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समालोचन

Home » उद्भ्रांत की आत्मकथा : धीरंजन मालवे

उद्भ्रांत की आत्मकथा : धीरंजन मालवे

रमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’ (4 सितम्बर, 1948) की आत्मकथा ‘मैंने जो जिया’ के तीन खंड प्रकाशित हो चुके हैं. कवि की कथा के साथ-साथ यह अपने समय की भी कथा है. इन तीनों खंडों की चर्चा कर रहे हैं, धीरंजन मालवे.

by arun dev
December 13, 2025
in समीक्षा
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उद्भ्रांत की आत्मकथा :  धीरंजन मालवे
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उद्भ्रांत की आत्मकथा
धीरंजन मालवे

बकौल नामवर सिंह उद्भ्रांत हिंदी की स्वातंत्र्योत्तर पीढी के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं. छह दशकों से भी अधिक समय से निरंतर चल रही उनकी साहित्य साधना उम्र के आठवें दशक के उत्तरार्ध में भी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ गतिशील है. उद्भ्रांत की पहचान मूलतः एक कवि के रूप में है और उनकी काव्य प्रतिभा ने कविता के हर रूप को समृद्ध किया है. आप नाम गिनते जाएँ-महाकाव्य, खंड काव्य, समकालीन कविताएँ , गीत, और नवगीत के साथ ग़ज़ल भी. लेकिन उनकी बहुमुखी प्रतिभा की व्याप्ति काव्य से इतर विधाओं को भी अपने में समेटती है, जैसे, उपन्यास, कहानियाँ, समीक्षाएं और निबंध. साथ ही, वे सम्पादन और प्रकाशन का भी व्यापक अनुभव रखते हैं. गद्य पर उनका अधिकार इस विवाद को जन्म दे सकता है कि वे अच्छे कवि हैं या अच्छे गद्यकार. मगर यह निर्विवाद है कि वे हिंदी के सम्पूर्ण साहित्यकार हैं.

एक जाने-माने लेखक के जीवन के बारे में पाठकों की जिज्ञासा अत्यंत स्वाभाविक है. पाठक यह अवश्य ही जानने चाहेंगे कि उनके अंदर के साहित्यकार के निर्माण में किन-किन कारकों ने अपनी भूमिका निभाई है? उनका निजी, पारिवारिक, सामाजिक, शैक्षणिक और पेशागत जीवन कैसा रहता आया है? उनमें कौन से उतार-चढ़ाव आते रहे हैं? वे कौन से तत्व हैं जिन्होंने उनके विचारों और विश्वासों को आकार दिया है? उनके ह्रदय और मस्तिष्क पर किन-किन व्यक्तियों, घटनाओं और परिस्थितियों का प्रभाव रहा है? वे सांचे कौन-कौन से हैं जिनसे उनके जीवन मूल्यों, उद्देश्यों तथा इनको लेकर जुनून और समर्पण की निर्मिति हुई है? पाठकों की इन स्वाभाविक जिज्ञासाओं का शमन लेखक का दायित्व बन जाता है.

इस दायित्व का निर्वहन तलवार की धार पर चलने के समान है. किसी उपन्यास की ही तरह आत्मकथा में भी कई चरित्र होते हैं; एक कथानक होता है तथा इससे सम्बद्ध घटनाओं का प्रवाह होता है. उपन्यास की तरह ही आत्मकथा में भी वर्णन के उस शिल्प और कौशल की आवश्यकता होती है जो पाठकों को अंत तक बाँध कर रख सके. लेकिन जहाँ उपन्यास के पात्र और घटनाएं लेखक की कल्पना की उपज होते हैं वहीँ आत्मकथा में कल्पना की लेशमात्र भी गुंजाइश नहीं होती. सच्चाई वास्तव में आत्मकथा की आत्मा होती है. उसके साथ समझौता आत्मा का हनन है. आत्मकथा वास्तव में लेखक और पाठक के बीच एक नैतिक करार है जिसमें लेखक पाठक से यह अलिखित वादा करता है कि वह अपनी कृति में सच्चाई के साथ कोई भी समझौता नहीं करेगा और पाठक को यह अधिकार देता है कि वह कृति के हर शब्द को सत्य मान कर चले.

आत्मकथा की रचना में लेखक के सामने वस्तुपरकता को लेकर एक बड़ी चुनौती सामने आती हैं. उपन्यास का मुख्य चरित्र लेखक की कल्पना द्वारा निर्मित होता है और इस प्रकार लेखक और मुख्य चरित्र अलग-अलग प्राणी हो जाते हैं. ऐसे में लेखक के लिए अपने पात्रों से दूरी बनाते हुए वस्तुपरक बने रहना सहज हो जाता है. लेकिन आत्मकथा में जो लेखक होता है वही कथानक का मुख्य चरित्र भी है. ऐसे में लेखक के लिए दोनों के बीच एक वस्तुपरक विभेद करना जितना बाध्यकारी होता है उतना ही कठिन भी. वस्तुपरकता स्वयं के प्रति निर्ममता की अपेक्षा रखती है. लेखक से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपनी खूबियों और सफलताओं को जिस प्रकार उजागर करेगा ठीक उसी प्रकार अपनी कमियों और असफलताओं को भी सामने रखेगा ताकि पाठकों के सामने उसका सच्चा स्वरूप आ सके. अपने प्रति निर्मम होना एक दुष्कर कार्य है और बहुत संभव है कि लेखक आत्मश्लाघा का अपना लोभ संवरण नहीं कर सके. ऐसा होने पर आत्मकथा का स्तर और गुणवत्ता गिर जाते हैं और वह पाठकों की कसौटी पर खरा उतरने की बजाय एक निम्न कोटि की रचना बन जाती है.

वस्तुपरकता की चुनौती केवल कथानक के मुख्य पात्र तक ही सीमित नहीं है. वैसे तो आत्मकथा एक लेखक के द्वारा अपने विगत जीवन का स्वयं द्वारा किया गया मूल्यांकन होती है, लेकिन इसके बावजूद पाठकों की यह भी अपेक्षा होती है कि वह अपने मूल्यांकन में पात्रों तथा कथानक से जुडी  विभिन्न घटनाओं का एक वस्तुपरक विवरण और विश्लेषण प्रस्तुत करे. यहाँ कठिनाई का अनुमान लगाया जा सकता है. वास्तविक जीवन में उन पात्रों और घटनाओं से लेखक का साबका व्यक्तिगत स्तर पर पड़ा होता है और उन्होंने उसके चेतन और अवचेतन मानस पर सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों प्रकार का प्रभाव छोड़ा हुआ होता है. कई प्रभाव अत्यंत गहरे और स्थाई भी हो सकते हैं. ऐसे में अपने वर्णन के क्रम में उन पात्रों और घटनाओं से अपनी एक वस्तुपरक दूरी बनाते हुए, उन्हें एक निरपेक्ष द्रष्टा भाव से देखते हुए उकेर पाना आसान नहीं हो सकता. लेकिन आत्मकथा के लेखक के लिए यह आवश्यक शर्त है क्योंकि आत्मकथा केवल उसके अपने जीवन का ही विवरण न होकर एक कालखंड विशेष में उस समाज का भी एक आधिकारिक दस्तावेज़ है जिसने उसे एक लेखक के रूप में गढ़ने में अपनी भूमिका निभाई होती है. पाठक आत्मकथा को इसी रूप में लेता है और उसके इस विश्वास की रक्षा करना लेखक का धर्म बन जाता है.

अब तक उद्भ्रांत की आत्मकथा के तीन खंड प्रकाशित हो चुके हैं और इन तीनों खण्डों का पाठक होने के नाते मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि एक लेखक के रूप में उद्भ्रांत उपर्युक्त मानदंडों पर खरे साबित हुए हैं. अपनी सार्वजनिक छवि के प्रति बेपरवाह रहते हुए उन्होंने अपने जीवन से जुडी विभिन्न घटनाओं का चित्रण अत्यंत बेवाकी से और बिना किसी लागलपेट के किया है. उनकी बेवाकी तीनो खण्डों में निरंतर हमारे सामने आती रहती है. वैसे भी बेबाकी उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग हैं और वे “न ब्रूयात सत्यमप्रियं” के आर्ष वाक्य को बाला-ए-ताक रखते आए हैं, बिना किसी नुकसान की परवाह किये हुए.

आत्मकथाओं में चूंकि लेखक ही मुख्य पात्र होता है, अतः वह पूरे कथानक में स्वयं को उत्तम पुरुष के रूप में संबोधित करता है. लेकिन इस प्रचलित शैली को नकारते हुए उद्भ्रांत ने मुख्य पात्र के लिए अन्य पुरुष का सहारा लिया है. वे कथानक में मुख्य पात्र की भूमिका रमाकांत को सौंप देते हैं. वैसे तो रमाकांत और कोई नहीं, उद्भ्रांत स्वयं ही हैं, लेकिन वे अपनी इस विशिष्ट शैली का सहारा लेते हुए मुख्य पात्र से अपनी लेखकीय दूरी बना पाने का एक सार्थक प्रयत्न करते हैं और उनकी पूरी कोशिश रहती है कि कथानक की यात्रा को एक तटस्थ दर्शक के रूप में देखा और वर्णित किया जाए.

पहले खंड ‘बीज की यात्रा’ उनके जीवन के पहले सत्ताईस वर्षों का वृत्तान्त है और इसका कालखंड पिछली सदी का तीसरा चतुर्थांश है. इस खंड में हम उद्भ्रांत के परबाबा और माता-पिता के जीवन-प्रसंगों से गुजरते हुए उनके जन्म से लेकर गार्हस्थ्य जीवन में प्रवेश तक का विवरण पाते हैं. यहाँ हम इस खंड और ब्रितानी राजनेता चर्चिल की आत्मकथा “माय अर्ली लाइफ” के बीच एक समानता भी पाते हैं क्योंकि चर्चिल की आत्मकथा भी उनके जन्म से शुरू होती है और विवाह पर जा कर ख़त्म होती है. लेकिन एक बड़ा अंतर भी है; चर्चिल ने अपनी इस आत्मकथा को यहीं पर विराम दे दिया था लेकिन उद्भ्रांत अपनी आत्मकथा को तीन खण्डों तक प्रकाशित करा चुके हैं और आगे भी इसे जारी रखने का इरादा रखते हैं.

उद्भ्रांत का जन्म राजस्थान के नवलगढ़ में हुआ था जहाँ उनके पिता अपनी नौकरी के सिलसिले में पदस्थापित थे. इस प्रकार प्रथम खंड अपनी आंचलिकता में नवलगढ़ से कानपुर तक का इलाका समेटता है और इन दोनों के बीच में आगरा, रामपुर, दिल्ली इत्यादि को भी समाहित करता है. इस बहाने पाठक को प्रथम खंड में इस पूरे अंचल के पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक और शैक्षणिक परिवेश की बानगी लेखक के दृष्टिकोण से मिल जाती है. इसके साथ ही पाठक हाल में ही स्वतंत्र हुए भारत की आशाओं और आकांक्षाओं से भी रूबरू होता है.

प्रथम खंड केवल उद्भ्रांत की निजी जीवन गाथा नहीं है. इसमें मध्यम वर्ग का हर वह शिक्षित व्यक्ति अपने जीवन का प्रतिबिम्ब देख सकता है जिसके पास न तो कोई जायदाद है, न कोई पूंजी और न व्यापार का कोई अनुभव. लेदे कर जीवन-यापन का यही मार्ग बच जाता है कि वह पढ़ लिख कर कोई नौकरी पा जाए. जो इस खांचे में नहीं समा पाता; वह अपनी अन्य दूसरी प्रतिभाओं के बावजूद नालायक घोषित कर दिया जाता है. वह अपने माता-पिता का निरंतर कोपभाजन तो बनता ही रहता है, रिश्तेदारों द्वारा भी अपमानित होते रहने के लिए अभिशप्त होता है. उद्भ्रांत की साहित्यिक प्रतिभा भले ही बचपन से ही सामने आने लगी थी; लेकिन परिवार वालों और रिश्तेदारों के सामने उसका कोई मोल नहीं था; क्योंकि औपचारिक शिक्षा के क्षेत्र में उनका प्रदर्शन स्थापित मानदंडों के अनुरूप नहीं था. प्रथम खंड में इस विडम्बना का चित्रण हम उद्भ्रांत द्वारा भोगे हुए यथार्थ के रूप में पाते हैं. यह विडम्बना हमारी उस शिक्षा प्रणाली पर करारा प्रहार है जो व्यक्ति की असली प्रतिभा को संपोषित और संवर्धित करने के स्थान पर उसे ठोक-पीट कर नौकरी के बाज़ार में बेचे जाने वाले एक उत्पाद के रूप में तैयार करने में जुटी रहती है.

प्रथम खंड में हम पाते हैं कि उद्भ्रांत के अंदर नैसर्गिक रूप से विद्यमान लेकिन बाह्य जगत की पथरीली भूमि के अन्दर दबा साहित्यिक बीज बाहर की खुली हवा में पुष्पित तथा पल्लवित होने के लिए निरंतर संघर्षरत है और एक वटवृक्ष बनने को छटपटा रहा है. पहला खंड इसी छटपटाते बीज के अंकुरण की राम कहानी है; और अपने नाम को सार्थक करता है.

दूसरे खंड में अंकुर के रूप में प्रस्फुटित इस बीज को हम आनेवाले तेरह वर्षों में एक कठिन और संघर्षपूर्ण राह से गुजरता हुआ पाते हैं. शीर्षक अत्यंत मौजू है – ‘जिस राह से गुज़रा हूँ’. इन तेरह वर्ष के दौरान उद्भ्रांत को अपने अन्दर के साहित्यिक बिरवे की रक्षा और विकास के लिए कई स्तरों पर जूझना पड़ता है. उनके सामने अनेक दिशाओं से चुनौतियां आती रहती हैं.

ब्रिटेन और अमरीका जैसे विकसित देशों में साहित्य सृजन एक अत्यंत लाभकारी पेशे के रूप में विकसित हो चुका है और एक अच्छा साहित्यकार केवल अपनी कलम के बूते पर स्वयं के लिए एक आरामदेह जीवन और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित कर सकता है. लेकिन भारत में, और खासकर हिन्दी जगत में, लक्ष्मी और सरस्वती के बीच अनवरत युद्ध की स्थिति रहती है. यह लगभग अकल्पनीय है कि कोई चोटी का हिंदी साहित्यकार भी केवल साहित्य सेवा के बूते पर अपनी गृहस्थी की गाडी को कुछ कदम भी आगे खींच ले. उसके लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह साहित्य सृजन से इतर आय का कोई नियमित श्रोत तलाशे.

उद्भ्रांत के पास भी अपने विवाह के बाद एक लम्बे समय तक आय का कोई ऐसा श्रोत नहीं था जिसे संतोषजनक और नियमित कहा जा सके. इस आर्थिक अनिश्चितता के बीच वे एक के बाद एक तीन बेटियों के पिता बन जाते हैं. अब उनके सामने दाल-रोटी का जुगाड़ करने की चुनौती तो है ही, तीन बेटियों की समुचित शिक्षा-दीक्षा का भी विकट दायित्व उपस्थित हो चुका है. अपनी गृहस्थी की गाड़ी को आगे खींचने के लिए वे संघर्षरत रहते हैं और जो कुछ भी काम मिल जाता है, उसे पतवार बना कर संसार सागर में किसी प्रकार अपने परिवार की नैया को उत्ताल तरंगों के बीच खेने लग जाते हैं.

जिम्मेदारियों और कठिनाइयों से भरे निजी जीवन के साथ-साथ संयुक्त परिवार से जुड़ी समस्याओं से भी लेखक को जूझते रहना पड़ता है. परिवार को उनसे अपेक्षाएं रहती हैं जिन्हें पूरा कर पाने में वे स्वयं को असमर्थ पाते हैं. माता-पिता तो उनसे अप्रसन्न रहते ही हैं, छोटा भाई भी शत्रुवत व्यवहार करता है.उधर सास-बहू का आपसी कलह! संयुक्त परिवार से जुड़ी अपनी निजी दास्तान के बहाने उद्भ्रांत सभी मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवारों की अंतर्कथा वर्णित कर जाते हैं. घर-घर देखा, एक ही लेखा!

कुछ वर्षों के बाद आर्थिक मोर्चे पर किस्मत मेहरबान होती है और वे पहले, कर्मचारी राज्य बीमा निगम की पटना शाखा में हिंदी अधिकारी की नौकरी पा जाते हैं और बाद में उन्हें अपने गृह नगर कानपुर स्थित भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम में हिन्दी सह जनसंपर्क अधिकारी की और भी बेहतर नौकरी मिल जाती है.

उद्भ्रांत नौकरी के लिए पूरी तरह से बने नहीं हैं मगर इसके बिना कोई और चारा भी नहीं है. उधर दफ्तर के माहौल का साहित्य से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है, ऊपर से छुटभैया अंदरूनी राजनीति! दफ्तर के लोग उनसे द्वेष रखते हैं और उनके विरुद्ध अनवरत षडयंत्र चलते रहते हैं; नौकरी पर भी बन आती है.

अगर कोई सामान्य व्यक्ति होता तो ऊपर वर्णित पारिवारिक और पेशागत चुनौतियां उसके अन्दर के साहित्यकार को अपनी अजगर सरीखी कुण्डली में जकड़ कर उसे अपना ग्रास बना लेतीं. लेकिन उद्भ्रांत तो किसी और ही मिट्टी के बने हैं. इन चुनौतियों से जूझते हुए वे अपने अन्दर के साहित्यकार को जीवित रखते हैं; इस क्रम में वे अपनी बचत को अपने और अपने परिवार के भविष्य की सुरक्षा के लिए निवेशित करने की बजाय अपनी पुस्तकों के प्रकाशन में लगाते हैं. साथ ही साहित्यिक समारोहों में भी भागीदारी करते हैं और लम्बी साहित्यिक यात्राएं भी करते रहते हैं. उद्भ्रांत के आत्मबल के स्नेह से उनके अन्दर का साहित्यिक दिया ज़िंदगी के तूफ़ान में हमेशा ही जलता रहता है.

दूसरे खंड के बहाने उद्भ्रांत ने अपनी आपबीती के माध्यम से सरकार और समाज द्वारा हिन्दी साहित्य और साहित्यकारों की निरंतर की जाती रही उपेक्षा पर तो तीखा प्रहार किया ही है, सरकारी कार्यालयों में हिन्दी की दुरावस्था का भी यथार्थपरक चित्रण किया है. वैसे तो हर सरकारी कार्यालय में हिंदी अधिकारी की तैनाती की जाती है लेकिन वह वहाँ का सर्वाधिक उपेक्षित प्राणी होता है; पूरे साल में हिन्दी पखवाड़ा ही वह अपवाद है जिसमें वह सहकर्मियों को अपने होने का कुछ अहसास दिला पाता है. उद्भ्रांत यह अच्छी तरह से रेखांकित कर पाते हैं कि सरकारी कार्यालयों में हिन्दी का प्रयोग इतना सीमित क्यों है !

इस खंड की एक बड़ी उपलब्धि मैं यह कहूँगा कि इसके माध्यम से हमें आठवें और नवें दशकों के दौरान हिन्दी के साहित्यिक परिदृश्य की कुछ अत्यंत प्रामाणिक झांकियां मिलती हैं. साथ ही हम बच्चन जी और मधुकर गंगाधर सहित हिन्दी के कई मूर्धन्य साहित्यकारों को और भी करीब से जान पाते हैं.

आत्मकथा का हाल ही में प्रकाशित तीसरा खंड दिसंबर १९८७ से शुरू होकर अप्रैल १९९५ तक जाता है और उनके जीवन के अगले सवा सात वर्षों की संघर्षमय यात्रा को चित्रित करता है. जीवन यात्रा का यह दौर ऐसा है मानो कोई मुसाफिर काली रात के अँधेरे से जूझता हुआ आगे बढ़ता चला जा रहा हो. इसीलिए लेखक ने इसका शीर्षक दिया है – ‘काली रात का मुसाफिर’.

सवा सात साल के इस कालखंड के पहले सवा तीन साल की राह अत्यंत कंटकाकीर्ण थी. भारतीय कृत्रिम अंग निर्माण निगम में दफ्तरी राजनीति से परेशान होकर उन्होंने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया. उनके शुभचिंतकों के अनुसार यह उनकी कवि सुलभ भावुकता थी क्योंकि उस समय उनके पास किसी अन्य नौकरी का विकल्प नहीं था. इतना अवश्य था कि उन्होंने आकाशवाणी और दूरदर्शन के केन्द्र निदेशकों के पदों के लिए यूपीएससी के विज्ञापन के जवाब में आवेदन कर रखा था और उन्हें विश्वास था कि वे अवश्य ही चुन लिए जायेंगे. लेकिन यह बादल को देख कर घड़े फोड़ने वाली बात साबित हुई. चयन प्रक्रिया मुकदमे में उलझ गयी.

बेरोज़गारी के इस दौर में बिना किसी नियमित आय के घर चलाना जब कठिन हो गया तो उनके मन में यह विचार आया कि क्यों न स्वयं द्वारा लिखित पुस्तकों के प्रकाशन का व्यवसाय शुरू किया जाय. नौकरी छोड़ते समय उन्हें निवृति लाभ के रूप में जो एकमुश्त रकम मिली थी उसका एक बड़ा हिस्सा प्रकाशन योजना की भेंट चढ़ गया. किताबें छपवाने के बाद उन्हें बेचने की समस्या आ खड़ी हुई. उद्भ्रांत एक लेखक थे और प्रकाशन के व्यापार पक्ष का न तो कोई अनुभव था न ही इसके लिए आवश्यक मानसिकता. लेकिन चारा भी क्या था! आर्थिक संकट से जूझने के लिए उन्होंने अपने संपर्कों का उपयोग करते हुए विश्वविद्यालय और इसके कॉलेजों के पुस्तकालयों में अपनी पुस्तकें खपाने की कोशिशें शुरू कर दीं . इस काम में उन्हें अनेक कड़वे अनुभव हुए और अपमान के घूँट पीने पड़े. अगर कोशिशों के बाद कहीं से पुस्तकों की खरीद का आदेश मिल भी जाता था तो भुगतान में देर लगती थी और परिवार की गाड़ी डगमगा जाती थी. इस गाढ़े समय में लेखक की पत्नी ने अत्यंत सार्थक भूमिका निभाई. वे शिक्षित तो थीं लेकिन पारिवारिक परम्परा का निर्वहन करते हुए उन्होंने अभी तक अपनी भूमिका गृहस्वामिनी तक ही सीमित रखी थी. परन्तु घर में व्याप्त आर्थिक संकट को देखते हुए उन्होंने पास के ही एक स्कूल में शिक्षिका की नौकरी पकड़ ली. उनके इस कदम से आर्थिक संकट का दंश कुछ सहनीय बन गया.

आर्थिक विपन्नता के इस दौर में उन्हें अपने संयुक्त परिवार से कोई आर्थिक मदद नहीं मिली. उलटे उन्हें और उनकी पत्नी को तरह-तरह से परेशान किया जाने लगा. परिवार के सदस्यों, विशेष रूप से लेखक के छोटे भाई के द्वारा उनकी पत्नी पर न केवल अनेक लांछन लगाये गए बल्कि उन्हें घरेलू हिंसा का शिकार भी बनाया गया; जिसमें उन्हें गंभीर चोटें भी आई. कलह ने इतना उग्र रूप धारण कर लिया कि पुलिस थाने में एफआईआर तक की नौबत आ गयी.

इस कठिन दौर में भी उद्भ्रांत की साहित्य साधना जारी रही. इसी दौर में उन्होंने न केवल ‘स्वयंप्रभा’ और ‘रुद्रावतार’ जैसी महत्वपूर्ण काव्य कृतियों का सृजन किया बल्कि ‘प्रज्ञावेणु’ के रूप में उन्होंने ‘श्रीमद्भागवदगीता’ का भी हिंदी में पुनर्सृजन किया. ये तीनों कृतियाँ साहित्य के मर्मज्ञों के बीच तो चर्चित रहीं ही, हिंदी के सामान्य पाठकों का भी इन्हें भरपूर प्यार मिला.

केंद्र निदेशक के रूप में उद्भ्रांत की नियुक्ति का मसला तो कानूनी और नौकरशाही के भंवर में स्थायी रूप से उलझा रहा लेकिन उन्होंने आकाशवाणी और दूरदर्शन के सहायक केंद्र निदेशक के पदों के लिए भी आवेदन कर रखा था. इस बार उनके सो रहे भाग्य के जगने की बारी थी. वे इस पद के लिए चुन लिए गए और अप्रैल १९९१ में दूरदर्शन में उनके सेवा काल की शुरुआत हो गयी. लेकिन काली रात का अंत अभी भी दूर था.

वहाँ से लेकर अप्रैल १९९५ तक, यानि इस खंड के अंत तक वे दूरदर्शन में कार्यस्थल से जुडी समस्याओं से लगातार जूझते रहते हैं. यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि दूरदर्शन में सहायक केंद्र निदेशक के उत्तरदायित्व की प्रकृति आकाशवाणी से थोड़ी भिन्न है. आकाशवाणी में सहायक केन्द्र् निदेशक केवल प्रशासनिक और प्रबंधकीय दायित्व निभाता है लेकिन दूरदर्शन में वह प्रायः कार्यक्रमों के प्रोड्यूसर की भूमिका में होता है. दूरदर्शन में प्रोडयूसर का काम चुनौतियों से भरा है. कार्यक्रम की रचना के सिलसिले में उसे एक टीम के साथ काम करना पड़ता है जिसमें कैमरामैन, इंजिनियर, विडियो एडिटर, इत्यादि होते हैं. इनमें से कोई भी उसका मातहत नहीं होता. बहुधा ये लोग नए-नए आये प्रोड्यूसर को आसानी से स्वीकार भी नहीं करते और उसके लिए परेशानियाँ पैदा करते है. लेकिन कार्यक्रम के निर्माण की पूरी जवाबदेही प्रोडयूसर की ही होती है और असफलता का ठीकरा भी उसी के सर पर फूटता है. इस विकट स्थिति को साधने में समय लगता है और जैसे-जैसे अन्य कर्मियों के साथ उसके व्यक्तिगत रिश्ते मधुर होते जाते हैं, केंद्र में उसकी जड़ें गहराती जाती हैं और काम करना आसान होने लगता है. तबतक धैर्य एवं व्यवहार कुशलता का ही सहारा होता है.

इस चुनौती से निबटना किसी के लिए भी आसान नहीं होता; उद्भ्रांत जैसे भावुक और आत्मसम्मान के प्रति अत्यंत सजग रहने वाले व्यक्ति के लिए तो और भी नहीं. यह भी गौरतलब है कि वे अब तक हिंदी साहित्य में अपनी सशक्त और प्रतिष्ठित पहचान बना चुके थे और उनमें इसका गौरव-बोध अत्यंत स्वाभाविक था. फिर चालीस पार करने के बाद विपरीत परिस्थितियों से तुरंत ही तालमेल बिठा पाने की क्षमता भी कम होने लगती है.

दूरदर्शन में उनके अधिकांश सहकर्मी और वरिष्ठ अधिकारी उन्हें भली भांति समझ नहीं पाए और इन चार वर्षों के दौरान उनसे जिस संवेदनशीलता की अपेक्षा की जा सकती थी वह उद्भ्रांत को प्राप्त नहीं हुई; मतभेद और संवाद हीनता मानो स्थायी भाव बन गए और उद्भ्रांत इन परिस्थितियों से जन्य समस्याओं को निरंतर झेलने और इसमें जीने को विवश हो गए. इन चार वर्षों के दौरान उन्हें देश के कई भागों में स्थानान्तरणों की असुविधा झेलनी पड़ी और वे परिवार के साथ निरंतर आशियाने बनाते और उजाड़ते रहे- पहले पटना, फिर इम्फाल, फिर पुणे और अंततः मुंबई.

यह संतोष का विषय है कि अंततः मुंबई दूरदर्शन के कुछ अधिकारियों ने उनकी ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता को पहचाना और उन्हें अपनी प्रतिभा और क्षमता को सामने लाने का अवसर दिया. केंद्र में हिंदी के साहित्यिक कार्यक्रमों को वह स्थान और सम्मान प्राप्त नहीं था जिसके वे अधिकारी थे. उद्भ्रांत ने हिंदी साहित्य को मिल रही इस उपेक्षा को दूर करने के लिए अनेक साहसिक कदम उठाए और विभिन्न कठिनाइयों के बावजूद हिंदी के साहित्यिक कार्यक्रमों को नियमितता प्रदान करने का प्रयत्न किया, जिसकी मुंबई के हिंदी साहित्य जगत में भूरि-भूरि प्रशंसा हुई.

उन्हें दूरदर्शन के अपने दायित्वों से जब भी समय मिलता, वे विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कवितायें भी निरंतर प्रकाशित होती रहती थीं. इनमें सबसे उल्लेखनीय है, ‘नूतन सवेरा’ में ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के ‘प्रज्ञावेणु’ नाम से उनके द्वारा किये गये हिंदी पुनर्सृजन का धारावाहिक प्रकाशन. इस प्रकाशन का पाठकों द्वारा भरपूर स्वागत किया गया जिससे पत्रिका की प्रसार् संख्या में आशातीत वृद्धि हुई. उद्भ्रांत की इस कृति को मिल रही लोकप्रियता को पत्रिका के सम्पादकीय विभाग के कुछ ईर्ष्यालु कर्मी पचा नहीं पाए और उन्होंने बिना उद्भ्रांत की अनुमति के उनके आलेख के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी जो एक अनैतिक और आपराधिक कृत्य था. इस कृत्य ने उद्भ्रांत के स्वाभिमान को इतना आहत कर दिया कि उन्होंने अपनी कृति की अगली किश्तों के प्रकाशन को रोक देने का निर्देश दे दिया. सम्पादक के लाख अनुरोध के बावजूद वे टस से मस नहीं हुए.

उद्भ्रांत की आत्मकथा का तीसरा खंड छः अप्रैल १९९५ के दिन मुंबई नगर से उनकी विदाई के साथ ही संपन्न हो जाता है. वे अबतक मुंबई के हिंदी साहित्य जगत में अपने लिए एक विशिष्ट पहचान अर्जित कर चुके थे; जब वे मुंबई से गोरखपुर के लिए रवाना हो रहे थे तो उन्हें विदा करने के लिए महावीर अधिकारी जैसे वरिष्ठ साहित्यकार अपनी वृद्धावस्था के बावजूद स्टेशन पर उपस्थित थे.

इस तीसरे खंड में हम उद्भ्रांत के बहाने दूरदर्शन केन्द्रों और पुणे स्थित फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया के अन्दर की दुनिया को अत्यंत निकट से देख पाते हैं एवं कविवर बच्चन और उनके परिवार से भी हमारा बहुत ही नज़दीक से साक्षात्कार होता है. एक दर्शक के रूप में अमिताभ बच्चन के कलाकार रूप से तो हम सभी परिचित हैं लेकिन अपने निजी जीवन में वे एक पितृभक्त पुत्र के रूप में हमारे सामने आते हैं जो हमें अभिभूत कर जाता है. इस खंड में उद्भ्रांत ने मुबंई के हिंदी साहित्यिक जगत और बॉलीवुड से जुड़े अपने अनेक संस्मरणों को भी पाठकों के साथ साझा किया है जो इसे अतिरिक्त समृद्धि प्रदान करता है.
उद्भ्रांत जितने समर्थ कवि हैं उतने ही सशक्त गद्यकार भी. उनका गद्य पाठक को पुस्तक के अंत तक बांधे रखता है. यही कारण है कि उनकी आत्मकथा के तीनों खण्ड साहित्य जगत में चर्चित रहे हैं और इन्हें हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट योगदान के रूप में देखा जा रहा है. उद्भ्रांत के साहित्यिक गुरु बच्चन जी ने अपनी आत्मकथा चार खण्डों में लिखी थी. उद्भ्रांत हिंदी के एकमात्र ऐसे साहित्यकार हैं जो अपने गुरु के पद्चिहों पर चलते हुए आत्मकथा कई खण्डों में लिख रहे हैं.

इन तीनों खण्डों को आम पाठकों का भी भरपूर प्यार मिला है एवं उनके मन में आगामी खण्डों को लेकर उत्कंठा भी होगी और अपेक्षा भी. उद्भ्रांत ने भी तीसरे खंड के अंत में इस संभावना की ओर इशारा किया है. अभी यह भविष्य के गर्भ में है कि ‘काली रात के मुसाफिर’ की आगे की यात्रा में पाठक कब सहभागी हो पाते हैं.

 

धीरंजन मालवे (जन्म 9 मार्च 1952, नालंदा) आकाशवाणी, दूरदर्शन और बीबीसी हिंदी सेवा से जुड़े वरिष्ठ प्रसारण विशेषज्ञ हैं. विज्ञान संचार के क्षेत्र में उन्होंने अनेक रेडियो-टीवी कार्यक्रमों का आलेखन, निर्माण और प्रस्तुतीकरण किया. बीबीसी लंदन में “ज्ञान-विज्ञान” सहित कई कार्यक्रमों का संचालन किया और अनेक वैज्ञानिकों पर श्रृंखलाएँ तैयार कीं. कनाडा की शास्त्री फ़ेलोशिप और ब्रिटेन की कॉमनवेल्थ फ़ेलोशिप के तहत प्रतिष्ठित संस्थानों से संबद्ध रहे. सेवानिवृत्ति के बाद भी लेखन एवं अध्यापन में सक्रिय, उनकी विज्ञान, मीडिया और अनुवाद विषयक चार पुस्तकें प्रकाशित हैं.
dhiranjan@gmail.com
Tags: 20252025 समीक्षाउद्भ्रांतधीरंजन मालवे
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Comments 4

  1. उद्भ्रांत says:
    2 months ago

    बहुत आभार

    Reply
  2. स्वप्निल श्रीवास्तव says:
    2 months ago

    उदभ्रात हमारी पीढ़ी के उन लेखकों में हैं जिन्होंने हर विधा
    में लेखन किया है
    धीरंजन जी ने उनकी आत्मकथा पर
    अच्छा आलेख प्रस्तुत किया है.

    Reply
  3. Anonymous says:
    2 months ago

    उद्भ्रान्तजी की आत्मकथा,अपने प्रकाशन के प्रारम्भ(पहले खण्ड) से ही समकालीन हिन्दी के लेखकों,पाठकों व साहित्यिकों समेत विभिन्न पत्रों पत्रिकाओं के सम्पादकों का भी ध्यान आकृष्ट करती रही है।इससे लेखनक्रम में ही उद्भ्रान्तजी की आत्मकथा के अंशों का छपते रहना तो उसकी लोकप्रियता का एक कारक रहा ही, पहले और दूसरे खण्डों के प्रकाशन से पूर्व उद्भ्रान्तजी ने इसे कुछ समकालीन विज्ञ व वरिष्ठ मनस्वीजनों को पढ़ने के लिये दे करके ,उन पर जो भरोसा किया,उससे न केवल दोनों प्रारम्भिक खण्डों की पाण्डुलिपि का पहला पाठ पूर्वापेक्षा बेहतर स्वरूप में छपा बल्कि;व्यापक पाठकों के बीच अपनी पहुंच से लोकप्रिय और स्वीकार्य होता हुआ पहला संस्करण समाप्त भी हो गया।
    ऐसे में दोनों खण्डों के दूसरे संस्करण के प्रकाशन-पूर्व उद्भ्रान्त जी को पुनःलगा कि इन खण्डों का गहन पुनरवलोकन होकर यदि आत्मकथा के दोनों खण्डों का दूसरा संस्करण प्रकाशित होगा तो न केवल पाठकों,अपितु हिन्दी साहित्य-कोष को समृद्ध करने की दृष्टि से भी यह श्रेयस्कर होगा। अत: एक बार पूर्वोक्त दोनों खण्डों का न केवल आत्मकथा-लेखक ने पुनरवलोकन से बल्कि;अनेक पाठकों के मतामत व कुछ मनीषी साहित्यकारों की स्मृतियों के प्रकाश में आत्मकथा के कई स्थलों को संवर्द्धित भी किया। इससे “मैंने जो जिया” आत्मकथा के दोनों खण्डों का दूसरा संस्करण निखरे-निथरे रूप में प्रकाशित हुआ है!
    रमाकान्त शर्मा ‘उद्भ्रान्त’ ने अपनी आत्मकथा “मैंने जो जिया” के तीसरे खण्ड ‘काली रात का मुसाफ़िर’ को,पहले दोनों खण्डों के २-२ संस्करणों के संवर्द्धन के अनुभवों के नाते पूरे धैर्य से कुछ उन मित्रों-आत्मीमजनों के परामर्शों और सद्भावी सम्मतियों के प्रकाश में देखा तो कुछ समय तो लगना ही था,लगा ही,पर आत्मकथा-कार को स्वयं जहां-तहां काफी-कुछ समाविष्ट करना अपरिहार्य हो गया! इससे ‘काली रात का मुसाफ़िर’ शीर्षक से तीसरा खण्ड लगभग डेढ़ महीने देर से तो अवश्य आया किन्तु;ख़ुद आत्मकथा-‘उद्भ्रान्त’ की अनुभूति यह रही कि सत्परामर्श और लेखकीय-धैर्य असंदिग्ध रूप से किसी भी कृती की कृति को परवान चढ़ाते हुए उत्कृष्ट बनाते हैं!

    Reply
  4. उद्भ्रांत says:
    1 month ago

    ‘समालोचन’ में आत्मकथा के तीसरे खंड पर धीरंजन मालवे जी के विस्तृत समीक्षा आलेख के लिए अरुण देव जी का हार्दिक आभार. उस पर मित्र स्वप्निल श्रीवास्तव की टिप्पणी देखी–“उद्भ्रांत हमारी पीढ़ी के ऐसे रचनाकार हैं जिन्होंने हर विधा में लेखन किया है.'”. उनका धन्यवाद.
    आगे उन्होंने मालवे जी के आलेख की प्रशंसा की है जो मुझे तो स्वाभाविक रूप से अच्छी लगनी ही थी; किन्तु विवेक कहता है कि वह तब ठीक होती जब उन्होंने पहले पढ़ा भी होता; क्योंकि तभी वह ठीक प्रकार से निर्णय लेने में सक्षम हो पाते कि कहीं दूरदर्शन के साथी होने के नाते मालवीय जी समीक्षा लिखते वक्त मेरे पक्ष में पूर्वाग्रहयुक्त तो नहीं थे?
    मुझे संदेह है कि उन्होंने आत्मकथा को पढ़ा होगा(क्योंकि खरीद कर पढ़ने वाले साहित्यकार हिन्दी में उंगलियों पर गिने जाने वाले ही मिलेंगे–दूर क्या, कुछ हफ्तों के बाद ही प्रगति मैदान में यह नज़ारा देखा जा सकता है!)और सिर्फ़ एक प्रतिष्ठित मंच से प्रसारित होने के चलते, शिष्टाचार-वश, एक पासिंग रिमार्क (“….जी ने उनकी आत्मकथा पर अच्छा आलेख”) प्रस्तुत किया है.
    लेकिन मुझे,बिना किसी पूर्वाग्रह के, उनके पहले वाक्य में आये “हमारी पीढ़ी” पद पर कुछ कहना जरूरी लगता है. विगत सदी में पीढ़ी का निर्धारण दशकों के आधार पर होता रहा है, जो नयी सदी में भी चला आ रहा है–पहला दशक, दूसरा दशक, तीसरा ..(अभी हाल में अविनाश की आलोचना पुस्तक आई है–‘नवा दशक’).माना जाता रहा कि साहित्य में 10 वर्ष में पीढ़ी बदल जाती है.
    सन ’59 से शुरू मेरा सृजन कार्य, सातवें दशक के मध्य में– वर्ष ’64 से– हिन्दी की प्रतिष्ठित व लोकप्रिय पत्रिकाओं में लगातार शाया होते रहने से ठीक तरह पहचाना जाने लगा था. शम्भुनाथ जी ने इसी कारण 1989 में प्रकाशित अपने महत्वाकांक्षी संकलन ‘नवगीत सप्तक’ में निराला, शम्भुनाथ जी स्वयं, ठाकुर प्रसाद सिंह, देवेन्द्र कुमार, ओम प्रभाकर और नईम के साथ मेरे 7 नवगीतों को शामिल किया था. यह वह समय था जब छठे दशक के प्रयोगवाद और नई कविता के आंदोलन के बाद सातवें दशक में कुछ नितांत अलग दिखने के लोभ में, शुरुआती दौर में प्रायः सामान्य गीत लिखने वाले धूमिल, कुमारेंद्र, जगूड़ी, देवताले, नरेश, राजकमल जैसे कवि, अकविता, ठोस कविता, युयुत्सावादी कविता आदि के रपटीले रास्ते से हट कर गीत के अनुशासन से मुक्त हो, अपेक्षाकृत आसान शिल्प वाली यथार्थ-अभिव्यक्ति की समकालीन कविता के समतल मार्ग पर आकर चलने लगे और आलोचकों का समर्थन पाकर सरपट दौड़ लगाने लगे. ऐसी स्थिति में गीत के नव्यतम रूप “नवगीत ” को भी आलोचकीय स्वीकृति नहीं मिल रही थी. जैसे कि “गीत” कविता नहीं है–कोई और ही चीज है! कविता तो भइया, मुक्तछन्द की (और उससे भी आगे जाकर शुद्ध गद्य की) छोटी-बड़ी, टेढ़ी-मेढ़ी लाइनें ही कही जाएंगी!
    परिणाम-स्वरूप, उस अवधि में भी मुक्तछन्द की कविताएँ लिखने के बावजूद, मेरे कवि को मान्यता तभी मिली, जब ’70 के–यानी आठवें दशक के मध्य में मेरा बहुचर्चित कविता संग्रह ‘नाटकतंत्र तथा अन्य कविताएँ’ प्रकाश में आया.
    तो क्या मैं आठवें दशक का कवि हो गया! क्योंकि सातवें दशक में पूर्वोक्त कवियों की तुलना में मैंने बड़ी संख्या में बेहतर और परिमाण में भी अधिक–गीत-नवगीत लिख कर उस रूप में काफ़ी ख्याति पा ली; और वे, तुलनात्मक रूप से कुछ अधिक बेहतर–गीत-नवगीत नहीं–कविताएँ लिखने के कारण– उसी दशक का होने के बावजूद– सातवें दशक के हो गए? यानी वे मुझसे वरिष्ठ हो गए;ताकि आठवें दशक के, मेरे हमउम्र कवि मुझे “अपनी पीढ़ी ” का कहें!
    ध्यातव्य है कि किशोर वय से प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में स-सम्मान प्रकाशन पाने के कारण सातवें दशक के मेरी पीढ़ी के पूर्वोक्त सभी कवि उम्र में मुझसे एक से डेढ़ दशक तक वरिष्ठ रहे हैं. और यह सर्वमान्य सिद्धांत है कि साहित्य में वरिष्ठता कवि की उम्र से नहीं,उसकी साहित्यिक उम्र से तय होती है. उम्र का आदर समाज में मिलता है. साहित्य में साहित्यिक उम्र की वरिष्ठता देखी जाती है. मैं अनेक उदाहरण दे सकता हूँ.
    लेकिन “साहित्यिक वरिष्ठता”, “साहित्यिक उत्कृष्टता” नहीं होती. उसे काल तय करता है. हम, आप या कोई आलोचक–बड़े से बड़ा भी–तय नहीं कर सकता. शुक्ल जी द्वारा दर्ज कई नामों को काल निगल गया. नामवर जी ने 15 वर्ष पूर्व मेरे लिए सार्वजनिक रूप से “प्रतिभा का विस्फोट” पद का इस्तेमाल किया था, जिस पर मैनेजर पाण्डेय और कइयों ने, कवि की और उनकी, साल भर तक खूब खिल्ली उड़ाई थी! लेकिन मैं कभी विचलित नहीं हुआ. उसी समय अविनाश मिश्र द्वारा लिये गए और ‘जनसंदेश टाइम्स’ के बाद दर्जन भर अन्य जगहों पर भी प्रकाशित होकर बहुचर्चित हुए साक्षात्कार में एक प्रश्न इस बारे में भी पूछा गया था। तब मेरा जवाब था– “मैं उसे नामवर जी के मेरे प्रति स्नेह और सद्भाव के रूप में ग्रहण करता हूँ, इससे अधिक नहीं”.
    पीढ़ी के कालगत निर्धारण का ही रूप हैं –स्वतंत्रता-पूर्व और स्वातंत्रोत्तर जैसे विशेषण। छायावाद, छायावादोत्तर, व्यक्तिपरक, राष्ट्रीय, प्रगतिशील, प्रयोगवादी आदि–ये प्रवृत्तिगत निर्धारण हैं.
    अंत में एक और बात स्पष्ट करनी जरूरी है. हर दशक और हर काल में कई कनिष्ठ (जिनकी जानकारी नहीं होती) और कुछ वरिष्ठ (जिनका कीर्ति-काल गुजर चुका होता है) रचनाकार भी सदा सक्रिय रहते हैं. उन सबका समकाल व्यापक अर्थ में एक ही है. अर्थात् उस कालावधि में रचनाकारों की कई पीढ़ियां एक साथ सक्रिय रह सकती हैं–अपनी वरिष्ठता या कनिष्ठता को बरकरार रखते हुए!
    आशा है इस प्रकाश में किसी लेखक की पीढ़ी या उसकी वरिष्ठता तय करने में अब किसी भ्रम की गुंजाइश न होगी.
    और उत्कृष्टता तय करने का तो कोई सवाल ही नहीं!

    Reply

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