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समालोचन

Home » पी. के. रोजी : एक बहिष्कृत अभिनेत्री : पीयूष कुमार

पी. के. रोजी : एक बहिष्कृत अभिनेत्री : पीयूष कुमार

क्या आप भारतीय सिनेमा की पहली दलित अभिनेत्री पी.के. रोजी को जानते हैं, जिनका नाम उपेक्षा के हाशिये में विलुप्त हो गया था? पी.के. रोजी को जानना मात्र किसी अभिनेत्री से परिचय प्राप्त करना नहीं है; यह उस स्त्री की स्मृति में लौटना है जो स्त्री होने के साथ-साथ दलित भी थीं और जिन्होंने इसी दोहरी पहचान की भारी कीमत जीवनभर चुकाई. भारतीय सिनेमा के प्रारम्भिक दृश्य केवल रीलों और कैमरों से नहीं बने थे, बल्कि उन जोखिमों, सामाजिक आक्रोश और अदृश्य हिंसा से भी बने थे जिन्हें शुरुआती कलाकारों ने अपनी देह, अस्मिता और स्वप्नों पर सहा. निर्देशक जे.सी. डेनियल और पी.के. रोजी की कहानी भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा प्रसंग है जो किसी दंतकथा-सा साहस, जोखिम और जिद की गाथा है जिसे कुछ खोजियों ने विस्मृति के अंधेरे से बाहर निकाला. पीयूष कुमार ने यह आलेख ख़ास आपके लिए लिखा है. प्रस्तुत है.

by arun dev
November 23, 2025
in फ़िल्म
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पी. के. रोजी  : एक बहिष्कृत अभिनेत्री : पीयूष कुमार
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पी. के. रोजी
एक बहिष्कृत अभिनेत्री
_______________________
पीयूष कुमार

 

आज से एक सौ तीस साल पहले 22 मार्च 1895 में ऑगस्ट निकोलस ल्युमेयर और उससे दो साल छोटे भाई लुई ल्युमेर की जोडी ने पेरिस में 46 सेकेंड के चलचित्र को निजी रूप में प्रदर्शित किया था. बाद में चलती फिरती तस्वीरों के उस नए  माध्यम ने दुनिया को आश्चर्य से भर दिया. दोनों भाइयों अपनी फिल्में लेकर दुनिया भर में दिखाने निकले और इसी क्रम में आस्ट्रेलिया जा रहे थे तो बंबई में रूके और 7 जुलाई 1896 में ल्युमियर के संचालक माॅरिस सेस्टियर ने वाट्सन होटल में उन्होंने दो रीलें ‘द ट्रेन कम ऑन द सियोतात स्टेशन’ और ‘वर्कर्स लीविंग द ल्युमियर फैक्ट्री’ दिखाईं.

इस शो पर टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा, ‘शताब्दी का आश्चर्य’. इस बात के सप्ताह भर बाद ही बंबई के नाॅवेल्टी सिनेमा में ल्युमेयर की लघु फिल्में दिखाई जाने लगीं. यह माध्यम इतना प्रभावशाली साबित हुआ कि जल्द ही यह शो तंबू लगाकर जगह-जगह होने लगे. इस घटना के सत्रह बरसों के बाद ही 3 मई 1913 को पूरी अवधि की पहली मूक भारतीय फीचर फिल्म जो मराठी में थी, ‘राजा हरिश्चंद्र’ रिलीज हुई और प्राचीन नाटकों के इस तकनीकी और आधुनिक स्वरूप ने इस उपमहाद्वीप में कला और मनोरंजन के द्वार खोल दिए. इस सिनेमाई करिश्में की तीव्रता इतनी थी की यह जल्द ही यह देश भर में फैल गया.

प्राचीन नाटकों ने तकनीक के माध्यम से यह नया रूप धरा और भारतीय समाज की रुचियों ने रुपहले पर्दे पर दिखना – दिखाना आरंभ किया. इस सिनेमाई करिश्में की तीव्रता इतनी थी की यह जल्द ही यह कोलकाता और मद्रास पहुंच गया. दक्षिण में इसे अन्य राज्यों तक पहुंचने में जरा समय लगा जिनमें त्रावणकोर अर्थात वर्तमान केरल भी था.

केरल के मलयाली समाज में सिनेमा से पहला परिचय 1906 में घुमंतू सिनेमा दिखाने वाले स्वामीकण्णु विंसेंट ने कोझीकोड में अपने एडिसन बाइस्कोप से कुछ रीलें दिखाईं. ‘भारतीय सिनेमा’ पुस्तक के लेखक महेंद्र मिश्र लिखतें हैं, ‘यह शायद एक संयोग ही था कि उसी समुद्र तट पर एक साहसी समुद्री नाविक वास्को डि गामा अपने बेड़े के साथ शताब्दियों पहले आया था. वह उपनिवेशवाद का आगमन था और यह सिनेमा का. दोनों का असर दूरगामी था.’ ऐसे वातावरण में एक डेंटिस्ट जोसेफ चेलैया डेनियल नादर ने मलयालम में सिनेमा निर्माण का सपना देखा.

डैनियल का जन्म 26 फरवरी 1900 को एक ईसाई में परिवार में अगस्तेश्वरम, तत्कालीन त्रावणकोर राज्य में हुआ था. उन्होंने अपनी शिक्षा यूनिवर्सिटी कॉलेज, त्रिवेंद्रम से पूरी की थी. उन्हें केरल की पारंपरिक तलवारबाजी की कला कलारीपयट्टू से लगाव था. इस लगाव के कारण डेनियल ने 1915 में ही जब वे पंद्रह साल के थे, अंग्रेजी में पुस्तक लिखी थी, ‘इंडियन आर्ट ऑफ फेंसिंग एंड सोर्ड प्ले’ अर्थात् तलवार चलाने की भारतीय कला. डेनियल को लगा कि वे सिनेमा के प्रभाव का उपयोग कलारीपयट्टू को लोकप्रिय बनाने में कर सकते हैं. इसके लिए वे फिल्म बनाने की तकनीक सीखने मद्रास गए पर वहाँ उन्हें स्टूडियो से सहयोग नहीं मिला. तब डेनियल ने बॉम्बे का रुख किया. यहाँ उन्होंने बताया कि वह केरल में एक शिक्षक है और वे अपने छात्रों को सिनेमा के बारे में पढ़ाना चाहते हैं तब यहाँ उन्हें फिल्म निर्माण के लिए पर्याप्त जानकारी और उपकरण मिल सके.

डेनियल ने बॉम्बे से लौटकर 1926 में केरल का पहला फिल्म स्टूडियो स्थापित किया जिसका नाम था, ‘त्रावणकोर नेशनल पिक्चर्स’. यह अभी केरल के वर्तमान लोक सेवा आयोग कार्यालय पट्टोम, त्रिवेंद्रम के पास है. डेनियल ने फिल्म निर्माण की अपनी प्रतिबद्धता के लिए अपनी जमीन बेचकर चार लाख रुपये जुटाए और अपने सपनों की फिल्म का निर्माण कार्य शुरू किया. उन्होंने खुद इस फिल्म का निर्माण किया, स्क्रिप्ट लिखी, निर्देशन किया, कैमरामैन बने, संपादन किया, फिल्म में नायक की भूमिका निभाई और अधिकांश पोस्ट प्रोडक्शन का कार्य किया. फिल्म का विषय सामाजिक महत्व का था जिसका नाम उन्होंने रखा, ‘विगताकुमारन’ जिसका अर्थ है, खोया हुआ बच्चा.

यह फिल्म एक बच्चे की कहानी थी जिसे त्रावणकोर से अपहृत कर लिया जाता है और सीलोन में बेच दिया जाता है. उन दिनों ऐसी घटनाएं अक्सर होती भी थीं. इस बच्चे का रोल जे. सी. डेनियल के बड़े लड़के सी. जे. सुंदरम ने निभाया था जो मलयालम सिनेमा के पहले बाल कलाकार के रूप में दर्ज हुए. गौरतलब है कि सी. जे. सुंदरम ने बाद में उच्चशिक्षा ग्रहण की और कैंडी, श्रीलंका में ट्रिनिटी काॅलेज के प्रिंसिपल बने. जे. सी. डेनियल ने इस फिल्म में नायक की भूमिका खुद निभाई और नायिका के लिए अभिनेत्री की तलाश की. उनके मित्र और फिल्म में भूतनाथ का चरित्र निभाने वाले कलाकार जाॅनसन ने एक लड़की के बारे में बताया जो यह रोल कर सकती थी. उस लड़की का नाम था राजम्मा और वह पुलाया जाति से संबंधित थी जो दलित वर्ग में आती थी.

PK Rosy

राजम्मा का जन्म 10 फरवरी 1903 को नंदनकोड, थाइकोड, त्रिवेंद्रम में हुआ था. पिता पॉलोज और माँ कुंजी की दो बेटियों में राजम्मा बडी संतान थी. जब वह बहुत छोटी थी, उसके पिता चल बसे थे. पेट पालने के लिए राजम्मा ने अपना जातिगत पेशा घास काटने को चुना. कुछ समय बाद उसके चाचा ने उसके परिवार को अपने घर में रहने को बुला लिया. युवा राजम्मा को कला खासतौर से नृत्य में भी बहुत रुचि थी जिसे देखकर उसके चाचा ने उसे प्रोत्साहित किया, और स्थानीय आर्ट स्कूल में प्रवेश दिला दिया. राजम्मा वहाँ तमिल और मलयालम मिश्रित तमिल लोक रंगमंच के एक रूप, कक्कारासी नाटक सीखने लगी.

इस लोकनृत्य में शिव और पार्वती के धरती पर आने की कहानी नृत्य और अभिनय के माध्यम से पेश की जाती थी. यह वह वक्त था जब समाज में एक महिला के लिए डांस और एक्टिंग बुरा माना जाता था. राजम्मा के दादा और समाज उसके स्कूल जाने और इस शौक से खुश नहीं थे पर कला के लिए राजम्मा को शायद इन विरोधों की परवाह नहीं थी. इसी समय राजम्मा की माँ ने स्थानीय एलएमएस चर्च के पादरी से शादी कर ली और राजम्मा का धर्म ईसाई हो गया.

धर्मांतरण के कारण अब राजम्मा का नाम रोजम्मा हो गया. माना जाता है कि इस धर्म परिवर्तन का आधार यह था कि ईसाई होने के कारण वह शिक्षा ग्रहण कर सकती थी हालांकि उसकी माँ एक हिंदू के रूप में ही रहती थी. राजम्मा अब अपने नए नाम रोजम्मा के साथ जीने लगी और 1928 तक वह काकीरसी नृत्य में कुशल हो गई थी.

यही वह समय था जब जॉनसन ने डेनियल की फिल्म ‘विगताकुमारन’ जो मलयालम की पहली फिल्म बनने जा रही थी, में नायिका की भूमिका के लिए रोजम्मा से संपर्क किया. फिल्म में अभिनेत्री के इस अविश्वसनीय प्रस्ताव से हैरान और संशयग्रस्त रोजम्मा ने डेनियल को कोई जवाब नहीं दिया पर उसके माँ-बाप केवल इसलिए भेजने को तैयार हो गए क्योंकि डेनियल द्वारा उसे दी जाने वाली दैनिक मजदूरी बहुत अच्छी थी. फिल्म में रोजम्मा को एक नायर महिला सरोजिनी को चरित्र मिला.

यहाँ उल्लेखनीय है कि मलयालम समाज में नायरों की सामाजिक स्थिति उच्च रही है. फिल्म के निर्माता निर्देशक जे. सी. डेनियल को रोजम्मा नाम जंच नहीं रहा था इसलिए उसने रोजम्मा का एक ग्लैमरस सा नाम रख दिया रोजी. फिल्म ‘विगताकुमारम’ की शूटिंग शुरू हुई. रोजी हर दिन अपने घर से पैदल चलकर शूटिंग वाली जगह पर सुबह नौ बजे तक पहुंच जाती थी और देर शाम को वापस घर चली जाती थी. रोजी भले ही हीरोईन थी पर दलित होने की वजह से वहाँ उसे अपना खाना लेकर जाना पड़ता था और सबसे अलग खाना भी पड़ता था. उसे वहाँ दूसरे कलाकारों के साथ बैठने और सेट पर मिलने वाले भोजन को छूने की इजाजत नहीं थी.

पहली मलयालम फिल्म बनने की खबरों के साथ फिल्म की हीरोईन के दलित होने की खबरें अखबारों में आईं तो लोगों ने आपत्तियां जाहिर करना शुरू कर दिया था. रोजी को उसके काम के लिए रोज पाँच रुपये दिए जाते थे. फिल्म दस दिनों में बनकर तैयार हो गई. रोजी ने इन दस दिनों में पचास रुपए कमाए. रोजी को अभिनय का कोई अनुभव नहीं था. उसने एक नौकरी के रूप में डेनियल के निर्देशों का सिर्फ पालन किया था. फिल्म पूरी हुई तो बतौर निर्माता निर्देशक जेसी डेनियल संतुष्ट थे पर अब जो बुरा होनवाला था, उसकी मिसाल सिनेमा के इतिहास में पूरी दुनिया में नहीं मिलती.

‘विगताकुमारन’ 23 अक्टूबर 1930 को शाम साढ़े छह बजे से साढ़े नौ बजे के बीच त्रिवेंद्रम के कैपिटल थिएटर में रिलीज हुई. फिल्म में किसी तरह की ध्वनि या संवाद नहीं था. थिएटर में यह फिल्म जमीन पर बैठकर देखी जानी थी. चूंकि यह एक मूक फिल्म थी इसलिए उसकी कहानी और दृश्यों की व्याख्या के लिए वहाँ एक उद्घोषक भी था. इस स्क्रीनिंग में अभिनेत्री रोजी कोे भी शामिल होना था पर रूढ़िवादियों ने एक दलित स्त्री के साथ बैठकर फिल्म देखने से मना कर दिया! फिल्म स्क्रीनिंग में आमंत्रित प्रतिष्ठित कहे जानेवाले कई लोगों ने ‘विगाथाकुमारन’ के इस उद्घाटन में शामिल होने से इनकार कर दिया जिसमें प्रसिद्ध वकील मल्लूर गोविंदन पिल्लई भी शामिल थे. इस स्थिति में डेनियल ने रोजी को अगले शो तक के लिए बाहर रुकने को कहा.

कैसी विडंबना थी कि सिनेमा से बाहर की वास्तविक दुनिया में मलयालम की पहली फिल्म की नायिका जातिभेद के कारण अपनी ही फिल्म को देखने से वंचित थी. फिल्म को लेकर उच्च जाति के हिंदू पहले से ही नाराज थे कि एक धर्म परिवर्तित दलित लड़की ने फिल्म में एक नायर महिला की भूमिका निभाई है. ऐसे में फिल्म में एक दृश्य के बाद जब नायक नायिका रोजी के बालों में लगे फूलों को चूमता है, दर्शक आपे से बाहर हो गए! वे कठोर सामाजिक वर्जनाओं के दिन थे. फिल्मों में काम करने की बात तो दूर सार्वजनिक तौर पर भी महिलाओं को कम ही देखा जाता था इसलिए उन्होंने रोजी के साहसिक कार्य को स्वीकृत सामाजिक व्यवस्थाओं के लिए एक चुनौती माना.

लोगों ने थिएटर में हंगामा खड़ा कर दिया. उन्होंने गुस्से में स्क्रीन पर पत्थर फेंके, स्क्रीन को जला दिया और थिएटर में तोडफोड की. इसके बाद उन्हें पता चला कि रोजी थिएटर के बाहर खड़ी है तो उसकी ओर दौड़े और उसपर जानलेवा हमला किया. रोजी जान बचाने भागकर पास ही के थायकोड थिएटर में छुप गई. लोगों का गुस्सा आसमान पर था. उन्होंने थिएटर में ही आग लगा दी ! इधर यह हिंसा देखकर जेसी डेनियल ने त्रावणकोर राजा को घटना की सूचना दे दी थी इस कारण जलते थिएटर में जिंदगी और मौत से जूझती रोजी को पुलिस ने आकर निकाला.

रोजी वहाँ भाग गई और शहर से बाहर एक पुल के नीचे छुप गई. किसी मदद के इंतजार करते रोजी ने सड़क पर आ रही लाॅरी को रुकवाया. लाॅरी रुकी और वह उसमें बैठकर नागरकोईल आ गई. उधर त्रिवेंद्रम में लोगों का गुस्सा शांत नहीं हुआ था. उच्च जाति की नायर महिला के रूप में अभिनय करने के उसके ‘अपराध‘ के लिए रोजी के घर को उच्च जातियों द्वारा कथित तौर पर जला दिया गया और उसके परिवार को भी बहिष्कृत कर दिया गया.

मलयालम सिनेमा की इस दुर्भाग्यशाली पहली हीरोइन के साथ फिर क्या हुआ, कोई नहीं जानता. इस घटना के अड़तीस साल बाद कुछ पत्रकारों ने रोजी के बारे में कुछ जानकारियां जुटाईं तब कुछ सूचनाएं मिलीं. अपने पर हुए हमले के बाद रोजी जिस लॉरी में भाग गई थी, उस लॉरी चालक का नाम केशवन पिल्लई था जो उच्च जाति का था. उसने रोजी के साथ शादी कर ली थी और अपना बाकी जीवन खामोशी से बिताया. यह खामोशी इतनी सघन थी कि उनके बच्चे तक रोजी के मलायालम सिनेमा के पहली अभिनेत्री होने के बारे में नहीं जानते थे. ऐसा माना जाता है कि केशव से विवाह के बाद रोजी नागरकोइल शहर के ऊट्टुपुरा थेरुवु में रहती थी. पी. के. रोजी को अपने जीवनकाल में कभी भी अपने काम के लिए पहचान नहीं मिली, उसने अपनी जिन्दगी गुमनामी में गुजारी. उसकी पहचान के नाम पर उसकी एक धुंधली सी इकलौती तस्वीर ही उपलब्ध है जो एडवोकेट मल्लूर गोविंद पिल्लई की फोटो गैलरी से मिली थी. गौरतलब है कि यह वही पिल्लई थे जिन्होंने रोजी को उसकी फिल्म ‘विगताकुमारन’ की स्क्रीनिंग पर शामिल होने से रोका था.

‘विगताकुमारन’ रिलीज तो हो गई लेकिन दलित एक्ट्रेस होने के कारण चंद लोग ही इसे देखने पहुंचे. नतीजन, फिल्म अपनी लागत भी नहीं निकाल सकी और फ्लॉप हो गई. डायरेक्टर जे. सी. डेनियल कंगाल हो गए. उन्हें अपने देनदारों का कर्ज चुकाने के लिए अपने सिनेमा उपकरणों को बेचकर स्टूडियो को बंद करना पड़ा और अपना शेष जीवन एक डेंटिस्ट के रूप में बिताना पड़ा. मलयालम की इस पहली और ऐतिहासिक लेकिन दुर्भाग्यशाली फिल्म की एक ही प्रिंट थी जिसे फिल्म निर्देशक डेनियल ने कुछ सालों तक सम्हाले रखा था जो फिल्म के हश्र की तरह ही नाटकीय ढंग से नष्ट हो गई.

‘द न्यूज मिनट’ वेबसाइट को दी गई जानकारी में जेसी डेनियल के दूसरे पुत्र 88 वर्षीय हैरिस ने बताया है कि यह 1942 की बात है जब वे सात साल के थे. ‘विगताकुमारन’ की रील एक गोल टिन के डब्बे में घर में पड़ी थी जिसका हैरिस और उनकी बहन ने खेलने के लिए उपयोग किया. खेल-खेल में उन्होंने उस फिल्म की रील के टुकड़े किये और उसमें आग लगाकर उससे उठती बैंगनी रोशनी देखकर खुश होते रहे. तब उन्हें उस फिल्म का महत्व पता नहीं था.

पहली मलयालम फिल्म की यह रील का इस तरह नष्ट होना इस फिल्म की बदनसीबी को और भी पुख्ता करता है. बहरहाल, वक्त चलता रहा. इधर मलयालम में और भी फिल्में बननी शुरु हुई, मलयालम सिनेमा स्थापित हुआ और उधर एक लंबे अरसे तक गुमनामी की जिंदगी जीते हुए 27 अप्रैल 1975 को मलयालम फिल्मों के बदनसीब पितामह जे. सी. डेनियल का आंशिक पक्षाघात के कारण निधन हो गया.

कुछेक दशकों बाद जब भारतीय सिनेमा विभिन्न भाषाओं में स्थापित होने लगा तो मलयालम सिनेमा ने भी अपने इतिहास को खोजने की कोशिश की. ‘विगताकुमारन’ की रिलीज के चालीस साल बाद कुछ फिल्म पत्रकारों ने मलयालम की पहली फ़िल्म की खोज की तो जे. सी. डेनियल के बारे में पता चला. इसपर 1968 में पत्रकार चेलंगट्ट गोपालकृष्णन ने एक रिपोर्ट लिखी थी जिन्हें इस दुर्भाग्यशाली निर्देशक के बारे में जानकारी मिल सकी. गोपालकृष्णन की डेनियल से हुई मुलाकात भी एक नाटकीय घटना है.

एक दिन गोपालकृष्णन ने थम्पनूर बस स्टैंड पर एक बुजर्ग को काले कोट और पैंट में देखा जो नेयाट्टिनकारा जानेवाली बस में बैठ रहा था. उसे उस बूढे का हुलिया पुराने दिनों में त्रावणकोर के सज्जनों की याद दिला गया. पास ही दुकानदारों ने उस बुजर्ग के बारे में बताया कि यह जे. सी. डेनियल है जिसने एक फिल्म बनाकर सब कुछ खो दिया था. चेलंगट्ट डेनियल को खोजते उनके घर पहुंचे, उनसे बातें की और तब मलयालम समाज जान सका कि उनकी पहली फिल्म कौन सी थी और उनके सिनेमा का पितामह कौन था.

इसके पहले तक मलयालम सिनेमा की पहली फिल्म के रूप में 1938 में प्रदर्शित फिल्म ‘बालन’ का नाम दर्ज था. रोजी के बारे में डेनियल को सिर्फ इतना ही पता था कि उसपर हुए हमले के बाद वह कहीं भाग गई थी. पत्रकार चेलंगट्ट भी पीके रोजी के बारे में इतना ही जान सके कि उसने अभिनय नहीं सीखा था इसके बावजूद वह सहजता से अभिनय करती थी.

रोजी पर पहली प्रामाणिक जानकारी 1971 में मिली. एक फिल्म पत्रकार और दलित कार्यकर्ता कुन्नुकुझी मणि को एक फिल्म सेमिनार में कंबिसेरी करुणाकरण जो कि एक पत्रकार, अभिनेता और सीपीआई के कार्यकर्ता थे, ने एक घास काटने वाली लड़की जो मलयालम फिल्म की पहली अभिनेत्री थी, उसके बारे में बताया. कुन्नुकुझी मणि ने इस पर रुचि दिखाई और पी. के. रोजी की खोज शुरु की. वे रोजी के रिश्तेदारों से मिले. उन्होंने फिल्म डायरेक्टर जे. सी. डेनियल से भी मुलाकात की और रोजी पर तमाम उपलब्ध सूचनाएं ‘कलाप्रेमी’ नाम की पत्रिका में छापा. रोजी के बारे में कुन्नुकुझी मणि ने बाद में चित्रभूमि, चंद्रिका, तेजस, समकालीना मासिका जैसी कई मलयालम पत्रिकाओं में लगातार लिखा. मीडिया रिपोर्टस के कारण अब लोग रोजी के बारे में जानने लगे पर रोजी को जीते जी पहली अभिनेत्री होने का सम्मान पाना संभव न हुआ. भारत की पहली दलित अभिनेत्री पी. के. रोजी का यह कैसा संत्रासपूर्ण जीवन था कि लोग उन्हें निजी तौर पर पहचान पाते, उससे पहले ही उन्होंने 1988 में 85 वर्ष की उम्र में इस बेदर्द दुनिया को अलविदा कह दिया!

समय बीता तो रोजी के जीवन पर मलयालम फिल्मकारों ने फिल्म और डाक्यूमेंट्री बनाकर डेनियल और रोजी को याद किया. 7 नवंबर 2012 को किरण रवींद्रन निर्देशित ‘द लॉस्ट चाइल्ड’ नाम की डाक्यूमेंटी प्रदर्शित की गई. इस अवसर पर निर्देशक अदूर गोपालकृष्णन ने इस डाक्यूमेंटी का परिचय दिया. 58 मिनट की इस डाक्यूमेंटी को पूरा करने में किरण को चार साल लगे. एक और डाक्यूमेंटी ‘रोजीयुडे कथा’ (यह रोजी की कहानी है) बनाई गई. इसी तरह 2013 में मलयालम फिल्म डायरेक्टर कमाल ने ‘सेल्यूलॉइड’ नाम से फिल्म बनाई जिसमें जे. सी. डेनियल और पी. के. रोजी की कहानी दिखाई गई.

इस फिल्म में लोकप्रिय अभिनेता पृथ्वीराज ने डेनियल और नई अभिनेत्री चांदनी गीता ने रोजी की भूमिका निभाई थी. कमाल द्वारा निर्देशित यह फिल्म विनू अब्राहम के उपन्यास ‘नशा नायिका‘ पर आधारित है जो रोजी के जीवन के बारे में बताती है. इस फिल्म में रोजी को एक दलित ईसाई महिला के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो चेलंगट्ट गोपालकृष्णन के द्वारा दिए गये विवरण पर आधारित है. इस फिल्म में कुछेक तथ्यात्मक गलतियां हैं और आलोचना की दृष्टि से कहा जा सकता है कि इस फिल्म में तथ्यों की प्रामाणिकता और बेहतर प्रस्तुति पर उचित ध्यान नहीं दिया गया.

अभी तीन साल पहले 13 अक्टूबर 2022 को ‘पीके रोजी’ नाम से मलयालम में फिल्म बनी जिसका निर्देशन शशि नदुक्कडु ने किया था. फिल्म में पी.के. रोजी के संघर्षों, सामाजिक भेदभाव और उनके साहस को दर्शाया गया है. फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में जयन चेरथला मधु, मदन मोहन, और भीमन रघु जैसे कलाकार शामिल हैं. यह फ़िल्म पी.के. रोजी के जीवन को श्रद्धांजलि देने के साथ-साथ उस दौर के सामाजिक हालातों पर भी प्रकाश डालती है.

आज का मलयालम सिनेमा समृद्ध है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर का सिनेमा भी बनाता है. केरल सरकार ने जे. सी. डेनियल को मलयाली सिनेमा का पितामह स्वीकार करते हुए 1992 में उनके नाम पर ‘जे. सी. डेनियल पुरस्कार’ स्थापित किया. यह केरल राज्य चलचित्र अकादमी द्वारा मलयालम सिनेमा में जीवन भर के उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रतिवर्ष दिया जाता है. केरल सिनेमा का यह सबसे बड़ा सम्मान है. जे. सी. डेनियल पुरस्कार सबसे पहले 1992 में टी. ई. वासुदेवन को दिया गया था और 2023 में शाजी एन. करुण को यह सम्मान दिया गया है. अब तक इस पुरस्कार सेे कुल 30 लोग सम्मानित हो चुके हैं. उल्लेखनीय है कि इन तीस सालों में सिर्फ एक ही महिला, अरनमुला पोन्नमा जिन्होंने पांच दशक तक मलयाली सिनेमा में माँ की भूमिका निभाई है, को ही यह पुरस्कार मिल सका है. यदि इस बात को स्त्रीवादी नजरिये से देखा जाए तो मलयालम सिनेमा में स्त्री अभी भी पीछे है.

पी. के. रोजी पर बात केरल तक ही थी पर वह वैश्विक चर्चा में तब आई जब 10 फरवरी 2023 को रोजी के 120वें जन्मदिन पर गूगल सर्च इंजन ने अपने डूडल में उनका स्केच बनाया और उनके सम्मान में लिखा, ‘धन्यवाद, पीके रोजी, आपके साहस और आपके छोड़ी गई विरासत के लिए.‘ इस डूडल के कारण दुनिया में व्यापक रूप से पी. के. रोजी को जाना गया.

केरल में पी. के. रोजी को सम्मान कुछेक सालों पहले ही मिलना शुरु हुआ है. यह सुखद है कि केरल समाज उन्हें विभिन्न रूपों में याद कर रहा है हालांकि यह पहल भी वहाँ की महिलाओं के द्वारा ही की गई. केरल में सिनेमा में महिलाओं की भागीदारी को रेखांकित करने और उन्हे मंच देने के लिए 1 नवंबर 2017 को वीमेन इन सिनेमा कलेक्टिव (डब्ल्यूसीसी) के नाम से एक संगठन बनाया गया. दो साल बाद डब्ल्यूसीसी के एक अंग के रूप में एक फिल्म सोसायटी की स्थापना की गई जिसका नाम ‘पी. के. रोजी फिल्म सोसायटी’ रखा गया है. इस सोसायटी के लोगो में रोजी की वही एकमात्र उपलब्ध तस्वीर है. इस पर सोसायटी का कहना है कि ‘हमारा लोगो रोजी को विजुअल रूप से आमंत्रित करता है जिसे मुंबई की डिजाइनर जोया रियास ने डिजाइन किया है. पी.के. रोजी फिल्म सोसाइटी का उद्देश्य पुरुष प्रधान फ़िल्म उद्योग में महिला फिल्म निर्माताओं और महिला फिल्म पेशेवरों की सहभक्गिता को बढाने के साथ नारीवादी सिनेमा सौंदर्यशास्त्र को प्रदर्शित करना, चर्चा करना और जश्न मनाना है.‘

इस संस्था की स्थापना का कारण भी महत्वपूर्ण है. यहाँ एक चर्चित मामले का उल्लेख करना आवश्यक प्रतीत होता है. पिछले साल 19 अगस्त 2024 को केरल में जस्टिस हेमा कमेटी की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है. इस रिपोर्ट को समझने से पहले सात साल पीछे जाना होगा. 17 फरवरी 2017 में मलयालम फिल्म इंडस्ट्री से एक अनपेक्षित खबर आई थी. वहाँ फिल्म इंडस्ट्री की एक प्रसिद्ध अभिनेत्री को कुछ लोगों ने अगवा कर लिया और फिर उसका यौन उत्पीड़न किया गया. इस मामले में एक प्रसिद्ध अभिनेता को भी गिरफ्तार किया गया था. इस घटना के कारण केरल में काफी आक्रोश फैल गया था और मलयालम फिल्म इंडस्ट्री की भी काफी किरकिरी हुई थी. इसी वजह से वहाँ महिलाओं ने वूमन इन सिनेमा कलेक्टिव (डब्ल्यूसीसी) का गठन किया गया था. इसी संस्था ने इस घटना और मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में यौन उत्पीड़न की जांच के लिए कोर्ट में याचिका लगाई थी. इस पर केरल उच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति के. हेमा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया. इस कमेटी ने अपनी जांच में रिपोर्ट में कई चौंकानेवाली जानकारी दर्ज की है. एक अभिनेता ने कमेटी को बताया कि यहाँ एक ताकतवर लॉबी काम करती है. वह किसी को भी बैन कर सकते हैं बेशक कोई नियम हो या नहीं. कुछ जूनियर कलाकारों ने बताया कि जूनियर कलाकारों का हाल तो और भी खराब है. उनके साथ तो गुलामों जैसा बर्ताव किया जाता है. महिलाओं के साथ यौन शोषण तो आम है और कास्टिंग काउच कोई नई बात नहीं है. अगर कोई महिला समझौता नहीं करेगी तो उसे काम की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

इस कमेटी ने मामले की जांच कर 2019 में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को 295 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी. इस रिपोर्ट में इंडस्ट्री के सैकड़ों महिला कलाकारों, आर्टिस्ट और लोगों से बातचीत कर बयानों को रिकॉर्ड किया गया मगर सरकार ने इस रिपोर्ट की गंभीरता को देखते हुए इसे कभी सार्वजनिक नहीं किया. इस मामले पर आरटीआई लगाने के बाद केरल सरकार ने 295 पन्नों की इस रिपोर्ट से 63 पन्नों को हटाकर इसे जारी किया है. केरल सरकार का कहना है कि उन्होंने संवेदनशील जानकारी और गोपनीयता संबंधी चिंताओं को देखते हुए इसे जारी नहीं किया था. खुद जस्टिस हेमा ने पत्र लिखकर सरकार से कहा था कि सेंसटिव जानकारी को साझा न किया जाए. जाहिर है, पिछले सौ सालों में मलयालम सिनेमा या संभवतः सभी तरह के सिनेमाई समाज में स्त्री को कलाकार के बजाय भोग्या ही समझा गया है.

पी. के. रोजी को याद करने और सम्मानित करने में सबाल्टर्न सिनेमा को जादुई यथार्थवाद की शैली में पेश करने वाले तमिल फ़िल्म निर्माता निर्देशक पा. रंजीत का भी बड़ा योगदान है. उनकी संस्था ‘वानम’ ने चेन्नई में 2023 से आरंभ किये गये फिल्म फेस्टिवल का नाम पी. के. रोजी फिल्म फेस्टिवल रखा है. वानम का अर्थ है, महोत्सव. पी. के. रोजी फिल्म फेस्टिवल एक सांस्कृतिक और सिनेमाई आयोजन है जो भारत में सिनेमा के दलित इतिहास माह के रूप में व्यक्त होता है. यह फेस्टिवल पी. के. रोजी की साहसिकता और सिनेमा में योगदान को सम्मानित करने के साथ सामाजिक न्याय और दलित संस्कृति को बढ़ावा देने का प्रयास करता है. यहाँ उन फिल्मों और वृत्तचित्रों को प्रदर्शित किया जाता है जो दलित समुदाय के अनुभवों, संघर्षों और संस्कृति को उजागर करते हैं.

इस वर्ष 2025 में यह फिल्मोत्सव दो चरणों में आयोजित हो रहा है जिसमें पहला है, फीचर फिल्मों का प्रदर्शन जो दो अप्रैल से छह अप्रैल तक सुबह नौ बजे से प्रसाद डिजिटल फिल्म लैब, सालीग्रामम, चेन्नई में आरम्भ होगा और दूसरे चरण में वृत्तचित्र और लघु फिल्में जो चार अप्रैल से छह अप्रैल तक सुबह नौ बजे से गोएथे इंस्टीट्यूट, मैक्स मूलर भवन, नुंगमबक्कम, चेन्नई में प्रदर्शित होंगी. इस फेस्टिवल में विभिन्न भाषाओं की फिल्में, लघु फिल्में और वृत्तचित्र दिखाए जाते हैं जो सामाजिक न्याय, दलित पहचान और संस्कृति पर केंद्रित होते हैं. उदाहरण के लिए पिछले आयोजनों में ‘अंबाजीपेटा मैरिज बैंड‘ (तेलुगु), ‘मामन्नन‘ (तमिल), और ‘फ्रूटवेल स्टेशन‘ (अंग्रेजी) जैसी फिल्में प्रदर्शित की गई थीं.

यह फेस्टिवल सभी के लिए मुफ्त है ताकि अधिक से अधिक लोग इसमें शामिल हो सकें. यहाँ फिल्म स्क्रीनिंग के बाद पैनल चर्चाएं और दर्शकों के साथ संवाद सत्र आयोजित किए जाते हैं जो सिनेमा और सामाजिक मुद्दों पर विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करते हैं. पी. के. रोसी फिल्म फेस्टिवल न केवल सिनेमा के माध्यम से कला का उत्सव है, बल्कि यह उन लोगों की आवाज को मंच देता है जो ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे हैं. यह आयोजन जाति, लिंग और वर्ग के आधार पर सिनेमा में बहिष्कार के मुद्दों को उठाता है और समावेशी कथाओं को प्रोत्साहित करता है. पा. रंजीत का मानना है कि यह फेस्टिवल समाज में समानांतर कथाओं को सामने लाने और दर्शकों के बीच सार्थक चर्चा उत्पन्न करने का एक जरिया है. भविष्य में आयोजकों की योजना इस तीन दिवसीय फेस्टिवल को सात दिनों तक विस्तारित करने की है, ताकि और अधिक फिल्मों और विविध कथाओं को शामिल किया जा सके.

पी. के. रोजी के साहस और सिनेमा में योगदान को सम्मान देने के लिए कोलंबिया यूनिवर्सिटी न्यूयार्क, अमेरिका में भी एक अंतराष्ट्रीय आयोजन भी 23 और 24 फरवरी 2019 में किया जा चुका है. यह पहला दलित फ़िल्म फेस्टिवल था. यह फेस्टिवल अमेरिका में स्थित अंबेडकरवादी संगठनों, डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल मिशन, अंबेडकर एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका, बोस्टन स्टडी ग्रुप और अंबेडकर बौद्धिस्ट एसोसिएशन टेक्सास द्वारा आयोजित किया गया था.

इसका उद्देश्य दलित-बहुजन सिनेमा को एक मंच प्रदान करना था जो जातिगत भेदभाव से प्रभावित मुद्दों को उठाता है और मुख्यधारा के सिनेमा में अक्सर नजरअंदाज किया जाता है. यह डॉ. बी. आर. अंबेडकर की विरासत से प्रेरित था जो कोलंबिया यूनिवर्सिटी के एक प्रतिष्ठित पूर्व छात्र थे. इसमें कई उल्लेखनीय फिल्में दिखाई गईं –

’पेरियेरम पेरुमल’’ (तमिल, निर्देशकः मारी सेल्वराज, निर्माताः पा. रंजीत), ’काला’’ (तमिल, निर्देशकः पा. रंजीत), ’मसान’’ (हिंदी, निर्देशकः नीरज घायवान), ’फैंड्री’’ (मराठी, निर्देशकः नागराज मंजुले), ’पपिलियो बुद्धा’’ (मलयालम, निर्देशकः जयन चेरियन), ’बोले इंडिया जय भीम’ (हिंदी, निर्देशकः सुबोध नागदेवे).

इसमें कुछ महत्वपूर्ण वृत्तचित्र भी प्रदर्शित किए गए – ‘कक्कूस‘ (तमिल), ‘पिस्तुल्या‘ (मराठी), और ‘दलन‘ (नेपाली). इस फेस्टिवल का उद्घाटन मशहूर दलित फिल्मकार पा. रंजीत, नागराज मंजुले और अभिनेत्री निहारिका सिंह ने किया था जहाँ फिल्मों के साथ-साथ दलित कलाकारों की कलाकृतियाँ, साहित्य और फोटोग्राफी भी प्रदर्शित की गईं. यह फेस्टिवल पहली बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दलित सिनेमा को समर्पित एक आयोजन था जिसे पी. के. रोजी को समर्पित किया गया था.

फेस्टिवल के दौरान उनकी कहानी को दर्शकों के सामने लाया गया, यह बताते हुए कि कैसे एक दलित महिला ने उस समय के रूढ़िवादी समाज में सिनेमा में कदम रखा और इसके लिए उन्हें क्या कीमत चुकानी पड़ी. इस फेस्टिवल ने न केवल दलित रचनात्मकता को उजागर किया, बल्कि जाति, लिंग और सामाजिक अन्याय जैसे मुद्दों पर वैश्विक संवाद को भी प्रोत्साहित किया.

पर इन सम्मानों के बावजूद जाति कितनी कठोर है, यह रोजी की कहानी में कम और उनके वंशजों की खामोशी में अधिक जाहिर है. वे आज यह बता नहीं सकते कि वे अपनी पूर्वज रोजी को कितना जानते हैं. रोजी की कहानी सामने लाने वाले कुन्नुकुझी के अनुसार, ‘‘उसने (रोजी) इस बारे में किसी से बात नहीं की. ऐसा कहा जाता है कि रोजी और केशवन के बीच इस बारे में बात न करने का एक समझौता था.’’ रोजी पर बात करने से, उसपर फिल्म बनाने से उनके परिवारों के बीच यह समस्या अवश्य उठती होगी जहाँ से जाति की समस्या शुरु हुई थी. वह घाव जो लगभग सौ साल पहले दिया गया हो पर आज भी मिटता नहीं, नाम और धर्म बदलने के बावजूद… वक्त बीतने के बावजूद.

पी. के. रोजी, जो मलयालम सिनेमा की पहली और भारतीय सिनेमा की पहली दलित अभिनेत्री रही हैं, जाति और पुरुषसत्तात्मक ताकतों के शिकार का एक दुखद, भयावह और वास्तविक उदाहरण हैं. उनका तत्कालीन सामाजिक बहिष्कार यह दर्शाता है कि उनका ‘अपराध‘ सिर्फ यह नहीं था कि एक दलित महिला ने एक उच्च जाति की महिला के रूप में काम किया, यह भी था कि एक महिला फिल्म के माध्यम से स्वयं को जाहिर कर अपनी अमिट पहचान बनाने का साहस कर सकती है.

रोजी की यह भयावह कहानी तत्कालीन केरल समाज के जातिगत और लैंगिक भेदभाव को जाहिर करता है. उनके साथ जो कुछ हुआ, संभवतः विश्व सिनेमा में अपनी तरह का अकेला है.

यह मलयालम सिनेमा और समाज के लिए कितना विडंबनापूर्ण सत्य है कि अपनी भाषा में पहली फीचर फिल्म का जश्न मनाने के बजाय फिल्म, फिल्म-निर्माता और उसकी दलित स्त्री कलाकार का हिंसात्मक विरोध किया और एक तस्वीर को छोड़कर सबकुछ नष्ट कर दिया.

जातीय और लैंगिक प्रताड़ना की यह एक ऐसी मिसाल है जो अश्वत्थामा के माथे के घाव की तरह मलयालम सिनेमा के इतिहास में दर्ज रहेगा. हालांकि पी. के. रोजी और जे. सी. डेनियल को अब ससम्मान याद किया जा रहा है और इसे पश्चाताप की तरह देखा जाना चाहिए जो कि उचित भी है. यह उसी तरह है जैसे गांधी की प्रतिमा ईंग्लैंड में पार्लियामेंट के बाहर लगाई गई है.

अंत में एक प्रश्न कि क्या दक्षिण भारतीय फिल्मकारों और संगठनों की तरह हिंदी समाज अपने सिनेमा या उससे बाहर जातीय और लैंगिक पूर्वग्रहों को इसी तरह सृजनात्मक ढंग से व्यक्त कर सकेगा?

 

पीयूष कुमार आलोचना, लोक-संस्कृति, कविता, सिनेमा, अनुवाद और डायरी जैसी विविध विधाओं में लिखते हैं. ‘सर्वनाम’ पत्रिका के सह-सम्पादक हैं. उनका कविता संग्रह ‘सेमरसोत में सांझ’ भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ है. लेखन के साथ-साथ वे शौकिया फोटोग्राफी भी करते हैं और कई पुस्तकों व पत्रिकाओं के आवरण पृष्ठों के लिए छायांकन कर चुके हैं. वर्तमान में वे उच्च शिक्षा विभाग, छत्तीसगढ़ शासन में हिंदी विषय के सहायक प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं.
piyush3874@gmail.com

Tags: 2025जे.सी. डेनियलपी. के. रोजीपीयूष कुमारभारतीय सिनेमा की पहली दलित अभिनेत्री
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Comments 10

  1. मृदुला सिंह says:
    2 months ago

    इस विषय पर यह चिंतनपरक लेख गहन विचारों और सूक्ष्म दृष्टिकोण से भरपूर है।सरल भाषा और प्रभावशाली प्रस्तुति । लेखक को बधाई।

    Reply
    • Bhavana Singh says:
      2 months ago

      अपने देश के सामाजिक कटु सत्य को , बहुत सुन्दरता से अभिव्यक्त किया, जैसे तलवार को कलम बना कर , समाज की दूषित मानसिकता की छाती पर , उभार दी हों रक्त की लकीरें।

      Reply
    • पीयूष कुमार says:
      2 months ago

      जी। शुक्रिया। सामाजिक विसंगतियों ने मनुष्यता का कितना नुकसान किया है, यह कल्पना से परे है। पता नहीं यह सब कब ठीक होगा।

      Reply
  2. nawal sharma says:
    2 months ago

    महत्वपूर्ण लेख : तारीफ़ ……

    Reply
  3. शशिभूषण मिश्र says:
    2 months ago

    रोजी के सिनेमाई संघर्ष को अपने जिस संवेदनशीलता के साथ उकेरने की कोशिश की है उससे जाति, जेंडर,स्त्री,समाज के वृहत्तर प्रश्न उभरने लगते हैं..आपका और समालोचन का हार्दिक धन्यवाद!

    Reply
  4. आभा सक्सेना says:
    2 months ago

    मलयालम सिनेमा और भारतीय सिनेमा में दलित स्त्री की स्थिति को बहुत ही धारदार शब्दावली में लिखा गया ये आलेख सिनेमा और समाज में दलित समाज के यथार्थ को रेखांकित करता है। अंत में उठाया गया प्रश्न केवल सिनेमा के लिए नहीं पूरे समाज के लिए है।

    Reply
  5. रानू उनियाल says:
    2 months ago

    एक उम्दा लेख. दिल भीग गया

    Reply
  6. Anand Bahadur says:
    2 months ago

    बहुत ही संवेदनशील तरीके से लिखा गया लेख जो तथ्यात्मक जानकारी से लैस है।

    Reply
  7. M P Haridev says:
    2 months ago

    आलेख अनेक महत्वपूर्ण जानकारियों से संपन्न है । जबकि पी के रोज़ी अपनी दलित जाति की वजह से विपन्न । पी के रोज़ी के बलिदान ही कहना चाहिए, कि वजह से भारत में ही नहीं अपितु संसार के फ़िल्म निर्देशक और निर्माता कलाकारों के साथ फ़िल्में बना रहे । सुखद है । भविष्य जातिगत जकड़नों से मुक्त हो ऐसा विश्वास है । पीयूष कुमार जी फेसबुक पर दोस्त हैं ।
    स्नान करते हुए इनकी अनायास याद आती है । पहली दफ़ा समालोचन पर लिखा । कल इस लिंक का शीर्षक और प्रस्तावना पढ़ ली थी । लेटलतीफ़ी ही सही परंतु पढ़ लिया ।

    Reply
  8. अटल तिवारी says:
    2 months ago

    बहुत गंभीर लेख। पढ़कर बहुत कुछ जानने को मिला। लेखक और प्रस्तोता दोनों को खूब बधाई।

    Reply

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