो साफ़ उच्चारण और सटीक आरोहों अवरोहों में, उसी डरावनी मुस्कान या गर्वीले गुस्से के साथ, जैसी जरूरत हो, उसके मुँह से इस तरह निकलते थे जैसे सांपों की पांत, वह बिल्कुल सही जगहों पर बलाघात देते और सही जगहों पर खामोशियाँ अख्तियार करते, बोलता जाता था, बोलता ही चला जाता था, घंटों और दिन भर लगातार. (10)
2. मैंने फाइल खोली और देखा पहले ही पेज पर एप्लिकेशन के ऊपरी कोने में उन जनाब यानी श्रीमान लफ़्फ़ाज़ का फोटो. मैंने उसे देखा तो देखता ही रहा. वह तो एक संत जैसा मासूम, निर्विकार चेहरा था. आँखों में देखो तो वहाँ नश्वर संसार के प्राणियों के दुखों के लिये करुणा दिखती थी और होंठों पर ऐसी सौम्य मुस्कान जैसे उसे स्थितप्रज्ञता हासिल हो गई हो, या कायनात के रहस्यों की कुंजी या कोई अंतिम, चरम सत्य जिसके लिये दुनिया भटक रही है. (15)
3. वह कोई मामूली शख्स नहीं था. बातें करते हुए रुआँसा हो जाता था, तक़रीरें करने लगता था. जो भी उसे सुनता था, शर्मिंदा हो जाता था कि देश कैसी मुसीबत में है, और वह…. वह हर वक़्त उद्विग्न नज़र आता था. हमने ग़लत रास्ता चुन लिया है. हम जिस ओर जा रहे हैं, वहाँ बरबादी है, केवल बरबादी. हाँ, बस इतना ही कहता था वह. कहाँ क्या ग़लत हुआ और कैसे ठीक किया जाये इसके बारे में कुछ नहीं…. (16)
4. …वह तक़रीर करने लगा. ऊँची आवाज़ में. हमें नये सिरे से शुरुआत करनी होगी, एक छोटी-सी, नन्हीं सी शुरुआत. अँधेरा है, लेकिन कब तक इसका शोक मनायेंगे. बेहतर है कि एक शमा खुद जलाई जाये. उसकी आवाज़ दूर तक जा रही थी. सब लोगों का ध्यान आकर्षित हो गया. स्टाफ उसकी बातें सुनने मेरे कमरे में चला आया. (16)
5. … उसके चेहरे पर बेपनाह चिंता होती थी कि मुल्क का मुस्तक़बिल क्या है. मुल्क को कोई अभिशाप लगा है. फिर वह बच्चों पर आकर रुका… बच्चे… बच्चे. हमें बच्चों को बचा लेना होगा, वह कहता था, पेश्तर इसके कि…. हमें नये सिरे से शुरुआत करनी होगी. वह कहता था कि मेरा सपना है अपने स्कूल को एक मॉडल स्कूल, एक मिसाल बनाने का. एजूकेशन शॉप नहीं, एक नया इंसान गढ़ने वाली वर्कशाप. नये ख्याल, नये सपने, एक नयी मानवात्मा. (17)
6. … वह आवाज़ के उतार चढ़ाव से महफिल की धडकनों को यूँ संचालित कर रहा था जैसे एक माहिर कंडक्टर आर्केस्ट्रा का करता है, बैटन को कभी हल्की जुंबिश देते और कभी तलवार की तरह नचाते हुए. वह धड़कनों को पतंग की तरह उठाता जाता था, ऊँचे, ऊँचे और ऊँचे… फिर कुछ पलों की ढील, जिसमें सुनने वाले दिल थामते थे, फिर यकबारगी राकेट की तरह आसमान में. क्लाइमेक्स का क्षण करीब आता, फिर दूर चला जाता था. सुनने वाले उसका यूँ अनुसरण करते थे जैसे किसी ड्रग के असर में हों…. (24)
7.…अहाते से बाहर गली तक एक भीड़ जमा थी. उसी भीड़ में से एक आवाज़ आयी- यह जो बह रहा है, इतिहास का अशुद्ध रक्त है, हिस्ट्री का मवाद. इसे बह जाने देना होगा, वरना इस मुल्क का समूचा जिस्म… हर राष्ट्र के जीवन में एक घड़ी आती है जब तुम तमाशबीन नहीं रह सकते. तुम्हें शिरकत करनी होती है. जब हिस्सा लेना एक फर्ज़ होता है. वह किसे उकसा रहा था और किस बात के लिये ? तो ये थे उसके असली ख्याल, मैंने सोचा, और वे सब उसके अपने लोग. वह वही लिनेन का सफ़ेद कुर्ता पहने था जिसमें पिछली बार मिला था लेकिन उस दिन सिर पर पगड़ी भी थी, केसरी रंग की. (31)
8. … अपना चश्मा उतारकर उसने झक सफ़ेद कुर्ते के किनारे से उसे पोंछा, उसे दूर से आर-पार देखा, “… हमारी लड़ाई जारी रहेगी. नफ़रत को फैसलाकुन शिकस्त देने, नेस्तनाबूद कर देने तक हमारी लड़ाई जारी रहेगी. मगर उनके जैसे हथियारों से नहीं. उनके चक्कू, खंजर, उस्तरे और ब्लेड उन्हें मुबारक. हमारे पास खूबसूरत विचार हैं.” में मंच पहचानने में कोई दिक्कत नहीं हुई. लगता था, अभी रोया, अभी रोया. (34)
9. हेल्थ या स्वास्थ्य के क्या मायने हैं- बीमारियों का इलाज या बचाव? यह तो केवल उसका फिज़िकल आयाम है. व्हाट अबाउट सोशल डायमेंशन? व्हाट अबाउट स्पिरिचुअल डायमेंशन? हमारा मुल्क बीमार है, हमारा समाज बीमार है, हमारी रूह बीमार है. जब सब कुछ बीमार है तो डॉक्टर कैसे बचा रह सकता है? डॉक्टर भी बीमार है. यह सब दुरुस्त करना एक अकेले डॉक्टर की क्षमता से परे है. मगर फिर भी कुछ न कुछ हो सकता है. एक अकेला शख्स भी एक छोटी- सी शुरुआत तो कर सकता है न? (36)
10. …यह जो हमारा चिकित्सा का तंत्र है, यह फ्राड है, टोटल फ्राड. यह एक तरफ जरासीम मारता है मगर दूसरी तरफ पैदा करता है. वे कहते हैं कि मैं जाल काट आया. अब आज़ाद पंछी हूँ. मरीजों की एक्सरे प्लेटों में देखता था तो स्याह दाग़ों के बीच दिखते थे अँधेरे पहाड़, घाटियाँ, खाइयाँ, चट्टानें, द्वीप और जंगल और जलधारायें. लेकिन बहुत दूर. अब उन पहाड़ों, घाटियों, खाइयों तक खुद जाऊँगा, सब जगहों से खून के नमूने लाऊँगा. हर उस जगह, जहाँ जरासीम पैदा होते हैं. यह एक जंग है जरासीम से और बेशक मैं सबको नहीं खत्म कर सकता, मगर उन्हें तो मार ही सकूँगा तो इतने बरसों से धीरे धीरे मेरी आत्मा में… (38)
तीन)
ऐसा नहीं है कि लफ़्फ़ाज़ जैसे व्यक्ति पहले नहीं होते थे. ठगों के बारे में हम पहले से सुनते आए हैं. ग़ौर से देखें तो अपने तौर-तरीक़ों में ठग मूलत: एक लफ़्फ़ाज़ ही होता है. वह हमेशा इस बात का लाभ उठाता है कि आम तौर पर लोगबाग कही हुई बातों पर शक करके नहीं चलते. दूसरे ढंग से कहें तो ठग व्यक्ति की मूर्खता का नहीं उसके भरोसे का लाभ उठाता है. लेकिन, चूंकि अंतत: ठग एक सीमित दायरे में काम कर रहा होता है, इसलिए उसके कृत्य का प्रभाव पीडि़त व्यक्ति के लिए कितना भी भयावह क्यों न हो, अंतत: वह कुछ व्यक्तियों और उनके आसपास के दायरे से आगे नहीं जाता.
लेकिन, इस कहानी का लफ़्फ़ाज अपनी योजना को एक नैतिक और पवित्र लक्ष्य बनाकर प्रस्तुत करता है. उसकी यह मनोवैज्ञानिक पेशबंदी लक्षित व्यक्ति की चेतना और विवेक का अपहरण कर लेती है— उसे इस बात का दूर-दूर तक भान नहीं होता कि उसके साथ छल किया जा रहा है. दरअसल, लफ़्फ़ाज अपनी जानकारियों, विश्लेषण के आधार पर पहले एक डिस्टोपिया खड़ा करता है और फिर लोगों को यूटोपिया थमा देता है.
उसकी व्यूह-रचना का एक पैंतरा यह है कि वह संबंधित व्यक्ति के भीतर अपराध-बोध जगाता है. वह इस व्यक्ति को बताता है कि उसकी उदासीनता या अकर्मण्यता के कारण समाज विनाश के कगार पर पहुंच गया है. इस छल में यह युक्ति अंतनिर्हित है: अगर समाज के इस उद्धार में तुम ख़ुद शामिल नहीं हो सकते तो कम से मेरी मदद करके ही इस पवित्र लक्ष्य में सहभागी बन जाओ.
मसलन, बैंक से लोन लेने की प्रक्रिया में वह मैनेजर और कर्मचारियों को यह कहकर विचलित करता है कि अपनी स्वार्थपरता के चक्कर में वे समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को भूल गए हैं. ज़ाहिर है कि समाज के प्रति ज़रा भी संवेदनशील व्यक्ति अक्सर इस अपराध-बोध से त्रस्त रहता है कि अपनी निजी आकांक्षाओं की ज़द्दोजहद में वह समाज के लिए कुछ नहीं कर रहा है. ऐसे में, उसके सामने जब कोई आदमी समाज के पुनरुद्धार का आह्वान करता दिखाई देता है कि तो उसे लगता है कि इस आदमी की ज़रा सी मदद करके इस अपराध-बोध से उबर जाएगा.
इस तरह, वह ‘बातें करते हुए रुआँसा हो जाता था, तक़रीरें करने लगता था. जो भी उसे सुनता था, शर्मिंदा हो जाता था कि देश कैसी मुसीबत में है, और वह… . वह हर वक़्त उद्विग्न नज़र आता था. हमने ग़लत रास्ता चुन लिया है. हम जिस ओर जा रहे हैं, वहाँ बरबादी है, केवल बरबादी.‘(पृ. 15)
लफ़्फ़ाज़ की व्यूह-रचना का दूसरा पैंतरा यह है कि वह ‘दोनों तरफ से’ और एक जैसे आवेग, एक जैसे यकीन और एक जैसे आँसुओं के साथ बहस कर सकता है और देखते ही देखते अपना पक्ष और पूरी बात बदल सकता है. वह दोनों तरफ, बल्कि हर तरफ नज़र आ सकता है. (34)
वह सूचनाओं के स्तर पर भी चाक-चौबंद रहता है. ‘उसकी जानकारियाँ जबरदस्त थीं. देश में आज़ादी के बाद जितनी सरकारें हुई हैं, हर स्टेट की, सेंटर की, इलेक्शन, आँकड़े… आपको कुछ भी जानना हो वह तुरंत बता देता था. हर चीज़ का एनेलिसिस करता था. ‘
लफ़्फ़ाज़ की उपस्थिति इतनी व्यापक है कि लोगों के असली जीवन की तरह वह उनके सपनों में दस्तक देने लगता है. वह दुनिया के हर सब्जेक्ट, देश के अतीत, भविष्य, लोकतंत्र समाजवाद, सेक्युलरिज़्म मुसलमान, अमरीका, आदिवासी, नक्सलवाद आदि हर चीज़ पर तक़रीरें करता है और उनके सपने तहस नहस कर देता है. (उपरोक्त: वही)
ऊपर के एक उदाहरण में हम साफ़ देख सकते हैं कि लफ़्फ़ाज केवल छोटी-मोटी धोखाधड़ी से संतुष्ट नहीं होता. वह केवल दर्जियों, भिश्तियों और ट्यूशन पढ़ा-पढ़ा कर पैसे जोड़ने वाले युवाओं को ही नहीं ठगता. उसका छल दो व्यक्तियों या संस्थाओं तक सीमित नहीं रह जाता.
मौक़ा मिलते ही वह अपने समय की सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करने लगता है. वह ‘इतिहास के अशुद्ध रक्त’ और ‘हिस्ट्री के मवाद’ जैसे उत्तेजक जुमलों से भीड़ को उकसा भी सकता है. बीसवीं और अब इक्कीसवीं सदी के चौथाई हिस्से में हम यूरोप, एशिया, अफ्रीका और लातीनी अमेरिका के बहुत-से देशों को लफ़्फ़ाज़ों के हाथों तबाह होते देख चुके हैं. अब तो इस सूची में अमेरिका जैसा देश भी शामिल हो चुका है.
चार)
ग़ौरतलब है कि हरेक ठग के भीतर एक लफ़्फ़ाज़ मौजूद होता है. लेकिन, हरेक ठग लफ़्फ़ाज़ के स्तर पर नहीं पहुंच सकता. असल में, उसके द्वारा भीड़ को नियंत्रित कर सकने की क्षमता एक ख़ास तरह की सामाजिक-आर्थिक गतिकी में पैदा होती है. ऐसा तब होता है जब संस्थाओं को सायास नष्ट किया जाता है और नियमों की जगह सत्ता और निष्ठा के संबंध कुंडली मार कर बैठ जाते हैं. ऐसे में, लफ़्फ़ाज़ का वायदा एक भावनात्मक संबल बनने लगता है. तब वह ठगी को राजनीतिक दर्शन के स्तर पर ले जा सकता है. यहाँ यह बात ओझल नहीं होनी चाहिए वह साधारण ठग के मुक़ाबले इसलिए ज़्यादा ख़तरनाक और घृणास्पद है क्योंकि वह राजनीति यानी सामूहिक हितों की न्यायपूर्ण दावेदारी और जनता की लामबंदी को अपने संगठित और बहुस्तरीय झूठ के बल पर हस्तगत कर लेता है.
वह जनमानस में समृद्धि और ख़ुशियों की एक फंतासी खड़ी करता है. वह लोगों को अंधे आवेग से भर सकता है. उन्हें प्रतिशोध के लिए उकसा सकता है. लेकिन, चूंकि लफ़्फ़ाज़ को इस बात से कोई मतलब ही नहीं होता कि ‘कहाँ क्या ग़लत हुआ और कैसे ठीक किया जाये’, इसलिए उसके द्वारा नियंत्रित और प्रेरित जनता को वैसा कुछ हासिल नहीं होता जैसा कि लफ़्फ़ाज़ अपनी पटकथा में वायदा करता है.
ख़ैर, यहाँ आर्थिक संसाधनों के निजीकरण तथा राजनीतिक एकाधिकारवाद की व्यापक परिघटनाओं में जाने की गुंजाइश तो नहीं है, लेकिन संक्षेप में कहा जाए तो आम जनता की ख़ुशहाली या सामाजिक कल्याण की संस्थाओं और निकायों के ध्वंस के पीछे कुछ ऐसी ही संरचनागत शक्तियों का हाथ होता है. लफ़्फ़ाज़ अभाव, दबाव और बंदिशों के इसी मटमैले माहौल— क़ानून की स्थापित प्रक्रियाओं के पतन और व्यवस्था की बेचेहेरगी के बीच सबसे ज़्यादा सफल होता है.
इस संबंध में सिग्मंड न्यूमान 1938 में छपे अपने एक लेख में जनता के क्षोभ और नाउम्मीदी को सत्ता की रणनीति में बदल देने वाले नेताओं के व्यक्तित्व की पड़ताल करते हुए कहते हैं कि ऐसे नेताओं के उदय को आधुनिक लोकतंत्र के विकास तथा संस्थाओं के पतन जैसी दुहरी स्थिति के बग़ैर नहीं समझा जा सकता. न्यूमान का कहना है कि आधुनिक लोकतंत्र का विकास उद्योगीकरण तथा शहरीकरण जैसी सहवर्ती परिघटनाओं के बीच संपन्न हुआ है. उल्लेखनीय है कि ये तीनों परिघटनाएं समाज की पीछे से चली आ रही व्यवस्था, धर्म की बुनियादी संकल्पनाओं और पुरातन संस्थाओं को छिन्न-भिन्न कर देती हैं. ऐसे में, संशय और असुरक्षा से ग्रस्त जनता एक उद्धारक की कल्पना करती है. और जनता का यह संकटमोचक खुद को संस्थाओं के विकल्प के रूप में पेश करने लगता है. उसकी सबसे बड़ी ख़ासियत यह होती है कि उसमें रंच मात्र भी संशय और आत्म-संदेह नहीं होता. वह जनता से आमूलचूल बदलाव, विश्वास और सुरक्षा का वायदा करता है— अपनी भाषा और भंगिमा को जनता की आकांक्षाओं के लघुतम समापवर्तक में ढाल लेता है. (सिग्मंड न्यूमान (1938) , द रूल ऑफ़ दि डेमागॉग, अमेरिकन सोशियोलॉजिकल रिव्यू, वॉ. 3, नंबर 4, पृ. 487.)
वह जनता को स्थिरता का भरोसा दिलाता है. अनिश्चितताओं से ग्रस्त जनता इस भरोसे के बदले उसे अपनी आज़ादी सौंप देती है. वह अक्सर गर्वोक्ति के साथ कहता है कि वह कार्यक्रम में नहीं कार्रवाई में यक़ीन करता है और उसकी सोच को एक गुण मान लिया जाता है. वह लोकोत्तर सत्ता में विश्वास खो चुके लोगों के लिए एक दैवीय प्रतीक के रूप में उभरता है. चूंकि दैवीय सत्ता को दुनियावी संकटों, झंझटों के लिए जि़म्मेदार नहीं ठहराया जा सकता लिहाज़ा बाद में यह प्रवृत्ति ऐसे शासक को किसी भी प्रकार की आलोचना अथवा जनता के प्रति कैसी भी जिम्मेदारी से बरी कर देती है. (पृ : 488-90)
पाँच)
योगेंद्र आहूजा की यह कहानी डेमागॉगी के विमर्श को एक ख़ास मायने में समृद्ध करती है. वह उसकी भौतिक उपस्थिति और परिवेश की इंदराजी करते हुए यह बताती है कि लफ़्फ़ाज कहाँ-कहाँ और कितनी जगह पाया जा सकता है. दूसरे शब्दों में, इससे पता चलता है कि लफ़्फ़ाज पैसा ऐंठने के लिए किसी सक्ष्म व्यक्ति के सामने राष्ट्र-निर्माण्, बच्चों के भविष्य और चौतरफ़ा तबाही के ख़तरे का नैरेटिव खड़ा कर सकता है; किसी के यहाँ शादी में रति-रहस्य का विशेषज्ञ बनकर लोगों को अपना मुरीद बना सकता है; साझी संस्कृति को मिटाने पर तुली एक राजनीतिक धारा के विध्वंसक दस्तों को अपने ज़हरीले भाषण से भड़का सकता है; शहर में अमन-चैन क़ायम करने के लिए आयोजित संगीत-कार्यक्रम में शांति के पक्ष में रुआंसी तक़रीर कर सकता है; और फिर ठगी की दूसरी योजना को क्रियान्वित करते हुए वह ख़ुद को एक ऐसे लोकचिंतक और सहृदय डॉक्टर के रूप में फार्मास्युटिकल कंपनियों और डॉक्टरों की मिलीभगत के खिलाफ़ अपने संघर्ष की एक ऐसी रूपरेखा पेश कर सकता है कि कोई भी सजग आदमी गच्चा खा जाए.
दरअसल, संकल्पना के स्तर पर यह कहानी छल की व्यूह-रचना से संबंधित विभिन्न चरणों, पैंतरों, कडि़यों, और घटकों आदि के संबंध में एक व्यापक अंतर्दृष्टि प्रदान करती है.
एक तरह से देखें तो कहानी का लफ़्फ़ाज इस बात की ओर संकेत करता है सत्ता के शिखर पर पहुंच कर पूरे देश-समाज को प्रभावित कर सकने की स्थिति में आने से पहले वह क्या-क्या करता रह सकता है. इस अर्थ में कहानी का लफ़्फ़ाज एक पूर्वाभास प्रस्तुत करता है. वह जनचेतना का अपहरण करके और ख़ुद को जनता का उद्धारक बताते हुए सत्ता के शिखर पर पहुंच सकता है. अपनी छलभरी तक़रीरों के दम पर वह समाज के बहुसंख्यकों को अपना मुरीद बना सकता है. वह ख़ुद को ईश्वर के एजेंट या अवतार के रूप में पेश कर सकता है. देश-समाज की हर मानीख़ेज़ चीज़, विचार और धरोहर का निर्णायक बन सकता है.
संक्षेप में, हम देख चुके हैं कि दुनिया के अनेकानेक देशों में यह लफ़्फ़ाज अपनी इच्छा को राज्य की इच्छा तथा अपने वफ़ादार कारकूनों और लाभार्थियों को व्यापक समाज का पर्याय सिद्ध करने में सफल रहा है.
एकबारगी ये बातें अतिरंजित लग सकती हैं लेकिन पिछले सौ बरसों के विश्व इतिहास को याद करें और दुनिया के मानचित्र पर नज़र डालें तो यह संदेह दूर हो जाएगा.
छह)
जैसे कहानी में लफ़्फ़ाज़ की पूरी रणनीति लक्षित व्यक्ति की भावनात्मक ब्लेकमेलिंग पर टिकी है, और वह इसलिए सफ़ल होता है क्योंकि भावनाओं के इस उद्रेक में पुननिर्माण का वायदा है. वह विकृति पर व्यवस्था की विकृतियों- ख़ामियों पर उंगली रखता है. और इस पूरी प्रक्रिया में यह सिद्ध कर ले जाता है कि इस पवित्र काम के लिए वह एक उपयुक्त पात्र है.
बीसवीं सदी में राष्ट्रीय पतन के लिए पिछले राजनीतिक तंत्र को दोषी ठहराकर ख़ुद सत्ता-तंत्र पर कब्जा कर लेने वाले नेताओं की कार्यशैली भी लगभग इसी तरह की थी है. उनकी रणनीति का मूल घटक भी जनता को भावनात्मक रूप से अस्थिर करने का था. ऐसे तमाम अधिनायकवादी नेता जनता की असुरक्षा और व्यग्रता का दोहन करते हुए उससे समाज और व्यवस्था के पुनर्निर्माण का वायदा करते थे. लेकिन, जैसा कि बाद में इतिहास ने सिद्ध किया, लफ़्फ़ाज़ अधिनायकवादियों के शासन में बड़ी पूंजी तथा परम्परागत अभिजन समूहों का तो कोई नुकसान नहीं हुआ, जबकि साधारण जनता अपने मूलभूत मानवाधिकारों और स्वतंत्रता को गंवा बैठी.
जैसा कि इस कहानी में दिखता है, लफ़्फ़ाज़ बरबादी का डर तो दिखाता है लेकिन यह नहीं बताता कि ‘कहाँ क्या ग़लत हुआ’ है और उसे कैसे ठीक किया जाये. इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उसके पास कोई ठोस योजना नहीं है. यानी उसका कहा एक सामाजिक छलावा है. चूंकि लफ़्फ़ाज़ के पास जनकल्याण की कोई ठोस नीति और समझ नहीं होती इसलिए वह खुद को संस्थाओं का विकल्प बताने लगता है. उसके शासन का यही एकमात्र आधार होता है.
आखि़र में, कहना न होगा कि योगेंद्र आहूजा की इस कहानी में लफ़्फ़ाज़ एक पैशाचिक और घृणास्पद लेकिन साथ ही एक चतुर-चौकन्ने व्यक्ति के रूप में सामने आता है. वह लगातार चेहरे बदलता है. नयी-नयी तरक़ीबें आजमाता है. देखते-देखते ग़ायब हो जाता है और फिर कहीं भी प्रकट हो जाता है. वह लगभग अपराजेय नज़र आता है, लेकिन, ग़ौर करिए कि कभी भी पकड़ में न आने वाला यह शख़्स कथावाचक को देखकर हर बार भाग जाना या कहीं छुप जाना चाहता है. आखि़र उसे कथावाचक से क्या भय हो सकता है?
शायद, यही इस कहानी का क्वथनांक है. यह उस तार्किक चेतना का मौन स्फोट है जो कथित और वर्णित को हूबहू स्वीकार करने के बजाय उसकी जांच-परख करने का आग्रह करता है. यह वह क्रिटिकल चेतना है जो छल की संरचना के पुर्जों को खोलकर रख देती है. वह ऐसा इसलिए कर पाती है क्योंकि वह स्वाभाविक और निर्मित-प्रक्षेपित यथार्थ में अंतर करना जानती है. वह गढ़े गए डेटा और आनुभविक सत्य का फ़र्क़ समझती है.
दरअसल, लफ़्फ़ाज़ का भय यही है कि कथावाचक उसकी असलियत जान गया है. वह लफ़्फ़ाज़ से पूछ सकता है : ‘यह लुकाछिपी छोड़ो, निगाहें मिलाकर बात करो. बताओ साफ़ साफ़ कि तुम कौन हो और तुम्हारे इरादे क्या हैं… इतिहास की, कल्चर की, गुज़री शताब्दियों की बातें… अब क्या चाहते हो ? तुम असल में कौन हो?’ (32)
ज़ाहिर है कि अपनी दिलचस्प बनावट, परिवेश की ध्वनियों और बारीक ब्योरों जैसी अन्य ख़ूबियों के साथ योगेंद्र आहूजा की यह कहानी मुख्यतः उस क्रिटिकल चेतना के उदय की कहानी है जिसके बग़ैर लफ़्फ़ाज़ों की जालसाज़ी अबूझ बनी रहती है.
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naresh.goswami@gmail.com |

नरेश गोस्वामी समाज-विज्ञानी, हिंदी कथाकार और अनुवादक हैं, उनकी पुस्तक ‘स्मृति-शेष: स्मरण का समाज-विज्ञान’ सामाजिक स्मृति और संस्कृति के अध्ययन में महत्वपूर्ण मानी जाती है. वे वर्षों तक प्रतिमान के संपादक रहे हैं. इधर उनका साहित्यिक-आलोचनातमक लेखन लगातार सामने आ रहा है.


मैं ने यह कहानी पढी नहीं है। फिर भी, यह टिप्पणी एक खास छद्म प्रवृत्ति की प्रकृति और प्रक्रिया का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है जो स्वेच्छाचारी सत्ता- व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त करती है। वर्तमान में यह परिघटना वैश्विक विस्तार पा चुकी है।
कहानी के कंटेंट की व्याख्या की गई है किन्तु इसके फार्म के बारे में कुछ नहीं कहा गया है।
यह कहानी बनी भी कि नहीं, इस पर कोई बात नहीं।