• मुखपृष्ठ
  • समालोचन
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • वैधानिक
  • संपर्क और सहयोग
No Result
View All Result
समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • अनुवाद
    • आलोचना
    • आलेख
    • समीक्षा
    • मीमांसा
    • बातचीत
    • संस्मरण
    • आत्म
    • बहसतलब
  • कला
    • पेंटिंग
    • शिल्प
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • नृत्य
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
No Result
View All Result
समालोचन

Home » परख : उपसंहार : काशीनाथ सिंह

परख : उपसंहार : काशीनाथ सिंह

by arun dev
September 4, 2014
in Uncategorized
Reading Time: 403 mins read
A A
फेसबुक पर शेयर करेंट्वीटर पर शेयर करेंव्हाट्सएप्प पर भेजें







ऐश्वर्य की मियाद                 

पल्लव

\’आखिर ईश्वर है क्या ? मनुष्य के श्रेष्ठतम का प्रकाश ही तो? और यह प्रकाश प्रत्येक मनुष्य के भीतर होता है. लेकिन फूटता तभी है जब किसी को कातर, बेबस, निरुपाय और प्रताड़ित देखता है. मैं भी था ईश्वर. हाँ, मेरी अवधि किन्हीं कारणों से थोड़ी लम्बी खिंच गई रही होगी.\’
मिथकों और पौराणिक आख्यानों का क्या रचनात्मक उपयोग हो सकता है? वर्तमान जीवन की विसंगतियों या सीमाओं की व्याख्या के लिए इनका प्रयोग कितना और किस तरह किया जा सकता है? भारतीय साहित्य में महाभारत और रामायण पर आधारित रचनाओं के लेखन का इतिहास पुराना है. इसलिए यह और अधिक चुनौतीपूर्ण है कि कोई समकालीन रचनाकार इन पर आधारित किसी कथा सूत्र को पकड़ कर बड़ी रचना करे. इस बड़ी रचना का आशय असल में तो समकाल की व्याख्या ही होगा तथापि वह रचना युक्ति के लिए किसी पौराणिक आख्यान का सहारा लेता है. आधुनिक जीवन में कलाकार की स्वायत्तता के प्रसंग में \’आषाढ़ का एक दिन\’ इसका प्रमाण हो सकता है. अभी हाल तक कविता में कुंवर नारायण और उपन्यास में सुरेन्द्र वर्मा ने ऐसा किया है. काशीनाथ सिंह का नया उपन्यास \’उपसंहार\’ कृष्ण के जीवन के अंतिम दिनों की कहानी है. उपन्यास की कथा पुरानी और बहुश्रुत होने पर भी कुछ अल्प परिचित प्रसंग आए हैं. सबसे मुख्य बात है इनका प्रस्तुतीकरण. एक वाक्य में कहा जा कि जिस तरह मैथिलीशरण गुप्त के महाकाव्य \’साकेत\’ में भगवान राम से अधिक पुरुषोत्तम राम का चरित्राख्यान है वैसे ही यहां योगीश्वर भगवान श्रीकृष्ण की नहीं वरन एक सामान्य मनुष्य का संघर्ष और पीड़ा की  अभिव्यक्ति हुई है. 

उपन्यास कृष्ण की नारायणी सेना के बहादुर योद्धा गोपाल भोज के बयान से प्रारम्भ हुआ है जहाँ वे अठारह दिनों के युद्ध के बाद क्षत–विक्षत लौट आये हैं और तीन दिन के जीवन-मरण संघर्ष के बाद दम तोड़ देते हैं. यहीं घोषणा होती है कि \’महाभारत –विजय के बाद द्वारकाधीश वासुदेव श्रीकृष्ण पहली बार द्वारका पधार रहे हैं. उनके साथ ही हमारी वह अपराजेय नारायणी सेना भी आ रही है,जिससे देवराज इंद्र तक भय खाते हैं.\’

द्वारका आ रहे कृष्ण उदास और हतप्रभ हैं और कदाचित वे इस अहसास से घिर गए हैं कि भीषण महायुद्ध में विजय के बावजूद क्या बदल गया? अपनी नारायणी सेना के वीरों की युद्ध में अकाल मृत्यु और नागरिकों का रोष उन्हें कातर बना रहा है. काशीनाथ सिंह लिखते हैं–\’द्वारका प्रवेश का यह पहला अवसर है, जब न तो कहीं से जय–जयकार सुनाई पद रहा है,न उनकी आरती उतारी जा रही है, न फूल–मालाएँ बरस रही हैं. उनका रथ तट से राजपथ की ओर जा रहा है और लोग देख भी नहीं रहे हैं.\’ उपन्यास में आगे कुछ समय बीत जाने पर जब उन्हें युधिष्ठिर के राज्य के समाचार मिलते हैं तो यह कातरता गहरा जाती है. युधिष्ठिर की जनता अकाल से पीड़ित है और वे लोगों को उपदेश कर रहे हैं -\’धैर्य धारण करें ,ऐसा मेरे ही राज्य में नहीं,पूरे आर्यावर्त में हो रहा है. ईश्वर हमारी परीक्षा ले रहा है,हम उत्तीर्ण होकर रहेंगे.\’ ऐसे समाचार पर कृष्ण सोचते-\’दुर्योधन क्या बुरा था? राजकाज देखने वाले भीष्म–विदुर थे, प्रजा को कोई शिकायत न थी.\’ 

उपन्यास कृष्ण पर हो और राधा का उल्लेख न हो ऐसा भला कैसे संभव है? उन्हें राधा की याद आती है और वह प्रसंग भी याद आता है. जब राधा दही–माखन लिए कृष्ण से मिलने मथुरा आई थी. राधा यह कह कर जाती है–‘हमारा मन कह रहा है कि यह हमारी अंतिम भेंट है.’ और सचमुच यह भेंट अंतिम ही थी. इधर अब सागर तट पर उदास बैठे कृष्ण जैसे स्वयं से ही कह रहे हैं-\’देखो तो ये कब की बातें हैं?/जैसे पिछले कई कई जन्मों की/कितना आसान है यह कहना कि आत्मा वही रहती है सिर्फ देह बदलती है /पुराने वस्त्र की तरह/यहां आत्मा बदलती गई और देह भी.\’ जब युद्ध से लौटकर उनकी रानियों ने स्वागत किया था–मंगलगान गाए थे तब वह सब उन्हें \’फूहड़ और भद्दा\’ लग रहा था. ऐसे ही उन्हें अपना बचपन याद आता है और वे सोचते हैं – \’आख़िरी बार \’लल्ला\’ कब सुना था,कहाँ सुना था,किससे सुना था? वे तंग आ चुके थे वासुदेव,केशव,पुरुषोत्तम,जनार्दन सुनते–सुनते. उन्हें लगता था कि इसके लिए दूसरे नहीं,वे स्वयं जिम्मेदार हैं.\’  

क्या यह जीवन की अनिवार्य नियति है? एक पराक्रमी पुरुष जिसकी ईश्वर मान कर लोगों ने पूजा तक की. वह भी निरुपाय है नियति के आगे? यदि ऐसा है तो इसका कारण खोजना चाहिए. यहां कृष्ण स्वयं वे कारण खोज रहे हैं– \’इसलिए तो नहीं कि वे दुर्जनों का विनाश करने के लिए उन्हीं  के स्तर पर उतर गए थे? क्या इसलिए तो नहीं कि भीष्म, द्रोणाचार्य जैसे जितने महायोद्धा उनकी चालों–धूर्तताओं से मारे गए थे, सबके सब दुर्जन नहीं थे. क्या इसलिए तो नहीं कि अपने भीतर के ईश्वर को झूठ और कपट से कलुषित कर दिया था?\’ कृष्ण अपनी शक्तियों का क्षय देख रहे हैं और इसे देखना अत्यंत पीड़ादायक है. वे रोना चाहते हैं और रो नहीं पाते. अपने सबसे विश्वसनीय सेवक दारुक को कहते हैं-\’मेरी आँखों में आँसू क्यों नहीं आते?\’ दारुक का उत्तर है– \’भगवान कहीं रोते हैं ?\’ कृष्ण फिर कहते हैं-\’भगवान होने के लिए पत्थर होना जरूरी है क्या?… लेकिन मैं तो बहुत रोता था गोकुल में ! अब क्या हो गया?\’ आगे अन्यत्र एक स्थल पर वे दारुक से ही कहते हैं-\’ इधर लगातार मेरे भीतर कुछ गूँज हो रही है. उथल–पुथल मची हुई है. वह जगे में नहीं, सोए में भी सुनाई देती है. महाभारत शुरू ही जब दोनों पक्षों की सेनाएँ आमने–सामने डट गईं, तो धृतराष्ट्र ने संजय से जानकारी चाही. संजय ने गांधारी वगैरह को बुलवाकर सबके सामने कहा – यतो कृष्णस्ततो धर्म: यतो धर्मस्ततो जय: यानि जहां कृष्ण हैं,वहां धर्म है और जहां धर्म है,वहीं जय है. यह मैंने सुना था. इधर बार–बार यही प्रतिध्वनि मेरे कानों में गूँज रही है कि क्या सचमुच मैंने महाभारत में अठारह दिन धर्माचरण किया था,जिससे विजय मिली?\’ और यही नहीं उन्हें अपने आसपास घायल और कराहते दुर्योधन –कर्ण –जयद्रथ नजर आते हैं जो उन्हें दोषी ठहरा रहे हैं. 

इस निरुपायता में उन्हें अपने वैभवशाली दिनों की याद आती है जब उन्होंने द्वारका बसाने का निश्चय किया था और इस स्थान को देखने आये थे और तब समुद्र अपनी महिमा समेट कर धन्य महसूस कर रहा था, विश्वकर्मा–कुबेर–वायुदेव–सूर्यदेव–इंद्रदेव कौन नहीं हैं जो इस नगरी के निर्माण में सहयोग नहीं करना चाहता था? इंद्र की अमरावती के टक्कर में लोग उसे द्वारावती या द्वारवती भी पुकारते थे. कृष्ण के लिए– सपना. वे चाहते थे ऐसा गणराज्य,जिसमें सारे कुल मिलकर रहें,सब समान रूप से संपन्न और सुखी रहें, ऊँच–नीच,छोटे–बड़े की भावना न रहे,सब सामान सुविधाएं भोगें, सब निर्भय और नि:शंक विचरण करें. इस तरह बनी द्वारका और द्वारकाधीश का हतप्रभ हो जाना विस्मित  करता है. लेकिन कृष्ण सर्वज्ञ हैं वे स्वयं कहते हैं– \’मैं भी था ईश्वर. हाँ, मेरी अवधि किन्हीं कारणों से थोड़ी लम्बी खिंच गई रही होगी.\’ काशीनाथ सिंह ईश्वर होने की सही व्याख्या करते हैं– \’कृष्ण ने द्वारका में स्थिर होने के बाद से ही ऐसे क्रूर,अहंकारी,बर्बर दानवों के सफाए का लक्ष्य निर्धारित कर लिया और इसके लिए वे आर्यावर्त के दूसरे छोर प्राग्ज्योतिषपुर (असम) तक गए. उनके इस लोकहित के काम ने द्वारका को वैभवशाली बनाया,प्रतिष्ठा दिलाई और उन्हें \’ईश्वर\’ की गरिमा दी. ऐसी गरिमा कि आर्यावर्त के जिस यज्ञ या स्वयंवर या सभा में कृष्ण न हों, वह जैसे हुआ ही नहीं.\’  और अब देखिये वही कृष्ण कह रहे हैं– \’देखो,यह वही समुद्र है,जो मेरे श्यामशिला पर बैठते ही पाँव पखारने के लिए दौड़ पड़ता था, आज कैसा दहाड़ रहा है ! ऐश्वर्य की भी एक मियाद होती है और वह पूरी हो गई. और वह कब पूरी हुई मुझे पता ही नहीं चला.\’ 

उपन्यास में बलराम कृष्ण का विपक्ष रचते हैं. वे ही थे जो कृष्ण को कुछ कह सकते थे,उनके निर्णयों पर आपत्ति कर सकते थे और फिर द्वारका के युवराज भी तो वे ही थे. कृष्ण ने द्वारका को एक गणतंत्र के रूप में विकसित करना चाहा था जहाँ राजा और प्रजा मिलकर निर्णय लें. महाभारत युद्ध से पूर्व उन्होंने \’सुधर्मा–सभा\’ बुलाई थी जिसमें युद्ध में द्वारका की भागीदारी का निर्णय होना था. और जब बलराम ने इस लड़ाई को कौरवों–पांडवों का घरेलू मामला कह कर द्वारका को बीच में न पड़ने की सलाह दी तब कृष्ण बोले थे– \’नहीं दाऊ, यह उनका घरेलू मामला नहीं है. यह वस्तुत: धर्म–अधर्म का, न्याय –अन्याय का,सत–असत का,प्रकाश–अन्धकार का, ईमानदारी–बेईमानी का मामला है. इतिहास–काल कल हमसे,आपसे,द्वारका से पूछेगा कि जब आर्यावर्त में युद्ध हो था,मार–काट मची थी,आग लगी थी,तब आप कहाँ थे? द्वारका किधर थी? नहीं पूछेगा? और तब क्या जवाब देंगे आप?\’ इस पर बलराम ने हँसकर जवाब दिया था-\’किसी भी बात से सिद्धांत गढ़ लेना पुरानी आदत है तुम्हारी.\’ लेकिन बलराम युद्ध की भावी विभीषिका जानकर विरोध कर रहे थे और उनका विरोध द्वारका की सेना को युद्ध में भेजने पर था -\’सेना दान–दक्षिणा में दी जाने इसकी निजी संपत्ति नहीं है. सेना तब के लिए होती है,जब कोई राष्ट्रीय आपदा हो,सीमा पर संकट हो,द्वारका में प्राकृतिक दुर्घटना हो.!\’  इसके बाद वे सभा छोड़कर हिमालय यात्रा पर निकल गए थे. अब जब युद्ध को बीते कई साल हो गए हैं और द्वारका–कृष्ण उस युद्ध की विभीषिका को झेल रहे हैं तब अपने बलदाऊ के साथ एक रात कृष्ण बैठे हैं और अतीत को याद कर रहे हैं. भीम और दुर्योधन के गदा युद्ध को याद करते हुए बलराम कहते हैं कि मैं मारने दौड़ा था लेकिन रूक गया क्योंकि तुम्हारा इशारा देख लिया था.  तब कृष्ण ने कहा –तो मुझे ही मारा होता आपने. बलराम कहते हैं -\’किस–किस अधर्म के लिए मारता मैं? एक–दो हों ,तब तो?…. क्या समझते हो,मैं हिमालय धूनी रमाने गया था? तपस्या करने गया था? उस ऊंचाई से वह सारा कुछ देख–सुन रहा था,जो तुम कुरुक्षेत्र में कर रहे थे. तुम अधर्म की नींव पर धर्म की जर्जर इमारत खड़ी कर रहे थे. कहकर गए थे द्वारका से कि यह अधर्म के विरुद्ध धर्मयुद्ध है,धर्म की स्थापना करनी है. किस धर्म को स्थापित किया?न्याय को?ईमानदारी को?भाईचारे को?प्रेम को?किसको? प्रेमयोग का ज्ञान देते घूम रहे हो और दादा को पोते से ,मित्र को मित्र से,गुरु को शिष्य से और भाई को मरवा रहे हो! पूरे आर्यावर्त में घूम कर देखा मैंने, ब्राह्मणों, महिलाओं और बच्चों को छोड़कर कोई नहीं बचा है. इसे किस धर्म की स्थापना कहेंगे ?\’ अंत में बलराम कहते हैं -\’हाँ,इस युद्ध के बाद इतना जरूर हुआ कि जो दबे स्वर में तुम्हें अवतार या ईश्वर कहते थे, वे खुलकर स्तुति–गान करने लगे. और गाने वाले थे ही कौन? वही वेदपाठी ब्राह्मण, तपस्वी, ऋषि–मुनि.\’ कृष्ण जैसे इस नरसंहार का समाधान जानते हैं– उनका द्वंद्व है दो भाई मथुरा छोड़कर द्वारका बसा सकते थे तो तुम पांच थे. पूरी वसुंधरा थी तुम्हारे पास. \’लेकिन नहीं क्योंकि राजा अंधा था,बेटा– जो भावी नरेश होने का सपना पाले था–बहरा था और मंत्रिपरिषद गूंगी थी. ऐसा राज्य जरासंध के मगध से भी बुरा होता.\’ तो कृष्ण का निर्णय है युद्ध नहीं रोककर ठीक किया. 

निर्णय के बावजूद कृष्ण गहरे द्वंद्व  से निकल नहीं पाते – \’ईश्वर का काम केवल संहार करना है?निरर्थक, निरुद्देश्य, नि:स्वार्थ जनसंहार? मथुरा से लेकर द्वारका तक वे केवल संहार और वध ही करते रहे ,क्या अवतार इसीलिए होता है?\’ उन्हें मालूम है -\’महाभारत में जो मारे गए  आर्यावर्त के गौरव थे.\’ वे पूछते हैं -\’\’क्या मनुष्य का मनुष्य होना ही काफी नहीं है? फिर उसे वर्णों में क्यों बाँटा गया? द्वारका में तो सब यादव हैं चाहे वे खेती करें,चाहे व्यापार, चाहे लोहे–लकड़ी के काम !\’ यह निश्चय ही गीता का उपदेश करते भगवान श्री कृष्ण नहीं हैं अपितु जीवन के शाश्वत सवालों से जूझ रहे एक मनुष्य का चित्र है. यह मनुष्य अब अपनी ज़रा से भी लड़ रहा है और तमाम प्रतिकूल परिस्थितियाँ उसे आहत कर रही हैं. उन्हें थोड़ा घूमने पर भी थकान होने लगी है –बुढ़ापा गहरा रहा है –उन्हें नहीं लगता लेकिन पत्नियाँ कहती हैं कि वे कम सुनने लगे हैं. युद्ध को छत्तीस साल हो गए हैं और बुरे बुरे समाचारों के बीच गार्ग्य मुनि बताते हैं-\’आपके महल के बाहर गरूड़द्वार पर मैंने कलिकाल को खड़ा देखा है. वह महल के खाली होने का इंतज़ार कर रहा है कि आप इसे छोड़ें और वह इसे दखल करे.\’ ऐसा कभी नहीं हुआ था लेकिन अब हो रहा था कि समुद्र से निकल कर मगर और घड़ियाल नगर की सड़कों पर आ रहे थे और शिकार कर रहे थे. अग्नि अपना स्वभाव छोड़ रही थी और मार्गों पर रंग बिरंगे चूहे दौड़ रहे थे. नागरिक मदिरापान में उद्यत थे और आकाश में गिद्ध मंडरा रहे थे. उनका गणतंत्र गणों की आपसी कलह और संघर्ष में नष्ट हो  रहा है. उनके पुत्र असंतुष्ट हैं कि पिता ने अपने कर्तव्य का सही निर्वाह नहीं किया. 

इससे पहले एक और घटना हुई थी जो कृष्ण को विचलित करती है. अचानक दुर्वासा द्वारका आते हैं और ऐसा उद्योग करते हैं जो मनुष्य जीवन की सामान्य गरिमा के विपरीत था. यह ठीक है कि इसके पीछे उनका उद्देश्य कृष्ण का कल्याण ही था फिर भी यह कृष्ण को गहरा विचलित करता है. वे सोचते हैं -\’क्या यह जताने आया था कि देख लो अपनी औकात/ हम हैं जो तुम्हें ईश्वर बना सकते हैं/ तो मटियामेट भी कर सकते हैं.?\’ द्वारका एक बंद मुट्ठी की तरह थी जो खुल गई–बिखर गई. इस बंद मुट्ठी का खुल जाना त्रास को जन्म देता है. यह त्रास अब हर कहीं है मीठी यादों में और कड़वे वर्तमान में. इन्हीं दिनों में कभी उन्हें वंशी की याद आती है जो नंदगांव छोड़ते समय उन्हें राधा ने दी थी, वे उसे मंगवाते हैं लेकिन जो आता है वह वंशी नहीं –लम्बे बांस के दो फट्टे हैं जो कृष्ण को और अधिक उदास करने वाले हैं . कृष्ण को अब लग रहा है कि पाञ्चजन्य के स्वर से धमकी और धौंस की बू आती थी  वे कहते हैं -\’देखो तो कैसे एक पहचान मिट गई और दूसरी बन गई.\’ मुरलीधर का युद्ध में शंख बजाना अब कितना त्रासदायक चित्र है जिस पर करुणा आती है. और यही वह स्थल है जहां कृष्ण कहते हैं – \’एक समय ऐसा आता है,जब जीने की इच्छा ख़त्म हो जाती है.\’ 

वस्तुत: कृष्ण का उपन्यास मे बन रहा यह चित्र समकालीन मनुष्य का ही चित्र है. इसे समृद्धि के चरम से जोड़ कर समझा जा सकता है.  इतना वैभव और ऐश्वर्य संसार में भला कब रहा होगा ? फिर भी मनुष्यता के सामान्य लक्षण तक दुर्लभ होते जा रहे हैं और व्यक्ति अकेलेपन और अवसाद से घिरा है. उपन्यास एक बड़ी विधा है जिसमें जीवन के यथार्थ का निरूपण करने के साथ ही किसी न किसी दर्शन का होना आवश्यक है. दर्शन वह जो जीवन के काम आ सके. जीवन के शाश्वत सवालों से लड़ने का हौंसला दे सके. मृत्यु ऐसा ही शाश्वत सवाल है जिसका कोई जवाब नहीं. कृष्ण ने भी जन्म लिया है और उनकी मृत्यु भी तय है. दुर्वासा भले अगरिमापूर्ण कौतुक रचकर कृष्ण की मृत्यु को रोकना चाहें वह अटल है. त्रास यह है कि कृष्ण को समूचे यदु वंश का नाश देखना है, पिता और बलदाऊ को अलविदा कहना है. मृत्यु से एन पहले उन्हें फिर राधा की याद आती है -\’गोकुल छोड़ने के बाद उन्होंने क्या-क्या नहीं किए? अगर नहीं कर सके तो सिर्फ एक काम ! राधा से किया वादा पूरा नहीं किया.  कि लौटकर आएँगे,मगर नहीं लौट सके. कोई बात नहीं. अब वे द्वारका की चिंता से मुक्त हैं. देर नहीं हुई है. अब भी जा सकते हैं. नन्दगाँव,फिर वहां से बरसाने … \’लेकिन क्या हम नहीं जानते कि बरसाना जीवन में बार बार नहीं मिलता. कृष्ण को भी नहीं. 
उपन्यास बहुत अधिक पृष्ठ नहीं घेरता. इधर काशी का अस्सी के बाद काशीनाथ सिंह लगातार कोशिश कर रहे हैं कि वर्णन का पारम्परिक ढंग बदले. वे यहां स्वगत और वर्णन दोनों के लिए कवितानुमा शैली का प्रयोग करते हैं. क्या यह उपन्यास को कविता की तरह सुगम बनाने की कामना है? बहरहाल इस प्रविधि से पाठक को कोई दुराव नहीं. भाषा अब उनके लिए चुनौती नहीं रही. कृष्ण आमफहम जबान बोलते हैं और यदु वंश के मनमौजी नौजवान ठीक वही भाषा बोलते हैं जो उन्हें बोलनी चाहिए. कोई उलझन नहीं और भाव तथा अर्थ निष्पत्ति में कोई बाधा नहीं. काशीनाथ सिंह की किस्सागोई प्रशंसित हुई है और वह यहां भी है. बलदाऊ और दारुक से बातें करते कृष्ण पाठक के भीतर चले जा रहे हैं. उनका दारुण अंत पाठक को समकालीन लगता है. इस नियति से साक्षात्कार करवाना काशीनाथ सिंह की कला का ही कौशल है. भले इसके लिए उन्हें जोखिम उठाने पड़े. और यह ठीक भी है क्योंकि जब मिथकों की पुनर्रचना हो रही है तो क्या वह हमारे समय और समाज के वर्तमान से निरपेक्ष हो सकती है? 
_________________
pallavkidak@gmail.com
यह समीक्षा हरे प्रकाश उपाध्याय द्वरा संपादित पत्रिका  मंतव्य में प्रकाशित है. 
ShareTweetSend
Previous Post

कथा – गाथा : शमोएल अहमद

Next Post

परख : जिद्दी रेडियो : पंकज मित्र

Related Posts

विश्लेषण: जंतर-मंतर की ‘अश्लील’ भाषा : त्रिभुवन
आलेख

विश्लेषण: जंतर-मंतर की ‘अश्लील’ भाषा : त्रिभुवन

बारिश की कविताएँ : अदनान कफ़ील दरवेश
कविता

बारिश की कविताएँ : अदनान कफ़ील दरवेश

रवींद्रनाथ की मृत्यु चेतना : कल्लोल चक्रवर्ती
आलेख

रवींद्रनाथ की मृत्यु चेतना : कल्लोल चक्रवर्ती

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

समालोचन

समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

  • Privacy Policy
  • Disclaimer

सर्वाधिकार सुरक्षित © 2010-2023 समालोचन | powered by zwantum

No Result
View All Result
  • समालोचन
  • साहित्य
    • कविता
    • कथा
    • आलोचना
    • आलेख
    • अनुवाद
    • समीक्षा
    • आत्म
  • कला
    • पेंटिंग
    • फ़िल्म
    • नाटक
    • संगीत
    • शिल्प
  • वैचारिकी
    • दर्शन
    • समाज
    • इतिहास
    • विज्ञान
  • लेखक
  • गतिविधियाँ
  • विशेष
  • रचनाएँ आमंत्रित हैं
  • संपर्क और सहयोग
  • वैधानिक