| तेग़ अली का बनारस शुभनीत कौशिक |
उन्नीसवीं सदी में छापेखाने और मुद्रण की संस्कृति के प्रसार, स्कूल-कॉलेजों की स्थापना और आधुनिक शिक्षा के विस्तार के चलते भारतीय भाषाओं की अभूतपूर्व उन्नति हुई. अकारण नहीं कि इस दौर में विभिन्न भारतीय भाषाओं में समाचारपत्रों, पत्रिकाओं और मुद्रित पुस्तकों की तादाद में भी बढ़ोतरी देखने को मिलती है. इसी दौर में अन्य भारतीय भाषाओं की तरह ही भोजपुरी भाषा की पुस्तकें भी पहले-पहल छपीं और बड़े पैमाने पर पाठकों तक पहुँचीं. बलिया के रविदत्त शुक्ल द्वारा लिखी किताब ‘देवाक्षरचरित्र’ वर्ष 1884 में भारतेन्दु हरिश्चंद्र के जीवनकाल में ही बनारस के लाइट प्रेस से छप चुकी थी, जिसे भोजपुरी का पहला नाटक माना जाता है.[1]
उन्नीसवीं सदी के नौवें दशक में ही तेग़ अली की भोजपुरी ग़ज़लों का संग्रह ‘बदमाशदर्पण’ शीर्षक से ‘भारत जीवन’ के प्रख्यात सम्पादक रामकृष्ण वर्मा ने 1889 में छापा. ख़ुद रामकृष्ण वर्मा ने भी ‘बलबीर’ उपनाम से ‘बिरहा नायिका भेद’ शीर्षक से बिरहा छंद में एक पुस्तिका लिखी थी, जो वर्ष 1900 में छपी थी.[2]
‘बदमाशदर्पण’ का दूसरा संस्करण 1895 और तीसरा संस्करण ग्यारह बरस बाद 1906 में छपा. भारत जीवन प्रेस से छपी इक्कीस पृष्ठों वाली इस किताब में भोजपुरी में लिखी तेग़ अली की 23 ग़ज़लें शामिल थीं. किताब की लोकप्रियता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि दो दशकों के भीतर इस किताब का तीसरा संस्करण प्रकाशित हुआ और उस तीसरे संस्करण के लिए भी तब एक हज़ार प्रतियाँ छपीं. किताब के तीसरे संस्करण के आवरण पृष्ठ पर ‘बदमाश दर्पण’ शीर्षक के साथ किताब के बारे में लिखा गया था –
‘जिस में काशी के बदमाशों की बोलचाल पर शैरें लिखी हैं जिस्मे (जिसमें) उनकी रीत रसम, चाल, व्यवहार, और जीविका झलकती है.’[3]
‘बदमाश दर्पण’ के प्रभाव का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जिस साल यह किताब छपी, उसी साल दिसंबर 1889 में एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल की एक बैठक को सम्बोधित करते हुए सोसाइटी के सभापति लेफ़्टिनेंट-कर्नल जे. वाटरहाउस ने आधुनिक भारतीय साहित्य की चर्चा करते हुए अपने भाषण में इसका भी उल्लेख किया था. उन्होंने पश्चिमोत्तर प्रांत और अवध से उस वर्ष छपी पुस्तकों का ज़िक्र करते हुए पंडित नकछेदी तिवारी (‘बिचित्रोपदेश’), लाला कांता प्रसाद (‘संगीत माला’), पंडित दामोदर शास्त्री (‘मेरी जन्मभूमि यात्रा’) की पुस्तकों के साथ तेग़ अली कृत ‘बदमाश दर्पण’ का भी संदर्भ दिया था. वाटरहाउस ने ‘बदमाश दर्पण’ के विषय में कहा था कि ‘इसमें बनारस के अवाम के रस्मोरिवाज का उनकी अपनी भोजपुरी बोली में विवरण मिलता है.’[4]
भारत जीवन प्रेस से छपा ‘बदमाश दर्पण’ का वह तीसरा संस्करण भी समय बीतने के साथ अप्राप्य हो गया. बीसवीं सदी के सातवें दशक में ‘बदमाश दर्पण’ के पुनरुद्धार का श्रेय ‘बहती गंगा’ जैसी अप्रतिम कृति के रचनाकार रुद्र काशिकेय को जाता है. जिन्होंने बनारस के प्रसिद्ध अख़बार ‘आज’ के सह-सम्पादक ईश्वर चंद्र सिन्हा के अनुरोध पर ‘बदमाश दर्पण’ का नवीन संस्करण प्रस्तुत किया, जिसमें तेग़ अली की ग़ज़लों की विस्तृत व्याख्या भी की गई थी. ज्ञानमंडल से वर्ष 1964 में छपे ‘बदमाश दर्पण’ के उस संस्करण का शीर्षक है – ‘तेग़ अली और काशिका’.[5] इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में ‘बदमाश दर्पण’ का एक और संस्करण नारायण दास की व्याख्या के साथ बनारस के ही विश्वविद्यालय प्रकाशन से छपा.[6] प्रस्तुत लेख में ‘बदमाश दर्पण’ के इन्हीं दो संस्करणों का प्रयोग किया गया है.
‘गंगा के पार गैबी पै नद्दी के तीर तेग़’
बनारस की जगहें और सामाजिक भूगोल
उन्नीसवीं सदी का बनारस, जहाँ भारतेन्दु हरिश्चंद्र (1850-1885) सरीखे कवि, सम्पादक और लेखक हुए, जिन्होंने हिंदी को नई चाल में ढालने का काम किया. उसी बनारस की ज़मीन से निकले हुए कवि थे तेग़ अली, जो भारतेन्दु के समकालीन थे. ख़ुद ‘तेग़’ एक फ़ारसी शब्द है, जिसके मानी होते हैं तलवार या शमशीर. जैसा नाम वैसी ही ग़ज़लें. तेग़ अली की कही ग़ज़लें किसी तलवार की धार से कम नहीं हैं.
बनारस की बोली (भोजपुरी/काशिका) के शानदार नमूने तो हमें भारतेन्दु और बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ की रचनाओं में भी जगह-जगह मिलते हैं. मसलन, भारतेन्दु के प्रसिद्ध नाटक ‘प्रेमजोगिनी’ के संवादों में बनारस की भोजपुरी/काशिका की निराली छटा ख़ूब दिखाई देती है. मगर भोजपुरी ग़ज़लों का एक मुकम्मल संग्रह लिखने का श्रेय निस्संदेह तेग़ अली को ही जाता है.
तेग़ अली की इन ग़ज़लों में बनारस के तमाम इलाक़ों, मोहल्लों, अखाड़ों, यहाँ तक कि जुआ खेलने के अड्डों तक का वर्णन है. इन ग़ज़लों को पढ़ते हुए उन्नीसवीं सदी के बनारस के सामाजिक भूगोल और शहर के विस्तार को भी दर्ज़ किया जा सकता है. किसी कालविशेष में लिखी गई रचना में उसका सामाजिक परिवेश और स्पेस किस तरह दर्ज़ होता है, इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है ‘बदमाश दर्पण’.
राजा दरवाज़ा, लक्सा, गुदड़ीबाज़ार, गैबी जैसी बनारस की तमाम हलचल भरी जगहों का ज़िक्र तेग़ अली की इन ग़ज़लों में प्रमुखता से हुआ है. ध्यान रखने की बात है कि किसी शहर का स्पेस कोई ठहरा हुआ या जड़ स्पेस नहीं होता है, उसमें वक़्त के साथ तब्दीलियाँ भी आती हैं. उसके स्वरूप और चरित्र में बदलाव आते हैं. कहना न होगा कि समय के साथ ख़ुद बनारस के भी सामाजिक भूगोल और स्पेस में अभूतपूर्व परिवर्तन आए हैं. मसलन, लक्सा जैसी जो जगहें तेग़ अली ने तब शहर के बाहर मानी थीं, वे कुछ ही दशकों में शहर के ठीक बीचोंबीच आ गईं.
सबेरे साँझ के लक्सा पै अउर गैबी पर
लगऽला खेवा कऽ संगी बजार बहरी ओर I
इसी तरह राजा दरवाज़ा में जुआ खेले जाने का उल्लेख करते हुए तेग़ अली लिखते हैं :
राजादुआरे फड़ बा परल तूँ चलल करऽ
रुपया असरफी लोट कऽ हुकमी बदल करऽ
और तेग़ अली सिर्फ़ बनारस तक ही नहीं रुकते वे माशूक़ की तलाश में प्रयाग, मथुरा, जगन्नाथ, द्वारका का भी फेरा लगा लेते हैं –
कासी पराग मथुरा जगरनाथ द्वारिका
बरिसन से हम फिरत हई धावल तोरे बदे
और फिर यहीं क्यों रुकें, वे हिंदुस्तान की सीमा से भी नहीं बँधते और चीन, लंदन का भी ज़िक्र लगे हाथ अपने माशूक़ से कर डालते हैं.
हरदम बा गोरा गोरा छलावन कऽ भीरभार
बैठक हमार चीन और लन्दन बा आजकाल
‘तमासा मेला में गंगा के पार बहरी ओर’
बनारस की लोक-संस्कृति, भाषा और संगीत
उन्नीसवीं सदी के बनारस के लोकजीवन की एक सजीव झाँकी भी तेग़ अली की इन ग़ज़लों में देखने को मिलती है. बनारसी लोगों का फक्कड़ मिज़ाज, बनारस के मेले और त्योहार, गीत-संगीत आदि इन ग़ज़लों में मुखर हो उठा है. बनारस के एक ऐसे ही लोकपर्व बुढ़वा मंगल के मेले का ज़िक्र करते हुए तेग़ अली लिखते हैं :
मंगर में अबकी रेती पै रजवा तोरे बदे
जरदोज़ी कऽ तनाइला तंबुआ तोरे बदे I
ग़ौरतलब है कि बुढ़वा मंगल के मेले के विषय में भारतेन्दु मंडल के साहित्यकार बदरीनारायण उपाध्याय ‘प्रेमघन’ ने अपनी पत्रिका नागरी नीरद में भी विस्तार से लिखा था. बुढ़वा मंगल के विषय में बनारस में प्रचलित एक कविता की ये पंक्तियाँ भी वे उद्धृत करते हैं : डूब जायें कहीं गंगा में न काशी वाले, नौजवानों का सनीचर है ये बुढ़वा मंगल.
बुढ़वा मंगल के बहुरंगी स्वरूप और उसके तामझाम के बारे में वे ‘नागरी नीरद’ में लिखते हैं :
काशी के पूर्व छोर से लेकर पश्चिम पर्य्यन्त के प्रत्येक घाटों पर जो अनुमान ढाई-तीन कोस के विस्तार में होंगे, काशिराज और नगर प्रतिष्ठित महाजनों से लेकर, मदन पुर के जुलाहों तथा श्मशान के डोमड़ों तक की नौकायें निज शक्ति और श्रद्धा के अनुसार सुसज्जित देख पड़ने लगीं. संख्या भी उनकी और वर्षों की अपेक्षा अधिक है कोई पटैले पर बाँसों के ठाट ठाटे हैं, तो कोई घटहा पाटे हैं, कोई बजड़े पर झाड़ फानूस की सजावट कर नाच नाच देखता, तो कोई मोर पङ्खी सजाये अपना अखाड़ा ला खड़ा किये हैं, किसी ने कोई छोटा मोटा कटर भाड़े कर रंगीन चोब वा तूल लपेट कर गोटे की लहरिया देकर झालरदार चाँदनी तान चार ठो हाँडी नाँद जला कर उजाला किये अपनी सूरत और झलामल कपड़ों की सजावट ही दिखाता घूमता, तो कोई एक पनसुही पर सवार नांच वाली नौकाओं की ताक में डोलता फिरता मानों मेले में भिक्षा सी माँग रहा है.[7]
बुढ़वा मंगल जैसे लोकपर्व के साथ तब बनारस की सड़कों पर दौड़ने वाले इक्के और बग्घी का ज़िक्र भी तेग़ अली अपनी ग़ज़लों में कुछ यूँ करते हैं :
एक्का पै जालऽ राजा तूं मेला तमासा में I
एक घोड़ा बग्घी ले देई तोके बिचार बाय ॥
बनारस का रोज़मर्रा का जीवन भी इन ग़ज़लों में दर्ज़ हुआ है. मसलन, बुलबुल, बटेर जैसे पक्षियों को लड़ाने के खेल के साथ ही भेड़ों को लड़ाने का ज़िक्र भी अपनी एक ग़ज़ल में तेग़ अली कुछ यूँ करते हैं :
बुलबुल बटेर लाल लड़ावऽलैं दुकड़हा
हम काबुली मंगउली है मेढ़ा तोरे बदे
पतंगबाज़ी, जिसके लिए बनारस मशहूर रहा है, का ज़िक्र भी तेग़ अली ने किया है :
मँगा देईला तोहैं पुरबी नख रजा सुन्नर
कि जेके चार खेलाड़ी कहैं कि बा सुन्नर I
बनारसी बोली भी अपने तेवर के साथ तेग़ अली की इन ग़ज़लों मुखर हो उठी है. यही नहीं तेग़ अली बात-बात में राम की क़सम भी खाते हैं, गणेश, गंगा और दुर्गा की सौगंध भी उठाने को कहते हैं.
दुरगा उठावऽ नाहीं तऽ बिछुआ घुसेरीला I
सबके छलब न तेग़ के रमधै छलल करब I
बनारस की बोली का यही रंग और तेवर हमें प्रेमघन द्वारा ‘नागरी नीरद’ में लिखे लेख में आए इस उद्धरण में भी दिखाई पड़ता है :
कहीं बनारसी गुण्डे और अक्खड़ों की बोली ठोलियाँ उड़तीं- क्या सिंघा? – ‘अचूका तो राजा’ – ‘और कैसन दबल जात हौवः’ – ‘कहाँ तोहरे नावै के तौ कट्टर भिड़ौले चलल आवत हँई.’ रंग है झंझर इतो भारी भर्राटे कै आवाज छेड़ल्यः. कहीं कोई चिल्लाता कि ‘तनिक रोकले रहः होः. नाव बढ़ जायद्यः’ – ‘अरे काहे झूरै नाव-नाव चिचियायेल्यः बच्चू अबहियें जहाँ चार डांड़ कसलों कि पल्ले पार कै दिहल’.[8]
तेग़ अली की इन ग़ज़लों से संगीत में उनकी गहरी दिलचस्पी और वाद्य-यंत्रों से जुड़ी उनकी जानकारी का भी अंदाज़ा होता है. करताल, मुरचंग, चिकारा, ढोल, तंबूरा, खंजड़ी, ढोलक, सितार, रमाना (डफ) जैसे वाद्य-यंत्रों के साथ-साथ वे बनारस के उस गुदड़ी बाज़ार का भी ज़िक्र करते हैं, जहाँ इन वाद्य-यंत्रों की दुकानें हुआ करती थीं. वे लिखते हैं :
ले आवऽ गुदड़ी से करतार, जोड़ी औ मुरचंग I
चिकारा, ढोल, तमूरा तयार बटलै बा॥
बजल करऽ ला रजा रात दिन चलऽ देखऽ
चिकारा, खंजड़ी औ ढोलक सितार बहरी ओर ॥
‘तोह के तs ए राजा पूड़ी औ हलुआ खिआईला’
बनारसी खान-पान
बनारस के खान-पान और मिठाइयों का वर्णन भी तेग़ अली ने अपनी इन ग़ज़लों में बारम्बार किया है. भंग-बूटी छानने से लेकर सतुआ, चबेना, बसौंधी, बर्फ़ी, हलवा, पूड़ी (लुचुई), बुनिया, बतासा, खाजा, खुरमा, मगदल का ज़िक्र वे ख़ूब करते हैं. दूध को औंटाकर बनाई गई मिठाई बसौंधी का ज़िक्र तो वे इतनी बार करते हैं कि यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि यह मिठाई उन्हें बहुत प्रिय रही होगी और शायद तब के बनारस में बेहद प्रचलित भी.
लिआइला थोरिक बूटी चलऽ तूँ बैठक में
बसौंधी, बरफ़ी औ पूड़ी तयार बटलै बा
स्वादिष्ट पकवानों के साथ-साथ तेग़ अली सत्तू, चबेना, रहिला (सूखा चना), ठोर्री (बिना लावा फूटा भूँजा या दाना) का भी ज़िक्र करते हैं, जिन्हें आम लोग अपने रोज़मर्रा के जीवन में इस्तेमाल करते थे. जहाँ माशूक़ के लिए वे स्वादिष्ट पकवानों की चर्चा करते हैं, वहीं अपने लिए सतुआ, चबेना रखे होने की बात कहते हैं.
खराई होई बजल आठ चाभ लऽ हलुवा
हमें तऽ सतुआ चबेना तयार बटलै बा
हम खरमिटाव कइली है रहिला चबाय के
भेंवल धरल बा दूध में खाजा तोरे बदे
डन् कै के अपने रोज तऽ रहिला चबाईला
राजा के अपने खुरमा औ बुनिया चभाईला
आज खरचौ तऽ दुकानदार से पउले बाटी I
चलके बैठक में तनी चाभ के मगदल आवऽ
पकवानों के साथ-साथ भंग (बूटी) छानने का उल्लेख भी तेग़ अली करते हैं :
कहाँ तू जालऽ छनै बूटी चलके बैठक में I
रजा फकत बा धतूरा मदार बहरी ओर ॥
बनारस की बात हो और पान का ज़िक्र न हो, भला यह कैसे संभव हो सकता है! पान के साथ-साथ तेग़ अली पान लगाने वाले एक चर्चित तमोली का भी ज़िक्र करना नहीं भूलते.
झोला में लेहले पान तोरे सँग रहल करी
कह देली है रिखइया तमोलिया तोरे बदे I
‘जरदोजी जूता ले लs दुपट्टा बनारसी’
बनारसी पहनावा
पहनावे के सामाजिक इतिहास की ओर हाल के वर्षों में इतिहासकारों का ध्यान नए सिरे-से गया है. बीसवीं सदी के पाँचवें दशक में प्राचीन भारत की वेश-भूषा का इतिहास लिखते हुए इतिहासकार मोतीचन्द्र ने लिखा था कि ‘वेश-भूषा के इतिहास में भारतीय वस्त्रों का भी इतिहास आ जाता है क्योंकि प्राचीन पहरावों में हमारी दिलचस्पी और बढ़ जाती है जब हम ठीक-ठीक जान लेते हैं कि वे किन कपड़ों से बनते थे और बड़े सादे होते थे अथवा नक्काशीदार. भारत के प्राचीन वस्त्र-व्यवसाय के इतिहास के लिए भी ऐसी जाँच-पड़ताल बहुत ज़रूरी है.’[9]
कहना न होगा कि अगर कोई अध्येता उन्नीसवीं सदी के बनारस में पहनावे का सामाजिक इतिहास लिखना चाहे तो तेग़ अली का ‘बदमाश दर्पण’ उसके लिए अपरिहार्य स्रोत होगा. बनारस के पहनावे, वेश-भूषा के तमाम रंग भी तेग़ अली की इन भोजपुरी ग़ज़लों में देखने को मिलते हैं. कुर्ता-धोती से लेकर जूता, टोपी, दुपट्टा, मोतियों की माला, जरदोज़ी के काम वाले कपड़ों का ज़िक्र तेग़ अली करते हैं:
बनवा देइला अबकी देवारी जरदोजी
जूता टोपी दुपट्टा में रामधै तोरे बदे ॥
चढ़ जालैं कौनो दाँव पै सारे तऽ लेईला
कंचन कऽ गोप मोती कऽ माला तोरे बदे ॥
इसी तरह गजरे के लिए इस्तेमाल होने वाले सुगंधित फूलों (बेला, चमेली, जूही), इत्र और दुशाले की चर्चा करते हुए तेग़ अली लिखते हैं :
मलिया से देली कह ऊ लियायल करी रजा
बेला चमेली जूही कऽ गजरा तोरे बदे ॥
अत्तर तू मलके रोज नहायल करऽ रजा
बीसन भरल धयल बा कराबा तोरे बदे ॥
अपने के लोई लेहली है कमरीऔ बा धइल
किनली है रजा लाल दुसाला तोरे बदे ॥
उन्नीसवीं सदी में बनारसी छैलों के पहनावे का ज़िक्र कुछ इसी तरह हमें प्रेमघन के यहाँ भी मिलता है. ‘नागरी नीरद’ पत्रिका में उन्होंने लिखा था :
बहुतेरे बनारसी नवयुवक छैले जिनके सुन्दर मुखारबिन्द पर कलित कामदार टोपियों से लसित घूँघरवाली काली कुन्तलावलि मानो मलिन्द माला सी मनोहर मालूम होती, सर्दई, सन्दली, शर्वती, काफूरी, मोतियई, खसखसी, कपासी, गुलाबासी, गुलाबी और प्याजी बनारसी दुपट्टों जिनसे गुलाब और ख़स के इत्र की सुगन्ध फैल रही है, गले में डाले मानो बहार में खिले नाना रंग के फूलों की बहार दिखलाते तटस्थ तम्बोलियों की दुकानों पर ऐंठे बैठे आँखें लड़ा रहे हैं.[10]
‘लड़े के कुस्ती औ डन् जालैं सैकड़न खेवा’
कुश्ती, लड़ाई और हथियार
कुश्ती की चर्चा जिस प्रकार तेग़ अली ने की है, इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि कुश्ती और पहलवानी में न केवल उनकी गहरी दिलचस्पी थी, बल्कि वे स्वयं पहलवानी के दाँव-पेंच से अवगत थे. मुगदर भांजना, दंड-बैठक करना, कुश्ती लड़ने का ज़िक्र वे प्रमुखता से करते हैं और अपने माशूक़ को भी अखाड़े में उतरने का न्यौता देते हैं.
कुस्ती लड़ा के मल् तोहें राजा बनाईला
खोदीला बइठका में अखाड़ा तोरे बदे
मुगदर हिलावऽ, डन् करऽ, बैठक किहल करऽ I
हम तऽ कहीला छूरी औ कुस्ती लड़ल करऽ ॥
बनारस के पहलवानों की दिनचर्या, जिसमें भोर में गंगाजी में नहाना शामिल था, का हवाला देते हुए तेग़ अली उन अखाड़ों का भी उल्लेख करते हैं, जहाँ वे पहलवानी और वर्जिश के लिए जाते थे. रुद्र काशिकेय ने लिखा है कि तेग़ अली के समय के बनारस में दो प्रसिद्ध अखाड़े थे. एक तो घुँघरानी गली स्थित जग्गू सेठ का अखाड़ा और दूसरा लाहौरी टोले में स्थित मन्ना साव का अखाड़ा. तेग़ अली सम्भवतः मन्ना साव के अखाड़े से जुड़े हुए थे :
नद्दी किनारे जाईला भोरे नहाईला
सहुआ के नित अखाड़े में कुस्ती लड़ाईला ॥
अपने माशूक़ की आँखों की तुलना वे बिछुआ, छुरी से करते हैं. यही नहीं उसकी आँखों के सुरमे की उपमा वे दुधारी बिछुए से देते हैं.
तू काहे फांड़े में बान्हऽ लऽ ए रजा बिछुआ I
तोहार आँख दुऔ दू हजार बा बिछुआ
बहुत तूं बँन्हले फिरऽलऽ छुरी छुरा बिछुआ
तोहें देखाई रजा एक दिन मजा बिछुआ I
दुतर्फी बाढ़ चढ़त बा, न लगउतऽ सुरमा I
तूं आज बान्ह के चलबऽ रजा नवा बिछुआ ॥
माशूक़ की निगाह की तुलना छुरी से करते हुए उन्नीसवीं सदी के ही नामचीन शायर दाग़ देहलवी ने भी क्या ख़ूब कहा है :
अदा से तेरी मगर खिंच रहीं हैं तलवारें
निगह निगह से छुरी पर छुरी निकलती है
मगर तेग़ अली यही नहीं रुकते वे छुरी, बिछुआ, उस्तरा, गोजी (लाठी), लोहांगी (लोहे के कड़े लगी हुई लाठी), ख़ंजर जैसे उन हथियारों का भी ज़िक्र करते हैं, जो उस वक़्त इस्तेमाल किए जाते थे.
आँख सुन्नर नाहीं सारन् से लड़ावत बाटऽ I
जहर कऽ छूरी करेजा में चलावत बाटऽ ॥
ई सुरमा आँख में नाहीं तूं घुलावत बाटऽ I
दुतर्फी बिछुआ पै ई बाढ़ चढ़ावत बाटऽ ॥
जानीला आजकल में झनाझन चली रजा
लाठी लोहांगी खंजर औ बिछुआ तोरे बदे ॥
तेग़ अली उस समय के प्रसिद्ध चाकू बनाने वाली कम्पनी रोजर्स का भी ज़िक्र करते हैं. ग़ौरतलब है कि इंग्लैंड की इस मशहूर कम्पनी की स्थापना जॉन रोजर्स ने 1724 में शेफ़ील्ड में की थी.
जे अबकी होरी में चक्कू बनल बा राजिस कऽ I
ऊ खूनी परले होई खंजरौ छुरा बिछुआ ॥
मज़े की बात है कि माशूक़ की नज़रों की तुलना वे बंदूक़ से चली गोली से भी करते हैं और कहते हैं.
लगल बा आँख कऽ बन्नूक तोरे अब न जियब I
रजा देखावऽ लऽ काहे के जम्बिया बिछुआ ॥
ख़ुद अपने बारे में तेग़ अली ने लिखा है कि वे लाठी चलाने की कला में दक्ष थे. बक़ौल तेग़ अली :
लगावै वाला हई हम हजार में गोजी
सहर में बस्ती में बन में उजार में गोजी॥
लगे हाथ वे चुनार का उल्लेख भी कर देते हैं, जहाँ की लाठियाँ प्रसिद्ध थीं :
पहाड़ी खड़कू से सुनली कि दुइ घड़ी पक्का I
चलल है तेग बरोबर चुनार में गोजी ॥
‘पारस मिलल बा बीच में गंगा के रामधै’
तेग़ अली की कविताई
तेग़ अली की ग़ज़लें अपनी बेबाक़ी और ऐंद्रियता की वजह से साहित्यकारों और अध्येताओं के लिए चुनौती का सबब भी रहीं हैं. यहाँ तक कि ‘लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया’ में बिहारी (भोजपुरी) के नमूने के रूप में ‘बदमाश दर्पण’ से उद्धरण देते हुए जॉर्ज ग्रियर्सन भी असहज हो उठे थे. ग्रियर्सन की टिप्पणी है कि ‘तेग़ अली का यह काव्य-संग्रह बहुत लोकप्रिय है. मगर दुर्भाग्य से ये कविताएँ अनुवाद के लायक़ नहीं हैं.’ अचरज की बात है कि ग्रियर्सन ने तेग़ अली की ग़ज़लों को कृष्णभक्ति काव्य के रूप में देखा. ग्रियर्सन की मानें तो तेग़ अली ने ये ग़ज़लें कृष्ण की प्रशंसा में कही हैं. ग्रियर्सन इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे इसका कोई विवरण उन्होंने नहीं दिया. यह ठीक है कि अपनी एक ग़ज़ल में तेग़ अली ने माशूक़ को कन्हैया कहा है (किरपा किहल करs ए कन्हैया कबौं-कबौं, या फिर दरसन दिहल करs ए कन्हैया कबौं-कबौं), पर केवल इस अधार पर उनकी ग़ज़लों को कृष्णभक्ति काव्य की श्रेणी में रखना सर्वथा अनुचित होगा.
विक्टोरियायुगीन नैतिकता का प्रभाव भी शायद ग्रियर्सन पर रहा होगा, जो वे ‘बदमाश दर्पण’ के विषय में यहाँ तक लिख जाते हैं कि ‘धार्मिक कविता भी किस निम्न स्तर तक गिर सकती है, उसका प्रमाण ये संग्रह है.’[11] हालाँकि रुद्र काशिकेय और नारायणदास जैसे ‘बदमाश दर्पण’ के बाद के भाष्यकार ग्रियर्सन सरीखी कोई व्याख्या नहीं करते और न ही ‘बदमाश दर्पण’ में कृष्णभक्ति के सूत्र तलाशते हैं. हाँ, तेग़ अली की ग़ज़लों में वर्णित विषय को लेकर असहजता इन भाष्यकारों में भी दिख जाती है. रुद्र काशिकेय इन ग़ज़लों में वर्णित विषय को उर्दू का प्रभाव मानते हैं और उन्हें बनारस की संस्कृति से अलगाने की कोशिश करते हुए कहते हैं :
तेग़ अली की ग़ज़लों में ‘अमरदपरस्ती’ का जो वीभत्स चित्रण है, उससे यह भ्रम न होना चाहिये कि वह काशी की संस्कृति है. वह विशुद्ध उर्दू का प्रभाव है, युग की छाया है. उर्दू के बड़े-से-बड़े कवि का माशूक नारी नहीं, निमूंछिया पुरुष ही होता था.[12]
तेग़ अली की ग़ज़लों में समलैंगिकता की मौजूदगी को रुद्र काशिकेय द्वारा ‘विशुद्ध उर्दू का प्रभाव’ बता देना ऐतिहासिक सच्चाई से मुँह मोड़ना ही कहा जा सकता है. जाहिर है कि ये ग़ज़लें और उनमें वर्णित विषय सिर्फ़ उर्दू के प्रभाव भर से तो नहीं बने होंगे. बनारस के समाज और उसके ताने-बाने में इसके तत्त्व कुछ अंश में ही सही मौजूद ज़रूर रहे होंगे, तभी वे इन ग़ज़लों में इतने मुखर रूप में सामने आए हैं.
श्लीलता-अश्लीलता, समलैंगिकता की इन बहसों को यहीं छोड़कर हम तेग़ अली की कविताओं की ओर वापस लौटते हैं. तेग़ अली की ग़ज़लों में आख़िर ऐसा क्या था, जो उन्हें इस कदर लोकप्रियता और मक़बूलियत हासिल हुई. सबसे पहली बात जो उनकी ग़ज़लों को लोकप्रियता दिलाने में कारगर साबित हुई होगी, वह थी बनारस की रोज़मर्रा की बोलचाल की भाषा में लिखी उनकी धारदार ग़ज़लें, जो ज़बान पर यक़बारगी चढ़ जाती हैं.
‘बदमाश दर्पण’ में संकलित एक ऐसी ही ग़ज़ल की पंक्तियाँ देखिए, जहाँ वे माशूक़ से शिकायत के लहजे में कहते हैं कि तड़पाकर मार डालने में माशूक़ ने तो कोई कसर नहीं उठा रखी है, मगर इस सूरत में भी जब वे अपनी आँखें मूँदते हैं, तो माशूक़ का चेहरा सामने आ जाता है और उतना ही उनके लिए जीने की वजह बन जाता है.
नाहीं मुऐ में लगउलऽ रजा तूं कुछ धोखा I
पै आँख मून के देखीला तब जिअत बाटी ॥
वहीं एक दूसरी ग़ज़ल में वे माशूक़ के साथ दिन-रात उसकी परछाईं की तरह चलने और उसकी आँखों में पुतली की तरह समाए होने की बात कहते हैं.
साथ परछाहीं मतिन् राजा फिरीला दिनरात
बनके पुतरी तोरे आँखिन में समायल बाटी ॥
तेग़ अली जिस आशिक़ की शख़्सियत को अपनी ग़ज़लों में पेश करते हैं, गढ़ते हैं, वह कोई मजबूर, लुटा-पिटा, बात-बात पर आहें भरने वाला आशिक़ नहीं है. यह आशिक़ ख़ुदा-ए-सुख़न मीर तक़ी मीर की ग़ज़लों में वर्णित आशिक़ की तरह है, जिसको माशूक़ से बेइंतहा इश्क़ है, लेकिन साथ ही उसे अपना आत्मसम्मान भी उतना ही प्यारा है. वह माशूक़ के लिए रक़ीबों से लड़ता-भिड़ता है, माशूक़ की नज़रसानी का बेसब्री से इंतज़ार करता है, पर अपने वजूद और शख़्सियत को भी संभाले रखता है. इसी माशूक़ के चलते वह अपने-पराए, दोस्त-दुश्मन सभी से वैर मोल लेने में भी हिचकता नहीं है.
आपन परावा भाई औ संघी तोरे बदे
जउनेके देखऽ जान कऽ दुस्मन बा आजकाल ॥
बातें बनाने में भी तेग़ अली का कोई जोड़ नहीं. एक जगह कहते हैं कि जलसाईं घाट (जहाँ मरणासन्न व्यक्तियों को मृत्यपूर्व गंगा के पास सुलाया जाता था) पर इतना उजाला इसलिए हो जा रहा है क्योंकि माशूक़ पर मरने वालों की तादाद इतनी है कि श्मशान पर लगातार लाशें जलती रहती है और चिताओं की आग से जलसाईं घाट तक रोशनी फैली रहती है.
देखीला केतने सारन से चटपट तोरे बदे I
जलसांई कऽ अँजोर हौ मरघट तोरे बदे ॥
माशूक़ को पाने के लिए जो ज़ोर-आज़माइश आशिक़ करता है, उसी सिलसिले में वह हर उस दरबार में, पीर-फ़क़ीर और देवता के सामने भी हाज़िरी लगाता है, जहाँ से उसे अपना काम होने यानी माशूक़ का संग-साथ मिलने, उसकी नज़रें इनायत होने की उम्मीद नज़र आती है. बक़ौल तेग़ अली :
पत्थर के पानी आग में बायू के सामने I
जा जा के रजा मूड़ झंकावल तोरे बदे ॥
जैसे कोई मासूम चिड़िया बहेलिये के जाल में फँस गई हो और जाल से छूटने की कोई सूरत दूर-दूर तक नज़र न आती हो, ठीक वैसे ही तेग़ अली का आशिक़ भी माशूक़ की ज़ुल्फ़ों के जाल में फँसा हुआ है.
ए राजा देखीला जुलफी के जाल से तोरे I
छुटब न रामधै चिरई मतिन बझल बाटी ॥
मीर तक़ी मीर ने माशूक़ की ज़ुल्फ़ों की क़ैद के बारे में कुछ इसी अंदाज़ में कहा था :
हम हुए तुम हुए कि ‘मीर’ हुए
उसकी ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए
बदमाश दर्पण में संकलित इन ग़ज़लों में तेग़ अली कहीं-कहीं रहस्यवादी बाना अपनाते नज़र आते हैं और दार्शनिकता की ऊँचाइयाँ भी छूते हैं. मसलन, अपनी एक ग़ज़ल में वे ईश्वर को ऐसा कुम्हार बताते हैं, जो इंसान रूपी मूर्तियाँ गढ़ता है और फिर उन्हें बिगाड़ देता है, मिट्टी में मिला देता है. मूर्तियाँ गढ़ना और उन्हें मटियामेट कर देना – ये सब मानो उसके लिए एक खेल है, जिससे वह अपना दिल बहलाता है.
कइसन बना बना के बिगारऽला मूरती
ए ‘तेग’ तोसे पूछीला कइसन कोहार बाय॥
एक जगह वे यहाँ तक कहते हैं कि बहस में तो वे नास्तिक और अनीश्वरवादियों (दहरी या लामजहब) को भी पीछे छोड़ देते हैं, निरुत्तर कर देते हैं. मगर माशूक़ के सामने उनकी एक नहीं चलती, उसके सामने आते ही वे लाजवाब हो जाते हैं, उसके क़ायल हो जाते हैं.
नास्तिक अउर दहरियन के हरा देईला
एक फकत तोहीं से हम रामधै क़ायल बाटी II
ये चंद उदाहरण तेग़ अली की ग़ज़लों की लोकप्रियता की वजह बताने और उनकी कविताई की बानगी देने के लिए पर्याप्त हैं. इक्कीसवीं सदी में समलैंगिकता और जेंडर को लेकर हो रहे विमर्शों ने रूथ वनिता और चौधरी मोहम्मद नईम जैसे विद्वानों का ध्यान उर्दू की रेख़्ती कविताओं की ओर नए सिरे-से खींचा.[13] इन विमर्शों ने उर्दू की रेख़्ती कविताओं को सेक्सुअलिटी और जेंडर की राजनीति के बरअक्स पढ़ने की कोशिश की है.
इसी क्रम में तेग़ अली की रचनाओं की ओर भी विद्वानों का ध्यान आकृष्ट हुआ और ‘बदमाश दर्पण’ को लेकर फिर से चर्चाएँ शुरू हुई हैं. निस्संदेह इन हस्तक्षेपों का अपना महत्त्व है और ‘बदमाश दर्पण’ में संकलित ग़ज़लों में जेंडर और समलैंगिकता के पहलुओं को भी लक्षित किया जा सकता है और किया भी जाना चाहिए. पर इन विमर्शों के इतर इतिहास के अध्येता के रूप में मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि उन्नीसवीं सदी के औपनिवेशिक बनारस को समझने, बनारस के सामाजिक इतिहास को लिखने के लिए तेग़ अली कृत ‘बदमाश दर्पण’ एक अपरिहार्य स्रोत है. इसकी कुछ मिसालें इस लेख में ऊपर मैंने पेश की हैं.
संदर्भ
[1] पण्डित रविदत्त शुक्ल, देवाक्षर चरित्र (बनारस : लाइट प्रेस, 1884).
[2] रामकृष्ण वर्मा, बिरहा नायिकाभेद (काशी : भारत जीवन प्रेस, 1900).
[3] तेग़ अली, बदमाश दर्पण (काशी : भारत जीवन प्रेस, 1906 [1889]), तृतीय संस्करण.
[4]प्रोसिडिंग्स ऑफ़ द एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल, जनवरी-दिसंबर 1889 (कलकत्ता : बैप्टिस्ट मिशन प्रेस, 1890).
[5] रुद्र काशिकेय, तेग़ अली और काशिका (वाराणसी : ज्ञानमंडल लिमिटेड, 1964).
[6] तेग़ अली, बदमाश-दर्पण, नारायण दास (सम्पा.) (वाराणसी : विश्वविद्यालय प्रकाशन, 2002).
[7] प्रभाकरेश्वर प्रसाद उपाध्याय व दिनेशनारायण उपाध्याय (सम्पा.), प्रेमघन-सर्वस्व, भाग 2 (प्रयाग : हिन्दी साहित्य सम्मेलन, 2003), पृ. 116-117.
[8] वही, पृ. 117.
[9] मोतीचन्द्र, प्राचीन भारतीय वेश-भूषा (प्रयाग : भारती-भंडार, 1950), पृ. 2.
[10] प्रेमघन सर्वस्व, भाग 2, पृ. 121.
[11] जॉर्ज ग्रियर्सन (सम्पा.), लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया (स्पेसीमन ऑफ़ द बिहारी एंड उड़िया लैंगवेज़ेज), खंड 5, भाग 2 (कलकत्ता : गवर्नमेंट प्रिंटिंग प्रेस, 1908), पृ. 273-276.
[12] रुद्र काशिकेय, तेग़ अली और काशिका, पृ. 11.
[13] सी.एम. नईम, “ट्रांसवेस्टिक वर्ड्स? : द रेख़्ती इन उर्दू”, एनुअल ऑफ़ उर्दू स्टडीज़, अंक 16 (2001), पृ. 3-26; साथ ही देखें, रूथ वनिता, जेंडर, सेक्स एंड द सिटी : उर्दू रेख़्ती पोइट्री इन इंडिया, 1780-1870 (न्यूयॉर्क : पालग्रेव मैकमिलन, 2012).
युवा इतिहासकारों में उल्लेखनीय शुभनीत कौशिक बलिया के सतीश चंद्र कॉलेज में इतिहास के शिक्षक हैं. जवाहरलाल नेहरू और उनके अवदान पर केंद्रित पुस्तक ‘नेहरू का भारत: राज्य, संस्कृति और राष्ट्र-निर्माण’ (संवाद प्रकाशन, 2024) का सह-सम्पादन किया है. पत्र पत्रिकाओं में हिंदी-अंग्रेजी में लेख आदि प्रकाशित हैं.ईमेल : kaushikshubhneet@gmail.com |

युवा इतिहासकारों में उल्लेखनीय शुभनीत कौशिक बलिया के सतीश चंद्र कॉलेज में इतिहास के शिक्षक हैं. जवाहरलाल नेहरू और उनके अवदान पर केंद्रित पुस्तक ‘नेहरू का भारत: राज्य, संस्कृति और राष्ट्र-निर्माण’ (संवाद प्रकाशन, 2024) का सह-सम्पादन किया है. पत्र पत्रिकाओं में हिंदी-अंग्रेजी में लेख आदि प्रकाशित हैं.


दिल से आभार, अपार आनंद की प्राप्ति हुई. कई भूले हुए शब्द याद आए, कई शब्दों के नए अर्थ, शायरी और लोकजीवन की ग़ज़ब छटा दिखी, दिन बन गया. इतिहास के ऐसे पन्ने मिलते रहने चाहिए.
समालोचन इस लेख के लिए शुभनीत कौशिक को बधाई। बहुत बढ़िया लेख। नए ढंग का।