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समालोचन

Home » परिप्रेक्ष्य : विष्णु खरे

परिप्रेक्ष्य : विष्णु खरे

by arun dev
September 29, 2014
in बहसतलब
Reading Time: 11 mins read
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लोग थर्रा गए जिस वक़्त मुनादी आयी
आज पैग़ाम नया ज़िल्ले इलाही देंगे.
परवीन शाकिर का यह शेर इधर मुझे बार – बार याद आता है, ख़ासकर जब  विष्णु खरे कुछ कहते हैं.









एक बौखलाए बाबू की मगरमच्छी ब्लर्ब-वेदना                
विष्णु खरे


वो बात उनके फ़साने में जिसका ज़िक्र न था
वो  बात  उन्हीं  को बहुत नागवार गुज़री है
(फैज़ अहमद ‘’फ़ैज़’’ का मशहूर शेर,कुछ ग़ुस्ताख़ तरमीम के साथ)
कवि एवं काव्य-सक्रियतावादी मिथिलेश श्रीवास्तव को पिछले तीन दशकों से अधिक से जानता आ रहा हूँ. रघुवीर सहाय की नितांत असामयिक,त्रासद और भारतीय कविता का अकूत नुकसान करनेवाली मृत्यु तक अन्य कुछ तत्कालीन युवा कवियों की तरह मिथिलेश भी उनके नज़दीक़ रहे और उनसे कविता लिखने,पढ़ने और पढ़वाने के उस्तादाना गुर हासिल किए. मिथिलेश श्रीवास्तव के पहले कविता-संग्रह (‘’किसी उम्मीद की तरह’’,1999) की शस्ति (ब्लर्ब) लिखने का फ़ख्र इस लेखक को हासिल है.

लेकिन उसके बाद मिथिलेश, जो ‘’टैंम्परामेंटल’’ और ‘’अन्प्रेडिक्टिबिल’’ भी हैं,एक ऐसी साहित्यिक संस्था के तत्वावधान में सक्रिय हो गए जिसे मैं अब भी संदिग्ध समझता हूँ और दूसरी ओर  ‘लिखावट’ नामक काव्य और विचार की अपनी संस्था के माध्यम से सभी-की कविता के प्रचार-प्रसार में जुटकर करेला और नीम-चढ़ा बन  गए और उनके मुझ सरीखे निराश प्रशंसकों को यह लगा कि वह अपनी कविता को भूल गए हैं. लेकिन पिछले दिनों उनसे संपर्क-सूत्र फिर जुड़े और उन्होंने अपना एकदम ताज़ा और नया संग्रह ‘’पुतले पर गुस्सा’’ मुझे दिया और विरक्त-भाव से कहा कि अच्छा लगे तो विमोचन पर आइए. मैं दूसरे-तीसरे दिन ही देख पाया कि उन्होंने संकलन में छाप दिया है कि ‘’मैं यह संग्रह कवि विष्णु खरे को समर्पित करता हूँ’’. मुझे सपने में भी ऐसी आशंका न थी. होती तो यह समर्पण न जाता.

बहरहाल, क़िस्साकोताह, उनके इस संग्रह ने मुझे उम्मीदों से परे, सकारात्मक अचम्भे में डाल दिया. जिस कवि को मैं लगभग बट्टे-खाते में डाल चुका था उसका कृतित्व मानो शेक्सपियर के किसी नायक-प्रेत की तरह मेरे सामने खड़ा ‘’स्लीप नो मोर’’ कहता हुआ अपना हिसाब माँग रहा था. वह सब कभी बाद में. लेकिन जिस चीज़ ने मुझे बेहद मायूस किया वह थी उसकी शस्ति जो बहुत कल्पनाशून्य तथा लुंज-पुंज थी एवं अल्प-बुद्धि और नासमझी से लिखी गई थी. लेखक थे उमेश ठाकुर जिन्हें यदि हिंदी में जानना ही हो तो वह एक चलताऊ, तीसरे दर्जे के ‘’कवि’’ के रूप में ही संभव है.

इन शब्दों में तो नहीं, लेकिन विमोचन के अवसर पर मैंने उस शस्ति पर अपनी गहरी निराशा व्यक्त की क्योंकि वह किसी भी ऐसे बेहतरीन संग्रह को अपाठ्य-सा दिखाने के लिए काफ़ी है. वैसे भी इस ब्लर्बिये की ऐसी ख्याति नहीं है, हो भी नहीं सकती, कि सजग पाठक ललक कर पढ़ना चाहें कि देखें भाई अपने ठाकुर साहब ने ऐसा क्या लिख डाला है. ’’पुतले पर ग़ुस्सा’’ पर उमेश ठाकुर की शस्ति वैसी ही है जैसे डिप्टी कलक्टरी के इंटरव्यू में किसी अभागे उम्मीदवार के पास अपने गाँव के सदाशयी पटवारी-कोटवार का ‘’टैस्टिमोनियल’’.

स्वाभाविक था कि उमेश ठाकुर, जो विमोचन में मौजूद थे, उठकर अपना और शस्ति का कोई कैफियत देकर बचाव करते. उन्होंने मिथिलेश श्रीवास्तव के हवाले से बताया कि संग्रह की पांडुलिपि कई महीने तक एक नामचीन कवि के पास पड़ी रही जिसने कई वादों के बाद भी ब्लर्ब नहीं लिखी सो नहीं लिखी. तब कवि ने ब्लर्बिये से ही निवेदन किया, जिसने कृपापूर्वक इस गुरुतर भार को स्वीकार कर ही लिया. लेकिन यह भी इशारे हुए कि ठाकुर-शस्ति पर भी क़लम-कैंची चले. लिहाज़ा अंतिम रूप में यदि वह विकलांग लगे तो स्वाभाविक ही है.

आश्चर्य यह है कि इस लेखक की आलोचना के बाद भी न उमेश ठाकुर ने न मिथिलेश श्रीवास्तव ने उस ब्लर्ब को दुबारा पढ़ने की ज़हमत उठाई.निजी बातचीत में मिथिलेश ने बताया कि स्वयं उन्हें उमेश ठाकुर की शस्ति में कतरब्योंत करनी पड़ी थी.यानी इस ब्लर्ब में जो स्नायुदौर्बल्य है उसके लिए वैद्यद्वय नीमहकीम ठाकुर-श्रीवास्तव दोनों उत्तरदायी हैं.

एक लोकप्रिय कहावत है,‘’लौंडों की दोस्ती,जी का जंजाल’’. इसमें आप चाहें तो ‘’लौंडों’’ के स्थान पर किसी भी केन्द्रीय या राज्य सेवा के काडर का नाम रख सकते हैं. उमेश ठाकुर आइ.ए.एस. बताए जाते हैं और किसी मंत्रालय में किसी वरिष्ठ कुर्सी पर हैं. अंग्रेज़ी अखबार, विशेषतः टाइम्स ऑफ़ इंडिया ग्रुप, ऐसे अफसरों को लगातार उद्दंडता और मज़ाहिया बेहुर्मती से ‘’बाबू’’ लिखते हैं,और इनके असोसिएशन कुछ कर नहीं पाते, लेकिन उनके हुज़ूर में बहुसंख्यहुडुकलुल्लू हिंदी लेखकों की, ज्ञानरंजन के शब्दों में, लेंडी तर और जहाँ से मानव की दुम झड़ गई है वहाँ गुदगुदी होती रहती है.

इस प्रकरण से मुझ सरीखे निर्लज्ज कुख्यात  ब्लर्बबाज़ के सामने भी यह होशदिलाऊ,त्रासद तथ्य आता है कि ब्लर्ब के लिखने-छपने के बाद न तो ब्लर्बिया पढ़ता है, न ब्लर्बाकांक्षी लेखक, न कोई प्रबुद्ध पाठक. प्रमाण के लिए यू.के.एस. ठाकुर,आइ.ए.एस. के ब्लर्ब का यह अंश देखें :

’’…(हुसैन के घोड़ों से प्रेरित अपनी कविता में) ‘यह गति मोनालिसा की मुस्कान की तरह रहस्यमयी नहीं है’ जैसी बात कह्कर ( मिथिलेश ) यह अहसास जगाने की कोशिश करते हैं कि पिकासो की चित्रकारी भले ही मोहक हो किन्तु वह गूढ़ता से ग्रस्त है…यहाँ एम.एफ़.हुसैन के घोड़ों की गत्यात्मकता और पिकासो की मोनालिसा की मुस्कान की रहस्यात्मकता की तुलना करने के बहाने वे कविता के विभिन्न स्वरूपों पर भी एक तुलनात्मक निगाह डालने का प्रयास करते हैं.’’


मैं यहाँ बाबू उमेश ठाकुर,आइ.ए.एस. की कविता की समझ,चित्रकला की बारीकियों की समझ की बात नहीं करता.मैं सिर्फ़ यह जानना चाहता हूँ कि जिस आदमी के जनरल नॉलेज का यह हाल है कि उसे पता ही नहीं है कि मोना लीज़ा सरीखी कृति को,जिसे उचित ही अपने ढंग का संसार का महानतम शाहकार माना जाता है,पिकासो ने नहीं बल्कि पिकासो के नगड़दादा लेओनार्दो दा विंची ने बनाया था,उसे आइ.ए.एस. में घुसने किसने दिया ?

सवाल मात्र आइ.ए.एस. का नहीं है और न ठाकुर बाबू की (अ)योग्यता का.यदि मिथिलेश श्रीवास्तव चित्रकला को जानने और इस ब्लर्ब को संशोधित करने का दावा करते हैं तो उनकी निगाह से यह शर्मनाक ग़लती छूटी कैसे ? एक अजीब शक़ होता है कि या तो ठाकुर बाबू ने ‘इन ड्यू कोर्स’ मिथिलेश को ‘एक्सपोज़’ करने के लिए यह ब्लंडर लिखा या मिथिलेश ने उमेश बाबू को ‘पोस्ट फैक्टो’ विवस्त्र करने के लिए उसे जाने दिया.हम यह न भूलें कि बाबू ने Faecesbook (पुरीषंपुस्तक) के अपने ‘’status’’ पर मिथिलेश श्रीवास्तव की एकतरफ़ा निंदा की है.मिथिलेश चुप हैं क्योंकि एक बड़े बाबू के सामने अब गरिमाहीन टेलीफोन डिपार्टमेंट का एक मँझोला अफ़सर और कर भी क्या सकता है.यह कुछ-कुछ ‘’मुग़ले-आज़म’’ में पृथ्वीराज कपूर और दिलीप कुमार के डायलाग की सिचुएशन है.

लेकिन मामला और भी गंभीर है.हिंदी में शस्तियाँ न भी पढ़ी जाएँ,जब ‘पुतले पर ग़ुस्सा’ अन्य देशी-विदेशी भाषाओँ में जाएगी तो वहाँ के हिन्दीप्रेमी,प्राध्यापक और विद्यार्थी क्या कहेंगे ? कुछ  तो अपनी ठेठ भाषा में पूछेंगे कि क्या हिंदी में ऐसे भी चूतिये काम  होते हैं ? कोई दूसरा,कमतर कविता-संग्रह होता तो मैं इतना तूल न देता – हिंदी-संस्कृति आज देश की पतिततम भाषा-संस्कृति है – लेकिन मैं मिथिलेश श्रीवास्तव के इस उत्कृष्ट  संग्रह को इस तरह संदिग्ध या हास्यास्पद होते नहीं देख सकता.

पता नहीं किससे,लेकिन मैं माँग करता हूँ कि हिंदी कविता और साहित्य की जो भी गरिमा शेष है उसके  लिए, मिथिलेश श्रीवास्तव की प्रतिभा,काव्य-सक्रिय छवि और हित-रक्षा के लिए,प्रकाशक की अपनी इज़्ज़त के लिए और स्वयं बाबू उमेश बी.एस. चौहान आइ.ए.एस. की पद-प्रतिष्ठा,जैसी हैं जहाँ हैं, की हिफ़ाज़त  के लिए इस संग्रह को अविलम्ब बाज़ार से वापिस लिया जाए,इसका वर्तमान कवर नष्ट किया जाए और एक सावधानी से संशोधित ब्लर्ब के साथ उसे पुनर्मुद्रित किया जाए. विमोचन के दिन प्रियदर्शन,लीलाधर मंडलोई और रवीन्द्र त्रिपाठी तीनों  ने उम्दा वक्तव्य दिए थे,उनमें से किसी को भी या तो पूरा या उनमें से दो-दो पैरे भी इस काम के लिए लिए जा सकते हैं.इसमें कोई कोताही न हो.
________________________

(२)सदाशयबाबू का पाखण्ड 

vishnukhare@gmail.com
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