• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » पहल के संग-साथ : रविभूषण

पहल के संग-साथ : रविभूषण

1973 से 2021 के बीच प्रकाशित पहल के 125 अंक ज्ञानरंजन की प्रतिबद्धता, संकल्प और ऊर्जा के दस्तावेज़ हैं. साहित्यिक पत्रकारिता का यह एक ऐसा आलोक-स्तम्भ है, जिसने पाँच दशकों तक साहित्य और विचार की दुनिया में अपनी केन्द्रीयता अक्षुण्ण रखी. कई पीढ़ियाँ इसकी सीढ़ियाँ चढ़ते हुए इसके खाद-पानी से विकसित हुईं. आज 89 वर्ष के ज्ञानरंजन का जन्मदिन है. उनके योगदान और पहल के महत्व को याद रखना इसलिए भी ज़रूरी है कि ऐसी वैचारिक पत्रकारिता की जगह बनी रहे, और ऐसे लोग बचे रहें जो “मनुष्य को खतरनाक ढंग से जीना चाहिए और उसे अपने घर ज्वालामुखियों के क़रीब बसाने चाहिए,” में विश्वास करते हैं. इस अवसर पर वरिष्ठ आलोचक रविभूषण का लिखा यह विशेष आलेख पहल के योगदान का विवेचन करते हुए वर्तमान की सामाजिक-सांस्कृतिक चुनौतियों को भी अपनी परिधि में लेता है. यह न केवल एक मूल्यांकन है, बल्कि उस परंपरा की ओर भी संकेत है जिसने हिन्दी साहित्य को उसके सबसे कठिन प्रश्नों से जोड़े रखा. प्रस्तुत है.

by arun dev
November 21, 2025
in आलेख
A A
पहल के संग-साथ : रविभूषण
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें
पहल के संग-साथ
रविभूषण

 

चौथे लोकसभा चुनाव (17-21 फरवरी, 1967) और नक्सलबाड़ी आंदोलन (3 मार्च 1967) के बाद हिन्दी साहित्य का ही नहीं, भारतीय साहित्य का भी चेहरा पूर्ववत नहीं रहा. 1960 के दशक के आरंभ में हिन्दी में जो कुछ नयी पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई थी ,उनमें और दशक के अंत में प्रकाशित हुई पत्रिकाओं में एक स्पष्ट अंतर है. यह अंतर साठ के दशक के आरंभिक वर्षों और अंतिम वर्षों के बीच घटी घटनाओं के कारण भी है. राजनीतिक परिदृश्य के बदलने के बाद नयी वामपंथी पत्रिकाओं की बाढ़-सी आ गयी थी. इस दौर में प्रकाशित वामपंथी पत्रिकाओं- ‘सामयिक’, ‘वाम’ , ‘समारंभ’, ‘विचार’, ‘क्यों’, ‘सर्वनाम’ आदि की, एक बड़ी भूमिका है.

तब वाम पंथ के करीब एक बड़ी रचना-पीढ़ी का आगमन हुआ था. सुरेन्द्र चौधरी ने ‘व्यवस्था और वामपंथ’ लेख (‘पहल’ 1) में लिखा है-

“पिछ‌ले पच्चीस वर्षों में एक-एक करके सारे प्रतिष्ठान पूंजीपति (एकाधिकारी) के पेट में चले गए. ‘प्रतीक’, ‘नया साहित्य’, ‘नया समाज’, ‘कल्पना’, ‘कृति’ और न जाने कितनी दूसरी पत्रिकाएँ बाजार से बाहर कर दी गयीं और उनकी जगह ली एकाधिकारी पूंजी से संचालित होने वाली पत्रिकाओं ने. स्वतंत्र पत्रकारिता को बाजार से खदेड़ कर भगा दिया दिया गया.”1

पहली बार इन लघु पत्रिकाओं में मार्क्स (5 मई 1818-14 मार्च 1883), एंगेल्स (28 नवम्बर 1820-5 अगस्त 1895), लेनिन (२२ अप्रैल 1870- 21 जनवरी 1924), माओ (26 दिसम्बर 1893-9 सितम्बर 1976), चे ग्वेवारा (14 जून 1928-9 अक्टू‌बर 1967), कास्त्रो (13 अगस्त 1926-25 नवम्बर 2016) अनेक बार उद्धरित किए गए.

1970 के दशक के आरंभ में राजनीतिक और साहित्यिक हलचलें काफी तेज थीं. 1970 में ‘भोजपुर विद्रोह’ आरंभ हो चुका था, २२ अप्रैल 1969 को स्थापित पार्टी भाकपा (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) चारु मजुमदार (15 मई 1918-28 जुलाई 1972) के निधन के बाद उनके समर्थकों और विरोधियों के बीच दो धड़ों में विभक्त हो चुकी थी. ‘गरीबी हटाओ’ नारा के साथ पाँचवाँ लोकसभा चुनाव (1-10 मार्च 1971) इन्दिरा गांधी जीत चुकी थीं और 1972 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद मुख्य मंत्री बने सिद्धार्थ शंकर रे (२० अक्टूबर 1920-6 नवम्बर 2010) ने वामपंथियों के खिलाफ सरकारी आतंक और हिंसा का एक खौफ़नाक उदाहरण पेश किया था. नागार्जुन की कविता ‘सामयिक’ जैसी लघु पत्रिका में प्रकाशित हुई थी- ‘अब तो बन्द करो हे देवि! यह चुनाव का प्रहसन’

यह समय वामपंथी चिंतन में विभाजन का है. ‘पहल’ के प्रकाशन के पहले बाँदा और भरतपुर में प्रगतिशील साहित्यकारों का सम्मेलन हो चुका था. ज्ञानरंजन की कहानी ‘बहिर्गमन’ प्रकाशित हो चुकी थी. 1970 से 72-73 का समय एक उफनता समय था. ज्ञानरंजन के मन में इसी समय एक पत्रिका निकालने का विचार आया.

“वे एक विशिष्ट प्रतिबद्धता के साथ-साथ नयी वैचारिक चेतना का प्रतिपादन करना चाहते थे. दूधनाथ और कालिया जैसे साहित्यिक मित्रों के साथ इसके नाम के विषय में चर्चा होती… कुछ नाम कवि-मित्र कुमार विकल ने सुझाए और कुछ मैंने भी. वे पत्रिका में गद्य की सभी विधाओं और कविता को स्थान देना चाहते थे. नाम रखा गया ‘पहल’” 2

इस नाम पर शैलेन्द्र शैल (लेखक और सेवानिवृत्त वायु अधिकारी ) को लगा था “यह किसी दंगल में पहले दाँव का बोध कराता है.” ज्ञानरंजन ने उन्हें लिखा-

“जब कोई नाम नहीं मिला, तो विवशता में यह सोचकर कि नाम में क्या रखा है, मैंने चलने दिया. इसमें पीढ़ीवाद और समसामयिक गाली-गलौज को मैंने दरकिनार किया है.”3‌

‘पहल’ प्रकाशित करते समय ज्ञानरंजन ने “‘ग्रांटा’, ‘पेरिस रिव्यू’, ‘कल्पना’, ‘निकष’, ‘एनकाउंटर’ और ‘पोयट्री’ जैसी ऐतिहासिक पत्रिकाओं का सपना” 4‌ देखा था. दुनिया की अग्रणी साहित्यिक पत्रिकाओं में से एक ‘ग्रांटा’ 1889 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में स्थापित प्रसिद्ध ब्रिटिश साहित्यिक पत्रिका है.  विश्व- प्रसिद्ध त्रैमासिक अंग्रेजी साहित्यिक पत्रिका ‘पेरिस रिव्यू’ की शुरुआत 1953 में पेरिस में हेरोल्ड एल- ह्यूम्स, पीटर मैथिसेन और जॉर्ज प्लिम्प्टन ने की थी. 1973 से यह पत्रिका न्यूयार्क से निकलने लगी. यह पत्रिका ख्यात रचनाकारों के साक्षात्कार ‘राइटर्स एट वर्क’ के लिए अधिक जानी जाती है.

कवि स्टीफन स्पेंडर और पत्रकार इरविंग क्रिस्टोल ने 1953 में ‘एनकाउंटर’ का प्रकाशन आरंभ किया था, जो 1990 त‌क प्रकाशित होता रहा. ‘पोयट्री’ पत्रिका का प्रकाशन हैरिएट मोनरोने में 1912 में शिकागो से किया था. ‘कल्पना’ फरवरी 1953 से प्रकाशित होने वाली प्रमुख पत्रिका थी. हिन्दी में पहले से निकलने वाली प्रगतिशील और जनवादी पत्रिकाएँ और थीं, पर ‘पहल’ उन सबसे एकदम अलग थी.

सत्तर के दशक के आरंभिक कुछ वर्ष कमाल के थे. वे वर्ष अब भी मेरे भीतर बचे हुए हैं, जिसने मुझे अब तक युवा बनाये रखा है. उस समय लगता था, सब कुछ बदल जाएगा.  पाश ने तब नहीं लिखा था- ‘सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना.’ सपने अब भी हैं, पर उस तरह नहीं. मैं भागलपुर विश्वविद्यालय  बिहार लोक सेवा आयोग की संस्तुति पर स्थायी रूप से नियुक्त हो चुका था. भरत प्रसाद सागर एम. ए. में मेरे विद्यार्थी थे. उन्होंने ही ‘पहल’ का अंक मुझे दिया था.

ज्ञानरंजन को मैं एक कहानीकार के रुप में अपने छात्र-जीवन से जानता था. ‘संबंध’ कहानी आज तक भूला नहीं, जबकि सारे संबंध या तो मतलबी हो चुके हैं या बिलाते जा रहे हैं. संभवतः 1967-68 में महेश्वर और भरत प्रसाद सागर ने एक पत्रिका प्रकाशित करने की योजना बनाई थी. नक्सलबाडी आंदोलन फैल रहा था. दूर-दूर तक की हवाओं में उसकी गंध और सुगंध थी. मैंने पत्रिका का नाम ‘बातचीत’ रखने का सुझाव दिया था. दोनों मेरे मित्र थे, जो अब दिवंगत हो चुके हैं.  महेश्वर जैसा प्रखर और समर्पित मार्क्सवादी बुद्धिजीवी आज कोई नहीं है. उन्होंने पार्टी से अपनी साँसें जोड़ ली थी. ‘बातचीत’ पत्रिका के प्रवेशांक की चर्चा नामवर सिंह ने ‘आलोचना’ के सम्पादकीय में की थी.

 

 दो)

‘पहल’ का प्रकाशन एक बड़ी घटना थी, वह न तो केवल साहित्यिक पत्रिका थी, न केवल वैचारिक. उसके प्रत्येक अंक में एक साथ कई फूल खिले होते थे. कई किस्म की वहाँ सुगंध थी. वैसी फुलवारी फिर किसी ने कभी नहीं बनाई. ‘पहल’ की तुलना किसी पत्रिका से नहीं की जा सकती. 125 अंकों को देखने से नहीं, पढ़ने से ही पता चलेगा कि ‘पहल’ ने अपने समय में कितने बड़े काम किए हैं, ‘पहल’ एक आन्दोलन था. ज्ञानरंजन ने

“अपना सारा ईंधन कोयले से परमाणु ऊर्जा तक ‘पहल’ में झोंक दिया.”

वे उन्नीस वर्ष की उम्र में इलाहाबाद विश्विद्यालय में पार्टी के ‘सक्रिय कार्यकता’ बन गये थे. वे मानते हैं ‘यहीं से मेरे जीवन की शुरु‌आत हुई… बहुत बाद में पार्टी से मेरा घमासान भी हुआ… मैं जिस आधुनिकता की चपेट में था, वह भग्न हो रही थी, उसका क्रांति और ज्ञानोदय से संबंध टूट चुका था.” 5

‘पहल’ के पहले अंक में केवल वर्ष 1973 का उल्लेख है. मेरा अनुमान है कि यह अंक नवम्बर या दिसंबर में प्रकाशित हुआ होगा. इस अनुमान के ठोस कारण हैं. ‘पहल’ के पहले अंक के संपादकीय का शीर्षक ‘चिली’ है. नहीं मालूम, इस संपादकीय पर किसी ने विचार किया है या नहीं ? आज जब ‘पहल’ बंद हो चुकी है और 21वीं सदी के 25 वर्ष भी समाप्त होने को हैं मेरा आग्रह है (निवेदन भी) कि यह सम्पादकीय अवश्य वे लोग अवश्य पढ़े, जो आज के भारत के हालात से केवल परेशान ही नहीं, भयाक्रान्त भी हैं.

अर्थशास्त्र के शिकागो स्कूल के धुरंधर अर्थशास्त्री फ्रेडरिक हायेक (8 मई 1899-23 मार्च 1992) और मिल्टन फ्रीडमैन (31 जुलाई 1912-16 नवम्बर २००6) की अर्थ दृष्टि को समझ कर ही नव उदारवादी अर्थव्यवस्था को समझा जा सकता है. हायेक ऑस्ट्रियाई -ब्रिटिश अर्थशास्त्री थे और फ्रीडमैन अमेरिकी अर्थशास्त्री थे.

इन दोनों के अर्थशास्त्रीय सिद्धांतों ने पूरी दुनिया को प्रभावित किया, जिसे हम अस्सी के दशक में ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर  (13 अक्टूबर 1925-8 अप्रैल 2013) और 40वें अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन (6 फरवरी 1911-5 जून 2004) की अर्थ-नीतियों में देख सकते हैं.

थैचर 4 मई 1979 से 28 नवम्बर 1990 तक यूनाइ‌टेड किंगडम की प्रधानमंत्री थीं और रीगन 20 जनवरी 1981 से 20 जनवरी 1989 तक संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति थे. इन दोनों ने हायेक फ्रीडमेन मार्ग पर चलना पसंद किया. इसके पहले इसका प्रयोग दक्षिण अमेरिकी देश चिली में किया गया था. साम्राज्यवाद की चर्चा के समय हम अक्सर “बौद्धिक साम्राज्यवाद’ की अनदेखी कर बैठते हैं. कनाडाई लेखिका, सामाजिक कार्यकर्ता और फिल्म-निर्माता पचपन वर्षीय नाओमी क्लेन (8 मई 1970) ने अपनी पुस्तक- ‘द शॉक डॉक्ट्रिन : द राइज ऑफ डिजास्टर’ (2007) के दूसरे अध्याय ‘द अदर डॉक्टर शॉक: मिल्टन फ्रीडमेन एंड द सर्च फार ए लैसेज फेयर’ (Laissez-faire) में ‘कैथोलिक यूनिवर्सिटी ऑफ चिली एंड द इंटरनेशनल कोऑपरेशन एडमिनिस्ट्रेशन’ को अगस्त 1957 में दी गयी तीसरी रिपोर्ट को उद्धृत किया है. 6

इस रिपोर्ट के अनुसार प्रोजेक्ट का मुख्य प्रयोजन चिली में अर्थशास्त्र मामले में छात्रों की उस पीढी को तैयार करना था, जो बाद में वहाँ के बौद्धिक नेता बनें. 1957 में चीली के राष्ट्रपति कार्लोस इबानेज़ डेल कैम्पों (3 नव‌म्बर 1877-28 अप्रैत 1960) निर्दलीय थे. वे 3 नवम्बर 1952 से 1958 तक चिली के 25वें राष्ट्रपति थे. इनके बाद वहाँ के राष्ट्रपति बने जॉर्ज एलेसेंड्रो (19 मई 1896-31अगस्त 1986). वे 3 नवंबर 1958 से 3 नवंबर 1964 तक चिली के राष्ट्रपति रहे. ये भी निर्दलीय थे. ध्यान दिया जाना चाहिए कि चिली में जिस प्रोजेक्ट पर काम किया गया था, वह इन दोनों का समय था.

 

तीन)

‘पहल’ के पहले अंक के सम्पादकीय पर अलग से विचार की जरूरत है.  चिली में 1970 का चुनाव ऐतिहासिक था. जॉर्ज एलेसेंड्रा पुनः चुनाव लड़ रहे थे. साल्वाडोर अलेंदे ने मामूली अंतर से चुनाव जीता था. 1 से  4 सितम्बर 1970 में हुए इस चुनाव में अलेंदे को 36.3 प्रतिशत वोट मिले थे और पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज एलेसेंडी को 34.9 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे. उन्हें दक्षिणपंथी नेशनल पार्टी और अन्य रूढ़िवादी समूहों का समर्थन था. तीसरे उम्मीदवार रादोमिरै टोमिक थे. सल्वादोर अलेंदे निर्दलीय जॉर्ज एलेसेंड्री और क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स रादोमिरो टोमिक से बहुत कम अंतर से जीते थे. अलेंदे सोशलिस्ट पार्टी ऑफ चिली के सह-संस्थापक और आजीवन सदस्य थे. चुनाव में उनकी पार्टी का अन्य 5 पार्टियों से गठबंधन था. उनके साथ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चीली, रैडिकल पार्टी, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी, पोपुलर यूनिटैरी, एक्शन मुवमेंटे और इंडिपेंडेंट पोपुलर एक्शन ग्रुप था.

अलेंदे लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित लैटिन अमेरिकी देशों के पहले मार्क्सवादी राष्ट्रपति थे. वे 3 नवम्बर 1970 से 11 सितम्बर तक चिली के राष्ट्रपति रहे. 11 सितंबर 1973 में चिली में तख्ता पलट हुआ, सैन्य तानाशाही स्थापित हुईं. सेना प्रमुख जनरल ऑगस्टो पिनोशे (25 नवम्बर 1915-10 दिसम्बर 2006) द्वारा किए गये तख्‌ता पलट को संयुक्त राज्य अमेरिका का समर्थन था. 11सितम्बर 1973 से 11 मार्च 1990 तक चिली में सैन्य तानाशाही थी अलेंदे की समाजवादी सरकार लोकतांत्रिक ढंग से बनी थी. उस समय यह माना गया था कि अलेंदे की हत्या की गयी है. इस हत्या के लगभग दो महीने के भीतर ज्ञानरंजन का माना स्वाभाविक था कि अलेंदे की हत्या की गयी है. रोबिंसन रोजा की पुस्तक ‘द मर्डर ऑफ अलेंदे एंड द ऐंड ऑफ द चिलीयन वे टू सोश्योलिज्म’ (1975) में भी अलेंदें की हत्या का ही उल्लेख है. उनकी हत्या और आत्म‌हत्या को लेकर चिली में लम्बे समय तक विवाद रहा है.

चिली की कोर्ट में इससे जुड़ा माम‌ला लम्बे समय तक चला था. अलेंदे की पुत्री मारिया इसाबेल अलेंदे बुस्सी (18 जनवरी 1945) दो बार चिली की सीनेट की सदस्य और बाद में अध्यक्ष भी रही है. उन्होंने यह माना कि उनका परिवार उनकी आत्महत्या के पक्ष में था. 11 सितंबर 2012 को अलेंदे की 39 वीं पुण्यतिथि को चिली के कोर्ट ने उनकी मृत्यु से जुड़ा केस बंद कर दिया. बाद में जाँच करने वाले जज ने विशेषज्ञों की जाँच के आधार पर दिसंबर 2011 में अलेंदे की मृत्यु को आत्महत्या घोषित किया.अन्तरराष्ट्रीय एक्सपर्ट टीम ने सभी तथ्यों की जाँच कर यह निष्कर्ष निकाला कि अलेंदे ने ए के 47 एसल्ट राइफल से आत्महत्या की. यह राइफल उन्हें फिदेल कास्त्रो (13 अगस्त 1926- 25 नवम्बर 2016) ने दी थी.उनकी मृत्यु के 12 दिन बाद पाब्लो नेरुदा (12-7-1904 -23.9.1973) चल बसे.

‘पहल’-1 की भूमिका ‘चिली’ है. आरंभ में पाब्लो नेरुदा (12-जुलाई 1904-23 सितम्बर 1973) का कथन है “मारने के अलावा वे और कर भी क्या सकते हैं और वह भी एक अच्छा सौदा नहीं होगा.” चिले और वहाँ 1973 में हुए सैन्य तख्ता पलट पर कम पुस्तकें नहीं हैं, पर निक्सन-प्रशासन द्वारा अलेंदे को उखाड़ फेंकने की साजिश का प्रामाणिक ,तथ्यपरक विवरण लुब्ना जेड कुरैशी की पुस्तक ‘निक्सन, किंसिजर एंड अलेंदे : यू एस इनवाल्वमेंट इन द 1973 कूप इन चिले’ में हैं. 1973 में निक्सन (9 जनवरी 1913-22 अप्रैल 1994) अमेरिका के 37 वें राष्ट्रपति पद पर थे. वे 20 जनवरी 1969 से 9 अगस्त 1974 तक अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर रहे. हेनरी किसिंजर (27 मई 1923-29 नवम्बर 2023) को निक्सन ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया था. इस पद पर किसिंजर 20 जनवरी 1969 से 31 नवम्बर 1975 तक रहे. ज्ञानरंजन का सम्पादकीय चिली की ‘फासिस्ट प्रतिक्रान्ति’ पर है.

इसमें ‘पाब्लो नेरुदा के साथ निर्लज्ज व्यवहार’ का जिक्र है. ज्ञानरंजन ने लिखा-

“मार्क्सवादियों का कत्लेआम हो रहा है. अमरीकी मशीनगनों से विश्वविद्यालयों की सफाई हो रही है और पुस्तकालयों, निजी संग्रहों और पुस्तक प्रतिष्ठानों में चुन-चुन कर वामपंथी पुस्तकों को निकाल कर जलाया जा रहा है. ताँबा खदानों का मुँह फिर अमरीका के लिए खोल दिया गया है.”

‘पहल’ के पहले सम्पादकीय में ज्ञानरंजन की जो मार्क्सवादी निष्ठा और दृढ़‌ता दिखाई देती है, वह अंत-अंत तक बनी रही है. उनमें कभी कोई विचलन नहीं आया. वे एक नैतिक मार्क्सवादी रहे हैं. न कभी रूढ़ रहे, न यांत्रिक. पिता रामनाथ सुमन गाँधीवादी थे और उनके पुत्र ज्ञानरंजन मार्क्सवादी.

“मैं अपने जीवन में बहुत लुम्पेन किस्म का व्यक्ति था. जब कम्युनिस्ट विचार‌धारा के निकट में आया, तब मेरा ये तत्त्व घटा, खत्म हुआ.”

चिली में घटी घटना पर लिखते हुए उन्होंने ‘दिल्ली की पूंजीवादी पत्रकारिता और तथाकथित आजाद मन के बुद्धिजीवियों’ की ‘ऊपरी तकलीफ और भीतरी खुशी’ की बात कही थी. चिली का सारा घटनाक्रम उनके समक्ष था. चुनाव भी.

“पिछली ताकत की तुलना में आयेंदे के पक्ष में तीन-चार प्रतिशत ज्यादा समर्थन दिया, जन प्रतिनिधियों के रूप में… चिली के वर्तमान इतिहास में ये चुनाव सड़‌कों पर रक्त रंजित लड़ाई और बैलेट की अद्भुत लड़ाई के रूप में स्मरण किए जाएंगे.”

ज्ञानरंजन ने उस समय अमेरिकी साम्राज्यवाद, चिली में उसके द्वारा किया गया हस्तक्षेप आदि पर जैसी प्रतिक्रिया प्रकट की, क्या वैसी प्रतिक्रिया उस समय किसी हिन्दी पत्रिका में देखने को मिल सकती है? चिली पर लिखते हुए ज्ञानरंजन का ध्यान अपने समय पर भी था. अपने समय की जैसी अचूक पहचान आरंभ से ही हम उनके यहाँ देखते हैं, वैसी बहुत कम के यहाँ हैं. 1973 में चिली की घटना एक बड़ी अन्तरराष्ट्रीय घटना भी, जिधर सबका ध्यान गया था. उन्होंने अंग्रेजी पत्रकार-सम्पादक शामलाल (1912-23 फरवरी 2007) और गिरिलाल जैन (1924-19 जुलाई 1993) पर प्रहार किया. इनके लिखने के तरीके में ‘बड़ी जादूगरी’ देखी, जो ‘एक तरफ रोशनी फेंकते हैं और दूसरी तरफ अंधकार’ ज्ञानरंजन ने सीधा सवाल किया-

“चिली में जनता को आयोजित रूप से तकलीफ पहुंचाने वाली ताकतें कौन थीं? मार्क्सवादी राष्ट्रपति आयेंदे अथवा खदान मालिक और ट्रक मालिक.”

भारत के अखबारों को उन्होंने धोखा देने वाला बताया “कि सैनिक प्रति क्रांति, जनक्रान्ति और आयेंदे के मार्क्सवाद की तुलना में जनता के प्रति ज्यादा सहानुभूति पूर्ण है. ज्ञानरंजन धनशक्ति के साथ नहीं, जनश‌क्ति के साथ रहे हैं. उन्होंने रेजिस डेब्रे (2सितम्बर 1940) को उद्धरित किया है कि  “सिर्फ तीन प्रतिशत कम्पनियों ने देश के समस्त औद्योगिक साधनों को कब्जे में कर रखा है.” ‘चिली’ पर लिखे गये लगभग चार पृष्ठों के सम्पादकीय की अंतिम पंक्ति है–

“भारत वर्ष की हालत, उसकी जरूरतें और लड़ाई अत्यधिक व्यापक रूप में ‘चिली’ जैसी ही हैं. ‘चिली’ का सबक दुनिया में संघर्ष को अधिक सही और तेज करेगा.”

 

 चार)

ज्ञानरंजन ने कभी ‘पहल’ को ‘पत्रिका’ नहीं कहा है. वह या तो ‘किताब’ रही या ‘पुस्तक’. पहल 3 और 4 में उसे ‘क्रान्तिकारी रचना और विचार की किताब’ कहा गया, 5वें से‌ 8वें अंक तक इसे ‘इस महादेश की चेतना के वैज्ञानिक विकास के लिए प्रस्तुत प्रतिक्रिया और प्रतिक्रान्ति का सामना करने वाली क्रान्तिकारी रचनाओं की अनिवार्य पुस्तक’ कहा गया और बाद में यह “इस महादेश के वैज्ञानिक विकास के लिये प्रस्तुत प्रगतिशील रचनाओं की अनिवार्य पुस्तक” हो गयी. उनकी चिंता में ‘महादेश की चेतना का वैज्ञानिक विकास’ था और थी प्रगतिशीलता. ‘चेतना के वैज्ञानिक विकास’ पर ज्ञानरंजन का सदैव बल रहा है. प्रगतिशील रचनाओं के लिए ‘पहल’ के दरवाजे खुले रहे हैं. उसकी ‘मुठभेड़’ ‘प्रगति विरोधी’, ‘सांप्रदायिक और तानाशाह शक्तियों और घरानों से’ होती रही है. साम्प्रदायिक शक्तियों ने हरिशंकर परसाई के घर पर जाकर उन पर शारीरिक हमला किया था. एक दक्षिणपंथी, साम्प्रदायिक संगठन से जुड़े युवकों के द्वारा 21 जून 1973 को परसाई के निवास पर जाकर किए गए हमले की देशभर में निंदा और भर्त्सना की गयी थी.

ज्ञानरंजन ने पहल 1 के सम्पादकीय में इस हमले को ‘फासिस्ट’ कहा. उनकी चिंता में केवल परसाई नहीं, पाब्लो नेरुदा भी थे. उन्होंने उन बुद्धिजीवियों-पत्रकारों की आलोचना की, जिन्होंने “मौत के वक्त पाब्लो नेरुदा के साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार और हरिशंकर परसाई पर होने वाले फासिस्ट हमले को… अपनी चिंता का विषय नहीं समझा.” ‘पहल’ आरंभ से ही प्रगतिशील शक्तियों का एक मंच रहा है. ‘पहल’ के पहले अंक में यशपाल, श्रीकांत वर्मा, राधाकृष्ण, शिव प्रसाद सिंह आदि के पत्र परसाई घटना को लेकर प्रकाशित हुए हैं.

‘पहल’ का पाठक मैं आरंभ से रहा. वहाँ छपा बहुत बाद में. अपनी इच्छा से मैंने कहीं कभी कोई रचना-आलोचना नहीं भेजी. एक गहरी उदासी और अकर्मण्यता के साथ चंचलता में डूबा रहा. 1990 के दशक में अशोक वाजपेयी ने राष्ट्रीय संस्कृति को लेकर विचारार्थ एक ड्राफ्ट तैयार किया था. जिसे उन्होंने देश में 100 लोगों के पास भेजा था. ज्ञानरंजन से 1980 के दशक से मेरा पत्राचार आरंभ हुआ था. मैं भागलपुर में था और सांस्कृतिक रूप से बेहद सक्रिय. ‘पहल’ की पाँच-दस प्रतियां वितरित करने के लिए मंगाता था.

हिन्दी के प्रोफेसर उस समय भी महान थे. उन्हें ‘पहल’ से मतलब नहीं था. वे समय प्रवाह में थे, या तो सत्ता मुखी थे या तटस्थ. मैं पागलों की तरह, वामपंथी, मार्क्सवादी पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों को जमालपुर से मंगा कर कालेज-कैम्पस की सड़‌कों पर विक्रय हेतु फैला देता था. वहाँ विक्रेता होते थे. ‘पहल’ कुछ लोगों के बीच तब अनिवार्य पत्रिका हो चुकी थी. वे कुछ लोग उसके नये अंक की प्रतीक्षा करते थे. ‘राष्ट्रीय सांस्कृतिक नीति’ वाला मसौदा मुझे ठीक नहीं लगा. यह ज्ञानरंजन ने मुझे पढ़ने के लिए भेजा था.  उस मसौदे पर एक लेख लिखकर ज्ञानरंजन को भेज दिया- ‘राष्ट्रीय संस्कृति नीति की असलियत.’  वह ‘पहल’46  (जनवरी-मार्च 1996) में प्रकाशित मेरा पहला लेख है. संस्कृति के क्षेत्र में मैं 1978-79 से सक्रिय था. महेश्वर ने मुझे ‘नव जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा’ से जोड़ लिया था. भागलपुर के सभी प्रगतिशील संस्कृति कर्मी, जिसमें मेरे कुछ प्रिय छात्र भी थे, आ जुड़े थे. हम सड़कों पर उतरते थे, बैनर और प्लेकार्ड लेकर चलते थे. गीत गाते हुए. सैकड़ों का जुलूस होता था. तब सक्रिय सभी छात्र-मित्र दिवंगत हो गए.

 

 पाँच)

‘पहल’ और ‘पहल पुस्तिका’ में, मेरे कुल दस लेख प्रकाशित हुए. ज्ञानरंजन को सबसे बड़ा श्रेय है कि उन्होंने मुझ जैसे आलसी का आलस्य तोड़ा. ‘पहल’ से मेरा आत्मीय रिश्ता रहा है. बार-बार उनके कोंचने कहने पर ही मैंने ‘पहल’ में लेख लिखे. नामवर सिंह की कथा लोचन पर दो लेख लिखे- ‘कथालोचक नामवर सिंह’ (‘पहल’  97) और ‘यह जो अर्ध स्वर्ण तन है’ (पहल 98 ), मलयज पर  ‘मलयज का महत्त्व’ (पहल 105), देवी शंकर अवस्थी पर ‘कथालोचना का नया विवेक’ (पहल 117) और विजय मोहन सिंह पर दो लेख ‘आलोचना समानांतर रचना है’ (पहल 121)  और ‘न कलावादी न मार्क्सवादी’ (पहल 123) ये सब लंबे लेख हैं. ज्ञानरंजन ने एक दो बार कहा भी कि ‘मैं आकाश के सारे तारे देखना-दिखाना चाहता हूँ.’

हाथ से लिखे गए लेख घने अक्षरों में होते थे. कई बार मेरे कहने पर भी उन्होंने न कभी कुछ काटा न संशोधित किया. अगर ज्ञानरंजन का आत्मीय दबाव न होता, तो शायद मैं ‘पहल’ में कुछ भी नहीं लिख पाता, जबकि ‘पहल’ में छप जाना उस समय बड़ी बात थी. उदासी और अकर्मण्यता से मुझे निकालने का सबसे बड़ा श्रेय ज्ञानरंजन को है. उनकी शिकायत थी कि मैं अधिक यात्राएं करता हूँ, सेमिनारों में केवल बोलता हूँ और लिखता नहीं हूँ.

‘पहल’ की तुलना किसी अन्य पत्रिका से नहीं की जा सकती है. ज्ञानरंजन के समान हिंदी का कोई सम्पादक नहीं रहा. उनके ‘यार’ कालिया ‘वागर्थ और नया ज्ञानोदय के सम्पादक बने, पर वह प्रतिष्ठान की पत्रिका थी. मोहन राकेश और कमलेश्वर ‘सारिका’ के संपादक थे और भारती ‘धर्मयुग’ के.

ये सभी पत्रिकाएँ संस्थानों की थीं.’पहल’ के प्रकाशन के पीछे कोई संस्था नहीं थी. जो लघु पत्रिकाएं अपने खर्चे से निकल गईं थीं, उनमें विषय की ऐसी व्यापकता नहीं थी.  ‘पहल’ एक साथ साहित्यिक और वैचारिक पत्रिका रही है. 36 वर्ष में 90 अंक निकलने के बाद जब इसके बंद होने की सूचना मुझे मिली, जोर का धक्का लगा. चार वर्ष बाद पहल का पुनः प्रकाशन आरंभ हुआ. प्रसन्न होना स्वाभाविक था. ‘पहल’ के कुल 125 अंक निकल चुके हैं. कर्मेंदु शिशिर घोर परिश्रमी, गंभीर शोधार्थी,  अध्येता, विचारवान, प्रगतिशील लेखक-संपादक हैं. उन्होंने ‘पहल’ की अनुक्रमणिका तैयार कर एक और बड़ा कार्य किया है. उस समय की रचनाशीलता और विचारशीलता को समझने के लिए ‘पहल’ के संग-साथ होना पड़ेगा. ‘पहल’ से बाद में मनोहर बिल्लौरे जुड़े. कुछ अंकों तक ‘पहल’ का अपना संपादक मंडल भी था जिसमें आग्नेय सहित और कई थे. पुनः प्रकाशन के बाद राजकुमार केसवानी (26 नवम्बर 1950-21 मई 2021)  ज्ञानरंजन के साथ ‘पहल’ के सम्पादक बने. उन्होंने ‘पहल’ को ‘एक वैचारिक महायज्ञ’ कहा है.

कर्मेंदु शिशिर ने ‘टयूबिंगन विश्वविद्यालय, जर्मनी के प्रोजेक्ट संकुल के साथ-साथ कर्मेंदु शिशिर शोधागार के लिए बनी योजना के तहत जो ‘पहल अनुक्रमणिका’ तैयार की, उस ‘पुस्तिका का ऑन लाइन संस्करण शोधागार के होम पेज पर अकाद‌मिक जगत के लिए और सभी अध्येताओं के लिए उपलब्ध है.’ (देखें: http//www.kss. uni-tuabingen. de) (8)

दो वर्ष पहले 2023 में कर्मेंदु शिशिर की पुस्तक-‘पहल और ज्ञानरंजन’, आई (अनन्य प्रकाशन, दिल्ली) “इस किताब (अनुक्रमणिका) में ‘पहल’ के 48 सालों (1973 में 2021) के संघर्ष पूर्ण सफर में प्रकाशित 125 अंकों के लगभग 30000 पृष्ठों की सामग्री का बीज रूप मौजूद है.” 9

‘पहल’ में प्रकाशित सामग्री की अनुक्रमणिका बनाने के पहले भी कर्मेंदु शिशिर ‘पहल’ में प्रकाशित चुनिंदा कविताओं का एक संकलन ‘समय की आवाज’ (आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा) और प्रतिनिधि लेखों की किताब ‘समय का सच’ (शिल्पायन प्रकाशन, दिल्ली) तैयार किया था.उनके और ज्ञानरंजन के बीच की ‘खतोकिताबत’ वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित होने वाली है.

 

छह)

ज्ञानरंजन और ‘पहल’ उसी तरह एक दूसरे के पर्याय हैं, जैसे महावीरप्रसाद द्विवेदी और ‘सरस्वती’. उनका ‘जोश, जज्बा और आवेग’ कभी नहीं रुका.भारतीय मार्क्सवाद के विविध रूप रंग हैं. प्रलेस, जलेस, जसम से जुड़े अनेक कवि लेखक ‘पहल’ में छपते रहे हैं. ज्ञानरंजन में कभी कट्टरता नहीं रही. वे प्रगतिशील लेखक संघ के रहे हैं, पर उन्होंने ‘पहल’ को संगठन की पत्रिका नहीं बनने दिया. ‘पहल’ के प्रकाशन (1973) के आठ वर्ष बाद 1981 में, भोपाल में, मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ की कार्यकारिणी की बैठक में ‘पहल’ को प्रगतिशील लेखक संघ के प्रान्तीय संगठन की मुख पत्रिका बनाने का निर्णय ‘विचारार्थ आकस्मिक रूप से सामने आया’ था. कार्यसूची में यह विषय नहीं था.

ज्ञानरंजन ने 7 नवम्बर 1981 को मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष हरिशंकर परसाई को पत्र लिखा-

“पहल को संगठन की मुख्य पत्रिका बनाने में कारगर रूप की कई दिक्कतें हैं. चूंकि मैं उसका सम्पादक से ज्यादा प्रकाशक भी हूँ, इसलिए मेरे ऊपर उसकी कई अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ भी आती हैं…. 6-7 वर्षों में हम जितनी कठिनाइयों को उठाते हुए ‘पहल’ की कुछ पहचान बना सके हैं, उसके पीछे हमारी व्यापक साहित्यिक नीति रही है. आज हर वामपंथी प्रतिभा ‘पहल’ में छपने की आकांक्षा रखती है… शत्रु भी सराहना करते हैं. अभी हमें ‘पहल’ को सर्वोत्तम ऊंचाइयों तक ले जाने में काफी काम करना है.  उत्तरशती और उत्तर गाथा जैसी पत्रिकाएं संगठन से जुड़‌कर बदतर हो गई, क्योंकि हमारी परिस्थितियाँ माकूल नहीं हैं… संगठन में लोग आते-जाते रहेंगे,

पदाधिकारी बदलते रहेंगे और यह जरूरी नहीं कि आज जैसी संगत हालत कल भी बरकरार रहे. उस स्थिति में ‘पहल’ को भी हिलना-डुलना पड़ेगा, नाज-नखरे उठाने होंगे. मेरा कोई संबंध ‘पहल’ से बाहर या निरपेक्ष नहीं है… मैं यह नहीं पसंद करूँगा कि ‘म. प्र. प्रगतिशील लेखक संघ की मुख-पत्रिका’ यह वाक्य औपचारिकता के तौर पर जाये. यह एक ठंडा और एक तरफा काम होगा. 10

यह लम्बा उद्धरण देना इसलिए जरूरी लगा कि हम जानें कि ‘पहल’ लेखक-संगठन की पत्रिका क्यों नहीं बनी. आज भी हिन्दी में ‘तद्भव’, ‘पक्षधर’ और ‘साखी’ जैसी पत्रिकाएं किसी लेखक-संगठन की नहीं हैं. ज्ञानरंजन ‘बलिदान के इस पौधे को हवा में छोड़ने’ के पक्ष में नहीं थे. 1981 के पहले ‘पहल’ के कुल 12 अंक प्रकाशित हुए थे, जिसमें ‘पहल’ 10-11 (नवम्बर 1977) ‘मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र’ पर केंद्रित था और 13वां अंक (1979) कवितांक1 था- ‘इस नवान्न में’ ज्ञानरंजन ने अपने पत्र में परसाई से ‘निजी राय’ मांगी थी और अपने पत्र को ‘संगठन के विचारार्थ’ भी रखा था.

 

सात)

ज्ञानरंजन पर मुख्यतः दो-तीन आरोप लगाये जाते रहे हैं. ‘पहल’ की अपने समय में इतनी धूम थी कि आज के युवा लेखक उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते. हिन्दी में ईर्ष्यालुओं की तब भी कमी नहीं थी, आज भी कमी नहीं है. जलनेवाले तब भी थे, आज भी हैं. ‘पहल‌’ ने न तो अपनी तेजस्विता कम की और न विचारधारा. गति और चाल में थोड़ा-बहुत अंतर देखा जा सकता है, पर वहाँ कभी कोई लड़खड़ाहट नहीं दिखाई देती. झूठा आरोप यह मढ़ा गया कि ज्ञानरंजन आपातकाल के समर्थक थे. कुछ महानुभावों ने उन पर जातिवाद (कायस्थवाद) का भी आरोप मढ़ा. प्रश्न पहल में छपने का भी था. कई लोग कम छपे और कई लोग नहीं छपे. बेहतर है, इस संबंध में ज्ञानरंजन की राय जानना –

“अगर मैं कायस्थवाद करता तो पहला झगड़ा मेरे जीवन में धर्मवीर भारती से हुआ. दूसरा विरोध कमलेश्वर से और अब रमाकांत जी के क्रियाकलापों से है. हमारे बाबा के जमाने से किसी ने जाति नहीं लिखी. मेरे पिता को लोग पंडित समझते थे और उनके नाम के आगे सम्मान से पं. लगाते थे. मेरे परिवार में अभी तक हाल ही हाल २० सालों के दरमियान 5 विवाह भाई-बहनों के हुए. इनमें चार अन्तरजातीय हुए और दहेज- एक में भी नहीं लिया गया या दिया गया.” 11

ज्ञानरंजन ने हरिशंकर परसाई, रमेशचन्द्र शाह, शम्भुनाथ, भगवत रावत, फुसकेले जी और विजय कुमार को जो पत्र लिखे हैं, वे ‘कुछ हमारी : कुछ तुम्हारी’ पुस्तक में प्रकाशित हैं. जिन्हें पढ़ने से ‘पहल’ के अतिरिक्त ज्ञानरंजन के व्यक्तित्व, विचार आदि का भी पता चलेगा. ‘पहल’ को प्रगतिशील लेखक संघ का मुखपत्र बनाने की कम कोशिश नहीं की गयी, पर वे अड़े रहे. फुसकेले जी को 31 जुलाई 1991 के पत्र में उन्होंने लिखा-

“आप यह चाहते हैं कि मैं उस संगठन के साथ ‘पहल’ को जोडूं, जिसकी ‘जुगलबन्दी’ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साथ चलती है. यह नामुमकिन है… मैं टी ए, डी ए, कमेटीवाल, जनसंपर्कीय कैरियरवाद और पैसा कमाने की घनघोर संस्कृति के खिलाफ हूँ.” 12

ज्ञानरंजन पर ‘उत्सवधर्मी’ होने का भी आरोप लगा. ‘पहल’ के प्रकाशन के बाद कहानीकार ज्ञानरंजन की चर्चा कम होती गयी और ‘पहल’ की चर्चा बढ़ती गयी. साहित्य और संस्कृति का केन्द्र जबल‌पुर कभी नहीं रहा. दिल्ली के केन्द्र होने के बाद भी चर्चा और बहस के केन्द्र में ‘पहल’ का बार आना कम बड़ी बात नहीं है. इसके पीछे ज्ञानरंजन का व्यक्तित्व, उनकी कार्यशैली, उनकी योजनाएं, उनका व्यापक मित्र संसार सब था. ‘पहल’ ने अपने समय में एक बड़ी भूमिका अदा की. उसने अनुवाद को महत्त्व दिया. ‘पहल’ में प्रकाशित लेखों का आज भी महत्व है. ये लेख केवल साहित्यिक नहीं हैं. साहित्य के बाहर की फैली हुई दुनिया ‘पहल’ में देखी जा सकती है. वहाँ विचार का महत्त्व है. ‘पहल’ के दूसरे अंक में व्यवस्था , वामपंथ और विचार से जुड़े लेख हैं.

‘पहल 6’ का प्रकाशन-समय आपातकाल का समय था (जनवरी 1976). यह अंक आज फिर से देखा जाना चाहिए. आज भी हम फ़ासिज़्म पर सोचते, बोलते, लिखते और उसके खिलाफ सक्रिय होते, जिन कुछ लोगों को पढ़‌ना-समझना चाहते हैं, उनमें एक बल्गेरियाई कम्युनिस्ट नेता जॉर्जी दिमोत्रिव (18 जून 1882-25 जुलाई 1943) भी हैं. उनके लेख ‘फ़ासिज़्म का वर्ग-चरित्र’ का अनुवाद बद्रीनाथ तिवारी ने किया था.

पहल-6 में हिन्दी का केवल एक लेखक श्याम कश्यप हैं. मोहित सेन बंगला के हैं. श्रीनिवास सरदेसाई मराठी हैं, दिमित्रोव बल्गेरियाई हैं, पाब्लो पिकासो स्पैनिश कलाकार हैं, आंद्रेजीद फ्रांसीसी लेखक हैं, बर्टेण्ड रसेल ब्रिटिश दार्शनिक हैं और इल्या एहरेन वर्ग सोवियत लेखक और पत्रकार हैं. यह नाम-सूची केवल यह बताने के लिए है कि पहल ने अपने समय में आरंभ से ही कैसा और कितना बड़ा काम किया है. उसने हमारी आँखें खोलीं और साहित्य के बाहर की एक नयी दुनिया से हमारा परिचय कराया. ‘पहल’ के शामियाने के नीचे कौन कवि लेखक कहाँ से कब -कब आया, यह भी देखा जाना चाहिए. घृणा जितनी आज फैली हुई है, आपातकाल के समय में भी नहीं थी.

 

 आठ)

‘पहल’ का ध्यान सदैव अपने समय पर रहा है. ज्ञान के लगभग सभी क्षेत्रों के लोग वहाँ उपस्थित रहे. कलाकार, फिल्मकार, चिंतक, विचारक, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, भाषाविद्, इतिहासकार सब. वहाँ हम बरबर राव, एजाज़ अहमद आदि के साथ रेमंड विलियम्स, जूलिया क्रिस्तोवा सबको देखते हैं. ‘पहल’ के लेखकों में जितेन्द्र भाटिया का अपना अलग महत्व है, जिन्होंने बाद के कई अंकों में धारावाहिक रूप से ‘इक्कीसवीं सदी की लड़ाइ‌याँ’ बताईं. समय और संस्कृति, सांस्कृतिक संकट, राष्ट्रीय संस्कृति नीति, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद, समाज और संस्कृति, अपसंस्कृति और साहित्य, विस्थापन और संस्कृति, समकालीन संस्कृतियां ,संस्कृति और राष्ट्र‌वाद जैसे निबंध यह बताते हैं कि सम्पाद‌क की चिंता में केवल साहित्य नहीं था, संस्कृति थी, विचार था. प्रतिगामी संस्कृति और शक्तियों से ‘पहल’ ने मुठभेड़ की है.

पहल के लगभग 60 अंकों में भाषा, धर्म, संस्कृति, विचार, नवजागरण आदि से जुड़े महत्त्वपूर्ण लेखों को हम आज भी पढ़ सकते हैं. ज्ञानरंजन की आँख सर्वत्र घूमती रही है. सम्पादक के रूप में उनकी देन या मूल्यांकन पर विचार अभी शेष है.

‘पहल’ अगर प्रगतिशील लेखक संघ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दबाव के तहत निकलती तो उसकी ऐसी भूमिका नहीं होती. ज्ञानरंजन ने सभी बाउंड्री तोड़ी, कई ‘मठ’ और ‘गढ़’ भी तोड़े.  उन्होंने निजी लाभ के लिए कुछ भी किया. वे कभी अवसरवादी, व्यक्तिवादी ,जातिवादी, संबंधवादी, चालाक और केवल किताबी मार्क्सवादी नहीं रहे. उनका विश्वास जोड़ने में रहा है. ‘पहल’ के सम्पादन के पहले वे खुद चमकते कहानीकार थे, कहानीकार के रूप में ‘पहल’ को उन्होंने ऊँचाई दी और ‘पहल’ ने भी उनकी शान बढ़ाई. उनकी निष्ठा और वैचारिकता ‘पहल’ के लगभग प्रत्येक अंक में दिखाई देती है. वामपंथी दल आज तक कभी एक नहीं हुए. लेखक संघ और सांस्कृतिक संगठन अब भी अलग-थलग हैं, पर उन्होंने प्रगतिशील, जनवादी, क्रान्तिकारी, सभी मार्क्सवादियों को एक जगह ला खड़ा किया. क्या उन्होंने प्रगतिशील लेखकों, रचनाकारों को यह संदेश नहीं दिया कि आओ, एक हो? रचना और रचनाकारों के जरिये ‘पहल’ ने एक अर्थ में वामपंथी एकता को महत्व दिया है. ‘पहल’ हिन्दी की लघु पत्रिकाओं में एक ‘पावर हाउस’ की तरह है.

‘पहल’ में अपना श्रेष्ठ देने के लिए ज्ञानरंजन ने देश भर में चुन-चुनकर लगभग सबसे सम्पर्क किया. दूसरे अंक के सम्पादकीय में उन्होंने लिखा- “पहल का प्रकाशन मुख्य रूप से लेखकों, बुद्धि‌जीवियों के लिए नहीं, बल्कि पाठकों की उस बड़ी संख्या के लिए हुआ है, जो एक खास तरह की तैयारी के लिये तैयार होने को हैं.” उन्होंने इसी सम्पादकीय में ‘स्पष्ट’ घोषित किया  “कि हमारा उद्दे‌श्य क्रान्तिकारी चेतना की व्यापक शिक्षा का है क्योंकि हमसे ज्यादा हमारे पाठकों की भूख को कोई नहीं जानता.” 

‘क्रान्तिकारी चेतना’ को निर्मित और विकसित करने के लिए जो पार्टी बनी थी, वह बुरी तरह बिखर चुकी थी. उस समय ‘क्रान्तिकारी चेतना की व्यापक शिक्षा’ की चिंता कर उस दिशा में कार्य करना बड़ी बात थी. यह एक बड़ा सांस्कृतिक कार्य था. ‘पहल’ जबलपुर से प्रकाशित होती रही. स्वाभाविक था ज्ञानरंजन की चिंता में पहले मध्य प्रदेश होता. “मध्य प्रदेश में व्यापक तौर पर हमारे पाठक गाँव के मास्टर, राजनैतिक कार्यकर्ता, प्राध्यापक, छात्र, पत्रकार, युवा लोखक और सरकारी मुलाजिम के रूप में फैले हुए हैं” (‘पहल’ के दूसरे अंक का सम्पाद‌कीय) श्रेष्ठ सामग्री का तब भी अकाल था, आज अधिक है. हिन्दी में पत्रिकाओं की कमी नहीं है, पर उसमें प्रकाशित सामग्री देखें. बहुत कम सम्पाद‌कों के पास चयन-दृष्टि, विवेक-दृष्टि और विचार-दृष्टि है.

आज जैसा दृश्य पहले कभी नहीं था. ‘पहल’ के दूसरे अंक के सम्पादकीय में ‘छापामार युद्ध’ के प्रसंग में कहे गये लेनिन के कथन को उद्धृत किया गया है, ज्ञानरंजन ने ‘सशस्त्र संघर्ष’ के सवाल पर, उसके स्वरूपों पर ‘सबसे स्पष्ट दृष्टिकोण लेनिन का’ मान कर यह लिखा-

“मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन ने इस दक्षिणपंथी अवसरवादी भ्रम को कि संक्रमण लाजिमी तौर पर शांतिपूर्ण ही होगा और उस वामपंथी अवसरवाद को, जो सशस्त्र संघर्ष को हर जगह समाजवाद का रास्ता खोजता है घोषित करता है, दोनों को नामंजूर कर दिया है.”

ज्ञानरंजन की राजनीतिक समझ साथ थी. उन्होंने कास्त्रो को भी उद्धृत किया. उनके यहाँ असहमति के लिए जगह थी. कृष्ण कुमार के लेख ‘विचार और पन्थ’ से वे असहमत थे, पर उन्होंने इस लेख को सुरेंद्र चौधरी के लेख के साथ छापा. सब जानते हैं कि सुरेंद्र चौधरी मार्क्सवादी थे, पर कृष्ण कुमार? वे कभी मार्क्सवादी नहीं रहे.

‘पहल’ का तीसरा अंक “अकाल, भुखमरी, सत्ता की बढ़ती हुई तानाशाही, प्रतिक्रियावाद के अभूतपूर्व उत्थान और पतनशील पूंजीवादी प्रवृत्तियों के विकास के बीच निकला था. ‘पहल’ में केवल कविता-कहानी नहीं छपी-अपने समय और समाज के ज्वलंत प्रश्नों को उसने सामने रखा. उसकी एक हस्तक्षेपकारी भूमिका है, जो आरंभ में जितनी थी, बाद में उतनी नहीं रहीं. उसने 1974 में जयप्रकाश नारायण से सवाल किए. कैसे गाँधी के हत्यारे आज बड़‌ी आसानी से जयप्रकाश जी के साथ कंधे से कंधा मिला रहे हैं? ये लोग उस निहायत छोटे वर्ग से क्रांति करवाने में लगे हैं, जिनमें बहुसंख्यक का श्रम और उत्पादन से कोई संबंध नहीं है.” (पहल 3 का सम्पादकीय)

यह समझ क्या गलत थी? जयप्रकाश नारायण के शिष्य आज किसके साथ है, क्या यह लिखने की ज‌रूरत है? क्या 1977 के बाद ही दक्षिणपंथी ताकतवर नहीं हुए? समाजवादी कहाँ गये? ‘पहल’ हिन्दी की अकेली पत्रिका है, जिसने 1974 में अर्थशास्त्र की, पूंजीवादी देशों की अर्थ-व्यवस्था की, विश्व बैंक और मुद्रा संस्थान की बात की. ज्ञानरंजन के लिए उस समय दुर्भाग्य और गहरी चिंता का विषय यह था कि  “हमारे मुल्क में नर्क जैसी स्थितियों में भी मस्त मुस्कराने वाले, ऐसे निर्लज्ज मौजूद हैं, जिन्हें ब्रेख्त के शब्दों में अभी भी भयावह समाचार सुनाई नहीं पड़ रहे हैं.” पिछले पचासवर्ष में ‘भयावह समाचार’ घटे हैं या बढ़े हैं? और निर्लज्ज भी कम हुए हैं या अधिक?

साहित्य की दुनिया में शामिल सभी तरह के लोगों को ज्ञानरंजन ने पहचान कर कभी चुप्पी नहीं साधी, नाम ले-लेकर उनकी आलोचना की. साहित्य को देखने का उनका नजरिया प्रगतिशील और मार्क्सवादी रहा है. वे कहीं से भी छद्म और वाचाल मार्क्सवादी नहीं रहे. ‘साहित्य की जमात में शामिल’ लोगों से उन्होंने चुन-चुनकर लोगों को अलग और इकट्ठा किया, लिखा, उन्हें ‘ढूंढकर’  अलग करना होगा, जो अमृतलाल  नागर के शब्दों में वामपंथी हथियारों से दक्षिण पंथियों की लड़ाई लड़ रहे हैं.” (पहल 3 का सम्पादकीय) अजमेर से निकलने वाली पत्रिका ‘अस्ति’ और ‘नया प्रतीक’ का विरोध किया और ‘पुरुष’, ‘कथा’, ‘वाम’, ‘क्यों’, ‘परिबोध’ की प्रशंसा की. ‘दिनमान’ ने ही नहीं, ‘धर्मयुग’ ने भी उनपर आक्रमण किया.

 

 नौ)

आपातकाल में धर्मवीर भारती ने “‘पहल’ के खिलाफ लगातार चार लेख छापकर उसकी आपात कालीन गैर राष्ट्रीय भूमिका का विमोचन किया था”13  धर्मवीर भारती के साथ तब राजेन्द्र अवस्थी भी थे. कादम्बिनी में ‘समय के हस्ताक्षर’ और ‘बिंदु-बिंदु विचार’ के साथ सम्पादकीयों में राजेंद्र अवस्थी ने ‘पहल’ के प्रकाशन को रोकने और ज्ञानरंजन को गिरफ्तार करने की माँग की थी. भूतपूर्व सांसद रत्नाकर पाण्डेय और राज्यसभा की सदस्या रत्नकुमारी देवी के सुर समान थे. ‘पहल’ और ज्ञानरंजन के खिलाफ गृहमंत्रालय को और वे जिस कॉलेज में प्रोफेसर थे, उसके मैनेजमेंट को लिखा गया. 14

ज्ञानरंजन ने आपातकाल का समर्थन करने के आरोप को ‘हवा से और कुछ कीट पतंगों’ से लेना बताया है-“जिस तरह वायरस मानव-शरीर में आकर जीवित हो उठता है, उसी तरह यह एक मरियल चरित्र हत्या में समर्थ एक छद्म आरोप है. ‘पहल’ एकमात्र हिन्दी की वह साहित्यिक पत्रिका है, जिसके ऊपर आपात काल में निरन्तर और लगभग मारक आक्रमण हुए.” 15

‘पहल’ और ज्ञानरंजन का संसार बड़ा रहा है. इस चरित्र हनन के विरोध में हस्ताक्षर अभियान हुआ, जिसमें “यशपाल, शिवमंगल सिंह सुमन, त्रिलोचन, नागार्जुन समेत 300 लोगों ने हस्ताक्षर किए थे.” अखबारों और पत्रिकाओं ने भी, जिनमें ‘नई दुनिया’ (इंदौर), ‘देशबंधु’ (रायपुर) और ‘सारिका’ भी थी, सबने विरोध किया. ‘पहल’ पत्रिका निकलती रही, ज्ञानरंजन डटे रहे. इस कुत्सित प्रचार के कारण ही उन्हें दी गयी मुक्तिबोध फेलोशिप बदल कर विनोद कुमार शुक्ल को दी गयी. उन्होंने मध्य प्रदेश शासन द्वारा दिया जानेवाला साहित्य-पुरस्कार ठुकरा दिया.

ज्ञानरंजन का आक्रामक स्वर कभी समाप्त नहीं हुआ. उसकी कठोरता और तीखेपन में थोड़ी कमी अवश्य आई. अस्सी के दशक में एक साथ कई घटनाएँ घट रही थीं. आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव की सरकार थी और मध्य प्रदेश में अर्जुन सिंह की. क्षेत्रीय दल हों या राष्ट्रीय दल, कवियों और लेखकों के प्रति उनका रवैया लगभग समान ही रहा है, पर वह मौजूदा सरकार की तरह कभी नहीं रहा है. ‘पहल’ का 31वाँ अंक जनवरी 1987 में प्रकाशित हुआ था. इस अंक का सम्पादकीय है- “सिकंदराबाद जेल में कवि और कलाओं के घर भारत- भवन में साहित्य-संस्कृति”.

आंध्र प्रदेश की सरकार ने वरवर राव के कविता-संग्रह ‘भविष्यातु चित्रपटम’ (1986) पर प्रतिबन्ध लगाया था और उन्हें उनके राजनीतिक विचारों और कर्म के लिए सिकन्दराबाद जेल में डाला था. उनके कविता-संग्रह में राजनीतिक हत्याओं और भोपाल गैस त्रासदी के ऊपर लिखी गयी कविताएँ संकलित थीं, पर भोपाल में गैस त्रासदी (3 दिसम्बर 1984) के बाद अशोक वाजपेयी ने विश्व कविता-पाठ का आयोजन कराया जिसे ‘पहल’ में ‘अश्लील’ कहा गया. ज्ञानरंजन कवि नहीं थे, अशोक वाजपेयी कवि हैं. ज्ञानरंजन ने लिखा- “हम यह कहना चाहेंगे कि आंध्र सरकार के कर्म और भारत-भवन के कर्म में बुनियादी अंतर नहीं है. एक स्थूल तरीके का आविष्कार है, दूसरा कुछ ठंडा और नव्यतम शैली का जनविरोधी नमूना. “ 16

उन्होंने गरीबों और भद्रलोगों के शोक में अंतर किया. एक में छाती पीटी जाती है, दूसरी में ‘काला लिबास होता है और कविताएँ होती हैं, चित्रकला होती है.’ ज्ञानरंजन ने इस प्रश्न का उत्तर चाहा-“आज़ाद देश के इतिहास में अपने विचारों के लिये आज तक कितने कलावादी गिरफ्तार हुये और कितने वामपंथी… लहू के जलाशय में नहाने वाले ही वास्तविक मोक्ष के अधिकारी हैं, वे कला तथा जीवन की विरासत के शीर्षक हैं… सिकन्दराबाद के जेल और भारत-भवन के जेल में अंतर नहीं है… भारत भवन का गठन जनसंस्कृतियों, प्रगतिशील संगठनों और मार्क्सवादी विचार के प्रसार के विरुद्ध शीत-युद्ध के संचालन के लिये किया गया है… यहाँ कविता सुनने की उत्कंठा है, पर कविता को जिंदा रखने की नहीं.”17

यह बेहद तीखा, कठोर और आक्रामक सम्पादकीय है. ऐसा सम्पादकीय फिर ‘पहल’ से लगभग गायब रहा. इसमें सच्चाई है, जो आवेश में व्यक्त की गयी है. ज्ञानरंजन का क्रोध सात्विक है. लग सकता है, वह व्यक्तिगत है, पर उन्होंने कभी व्यक्तिगत हमले नहीं किए. जवाब दिये, अटैक किए. ‘स्टैंड’ लिया. कुछ शब्द प्रयोगों से बचा जा सकता था, पर जो माहौल था और आज उससे जो सौ गुना अधिक है, उसमें भाषा भी बांध तोड़ देती है. ‘पहल’ ने लघु पत्रिका की लड़ाई लड़ी. उस समय व्यावसायिक पत्रिका और लघु पत्रिका के बीच बहस ही नहीं, लड़ाई भी जारी थी. इन दोनों के बीच का फर्क उनके लिए “मिनी स्कर्ट और लॉन्ग स्कर्ट का फर्क नहीं है. यह फर्क खुले रूप से जीवन-दर्शन, राजनीति, व्यवस्था, संघर्ष के तौर-तरीकों और मूल्यों का है.” 18

‘धर्मवीर भारती के लेख पर कादम्बिनी को हमारी प्रतिक्रिया’ में यह स्पष्ट किया गया है कि

“छोटी पत्रिका बनाम बड़ी पत्रिका के बीच होने वाला टकराव सर्वहारा की शक्ति, विचार और जनवादी रचनात्मकता के साथ पूंजीवादी शक्ति, विचार और पतनोन्मुखी रचना के बीच हो रहा है. छोटी पत्रिकाएँ एक आन्दोलन हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में राजनीतिक  क्रान्तिकारी चेतना का कार्यक्रम पूरा करने का प्रयत्न करती है… बड़ी पत्रिकाएँ विलासिता के सामानों जैसी हैं, जो समय काटने की एक खूबसूरत तसल्ली और भटकावों के साथ-साथ इन दिनों अपनी राजनीतिक साजिश की कीमियागिरी भी दिखाने लगी है. वे बौद्धिक भूख के स्थान पर धीमा बौद्धिक जहर हैं.” 19

यह सम्पादकीय (प्रारंभिक) छह पृष्ठों का है. ज्ञानरंजन जैसा स्टैंड लेने वाले कम सम्पादक रहे हैं. भारती और अशोक वाजपेयी से उनके वैचारिक मतभेद थे. उनके लिए विचार सदैव प्रमुख रहा है. ‘पहल’ के अब तक प्रकाशित 125 अंकों के ‘सम्पादकीय’ पर स्वतंत्र रूप से एक लेख लिखने की जरूरत है. पहल के सम्पादकीय राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हो रह हैं.

कर्मेंदु शिशिर ने जिस मिहनत और लगन से ‘पहल’ की जो अनुक्रमणिका तैयार की है, अब उससे बिना गुजरे ‘पहल’ को उसकी समग्रता में नहीं जाना जा सकता. उनकी पुस्तक-‘पहल और ज्ञानरंजन’ ‘पहल’ को समझने के लिए एक अनिवार्य पुस्तक है. इस पुस्तक में ‘पहल’ से संबंधित सबकुछ है-अंक संख्या अवधि, मुखपृष्ठ, रेखांकन, कला दीर्घा, तस्वीर, सम्पादकीय/प्रकाशकीय, कला, शास्त्रीय संगीत, स्मृति- स्मरण, शहरनामा, पत्र, प्रतिक्रिया, प्रतिवाद, प्रस्ताव, अपील, रपट, परचा, बुलेटिन, कविता, कहानी, लेख, नाटक-एकांकी, संस्मरण, व्याख्यान, डायरी, पुस्तक-समीक्षा आदि. पाँचवें खण्ड ‘पहल : सम्पादकीय/प्रकाशकीय’ (पृष्ठ 39-40) के अनुसार ‘पहल’ का सम्पाद‌कीय/प्रकाशकीय कुल 58 अंकों में है.

पहल 91 (मार्च 2015) से सम्पादकीय के स्थान पर ‘कुछ पंक्तियां‌’ आ गयीं. ज्ञानरंजन ने अधिक सम्पादकीय नहीं लिखे हैं- सम्पादक जिन रचनाओं को प्रकाशित करता है, वे रचनाएं हीं पत्रिका में महत्वपूर्ण हैं. ज्ञानरंजन ने किसी भी बड़ी घटना को स्वतंत्र रूप में न देखकर उसे कई घटनाओं से जोड़ा है.

“अब जहाँ भीड़ की भीड़, गाँव के गाँव, घर के घर एक पल में तबाह कर दिये जा रहे हों, वहाँ कुछ संस्कृतिकर्मियों के मौत-मातम को सार्वजनिक मटियामेट हालत से जोड़ना होगा. एक व्यापक  एकता के लिए समय खुला है. इसमें विलाप करने, अपनों पर दोषारोपण करने और एक हद तक भुनाने के तरीके बहुत बुरे हैं. मेहनतकशों की दुनिया में दुःख लम्बा नहीं चलता” (पहल 36, पृष्ठ 4-5)

इस सम्पादकीय में सत्ता-संस्कृति के आतंकवाद को स्पष्ट किया गया है. सफदर की हत्या के बाद ज्ञानरंजन ने सभी नाट्य-मंचों को एक दूसरे से जुड़ने की बात कही थी. एक ही समय में सफदर हाशमी की हत्या हुई थी और गोरख पाण्डेय ने आत्महत्या की थी. ‘इन हत्याओं, आत्महत्याओं के बारे में’, उस समय उन्होंने जो निवेदन किया था, वह तब भी महत्त्वपूर्ण था, आज भी महत्त्वपूर्ण है. उन्होंने लिखा था-

“असमय मृत्यु, हत्याएँ और आत्महत्याएँ इन सब में हमारे शत्रु एक ही हैं. स्वस्थ समाज में पागल होना एक अपवाद है, पर पूँजीवादी समाजों में पागलों की संख्या ज्यादा होती हैं… आत्महत्या इतनी बुरी चीज नहीं कि उससे गोरख पांडेय को छिन्न -भिन्न ही कर दिया जाय. वास्तविकता यह है कि हमारे संगठन इतने सजल और संवेदनशील नहीं हैं, जितना उन्हें होना चाहिए. हमारा भीतरी जल अभी प्लावित नहीं है. एक हदतक हम अपने आदमियों को बचा सकते हैं. कहीं प्यार से, कहीं नीति से. पटना या दिल्ली या लखनऊ या बम्बई में कोई खास फर्क नहीं है.” 20

निर्भीक हिन्दी पत्रकार उमेश डोभाल (17 फरवरी 1952-25 मार्च 1988), कवि पाश (9 सितम्बर 1950-23 मार्च 1988) और सफदर हाशमी (12 अप्रैल 1954-2 जनवरी 1989) की हत्या की गई थी और कवि गोरख पांडेय (1945-29 जनवरी 1989) ने आत्महत्या की थी. ज्ञानरंजन ने सम्पादकीय लिखा-“पाश, उमेश डोभाल,सफदर हाशमी की हत्या और गोरख पांडेय की आत्महत्या.” 21

उन्होंने इनके चले जाने से समाज के ‘आकुल-व्याकुल’ होने की बात लिखी. “हम आज अपने शत्रु को भी बेहतर पहचान रहे हैं और कड़ी सच्चाइयों के लिए बार-बार विचार करने, एक जुट होने की जरूरत महसूस कर रहे हैं. जरूरी है कि हम अपने मित्रों को भी पहचानें, जो इस देश की जनसंख्या में से विशाल पैमाने पर हमारे पास आने को तैयार हैं.” 22

‘पहल’ ने केवल नामवर सिंह पर एक अंक केन्द्रित किया है. यह ‘पहल’ का 34वां अंक है. (मार्च-मई 1988) यह अंक कमला प्रसाद द्वारा सम्पादित है. 13 पृष्ठों का उनका (कमला प्रसाद का) सम्पादकीय है- ‘अर्थ-मीमांसा की परम्परा के आलोचक’ (पृष्ठ 5-17) रामविलास शर्मा पर ‘पहल’ ने कोई अंक केन्द्रित नहीं किया. डॉ शर्मा की जन्मशती के एक वर्ष पहले जब मैं थोड़ा-बहुत सक्रिय और परेशान था, एक फोल्डर में उनकी प्रकाशित सभी पुस्तकों-पुस्तिकाओं की कालक्रम के अनुसार सूची तैयार करने में लगा था, ज्ञानरंजन ने मुझे परेशानी से मुक्त कर ‘पहल’ की ओर से वह फोल्डर जारी किया था. यह नामवर सिंह का जन्मशती वर्ष है और विचारार्थ एक विषय ‘नामवर सिंह और उन पर केन्द्रित पहल का एक अंक’ भी हो सकता है.

शमशेर बहादुर सिंह का ‘सैयद नामवर’, हरिशंकर परसाई का ‘जालिम में थी…’ और काशीनाथ सिंह का ‘गरबीली गरीबी वह’ इसी अंक में प्रकाशित है- ‘पहल’ के सम्पाद‌क 47 अंकों तक ज्ञानरंजन और कमला प्रसाद  रहे हैं. 47वें अंक (नवंबर 1992- अगस्त 1993) के बाद कमला प्रसाद सम्पादक नहीं रहे.

‘पहल’ ने कई संग्रहणीय विशेषांक निकाले. ‘मार्क्सवादी सौंदर्यशास्त्र’ (पहल 10 -11, नवंबर 1977) ‘कवितांक 1, इस नवान्न में’ (पहल 13, 1979), ‘पाकिस्तान में उर्दू कलम’ (पहल 17-18, 1981), ‘चीनी भाषा विशेषांक’ (पहल 32, मई 1987), ‘बंगला विशेषांक’ (पहल 41, अफ्रीकी रचना विशेषांक), ‘नवजागरण और इतिहास-चेतना’ (पहल 43-44 नवम्बर 1991 मार्च 1992) ‘अफजल अहमद पर केन्द्रित (पहल 45, जून-अगस्त 1992), ‘मार्क्सवादी आलोचना विशेषांक’ (पहल 64-65, अप्रैल-जून 2003 और ‘वाल्टर बैंजामिन अंक’ (पहल 69, सितम्बर-नवम्बर 2001).

 

 दस)

‘पहल’ का योगदान बड़ा है, उसका स्थायी महत्व है. ‘पहल’ ने सदैव रचनाओं और रचनाकारों को महत्व दिया. ‘पहल-100’ के सम्पादकीय ‘कुछ पंक्तियाँ’ में ज्ञानरंजन ने लिखा-“हम सम्पादकीय प्रायः नहीं लिखते थे. उसकी जरूरत नहीं थी, क्योंकि प्रायः सम्पादकीयों का एक स्वतंत्र महत्व बन जाता है, उसका पत्रिका को निकालने के विचार और लक्ष्य से कोई तालमेल नहीं होता है… ‘पहल’ आत्ममुग्धता के खिलाफ एक शैली बनाने का प्रयास करती रही है… पहल, सम्पादक, रचनाकार, पाठक और उसके कार्यकताओं का एक समूह है टूटी-फूटी एक कड़ी सदा मौजूद रहती है, और इस समू‌ह को स्थानीयता से लेकर विश्व समाजों तक का स्पर्श कराने की धुन हमने कभी नहीं छोड़ी, हमने सांस्कृतिक और वास्तविक भूमंडल की कल्पना की थी, जिसकी वजह से हम दुनिया की उत्कृष्ट रचनाशीलता से जुड़ सके.” 23

राजेन्द्र यादव का ‘हंस’ उनके सम्पादकीय ‘मेरी तेरी उसकी बात’ के कारण अधिक जाना जाता था. ‘पहल’ सम्पादकीय के कारण नहीं, रचनाओं के कारण जाना जाता रहा. राजेन्द्र यादव व्यक्तिवाद से मुक्त नहीं रहे. ज्ञानरंजन ने इसे अपने पास फटकने तक नहीं दिया. सब जानते हैं, पहल के आयोजनों और समारोहों में वे मंच के पीछे रहे. राजेन्द्र ‌यादव और ज्ञानरंजन की तुलना नहीं की जा सकती और पहल की तुलना ‘हंस’ से करना बेकार है, एक प्रकार की शरारत है. राजेन्द्र यादव के ‘हंस’ में ‘नीर-क्षीर विवेक’ कम था. ज्ञानरंजन के यहाँ यह था. राजेन्द्र यादव को मार्क्सवादी कहना मार्क्सवाद की हँसी उड़ाना है. ‘पहल’ को ज्ञानरंजन ने ‘मीटरगेज की रेलगाड़ी की तरह’ कहा है. उन्होंने 100वें अंक (जून-जुलाई 2015) के सम्पादकीय में लिखा-

“हम मुठभेड़ के बावजूद डर डर के चले हैं. सहारे के लिए किसी प्रकार के सामाजिक-राजनैतिक आन्दोलन नहीं हैं. फुटकर जनता जगह-जगह मुठभेड़ कर रही है. आवाजें उठती हैं. अन्यथा पाठ्‌यक्रमों, शिक्षा क्षेत्रों, सिनेमा घरों, पुस्तकों, लेखकों, रंगमंच, और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं पर हमले हो रहे हैं. डर के इसलिए चलते हैं कि हमारी छुक छुक को राजधानियाँ, शताब्दि‌याँ ठोक न दें. और अब तो डर बढ़ ‌गया है क्योंकि सामने से बुलेट ट्रेन की छाया आ रही है, जिसकी रफ्तार में ही कुचलने का अरमान है. फासिस्ट सबसे तेज़ और एकबारगी विकास करते हैं. फिर बुलेट ट्रेन का चालक ‘हिट एण्ड रन’ से कई गुना अधिक आनंद रक्तपात में ही पाता है.” 24

90 अंक (सितम्बर-अक्टूबर 2008) के प्रकाशन के बाद ‘पहल’, के प्रकाशन पर विराम लग गया था. हम सब बेचैन हो उठे थे. ‘पहल’ का बंद हो जाना एक बड़ी घटना थी. ज्ञानरंजन के फोन की घंटियाँ लगातार बजने लगीं. ‘पहल’ का पाठक-लेखक संसार बहुत बड़ा था. वह देश के विविध हिस्सों में ही नहीं, देश के बाहर भी था. सब दुखी, चिंतित और परेशान थे. यह आत्मीय जुड़ाव और रिश्ते के कारण था. “पहले जब स्थगित या बंद हुई तो वह उतना अकस्मात नहीं था जितना लगता था. वह एक दर्द भरा निर्णय था. उसमें बहुतेरी चीजें शामिल थीं. सम्पादक की अस्वस्थता, सम्पादक का आवेग और उन तमाम मध्यवर्गीय लेखकों का मद जो सफलता के शिखर पर पहुँच चुके थे, जिनमें आग ठंडी हो रही थी और परिवर्तन‌कामी मुठभेड़ का पर्याप्त हौसला बचा नहीं था. पहल को नये रचनाकारों के पहचान की चुनौती थी. रेलगाड़ी और उसकी पटरियों को दुरुस्त करना भी था, कई ताकतें विकास के नाम पर पटरियों को उखाड़ रही थीं. सिनेमा के पर्दों, रंगमंचों, पुस्तकालयों, अभिव्यक्तियों पर, इतिहास पर, विज्ञान पर, वैज्ञानिक सोच पर हमला था, यहाँ तक कि हत्याएँ भी थीं.” 25

समय बदल चुका था. पुरानी सभी पटरियां उखड़ने लगी थी.  पहले की तरह अब कुछ भी नहीं हो सकता था. ‘पहल’ में पहले जो आग थी-एक तेज आग, उसका मद्धिम होना स्वाभाविक था. ‘पहल’ की खूबी यह रही कि उसकी आग अंत- अंत तक (अप्रैल 2021) कभी नहीं बुझी. सोवियत संघ के विघटन के समय ‘ग्लास्नोस्त’ और ‘पेरेस्त्रोइका’ पर पहल- पुस्तिका प्रकाशित हुई थी. साहित्य और  विचार पहल की दो पटरियां थीं. “पहल के बंद होने के पीछे अवसाद उतना नहीं था, जितना अपने दायित्व की परिवर्तन कामी चुनौतियाँ थीं.”26

मुश्किलें कम नहीं थी. वर्गीय स्थिति की नयी समझ, ‘प्राइड’ से समझौता नहीं करना, उत्कृष्टता की कसौटियों पर खरा उतरते रहना आदि. ज्ञानरंजन “खिचड़ी वाले चावलों से बिरयानी नहीं बना सकते थे.” 27

‘पहल’ का प्रकाशन लगभग साढ़े चार वर्ष स्थगित रहा. सितम्बर-अक्टूबर 2008 (अंक 90) के बाद वह पुनः जनवरी 2013 (पहल 91) से प्रकाशित होने लगा और अगले 35 अंक (अप्रैल 2021)  प्रकाशित हुए. ‘पहल’ को पुनः प्रकाशित करने के लिए ज्ञानरंजन के मित्र और आत्मीयजन उनसे आग्रह करते रहे, ‘ठोंकते प्रेरित’ करते रहे और देश के कोने-कोने से मध्यवित्त नौकरी पेशा लेखक पाठक आर्थिक सहायता के लिए आश्वस्त करते रहे.यह नोट किया जाना चाहिए कि जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से निकले अनेक इंजीनियरों ने उनसे ‘पहल’ को निकालने, स्वतंत्रता के साथ निकालने और राज्य सरकारों के विज्ञापन के बगैर निकालने का आग्रह किया? ‘पहल’ निकलने लगी और आठ वर्ष तक निकली (जनवरी 2013 से अप्रैल 2021 तक).

‘पहल’ में प्रकाशित सभी रचना-सूची कर्मेन्दु शिशिर की पुस्तक ‘पहल और ज्ञानरंजन’ (2023) में हैं. “125 अंकों की सम्पूर्ण सामग्री से अगर आप सरसरी तौर पर भी गुजरें तो समकालीनता के सारे गवाक्ष दिख जाएँगे… समय, समाज और साहित्य को प्रभावित करने वाला शायद ही कोई मुद्दा उससे ओझल रहा हो. उसकी वैज्ञानिक सोच और यथार्थपरक विश्लेषण से तमाम अन्तविरोधों और विडम्बनाओं के परखने तथा एक ऐसी सांस्कृतिक सोच विकसित करने में मदद मिली, जिससे मौजूदा समय में संवेदना और संस्कार समृद्ध हुए… समय और समाज के गहरे और बहुस्तरीय अंतर्विरोधों के बीच मौजूद वैचारिक और सांस्कृतिक संकटों की उसे अचूक पहचान है.” 28

‘पहल’ के पचासवें अंक (1997) में उन्होंने यह लिखा –

“एक रचनाकार के लिए जरूरी है कि वह अपने समय की नाटककिय स्थितियों उसकी लीलाओं और उसके घने अंधकार के प्रति सचेत रहें.”

‘पहल’ में प्रकाशित साहित्यिक आलोचना के साथ वैचारिक और सैद्धांतिक निबंधों पर एक नजर डालने से ही यह मालूम होगा कि ‘पहल’ ने अपने समय में क्या काम किया है. ज्ञानरंजन का यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है-“जो काम वामपंथी पार्टियाँ नहीं कर सकीं, वह हमने किया.” 29 पहल 8 (जुलाई 1976) में ‘साहित्य में दक्षिणपंथी प्रतिक्रिया वाद के विरुद्ध संघर्ष’ पर बहस चली, प्रवेशांक में ही ‘मास कल्चर तथा मास लिटरेचर’ (प्रमोद) पर विचार किया गया. फ्रेंच कथाकार, उपन्यासकार हेनरी बारबूस (17 मई 1873-30 अगस्त 1935) का लेख ‘लेखन और युद्ध’, ज्यां पाल सार्त्र (21 जून 1905-15 अप्रैल 1980) का लेख ‘फासिज्म और साहित्यकार’, कार्ल मार्क्स (5 मई 1818-14 मार्च 1883) का ‘कला और समाज’, लेनिन (22 अप्रैल 1870-21 जनवरी 1924) का ‘कला और सर्वहारा’, माओ त्से तुंग (26 दिसम्बर 1893-9 सितम्बर 1976) का ‘कला और क्रान्ति’, क्रिस्टोफर कॉडवेल (२० अक्टूबर 1907-12 फरवरी 1937) का ‘मध्यवर्गीय कलाकार के नाम’, लूनार्चास्की (23 नवम्बर 1875-26 दिसम्बर 1933) का ‘मार्क्सवादी आलोचना की समस्याएँ’. एडवर्ड सईद (1 नवम्बर 1935-25 सितम्बर २००३) आदि के लेख ‘पहल’ में प्रकाशित हुए. ‘पहल’ में कविता, कहानी ,विचार, लेखादि के अनुवाद कम नहीं हैं.

 

 ग्यारह)

कथाकार होने के बाद भी ज्ञानरंजन की साँस आरंभ से ही कविता से जुड़ी रही है. उनकी चमकीली, अनोखी, अनूठी गद्य-भाषा में कविता के कुछ तत्त्व झिलमिलाते हैं. उन्होंने लिखा है- “कविता ‘पहल’ का प्राण थी. इस गाड़ी में ‘पाश’ बैठे और बैठे लाल सिंह दिल, सुरजीत पातर भी बैठे.” 30 ‘पहल’ में प्रकाशित कवियों की बड़ी लम्बी सूची है. कविता का इतना बड़ा जगमगाता आकाश किसी भी पत्रिका में नहीं है. पत्रिका हिन्दी की है, पर सम्पादक की नजर पूरे विश्व पर है. नवारुण की प्रसिद्ध कविता का अनुवाद ‘पहल’ में ही छपा-‘मृत्यु का उपत्यका मेरा देश नहीं है’, पाश की लोकप्रिय कविता ‘हम लड़ेंगे साथी’ से हम सब ‘पहल’ से ही परिचित हुए थे. ‘पहल’ के कवितांक (पहल 13) में ये कविताएं प्रकाशित हुई थीं. वीरेन डंगवाल की ‘राम सिंह’, अरुण कमल की ‘उर्वर प्रदेश’, पंकम सिंह की ‘शरद के बादल’ भी इसी अंक में छपी थी. कविता के संबंध में ‘पहल’ और ज्ञान की दृष्टि साफ थी.

‘इस नवान्न में’ (1979 कवितांक -1) केदारनाथ अग्रवाल और केदारनाथ सिंह से लेकर सोमदत्त तक 19 कवियों की कविताएँ थी. इस अंक को बनाने में विजय कुमार , उदय प्रकाश, मंगलेश डबराल का योगदान था. ‘पहल’ की अपनी एक नायाब टीम थी. यह कविता का एक यादगार अंक तब भी था, आज भी है. सातवें दशक की आरंभिक कविताओं के बारे में इस अंक के सम्पादकीय की यह टिप्पणी पढ़ी जानी चाहिए-

“रचना के बाहर की जिस दुनिया में रचना के समस्त स्रोत होते हैं, उसमें जारी हलचलों और संघर्षों से उनका कोई सरोकार नहीं था… सातवें दशक के उत्तरार्द्ध में भयावह सामाजिक परिस्थितियों, राजसत्ता की असफलताओं और क्रूरताओं के प्रतिरोध से उभरी लड़ाइयों ने जब देश की चेतना को गुणात्मक स्तर पर बदलना शुरू किया तो एक और तरह की कविता की जरूरत पैदा हुई.” 31

‘पहल’ अकेली पत्रिका है, जिसने उस समय एक साथ ऐसे कवियों की कविताओं को प्रस्तुत किया. ‘इस नवान्न में’ पाश, अमरजीत चन्दन, लाल सिंह दिल और सुखचैन मिस्त्री सहित पंजाबी के 7, नवारुण भट्टाचार्य, सुकान्त भट्टाचार्य, काजी नजरुल इस्लाम सहित बंगला के 7 और नामदेव ढसाल, नारायण सुर्वे, सतीश कालसेकर सहित मराठी के 4 कवियों की कविताएँ हैं. कवियों और उनकी कविताओं की ऐसी एकत्र उपस्थिति पहले कहीं भी दिखाई नहीं देती. हिन्दी कविता मराठी, बंगला और पंजाबी कवियों की कविताओं के साथ जुड़ी और भारतीय कविता का एक चित्र सामने आया.

“आज की कविता में अलग से कोई आन्दोलन नहीं है, बल्कि वह देश में विभिन्न स्तरों पर जारी शोषण, अत्याचार, बर्बरता और जन साधारण के विरुद्ध किए जा रहे षड्‌यन्त्रों के प्रतिरोध में जारी एक व्यापक आन्दोलन का हिस्सा है…यह बहस निरर्थक है कि कविता केन्द्र में है या परिधि पर… युवा कवियों की एक पूरी पीढ़ी आज ऐसी कविता की रचना कर रही है, जिसमें व्यक्तिगत और सामाजिक, स्थानीय और सार्वभौम, राजनीतिक और अराजनीतिक जैसे अलगाव न होकर उनकी वास्तविक द्वन्द्वात्मकता है.” 32

अंत: संबंधों की द्वन्द्वात्मकता’ को पहली बार ‘पहल’ में ‘समकालीन कविता का आधार-बिन्दु’ माना गया. ‘अच्छी कविता’ के साथ ‘सही कविता’ की भी बात की गयी. ब्रेख्त की इन कविता-पंक्तियों को उद्धृत कर उसे ‘आज लिखी जा रही सारी अच्छी कविता का भी वक्तव्य’ कहा गया.

 

“तुम्हें देखकर अच्छे लोगों की आँखें आश्चर्य और चमक से भर उठती हैं
और बुरे लोगों की आँखें दहशत से
मैं चाहूँगा कि मेरी कविता के बारे में भी यही कहा जाये.”

 

उस समय सब कुछ बदल रहा था. बदलते समय की नब्ज पर जैसी पकड़ ज्ञानरंजन की रही है, वह दुर्लभ है, जिसे हम पिछले दिनों बाँदा में दिये गये उनके वक्तव्य से और समझ सकते हैं. इस भूमिका का अंत इन पंक्तियों से हुआ है-“जनता ही कविता को संभव करने वाली शक्ति है और… ‘एक सही राजनीतिक कविता’  और एक सही ‘प्रेम कविता’ में दरअसल कोई विरोध नहीं होता : बल्कि वे एक दूसरे के उद्देश्य को ताकत देती है.” 33

पहल में हिन्दी के अतिरिक्त बंगला, असमिया, तमिल, पंजाबी, तेलुगू, मराठी, गुजराती, उड़ि‌या, मलयाली, कन्नड़, कश्मीरी, मैथिली, तिब्बती, खासी, नेपाली आदि भाषाओं की बेहतरीन कविताएँ अनुदित होकर प्रकाशित हुईं. विदेशी भाषाओं की कविताओं पर एक नजर डालें तो पेरु, चिली, वियतनाम, आस्ट्रिया, बुल्गेरिया, जर्मन, फ्रांस, स्पैन, रूस, चीन, कोरिया, फिलिस्तीन, जापान, ब्रिटेन, नाइजीरिया, रोमानिया, निकारागुआ, दक्षिण अफ्रीका, अंगोला, राइप्रस, पोलैंड, इजीप्ट, हिस्पानी, इटली, ईरान, ग्रीस, लिथुवानिया, आदि देशों की महान कविताएँ वहाँ छपी हैं. मिरोस्लाव होलुब, निकानोर पार्रा, पाब्‌लो नेरूदा, हो ची मिन्ह, निकोला वाप्तसरोव, बर्तोल्त ब्रेख्त्र, पॉल एलुआर, लोर्का, आंद्रे बोज्सेन्स्की, मायकोवस्की, महमूद दरवेश, वोले शोयिंका, ताद्यूज रोजेविच, मारीना त्स्वेतायेवा, नीकोलास गीयेन, सिम्वोस्का, गिम्सबर्ग, गुंटर ग्रास, नाजिम हिकमत, येहूदा अमीखाई, चेस्वाव मिवोश, कवाफी, एर्नेस्तो कार्र्देनाल, सब ‘पहल’ में हैं. पहल ने हिन्दी पाठकों के सामने तारों भरा आकाश लाकर रख दिया था. ज्ञानरंजन के मित्रों में कवि मित्रों की संख्या सर्वाधिक रही है. हिन्दी का शायद ही कोई महत्वपूर्ण समकालीन कवि होगा, जिसकी कविताएँ ‘पहल’ में प्रकाशित न हुई हों.

‘पहल’ की पुस्तिकाओं में राजेश जोशी की लम्बी कविता ‘समरगाथा’, ‘ग़ालिब की फारसी गजलें’, ‘माच्चू पिच्चू के शिखर’ (नीलाभ) ‘पुरातत्वेत्ता’ (शरद कोकास) ‘वली दक्खिन की कविताएँ’ ‘हे राम !’ (गुजरात त्रासदी पर लम्बी कविता) नाज़िम हिकमत की कविताएँ (वीरेन डंगवाल ) प्रकाशित हुईं. ‘रेनबो’ की कुछ कविताएं ‘ओ ऋतुओं, ओ महलों’ शीर्षक से (शरत चंद्रा ) और ‘जेब्रिएला मिस्त्राल की 36 चुनी कविताएं’ ‘पृथ्वी का बिम्ब’ शीर्षक से प्रकाशित हुई (नरेंद्र जैन). कविता का एक बडा संसार पहल में है. पहली बार ‘कविता का तीसरा संसार’ पर सियाराम शर्मा ने विचार किया और केन्द्र में चार कवियों-कुमार विकल, आलोक धन्वा, गोरख पांडेय और वीरेन डंगवाल को रखा. ‘पहल’ के लगभग प्रत्येक अंक में ऐतिहासिक महत्त्व की कोई रचना अवश्य है. ‘विज्ञान पुराण’ पर एक पुस्तिका निकली तो एक राव साहब कसबे द्वारा ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ पर लिखी गयी पुस्तिका भी.

‘1857 की राजक्रान्ति’ हो या ‘ऐतिहासिक बाँदा सम्मेलन के दस्तावेज’ ये पुस्तिका के रूप में प्रकाशित हुए. ‘सांस्कृतिक संकट’ पर प्रदीप सक्सेना, ‘जन आंदोलन और लेखक की भूमिका’ पर ‘बरबर राव’ और ‘आज के जमाने में मार्क्सवाद का महत्त्व’ पर ‘एजाज अहमद’ ने विचार किया. बलराज साहनी का ‘हिन्दी साहित्यकारों के नाम पत्र’ को पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया गया. ‘पहल’ ने विश्व कविता में से प्रगतिशील कविता का चयन किया और ‘प्रगतिशील कविता की विश्व- परम्परा’, सामने रखी. उसने पाठकों की चेतना विकसित की और हिन्दी के कवियों-लेखकों के समक्ष विश्व की उत्कृष्ट रचनाएँ प्रस्तुत कीं. कला, साहित्य, संस्कृ‌ति, के साथ समाज-विज्ञान, अर्थशास्त्र, विज्ञान एवं विकसित हो रही तकनीक से पाठकों को परिचित कराया. ‘पहल’ ने एक लड़ाई लड़ी-सृजन और विचार दोनों ही स्तरों पर.

‘पहल’ में जितने अनुवाद और साक्षात्कार प्रकाशित हुए हैं, वे अलग से अध्ययन की मांग करते हैं. वहाँ अपने समय के, ‘बीसवी’ सदी के अपने-अपने क्षेत्र के अधिसंख्य कवि, लेखक, विचारक आदि हैं. चार्ली चैप्लिन ,पाउलो फ्रेरे, दास्तोवस्की, देरिदा, नोम चोम्स्की, एजाज अहमद, दून्या मिखाइल, ऋत्विक घटक, विलियम फॉकनर, हावर्ड जिन, पिकासो, फिदेल कास्त्रों, इंगमार बर्गमैन, श्याम बेनेगल, श्यामाचरण दुबे, गेब्रियल ओकारा, मार्क्वेज, महमूद दरवेश, महेश एलकुंचवार, महाश्वेता देवी, जोसे सारामागो, उत्पल दत्त, जूलियस  फ्यूचिक, स्टीफन हॉकिंग, सच्चिदानन्द सिन्हा, मर्लिन मुनरो, नवनीता देव सेन, असगर अली इंजीनियर …कौन नहीं है ‘पहल’ में? यह नाम-सूची आराम से सौ या उससे अधिक भी पहुँच सकती है.

‘पहल’ ने “वामपंथी संकीर्णता से अपने को मुक्त रखा और व्यापक जनवादी लोकतांत्रिक वैचारिक एकता की जमीन निर्मित किया… उसने हिन्दी पाठकों के विवेक और बोध को वैश्विक समकालीनता से जोड़ने का स्तुत्य कार्य किया.” 34

‘पहल’ ने आरंभ से विश्व साम्राज्य वाद और साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का विरोध किया है. समाज और जीवन को विविधता एवं सम्पूर्णता में देखकर उसने प्रातिशील तत्वों का चयन किया. उसकी दुनिया कभी केवल साहित्य तक सीमित नहीं रही है, उसके सरोकार बड़े रहे. वे सरोकार केवल साहित्य के ही नहीं, साहित्येतर भी थे. राजनीतिक अर्थशास्त्र, भारतीय अर्थव्यवस्था, सामंती अत्याचार, धर्म, साम्प्रदायिकता, इतिहास-दृष्टि, नैतिकता हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता, वर्ण और वर्ग, जनविज्ञान, टेक्नालॉजी, प्रकृति-विज्ञान, सामाजिक विखण्डन, धर्म निरपेक्षता, गांधी, दलित, वामपंथी एकता, आधुनिकता, विकास, इतिहास-बोध, तकनीकी शिक्षा और प्राथमिकताएँ, मार्क्सवाद की प्रासंगिकता, नारीवाद, क्रान्ति-चेतना, आभासी यथार्थ, नया मध्यवर्ग, भगत सिंह, डार्विन, भूमंडलीकरण, मीडिया, मूल्य-बोध आइंस्टीन से हॉकिंग तक का समय, हिन्दू वर्ण-व्यवस्था, भौतिक विज्ञान और प्रकृति का द्वन्द्ववाद, विकास का आतंकवाद, आदिवासी प्रति-संस्कृति, इस्लाम, सभ्यता और समाजवाद का संकट, डिजिटल पूंजीवाद, कॉरपोरेट संस्कृति, मीडिया, फेसबुक, राष्ट्रवाद आदि विविध विषयों पर लिखे गये लेख, वक्त किए गये विचार ‘पहल’ के विविध अंकों में मौजूद हैं. अपने समय और समाज के लगभग सभी ज्वलंत विषयों से संबंधित सामग्री ‘पहल’ में दिखाई देगी.

कविता के बाद कहानी का इस पत्रिका में प्रमुख स्थान रहा है. 45 कहानी-संग्रहों की यहाँ समीक्षा प्रकाशित हुई. ‘पहल’ के दो कहानी-विशेषांक प्रकाशित हुए  (अंक 27-28 सितम्बर 1985). इस अंक की बड़ी विशेषता यह रही कि कहानी पर कई कहानीकारों के विचारों से भी पाठक अवगत हुए. प्रेमचन्द, प्रसाद, रेणु, मुक्तिबोध, जोसेफ कॉनराड, जूलियन कावलाक, जॉयस, कैरी, अलबर्टो मोराविया, तुर्गनेव, शान ओ’ फालेन, कैथरीन मैंसफील्ड, एडेल फ्रांसिस, चेखव, टामस मान,बोर्खेस, कैथरीन पोर्टर, मार्क्वेज, विलियम फाकनर, इसाक डिनेसन, गुस्ताव फलाबेयर, साल बेलो, फिलिप राथ, इसाक वाशेविस सिंगर, फलानेरी ओ’ कॉर्नर , सार्त्र, डी. एच. लोरेंस, दॉस्तोवस्की, और फ्रांस्वा मॉरिआक के विचार इस अंक में एक साथ हैं. जैसे कविता-अंक के साथ एक अच्छी टीम जुड़ी रही, उसी तरह इस अंक के साथ भी.

’पहल’ में सदैव गुणवत्ता (क्वालिटी) प्रमुख रही है. इस अंक के निर्माण में उन्हें प्रभु जोशी, बरयाम सिंह, विनोद दास, राजकुमार सैनी और मोहन थपलियाल के साथ अन्य कई साथियों का सहयोग था.

‘कहानी और कहानीकार’ वाले सभी अंशों का चयन प्रभु जोशी ने किया था और हिन्दी में उन सबका अनुवाद भी किया. कहानी-संबंधी विचारों की खोज करना एक बड़ी मिहनत का काम था. तब गूगल नहीं था. विकीपीडिया भी नहीं. राजकुमार सैनी ने कहानी- संबंधी विचारों को खोज कर एक जगह एकत्र किया. यह सारी सामग्री ‘एनकाउंटर’, ‘न्यू वर्ल्ड रायटिंग’, ‘पेरिस रिव्यू’, ‘प्लेबाय’, ‘रायटर्स आन देयर क्राफ्ट’, ‘द ग्रेट मास्टर्स’, ‘फाकनर इन द यूनिवर्सिटी’, ‘मॉन ऑन चेखव’, ‘द न्यू डायरेक्शन एनुअल’, ‘लिटरेरी हेरिटेज’, ‘योरोपियन रायटर्स ऑन देयर क्राफ्ट’, ‘फ्लाबेयर एण्ड हिज आर्ट’, ‘ ऑन गोर्की’, ‘फिलासफी आव क्रियेटिव प्रोसेस’ आदि किताबों और पत्रिकाओं से सामग्री जुटाना एक श्रम-साध्य कार्य था.

‘पहल’ के इसी कहानी-अंक में ब्रेख्त की ‘महाशय ‘ब’ की कहानियाँ’, भीष्म साहनी की ‘झुटपुटा’, काशीनाथ सिंह की ‘कहानी सराय मोहन की’ स्वयं प्रकाश की ‘क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा?’, उदय प्रकाश की ‘छप्पन तोले का करधन’, विजयकांत की ‘जाग’, विजेन्द्र अनिल की ‘सफर’, पंकज बिष्ट की ‘आखिरी पहर’ और असगर वजाहत की ‘गवाही’ इसी अंक में प्रकाशित हुई थी.पहल ने ‘कथा समय’ पर दो पुस्तिकाएं भी प्रकाशित की, जिनमें कई कहानीकारों की कहानियों पर कई आलोचकों ने लिखा था.

योगेन्द्र आहूजा की कहानी ‘लफ्फाज’ ‘पहल’ के 108 वें अंक  (जुलाई 2017) में छपी थी. इसके पहले उनकी कई कहानियाँ पहल में प्रकाशित हो चुकी थीं. देवी प्रसाद मिश्र की कविताएँ और कहानी दोनो ‘पहल’ में आईं. भीष्म साहनी, अमरकान्त, गिरिराज किशोर, काशीनाथ सिंह से लेकर चंदन पांडेय तक की चार पीढ़ि‌यों के कहानीकारों की प्रकाशित कहानियों में से 10-15 कहानियां स्थायी महत्व की हैं. कविता और विचार के क्षेत्र में अच्युतानन्द मिश्र और अविनाश मिश्र आये, उसी तरह कहानी की आलोचना में प्रिया अंकित और अन्य. ‘पहल’ के लिए सुरेश पाण्डे ने नामवर सिंह से जो साक्षात्कार लिया था, वह अब ऐतिहासिक महत्त्व का बन चुका है. ‘पहल’ में ऐतिहासिक महत्त्व की रचनाएं- आलोचनाएं कम नहीं है.

अनेक विश्वविद्यालयों में ‘पहल’ पर शोध कार्य हुए हैं और हो भी रहे हैं जिसकी सही सूचना अभी उपलब्ध नहीं है. काजी नज़रुल इस्लाम यूनिवर्सिटी, आसनसोल के शोधार्थी अमित साव ‘हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता के विकास में पहल की भूमिका’ पर शोध कार्यरत हैं. किसी भी शोधार्थी के लिए ‘पहल’ के सभी अंकों से गुजर कर उसकी देन को तब तक नहीं समझा जा सकता, जब तक उसे  उस समय की भी पहचान न हो. ‘पहल’ के आयोजन और ‘पहल’ सम्मान कभी भुलाये नहीं जा सकते. ‘पहल’ ने अपने समय में ‘एक साहित्यिक सांस्कृतिक आन्दोलन’ खड़ा किया. उस समय से आज का समय एकदम भिन्न है. हम भुतहे और आतातायी समय में हैं. ‘पहल’ के गौरव-गान से इस समय आवश्यक है, उससे प्रेरणा ग्रहण कर सम्पादकों का सक्रिय होना.

मनोहर बिल्लौर और राजकुमार केसवानी की बाद के वर्षों में ‘पहल’ में बड़ी भूमिका रही है. ज्ञानरंजन के पास हमेशा एक सक्रिय और भरोसेमंद टीम रही. उनके लिए ‘मैं’ नहीं, ‘हम’ महत्वपूर्ण था, जो भारतीय संविधान की ‘उद्दे‌शिका’ का पहला शब्द है. ‘पहल’ ने अपने समय में सार्थक पहल की. गुणात्मक स्तर कायम रखते हुए 47 वर्ष में 125 अंकों का निकलना सामान्य कार्य नहीं है. ‘पहल’ ने कभी कोई मुखौटा नहीं लगाया. हम उससे इतना तो सीख ही सकते हैं कि मुखौटा नहीं लगायें. पर हमारा समय मुखौटा समय है. लोकतंत्र और विकास के मुखौटे में क्या नहीं हो रहा है. ‘पहल’ का पाठक और लेखक-वर्ग कभी एक वर्ग विशेष का नहीं रहा है. हिन्दी साहित्य के बाहर के लोग कम नहीं थे. शेखर जोशी को जब इलाहाबाद में ‘पहल’ सम्मान दिया जा रहा था, ज्ञानरंजन ने उनके कथा-संसार पर मुझे बोलने को आमंत्रित किया था. वहीं मैंने पहली बार ‘नयी कहानी’ की ‘मित्र-त्रयी’ और ‘जेन्युइन त्रयी’ की बात कही.

ज्ञानरंजन के काम को इस समय इसलिए भी देखना चाहिए कि क्योंकि हम सब बड़ा काम नहीं कर पा रहे हैं. ‘पहल’ ने ‘नये जमाने के शत्रुओं की पहचान’ की थी. उन्होंने रक्त और रगों में ‘कमिटमेंट’ की बात कही है. हम सब बाजार के बीच में हैं, शत्रुओं से घिरे हुए. इस समय ‘ईंधन’ खत्म नहीं होनी चाहिए. ‘पहल’ के अनेक कवि-लेखक इस दुनिया को छोड़कर चले गये. हम अभी इस दुनिया में बचे हुए हैं. ‘पहल’ के संग-साथ होना कुछ अंशों में अपने समय के संग साथ होना है. वामदल झपकियां ले रहे हैं. फासीवाद आ धमका है. ‘पहल’ का परिवार बड़ा था. हम अब एक छोटे परिवार में रह रहे हैं. लेखकों-सम्पाद‌कों के बीच की मैत्री चंद अपवादों को छोड़कर समाप्त हो चुकी है. दुर्गन्ध चारों ओर है. ‘पहल’ ने मुठभेड़ की थी, पर हम समझौते कर रहे हैं. समय बदल चुका है.

आज हिन्दी पट्टी में एक होने की जरूरत है. हिंदी प्रदेश में ही सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता सौंपी है इसलिए हिंदी के कवियों, लेखकों, आलोचकों, पत्रकारों, संपादकों, संस्कृति कर्मियों और बुद्धिजीवियों की आज कहीं बड़ी भूमिका है.दुश्मन कहीं अधिक ताकतवर और हमलावर है. आज साँसें फूल रहीं हैं और हवाओं में जहर घुला हुआ है.‘पहल’के 50वें अंक (नवंबर दिसंबर 1997 ) के संपादकीय में मेक्सिको कोट किया गया था-

“ मनुष्य को खतरनाक ढंग से जीना चाहिए और उसे अपने घर ज्वालामुखियों के करीब बसाने चाहिए.”

‘पहल’ के अनेक पाठक और लेखक अब भी ज्ञानरंजन के मित्र और आत्मीय हैं. वे सब मंगल कामनाएं कर रहे होंगे की कम से कम 100 वर्ष तक हिंदी का यह अनोखा कथाकार और शानदार संपादक स्वस्थ रहे शतायु हो.

 

संदर्भ

  1. पहल 1, 1973, पृष्ठ 83
  2. शैलेन्द्र शैल, ‘ज्ञानरंजन : कमबख्त आदमी नहीं, चुम्बक’, ‘कुछ हमारी : कुछ तुम्हारी’ (कथेतर गद्य) में संकलित, संकल्प प्रकाशन, दिल्ली, २०२३, पृष्ठ-142-43
  3. वही, पृष्ठ 143
  4. ‘उपस्थिति का अर्थ’, सेतु प्रकाशन, नोएडा, 2020, पृष्ठ 149
  5. वही, पृष्ठ 110
  6. नाओमी क्लेन, ‘द शॉक डॉक्ट्रिन : द राइज ऑफ डिजास्टर’ (2007), पृष्ठ-76
  7. कुछ हमारीः कुछ तुम्हारी, पृष्ठ २०
  8. वही, पृष्ठ 134
  9. ज्ञानरंजन : कुछ शब्द, ‘पहल और ज्ञानरंजन’ (कर्मेन्दु शिशिर), अनन्य प्रकाशन, २०२३, पृष्ठ 9
  10. कुछ हमारीः कुछ तुम्हारी, पृष्ठ 68
  11. वही, पृष्ठ 88
  12. वही, पृष्ठ 87
  13. कबाड़खाना, आधार प्रकाशन, 1997, पृष्ठ 85
  14. वही
  15. वही
  16. पहल 31, (जनवरी 1987), पृष्ठ 12
  17. वही, पृष्ठ 12,13, 14 के अंश
  18. पहल 5 ‘प्रारंभिक’ (मई 1976), पृष्ठ-३
  19. वही, पृष्ठ 4
  20.  पहल 36 (अगस्त-अक्टूबर 1988)
  21. वही
  22. २२. वही
  23. पहल 100 (जून-जुलाई 2015, विशेष अंक) पृष्ठ 5
  24. वही, पृष्ठ 6
  25.  वही, पृष्ठ 7
  26. वही
  27. वही, पृष्ठ 8
  28. कर्मेन्दु शिशिर, ‘पहल और ज्ञानरंजन’, पृष्ठ 18
  29. पहल 100 (जून-जुलाई 2015) कुछ पंक्तियाँ, पृष्ठ 7
  30. वही, पृष्ठ 6
  31. पहल 13, पृष्ठ 5-6
  32. वही, पृष्ठ 6-7
  33. वही, पृष्ठ 8
  34. कर्मेन्दु शिशिर, ‘पहल और ज्ञानरंजन’, पृष्ठ 20

17 दिसम्बर 1946 को बिहार प्रान्त के मुज़फ्फ़रपुर जिले के गाँव चैनपुर-धरहरवा के एक सामान्य परिवार में जन्मे रविभूषण की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के आसपास हुई. बिहार विश्वविद्यालय के लंगट सिंह कॉलेज से हिन्दी ऑनर्स (1965) और हिन्दी भाषा-साहित्य में एम.ए. (1967-68) किया. भागलपुर विश्वविद्यालय से डॉ. बच्चन सिंह के निर्देशन में छायावाद में रंग-तत्व पर पी-एच.डी. (1985) की. नवम्बर अक्टूबर 2008 में राँची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन. समय और समाज को केन्द्र में रखकर साहित्य एवं साहित्येतर विषयों पर विपुल लेखन.

‘फ़ासीवाद की दस्तक’, ‘बुद्धिजीवियों की जिम्मेदारी’ ‘वैकल्पिक भारत की तलाश’, ‘कहाँ आ गये हम वोट देते-देते’ और ‘रामविलास शर्मा का महत्व’ पुस्तकें आदि अभी तक ९ पुस्तकें प्रकाशित.
ravibhushan1408@gmail.com

Tags: 2025ज्ञानरंजनपहलपहल के संग-साथरविभूषणहिंदी साहित्यिक पत्रकारिता
ShareTweetSend
Previous Post

सीरियाई गृहयुद्ध की कहानियाँ : प्रो. लोई अली ख़लील : शहादत

Next Post

परम्परा, आधुनिकता तथा समकालिकता: राधावल्लभ त्रिपाठी

Related Posts

ज्ञानरंजन का कथा-संसार :  प्रेमकुमार मणि
आलेख

ज्ञानरंजन का कथा-संसार : प्रेमकुमार मणि

जेन ज़ी क्या पढ़ रही है? : त्रिभुवन
आलेख

जेन ज़ी क्या पढ़ रही है? : त्रिभुवन

चार फूल हैं और दुनिया है : विपिन शर्मा
फ़िल्म

चार फूल हैं और दुनिया है : विपिन शर्मा

Comments 17

  1. विमल कुमार says:
    2 months ago

    बहुत शानदार लिखा।बड़ी मेहनत से।पहल पर ऐसा लेख नहीं आया था कभी।किसी पत्रिका पर भी नहीं।

    Reply
  2. पीयूष कुमार says:
    2 months ago

    जरूरी लेख। लघु पत्रिका आंदोलन से साहित्यिक पत्रकारिता और वैचारिक साहित्य की भूमि तैयार करनेवाली इस तरह की तमाम पत्रिकाओं का इसी तरह मूल्यांकन किया जाना होगा।

    Reply
  3. माताचरण मिश्र says:
    2 months ago

    पहल में प्रकाशित होना लेखक होने की स्वीकृति होता था,पहल ने मुझे कभी प्रकाशित नहीं किया पर उन दिनों जब मैं प्रदेश के कोयलांचलों में रहा करता था, ज्ञानरंजन जी ने चाहा था कि मैं कोयलांचलों के जनजीवन पर उन्हें पहल के लिए अपनी रपट दूं पर अलालीवश मैं नहीं लिख सका, मुझे लताड़ते हुए एक लम्बा पत्र मुझे लिखा था ,आज भी वह मेरे पास एक उपलब्धि की तरह अवश्य है,,, मैं तब उन्हें जवाब नहीं दे पाया पर उनके प्रति एक गहरा आदरभाव आज भी है,,,,सादर,,,,,

    Reply
  4. त्रिभुवन says:
    2 months ago

    रविभूषण जी ने वाक़ई बहुत क़माल और उल्लेखनीय लेख लिखा है। आपको रविभूषण जी को और समालोचन टीम को इसके लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं, बधाई और धन्यवाद।

    ज्ञानरंजन का हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता में योगदान अप्रतिम है। रविभूषण का यह लेख तो बताता ही है, उनका अपना काम भी बोलता है। वे एक साहसिक साहित्यकार हैं। उनका काम केवल एक साहित्यिक पत्रिका निकालने भर का नहीं रहा, वह हिन्दी में संपादक-चरित्र की वैचारिक और नैतिक पुनर्खोज है। चौथे लोकसभा चुनाव, नक्सलबाड़ी, आपातकाल, चिली से लेकर आज तक जितने भी ऐतिहासिक झटके और कंपन हमारे समय ने महसूस किए, उनकी प्रतिध्वनि एक अकेले आदमी की संपादकीय चेतना में जितनी साफ़, बहसों को जन्म देने वाली और दीर्घकालिक रूप में दर्ज़ हुई, वह “पहल” और उसके संपादक ज्ञानरंजन के बिना सोची ही नहीं जा सकती।

    साहित्यिक आत्म-प्रदर्शन और “ब्रांड-रचनाकार” संस्कृति से अलग, ज्ञानरंजन ने जिस चीज़ का बलिदान किया, वह अपनी ख़ुद की रचनाकार की “कॅरियर” सम्भावना थी। “पिता”, “बहिर्गमन”, “छलाँग”, “शेष होते हुए”, “फेंस के इधर-उधर”“बहिर्गमन”, “संबंध” आदि जैसी कहानियाँ लिखने वाला लेखक चाहता तो अपने को ही केंद्र में रखकर चल सकता था; लेकिन उसने अपना लगभग सारा “ईंधन कोयले से परमाणु ऊर्जा तक” एक पत्रिका में झोंक दिया। यही वह निर्णायक मोड़ है, जहाँ ज्ञानरंजन सिर्फ़ अच्छे कहानीकार से आगे बढ़कर हिन्दी के लिए वही काम करने लगते हैं, जो विश्व-साहित्य में पैरिस रिव्यू, ग्रांटा, पॉएट्री, एन्काउंटर जैसी पत्रिकाएँ करती रही हैं। रचनाशीलता, विचार, राजनीति, संस्कृति और विश्व साहित्य के बीच पुल बनना, एक सपना तो है; लेकिन ज्ञानरंजन उस पुल को अपनी विचार चेतना के कंधे पर उठाकर यहाँ तक ले आए।

    “पहल” का सपना कोई छोटे कक्ष की लघु पत्रिका का सपना नहीं था; यह इस महादेश की चेतना के “वैज्ञानिक विकास” की परियोजना था। मैंने जब विज्ञान के एक विद्यार्थी होने के नाते पहली बार यह पत्रिका देखी तो यही समझा था कि यह कोई विज्ञान की पत्रिका है; लेकिन बाद में पढ़ा तो पता चला कि यह वैज्ञानिक चेतना से नहाई हुई एक वैचारिकी वाली धारा है। इसे सिर्फ़ वामपंथ कहना इसके साथ ज़्यादती है। ज़रूरी नहीं कि हर वामपंथी चीज़ वैज्ञानिक चेतना से जुड़ी हुई हो ही। मार्क्स और एंगल्स के कैम्युनिस्ट मेनिफेस्टो के प्रकाशन के बाद के 177 साल बाद दुनिया के समुद्रों में पानी बहुत भर गया है और उसमें बहुत सारे द्वीप-उपद्वीप डूब रहे हैं या डूबने जा रहे हैं।

    वामपंथी होना अपने-आप में वैज्ञानिक चेतना की गारंटी नहीं है। मार्क्स और एंगेल्स के समय, विशेषकर 1848 के कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो तक, यह बात काफ़ी हद तक सत्य मानी जा सकती थी कि वामपंथ आधुनिक विज्ञान, इतिहास और समाजशास्त्र की उपलब्धियों से सबसे अधिक संवाद में रहने वाली धारा है। लेकिन उसके बाद विज्ञान स्वयं जिस अविश्वसनीय गति से आगे बढ़ा; डार्विन, आइंस्टीन, क्वांटम भौतिकी, जीवविज्ञान, सूचना-प्रौद्योगिकी, जीन विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान आदि उसके सामने कोई भी राजनीतिक विचारधारा यदि अपने को “वैज्ञानिक” कहती है तो उसे लगातार अपने बौद्धिक औज़ारों की समीक्षा और अद्यतन करना पड़ता है।

    ऐसे ही समय में ज्ञानरंजन जैसे चेतनशील मार्क्सवादी की विशिष्टता उभरती है। उन्होंने समय से बहुत पहले उस आहट को भांप लिया और वैज्ञानिक चेतना पर ज़ोर दिया। उन्होंने वामपंथ को केवल नारे, इतिहास-स्मृति या पार्टी लाइन के रूप में नहीं, “वैज्ञानिक चेतना” की एक लगातार विकसित होती परंपरा के रूप में समझा। “पहल” में अर्थशास्त्र, फ़ासीवाद, साम्राज्यवाद, तकनीक, मीडिया, प्रकृति-विज्ञान, भाषा और संस्कृति के प्रश्न जिस तरह साथ-साथ रखे गए, वह इस बात का प्रमाण हैं कि वे विचारधारा को जड़ सूत्रों की तरह नहीं, गतिशील ऐतिहासिक प्रक्रिया की तरह देखते थे। उनके लिए मार्क्सवाद का अर्थ किसी किताब की स्थिर उद्धरणशीलता नहीं, “आलोचनात्मक और वैज्ञानिक दृष्टि” था, जो नई वैज्ञानिक खोजों, नयी सामाजिक संरचनाओं और नये पूंजीवादी रूपों के साथ बराबरी के स्तर पर संवाद कर सके। यह सुखद भी है और बेहद विडंबनामूलक भी कि भारतीय राजनीतिक मार्क्सवादियों को जो बात आज तक समझ नहीं आ सकी, उसे नक्सलबाड़ी के दिनों में एक वैज्ञानिक ऊर्जा आप्लावित साहित्यकार समझ चुका था।

    भारतीय मार्क्सवादियों की एक बहुत बड़ी समस्या यह है कि यहाँ राजनीतिक खेमा वैचारिक लोगों को नियंत्रित करने की कोशिश करता है, जबकि होना इसका उलटा चाहिए। राजनीति के महासमर में आज वे इसीलिए मारे-मारे फिर रहे हैं; क्योंकि उन्होंने उलटी रीत को अपनाया। ख़ैर, यह बहुत बड़ी बहस का विषय है। इस हिसाब से और इस अर्थ में ज्ञानरंजन का काम ख़ुद सहज मार्क्सवादी परंपरा की उस मूल ऐतिहासिकता से जुड़ता है, जो हर दौर में अपने समय की वास्तविकता, उसके विज्ञान और उसकी सामग्री को गंभीरता से लेकर स्वयं को आलोचनात्मक रूप से बदलने की क्षमता रखती है। उन्होंने दिखाया कि वामपंथ की विश्वसनीयता केवल “वाम होने” में नहीं, इस बात में है कि वह अपने समय के सबसे उन्नत वैज्ञानिक और बौद्धिक विवेक के साथ कितनी ईमानदारी से खड़ी रहती है।

    एक तरफ मार्क्स, लेनिन, माओ, नेरुदा, पाश, नाज़िम, दरवेश, ब्रेख्त, दूसरी तरफ भारतीय भाषाओं; जैसे पंजाबी, बांग्ला, मराठी, तमिल, उर्दू, असमिया आदि की कविताएँ और कथा, साथ में अर्थशास्त्र, साम्राज्यवाद, फ़ासीवाद, सांस्कृतिक राजनीति, तकनीक, विज्ञान पर गंभीर लेख। हिन्दी में इससे पहले किसी पत्रिका ने पाठक को इतना व्यापक, सघन, विश्वस्तरीय बौद्धिक नभ नहीं दिखाया था। इस अर्थ में “पहल” सचमुच हिन्दी की पैरिस रिव्यू नहीं, उससे आगे की चीज़ भी कही जा सकती है; क्योंकि उसमें केवल लेखकीय “क्राफ़्ट” नहीं, वर्ग-संघर्ष और सांस्कृतिक प्रतिरोध की सुचिंतित दृष्टि भी है।

    “दॅ पैरिस रिव्यू” का नाम तो लोग सहजता से ले लेते हैं; लेकिन वे यह उल्लेख करना भूल जाते हैं कि “दॅ पैरिस रिव्यू” ज्ञानरंजन का एक छोटा-सा “घरेलू” दफ़्तर नहीं, एक ठीक-ठाक आकार की अमेरिकी संस्था है और उसके मुक़ाबले अकेले ज्ञानरंजन का काम कहीं विराट् दिखने लगता है।

    कोई भी “दॅ पैरिस रिव्यू” जैसी पत्रिका के बारे में सोचता है और सोचता है कि “पहल” क्या है और उन पर प्रश्न उछालता है तो उसे देखना चाहिए कि अमेरिका मंक “दॅ पैरिस रिव्यू फाउंडेशन” नाम से एक नॉन-प्रॉफ़िट संगठन चलता है, जो इस पत्रिका को निकालता है। उनकी ताज़ा फाइलिंग के मुताबिक इसके बीस कर्मचारी हैं, जो एडिटर, सब-एडिटर, इवेंट-फंडरेज़िंग, डिजिटल, एडमिन, अकाउंट आदि का काम देखते और करते हैं। यानी यह एक पूरा प्रोफ़ेशनल दफ़्तर है। इसकी कुल आमदनी 3.75 मिलियन डॉलर और कुल ख़र्च 3.43 मिलियन डॉलर है। यानी मोटे तौर पर कहें तो “दॅ पैरिस रिव्यू” का सालाना ऑपरेशनल बजट लगभग 3.5 मिलियन यूएस डॉलर है यानी 30–31 करोड़ रुपये।

    ज्ञानरंजन ख़ुद का खून जलाकर तैयार करते रहे हैं और “दॅ पैरिस रिव्यू” की संपादक ऐमिली स्टॉक्स सालाना दो लाख चार हजार तीन सौ छियासठ डॉलर यानी 15 लाख रुपए महीना और इसकी एक्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर लॉरी डॉल एक लाख 45 हजार 399 डॉलर सालाना यानी दस लाख पचहत्तर रुपए महीना वेतन पाती हैं। और उसमें जो बीस लोगों की प्रोफ़ेशनल टीम है, उसे साढ़े तीन मिलियन डॉलर का बजट मिलता है। यहीं से साफ़ दिखता है कि जिस तरह की वैश्विक-स्तर वाली पत्रिका “दॅ पैरिस रिव्यू” इस पूरी संस्थागत मशीनरी, भारी बजट और ऊँची तनख़्वाहों पर टिककर निकलती है, वैसी ही क्षितिज वाली पत्रिका ‘पहल’ ज्ञानरंजन ने लगभग अकेले, बेहद सीमित संसाधनों और लगातार हमलों और संदेहों के बीच खड़ी की। ये तथ्य उनके योगदान को असाधारण ही नहीं, ऐतिहासिक भी बना देते हैं।

    और यह सब किसी संस्थान, मीडिया-हाउस या पार्टी के बज़ट पर नहीं, जबलपुर के एक लेखक की निजी कमरकस ज़िद पर खड़ा था। उन्होंने साफ़ लिखा कि वे “टीए-डीए, कमेटीवाल, जनसंपर्कीय कॅरियरवाद” के ख़िलाफ़ रहे हैं और इसीलिए “पहल” को उन्होंने किसी संगठन का मुखपत्र बनने नहीं दिया। यही स्वतंत्रता उसे वैचारिक रूप से तेज, चयन में कठोर और नजरिए में निर्भीक बनाती है। यही वजह है कि आपातकाल के दौर में धर्मवीर भारती, राजेंद्र अवस्थी जैसे शक्तिशाली नामों के सार्वजनिक आक्रमण झेलने पड़े और वह सिलसिला आज तक भी रुका नहीं है; गृहमंत्रालय तक शिकायतें पहुँचीं, फेलोशिपें छीनी गईं; लेकिन फिर भी न तो पत्रिका रुकी, न संपादक का स्वर नरम हुआ। सबसे बड़ी बात तो यह है कि “पहल” और ज्ञानरंजन के उस काम ने जाने की पहलों को जन्म दिया और जाने कितने ज्ञानरंजन बनने की कोशिशों में हिन्दी को बेहतरीन साहित्यकार मिले।

    ज्ञानरंजन की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने हिन्दी में “पत्रिका” को महज़ रचनाएँ छापने वाली फाइल न रहने देकर उसे जागरूक वर्ग-चेतना, विश्व दृष्टि और सौंदर्यबोध का जीवित मंच बनाया। उन्होंने वामपंथी संगठनों की संकीर्णता से दूरी रखते हुए भी मार्क्सवादी दृष्टि की ज़मीन नहीं छोड़ी, उन्होंने उसके फ़लक को वैज्ञानिक विस्तार दिया और जरख़ेज़ भी बनाया। विविध धाराओं जैसे प्रगतिशील, जनवादी, उग्र, नरम, प्रयोगधर्मी आदि सबको एक बड़ी, बहसयोग्य, जटिल परंतु दीर्घकालिक परियोजना में जोड़ दिया। इसलिए ज्ञानरंजन का महत्व सिर्फ़ इस बात में नहीं है कि उन्होंने हिन्दी को विश्वस्तरीय पत्रिका दी; असल बात यह है कि उन्होंने दिखा दिया कि एक अकेला लेखक, अपनी निजी रचनाशीलता की कीमत पर भी पूरी पीढ़ियों के लिए बौद्धिक और राजनीतिक “इन्फ्रास्ट्रक्चर” तैयार कर सकता है और मारक हमलों, झूठे आरोपों और बाज़ार-संस्कृति की लहरों के बीच भी अपने स्टैंड से पीछे नहीं हटता। यही “पहल” की और ज्ञानरंजन की ऐतिहासिकता है।

    Reply
  5. नरेश सक्सेना says:
    2 months ago

    बहुत सुंदर और ज़रूरी आलेख।
    बहुत बधाई ।
    ज्ञानरंजन ने जो भी किया उसमें वे अद्वितीय हैं ।

    Reply
  6. शिरीष खरे says:
    2 months ago

    याद ‘पहल’ की
    बतौर प्रिंट मीडिया का विद्यार्थी जब से होश संभाला तब से मेरे लिए लिखना मतलब समाचार आधारित स्टोरी ही हुआ करती थी। दो दशक ग्रासरुट की इंडेप्थ रिपोर्टिंग करते या उन्हें पढ़ते हुए इस तरह गए थे कि लेखन की दूसरी विधाओं पर हाथ अज़माने के बारे में ख़्याल तक नहीं गया था। मगर, साल 2017 में मुख्यधारा की पत्रकारिता से कट जाने के बाद ऐसा पहली बार हुआ था कि अगले एक साल न किसी की कोई स्पेशल स्टोरी पढ़ने का मन हुआ, न किसी नई जगह घूमने के बावजूद रिपोर्ट लिखने की हूक उठी।

    लगता रहा कि अब बहुत हुआ! अपने गाँव से निकलकर देश के सात राज्यों के दुर्गम भूखंडों में होने वाले दमन-चक्र की हजार भर रिपोर्ट्स लिखने और उनका लेखा-जोखा तैयार करने के बाद, अब आगे क्या?

    फिर उन्हीं दिनों अपनी बायलाइन कतरनों पर विचार करते हुए एक विचार आया। ज्ञानरंजन जी जैसे लेखक-संपादक की सहज उपस्थिति ने जब इस विचार पर काम करने के लिए जोर दिलाया तो मुझे बहुत बल मिला।

    विचार यह कि क्यों न गए दो दशक के दौरान सात राज्यों के उसी यात्रा पर लौटा जाए और एक बार पुन: उसे अलग-अलग समय और अलग-अलग जगहों से देखा जाए!

    इस तरह, उसी रास्ते उसके पहले छोर मतलब अपने गाँव की सड़क से दुबारा कई हजार किलोमीटर की यात्रा की!

    वापसी के इस क्रम में ज्ञानरंजन जी के चलते उनकी ‘पहल’ पर यह पहला मौका था जब पत्रकारिता के इलाके से बाहर भी कदम रखा था।

    उन्होंने हिन्दी साहित्य की पुस्तक ‘पहल’ के 112वे अंक में मेरा पहला कथा-संस्मरण प्रकाशित किया।

    उजाड़-कथाओं की वह प्रथम प्रस्तुति उस विशेष स्थान से थी जहाँ संघर्ष की ईमानदारी की एकमात्र परिभाषा होती है।

    संघर्ष, यानी पूरी ईमानदारी से जंगल में जीने का।

    संघर्ष, यानी पूरी ईमानदारी से मैदानी इलाकों में काम तलाशने का।

    बाहरी घुसपैठियों के नियोजित कुकर्मों के बावजूद वहाँ जिनकी आस और सादगी जीवन की पूँजी होती है।

    अपनी इस दुनिया से भिन्न उस दुनिया के लोगों की बाते मैं इसलिए भी पूरे अनुशासन और ध्यान से सुन सका, और कह सका था, क्योंकि उन्होंने भी हर बार पूरे अनुशासन और ध्यान से मेरी बातें सुनी, और अपनी बातें कही थीं।

    Reply
  7. राजकुमार सोनी says:
    2 months ago

    रवि भूषण जी ने बड़ी मेहनत के साथ
    यह लेख लिखा है.आलेख में बेहद महत्वपूर्ण डिटेल है.
    रवि भूषण जी को बधाई और ज्ञानरंजन जी को शुभकामनाएं.

    Reply
  8. सियाराम शर्मा says:
    2 months ago

    रविभूषण जी की तरह अत्यंत संवेदनशील और गंभीर आलोचक का हिंदी में अभाव है । वे टिक कर , मनोयोग और पूरी दृष्टि संपन्नता के साथ कार्य करते हैं । उनकी तैयारी चकित करती है।उनमें बौद्धिक हड़बड़ी नहीं है। एक विशेष समय और संदर्भ में हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता में ‘पहल ‘की ऐतिहासिक भूमिका और ज्ञान रंजन की प्रतिबद्धता, वैचारिक सलंग्नता एवं तीक्ष्ण संपादकीय विवेक का जैसा विशद और व्यापक मूल्यांकन उन्होंने किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए रवि भूषण जी को बहुत-बहुत बधाई और ज्ञान जी को जन्म दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

    Reply
  9. देवेंद्र पाठक महरूम says:
    2 months ago

    मुझे मेरे कथाकार व्यक्तित्व को काल कवलित होने से बचाया आपने ज्ञानदा, जब मेरे प्रथम उपन्यास कोहड़पने में लगे थे एक बड़े प्रकाशक। पहल ने मुझे लेखक बनने की सही दिशा दी। नये लेखकों को रौशनी में लानेवाले ज्ञानदा आप स्वस्थ रहते हुये उम्र का शतक पूरा करें। मेरी हार्दिक शुभेच्छायें , बधाई!

    Reply
  10. देवी प्रसाद मिश्र says:
    2 months ago

    ज्ञान जी के 89 वें जन्मदिन के अवसर पर रविभूषण जी के लेख के बहाने मैं कुछ बातें ज्ञान जी के बारे में कहना चाहता हूं। पहली बात तो यह है कि अगर किसी कथाकार में इलाहाबाद का कटखनापन, असहमति, आवारगी और एक विद्रोही एलिशनेशन था तो वह ज्ञान जी ही थे। वह भारतीय राज्य से ऊब की कहानी लिख रहे थे और पीढ़ियों के भटकाव की। एक पथ था जो उतना कुपथ न भी हो तो विपथित होने की आत्म-भर्त्सना – SELF- ABNEGATION और किसी का सिर न तोड़ पाएँ तो बहुत ज़ोर से अपना ही पैर पटकने की रुला देने वाली अनुगूँजें वहाँ थीं। वे कथाएँ अपने नागरिक अस्तित्व के अधूरेपन की बेबसी और कराहें थीं- घनघोर पश्चाताप कि किस तरह हो कि हम नेशनबिल्डिंग में शामिल हो सकें जिसकी सूरत देश को बहुत आधे-अधूरे तरीके से बनाते-बिगाड़ते कांग्रेसी तंत्र ने ख़ासी विद्रूप कर रखी थी।

    यह कुछ दशकों पहले के भारत का हवाला है। ज्ञान जी की कथाओं में फैले अंधेरे में बेध देने वाला युगीन परिहास भी था जो निराशावाद के गर्त में जाने से बचाए रखता था। ज्ञानरंजन को इसीलिए बार-बार पढ़ने ही नहीं पुनराविष्कृत करने का मन भी होता रहता है। तो वे किसी टाइमफ्रेम में ठहरी कहानियाँ नहीं हैं, वे निम्न मध्यवर्ग के डूबने – उतराने की सततजीवी अंतर्कथाएँ हैं। नीलाभ ने मुझे ज्ञान जी से अपने घर के विस्तृत लॉन की घास पर मिलवाया था – सर्दियों की दोपहर में। वह जबलपुर से आए हुए थे। नीलाभ और उनके कहने पर मैंने उन्हें तीन – चार कविताएँ सुनाईं जिन्हें उन्होंने पहल में छापा । उसके बाद मैं कितनी ही बार छपा। शायद इसलिए भी कि ज्ञान जी बिना किसी भोंपू के नवजागरण वाला काम कर रहे थे। मेरी सुचिंतित थियरी है कि ज्ञान जी ने हिंदी प्रदेश में लगभग न दिखते लेकिन बहुत महसूस किए जाते और मानस को व्यापक तौर पर प्रभावित करने वाली बौद्धिक नवजागरण की ताकतों को उन्मोचित किया और पहल को उसका केंद्रीय संवाहक बना दिया। यह सोचने और बेचैन होने वालों के जुटान का काम था – जो जनविरोधी सत्ता है और जो छूँछ शब्दवाद है उस के प्रतिरोध को संयोजित और संचालित करने का काम ।

    पहल पत्रिका साहित्यिक उठान को तो संभव बना ही रही थी, वह युगीन अंतर्वस्तु को खोज रही थी। अंतर्वस्तु को नियंत्रित नहीं, उत्प्रेरित संयोजित और प्रसारित करने का काम ज्ञान जी लगभग अकेले दम कर रहे थे। ज्ञान जी से मैं बहुत कम मिला । मिलो तो ज्ञान जी बेहद अकेले और अजीब तरह से लजाए होते थे। हिंदी की महान् पत्रिका का संपादक होने के बावजूद न तो उनका कोई ठसका था और न किसी तरह का अहंवाद ।

    ज्ञान जी के कथाकार व्यक्तित्व में अराजक विद्रोह की छटाएँ हैं। पहल में वह विचारधारा के साथ खड़े होते हैं। इस दावेदारी के साथ कि भारतीय मनुष्य के हक की उपेक्षा नहीं जा सकती और जनोन्मुख अंतर्वस्तु अधिक कलात्मक, विश्वसनीय, मानवीय, पठनीय, उद्भावक और उन्मेषकारी होती है। पहल ने प्रतिकार की बड़ी संस्कृति रची और भारतीय मनुष्य के पक्ष में खड़ी होने वाली चेतना को बहुत कृतिकार तरीक़े से संवर्द्धित किया।

    कई बार ज्ञानरंजन को लेकर यह सवाल खड़ा किया जाता है कि पहल निकाल कर वह अपने कथाकार का पश्चाताप कर रहे हैं। यह किसी उथले विश्लेषण की बानगी भर है। ज्ञान जी ने अपनी कथाओं में नागरिकता की जिन सीमितताओं को विवृत किया था, पहल के जरिए उन्होंने एक विजन की ओर बढ़ना शुरू किया जो कथाओं की ऊब और अवसाद और चिढ़ और निरुपायता और बेकली और विचलन और भटकाव की सीमाबद्धता को ढहा दे। रविभूषण जी का लेख उनके अवदान को और उनकी बेचैनी को गहरे विवेक के साथ अग्रसारित करता है। ज्ञान जी सौ बरस जिएँ, यह दिली आकांक्षा और शुभेक्षा है।

    Reply
    • त्रिभुवन says:
      2 months ago

      बहुत ही अद्भुत और सटीक टिप्पणी।

      Reply
  11. विनय सौरभ says:
    2 months ago

    रविभूषण अपने किसी भी लेख में अतिशय परिश्रम करते हैं। पहल की भूमिका और महत्व पर यह कर्मेन्दु शिशिर के बाद दस्तावेजी काम है।

    Reply
  12. जयदेव तनेजा says:
    2 months ago

    विवेचना के निमंत्रण पर एक सेमिनार में हिस्सा लेने(सन् तो ठीक से याद नहीं शायद १९७५ के आसपास कभी रहा होगा)जबलपुर गया था।तब पहली और आख़िरी बार ज्ञानरंजन जी से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था ।उनसे उस आत्मीय और स्नेहिल मुलाक़ात की ऊष्मा आज तक स्मृतियों में बसी है।
    आज उनके जन्मदिन पर उनके स्वस्थ,सतत सक्रिय और शतायु होने की मंगलकामना करता हूँ ।

    Reply
  13. कल्लोल चक्रवर्ती says:
    2 months ago

    रविभूषण सर का यह लेख अद्भुत है। अभी कुछ ही दिन पहले मुक्तिबोध पर उनका लेख समालोचन में पढ़ रहा था। पहल की पूरी यात्रा का इस लेख में विस्तार से वर्णन है। रविभूषण जी और समालोचन का बहुत बहुत आभार।

    Reply
  14. Rajaram Bhadu says:
    2 months ago

    ज्ञान जी के जन्मदिन पर इससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता था। रविभूषण जी ने पहल की पूरी यात्रा को उसके समय के बरक्स प्रस्तुत कर दिया है जिसमें पहल ने रचनात्मक हस्तक्षेप किया था। सच में पहल का हर अंक मूल्यवान पुस्तक की तरह संग्रहणीय रहा है। मैं इस अवसर पर पहल सम्मान के साथ पहल व्याख्यानों की भी याद दिलाना चाहूँगा। साथ ही ज्ञान जी प्रणीत लघु पत्रिका आन्दोलन को व्यापकता और सक्रियता के लिए गठित राष्ट्रीय लघु पत्रिका समन्वय समिति और उसके चार राष्ट्रीय सम्मेलन भी इस संदर्भ में जोडे जाने चाहिए।

    बहरहाल, रविभूषण जी और समालोचन का शुक्रिया और ज्ञान जी को हार्दिक बधाई !

    Reply
  15. Sunil Prajapati says:
    2 months ago

    ज्ञान रंजन जी ने पचास वर्षों तक पहल नहीं निकली,इबादत की है, कुदरत ऐसी इबादत को बड़ी मुहब्बत से कबूल करता है???? ऐ खुदा मुझसे न लें मेरे गुनाहों का हिसाब,मेरी झोली में मुहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं?? ज्ञान जिस दिन लगेगी अदालत ए इश्क एक तुम ही चुने जाओगे सजा के लिए????*****”” किसी से फिर प्यार न कर बैठना खुदा के लिए??

    Reply
  16. Amit shaw says:
    2 months ago

    सबसे पहले रविभूषण सर को इस उत्तम कोटि के लेख के लिए हार्दिक बधाई! इस लेख में आपके वर्षों का परिश्रम और अनुभव स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। पहल’ का प्रत्येक अंक बहुमूल्य है। उसे संजोकर रखने भर से उसकी उपयोगिया व महत्व सिद्ध नहीं हो जाती, बल्कि आवश्यकता है बारीकी से उसका अध्ययन और विश्लेषण किया जाए। साहित्यिक पत्रकारिता के विकास में पहल की भूमिका की तलाश की जाए। इसके लिए चर्चा-परिचर्चा की जरूरत है। पहल लघु पत्रिका आंदोलन एवं वामपंथी पत्रिकाओं की मार्गदर्शिका रही है। उसकी वैचारिकी मार्क्सवाद के प्रति प्रतिबद्ध रही है। और मार्क्सवाद मजदूरों, किसानों, उपेक्षितों की बात करता है, समानता की बात करता है। पहल ने हर विधाओं को अपने अंकों में स्थान दिया। केवल वैचारिक, कविता या कहानी की पत्रिका बन कर नहीं रह गई। पहल पुस्तिकाएँ भी पहल के किसी अंक से कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसलिए पुस्तिकाओं पर अलग से शोध किया जा सकता है।
    पहल के पहले अंक का संपादकीय पढ़ने के दौरान ‘चिली’ को लेकर अनभिज्ञ था। गूगल का सहारा लिया, लेकिन कुछ ख़ास हाथ नहीं लगा। आज इस लेख को पढ़ने के बाद चिली को लेकर जो धुंध था, वो थोड़ा साफ़ तो जरूर हुआ है। और कुछ नए तथ्यों से रू-ब-रू हुआ हूँ। यह लेख मेरे शोध कार्य के लिए सहायक होगा। सर को बहुत -बहुत साधुवाद!🙏

    Reply

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2023 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक