| श्रीमती तारा रानी श्रीवास्तव बड़ा जतन से हम सिया जी के पोसली गरिमा श्रीवास्तव |
सन बयालीस के आंदोलन में श्रीमती तारा रानी श्रीवास्तव के पति फुलेना प्रसाद शहीद हुए थे महाराजगंज, सीवान में. तारा रानी ने आंदोलन का नेतृत्व किया, पति खोया, वैधव्य सहा लेकिन मृत्यु पर्यन्त देश के लिए जीती रहीं. रोगी होने पर बालबंगरा गाँव की माटी शरीर पर थोप लेती, कभी एलोपैथी दवा नहीं खाई. स्वाधीनता सेनानी पेंशन लेने से इनकार कर दिया. बेहद सादगी भरा जीवन जीती रहीं, लिखना पढ़ना उनका शगल था, उनकी लिखी पुस्तकें वक्त की दीमकों के हवाले हो गईं. उनकी पैतृक संपत्ति गाँव की राजनीति ने हड़प ली है. गांधी के आह्वान पर ब्रह्मचर्य व्रत लेने वाली तारा का रक्तांश मुझमें भी है यह सोचकर उत्तरदायित्व के बोध से भर उठती हूं. मैंने उनको 1987 तक देखा- गर्वोन्नत भाल, सुंदर गोरा चेहरा और स्वातंत्र्य आकांक्षा से देदीप्यमान एक अद्भुत भयहीन व्यक्तित्व, जिसने ब्रिटिश राज का मुकाबला किया डटकर, गोली दागती पुलिस के आगे नहीं झुकाया माथा. पीछे भागती भीड़ पर अपनी चूड़ियां उछाल दीं, गोद में अपने पति को पुलिस की गोली से दम तोड़ते देखा, उनके घावों पर अपनी साड़ी फाड़कर बांधती रहीं. शहीद फुलेना प्रसाद का स्मारक महाराजगंज के प्रवेश पर ही मिलेगा आपको, उनके स्मारक पर चढ़ावे चढ़ते हैं, तारा रानी नितांत अकेला जीवन जीकर चली गईं, गाँव ने उनकी कद्र नहीं की, गाँव के मुखिया और पट्टीदारों की नज़र में तारा रानी की जमीनें काम की थीं, तारा नहीं. उनके लिए वे आजादी के बाद एक एकाकी विधवा औरत थीं. वे तारा के दाय को समझ नहीं पाए. तारा रानी श्रीवास्तव ने भी मेरी ननिहाल में अपने जीवन के उत्तरार्ध में लगभग गुमनामी की जिंदगी जी, शुरू में महामाया बाबू जैसे अनेक उनसे मिलने आते रहे, वे भी बुलाई जाती रहीं. सुभाष चंद्र बोस से उनकी मित्रता रही थी. धीरे धीरे राजनीति में सक्रिय लोग मित्रता में निष्क्रिय होते गए. तारा सन 87 तक चलती फिरती रहीं. फिर निःशेष हो चलीं. क्या देख पाती होंगी कहीं से अपने सपनों के आजाद भारत का रूप. आज होती वे तो क्या कहतीं? पिछले वर्ष उनकी स्मृति में उनकी एक प्रतिमा स्थापित की गई, उन्हीं के घर के पास, राजनेता आए, आए भू -माफिया. जिस आज़ाद हिंदुस्तान के सपने के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, उनके नाम की ज़मीनों की बंदरबांट में गाँव के रसूखदार लोग लगे हुए हैं क्या मुखिया, क्या अध्यापक और क्या रिश्तेदार. काश कि उनके जीते जी भी यही लोग उनकी ओर देखते. उन्हीं की याद जितनी सी मेरे पास बच रही है
गरिमा श्रीवास्तव
बड़ा जतन से हम सिया जी के पोसली
मेरी स्मृति जहाँ तक दौड़ती है वहाँ मुझे मिट्टी के कच्चे घर को घेरे हुए केले के पेड़ दिखाई देते हैं. केले के पेड़ ही पेड़, तने से लिपटे केले के गुच्छे. केले की तरह तरह की किस्में- चिनिया केला, सोनपुरी, हरा केला, लाल केला, पीताम्बरी केला, जलपान, मोठरा. न जाने कितने केले. साल भर फल देने वाले केले तो कई तरह के होते हैं पर इनके यहाँ केवल हाजीपुरिया के गाछ हैं जिनसे घिरी कोठरियों में अन्दर घुसने के लिए सर को खूब नीचे झुका लेना पड़ता है, मेरी उम्र है लगभग छह और मामा-मौसी की उंगली पकड़े इस केले वाले घर में आना होता है गर्मियों की छुट्टियों में. साल भर दिल्ली के पब्लिक स्कूल में होमवर्क-क्लासवर्क रटते-रटते जो जी हलकान हुआ रहता है, वैसे में नानी के घर आने से इस तरफ भी आने का मौका मिलता है. खपरैल के छाये हुए छोटे से घर में दो कमरे दिखाई देते हैं, मिट्टी-गोबर से लिपा हुआ फर्श, बरामदे में एक ओर जलावन की लकड़ियाँ रखी हुई हैं, दूसरी ओर छोटा-सा मिट्टी का चूल्हा, राख ठंडी हुई पड़ी है, शायद सुबह खाना बना होगा, शाम के चार बजे तक चूल्हे में कोई सुलगन बाकी नहीं. मामा की उंगली थामे मैं. डाक्टर मामा कुर्ता-पायजामा पहने हैं, सफ़ेद कपड़े में उनकी गाढ़ी सांवली काया और भी सांवली लग रही है. वे पुकारते हैं- दिदिया !
भीतर से एक दबंग सी आवाज़ ने प्रत्युत्तर दिया है–‘के हS’
खटिया चरमराती है, झिलंगी चारपाई से मोटी वजनी काया को उठने में समय लगा है, वे निकल आई हैं दरवाज़े पर, मैंने अपने नन्हे हाथों की मुट्ठी में मामा के कुरते का कोना पकड़ लिया है, ज़ोर से. चाहती हूँ उनकी नज़र मुझपर न पड़े लेकिन मैं उनको देख लूं. मामा ने झुककर उनके चरण स्पर्श किये हैं, वे पीछे हटते हुए बोली हैं- ना रहे द ए सरोज. जा पहिले कल से हाथ-गोड़ धो ल.
मेरी ओर उन्होंने उपेक्षा भरी नज़र डाली है- आशा आईल बिया का दिल्ली से, ओकरे नूं हीय ई ?
मामा आँगन में लगे पुराने चांपाकल से जूझ रहे हैं, नल सूखा पड़ा है, मामा बड़ी मशक्कत से थोड़ा पानी निकाल पाए हैं, पैरों को एक-दूसरे से रगड़ कर धोते हैं, उनके पायजामे की मोहरी गीली और वे खुद पसीने-पसीने हैं. मेरे हाथ भी धुलाये जाते हैं. दरअसल दिदिया बड़ी सफाई पसंद हैं हाथ-पैर धोये बिना कोई उनके सामने बैठ नहीं सकता. दिदिया की खाट के नीचे रखे काठ के पीढ़े को खिसका कर मामा बैठ गए हैं, मैं दरवाज़े का कोना पकड़े चुपचाप खड़ी हूँ.
मामा दिदिया के छोटे-मोटे काम कर रहे हैं, मसलन ऊंचे आले पर रखे जंग लगे संदूक को उतार कर दिदिया के सामने रख देते हैं. काई लगे घड़े को साफ़ कर ताज़ा पानी भर देते हैं. पके केले का घौद काट देते हैं, बरामदे के कोने में टिका कर रख देते हैं. खड़े-खड़े मेरे पैर दुखने लगे हैं दिदिया संदूक से निकाल रही हैं कुछ कागज़ और मामा उन्हें बड़े मन से पढ़ रहे हैं. मामा ने झोले से दो किताबें निकाल कर दिदिया को दी हैं. मैंने किताबें पहचान ली हैं, माँ इन्हें दिल्ली से लायी थीं. दिदिया की कोठरी में चूहे हैं, उनका उछलना-कूदना चल रहा है. मिट्टी की पतीली पर काठ का ढक्कन है जिसे खोलने के लिए चूहे उतावले हैं, दिदिया ने सिल रख दी है उसपर. पूरे घर में निर्धनता का साम्राज्य है, एक बड़ी-सी तस्वीर जो मज़बूत फ्रेम से मढ़ी है, गांधी जी की तस्वीर की बगल में टंगी है, उसपर अक्सर टीका लगाया जाता होगा, क्योंकि तस्वीर का चेहरा लाल सिंदूर से ढँक-सा गया है. चन्दन की माला भी है, ताखे में दीया रखा है जिसकी लौ की कालिख से मिट्टी की दीवार पर एक लम्बी रेखा बन गयी है.
मुझे पैरों में खुजली हो रही है, अपरान्ह का समय है पर मच्छर अपनी पूरी ताकत के साथ खून पीने दौड़ पड़े हैं. मामा और दिदिया बातों में मगन हैं उनकी बातें मेरी समझ में ज्यादा नहीं आतीं क्योंकि वे भोजपुरी में हैं जो मुझे अच्छी तरह समझ नहीं आती, बस बीच-बीच में गांधी जी, हिटलर, रशिया जैसे शब्द सुन पड़ते हैं. मुझे ऊब हो रही है और मैंने सुबकना शुरू कर दिया है, मामा ने पता नहीं क्या कहा है उनसे लेकिन देखती हूँ, मामा जल्दी से बाहर आकर मेरा हाथ थाम नानी के घर की ओर चल पड़े हैं. रोना थम गया है और सोच रही हूँ कि अब नहीं आऊंगी दिदिया के घर की तरफ़.

एक)
सन 1972, स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले सेनानियों का महासम्मेलन हो रहा है दिल्ली में मौक़ा है स्वतंत्रता प्राप्ति की रजत जयंती का. वैसे दिल्ली सज रही है किसी और ही कारण से, नवंबर में होने वाले एशिया 72 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेले की शुरुआत की तैयारी ज़ोरदार है. उधर पूरे देश से सेनानियों का जुटान है-लुटियन की दिल्ली में खादी के धोती-कुरते की धज वाले सेनानियों का हुजूम है, लम्बे, दुबले, नाटे वृद्ध और अति वृद्ध सेनानी यहाँ आये हैं. इन्डिया गेट, संसद भवन की इमारतों को गर्व से सर ऊंचा करके निहारते हैं- ज्यों कहते हों-
“देख रहे हो हमने जेलों में सड़ कर, शहादत देकर, परिवार खोकर जो देश पाया, वह तुम्हें सौंपा है, ये सब हमारे त्याग और बलिदान का नतीजा है”
कुछ लोग नई पीढ़ी के हैं जिनके अभिभावकों ने सर्वस्व त्याग कर देश को आज़ादी दिलाई, उनकी चाल में भी गर्व कम नहीं. सभी अतिथि गृह भरे हुए हैं. हरेक स्वतंत्रता सेनानी की अपनी कहानी है, दक्षिण-पश्चिम-पूर्व से आये सेनानियों की उज्ज्वल खादी की आभा से दिल्ली जगमगा रही है. दिदिया को सभा में अध्यक्ष बनाया गया है. मीटिंग में तय हुआ है कि वे अध्यक्षीय भाषण देंगी और इंदिरा गांधी का स्वागत करेंगी, वे बतायेंगी कि इंदिरा जी के राज में स्वतंत्रता सेनानियों को पेंशन, मुफ्त रेल यात्रा इत्यादि सुविधाएँ मिली हैं और इस देश के स्वतंत्रता सेनानी उनके कितने कृतज्ञ हैं.
दिदिया जनपथ के होटल में ठहरी हैं, मोटी खादी की धवल, बारीक भूरे पाड़ की साड़ी में काले घुंघराले बालों वाला गोरा चेहरा दिपदपाता है. पान से लाल होंठ, फर्राटेदार अंग्रेजी, हिन्दी बोलने वाली दिदिया का रुआब है. लोग पैर छू कर प्रणाम करते हैं. बिहार से आये हुए स्वतंत्रता सेनानियों में कोई ऐसा नहीं जो दिदिया की अनदेखी कर दे. तय है कि वही सभा की कमान संभालेंगी.
दिदिया आयोजन-सभा में हैं, लेकिन यह क्या! वे सभा की अध्यक्षता से मना कर देती हैं- मसला है कि वे इंदिरा गांधी का स्वागत और उनकी तारीफ़ करने को राज़ी नहीं. स्वाधीनता सेनानियों में खुसर-पुसर हो रही है. दिदिया को समझाते हैं महामाया बाबू, तारकेश्वरी देवी-लेकिन दिदिया यानी तारा रानी श्रीवास्तव मानने को राज़ी नहीं. उनका कहना है नेहरु परिवार ने देश को गर्त में धकेला है, हमने जान देकर यह स्वतंत्रता पाई है, देश की स्वाधीनता में इंदिरा का क्या योगदान है- ऐसा कहकर सभा छोड़कर तारा रानी चली आई हैं. कीर्तिनगर के ऍफ़ ब्लाक में देबू बाबू की बड़ी बेटी आशा सपरिवार बस गयी हैं, दिदिया उन्हीं की मेहमान हैं.
दिदिया को दुनिया की नज़रों से छिपाकर रखा जा रहा है, अँधेरे में ही आते हैं कई नेता उनसे मिलने के लिए, लेकिन दिदिया को यह ताकीद दिए जाते हैं कि वे दिन के उजाले में न निकलें और चुपचाप महाराजगंज वापस चली जाएँ. इंदिरा गांधी से सभी डरते हैं, जनता में कई अफवाहें हैं, उनके कठोर निर्णयों की, झूठी सच्ची घटनाओं की. दिदिया डरती नहीं पर तिमंजिले की बरसाती वाले मकान में टिक ही जाती हैं. आशा उनकी भांजी लगती हैं, वे अपने दो छोटे बच्चों के साथ यथासंभव दिदिया को सुविधा देने की कोशिश में मुब्तिला हैं, लेकिन दिदिया बड़ी सफाई पसंद हैं, खूब ऊँची गोरी लम्बी दिदिया को बच्चों को छूना नहीं सुहाता, वे बच्चों से थोड़ी दूरी बरतती हैं, खूब पान खाती और पानी की बाल्टी में थूक देती थीं.
एक महीने बाद उनका गोरखपुर का टिकट हो गया है, इस खबर से गृहिणी को बड़ी राहत महसूस हुई है. दिदिया के प्रति सारे सम्मान के बावज़ूद उनकी टोका-टाकी, छुआछूत से आशा परेशान थीं लेकिन मायके की बात थी, पति के सामने ज़ाहिर भी करतीं तो कैसे. मन ही मन बालबंगरा के खुदी बाबा को हाथ जोड़े..
“ए बाबा अब ले जाईं इहाँ से दिदिया के! पता ना कौन बात से खिसिया जाएब. खुसी -खुसी इहाँ से चल जाईं त तनी हमरो आराम मिलो, जय बाबा किरपा करीं. बाल बंगरा आएम त लड्डू चढ़ाएब.”
तारा दिदिया को किसी और की परवाह हो ऐसा लगता नहीं. छोटा घर. वह भी किराये का. जिसमें दो तीन गमले-गमलों में. तुलसी, एलो वेरा, सदाबहार जैसे पौधे. लगे हुए हैं. क्या तारा दिदिया जान पाएंगी किराये के घर में रहने वाली लड़की की मुसीबतें? बिहार के गाँव से आई हुई लड़की को अपनी गृहस्थी बसाने में कितने दिन लगे और इस नन्ही-सी गृहस्थी में कोई अचानक आकर छुआछूत बरतने लगे, तरह-तरह की माँग करने लगे वैसे में आखिर इस सादा-नन्हीं गृहस्थी की मालकिन करे तो क्या करे.
आशा परेशान हैं, संस्कार सम्मान करना सिखाते, तारा दिदिया का सम्मान तो कौन नहीं करता पूरा गाँव जवार सब जानते हैं. तारा दीदी को जानते हैं सब उनका त्याग-पूरी भरी जवानी जिसने निकाल दी, यूँ ही अकेले अपने पति के लिए पति के नाम पर उसका सम्मान कौन नहीं करेगा लेकिन यहाँ इस किराये के घर में वे सम्मान करते करते थक चुकी हैं. अंत तो एक दिन आ ही गया जिस दिन आशा ने पूड़ी -भुजिया बनाकर सुराही में पानी भरकर तारा दिदिया को उनके गाँव के लिए विदा कर दिया.
तारा दिदिया को पैसा खर्च करना पसंद नहीं था. ये बात कहना गलत होगा क्योंकि उन्हें पैसे की ताकत का अंदाजा नहीं था बल्कि ये था कि वो पैसे को अपनी देह पर खर्च करना, अपनी सुविधा के लिए खर्च करना उचित नहीं समझती थीं, शायद सैद्धांतिक आग्रह के कारण. उन्हें ऐसा लगता था इस देश की एक-एक ची़ज, उसकी मिट्टी का एक-एक कण उनको बचायेगा. मामा कहते हैं अपने जीवन के अंतिम वर्षों में तारा दिदिया को ऐसा आभास था, मानो वे फिर से 16 साल की किशोरी हो जायेंगी. सुनने वालों को ये बात थोड़ी अजीब-सी लगती थी थोड़ी क्या बहुत. लेकिन किसकी हिम्मत थी जो तारा दिदिया के सामने ये बात कहता कि दिदिया एक बार गया हुआ वक्त फिर वापस नहीं आता, जो बीत जाता है वह बस बीत जाता है, उसकी स्मृतियाँ हमारी हमारे होंठों पर मुस्कान भले ला दे, आँख के कोने को एक नन्हा आंसू भले भिगो जाए लेकिन जो दिन बीत जाते हैं, वो कभी वापस नहीं आते.
गाँव में पीढ़ी ही बदल चुकी थी, इस पीढ़ी को स्वतंत्रता सेनानी, शहीद, शहीद की बेवा से कुछ लेना देना न था. कमला पंडित दिन भर इस जुगत में रहते थे ये कैसे तो तारा रानी को परेशान करें. तारा रानी के घर के बाहर पेड़ों से घिरे आहाते के पीछे छिपकर डरावनी आवाजें निकालना, मानो कई सियार एक साथ हुआँ-हुआँ कर रहे, किसी सुबह तारा रानी उठकर देखती तो उनके बहुत प्यार से लगाए हुए पौधे यूँ ही तुड़े-मुड़े पड़े हैं. दिदिया को पता नहीं चलता ये किसका काम है और वे पूरे गाँव को गालियों से नवाज देतीं. एक अकेली विधवा औरत, निस्सहाय निसंतान और इसलिए अनाथ. उनके टोले में उनसे किसी को सहानुभूति नहीं थी, उनके अपने जाति भाई इस इंतजार में रहते की कब दिदिया कहीं जायें या कब इहलोक छोड़ दें. बाद के दिनों में कमला पंडित दिदिया के दरवाजे पर जाकर पाखाना कर आते. कमला पंडित की सात पुश्तों को दिदिया गालियों से तार देती. लेकिन एक अकेली अबला औरत की गालियाँ दुर्वासा ऋषि का शाप नहीं थी बल्कि लोगों के लिए उपहास का कारण थीं.
दो)
तारा रानी श्रीवास्तव आख़िर दिदिया क्यों बन गई थी इसलिए क्या उनके पास दीदी होने के अलावा कोई चारा नहीं था या इसलिए कि उनका अपना कोई बचा ही नहीं था. निज का कोई रिश्ता नहीं, माँ नहीं, बाप नहीं, पति नहीं, संतान नहीं ऐसे में दीदी बन जाना ही तो स्वाभाविक था- तारा दिदिया लेकिन बालबंगरा गाँव में ही वह कूवत थी की एक खूब बोल्ड स्वतंत्रता सेनानी को एक साधारण, अति साधारण अबला स्त्री में रिड्यूस कर दे. खैर वह बात फिर कभी.
तारा दिदिया अपने हाते में लगे पेड़ पौधों से बात करती. कानपुर, दिल्ली कलकत्ता से आने जाने वाले लोग- यानी जो उनसे मिलने आते उनसे किताबें मंगवाती, पढ़ा करती और लौटा देती. कोशिश करती कि कभी कुछ खरीदना न पड़े, बाज़ार से अद्भुत परहेज था उन्हें अति की सीमा तक. अपने कोला में जो हो जाता, जो उपज जाता उसी से अपना काम चला लिया करती. न जाने क्यों उनके ओसारे के कोने में बना हुआ मिट्टी का चूल्हा मेरी स्मृति में अमिट है. छोटा-सा चूल्हा. कच्ची मिट्टी से लिपा हुआ. ठंडी और काली राख से भरा हुआ. उस पर एक हाँडी टेढ़ी पड़ी हुई जिसके मुँह पर पकी हुई खिचड़ी के चिपके कुछ दाने पिछले दिन के बने हुए भोजन की गवाही दे रहे थे. उनके अहाते के बाहर कुत्ते बैठे रहते थे, ठंडक की तलाश में मिट्टी को कुरेद-कुरेद कर उसमें अपने सोने लायक जगह बना लेते थे और गुड़ी-मुड़ी होकर उसी दरवाजे पर पड़े रहते थे, ना किसी के आने से भौंकते थे और न किसी के जाने से चौकन्ना होते थे ज्यों उन्हें किसी का इंतजार ना था. लेकिन इंतजार था तो दिदिया को उनके साथी सेनानियों के पुनर्जन्म का.
बाद के सालों में सुना गया कि तारा दिदिया कहा करती हैं कि साधु के वेश में सुभाष चन्द्र अकसर उनसे मिलने आते है. बुखार के दौरान दिदिया बड़बड़ाती ज्यों गाँधी महात्मा से बात कर रही हों. उनके विवाह के तुरंत बाद फुलेना बाबू गाँधी जी से मिलने के लिए पत्नी समेत गए थे 13-14 साल की पत्नी सुन्दर गदबदी गोरी चिट्टी माँ बाप की इकलौती बेटी- किसको पहचानती थी गाँधी को! सोचती थी यह गाँधी बाबा है जो अच्छे हैं जो कहेंगे सो अच्छा ही कहेंगे गाँधी ने कहा था फुलेना बाबू विवाह तो कर लिए हो लेकिन स्वराज मिलने तक ब्रह्मचर्य का पालन कर सकोगे ? फुलेना बाबू ने पत्नी समेत शपथ ली थी, सुराज नहीं तो दाम्पत्य नहीं. उसी स्वराज के इंतजार में तो फुलेना बाबू ने किशोरी पत्नी से दोस्ती कर ली, अब वे दोनों पति पत्नी नहीं बल्कि थे परम मित्र.
तारा रानी को और क्या चाहिए था देश के लिए, राष्ट्र के लिए जी जान से प्राणपण से हर क्षण तैयार नौजवान फुलेना प्रसाद, जिसका सम्मान वह जी जान से किया करतीं. फुलेना प्रसाद ने नए-नए लोगों से तारा का परिचय करवाया. सपनों सी दुनिया में सपनों से लोग. राष्ट्र के लिए मर जाने का सपना देश के लिए प्राण देने का सपना, गाँधी से किए वायदे को पूरा करने का सपना. वे गाया करते
सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से मोर प्राण बसे हिम खोह रे बटोहिया
एक द्वार घेरे रामा हिम कोतवलवा से
तीन द्वार सिंधु घहरावे रे बटोहिया
जाऊ जाऊ भइया रे बटोही हिंद देखी आऊ
जहाँवा कुहुकी कोइली गावे रे बटोहिया
पवन सुगन्ध मंद अगर चन्दनवा से
कामिनी बिरह राग गावे रे बटोहिया
कौन जान पाएगा कि तारा दिदिया एक समय में खूब रोमाँटिक थीं.
उन्हें याद है अपनी कच्ची उम्र. इकलौती लड़की, लाड़ली. दरवाज़े पर बारात लेकर आये थे फ़ुलेना बाबू, खूब जवाँ मर्द, लंबी चौड़ी क़द काठी, पर चेहरे पर नई आयी मूछों के बावजूद चेहरे पर एक कोमलता और मासूमियत. इसी मासूमियत ने तो मोह लिया था तारा के पिताजी का मन. बस यही, यही उपयुक्त पात्र रहेगा अपनी गोरी-चिट्टी-ज़िद्दी तारा के लिए. बारात आई थी- दरवाज़े पर पेट्रोमेक्स जल रहे थे, बाग़ीचे में कनातें लगी थीं, बारात का बहुत स्वागत-सत्कार हो रहा था. अंदरमहल की स्थिति ही दूसरी थी, तारा को हल्दी चढ़ी थी, और चुमावन चल रहा था, उधर उनकी माँ बार-बार चेतनाहीन हो जाती थीं- रह रह कर चेहरे पर पानी छिड़कने की नौबत आ जाती थी. तेरह साल की सुंदर, अल्हड़, ज़िद्दी तारा गृहस्थी कैसे बांध पाएगी, माँ की नज़रों से दूर कैसे रह पायेगी, सोचते ही माँ का कलेजा मुँह को आने लग रहा था.
आँगन में गीत गा रही थीं औरतें – “बड़ा जतन से हम सिया जी के पोसली, आ से हो रघुवंशी लेले जाय”-सच ही तो था फ़ुलेना प्रसाद रघुवंशी से ही देखते थे, अमिया की फाँक जैसी बड़ी आँखें दृढ़ निश्चय से परिपूर्ण थीं. तारा के माता-पिता को फुलेना प्रसाद के मन के भीतर चलने वाले आलोड़न-विलोड़न के बारे में मालूम था क्या, उन्हें तो अच्छे कायस्थ ख़ानदान का पढ़ा-लिखा, सुशील-सुंदर युवा भा गया था. बिचौलिये ने वर की प्रशंसा के पुल बांध दिए थे, जिन पुलों की उतराई तारा के गाँव में होनी थी. तारा थोड़ी ऐंठी हुई, ज़िद्दी थीं ठीक वैसी ही जैसी अकसर बड़े परिवारों की इकलौती संतान हो जाया करती है.
उन्होंने गृहस्थी का कोई काम सीखा ही नहीं, घर पर ही आकर उस्ताजी पढ़ा कर चले जाया करते, तारा रानी की ज़िंदगी में थीं किताबें और तानपुरा. उन्हें दुनियादारी का कोई ज्ञान न था, उन्हें कंघी-चोटी कर बिंदी लगाना आता था, और बिंदी सजती भी तो कितनी थी उनपर. ऐसी ही तारा को ब्याह कर माता-पिता कन्यादान के पुण्य के भागी हो जाना चाहते थे. उधर देश के हालात ही कहाँ अच्छे थे.
फुलेना प्रसाद अपने साथ तारा रानी को पाकर खुश थे, और तारा रानी खुश थीं कि ऐसा मित्र मिला जिसके आगे किसी और संबंध की चाह नहीं नहीं रह गई. फुलेना प्रसाद तरह -तरह की किताबें पढ़ते, तारा को पढ़ने को देते. सादा जीवन उच्च विचार. तारा ने क्या नहीं पढ़ा, कथा कहानी, आत्मकथाएँ, शहीदों की जीवनी. भारत का इतिहास विश्व का इतिहास और जान पाई गुलाम देश की सिसकती आत्मा का दर्द. फुलेना प्रसाद और तारा रानी, तारा रानी और फुलेना प्रसाद, फुलेना और तारा, तारा और फुलेना दोनों को अलग करना, अलग- अलग समझना अलग करके समझना मुश्किल था या असंभव था.
तीन)
उसी तारा रानी ने फुलेना प्रसाद के शहीद होने पर एक आँसू नहीं बनाया, नहीं बनाया ख़ुद को किसी की दया का पात्र. उन्होंने सरकार से कोई पेंशन नहीं ली, समझौते नहीं किए. लिखी कहानियाँ, निबंध, राजनैतिक टिप्पणियाँ. लिख कर संदूक में रख दिया करतीं, आज़ाद भारत के प्रकाशक छापने के पैसे माँगते. वे मेरे मामा से कहतीं कोई प्रकाशक ढूँढो उसे बताओ तो सही मैं कौन हूँ और मैंने क्या लिखा-पढ़ा है.
वे बनारसीदास चतुर्वेदी से पत्र व्यवहार किया करतीं. अधिकांश लोग उन्हें झूठी तसल्ली देते. वे किसी को लाभ न देतीं, राजनेताओं से संपर्क के बावजूद वे स्वाभिमान के आवेश में रहतीं. धीरे-धीरे उम्र के असर से उनकी आवाज़ मंद होती गई. आँगन का नल बहुत कष्ट से थोड़ा पानी निकल पाता, पानी निकालने की कोशिश में वयोवृद्ध घुटने नल के आसपास इकट्ठी रेत में धँस गए, चोट लगी पर उन्होंने दवा -इंजेक्शन न लिया. चलाचली की बेला में वे स्वर्गीय फुलेना बाबू को याद किया करतीं, बातें करतीं. पान खाये कई दिन बीत चले, फुलेना बाबू के स्मारक पर चढ़ावे में आए कपड़े के टुकड़ों को जोड़ कर सिला सूती लहंगा मैला और तार-तार हो चला, गमछा चीकट, ताखे पर रखी शहीद की तस्वीर का दीपक कोई जलाता नहीं, अब किसी के बुलाने और आवाज़ देने की ज़रूरत नहीं पड़ने वाली थी.
वे ख़ुद से बातें करते हुए एक सुबह अचानक मौन हो गईं, झुर्रीदार काया निश्चेष्ट, राग-विराग से परे. दरवाज़े पर पड़े कुत्तों का रोना सुन गाँव के लोग आए, आए पत्रकार, खींची गई तस्वीरें. ज़िंदाबाद के नारों के साथ युवकों ने तारा रानी की अर्थी कंधों पर उठा ली, फुलेना बाबू के समाधि स्थल पर सार्वजनिक दर्शन के लिए तारा उपस्थित थीं, लोग आते फूल चढ़ाकर श्रद्धांजलि देते. सब उन्हें जानते थे वे गाँव, जिले और देश का गौरव थीं, अब उनकी सारी संपत्ति की बेधड़क लूट का सुअवसर था, लोग उनकी ज़मीन का बंटवारा कर रहे हैं आज भी और वे प्रतिमा बनी बालबंगरा में खड़ी देख रही हैं मूक, शांत और स्थिर.
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा॥
|
गरिमा श्रीवास्तव
प्रकाशित पुस्तकें : ‘आउशवित्ज : एक प्रेम कथा’, ‘देह ही देश’, ‘चुप्पियाँ और दरारें’, ‘हिन्दी नवजागरण : इतिहास, गल्प और स्त्री प्रश्न’, ‘किशोरीलाल गोस्वामी’, ‘लाला श्रीनिवासदास’, ‘हिन्दी उपन्यासों में बौद्धिक विमर्श’, ‘भाषा और भाषा विज्ञान’, ‘ऐ लड़की में नारी चेतना’, ‘आशु अनुवाद’. सम्पादित पुस्तकें : ‘उपन्यास का समाजशास्त्र’, ‘जख्म, फूल और नमक’, ‘हृदयहारिणी’, ‘लवंगलता’, ‘वामाशिक्षक’, ‘आधुनिक हिन्दी कहानियाँ’, ‘आधुनिक हिन्दी निबन्ध’, ‘हिन्दी नवजागरण और स्त्री’ शृंखला में सात पुस्तकें—‘महिला मृदुवाणी’, ‘स्त्री समस्या’ ‘हिन्दी की महिला साहित्यकार’, ‘हिन्दी काव्य की कलामयी तारिकाएँ’, ‘स्त्री-दर्पण’, ‘हिन्दी काव्य की कोकिलायें’, ‘स्त्री कवि संग्रह’. अनुवाद : ‘ए वेरी ईजी डेथ : सिमोन द बोउवार’, ‘ब्राजीली कहानियाँ’, ‘जारवा भाषा : स्वनिमिक अध्ययन’. सम्प्रति |





बड़ा जतन से हम सिया जी के पोसली, आ से हो रघुवंशी लेले जाय
आज जब लगातार हम स्मृति भ्रंश और एकल नायकत्व की केंद्रीयता के शिकार होते जा रहे हैं ऐसे में दीदिया की याद उस जतन को याद करने जैसा है जिसे एक ऐसा रघुवंशी ले जा रहा है जिसके बाद सिया सुकुमारी के भाग्य में निर्वासन, अकेलापन और कष्ट ही बदा है। गरिमा जी का कुल लेखन इसी विस्मृतियों के खिलाफ स्मरण का सत्याग्रह है। इस आलेख के लिए गरिमा जी को और प्रकाशन के लिए समालोचन को साधुवाद।
ओह्ह। नमन उन्हें। आज के हम कृतघ्न लोग क्या ही समझ रहे हैं इस समर्पण और उत्सर्ग को।
स्वाधीनता संग्राम के एक बलिदानी की पत्नी और स्वाभिमानी स्त्री की आज़ाद भारत में दुर्दशा का जीवंत चित्रण के लिए गरिमा जी को साधुवाद.
इस देश के हर इलाके में न जाने कितने फुलेना प्रसाद और तारा रानी श्रीवास्तव होंगे , जिनका कोई नामलेवा नहीं है.
इस मार्मिक स्मृतिलेख से गुज़रते हुए दिनकर की “क़लम आज उनकी जय बोल’ कविता शिद्दत से याद आ रही है.
क्या ही लिखा है गरिमा जी आपने! आपकी लेखनी को सलाम! एक दिलेर स्त्री की दास्तान स्मृतियों से निकाल कर आपने ऐसे सामने रखी है जैसे की सब कुछ बस कल का ही देखा हुआ हो ! बारीक चित्रण है, संवेदनाएं हैं और साथ ही वे सवाल हैं जिनका कोई जवाब नहीं। व्यक्तित्व के चित्रण में भी कितनी ईमानदारी है! श्रीमती तारा देवी श्रीवास्तव उर्फ दिदिया को जो अंत नसीब हुआ, भारतीय समाज में खुद्दार स्त्रियों की वही नियति है शायद! दिदिया को नमन!
बहुत ही मार्मिक और भीतर तक उदास कर देने वाली गाथा है ये।
स्वाभिमान के आवेश में अब भी भोले पर अक्खड़ लोग अपना बहुत नुक़सान कर लेते हैं।
लिखने के लिए शुक्रिया गरिमा जी , more power to your pen.
गरिमा मैम को मैं लंबे समय से अनुवाद और भाषा-विज्ञान के संदर्भ में पढ़ता और समझता आया हूँ। पिछले कुछ दशकों में उन्होंने नवजागरण, स्त्री-जीवन और स्त्री-अनुभवों को जिस गंभीरता और निरंतरता के साथ अपने लेखन के केंद्र में रखा है, वह भारतीय बौद्धिक परंपरा को कई स्तरों पर समृद्ध करता है। उनकी दृष्टि न केवल ऐतिहासिक चेतना को तीक्ष्ण बनाती है, बल्कि हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक विमर्श में भी एक आवश्यक विस्तार जोड़ती है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी श्रीमती तारा रानी श्रीवास्तव जी के जीवन और योगदान के बारे में पढ़ते हुए लगा मानो इतिहास का एक नया, अब तक अनदेखा अध्याय मेरे सामने खुल गया हो। सहज ही बार-बार यह प्रश्न दिमाग में आया कि यदि हम अपने इतिहास के प्रति इतनी उपेक्षा और लापरवाही बरतते रहेंगे, तो यह हमें अंततः किस दिशा में ले जाएगा? अपने अतीत से विमुख होना न केवल स्मृति-ह्रास है, बल्कि उस वैचारिक ऊर्जा का क्षरण भी है, जो समाज को आगे बढ़ाती है। श्रीमती तारा रानी श्रीवास्तव जी के जीवन-संघर्ष से परिचय कराने के लिए गरिमा मैम और ‘समालोचन’ का हार्दिक आभार…
तारा देवी की गरिमा, दृढ़ता, त्याग को करीने से , अत्यंत सम्मान के साथ रेखांकित करता आलेख है। 💐💐
एक रौ में पढ़ गई। कभी दीदी पर गुस्सा आया कभी प्यार और अंत में बस भीगा हुआ मन बचा। दीदीया और उनके साथी होते तो देखते कि अब शहीदों की चिताओं पर मेले भी नहीं लगते। लगते भी हैं तो कैमरा फूलमाला चढ़ाने वाले के चेहरे से नहीं हटता, जयकारे भी उसीके लगवाए जाते हैं।
एक सांस में पूरा पढ़ गई… कितनी खुबसूरत से लिखा गया है… कितने बेहतरीन तरीके से तारा देवी श्रीवास्तव उर्फ दिदिया का चरित्र चित्रण किया गया है कि ये आंखों के साथ मन को भी बांध लें रहा और फिर हम आत्मविह्वल हो जा रहें।
बहुत खूब….
अपनी स्मृतियों की पोटली में से दिदिया जैसे स्वाभिमानी स्त्री के संघर्ष की मार्मिक गाथा से परिचय कराने के लिए गरिमा मैम को धन्यवाद।
जिनका रक्तांश हम में हो या जिनसे निजी जुड़ाव हो उनके बारे में निरपेक्षता के साथ लिख पाना संभव नहीं होता। लेकिन आपने इस पूरे लेख में एक मार्मिक संतुलन बनाए रखा है और उनके व्यक्तित्व के सभी आयामों को सही कोण से प्रकाशित भी किया है।
सम्मान के बावजूद व्यावहारिकताओं में किस तरह मूल्यवान गंभीर व्यक्तित्वों से हम अनकंफर्टेबल हो जाते हैं यह भी बखूबी चित्रित हुआ है। बिना किसी वैल्यू जजमेंट के।
ऐसी ही नायिकाओं को उनके पूरे तेज और तेवर के साथ बाहर लाना लेखक का सच्चा धर्म है। जो अलक्षित है उस मूल्यवान को रेखांकित करना इतिहास लेखक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है।
आपने उनकी जिस शब्द प्रतिमा का अनावरण किया है वह बेहद संवेदनशील, चेतनासंपन्न और प्रामाणिक है।
बहुत बधाई 💐👏
बिसरा दी गईं तारा रानी श्रीवास्तव के जीवन संघर्ष की बहुत ही मार्मिक झलकियां प्रस्तुत की है आपने. तारा रानी जी का जीवन उस अंधेरे में जले हुए रोशनी का प्रतीक है जिसकी छांव में सच्चाई की लौ दीप्तिमान है. बहुत मनोयोग से लिखा गया लेख. सच्ची देश भक्त तारा रानी की स्मृति को नमन. आपको साधुवाद Ma’am.
तारा दीदीया के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि गरिमा (सोनी) ने अपनी कलम से अर्पित किया है। मैं बहुत-बहुत आभारी हूँ। जनमंगल हित ज्योति पथिक ने निज जीवन बलिदान किया।
हमारे समाज दीदीया, गांव का गौरव। तारा रानी अमर रहें।
आदरणीय प्रो उर्वशी शर्मा- जयपुर से अपनी टिप्पणी भेजती हैं”आज पूरा पढ़ पायी हूँ ! बहुत समादृत और स्मरणीय व्यक्तित्व की धनी श्रीमती तारा रानी श्रीवास्तव के अद्भुत जीवट की झलक मिली …लगा कि यह भी आपके शोध आलेखों की तरह एक विस्तीर्ण संस्मरण होगा । लेकिन समझ सकती हूँ कि अतीत के रेशों-रेशों को बटोरकर और अपनी याददाश्त के ताने बाने से बहुत लंबा चौड़ा बुन पाना मुश्किल काम है।
स्वतंत्रता संग्राम की विस्मृत नायिकाओं की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है।इसी तरह से एक एक मोती चुन चुनकर इसे सहेजना संभव हो सकेगा।
साधुवाद, इस माला को आगे बढ़ाने के लिए और उऋण होने के लिए भी कि आपकी प्रखर लेखनी यदि इसे नहीं लिखती तो दिदिया क्या कभी आपको बख्शतीं!!
स्नेह..”
मैं बापू टावर पटना में कार्यरत हूँ।महात्मा गांधी के जीवन और सिद्धांतों पर यह देश भर का अकेला अत्याधुनिक संग्रहालय है ।इस संग्रहालय में एक दीर्घा बिहार के प्रमुख नेताओं का है।इसी सेक्शन में एक बड़ा कटआउट श्रीमती तारा रानी श्रीवास्तव का भी है अनीश फातिमा और तारकेश्वरी सिन्हा के साथ।मगर मुझे इनके बारे में विस्तृत जानकारी इस लेख को पढ़ने के बाद ही मिली।स्वतन्त्रता संग्राम की इन अलक्षित नायिकाओं के बारे में काफी कुछ शोध किया जाना अब भी बाक़ी है। आपको इस आलेख के लिए साधुवाद।