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समालोचन

Home » रिडिप्लॉयमेंट : फिल क्ले : अनुवाद: आयशा आरफ़ीन

रिडिप्लॉयमेंट : फिल क्ले : अनुवाद: आयशा आरफ़ीन

फिल क्ले की कहानी ‘Redeployment’ युद्ध से लौटे एक सैनिक के अनुभवों पर केंद्रित है. यह कहानी केवल सैनिक जीवन के बाहरी वृत्त तक सीमित नहीं रहती; बल्कि घर लौटने की प्रक्रिया में उत्पन्न होने वाली उन नैतिक उलझनों को उभारती है, जिनमें सैनिक स्वयं को फँसा हुआ पाता है, जहाँ रोज़मर्रा की हिंसा साधारण लगने लगती है और घरेलू जीवन धीरे-धीरे अजनबी हो जाता है. यह उन नाज़ुक और विरोधाभासी जीवन-स्थितियों और नैतिक शब्दावलियों की पड़ताल करती है जिनके साथ सैनिक लौटने के बाद जीने की कोशिश करते हैं. घर वापसी के बाद भी उनका युद्ध समाप्त नहीं होता. इसी कारण कथाकार आयशा आरफ़ीन ने इसे ‘घर वापसी’ कहा है. एक ऐसी वापसी जो वास्तव में कभी पूरी नहीं होती. अनुवाद में प्रवाह, तीक्ष्णता और तनाव बरकरार है. प्रस्तुत है यह कहानी.

by arun dev
December 3, 2025
in अनुवाद
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रिडिप्लॉयमेंट : फिल क्ले : अनुवाद: आयशा आरफ़ीन
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घर वापसी
फिल क्ले


अनुवाद: आयशा आरफ़ीन

हमने कुत्तों को मारा. अनजाने में नहीं, सोच-समझ कर गोली मारी और इसे ‘ऑपरेशन स्कूबी’ का नाम दिया. इस बारे में मैंने बारहा सोचा क्योंकि मुझे कुत्ते पसंद हैं.

पहली बार स्वाभाविक था. मैंने ओ’ लियरी के मुँह से यक-ब-यक सुना, ‘जीज़स’. एक मरियल-सा भूरा कुत्ता ख़ून इस तरह सुड़क रहा था जैसे प्याली से पानी पीता हो. यह अमेरिकियों का ख़ून नहीं था लेकिन फिर भी वह कुत्ता उसे पीये जा रहा था. यह शायद इंतिहा थी. फिर हमने उन कुत्तों पर गोलियाँ बरसानी शुरू कर दीं.

उस वक़्त आप इस बारे में नहीं सोचते हैं. आप यह सोचते हैं कि उस मकान में कौन है, उसके पास कौन से हथियार हैं, वह आपकी और आपके दोस्तों की जान कैसे लेने वाला है. आप बंकर में एक ब्लॉक से दूसरे ब्लॉक तक, पाँच सौ पचास मीटर मारक क्षमता वाली राइफ़लों से लोगों को पाँच-पाँच के जत्थों में मार देते हैं.

सोचना समझना तब की बात है, जब वे लोग आपको यह मौक़ा देते हैं. कहने का मतलब यह है कि ऐसा नहीं है, आप जंग से निकले और सीधे जैकसनविले मॉल पहुँच गए. जब हमारी तैनाती ख़त्म हुई, उन्होंने हमें TQ में रखा था. TQ एक बंदोबस्त-विभाग है जो रेगिस्तान में है. जब तक हम वहाँ थे, इत्मीनान से थे. इस इत्मीनान के क्या मानी हैं इससे मैं बेख़बर हूँ. इत्मीनान से हमारा मतलब यह था कि हमें वहाँ शावर के नीचे बे-इंतिहा मास्टर्बेशन की आज़ादी थी. हम ख़ूब सिगरेट पीते और दिन भर ताश खेलते. और फिर हमें कुवैत भेज कर कमर्शियल एयरलाइन से घर रवाना किया गया.

तो लो जी आप पहुँच गए. आप बकवास जंगी इलाक़े में थे और अब इस वक़्त आलीशान कुर्सी पर बैठे एक छोटे से नॉज़ल को एयर कंडिशनिंग का काम आसान करते हुए देख कर सोचते हैं, क्या बकवास है. आपके दोनों घुटनों के दरमियान एक राइफ़ल है, जैसा कि दूसरों के पास भी है. कुछ फ़ौजियों के पास तो M9 पिस्तौल है, मगर आप से आपकी संगीन भी छीन ली जाती है क्योंकि आपको जहाज़ में चाक़ूओं को ले कर जाने की इजाज़त नहीं है. आप नहाये हुए हैं तो भी गंदे और मरियल से लगते हैं. सभी की आँखें धँसी हुई हैं, उनकी वर्दियों की हालत बहुत ख़राब है और आप वहाँ बैठते हैं, आँखें बंद करते हैं और सोचते हैं.

मसला यह है कि आपके ख़यालात सीधी लकीर में नहीं चलते. आप यह नहीं सोचते कि मैंने क किया, फिर ख किया, ग किया और फिर घ किया. आप अपने घर के बारे में सोचने की कोशिश करते हैं मगर फिर आप उस टॉर्चर रूम में होते हैं. आप लॉकर में रखे हुए जिस्म के टुकड़ों को देखते हैं और पिंजरे में उस पागल लड़के को. वह एक मुर्ग़ी के बच्चे की तरह चीख़ा. उसका सर एक नारियल के आकार जितना सिकुड़ गया था. आपको कुछ वक़्त लगता है यह याद करने में कि डॉक्टर कह रहा था कि उसकी खोपड़ी में उन्होंने पारा डाल दिया था. अब तक यह बात आपकी समझ से परे है.

आप उन चीज़ों को देखते हैं जो आपने उस वक़्त देखी जिस वक़्त आप मरने की कगार पर थे. वह टूटी टीवी और वह हाजी की लाश. ख़ून में लिथड़ा हुआ इकोल्ज़. रेडियो पर बोलता हुआ लेफ्टिनेंट.

आप उस लड़की को देखते हैं, जिसकी तस्वीरें कर्टिस को मेज़ की दराज़ में मिली थीं. पहली तस्वीर में एक खूबसूरत इराक़ी बच्ची थी, तक़रीबन सात या आठ साल की रही होगी. वह नंगे पैर थी और उसने एक अच्छी-सी सफ़ेद रंग की ड्रेस पहन रखी थी जैसे उसका अक़ीक़ा हो. दूसरी तस्वीर में वही लड़की लाल ड्रेस, ऊँची एड़ी के चप्पल पहने हुए थी और उसने ख़ूब मेक-अप किया हुआ था. अगली फ़ोटो में कपड़ा वही है मगर उसका चेहरा धब्बों से भरा है और उसने अपने हाथ में एक बंदूक उठा रखी है.

मैंने दूसरी चीजों के बारे में सोचने की कोशिश की, जैसे मेरी बीवी चेरल के बारे में. उसकी रंगत ज़र्द थी और उसके बग़ल में मुलायम काले बाल थे. उनसे उसे शर्म आती थी मगर वे नाज़ुक और मुलायम थे.

मगर चेरल के बारे में सोच कर, मैंने अपने आपको गुनाहगार-सा जाना. इसलिए मैंने लेन्स कोर्पोरल हर्नानडेज़, कोर्पोरल स्मिथ और इकोल्ज़ के बारे में सोचा. मैं और इकोल्ज़ भाइयों की तरह थे. एक दफ़ा हमने इस फ़ौज की टुकड़ी को बचाया था. कुछ हफ़्तों के बाद इकोल्ज़ एक दीवार पर चढ़ता है. वह आधे रास्ते में ही था कि एक बाग़ी ने अचानक खिड़की से उसकी पीठ पर गोली चला दी.

अब मैं उन सारी बातों के बारे में सोच रहा हूँ. मैं उस पागल को, उस लड़की को, और उस दीवार को जहाँ इकोल्ज़ ने दम तोड़ा था, देख रहा हूँ. मगर बात यह है कि मैं उन बेहूदा कुत्तों के बारे में बहुत सोच रहा हूँ, मेरा मतलब है कि बहुत ही ज़्यादा सोच रहा हूँ.

मैं अपने कुत्ते, विकर, के बारे में सोच रहा हूँ और उस घर के बारे में जहाँ से हम उसे लाये थे. इस मौक़े पर चेरल ने कहा था हमें उम्र में बड़ा कुत्ता लेना चाहिए क्योंकि बड़े कुत्तों को कोई नहीं ख़रीदता. उसे पता नहीं हम क्यूँ कुछ भी नहीं सिखा पाये. अब वह उस चीज़ को कैसे उगले जो उसे खानी ही नहीं चाहिए थी. जब उसकी ग़लती होती तो कैसे वह दुम दबा कर, सर झुका कर, पिछली टाँगो को मोड़कर चुपके से खिसक जाता था. कैसे उसके बाल उसको ख़रीदने के दो सालों के बाद ही सफ़ेद होने लगे थे और उसके चेहरे पर इतने सफ़ेद बाल थे कि वे मूँछों जैसे लगते थे.

तो यह बात रही. विकर से ऑपरेशन स्कूबी की दास्तान और मेरे घर तक का सफ़र.

मैं ठीक से नहीं कह सकता, मगर हो सकता है कि आप लोगों को मारने के लिए तैयार हों. आप इंसानी शक्ल के टार्गेट पर अभ्यास करते हैं ताकि आप तैयार हो जाएँ. यक़ीनन हमें टार्गेट मिलते हैं जिन्हें हम ‘डॉग टार्गेट’ कहते हैं. टार्गेट, डेल्टा (अमरीकी फ़ौज में विशिष्ट ऑपरेशन फ़ोर्स) को आकार देता है. मगर वे कमबख़्त कुत्तों जैसे नहीं दिखते.

और इनसानों को मारना भी कोई आसान काम नहीं. बूट कैंप से निकलते ही फ़ौजी इस तरह पेश आने लगते हैं जैसे रेम्बो खेलने निकले हों. मगर यह आम तौर पर बेहद संजीदा और पेशेवराना काम है. हमने एक बाग़ी को मौत की कगार पर देखा, काँपते हुए, मुँह से झाग निकालते हुए, लगभग ख़त्म ही हो चुका था मानिए. उसकी छाती और पेडू में 7.62 से मारा गया था; वह एक लम्हे में मर जाता मगर फिर XO कंपनी आ पहुँची, उसका जंगी चाक़ू खींचा और उसी से उसका गला रेत दिया. कहा गया कि, ‘एक आदमी को चाक़ू से मारना बेहतर होता है’. सारे फ़ौजियों ने एक दूसरे की तरफ़ ऐसे देखा मानो कह रहे हों, ‘यह क्या बकवास था?’ XO से हमें यह उम्मीद नहीं थी. ये साले छोटे रैंक के फ़ौजी!

हवाई जहाज़ में मैंने इस बारे में भी सोचा.

यह बेहद मज़ाहिया है कि आप वहाँ राइफ़ल को अपने हाथों में लिए बैठे हैं और गोलियों का कहीं अता-पता नहीं. आप आयरलैंड में ईंधन के लिए उतरते हैं. वहाँ इतनी धुंध है कि कुछ भी नज़र न आने के बावजूद आपको पता है कि यह आयरलैंड है और यहाँ बीयर का इंतजाम ज़रूर होगा. और वह जहाज़ का कप्तान, कमबख़्त एक आम आदमी हमें अपने फ़ौजी उसूल पढ़कर सुनाता है कि ऐसा मान लिया जाए कि हम अब भी ड्यूटी पर हैं और हमें अमरीका पहुँचने तक शराब नहीं मिल सकती.

तभी हमारा कंपनी अफ़सर बीच में आ टपका और बोला, ‘यह बात इतनी ही बेमानी है जितना कि फ़ुटबाल को बैट से खेला जाना. ठीक है, जवानों, आपके पास तीन घंटे हैं. मैंने सुना है ये लोग गिनस शराब बेचते हैं. अफ़सर विसर्ट ने एक बार में पाँच बोतलें ऑर्डर कीं और उनकी नुमाइश लगा दी. उसने एक घूंट भी नहीं पी, बस मसर्रत से उन्हें निहारता रहा. ओ’ लियरी ने कहा, ‘देखो अपनी तरफ़, ऐसे मुसकुरा रहे हो जैसे गुड़ को उसका सामान मिल गया हो. इस तरह कि गालियाँ कर्टिस को बेहद पसंद थीं, इसलिए वह हँसा और बोला, क्या भयानक सामान रहा होगा. और हम सब हँसने लगे, यह जानते हुए कि हमें कभी भी मारा जा सकता है, इसकी परवाह किए बग़ैर, हम बस ख़ुश थे.

हम पुरजोश थे. हम में से ज़्यादातर लोगों का वज़न बीस पाउंड तक गिर गया था और शराब की एक बूंद के लिए हम सात महीनों से तरस रहे थे. मैकमेनिगन, जो एक छोटे ओहदे पर था, अपने सामान को वर्दी से निकाले, शराबख़ाने के चक्कर काट रहा था और फ़ौजियों से कह रहा था, ‘मेरे सामान की तरफ़ घूरना बंद करो, सालों’. लांस कोर्पोरल स्लोटर बाथरूम में उल्टी करने से आधे घंटे पहले तक वहाँ मौजूद था और कोर्पोरल क्रेग उसकी मदद कर रहा था, जो ऐसा मोर्मोन [एक ईसाई पंथ का नाम] था जिसे अभी चढ़ी नहीं थी और लांस कोर्पोरल ग्रीली, उसके बग़ल के स्टाल में उल्टी कर रहा था, जो नशे में धुत एक मोर्मोन था. यहाँ तक कि उस फ़ौजी दस्ते का सरदार भी शराब के नशे में मदहोश था.

यह सही था. हम जहाज़ पर वापस गए और फिर हमें कुछ याद नहीं. होश हमें सीधे अमरीका पहुँच कर आया.

हम जब चेरी पॉइंट पहुँचे तो वहाँ कोई नहीं था. आधी रात का वक़्त था और ठंड थी. हम में से आधे लोग अरसे बाद शराब उतरने का लुत्फ़ उठा रहे थे. उस वक़्त यह एक क़िस्म का ओछापन कहलाता मगर हमें इसमें मज़ा आ रहा था. हम जहाज़ से उतर गए, वहाँ एक विशाल और ख़ाली रनवे था. लैंडिंग में मदद करने वाले शायद आधा दर्जन रेड पेचर थे और सात टन का एक भंडार मौजूद था. मगर कोई परिवार नहीं था.

फ़ौजी दस्ते के सरदार ने कहा कि वे हमारा लज्यून में इंतज़ार कर रहे थे. जितनी जल्दी हम ट्रकों में सामान लोड करेंगे उतनी ही जल्दी हम उनसे मिल पाएंगे.

समझे जवानों! हमने काम के लिए जत्थे बनाए और अपने थैले और बाक़ी बस्तों को उस सात टन के भंडार में डाल दिया. बहुत मेहनत का काम था इसलिए ठंड में भी हमारे ख़ून की गर्दिश बढ़ गई. पसीने के साथ शराब भी बह रही थी.

फिर कुछ बसों का इंतज़ाम किया गया जिसमें हम सवार हुए. साथ में हमारा सामान ठूस दिया गया और M16 हर तरफ़ लटका दिये गए. बंदूकों का मुँह किस तरफ़ है, हमने इसकी भी कोई परवाह नहीं की.

चेरी पॉइंट से लज्यून का सफ़र एक घंटे का है. शुरुआत का सफ़र दरख़्तों के बीच से हो कर गुज़रता है. आप अंधेरे में ज़्यादा कुछ देख नहीं पाते. 24 (नॉर्थ कैरोलिना हाइवे) पर पहुँचते हैं तब भी नहीं. दुकानें अभी तक नहीं खुली हैं. गैस स्टेशन और शराब ख़ानों की नियोन लाइटें भी अभी बंद हैं. बाहर देखने पर, मुझे मालूम था मैं कहाँ हूँ मगर मुझे महसूस ही नहीं हुआ कि मैं घर आ गया हूँ. मैं समझ गया घर को मैं तब महसूस कर पाऊँगा जब मैं अपनी बीवी और अपने कुत्ते को चूम सकूँगा.

हम लज्यून में बग़ली दरवाज़े से दाख़िल हुए, जो कि हमारी बटालियन से दस मिनट के फ़ासले पर था. पंद्रह, मैंने अपने आप से कहा, यह साला गाड़ी ऐसे चला रहा है. हम जब मैकह्युग पहुँचे, सभी थोड़े जोश से भर गए. और फिर ड्राइवर ‘अ’ गली पर मुड़ गया. बटालियन का इलाक़ा ‘अ’ पर था, और मैंने फ़ौजियों के लिए बनाए गए घरों को देखा और सोचा कि यह तो रहा. और फिर वे चार सौ मीटर के फ़ासले पर रुक गए. ठीक हथियार-घर के सामने.

जहाँ हमारे परिवार थे, मैं वहाँ दौड़ कर जा सकता था. मैं देख पा रहा था, फ़ौजियों के घरों के पीछे एक जगह थी जहाँ उन्होंने रौशनियाँ लगाई थीं. और हर जगह कारें खड़ी थीं. मैं यहाँ से भीड़ की आवाज़ सुन पा रहा था. हमारे परिवार वहाँ थे. मगर हम क़तार में खड़े, उनके बारे में सोचते रहे. मैं, चेरल और विकर के बारे में सोच रहा था. और हम इंतज़ार करते रहे.

हालाँकि जब मैं खिड़की के पास पहुँचा और अपनी राइफ़ल सौंपी, मेरी हालत ख़राब हो गई. यह पहला मौक़ा था जब मैं इससे कई महीनों बाद अलग हो रहा था. मुझे समझ नहीं आया कि मैं अपने हाथ कहाँ टिकाऊँ. पहले मैंने उन्हें अपनी जेब में डाला, फिर मैंने उन्हें जेब से बाहर निकाला और अपनी बाँहों का घेरा बना लिया, और फिर उन्हें ऐसे ही अपने दोनों तरफ़ झूलते रहने दिया.

जब सारी राइफलें जमा हो गईं, तो फ़र्स्ट सार्जेंट (अफ़सर) ने हमारी परेड करवा दी. हमारे सामने फ़ौज का झण्डा लहरा रहा था और हम ‘अ’ गली की तरफ़ क़दम से क़दम मिलाते हुए चलते गए. जब हम पहले घर के किनारे पहुँचे, तो लोगों ने ख़ुशी से चिल्लाना शुरू कर दिया. मैं उन्हें तब तक नहीं देख पाया जब तक कि हम रास्ते के कोने में न मुड़ गए हों. वे सब वहाँ थे, एक बड़ा मजमा बाहरी रौशनियों में हाथों से लिखी हुई तख्तियाँ पकड़े, हमारी तरफ़ बढ़ा आ रहा था. आँखों में चुभने वाली रौशनियाँ सीधे हमारे मुँह पर पड़ रही थीं. ऐसे में भीड़ में कौन-कौन है, यह पहचानना मुश्किल हो गया था. बग़ल में पिकनिक की टेबलें थीं और एक फ़ौजी वूडलेंड पहने हॉट डॉग पका रहा था. एक हवा से भरा हुआ ढाँचा भी था. एक बेकार-सा बाउन्सी कासल.

हम क़दम से क़दम मिलाकर चलते रहे. कुछ फ़ौजी अपने वूडलेंड्स में थे और भीड़ को पीछे हटाने का काम कर रहे थे. हम तब तक चलते रहे जब तक कि हम भीड़ के साथ न चलने लगे. फिर फ़र्स्ट सार्जेंट ने हमें रुक जाने का हुक्म दिया.

मैंने कुछ टीवी कैमरों को देखा. वहाँ बहुत सारे अमरीकी झंडे थे. पूरा मैकमेनिगन परिवार वहाँ बीचों बीच मौजूद था, एक बैनर को थामे हुए जिस पर लिखा था: हुर्रे प्राइवेट फ़र्स्ट क्लास ब्रैडले मैकमेनिगन. हमें बहुत नाज़ है.

मैंने भीड़ को परखा. कुवैत पहुँच कर मैंने चेरल से थोड़ी देर के लिए ही बात की थी. बस यही कहा कि मैं ठीक हूँ और यह कि, ‘अड़तालीस घंटों के अंदर FRO से बात करो, वह तुम्हें बताएगा कि वहाँ कब पहुँचना है’. उसने कहा वह वहाँ पहुँच जाएगी, मगर फ़ोन पर यह सब अजीब जान पड़ता था. मैंने उसकी आवाज़ बहुत वक़्त से नहीं सुनी थी.

फिर मैंने इकोल्ज़ के पिता को देखा. उनके पास भी एक साइन था. उस पर लिखा था: ब्रावो कंपनी के वीरों, तुम्हारा स्वागत है. मैंने सीधे उनकी तरफ़ देखा और मुझे वह लम्हा याद आया जब हम यहाँ से निकले थे और मैंने सोचा, ‘यह इकोल्ज़ के पापा हैं’. उसी वक़्त उन्होंने हमें जाने दिया. उन्होंने भीड़ को भी जाने दिया.

मैं वहीं चुपचाप खड़ा था और मेरे गिर्द खड़े फ़ौजी, कर्टिस, ओ’ लियरी, मैकमेनिगन, क्रेग और विसर्ट, वे सभी भीड़ की तरफ़ भाग रहे थे. और भीड़ आगे की तरफ़ बढ़ रही थी. इकोल्ज़ के पिता भी आगे बढ़ रहे थे.

वह जिस फ़ौजी के पास से गुज़र रहे थे उससे हाथ मिलाते जा रहे थे. मुझे नहीं लगता ज़्यादातर लड़के उन्हें पहचान भी रहे थे, मुझे मालूम था कि मुझे उनसे कुछ कहना चाहिए मगर मैंने कुछ नहीं कहा. मैं पीछे हट गया. मेरी नज़रें मेरी बीवी को तलाश रही थीं. फिर मैंने अपना नाम एक साइन पर देखा. उसमें लिखा था: सार्जेंट प्राइस. मगर बाक़ी का हिस्सा भीड़ की वजह से नज़र नहीं आया और मुझे यह भी नहीं मालूम हुआ कि साइन किसने पकड़ा हुआ था. और फिर मैं, इकोल्ज़ के पिता, जिन्होंने कर्टिस को गले लगाया हुआ था, से दूर उसकी तरफ़ बढ़ रहा था. और मैंने वह बाक़ी का साइन देखा. उसमें लिखा था: सार्जेंट प्राइस, अब जबकि तुम घर आ गए हो, तुम कुछ काम कर सकते हो, और यह है तुम्हारे हिस्से के कामों की लिस्ट. 1) मैं. 2) नंबर एक को दोहराओ.

 

pinterest से आभार सहित

2)

और वहाँ, वह साइन पकड़े, चेरल खड़ी थी.

ठंड होने के बावजूद उसने केमी शॉर्ट्स और टैंक टॉप पहना था. ये सब उसने मेरे लिए पहने होंगे. वह पहले से दुबली हो गई थी. ज़्यादा मेक-अप भी लगाया हुआ था. मैं थका हुआ और बेचैन था और वह कुछ अलग-सी नज़र आ रही थी. मगर वह वही थी.

हमारे चारों ओर परिवार थे, उनकी बड़ी-बड़ी मुस्कुराहटें थीं और थके हुए फ़ौजी थे. मैं उस तक गया. उसने मुझे देखा और उसका चेहरा खिल उठा. एक लंबे अरसे से कोई औरत मेरी तरफ़ देख कर इस तरह नहीं मुसकुराई थी. मैं अंदर गया और मैंने उसे चूमा. मुझे लगा मुझे यही करना चाहिए था. मगर बहुत अरसा गुज़र चुका था और हम दोनों ही घबराए हुए थे और वह चुंबन ऐसा महसूस हुआ जैसे बस होंठ पर होंठ धकेल दिये गए हों. सही से कह नहीं सकता. वह पीछे हट गई, उसने मेरी तरफ़ देखा, अपने हाथ मेरे कंधों पर रखे और रोने लगी. वह ज़रा हटी और उसने अपनी आँखें मली और फिर उसने मुझे अपनी बाँहों में लेकर भींच लिया.

उसका बदन कोमल था और वह मेरी बाँहों में समा गई. मेरी तैनाती के दौरान मैं रोज़ या तो ज़मीन पर या कैनवस की चारपाइयों पर सोता था. मैं कवच पहने होता और मेरे बदन पर एक राइफ़ल टंगी होती. मैंने सात महीनों में उस जैसा कुछ भी नहीं महसूस किया था. मैं जैसे उसका लम्स लगभग भूल चुका था या फिर जैसे मैंने उसकी छुअन को कभी जाना ही नहीं था, और अब यह नया एहसास ऐसा था जैसे रंगों के सामने बाक़ी की सभी चीज़ें सफ़ेद और स्याह में तब्दील हो गई हों. फिर उसने मुझे आज़ाद किया और मैंने उसका हाथ थाम लिया. मैंने अपना सामान लिया और हम वहाँ से निकल आए.

उसने मुझसे पूछा क्या मैं गाड़ी चलाना चाहूँगा. मैं ज़रूर चलाना चाहता था, इसलिए ड्राइवर की सीट पर बैठ गया. मैं यह भी बहुत वक़्त के बाद कर रहा था. मैंने कार को पीछे लिया, बाहर निकाली और घर की तरफ़ जाने लगा. मैं सोच रहा था किसी अँधेरी जगह पर कार को रोक कर, उसके साथ कार की पिछली सीट पर हाई स्कूल के ज़माने की तरह बैठ जाऊँ. मगर मैंने कार को वहाँ से निकाला और मैकह्युग की तरफ़ चल पड़ा. मैकह्युग के रास्तों पर मोटर चलाना बस के उस तजुरबे से अलग था. यह लज्यून है. यह वही रास्ता है जहाँ से मैं अपने काम पर जाया करता था. यहाँ बहुत अंधेरा था और ख़ामोशी थी.

चेरल ने पूछा, ‘कैसे हो?’ जिसका मतलब था, ‘सब कैसा रहा?’ ‘क्या तुम अब परेशान हो?’

मैंने कहा, ‘बढ़िया. मैं ठीक हूँ’.

और फिर से ख़ामोशी छा गई. हम होल्कम की तरफ़ मुड़ गए. मुझे ख़ुशी थी कि मैं कार चला रहा था. इससे मेरा ध्यान केन्द्रित रहेगा. इस रास्ते चलो, फिर पहिया घुमाओ और दूसरे रास्ते पर चल दो. एक वक़्त में एक ही क़दम. आप कुछ भी हासिल कर सकते हैं, मगर एक वक़्त में एक ही क़दम.

उसने कहा, ‘मैं बहुत ख़ुश हूँ कि तुम घर आ गए’.

फिर उसने कहा, ‘मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ’.

फिर कहा, ‘मुझे तुम पर नाज़ है’.

मैंने कहा, ‘मैं भी तुमसे प्यार करता हूँ’.

जब हम घर पहुँचे उसने मेरे लिए दरवाज़ा खोला. मुझे तो यह भी नहीं मालूम था कि मेरे घर की चाबियाँ कहाँ हैं. विकर दरवाज़े पर मेरा इस्तक़बाल करने नहीं आया. मैं अंदर दाख़िल हुआ, चारों तरफ़ नज़रें दौड़ाईं और देखा वह वहाँ काउच पर बैठा था. जब उसने मुझे देखा वह आराम से उठा.

उसके बाल पहले के मुक़ाबले और भी सफ़ेद हो गए थे. उसके पैरों पर चर्बी के अजीब से गुच्छे थे. ये छोटे ट्यूमर थे जो लेब्रेडोर प्रजाति के कुत्तों को होते ही हैं मगर विकर पर अब ये ज़्यादा तादाद में हो गए थे. उसने अपनी पूँछ हिलाई. वह अपने काउच से वाक़ई में धीरे से उतरा जैसे उसे दर्द हो रहा हो. चेरल ने कहा, ‘यह तुम्हें याद करता है’.

‘यह इतना कमजोर क्यूँ हो गया?’ मैंने पूछा और मैंने झुक कर उसके कानों के पीछे खुजलाया.

‘जानवरों के डॉक्टर ने कहा है कि हमें इसका वज़न नियंत्रण में रखना होगा. आजकल यह खाते वक़्त उल्टी कर देता है’.

चेरल मेरा हाथ खींच रही थी. विकर से मुझे दूर ले जा रही थी. और मैंने उसे ऐसा करने दिया.

उसने कहा, ‘घर वापस आ कर अच्छा महसूस हो रहा होगा, है ना?’

उसकी आवाज़ काँप रही थी जैसे उसे यक़ीनी तौर पर जवाब न मालूम हो. मैंने कहा, ‘हाँ, हाँ सो तो है’. फिर उसने मुझे ज़ोर का बोसा दिया. मैंने उसे खींच कर अपनी बाँहों में भर लिया और उसे ऊपर उठा कर बेडरूम में ले गया. मेरे चेहरे पर खिलखिलाहट थी मगर वह काम न आई. वह उस वक़्त मुझ से कुछ डरी हुई लग रही थी. मेरे ख़याल से सभी की बीवियाँ शायद कुछ हद तक डरी हुई थीं.

और यही मेरी घरवापसी थी. लगता है सब ठीक ही रहा. वापस आने से वैसा ही महसूस होता है जैसे डूबने के बाद की पहली साँस का आना. हालाँकि इसमें तकलीफ़ होती है मगर अच्छा महसूस होता है.

मैं शिकायत नहीं कर सकता. चेरल ने सब कुछ अच्छे से संभाला हुआ था. मैंने लांस कोर्पोरल, कर्टिस की बीवी को जैकसन विले में देखा था. उसने उसकी सारी तनख्वाह उसके वापस आने से पहले ही ख़र्च कर दी थी और वह पाँच महीने की हामिला थी जो कि एक सात महीने से तैनात फ़ौजी के घर वापस आने पर, उतनी भी हामिला नहीं नज़र आती थी.

जब हम वापस आए, कोर्पोरल विसर्ट की बीवी तो वहाँ मौजूद ही नहीं थी. वह हँसा और बोला शायद उसे हमारे आने के वक़्त का पता न चल पाया हो, और ओ’ लियरी ने उसे घर तक छोड़ा था. वे वहाँ पहुँचे मगर घर ख़ाली था, सिर्फ़ लोगों से ही नहीं बल्कि सारी चीज़ों से: फर्नीचर, दीवार पर टंगी चीज़ें, सब कुछ. विसर्ट ने हक्का-बक्का होकर ये सब देखा, अपना सर झटका और हँसने लगा. वे लोग बाहर गए, कुछ शराब की बोतलें खरीदीं और वहीं अपने ख़ाली घर में टुन्न होकर पड़े रहे. विसर्ट पी कर सो गया था और जब वह उठा तो मैकमेनिगन उसके बग़ल में ज़मीन पर बैठा था. मैकमेनिगन ही वह इकलौता शख़्स था जिसने उसे तैयार किया और बेस पर वक़्त पर ले आया जहाँ वे लोग हमें यह सिखाते हैं कि, ख़ुदकुशी मत कर लेना, अपनी बीवियों को मत पीटना. और विसर्ट का यह कहना था, ‘मैं अपनी बीवी को पीट नहीं सकता क्योंकि मुझे तो यह भी नहीं मालूम कि वह कमबख़्त है कहाँ’.

उस हफ़्ते उन्होंने हमें एक 96 (किसी चीज़ को वॉलंटियर करने के लिए 96 घंटे या एक हफ़्ते में चार दिन की छुट्टी) दिया, और मैंने शुक्रवार को विसर्ट की जगह काम किया. वह लगातार तीन दिनों से पी रहा था, और ऐसे वहशियाना जश्न में मसरूफ़ था, जो शराब और अश्लील नाच, दोनों से भरा हुआ था. मैं उसे स्लोटर के घर पहुँचा कर, चार बजे अपने घर लौटा, मेरे आने से चेरल जाग गई. उसने कुछ नहीं कहा. मैंने सोचा वह मुझसे नाराज़ होगी और वह नाराज़ लग भी रही थी मगर जब मैं बिस्तर पर लेटा, वह मेरे पास सरक आई. हालाँकि मुझमें  से शराब की बू आ रही थी, उसने मुझे झप्पी दी.

स्लोटर ने विसर्ट को एडिस के यहाँ छोड़ा, एडिस ने ग्रीली के यहाँ, और इसी तरह चलता रहा. पूरे हफ़्ते, हममें से कोई ना कोई उसके साथ रहा जब तक कि हमें यह तसल्ली न हो गई कि वह ठीक है.

जब मैं विसर्ट या बाक़ी के दस्ते के साथ न होता तो विकर के साथ उन बेसबॉल खेलों को देखता जो चेरल ने मेरे लिए टेप करके रखे हुए थे. कभी-कभी मैं और चेरल उसके उन सात महीनों, उसके परिवार के बाक़ी लोगों, उसकी नौकरी, उसके बॉस और उन फ़ौजियों की बीवियों के बारे में जो घर पर रह गईं थीं, बातें करते. कभी वह कुछ सवाल करती. कभी मैं कुछ जवाब देता. मैं अमरीका आ कर ख़ुश था. अगरचे मेरे लिए पिछले सात महीने काफ़ी नागवार थे और मेरे वहाँ टिके रहने की वजह सिर्फ़ वे फ़ौजी, जिनके साथ मैंने काम किया और अपने घर वापस आने का ख़याल ही था, मुझे ऐसा महसूस होने लगा था जैसे मैं वहाँ वापस जाना चाहता हूँ. क्योंकि भाड़ में जाए ये सब.

अगले पूरे हफ़्ते आधे दिन का काम होता और फिर वही बकवास. जो लड़के अपने ज़ख़्मों को छुपा रहे थे या उन्हें झेल रहे थे, उन सब को डॉक्टरों के चक्कर लगाने पड़ते. दाँतों के डॉक्टरों के अपोइंटमेंट. प्रशासन. हर शाम, विकर और मैं काउच पर बैठे टीवी देखते, चेरल का इंतज़ार करते कि कब वह अपने टेक्सस रोडहाउस की शिफ़्ट पूरी करके घर लौटेगी.

विकर मेरी गोद में सर रख कर सोता और तब उठता जब मैं उसे झुक कर सलामी के छोटे-छोटे लुक़्मे खिलाता. जानवरों के डॉक्टर ने चेरल से कहा था यह इसके लिए बुरा है मगर वह कुछ अच्छा पाने का हक़दार है. मैं जब भी उसे सहलाता, ज़्यादातर उसके किसी ट्यूमर पर रगड़ लग जाती जिससे उसे दर्द होता. ऐसा मालूम होता जैसे उसे हर चीज़ में तकलीफ़ होती थी, पूँछ हिलाने में, खाना खाने में. चलने में. बैठने में. और जब वह उल्टी करता, जो कि वह हर दूसरे दिन करता था, ऐसे खाँसता जैसे उसका दम घुट रहा हो. बीस सेकंड तक वह तेज़ी से खाँसता रहता, फिर कुछ बाहर निकलता. मुझे वह शोर ज़्यादा परेशान करता था. क़ालीन साफ़ करने में मुझे कोई हर्ज नहीं था.

फिर चेरल घर आती और हमें देखती, अपना सर हिलाती, मुसकुराती और कहती, ‘मुझे तुम दोनों के लिए अफ़सोस है’.

मुझे विकर अपने इर्द-गिर्द चाहिए था मगर मैं उसकी तरफ़ देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था. शायद इसलिए जब चेरल मुझे उस हफ़्ते की छुट्टी के रोज़ घर से बाहर ले कर गई तो मैंने उसे ऐसा करने दिया. मैंने अपनी तनख्वाह ली और ढेर सारी ख़रीदारी की. इसी तरह अमरीका दहशतगर्दों के खिलाफ़ लड़ता है.

तो यह रहा एक तरह का तजुर्बा. आपकी बीवी आपको विलमिंगटन में शॉपिंग कराने ले जाती है. पिछली बार जब आप किसी शहर के रास्ते पर चलते थे, आपका साथी जवान ज़िम्मेदारी से रोड के उस तरफ़, सब कुछ चेक कर के, सामने की छतों को स्कैन करता हुआ निकलता था. उसके पीछे वाला फ़ौजी इमारतों के ऊपरी स्तरों की खिड़कियों को जाँचता, उसके पीछे वाला फ़ौजी खिड़कियाँ ज़रा नीचे करवाता, जब तक कि आपके लोग रास्ता न पार कर लें, और जो जवान आख़िर में रहता, उसका ध्यान पीछे की तरफ़ होता. शहर में ऐसी सैकड़ों जगहें हैं जहाँ से आप को मारा जा सकता है. पहले पहल आप डर जाते हैं. मगर आपकी ट्रेनिंग यहाँ काम आ जाती है.

विलमिंगटन में आपके पास न आपका दस्ता होता है, न आपके जंग के साथी, न ही आपके पास कोई हथियार होता है. आप डर के मारे उसे दस दफ़ा तलाश करते हैं मगर वह वहाँ नहीं होता. आप महफ़ूज़ हैं. आपको इस बात का इत्मीनान होना चाहिए कि आप ख़तरे से बाहर हैं, मगर ऐसा हो नहीं पाता.

बजाय इसके, आप अमरीकन ईगल आउटफिट्टर्स के कपड़ों में बंध कर रह जाते हैं. आपकी बीवी आपको कुछ कपड़े देती है और आप कपड़े पहन कर देखने के लिए ड्रेसिंग रूम की तरफ़ चल देते हैं. आप दरवाज़ा बंद करते हैं और फिर उसे खोलना नहीं चाहते.

बाहर, दुकानों के शीशों के आस-पास लोग ऐसे टहल रहे हैं जैसे कोई बड़ी बात है ही नहीं. वे लोग, जिनको कोई अंदाज़ा ही नहीं है कि फ़लूजा कहाँ है, आपके दस्ते के तीन फ़ौजी किस जगह मरे. लोग जिन्होंने अपनी सारी ज़िंदगी चैन से गुज़ारी है.

ऑरेंज क्या है, उनको तो यह कभी भी समझ में नहीं आएगा. आप तब तक इसे नहीं समझ सकते, जब तक कि आप पहले गोलाबारी में न फँसे हों, या पहली दफ़ा IED विस्फोट हुआ हो और आप बाल-बाल बचे हों, और आपको एहसास होता है कि हर किसी की ज़िंदगी, हर एक की ज़िंदगी इस पर निर्भर करती है कि आप कोई गड़बड़ न करें. और आप उन पर आश्रित हैं.

कुछ लड़के सीधे जोखिम उठाते हैं. वे कुछ देर तक ऐसे ही रहते हैं और फिर वे भिड़ जाते हैं, उनका डर ख़त्म हो जाता है, इस हद तक कि वे कहते हैं, अगर मर भी जाएँ, तो हमें कोई परवाह नहीं’. बाक़ी सब ज़्यादातर हर वक़्त ऑरेंज [अलर्ट] रहते हैं.

तो यह है ऑरेंज. आप वे सब नहीं देखते और सुनते जो आप देखा या सुना करते थे. आपके दिमाग़ की कैमिस्ट्री बदल जाती है. आप फ़ज़ा के हर एक पहलू को समझते हैं. मैं सड़क से साठ फुट की दूरी से एक सिक्के तक को देख सकता था. मेरे पास एंटेना था जो ब्लॉक तक फैला था. यह याद करना भी मुश्किल है कि वह सब कैसा महसूस होता था. मुझे लगता है आपके पास इतनी जानकारी इकट्ठी हो जाती है कि आप भूल जाते हैं. दिमाग़ में अगले लम्हे की उन सारी बातों के लिए, जो आप को ज़िंदा रखने वाली हैं, के लिए थोड़ी जगह बनाते हैं. फिर आप उस लम्हे को भी भूल जाते हैं और दूसरे लम्हे पर ध्यान देते हैं. फिर अगले पर. सात महीनों तक.

तो यह था ऑरेंज. और फिर आप विलमिंगटन में ख़रीदारी करने जाते हैं, निहत्थे, और आप सोचते हैं आप बेफ़िक्र हो जाएँ? इत्मीनान की साँस लेने में आपको एक लंबा अर्सा लगेगा.

 

pinterest से आभार सहित

3)

इस सब के बाद आख़िरकार मुझे सुकून हुआ. चेरल ने मुझे वापस घर जाते वक़्त कार चलाने नहीं दी. मैं सौ मील प्रति घंटे की रफ़्तार से कार चला सकता था. और जब हम वापस पहुँचे, हमने देखा विकर ने ऐन दरवाज़े के पास उल्टी की हुई है. मैंने उसे तलाश किया, वह काउच पर बैठा, अपने लरज़ते हुए पैरों से उठने की कोशिश कर रहा था. मैंने कहा, ‘ख़ुदारा, चेरल. वक़्त आ गया है’.

उसने कहा, ‘तुम्हें लगता है कि मैं नहीं जानती?’

मैंने विकर की तरफ़ देखा.

उसने कहा, ‘मैं इसे कल जानवरों के डॉक्टर के पास ले जाऊँगी’.

मैंने कहा, ‘नहीं’.

उसने अपना सर हिलाया. उसने कहा, ‘मैं इसे संभाल लूँगी’.

मैंने कहा, ‘तुम्हारा मतलब है मेरे कुत्ते को मारने के लिए तुम किसी गधे को पैसे दोगी’.

उसने कुछ नहीं कहा.

मैंने कहा, ‘यह इस तरह नहीं किया जाता. सब मुझ पर छोड़ दो’.

वह मुझे ऐसी कोमल नज़रों से देख रही थी कि मैं ख़ुद को संभाल नहीं पाया. मैं खिड़की के बाहर ख़ला में देखने लगा.

उसने कहा, ‘तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारे साथ चलूँ?’

मैंने कहा, ‘नहीं. नहीं’.

‘ठीक है’, उसने कहा. ‘यही ठीक होगा’.

वह विकर के पास गई, झुकी और उसे गले लगाया. उसके बाल उसके चेहरे पर बिखर गए इसलिए मैं यह देख नहीं पाया कि वह रो रही है या नहीं. फिर वह खड़ी हुई, बेडरूम की तरफ़ गई और हौले से दरवाज़ा बंद कर लिया.

मैं काउच पर बैठ गया और विकर के कानों के पीछे खुजलाने लगा. फिर मुझे एक तरकीब सूझी. कोई बहुत अच्छी तरकीब नहीं, बस एक तरकीब. कभी-कभार इतना ही बहुत होता है.

मैं जहाँ रहता हूँ उसके पास एक कीचड़ भरा रास्ता है और सड़क के उस पार एक नदी बहती है जहाँ डूबते सूरज के वक़्त रौशनी छन कर आती है. ख़ूबसूरत नज़ारा होता है. मैं उस तरफ़ कभी-कभी दौड़ने जाया करता था. मैंने सोचा यह इस काम के लिए सही जगह होगी.

ज़्यादा दूर नहीं है. हम वहाँ सूरज डूबने के वक़्त पहुँचे. मैंने रोड के किनारे गाड़ी पार्क की, ट्रंक से अपनी राइफ़ल निकाली, कंधों पर लटकाई, और कार के दूसरी तरफ़ गया. मैंने दरवाज़ा खोला और विकर को अपनी बाहों में उठा लिया और उसे नदी तक ले गया. उसका जिस्म भारी और गर्म था और जब मैं उसे ले जा रहा था, वह मेरा मुँह चाट रहा था, मंद और सुस्त तरीक़े से. यह कुत्ता सारी उम्र ख़ुश रहा है. जब मैंने उसे नीचे उतारा और वापस जाने को हुआ, उसने मेरी ओर देखा. उसने अपनी पूँछ हिलाई. और मैं शल पड़ गया.

एक और दफ़ा मैं इसी तरह हिचकिचाया था. फ़लूजा को पार करके एक बाग़ी हमारी सीमाओं से गुज़रा था. जब हमने शोर मचाया और सबको आगाह किया तो वह ग़ायब हो गया. हम घबरा गए, हर तरफ़ तब तक तलाश करते रहे, जब तक कर्टिस ने उस पानी के हौज़ में न झाँका था जिसे हम मल इकट्ठा करने के काम में लाते थे. वह दरअसल एक बड़ा सा, गोलाकार डब्बा था जिसका एक चौथाई हिस्सा तरल पाख़ाने से भरा था.

वह बाग़ी उसमें तैर रहा था, उसी मल में छुपा था और सिर्फ़ साँस लेने के लिए बाहर आ रहा था. यह नज़ारा ऐसा था जैसे एक मछली पानी की सतह पर बैठे किसी पतंगे को पकड़ने के लिए ऊपर उछलती है. उसका मुँह सतह को चीरता, साँस लेता और फिर जल्दी से ढँक देता, फिर वह डूब जाता. मैं इसका तसव्वुर भी नहीं कर सका. महज़ इसकी बदबू ही मेरे लिए काफ़ी थी. लगभग चार या पाँच जवानों ने निशाना साधा और मल में गोलियाँ बरसानी शुरू कर दीं. सिवाए मेरे.

विकर की तरफ़ घूरना भी मेरे लिए ऐसा ही था. यह एहसास ऐसा था कि अगर मैं ऐसा करता हूँ तो मेरे अंदर कुछ टूट जाएगा. और मैंने यह ख़याल किया कि चेरल विकर को जानवरों के डॉक्टर के पास ले जा रही है, कि कोई अजनबी मेरे कुत्ते को छू रहा है, फिर मैंने सोचा, मुझे यह करना ही होगा.

मेरे पास शॉटगन नहीं थी, AR-15 थी. बिल्कुल एक M16 के जैसी जिससे हमें ट्रेनिंग मिली थी. मुझे इसको सही से इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग दी गई थी. निशाना साधना, ट्रिगर को नियंत्रण में लेना, साँस को क़ाबू करना. बंदूक़ की मक्खी पर ध्यान रखना, न कि टार्गेट पर. टार्गेट धुँधला होना चाहिए.

मैंने विकर पर निशाना साधा, फिर बंदूक़ की मक्खी पर. विकर सुरमई धुंधलके में ग़ायब हो गया. मैंने AR-15 की सेफ़्टी हटाई.

तीन गोलियाँ तो मारनी ही पड़तीं. ऐसा नहीं है कि आपने ट्रिगर दबाया और काम हो गया. सही ढंग से करना होता है. एक के बाद फ़ौरन से पेशतर दूसरी गोली दागनी पड़ती है. और फिर एक आख़री सही निशाना, सर पर.

पहली दो गोलियाँ बेहद जल्दी मारनी होती हैं, यह ज़रूरी है. आपका जिस्म ज़्यादातर पानी है, तो जब एक गोली वहाँ से गुज़रती है तो वह तालाब में एक पत्थर फेंकने जैसा होता है. वह तरंगें उत्पन्न करती है. पहले पत्थर के बाद जल्द ही दूसरा पत्थर फेंकिए, और जहाँ वे दोनों पत्थर गिरे थे उसके बीच के पानी में हलचल नज़र आती है. यह होता है आपके जिस्म के अंदर, ख़ास तौर पर तब जब ये दो 5.56 राउंड, आवाज़ की रफ़्तार से भी तेज़, आपके जिस्म से गुज़रती है. ये तरंगें अंगों के चिथड़े-चिथड़े कर सकती हैं.

अगर मुझे आपके दिल के दोनों तरफ़ गोली मारनी हो, एक गोली… और फिर दूसरी, आपके पास दो ज़ख़्मी फेफड़े होंगे, छाती पर दो नाख़ुशगवार ज़ख़्म. अब आप ठीक भी हैं और आपकी लग भी गई है. लेकिन अब भी आप इतनी देर तक ज़िंदा रहेंगे कि यह महसूस कर सकें कि आपके फेफड़ों में ख़ून भरा है.

अगर मैं आप पर तेज़ रफ़्तार से गोलियाँ चला दूँ, तो कोई मसला नहीं है. ये तरंगें आपके दिल और फेफड़ों को चीर कर रख देंगी और आप मरते वक़्त कोई चीख़-पुकार नहीं करेंगे. आपको झटका लगेगा, मगर दर्द नहीं होगा.

मैंने ट्रिगर खींचा, बंदूक के झटके को महसूस किया और मक्खी पर ध्यान केन्द्रित किया, विकर पर नहीं, तीन बार. दो गोलियों ने उसका सीना चीर दिया और एक ने उसका भेजा. गोलियाँ बहुत तेज़ रफ़्तार से चली थीं, इतनी तेज़ रफ़्तार से कि कुछ महसूस ही नहीं हुआ. यह ऐसे ही किया जाना चाहिए. दूसरी गोली पहली वाली के तुरंत बाद चलनी चाहिये ताकि आपको उबरने का वक़्त ही न मिले, मतलब कि तकलीफ़ से.

मैं वहीं कुछ देर तक बंदूक़ की मक्खी को घूरते, खड़ा रहा. विकर एक सफ़ेद और स्याह धब्बा था. रौशनी मद्धिम हो रही थी. मुझे याद नहीं मैं उस लाश का क्या करने वाला था.

नोट: कोष्ठक () में मौजूद शब्द/वाक्य अनुवादक के अपने हैं.

 

यूएस मरीन कॉर्प्स में अधिकारी रहे फिल क्ले (जन्म 1983) युद्ध और उसके सामाजिक-मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर आधारित अपनी कहानियों के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं. उनकी पहली पुस्तक Redeployment है जो जो इराक युद्ध से लौटे सैनिकों की मनःस्थितियों और अनुभवों पर केंद्रित छोटी कहानियों का संग्रह है जिसे 2014 में नेशनल बुक अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था.

वर्तमान में फिल क्ले फेयरफ़ील्ड यूनिवर्सिटी के MFA रचनात्मक लेखन कार्यक्रम में अध्यापन से जुड़े हैं.

आयशा आरफ़ीन ने जे.एन.यू., नई दिल्ली से समाजशास्त्र में एम.फिल और पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं. उनकी कहानियाँ हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं, साथ ही हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं की पत्रिकाओं में उनके लेख और अनुवाद भी प्रकाशित होते रहे हैं. उनका कहानी-संग्रह ‘मिर्र’ वर्ष 2025 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है.

संपर्क: ayesha.nida.arq@gmail.com

Tags: 20252025 कहानीआयशा आरफ़ीनफ़िल क्लेरिडिप्लॉयमेंट
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Comments 4

  1. पीयूष कुमार says:
    2 months ago

    हृदयविदारक अंत। आम इंसान इसी तरह सोचेगा पर शायद फौजी, अमेरिकन फौजी इस तरह सोचता और करता हो। किसी को गोली किस तरह मारी जानी चाहिए, क्लाइमेक्स में इसका विस्तृत और ठहरा हुआ विवरण है कि यकीन नहीं होता। हालांकि शिकार कथाओं में मैंने यह पढा है लेकिन इस कहानी का ‘विकर’ कोई शिकार नहीं था।
    सैन्य मनोविज्ञान को बेहतरीन पेश किया है इस कहानी ने। हालांकि मानवीय करुणा के कारण अंत अच्छा न लगा।

    Reply
  2. Mohd Raza Husain says:
    2 months ago

    Redeployment को अंग्रेज़ी में पढ़ने के बाद , मैं इतना कह सकता हूं कि ये अनुवाद असल के बेहद करीब है। हालांकि चेरिल का प्राइस को गले लगाने के लिए झप्पी का लफ्ज़ अटपटा सा महसूस होता है। कहानी के माहौल से कुछ बइद महसूस होता है।
    ज और ज़, क और क़, फ और फ़ वगैरह का इस्तेमाल अनुवाद की खूबसूरती को बढ़ाता है। उदाहरण के लिए कुछ व्यक्ति ज़मीन को जमीन, आवाज़ को आवाज लिख देते हैं, और इस को सही जानते हैं। जबकि सही ज़मीन है न कि जमीन।
    कहानी के बारे में – प्राइस जंग के मैदान को छोड़ चुका है लेकिन जंग इस के ज़हन में सरायत कर गई है। नफ़सियती तौर पर वो अब भी वहीं फ़ौजी है जो अपने टारगेट को तीन गोली एक के बाद एक , एक लम्हे में मरने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। ऐसा करने के लिए वो बंदूक की मक्खी को देखता अपने टारगेट को नहीं। आत्मग्लानि उस के मन पर एक बोझ बनी हुई है। बेचारा विकर।

    Reply
  3. डॉ० समीउद्दीन ख़ाँ "शादाब" says:
    2 months ago

    पहली और सबसे बड़ी बात, वह यह कि मैं जब भी विदेशी भाषाओं की कहानियों के अनुवाद पढ़ता हूं तो कुछ बोरियत सी महसूस होती है लेकिन Redeployment का अनुवाद पढ़ने समय मुझे बोरियत महसूस नहीं हुई, यह कहानी के कथानक से जुड़ाव था या फिर अनुवाद का जादू , हो सकता है दोनों ही बातें हों ।
    दूसरी बात यह कि मैं ज़्यादातर कहानियां एक शिफ़्ट में नहीं पढ़ता ( Edgar Allan Poe की रूह से माज़रत के साथ ) लेकिन Redeployment का अनुवाद उन चंद कहानियों में से है जिन्हें मैंने एक ही शिफ़्ट में पढ़ा है ।
    कहानी में एक फ़ौजी के मनोविज्ञान का बड़ा ही मार्मिक चित्रण है फ़ौजियों का मनोविज्ञान और व्यवहार दोनों आम नागरिकों से अलग होता है, मैं इसे बेरहम नहीं कहूंगा लेकिन इसे मैकेनिकल ज़रूर समझता हूँ ।
    वही मशीनीपन प्राइस के किरदार में भी बख़ूबी चित्रित हुआ है । कहानी में प्राइस, चैरल और विकर के अलावा भी बहुत कुछ है । इस कहानी की तहों में बहुत कुछ छिपा हुआ है ।।
    और एक बात और सबसे बड़ी बात बल्कि एक महत्वपूर्ण प्रश्न चिन्ह, वह यह कि क्या ‘ घर वापसी ‘ के बाद भी किसी व्यक्ति की नफ़सीयात बदल जाती है ? क्या वह अपने साथ अपनी पुरानी छाया नहीं लाता ??
    एक सख्त कहानी के अच्छे अनुवाद के लिए आयशा आफ़रीन को बहुत सा साधुवाद ।।

    Reply
  4. पवन करण says:
    2 months ago

    उदासी बढ़ा देने वाली स्मृतिजन्य कहानी है। उल्लेखनीय अनुवाद है।

    Reply

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