वी.एस.नायपॉल : आधा जीवन – ३ : जय कौशल

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वी.एस.नायपॉल के महत्वपूर्ण उपन्यास \’आधा जीवन\’ (Half a Life) का तीसरा और अंतिम भाग प्रस्तुत है. इसका अनुवाद जय कौशल ने किया है, यह अनुवाद उनके अकादमिक कार्य का हिस्सा है. यह एक श्रमसाध्य कार्य था जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक सम्पन्न किया है. इसे पढ़कर आप जहाँ विश्व विख्यात उपन्यासकार नायपॉल को समझते हैं वहीं एक […]


नोबेल पुरस्कार से सम्मानित वी.एस.नायपॉल के महत्वपूर्ण उपन्यास \’आधा जीवन\’ (Half a Life) का तीसरा और अंतिम भाग प्रस्तुत है. इसका अनुवाद जय कौशल ने किया है, यह अनुवाद उनके अकादमिक कार्य का हिस्सा है. यह एक श्रमसाध्य कार्य था जिसे उन्होंने सफलतापूर्वक सम्पन्न किया है. इसे पढ़कर आप जहाँ विश्व विख्यात उपन्यासकार नायपॉल को समझते हैं वहीं एक विश्वस्तरीय उपन्यास पढ़ने का सुख भी प्राप्त करते हैं.



वी.एस.नायपॉल : आधा जीवन – ३ : जय कौशल                           





स्ताक्षर के लिए उसे दो कापियाँ दी गई थीं. जब वह दूसरी पर दस्तख़त कर रहा था तभी रिचर्ड ने मेज की दराज से एक लिफ़ाफ़ा निकाला और उसके सामने रख दिया.
‘‘यह पेशगी है, पाँच पाउण्ड के नए नोटों में- पचास पाउण्ड. क्या आपको एक बार में कभी इतना पैसा मिला है ?’’ रिचर्ड ने पूछा था.
‘‘नहीं, बी.बी.सी. स्कूल की ट्रांसक्रिप्शन सर्विस में ‘आलिवर ट्विस्ट’ पर पन्द्रह मिनट के लिए उसे अब तक की अधिकतम धन राशि तेरह गिनी ही मिली थी.’’
जब वह नीचे उतरा, तब तक स्वागत कक्ष वाली लड़की सामान्य हो चुकी थी. लेकिन घर और दफ़्तर दोनों का तनाव उसके चेहरे से झलक रहा था. विली और भी असहाय होकर सरोजिनी के बारे में सोचने लगा.
रोज़र ने अनुबन्ध देखना चाहा लेकिन विली बहुत परेशान था कि वह बिना पढ़े हस्ताक्षर कर देने की परिस्थितियाँ उसे कैसे समझा पाएगा. अनुबन्ध पढ़ते समय रोज़र वकील वाली मुद्रा में था. अन्त में उसने कहा- ’‘जो भी हो, मुख्य चीज़ है, किताब प्रकाशित होना. वह बहुत तेज़ आदमी है, किताब के बारे में क्या बता रहा था ?’’
   
‘‘उसने किताब के बारे में तो कुछ नहीं कहा. सिर्फ़ मारकस और ‘वेनिटी फेयर’ पर बात कर रहा था.’’
   
चार-पाँच हफ़्ते बाद चेलसिया (टेम्स नदी के उत्तरी छोर पर बसा लंदन का एक आवासीय इलाका)  में रिचर्ड के घर एक पार्टी थी. विली वहाँ कुछ जल्दी पहुँच गया था, तब तक उसका कोई परिचित वहाँ नहीं आया था. इसलिए वह एक मोटे-से अधेड़ के साथ बतियाने लगा. उसने चश्मा लगा रखा था और एक छोटा जैकेट और गंदा-सा पुलोवर पहने था. उसके बाल उलझे हुए थे. वह (लेखक के) प्राचीन बोहेमियन विचारों का समर्थक था. वह पेशे से एक मनोचिकित्सक था और उसने ‘द एनीमल इन यू एण्ड मी’ नाम की एक पुस्तक भी लिखी थी. इसकी कुछ प्रतियाँ वहाँ रखी हुई थीं लेकिन किसी ने इस ओर ख़ास ध्यान नहीं दिया. कई सारे कमरों में घूमते-घूमते बातें करते हुए विली और वह इतना खो  गये थे कि विली को रोज़र के आने का ध्यान ही नहीं रहा. तभी सेराफ़िना और रिचर्ड भी आ पहुँचे. आज वह रोज़र की पार्टी की तरह गंभीर नहीं थी और फूलों के पीले परिधान में प्रसन्नचित्त नज़र आ रही थी.
   
मनोचिकित्सक को छोड़ विली ने उसी की ओर रुख किया. एक दूसरे का अभिवादन कर वे रिचर्ड को लेकर बतियाने लगे.

वह विली को रोज़र के साथ किए गए बिजनेस के बारे में बता रही थी कि उन्होंने कितनी कठिनाइयों में काम किया. सबसे पहले उन्होंने उत्तरी अर्जेन्टीना के जुजुई में क़ागज़-निर्माण का काम किया. इसके बाद यूरोप और युनाइटेड स्टेट्स में पेपरबैक पुस्तकों की प्रिटिंग आदि की. अब लुगदी के बिना भी अच्छा कागज बनाना संभव हो गया था. खोई एक रेशेदार गूदा होता है जो चीनी निर्माण में गन्ने के सूखे चूरे के रूप में बच रहता है. जुजुई तट पर सेराफ़िना के पास कई वर्गमील की गन्ने की ज़मीन थी. गन्ना कोई साल भर में तैयार होता है और खोई को कूड़ा समझा जाता है. खोई जैसी फ़ालतू चीज़ पर बातचीत सुन कर आस.पास के लोग उपेक्षा से मुस्कुराते हुए निकल रहे थे.
   
विली के दिमाग़ में आया ‘‘अपने बड़े से ऑफिस में रिचर्ड और स्वागत-कक्ष की वह लड़की जितनी वास्तविक लग रही थी, यहाँ इस छोटे से घर में हो रही पार्टी में एकदम नहीं. रिचर्ड ही नहीं, सारे लोग अभिनय करते हुए लग रहे हैं.’’
   
इसके बाद वे पार्टी और सेराफ़िना आदि पर बातचीत करने लगे थे.
रोज़र बोला- ‘‘रिचर्ड इससे कुछ सौ-हज़ार रुपये ले लेगा. ऐसे शानदार मौक़ों का फ़ायदा उठाना ही उसकी फ़ितरत है. अच्छा तो तब हो, जब कोई रिचर्ड के साथ ऐसा करे. उसके ज़्यादातर प्रोजेक्ट रुपयों की खान हैं. वह ऐसे ही किसी काम में नहीं फँसता. वह बेहद उतावला आदमी है. रोमांचक विचार, प्रलोभन और तुरत-फुरत पैसा मिलना उसे पसन्द है. इसके बाद वह अलग हट जाता है. सेराफ़िना तो और भी जोशीली है, पैसे वापस मिलें या न मिलें, उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. उसका जोश वैसा ही रहेगा. यदि उसने शिकायत की तो रिचर्ड उससे यही कहेगा कि यह पैसा उसने अपने से नहीं कमाया था, यह तो उसे विरासत में मिला था.’ ‘‘यहाँ के कुछ लोग बहुत ‘क्लासी’  है.’’ विली ने कालेज से सीखा हुआ एक विशेष शब्द का प्रयोग किया था.
रोजर बोला- 

‘‘ये सारे लोग किताबें लिखते हैं. सत्ता और कुलीनता की यह ख़ास कमज़ोरी है. ये लिखना नहीं चाहते पर लेखक कहलाना चाहते हैं. ये किताब पर अपना नाम भर देखना चाहते हैं. रिचर्ड भी इन्हीं में से एक आडम्बरवादी प्रकाशक है. लोग ऐसे प्रकाशकों को अपनी पुस्तकें छपवाने के लिए खूब पैसे देते हैं. रिचर्ड भी बहुत तेज़ है. अपने आडम्बरवादी प्रकाशन-क्षेत्र में वह बेहद सावधान एवं चुनिन्दा बना रहता है, जिसकी असलियत कोई नहीं समझ सकता. इससे वह अमीर एवं स्थापित लोगों से संबंध बनाकर रखता है ताकि वे उसके अहसानमंद रहें. इसी कारण वह किसी केबिनट मिनिस्टर की तरह ताक़तवर है, बल्कि वे तो आते-जाते रहते हैं, वह स्थायी हो गया है. समाज में चारों ओर उसकी मजबूत पकड़ है.’’

   
इसके बाद कई हफ़्तों तक विली रोज़र के यहाँ मार्बल आर्क स्थित घर में आता जाता रहा. कभी पांडुलिपि की तैयारी में सुझाव हेतु, कभी अस्वीकृति-पत्रों को लेकर. पर्दिता अक़्सर वहीं होती. विली के मन में उसका आकर्षण बढ़ता जा रहा था. इस बीच विली कई बार असमंजस में आ जाता. वह रोज़र को सब कुछ बता देना चाहता था लेकिन हिम्मत नहीं होती. अब जब किताब़ निपट गई और उसे अपने पचास पाउण्ड भी मिल गए, तो उसने तय किया कि अब ज़्यादा दिन नहीं झेलेगा. वह रोज़र के कमरे में जाएगा और विनम्रतापूर्वक कहेगा- ‘‘रोजर, मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ. मैं और पर्दिता एक-दूसरे को प्यार करते है.’’
   
लेकिन वह जा नहीं पाया क्योंकि उसी दौरान नाटिंग हिल में जातीय दंगे भड़क उठे. शांत रहनेवाली गलियाँ, जिनके मकानों की खि़ड़कियों पर मोटे.मोटे पर्दे लटके रहते थे और फ़्लैट हमेशा खाली.खाली लगते थे, अब दंगाइयों से भर गई थीं. ऐसे मकान जिनमें किरायेदार होते, उनमें से बूढों और असहायों को छोड़ सबको खींच-खींचकर निकाल लिया गया था. मुँह पर एडवार्डियन (किंग एडवर्ड सप्तम के शासन सर्मथक) कपड़ा लपेटकर घूमनेवाले गिरोहों द्वारा गली-गली में अश्वेत लोगों को ढूँढ़ा जा रहा था. वहीं एक केलसो नामक एक वेस्ट-इंडियन, जिसे इस बारे में कुछ पता नहीं था, अपने दोस्त से मिलकर आ रहा था कि लेटिमर रोड के भूमिगत स्टेशन पर दंगाइयों की गिरफ़्त में आ गया और मार डाला गया.
   
अख़बार, रेडियो जैसे माध्यम दंगों की ख़बरों से भरे थे. रोज़ की तरह जब विली दंगे वाले दिन मिड.मार्निंग कॉफ़ी के लिए कालेज के पास वाले ढाबे पर गया तो उसने देखा हर आदमी अख़बार में गड़ा हुआ था, जिनमें फ़ोटो और सुर्खियाँ छाई थीं. तभी वहाँ काम करने वाले एक बूढ़े ने अचानक बताया- ‘‘अश्वेत लोग धमकियाँ दे रहे हैं.’’ उसके चेहरे पर सालों से झेला गया अभाव का कष्ट झलक रहा था. अख़बारों में तो इस तरह कुछ नहीं दिया था लेकिन विली यह सुनकर बुरी तरह डर गया. उसे लगा सब लोग उसी को देख रहे हैं, अख़बार भी उसी के बारे में कह रहे हैं. वह जल्दी से कॉलेज में चला आया और उसने बाहर निकलना ही बंद कर दिया. इस तरह छिपना कोई नई बात नहीं था, घर पर भी कोई गंभीर धार्मिक अथवा जातीय दंगा भड़काने पर वे ऐसा ही किया करते थे. दंगे के तीसरे दिन उसके एक जानकार रेडियो प्रोड़यूसर का टेलीग्राम आया. विली ने उसे फ़ोन किया.
वह कहने लगा- ‘‘विली, हम यह ख़बर लें कि नहीं, अगर लें तो किस रूप में ? मेरा विचार है तुम साधारण वेशभूषा में भूमिगत लेडब्रोक ग्रोव, सेंट एन्स वेल रोड अथवा लेटिमर रोड पर जाओ. लेटिमेर रोड ज़्यादा ठीक रहेगा क्योंकि मुख्य घटना यहीं हुई थीं. तुम ऐसे व्यवहार  करोगे मानो भारत का कोई आदमी नॉटिंग हिल देखने आया है. केलसो के साथ क्या हुआ, तुम इसका भी पता लगाओ, जहाँ लोग इकट्ठे खडे़ हों, वहाँ जाकर बात करो. केवल तुम्हीं वह आदमी हो, जो जड़ का पता लगा सकता है, चीज़ों की खोज कर सकता है. विषय पर बने रहना बस! पता लगाओ वहाँ क्या हुआ था. अमूमन पाँच मिनट की स्क्रिप्ट हो.’’

‘‘फ़ीस क्या होगी?’’
‘‘पाँच गिनियाँ.’’
‘‘इतना तो आप हमेशा देते हैं. ये कोई फ़ैशन शो या कला.प्रदर्शनी तो नहीं है.’’
‘‘विली, तुम्हें पता है, हमारा बजट निश्चित है.
‘‘मेरी परीक्षाएँ हैं, मैं पढ़ाई कर रहा हूँ, समय नहीं है.’’ विली ने बात ख़त्म कर दी.’ तभी रोज़र का पत्र आया.

\”प्रिय विली! बड़े शहरों की ज़िन्दगी में ऐसा पागलपन आ जाया करता  है. जिसका तुरन्त कोई हल नहीं सूझता. मैं और पर्दिता हमेशा तुम्हारे साथ हैं, समझे.’’

विली सोचने लगा- ’’कितना अच्छा आदमी है. शायद मेरे परिचितों में एकमात्र. मेरा अच्छा भाग्य ही था जब लीगल-एड वकील का काम करते समय इसकी मुझसे मुलाकात हुई. अच्छा हुआ मैंने इसे पर्दिता के बारे में कुछ नहीं बताया. कॉलेज में छिपने के दौरान विली ने पर्सी कार्टो को काफ़ी कुछ समझ लिया था, जो कुछ इधर के महीनों में हुआ था. हालाँकि वे अब भी दोस्त थे पर रुचियों की भिन्नता ने उनके बीच एक दरार पैदा कर दी थी. अब विली को गाइड के रूप में भी पर्सी की ज़रूरत नहीं रही थी क्योंकि अब तक वह लंदन के बारे में काफ़ी कुछ जान चुका था. वे बोहिमियन (मौज़मस्ती के नाम पर होने वाली) पार्टियाँ, जो उसने जुने, पर्सी और दूसरे लोगों के साथ मनाई थी, उनमें भी उसने कुछ.न.कुछ खोया ही था. नॉटिंग हिल के टूटे-फूटे इलाकों की महानगरीय और चकाचैंध भरी उन पार्टियों की याद भी धुँधली होती जा रही थी.
   
अपनी ड्रेस को लेकर पर्सी अभी भी वैसा ही स्टाइलिश था लेकिन उसमें कुछ बदलाव आ गया था, उसका कुछ नष्ट हो गया था.
   
पर्सी ने कहा था- ‘‘विली, उस बूढे़ की जागीर लुटने जा रही है. दस्तावेज़ उसे कहीं जाने की इज़ाजत नहीं देते. लेकिन वह मुझे नीचे गिराना चाहता है. वह इसके लिए कुछ भी कर सकता है. उसने मुझे कभी माफ नहीं किया. प्रेस ने नॉटिंग हिल में उसकी संपत्ति एवं विकास की सब योजनाओं का खुलासा कर दिया है. किसी ने उसके दिमाग़ में यह घुसा़ दिया है कि उसका बुरा करने वाला अश्वेत आदमी मैं ही हूँ. मैं रोज़ाना कॉमन रूम में धड़कते दिल से अख़बार खोलता हूँ कि आज ज़रूर मेरा नाम घसीटा गया होगा. कॉलेज को भी अच्छा नहीं लगेगा कि नॉटिंग हिल के किसी काले धूर्त को छात्रवृत्ति दी गई. वे मुझे बाहर भी निकाल सकते हैं. लेकिन मैं समझ नहीं पाता, कहाँ जाऊँगा ?’’
   
तभी भारत से विली का एक पत्र आया. घर से आया यह लिफ़ाफ़ा कुछ ख़ास तरह का लग रहा था. जैसा कि बाज़ार में अख़बारों की स्टालों पर रखा होता था. इन्हें फ़र्श पर बैठे ग़रीबों के बच्चे बनाते थे. उनमें कुछ बड़े वाले ब्लेड का उपयोग करते, जो उनके अंगूठे से सटा रहता तो कुछ सरेस की ब्रशों (चिपकाने वाली) का. घर से आए पत्र के कारण विली को अचानक अपना अतीत याद हो गया. उसे अच्छा नहीं लग रहा था. पत्र पूरा पढ़ लेने पर भी उसका अवसाद बना रहा लेकिन इसका मूल कारण विस्मृत हो गया था.
   
वह पत्र पिताजी का लिखा हुआ था. इधर विली अपने पिता के बारे में कुछ सहृदयता से सोचने लगा था. “शायद वह दंगों की ख़बर से चिन्तित हो उठे होंगे. इसे वह घर पर हुए दंगों की तरह देख रहे होंगे.’’
उसने पत्र पढ़ाः

प्रिय विली, उम्मीद है मेरा यह पत्र तुम्हें मिल जाएगा. मैं ठीक से नहीं लिख पा रहा हूँ. क्योंकि मेरे पास कोई ख़ास समाचार हैं नहीं. फिर भी तुम्हें लिखने का मन कर रहा था. तुम्हारी बहन सरोजिनी के बारे में बता रहा हूँ. पता नहीं तुम क्या सोचो. ख़ैर, यह तो तुम्हें पता ही है आश्रम में सारी दुनिया से लोग आते रहते हैं. ऐसे ही एक दिन एक जर्मन वहाँ आया. देखने में वह अधेड़ और एक पैर से विकलांग था. कुल मिलाकर यह कि उसने सरोजिनी से विवाह का प्रस्ताव रखा. हमने मंज़ूर कर लिया. पता है, मुझे बहुत पहले से महसूस होता रहा है कि सरोजनी अंतर्राष्ट्रीय विवाह की इच्छुक थी. इससे मुझे हैरानी भी होती रही. हो सकता है उसकी एक और पत्नी हो. बहरहाल, ज़्यादा कहना ठीक नहीं. वह एक फोटोग्राफ़र है, कहता है युद्ध के अंतिम दौर में वह बर्लिन की ओर से लड़ा था, रूसी टैंक पर मशीनगन से फ़ायरिंग करते हुए जबकि उसका दोस्त बंदूक़ फेंककर ज़मीन पर चित्त पड़ गया था, मारे डर के उसके दाँत किटकिटाने लगे थे. आजकल वह क्रांति विषयक फ़िल्में बनाकर निर्वाह करता है. यह कुछ ठीक तो नहीं पर सबको अपनी तरह जीने का हक़ है.’’

विली ने सोचा- ‘काश, आप इसे फिर कह सकते.’

‘‘तुम कहोगे कि क्या यह बात करने को मैं ही बचा हूँ. वे एक फ़िल्म बनाने के लिए क्यूबा गए है, वहाँ सिगार बनाए जाते हैं. वहाँ से किसी गून, गोविया या गोवारा नाम के आदमी को लेकर आगे कई जगह जाएँगे. तुम्हारी माँ लड़की का हाथ उसे देकर बहुत खुश है, हालाँकि अब वह इसको मना भी करे तो कोई ख़ास आश्चर्य नहीं होना चाहिए. पता नहीं, इन सबका अन्त क्या निकलेगा. क्या होगा बेचारी सरोजनी का. खै़र, मैं तुम्हें यही बताना चाहता था.’’

‘‘यहाँ आने के बाद मैंने यही तो सीखा है. सब कुछ इकतरफ़ा ढंग से चल रहा है. यह दुनिया थम जानी चाहिए लेकिन यह है कि चलती जा रही है.’’ विली सोच रहा था.
तीन
दूसरा अनुवाद
(The Second Translation)


क दिन विली को ख़याल आया कि उसने कई दिनों से कॉलेज में पर्सी काटो को नहीं देखा. पूछताछ करने पर पता चला कि वह तो बिना किसी को कुछ बताए एक बैग में अपना सामान ले, कॉलेज छोड़कर चला गया था. वह कहाँ गया, इस बारे में पक्का कोई नहीं कह सकता था. बस एक शगूफ़ा था कि वह लंदन छोड़कर पनामा चला गया. इस ख़बर से विली को बड़ी निराशा हुई. नॉटिंग हिल में दंगों की घटना के बाद उसका लंदन में बिताया सारा समय कलुषित हो गया था. पर्सी अख़बारों में अपना नाम छप जाने के डर से बड़ा चिंतित था. वैसे तो प्रॉपर्टी की ठगी पर अख़बारों में कई हफ़्तों तक काफी कुछ आता रहा था पर उसमें पर्सी को लेकर व्यक्तिगत कुछ नहीं था. लेकिन विली समझ गया कि पर्सी को यह आभास हो चला था कि दंगों के बाद कुछ और अनहोनी ना हो जाए, इसलिए उसने पहले ही लंदन छोड़ दिया. अब विली यहाँ खुद को अरक्षित पा रहा था, लंदन के जीवन का पूरा जा़यका ही बिगड़ गया था. इस पर वह सोच.सोच कर काफी हैरान होता था कि उसने एकदम शुरुआत में जो कुछ किया वही अब भी किए चला जा रहा था.

   
जर्मनी से उसकी बहन सरोजिनी का पत्र आया. विली की उसे खोलने की इच्छा नहीं हो रही थी. शर्म के मारे वह सोच रहा था कि अगर घर पर, आश्रम में अथवा मिशन स्कूल में जर्मनी या विदेशी स्टाम्प का यही पत्र उसके पास आया होता तो वह कितना खुश होता. स्टाम्प के डिजाइन से वह उस देश के ख़यालों में चला गया और सोचने लगा कि पत्र-प्रेषक ने उसे कितना प्यार भेजा है-
   

‘‘प्रिय विली,
तुम नहीं जानते, हम तुम्हें लेकर कितने चिंतित हैं. ना तुम लिखते हो, ना हमें कुछ पता है कि तुम क्या रहे हो ? क्या तुम वहाँ कॉलेज से डिग्री ले रहे हो और क्या उसके बल पर तुम्हें नौकरी मिल जाएगी ? अपने पिताजी का उदाहरण तुम्हारे सामने है, अब भी नहीं संभले तो उनकी तरह तुम भी बेकार रह जाओगे. घरेलू जीवन में ऐसा होता भी है.

विली सोचने लगा- मैं इस लड़की को लेकर कितना परेशान रहता था. अगर यह एक मौका भी देती तो इसकी सुखी बनाने के लिए मैं कुछ भी कर देता. आज यह बदशक्ल लड़की बदल गई क्योंकि वह अधेड़ जर्मन जो आ गया.
   
औरों की तरह यह भी मेरी माँ जैसी एक पूरी शादीशुदा औरत हो गई है, मानो हमेशा से ऐसी ही थी. लगता है मेरी सारी चिंता एवं स्नेह का मज़ाक़ बनाया जा रहा है, सरोजिनी की तरफ़ से यह मुझे ठीक नहीं लगता.

‘‘मैं और वूल्फ़ क्यूबा आदि कई जगह जाने वाले हैं. वूल्फ़ मुझसे क्रांति संबंधी बहुत सारी बातें बताता है. वह हमारी माँ के चाचा की तरह ही है लेकिन उनसे ज़्यादा पढ़ा.लिखा और संभावनाओं वाला है. उनके बजाय इन्हें दुनिया का अधिक अनुभव है. मेरी इच्छा है कि तुम भी परिवार में ऐसी ही जगह बनाओ ताकि तुम्हें पता चले कि दुनिया में कितना कुछ करने को है और तुम किस तरह लंदन में स्वार्थी ढंग से पड़े रहकर छोटी.मोटी चीजें करके जीवन बरबाद करने पर तुले हो. वूल्फ़ और मैं कुछ हफ़्तों से जर्मनी में है. वूल्फ़ के पास सरकार और आम जनता को दिखाने के लिए एक फ़िल्म रखी है. सब व्यवस्थित होने के बाद मैं तुमसे मिलने कुछ दिन के लिए लंदन आऊँगी.’’

प्लीज़ मत आना सरोजिनी, मत आना’ विली बुदबुदाया. लेकिन जल्दी ही वह आ पहुँची और तीन.चार दिन में ही उसने विली की ज़िन्दगी पलट दी. वह कॉलेज के पास स्थित एक छोटे होटल में ठहरी थी, जर्मनी छोड़ने से पूर्व ही इसका इन्तजार कर लिया गया था. वहाँ से वह रोज़ विली के कॉलेज स्थित कमरे में आती और खाना तैयार करती. विली की इसमें कोई सहायता नहीं लेती. उसने कुछ सस्ते बर्तन खरीद लिए और फेरी वालों से रोज ताज़ा सब्जी लेना तय कर लिया. वह हीटर को विली के कमरे के पीछे ले जाकर खाना बनाती थी. फिर वे पेपर की प्लेटों पर खाना खाते. इसके बाद वह कॉरीडोर के अंत में बने सिंक में बर्तन धोकर ले आती. सरोजिनी को कभी अच्छा खाना बनाना नहीं आया, वैसे भी कॉलेज रूम में खाना बनाना ठीक नहीं लगता. उसकी गंध कमरे में पसरी रहती थी. कॉलेज के नियम तोड़ना भी विली को अनुचित प्रतीत होता. उसे यह भी नहीं जँचता था कि लोग उसकी काली.सी कुक को- जो उसकी बहन ही है- साड़ी के ऊपर भद्दा कार्डीगन और पैरों में गंदे मोजे़ पहने फूहड़ रूप में देखें.
    
उसने पाँच ही मिनट में विली के आगे परिवार और परिवेश की छोटी-मोटी कहानियों को एक नए ढंग से पेश किया, हालाँकि वह किसी के बारे में ठीक से समझती नहीं थी.

‘‘जब तुम्हें यहाँ की विख्यात डिग्री या फिर डिप्लोमा मिल जाएगा तो क्या करोगे ? क्या तुम अध्यापक जैसी कोई ऐसी.वैसी नौकरी करोगे या बाक़ी ज़िन्दगी यहीं छुपे रहकर गुज़ार दोगे ?’’ उसने पूछा.


विली- ’‘ऐसा तो नहीं है, हाँ मेरी एक किताब आने वाली है, शायद अगले वर्ष!’’

सरोजिनी- ‘‘ये एकदम फ़ालतू काम है विली, कोई तुम्हारी लिखी किताब पढ़ना नहीं चाहेगा. मैं कहना तो नहीं चाहती, पर याद है तुम एक बार मिशनरी बनना चाहते थे.’’
विली- ‘‘मेरा मतलब यह था कि जब तक किताब आए मैं यही रहकर इन्तज़ार करूँ.’’
सरोजिनी- ‘‘हाँ, हाँ, इसके बाद रुकने को कुछ और बहाना बना देना, फिर कुछ और. तुम्हारे पिताजी की ज़िन्दगी भी ऐसे ही बीती है.’’
   
खाना बनाने की गंध उसके जाने के कई दिन बाद भी कमरे में बनी रही, रात में विली उसे अपने तकिए में, बालों और बाहों तक में महसूस करता.

वह सोच रहा था- सरोजिनी जो कहती है, सही तो है पर उसके मुँह से सुनना मुझे अच्छा नहीं लगता. पता नहीं मैं कहाँ जा रहा हूँ, बस समय गुज़र रहा है, लेकिन मुझे घर जाना बिल्कुल पसन्द नहीं, जहाँ मेरा इंतजार किया जाए. पिछले ढाई सालों से मैं एक स्वच्छंद व्यक्ति की तरह रहा हूँ. अब मैं कुछ और करने वापस नहीं लौटूंगा. मुझे सरोजिनी की तरह किसी से शादी करने का बिल्कुल मन नहीं है, और घर जाने पर यही किया जाएगा. घर जाने पर मुझे अपनी माँ के चाचा की तरह विद्रोह करने होगें. जो मैं नहीं चाहता. यह तो मेरे अमूल्य जीवन को बरबाद करना हुआ. और लोगों को इसमें मज़ा आएगा. सरोजिनी भी कुछ यही चाहती है. शिक्षा में डिप्लोमा लेने के बाद यदि मुझे यहीं पर अध्यापन का मौका मिल जाए तो रुकने का अच्छा बहाना होगा. नॉटिंग हिल जैसी जगह इसके लिए अच्छी नहीं है. अगर मुझे ऐसी जगह भेज दिया गया तो डर के मारे मैं किसी दिन भीड़ के हत्थे चढ़ जाऊँगा और केलसो की तरह मार दिया जाऊँगा. यह घर जाने से ज़्यादा बुरा होगा. लेकिन अगर मैं यहीं रह गया तो हमेशा अपने दोस्तों की प्रेमिकाएँ पटाने में लगा रहूँगा, हालाँकि यह कोई कठिन काम नहीं, पर है तो ग़लत. किसी दिन ज़रूर फँस जाऊँगा. मुश्किल यह भी है कि मैं अब तक नहीं जानता कि अपने लिए लड़की कैसे पटाई जाती है, न किसी ने कभी कुछ बताया ही. मुझे तो यह भी नहीं पता किसी अजनबी लड़की से व्यवहार कैसे किया जाता है, कैसे उसे छुआ जाता है, कब उसका हाथ पकड़ा जाए अथवा उसका चुम्बन लेने का सही ढंग क्या है ?
    


जब पिताजी स्वयं के बारे में बताते हुए अपनी यौन-अक्षमता का ज़िक्र कर रहे थे तो मुझे उन पर हँसी आ रही थी, लेकिन तब मैं नासमझ था. अब पता चला है कि मेरी हालत भी अपने पिताजी जैसी ही थी. सबको अपने पुत्रों को काम-कला की जानकारी देनी चाहिए. लेकिन हमारी संस्कृति में यह नहीं होता. क्योंकि हमारे यहाँ अरेन्ज-मेरिज की जाती हैं, जहाँ सेक्स को कला के रूप में नहीं लिया जाता. कुछ लड़के यहाँ मुझसे ‘कामसूत्र  की बात कर कर रहे थे, जो घरों मे वर्जित पुस्तक है. कामसूत्र कुलीन वर्ग के लिए मानी जाती है लेकिन मुझे नहीं लगता मेरे पिताजी ने एक ब्राह्मण होकर भी उस पुस्तक को कभी देखा होगा. सेक्स का दर्शन व्यावहारिक रूप से हमारे इतिहास से जुड़ा है पर मुसलमानों ने उस परम्परा को ही तहस-नहस कर डाला.

    
अब हम पशुओं की तरह घर में व्यभिचार करते हैं. औरतों से हमेशा अंधेरे में संबंध स्थापित करते हैं और शर्म से गड़े रहते हैं. घरों में कभी कोई संभोग अथवा काम-कला पर बातचीत नहीं करता. मुझे लगता है कि सारे पुरुषों को इसमें दक्ष रहना चाहिए. मारकस, पर्सी काटो और रिचर्ड इस क्षेत्र के महारथी थे. जब मैंने पर्सी से पूछा कि उसने यह सब कैसे सीखा, वह बोला कि उसने छोटी-छोटी लड़कियों के साथ पहले उँगली और फिर वैसे बलात्कार करके ये सब सीखा था. उस समय सुनकर मुझे झटका लगा था, पर अब ऐसा नहीं है.’’

उसने सुबह-सुबह पर्दिता को फोन किया- 

‘‘पर्दिता, इस वीकेण्ड पर कॉलेज में आ जाना प्लीज़!’’
‘‘यह ठीक नहीं है विली! बल्कि यह तो रोज़र को धोखा देना हुआ.’’

‘‘यह ठीक तो नहीं, पर मुझे तुम्हारी जरूरत है. पिछली बार मैं चूक गया था, पर तुम्हें बता दूँ, यह हमारा सांस्कृतिक मसला है. मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ और तुम्हारे साथ संभोग करना चाहता हूँ लेकिन ऐन मौके पर पुरातन संस्कार मुझ पर हावी हो जाते हैं और मैं भय और शर्म से गड़ जाता हूँ. पता नहीं क्यूँ इतना बुरा होता है. लेकिन इस बार वैसा नहीं होगा, मुझे एक मौका तो दो’’


‘‘ओह विली, काश तुमने यह पहले कहा होता!’’
 वह नहीं आई .

अब विली जुने की तलाश में निकल पड़ा. वह कई महीनों से नहीं दिखी थी, नॉटिंग हिल वाले मकान में जो कुछ हुआ था, याद कर उसे रोमांच हो आया. दंगों के बाद भी वे वहीं जाते रहते पर जुने डेबन्हाम्स वाली जगह नहीं थी. दूसरी लड़कियों में विली को वह बात लगी नहीं. बल्कि उसके थोड़े कड़क व्यवहार से एकाध तो सहम भी गई. अन्ततः एक अन्य लड़की ने उसे जुने के बारे में बताया कि उसकी शादी हो गई थी. उसने अपने बचपन के एक दोस्त जिसे वह बारह साल की उम्र से जानती थी, से ब्याह कर लिया था. उसकी कहानी अब भी रोमांस से भरी थी, जिसे बताते समय लड़की की आँखों में एक खास चमक देखी जा सकती थी, हालाँकि उसने मस्कारा आदि कृत्रिम चीजें भी लगाई हुई थीं.
   
वे हर कहीं साथ-साथ जाते और भाई-बहन जैसे लगते. हालांकि वह अण्डरटेकर (शवों के अंतिम-संस्कार की व्यवस्था करने वाला.)  नामक एक खराब व्यवसाय में था, यह उनका पुश्तैनी पेशा था. लेकिन अगर आप उसे ढंग से करें तो उसका रूप कुछ और होगा, ऐसा जुने ने बताया था. कई बार वह और जुने एक साथ अंतिम संस्कारों में भी जाते. उनके पास शादी के लिए एक पुरानी रॉल्स रॉएस थी, जिसे उसके परिवार वालों ने पच्चीस पाउण्ड में किराए पर लिया था. यह कीमत एकबारगी ज़्यादा लग सकती है लेकिन उस कार के लिए यह ठीक ही थी. जुने ने सुबह के वक्त उस खूबसूरत कार को देखा, जिसे चोटीदार टोपी आदि लगाए वह लोकल आदमी चला रहा था, जिसने उसे किराए पर लिया था. उसने पिता से पूछा- ‘क्या आपने इसे किराए पर नहीं लिया ?’ उन्होंने मना कर दिया, शायद वह किसी विंटेज कार रैली  में जाने वाली थी और इसीलिए यहाँ थी. वे भाई-बहन की तरह ही थे. यह कोई ऐसी बात नहीं थी, जैसी आजकल हुआ करती है.
    
वह लड़की क्रिकलवुड में उसके परिवार और दोस्तों के साथ सुरक्षित, सुखी और आनंदपूर्ण जीवन के बारे में जितना ज़्यादा बता रही थी, विली उतना ही उससे अपने को दूर पा रहा था. यहाँ तक कि यदि वह पीना जानता या पीने की अदा भी जानता तो शायद किसी पब में चला जाता. या फिर वह किसी वेश्या को खोजने की सोचने लगता.
    
देर शाम वह पिकेडिली सर्कस की ओर निकला. वह फुटपाथ पर आने जाने वालों की घूरती निगाहों से बचने की कोशिश करता चल रहा था. थकान के बावजूद वह रुका नहीं और लगभग आधी रात को एक जगमगाते कैफे में पहुँचा. यह वेश्याओं के लिए कुख्यात था. गंदी और अनाकर्षक औरतें वहाँ बैठी हुई चाय, सिगरेट अथवा पनीर की टिकिया खा रही थीं और तरह-तरह के स्वरों में बतिया रही थी. एक वेश्या ने दूसरी से कहा- ‘मेरे पास पाँच और होंगे.’ वह कंडोम के बारे कह रही थी. उसने बैग खोला और निकालकर गिनने लगी. विली वापस लौट पड़ा. गली में सन्नाटा पसरा था. बगल की गली में एक लड़की एक आदमी से घुल.मिलकर बातें कर रही थी. रुचि न होते हुए भी विली उस ओर बढ़ गया. तभी एक आदमी गुस्से में चीखते हुए गुजरा- ‘‘तुम्हें पता है तुम क्या कर रही हो ?’’
वह उससे छिटक कर खड़ी हो गई. उसके बालों, माथे और पलकों पर पाउडर चमक रहा था. उसने उस गंजे आदमी से कहा- ’’मैं इसे तब से जानती हूँ जब यह आर.ए.एफ में था और मैं डब्ल्यू.डब्ल्यू.ए.एफ में.’’
    
ख़ैर, अनिच्छा के बावजूद विली ने उस औरत से बातचीत की और उसके चेहरे को देखे बिना ही उसके पीछे.पीछे चलने लगा. वे एक कमरे में पहुँचे, जिसमें परफ़्यूम, पेशाब आदि की मिली.जुली दुर्गन्ध आ रही थी.
    
विली ने ना उसे देखा, ना ही कोई बात की, बस कपड़े उतारते हुए अपनी सेक्स-पावर के बारे में सोचता रहा. उस औरत ने अभी आधे ही कपड़े उतारे थे, फिर अपनी खुरदरी आवाज में बोली- ‘तुम मोज़े पहने रह सकते हो’ (शायद कंडोम के अर्थ में प्रयुक्त है). इन अजनबी से शब्दों को वह पहले भी सुन चुका था पर इनका भावार्थ उसे कभी पकड़ में नहीं आया. उसने फिर कहा- ’‘मेरे बालों के प्रति सावधानी बरतना.’’ विली में उत्तेजना की लहर उठी, पर वह उत्तेजना संवेदहीन थी, इससे उसे आनंद के बजाय शर्म महसूस हो रही थी. उसे सेक्स पर लिखी पेलिकन पुस्तक के कुछ शब्द याद आ रहे थे, जिनसे वह पहले भी अपमानित हो चुका था. ‘काश, मैं सेक्स का एथलीट होता!’ तभी वह बोली- ‘अंग्रेज़ों की तरह संभोग करो ना!’ पर कुछ ही क्षणों में उसे धकेल दिया गया. विली ने कोई प्रतिवाद नहीं किया. चुपचाप कपड़े पहने और कॉलेज की ओर चल पड़ा. वह शर्म से गड़ा जा रहा था.    
    
कुछ दिन बाद विक्टोरिया कोच स्टेशन, जो कि लोकल बसों का आख़िरी स्टेशन है, से जाते समय विली ने बस में उसी वेश्या को देखा, जिसके साथ वह तीन-चार दिन पहले था. वह एकदम सपाट और साधारण लग रही थी, रात वाले मेकअप का उस पर कोई चिह्न नहीं था, मानो दुराचार तो एक बहाना था, वह तो देहात से लंदन में कुछ दिनों के लिए आई थी और अब वापस लौट रही थी.

‘‘इसे फिर देखना भी लिखा था! मुझे भी पर्सी की तरह यहाँ से जाना होगा.’’ विली सोचने लगा.
    
पर जाए कहाँ, यह पता नहीं था. पर्सी के पास तो विकल्प थे, वह कहीं से भी अपनी दुनिया की शुरुआत कर सकता था, उसे अपने पिताजी का भी साथ था, जो जमैका छोड़कर अश्वेत मज़दूरों के साथ काम करने पनामा नहर पर थे. इसलिए पर्सी पनामा, जमैका और चाहे तो युनाइटेट स्टे्टस भी जा सकता था. विली के लिए एक मात्र विकल्प भारत था, जहाँ वह जाना नहीं चाहता था. उसके मन में खयाल आया कि काश कोई ऐसा जादू हो जाता, वह चाहे जहाँ जा सकता. उसने तय किया कि ऐसा कोई मौका आने पर वह खुद को तैयार रखेगा.
    
लेकिन उसे किताब के प्रकाशित होने और डिप्लोमा मिलने तक इन्तज़ार करना था. वह कॉलेज में आ दुबका और डिप्लोमा के बाद अपने स्वतंत्र होने के बारे में सोचने लगा, उबाऊ किताबों से मेहनत करके उसे डिप्लोमा के रूप में ही असली फल मिलने वाला था. बाहरी दुनिया से मानो उसका कोई नाता नहीं था, संसार भी जैसे उसे भुला चुका था. बी.बी.सी. प्रोड्यूसर की ओर से भी स्क्रिप्ट के अनुरोध बंद हो चुके थे, रोज़र की भी कोई ख़बर नहीं थी. कई हफ़्तों से उसने उसे याद भी नहीं दिलाया था कि विली ने लंदन में सक्रिय और मिश्रित जीवन शैली निर्मित की थी और पुस्तक प्रकाशित होते ही वह एक लेखक के रूप में जाना जाने वाला था.
    
इसकी याद दिलाने रिचर्ड का कैटलॉग आया था. जो काफी पीड़ादायक था. पुस्तक के बीच में आधे पृष्ठ का एक अनुच्छेद दिया गया था, जिसमें विली को ‘उमहाद्वीप की एक नई विद्रोही आवाज़’ के रूप में प्रस्तुत किया गया था. आगे कहानियों में भारतीय ग्रांमाचल के वर्णन पर फालतू टिप्पणी थी. लेखन की शैली पर कुछ नहीं दिया गया था.
    
कैटलॉग-एन्ट्री’ ठीक-ठाक लेकिन व्यावसायिक रूप से स्व्रप्रतिरोधक थी, जिसमें ‘ट्रिब्यूट’ करना पुस्तक के प्रति कम, रिचर्ड और उसकी फर्म की कूटनीति के प्रति ज्यादा था. रिचर्ड ने वही काम किया था जिसका रोज़र को अंदेशा था. विली को ऐसा लगा मानो किताब कलुषित हो गई थी बल्कि उसके लिए ख़त्म हो चुकी थी.
    
इसके कुछ समय बाद प्रूफ़ आए, जिनको उसने ऐसे देखा मानो दंगों या मृत.प्रसव के बाद की औपचारिकताएँ पूरी कर रहा हो. लगभग चार माह बाद किताब की छः प्रकाशित प्रतियाँ आईं. रिचर्ड और उसके ऑफिस की ओर से कुछ नहीं था. ना ही रोज़र की कोई प्रतिक्रिया आई थी. विली यह सोचकर सहम गया था कि कहीं पर्दिता ने भी उसे छोड़ तो नहीं दिया. उसने अवसाद में गहरी चुप्पी ओढ़ ली थी. अब वह कॉलेज लाइब्रेरी में अखबार और साप्ताहिक देखने लगा; ऐसे.ऐसे प्रकाशन जो उसने कभी नहीं सुने. दो हफ़्तों तक किताब पर कुछ नहीं मिला. इसके बाद उसने इधर.उधर इस पर कुछ टिप्पणियाँ देखी-

‘‘जॉन मास्टर्स के एंग्लो-इंडियन मेले में, जहाँ कोई भी स्तरीय और ज़ायकेदार कढ़ी की उम्मीद करता है, उसे एक अजीब-से स्वाद की चीज मिलती है, जिसके मूल का भी पता नहीं और अंततः उसे एक बेस्वाद सी अनुभूति होती है. मानो उसने कई प्रकार का खाया बहुत कुछ हो, लेकिन पेट न भरा हो .. भय, अशांति और चिंता के विभिन्न टुकड़ों को इस तरह बिखरा-बिखरा और अनिश्चित ढंग से पेश किया गया है कि दीन-दुनिया की कोई मुक़म्मल तस्वीर नहीं बनती. लेखक युवा पीढ़ी की दिशाहीनता की तो ढेरों बातें करता है लेकिन उसने नए ज़माने की एक बदरंग  तस्वीर पेश की है… ’’

विली ने किताब का नोटिस लेना ही छोड़ दिया उसकी उसे याद करने की इच्छा तक नहीं होती. ‘‘अब और नहीं लिखूँगा. किताब वैसी नहीं बनी, जैसी मैं चाहता था. यह बनावटी और छद्म लगती है. मुझे उन समीक्षकों का धन्यवाद ही करना चाहिए, जिन्होंने इसे वैसा पेश नहीं किया, जैसा होता.’’

और एक दिन उसे दो पत्र मिले. जिनमें एक रोजर का था-
    

‘‘प्रिय विली, देर से सही लेकिन किताब के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ. उसमें क्या है, मुझे अच्छी तरह पता है. मैंने जो भी समीक्षाएँ देखी, सब उतनी खराब नहीं हैं. ऐसी किताब पर टिप्पणी करना सरल नहीं है. प्रत्येक समीक्षक ने उसके किसी खास पक्ष को रेखांकित किया है, जो अच्छी बात है. रिचर्ड इसे और बेहतर बना सकता था, पर उसकी यही स्टाइल है. किसी लातिन कवि ने कहा है- ‘किताबें अपनी किस्मत स्वयं तय करती है.’ यह किताब भी उसी रास्ते पर है, पर अभी तुम इसका अनुमान नहीं कर पाओगे.’’


पर्दिता को लेकर चिंतित और निराश विली को इस पत्र में दोहरापन नज़र आया, उसे यह तटस्थ और रूखा दोनों लगा, इसलिए उसने इसका खास नोटिस नहीं लिया. दूसरा पत्र किसी अफ्रीकन देश की एक लड़की का था. नाम से पुर्तगाली लगने वाली वह लड़की लंदन में कोई कोर्स कर रही थी. उसने ‘डेली मेल’ में छपी एक समीक्षा के बारे में ज़िक्र किया था. विली को वह हल्की समीक्षा याद थी. एक समीक्षक ने उसकी कहानियों का निर्धारण करने का प्रयास किया था. इसी से वह किताब लेने को प्रेरित हुई थी.

‘‘स्कूल में हमें बताया जाता था कि पढ़ने के लिए यह किताब अच्छी है, वह किताब अच्छी है, लेकिन हम जैसी पृष्ठभूमि वाले लोगों के लिए उन्हें लेना आसान नहीं होता. मुझे लगता है कि आपकी किताब वैसी है, जिसमें हम अपने को खोज सकते हैं. हमने इधर.उधर जो भी किताब पाई, अपनी पसंद मानकर ही पढ़ी. लेकिन हमें दी गई सारी किताबें दूसरे लेखकों की थी, जिनमें हम स्वयं को किसी और के घर में खड़ा पाते थे, जहाँ हमें सावधानी से चलना है और कई लोगों की कही बातों पर अपने कान भी बंद करने हैं. मैंने आपको इसीलिए पत्र लिखा क्योंकि आपकी कहानियों में मैंने पहली बार अपनी जिन्दगी की घटनाओं की झलक पाई, हालाँकि उनकी पृष्ठभूमि और कथा-वस्तु काफ़ी भिन्न है. मुझे यह जानकर बड़ी तसल्ली हुई कि इतने सालों में कोई तो ऐसा मिला जो मेरी ही तरह सोचता और महसूस करता है.’’

    
वह उससे मुलाक़ात की इच्छुक थी. विली ने तुरन्त उसे कॉलेज आ जाने के लिए लिख डाला पर शीघ्र ही वह परेशान हो उठा, कहीं वह अपने ख़त जैसी खूबसूरत न हुई तो. वह उसके पुर्तगाली अफ्रीकी देश के बारे में कुछ नहीं जानता था और न ही उसके वंश, मूल अथवा वर्ग की उसे कोई जानकारी थी. उसने अपनी पृष्ठभूमि का संकेत भर किया था, ज्यादा कुछ नहीं बताया था. हो सकता है वह किसी संकर समुदाय की रही हो या फिर ऐसी ही किसी मिश्रित अवस्था की. काश, उसके पुस्तक पढ़ने के ढंग से ही उसके मनोभावों की कुछ जानकारी मिल पाती. विली को अपने पुराने दोस्त पर्सी की याद आई जो ऊपर से जितना छैल.छबीला और मज़ाक़िया दिखता था, अंदर से उतना ही परेशान रहता. अगर उसने गहराई से किताब के बारे में पूछ लिया तो वह शायद ही खुद पर काबू रख पाए, फिर तो वह आराम से समझ जाएगी कि जिन भारतीय कहानियों में वह अपने अफ्रीकी जीवन की झलकियाँ देख रही है वे पुरानी हॉलीवुड फ़िल्मों और रूस के मैक्सिम गोर्की के तीन नाटकों से उधार ली गई थीं. विली यह बिल्कुल नहीं चाहता था, उसकी इच्छा थी कि वह उसकी प्रशंसिका बनी रहे.
    
इससे उसे यह डर भी लगने लगा कि कहीं वह उसे पुस्तक का लेखक होने के बावजूद उतना बेहतर न पाए या मुलाक़ात के दौरान वह उतना सुंदर ही न दिखे.
    
लेकिन ज्यों ही वे मिले, उसकी सारी शंकाएँ हवा हो गईं, वह मानो उसी के वश हो गया था. लड़की ने भी ऐसा व्यवहार किया मानो वह उसे कभी से जानती और पसंद करती थी. वह छोटे क़द की लेकिन युवा और थोड़ी आकर्षक थी. उसके अंदाज़ में ग़ज़ब का संतुलन था. विली के लिए सबसे खास बात यह थी कि जीवन में पहली बार ऐसा कोई मिला था, जिसने उसे पूरी तरह स्वीकार किया था. घर पर उसे अपने मिश्रित माता.पिता द्वारा शासित किया जाता था, जिसने उसे बरबाद ही किया, यहाँ तक कि अपनी माँ के प्रति स्नेह, जो कि विशुद्ध होता है, माँ की परिस्थितियाँ जानने के बाद कष्टकर ही रहा. इंग्लैण्ड में वह अपनी भिन्नता का विचार लेकर गया था. शुरुआत में विभेद का यह भाव घर के नियमों और क्रूरताओं से आजादी पाने के लिए  था, पर बाद में उसे इसको हथियार बना लियाय स्वयं को और भी साधारण और अनगढ़ रूप में दर्शाकर. पहले जुने, फिर पर्दिता के साथ और कभी-कभार कॉलेज में कोई समस्या आने पर उसने इस हथियार का प्रयोग किया था. उसने इस अफ्रीकी बाला पर भी इसके प्रयोग करने का मन बना लिया था, पर इसकी ज़रूरत नहीं पड़ी. यहाँ करने को इतना कुछ था कि आपस में दूरी या बहानेबाजी करने का सवाल ही नहीं था. 

लगभग आधे घण्टे खूब बतियाने के बाद, अपनी नज़रों में भी खुद को परिपूर्ण समझने और मानने की नई भावना से विली आत्ममुग्ध हो उठा था. पता नहीं इसकी वजह किताब थी या एना की मिश्रित पृष्ठभूमि कि वह बिना किसी झिझक के विली की ओर मंत्रमुग्ध भाव से तकती रही. विली इसकी पड़ताल का इच्छुक भी नहीं था. एना के दाय को उसने पूरी मात्रा में लौटाया. वह उसे भाने लगी थी, कुछ ही हफ़्तों में वह उसकी चीज पर मरने लगा – उसकी आवाज़, उच्चारण, अंग्रेज़ी के ख़ास शब्दों के प्रति उसकी झिझक, उसकी खूबसूरत त्वचा, अधिकारपूर्वक पैसे ख़र्च करने की अदा. पैसों के प्रति ऐसा भाव उसने किसी और लड़की में नहीं पाया. पर्दिता पैसे देखकर अधीर हो उठती थी तो भारी कूल्हों वाली जुने लेन.देन होने तक अनजान बनी रहती, इसके बाद अपने बड़े-बड़े हाथों से छोटा सा पर्स खोलने का उपक्रम करती. एना पैसे की ओर से हमेशा तैयार मिलती थी. हालाँकि इस अधिकारपूर्ण आग्रह के पीछे उसका निराशा की स्थिति तक भावुक होना था, इसके लिए उसे सुरक्षात्मक आधार की ज़रूरत थी, इसलिए उसे प्यार करना सहज था. विली इतना नरम हो गया था मानो यह उसके स्वभाव का अंग ही था. जैसा कि पर्सी ने बताया था, उसने औरों के साथ कठोरता बरती थी, इसमें आक्रामक रुख अपनाने की जरूरत नहीं होती. सो एना के साथ उसे पूर्ण आनंद मिलने लगा था.
    
जब उन्होंने अपने कॉलेज वाले कमरे में पहली बार चुम्बन किया तो एना ने कहा- ‘‘तुम्हें अपने दाँतों की देखभाल करनी चाहिए. इनके कारण तुम भद्दे लगते हो.’’ वह मज़ाक़ में बोला- ‘‘एक रात मुझे सपना आया कि मेरे दाँत बहुत भारी हो गए हैं और नीचे गिरने वाले हैं.’‘ सच यह था कि जब से वह इंग्लैण्ड आया, उसने दाँतों के बारे में सोचना लगभग छोड़ दिया था. नॉटिंग हिल के दंगों, पर्सी के जाने और रिचर्ड द्वारा कैटलॉग में ग़लत.सलत पेश करने के बाद भी यह जारी रहा. अब तो अपने बदरंग बल्कि काले पड़ चुके दाँतों को लेकर उसे आनंद.सा मिलने लगा था. उसने एना को भी इस बारे में बताने की कोशिश की. ‘‘किसी दंत चिकित्सक को दिखा लो.’‘ वह बोली. आखि़र वह फुलहाम में एक ऑस्ट्रेलियाई दंत चिकित्सक के पास गया और कहने लगा – ‘‘मैं पहली बार किसी दंत चिकित्सक के यहाँ आया हूँ. मुझे दर्द भी नहीं होता. न मुझे आपसे बात करने में कोई कठिनाई हो रही. मैं तो यहाँ सिर्फ़ इसलिए आया हूँ, क्योंकि मैंने सपने में देखा कि मेरे दाँत गिरने वाले हैं.’’

डॉक्टर ने कहा- ‘‘हम इसके लिए भी तैयार हैं. यह ‘नेशनल हेल्थ’ में आता है. ज़रा मुझे देखने दो.’’ इसके बाद वह बोला- ‘‘तुम्हारे सपने का कोई गूढ़ अर्थ नहीं था. मुझे डर है कहीं आपके दाँत सचमुच न गिर जाएँ. तुमने चाय बहुत पी है, टार्टर जम गया है, दाँत बदरंग हो चले हैं. निचला मसूड़ा भी निकल रहा है, गंदगी की पूरी दीवार जम गई है. मैं पहली बार ऐसा हाल देख रहा हूँ. इस पर भी तुम्हारा जबड़ा खुला जाता था.’’ वह उठकर टार्टर को रगड़ने, छीलने और दबाने लगे. डॉक्टर के रुकने पर विली का मुँह खट्टा हो गया था, उसके दाँत हवा के प्रति संवेदनशील हो उठे थे. ऐसा लग रहा था मानो घर्षण से वे हिलने लगे थे.

उसने एना से कहा- ‘‘कॉलेज के लड़कों से मैंने लंदन में प्रेक्टिस करने वाले ऑस्ट्रेलियाई दंत चिकित्सकों को लेकर कई चुटकुले सुने हैं, लेकिन हमने यहाँ आकर ठीक ही किया.’’
    
विली ने एना से उसके देश के विषय में जानना चाहा, फिर अफ्रीका के पूर्वी तट को उसके पूरे सूनेपन के साथ महसूस किया. एना से बातचीत के दौरान ही विली को पता चला कि उसमें लोगों को पहचानने की ख़ास क्षमता हैय कौन अफ्ऱीकी है और कौन नहीं. ‘‘तो क्या इसने मुझे भी इसी तरह देखा कि मैं अफ्ऱीकी नहीं हूँ.’’ एक पल कौंधे विचार को उसने तुरन्त झटक दिया था.
    
एना अपने स्कूल की एक दोस्त के बारे में बताने लगी- ‘‘वह हमेशा से नन बनना चाहती थी. उसने इसके लिए कोशिश भी की. कुछ महीने पहले मैं उससे मिलने गई थी. वे एक तरह का जेल.जीवन गुजार रहें हैं. जिस तरह जेल में रहने वाले लोगों का बाहरी दुनिया से नाम मात्र का संपर्क रहता है. भोजन के समय कोई उन्हें अख़बार की कुछ चुनी हुई चीजें सुना देता है और वे बेहद साधारण चीज़ों पर भी स्कूल की लड़कियों की तरह खीसें निपोरते हैं. देखकर मुझे रोना आ गया. इतनी सुंदर लड़की किस तरह अपना जीवन बरबाद कर रही थी. मैं खुद को रोक नहीं पाई और पूछ बैठी कि उसने यह सब क्यों किया ? मैंने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया था. उसने बताया- ‘‘मेरे लिए करने को था ही क्या ? हमारे पास न पैसा है, ना ही कोई मर्द मुझे आकर कहीं ले जाने वाला था. मैं वहाँ घुलना नहीं चाहती थी.’’ मानो वह अब नहीं घुल रही थी.

विली- ‘‘मैं तुम्हारी दोस्त की हालत समझ गया. एक समय मैं भी पादरी बनना चाहता थाय एक मिशनरी. मैं पादरियों जैसा होना चाहता था. वे हमारे आस.पास के लोगों से काफी अच्छी स्थिति में थे. उस समय मुझे कुछ और नहीं सूझता था.’’ वह सोच रहा था कि अपने देश में एना की स्थिति भी ऐसी ही रही होगी जैसे अपने घर उसकी थी.
    
एक दिन सोफ़े पर बैठे हुए एना ने कहा- ‘‘मेरे पास तुम्हारी अगली किताब के लिए एक कहानी है. चाहो तो इसका उपयोग कर सकते हो. मेरी माँ की एक सहेली थी- लुइसा. उसके मूल की कोई जानकारी नहीं है. उसे एक बहुत बड़े जागीरदार परिवार ने गोद लिया था, इसलिए वह उसकी पैतृक सम्पत्ति की हिस्सेदार बन गई थी. लुइसा पुर्तगाल और यूरोप जाती रहती थी, वहाँ सालों तक ठाठ से रहती थी. एक दिन उसने घोषणा की कि उसे एक अच्छा साथी मिल गया है. उसके साथ वापस आने पर उन्होंने शहर में एक भव्य पार्टी रखी. उसी दौरान उसके साथी ने बताया कि यूरोप की लगभग सभी नामचीन हस्तियाँ उसकी दोस्त हैं. इसके बाद वे लुइसा के एस्टेट में रहने चले गए. लोग सोचते थे कि लुइसा के पति के नामचीन दोस्त आने पर फिर पार्टी होगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. लुइसा और उसका पति खा.पीकर मुटा गए थे, वे हमेशा पार्टी की ही बातें करते रहते. इसलिए लोगों ने उनके यहाँ जाना कम कर दिया. कुछ दिनों बाद उस आदमी ने अन्य अफ्रीकी औरतों के साथ भी सोना शुरू कर दिया था लेकिन जब अख़रने लगा तो उसने यह काम छोड़ दिया. इस तरह गोद ली हुई लुइसा और उसका आदमी अच्छा.बुरा जीवन जीते हुए अन्ततः मृत्यु को प्राप्त हुए. लुइसा का परिवार ख़त्म हो गया. आज कोई नहीं जानता कि लुइसा या उसका पति कौन थे! मेरी माँ अक्सर यह कहानी सुनाती थी.’’
    
\”एक और कहानी है, बोर्डिंग स्कूल की मैले-कुचैले कपड़ों वाली एक नाख़ुश लड़की की है. वह अपनी सौतेली माँ और पिताजी के साथ कहीं रहती थी. इसके बाद जब उसकी असली माँ ने पुनर्विवाह कर लिया तो वह उसके साथ रहने चली गई. लेकिन अब वह बदल गई थी. वह बहुत ज़िंदादिल, स्टाइलिश और आकर्षक लगने लगी थी. पर यह ज्यादा नहीं चल पाया. उसका सौतेला पिता उस पर बुरी नज़र रखने लगा था. एक दिन तो वह उसके बेडरूम में ही घुस गया. घर में ताण्डव मच गया था. आखिरकार पति-पत्नी के बीच तलाक हो गया.  
  


विली समझ गया था कि दूसरी कहानी में नाखुश दिखने वाली, बेहद डरी-डरी रहने वाली लड़की स्वयं एना ही थी. उसका दुर्बल और निराश-उदास होना इसी का परिचय था. इससे उसके प्रति विली की सहानुभूति और बढ़ गई. एक दिन क्यूबा से सरोजिनी का पत्र आया, उसमें एक फ़ोटो भी थी.


‘‘यह आदमी कहता है कि यह तुमको जानता है. यह ‘काटो’ नाम का पनामा का कोई लातिन अमेरिकी है. इसके परिवार का ज्यादातर समय ब्रिटिश उपनिवेशों में बीता है. इसके अनुसार पहले लोग मज़ाक़ के लिए अपने गुलामों को ग्रीक और रोमन नाम दे देते थे, उसके पूर्वजों को ‘काटो’ इसी तरह मिला. आजकल यह दक्षिण अमेरिका में ‘चे’ के साथ काम करता है. हो सकता है किसी दिन यह वापस जमैका जाकर भी काम पाने में कामयाब हो जाए. उसका मन वहीं है. तुम्हारे लिए उदाहरण है यह.’’
    
उस ब्लेक एण्ड ह्वाइट फ़ोटो में, जो ठीक नहीं खिंचा था, पर्सी एक छोटी दीवार पर बैठा था, उसके पैर नीचे लटके थे और उस पर सुबह या दोपहर की तिरछी रोशनी पड़ रही थी.
    
उसने एक धारीदार ऊनी टोपी एक सफ़ेद छोटा कोट और वैसी ही सफ़ेद एम्ब्राइडरी की क़मीज़ पहनी हुई थी. यानी वह हमेशा की तरह स्टाइलिश बना हुआ था. वह मुस्कुरा रहा था. विली को उसकी चमकती आँखों में ढेर सारे पर्सी- जमैका में, पनामा में, नॉटिंग हॉल, बोहेमियन पार्टियों और कॉलेज में नजर आ रहे थे.

‘‘आगे तुम्हारी क्या योजना है ? हमें यहाँ इंग्लैण्ड की ज्यादा ख़बर नहीं मिल पाती. कभी.कभार नस्लीय दंगों का पता चलता है. तुम्हारी किताब प्रकाशित हो गई ? तुमने हमें एक भी कॉपी नहीं भेजी, लगता है वह आई और चली गई. ख़ैर, अच्छा होगा अब तुम इन सबसे से उबर जाओ. अब भी समय है, अपने झूठे घमण्ड को झटक दो और गहराई से अपने भविष्य के बारे में सोचो.’’

विली चिन्तामग्न हो उठा- ‘‘वह ठीक कहती है, मैं खो गया था. मेरा समय ख़त्म होने को आ गया, मेरी छात्रवृत्ति भी समाप्त होने वाली है और मैंने अब तक कुछ नहीं सोचा. मैं मूर्ख इसे हमेशा बना रहने वाला स्वर्ग समझ बैठा था. डिप्लोमा पूरा होते ही मुझे कॉलेज से बाहर कर दिया जाएगा, फिर सब कुछ उलट जाएगा. मुझे रहने की जगह तलाशनी होगी, कोई काम खोजना होगा, तब यह लंदन ऐसा नहीं लगेगा. एना नॉटिंग हिल जैसी जगह स्थित कमरे में आना भी पसंद नहीं करेगी, मैं इससे भी हाथ धो बैठूँगा.’’

वह कई दिन इसी चिन्ता में डूबा रहा, फिर सोचने लगा- ‘‘मैं भी बेवकूफ़ हो गया हूँ. मुझे जाना कहाँ है, इसके लिए किसी की सलाह के इंतज़ार में बैठा हूँ. एक संकेत तो कभी से मेरे साथ है. मुझे एना के साथ उसके देश चले जाना चाहिए.’’
अगली बार जब वे मिले तो विली बोला-’’एना, मैं तुम्हारे साथ अफ्रीका चलना चाहता हूँ.’’
    
’‘छुट्टियाँ बिताने!’’    
’’हमेशा के लिए.’’

उसने कोई जवाब नहीं दिया. कोई हफ़्ते भर बाद विली ने पूछा- ‘याद है, मैंने तुमसे अफ्रीका जाने के बारे में पूछा था?’

वह मुरझा-सी गई. ‘’तुमने मेरी कहानियाँ पढ़ी हैं. मेरे लिए कहीं जाने को नहीं है, दूसरे, मैं तुम्हें खोना चाहता.’’ वह असमंजस में पड़ी थी. आगे विली ने कुछ नहीं कहा. जात.जाते वह बोली- 
’‘मुझे कुछ सोचने का समय दो.’’
अगली बार वह उसके कमरे में आई और सोफ़े पर बैठते हुए पूछा- ‘‘क्या तुम्हें अफ्रीका पसन्द आएगा ?’’

विली- ‘वहाँ मेरे करने लायक कोई काम होगा
?’’

‘‘देखते हैं, तुम्हें जंगली एरिया भाता है या नहीं. हमें एस्टेट के लिए एक आदमी की ज़रूरत है, पर तुम्हें वहाँ की भाषा सीखनी पड़ेगी.’’

    
कॉलेज के अंतिम हफ़्ते में कोलम्बिया से सरोजिनी का पत्र आया. ‘‘मुझे खुशी है, आखिर तुमने डिप्लोमा ले ही लिया. लेकिन मैं नहीं जानती तुम इसका क्या उपयोग करोगे, कहाँ जाओगे. अफ्रीका में करने को बहुत काम होंगे, ख़ासकर उन पुर्तगाली जगहों पर, लेकिन मुझे नहीं लगता तुम कर पाओगे. क्योंकि तुम भी अपने पिता जैसे हो, अन्त तक प्राचीन संस्कारों से चिपटे रहने वाले. उम्मीद करती हूँ, जो कुछ करोगे उस पर ठीक से सोच लिया होगा. विली, तुमने लड़की के बारे में क्या कुछ लिखा है, मुझे समझ में नहीं आया. बाहरी लेग जब भारत जाते हैं तो वहाँ के बारे में ज़्यादा समझ नहीं पाते. यही बात अफ्रीका पर भी लागू होती है. सो ध्यान रखना, तुम किसी अजनबी के हाथों पड़ने जा रहे हो. तुम सोचते हो जो कुछ करने जा रहे हो, उसके बारे में सब पता है, लेकिन तुम्हें कुछ.कुछ पता है, सब कुछ नहीं.’’

‘‘इस लड़की ने खुद तो अंतर्राष्ट्रीय विवाह कर लिया और मुझे सीख दे रही है.’ विली ने सोचा.
    
लेकिन हमेशा की तरह उसके शब्द ऐसे प्रवाहपूर्ण थे और गूँज रहे थे, मानो वह किसी अधेड़ आदमी की नक़ल कर रहा हो, जिनसे वह परेशान भी होता हो, पर साथ भी रहता हो. ये शब्द पैकिंग के समय, कॉलेज रूम से निकलने वक़्त, लंदन जीवन के केन्द्र से हटते हुए भी उसके दिमाग़ में गूँज रहे थे. इस दौरान वह यह भी सोच रहा था कि अगर कभी ज़रूरत पड़ी तो इस शहर में दुबारा क़दम कैसे रख पाएगा. भाग्य उसे फिर यहाँ ला सकता है, अगर घटनाओं की ऐसी ही कड़ियाँ फिर हों, लेकिन तब यह कोई अनजान शहर ही होगा.

विली और एना साउथम्पटन  से चल दिए. वह उस नई भाषा के बारे में सोच रहा था, जो उसे सीखनी थी. जब वह उसकी अपनी भाषा हो जाएगी तो कैसा लगेगा ? अगर वह अपनी अंग्रेज़ी, जो उसकी कहानियों की भाषा थी, भूल जाए तो क्या होगा? वह अपनी परीक्षा लेने लगा, एक जाँच खत्म होती वह तुरन्त दूसरी शुरू कर लेता. भूमध्यसागर पार होने के बाद लोग खा.पीकर जहाज़ पर गेम खेलने लगे थे, जबकि विली उसी में खोया था, मानो उसकी घरेलू भाषा जा चुकी थी. वह अंग्रेज़ी भूल गया था, यानी अब उसके पास अभिव्यक्ति का कोई सही उपकरण नहीं बचा था. उसने एना को इस बारे में कुछ नहीं बताया. इस दौरान उसने जो कुछ भी कहा, जैसे वह खुद की जाँच करने के लिए था कि अभी कितना और याद है. इस तरह की फालतू उधेड़बुन में पड़ा वह अपने केबिन में ही बना रहा.
    
एलैक्जेन्ड्रिया और स्वेज़ नहर अब उसके लिए कुछ नहीं थे. (अपने रास्ते के दोनों तरफ चमकती लाल रेत से उसे एक और खुशनुमा जिन्दगी याद आ गई- हाइडे पार्क में फूलों के बीच से लाठी के सहारे कृष्ण मेनन गुजर रहे हैं, उन्होंने डबल ब्रेस्ट वाला सूट पहन रखा है.वह सिर झुकाए मिस्र या स्वेज़ नहर पर अपने संयुक्त राष्ट्र के भाषण पर विचार करते हुए चले जा रहे हैं.)
    
तीन साल पूर्व, जब वह इंग्लैण्ड गया तो इसके उल्टी दिशा में यात्रा की थी. उसने क्या.क्या देखा, कुछ याद नहीं लेकिन अब उसे इतिहास और भूगोल का बेहतर ज्ञान था, थोड़ा.बहुत मिश्र की प्राचीन कला.शैली की भी समझ है. वह कुछ प्राकृतिक दृश्यों की याद करना चाह रहा था पर उसे अपनी भाषा गुम हो जाने के भय ने आ घेरा. उसकी ये हालत अफ्रीका के बंदरगाह; सूडान के तट से लेकर द्जिबॉटि (क्पेइवनजप), इसके बाद अफ्रीका के पश्च हॉर्न, मोम्बासा, दर.ए.सलाम, यहाँ तक कि एना के देश तक बनी रही. उसने यह सब इतनी सफाई और स्वाभाविकता से याद किया कि एना समेत किसी को अंदेशा तक नहीं हुआ. इस दौरान विली को लगा मानो उसके भीतर की सूनी जगह में कोई बैठा था, जिसने उसका सम्पूर्ण बाहरी जीवन दबा रखा था.
    
उसकी इच्छा हुई कि काश वह एना के देश किसी और तरीके से आता. शहर उसकी कल्पना से परे काफी बड़ा एवं खूबसूरत था. उसे देखकर अफ्रीका से जोड़ना मुश्किल लग रहा था. उसकी भव्यता हैरान करने वाली थी. वह यहाँ टिक पाएगा कि नहीं तय नहीं कर पाया. आस.पास दिखने वाले अजनबी लोग अपनी भाषा में बतियाते हुए गुज़ररहे थे. उसने तय किया, ‘‘मैं यहाँ नहीं रहूँगा, चला जाऊँगा. कुछ दिन यहाँ ठहरूंगा, तब तक जाने का कोई उपाय सूझ जाएगा.’’
    राजधानी में एना की एक दोस्त के घर पहुँचने पर भी वह यही सब सोचता रहा, बल्कि वहाँ से एस्टेट के लिए छोटे जहाज़ से की जाने वाली अगली यात्रा के दौरान भी उसके दिमाग़ में यही सब चलता रहा. यह यात्रा भी उसी रास्ते पर थी, जिधर से वह अभी आया था, लेकिन इस बार ज़मीन नजदीक थी. अब वह चौड़ी नदियों के शांत लेकिन कीचड़ और पानी मिश्रित काई के भँवर से बने डरावने दलदली मुखनद को निकट से देख रहा था. ये वे नदियाँ थी, जो उत्तर से जुड़ने वाले किसी भी रास्ते या सड़क को बाधित किए डालती थी.
    अंत में वे निचाई में स्थित कस्बे से गुजरे, यहाँ के मकान गेरूए, सलेटी और हल्के सफेद रंग से पुते थे. राजधानी की तरह यहाँ की गलियाँ सीधी थीं पर कोई विज्ञापन नजर नहीं आ रहा था. ना ही शहर जैसी कोई और छाप थी. केवल डामर की एक सड़क खुले इलाके से भीतर आ रही थी. यहाँ भी छोटे.छोटे और दुबले अफ्रीकी जंगलियों की तरह सड़क की दोनों तरफ घूम रहे थे, पर उनके लिए यह जंगलीपन नहीं था. थोड़ी सी दूर मक्का, कैसावा और दूसरी फसलें दिख रही थीं, वहीं अफ्रीकियों ने अपनी सुविधानुसार एक कतार झोपड़ियाँ में बनाई हुई थी, उनकी छतें इतनी लम्बी घास की बनी थी मानो सूरज को छू लेंगी. उनके रोंये सँवरे हुए थे. भूरी.भूरी पहाड़ियाँ काफी बड़ी और तिकोनापन लिए थी. कुछ इनसे भी विशालकाय थीं जिन्हें देखकर लगता था मानो वे अकस्मात् ज़मीन से निकल पड़ी थीं. सभी के सिरे विशेष आकार के और खास तरह का दृश्य निर्मित कर रहे थे. वे एक रेतीली सड़क पर आ गए थे. यहाँ झाड़ियाँ कार जितनी ऊँची हो गई थीं. गाँवों में सड़कों की अपेक्षा ज्यादा भीड़.भाड़ थी. सड़क वैसे तो सूख चली थी पर पहले की कीचड़ होने से शीशों पर उसके धब्बे लग गए थे. यह रास्ता भी छोड़ उन्होंने घर की ओर जाने वाली एक ऊँची सड़क ले ली. जो कहीं से सीधी तो कहीं टेढ़ी.मेढ़ी थी. जहाँ तहाँ वर्षा के कारण गड्ढे और नालियाँ बन गई थीं, पानी अपना रास्ता खुद बना लेता है. एना का घर बेतरतीब ढंग से फैले एक बगीचे के मध्य और बड़ी.बड़ी टहनियों वाले एक बरसाती पेड़ के नीचे बना था. बरामदे के तीन ओर बोगनविलिया की बेलें फैली थीं.
    
घर के भीतर की हवा गर्म और निस्तेज मालूम पड़ी. बेडरूम की जालीदार खिड़की में मरे हुए कीट फँसे दिख रहे थे, बगीचे में पपीते के बड़े.बड़े पेड़ लगे थे, ज़मीन पर काजू गिरे हुए थे तथा चट्टानों पर उगी घास दूर से हल्की पीली शृंखला.सी लग रही थी. विली सोच में पड़ा था- ’‘पता नहीं मैं हूँ कहाँ ? अब नहीं लगता मैं वापसी का रास्ता खोज भी पाऊँगा. मैं इस तरह पारिवारिक नहीं होना चाहता. मुझे यहाँ नहीं रूकना. मैं ऐसा बिल्कुल नहीं जताऊँगा कि मैं यहाँ रहने जा रहा हूँ.’’
    
लेकिन वह अठारह साल वहीं रहा .

एक दिन वह एस्टेट हाउस के सामने वाली सीढ़ियों से फिसलकर गिर पड़ा. इसे एना के गोरे दादाजी ने प्रथम विश्वयुद्ध यानी 1914 ई. के बाद बनवाया था. उनके बारे में कहते ह,ैं वह साल में एक बार पेरिस और लिस्बन जरूर जाया करते. अर्द्धचंद्राकार बनी सीढ़ियों का सफेद और भूरा संगमरमर वहीं से मँगवाया गया था. जो अब टूट.फूट गया था, उसमें काई लग गई थी. बरसात से एस्टेट हाउस की सीढ़ियाँ फिसलनदार हो चली थीं, उनमें बड़े छायादार पेड़ों के अंकुर फूटने लगे थे.
    
होश आने पर विली ने खुद को मिलिटरी अस्पताल में पाया. उसके आस.पास घायलावस्था में अश्वेत सिपाही पड़े थे लेकिन उनके चेहरे और आँखें दमक रही थीं.

जब एना उससे मिलने आई तो वह बोला- ‘‘मैं तुम्हें छोड़कर जा रहा हूँ.’
उसने कहा (यह आवाज उसे अभी तक आकर्षित करती थी)- ’‘तुम बुरी तरह गिरे थे. मुझे सीढ़ियों की सफाई करने वाली उस नई लड़की ने यह बताया. संगमरमर फिसलनदार होता ही है, ख़ासकर बरसात के दिनों में. इस जगह की तरह वह भी पागल हो जाता है.’’
 ’‘मैं तुम्हें छोड़ कर जा रहा हूँ.’’
’’तुम घायल हो विली! कुछ देर बेहोश भी रहे. लोग इसे बढ़ा.चढ़ाकर कह रहे हैं. जानते हो, अब कोई लड़ाई शुरू नहीं होने जा रही है.’’
’‘मैं लड़ाई के बारे में नहीं सोच रहा. सारी दुनिया ही फिसलनों से भरी है.’’
’‘मैं बाद में आती हूँ.’’     

उसके आने पर विली कहने लगा- ’‘तुम्हें क्या लगता है कोई मेरी चोटों और घावों की देखभाल करता रहे, हर समय मेरी ही चिंता में डूबा रहे. क्या यह संभव है ? मुझे अपना किया खुद भोगना चाहिए.’’
    
‘’तुम तेजी से ठीक हो रहे हो.’’    
‘’तुमने मेरे ऊपर अठारह साल गँवा दिए.’’    
‘’यानी तुम मुझसे ऊब गए हो.’’

’‘मेरा मतलब है, मैं तुम्हें अठारह साल सौंप चुका हूँ, अब और नहीं. अब मैं और अधिक तुम्हारा जीवन नहीं जी सकता. मैं खुद की ज़िन्दगी जीना चाहता हूँ.’’
’‘ठीक है विली, अगर तुम्हारी मर्जी यही है, लेकिन तुम जाओेगे कहाँ ?’’
‘’पता नहीं, पर अब मुझे तुम्हारे हिस्से का जीना ज़रूर छोड़ देना चाहिए.’’

उसके जाने के बाद विली ने वहाँ उपस्थित म्यूलेटो (श्वेत और अश्वेत माता-पिता की संतान.)  मैट्रन को बुलाया और धीमे-धीमे अंग्रेज़ी बोलकर सरोजिनी के लिए पत्र लिखवाया. सालों से वह परिस्थिति के अनुसार सरोजिनी के पते याद रखता आ रहा था- इनमें कोलम्बिया, जमैका, बोलीविया, पेरू, अर्जेन्टीना, जॉर्डन और आधा दर्जन दूसरे देशों के पते होते. हालाँकि वह जर्मन शब्दों को लेकर थोड़ा अनिश्चित था, फिर भी बेहद धीमे-धीमे उसने मेट्रन को पश्चिमी बर्लिन का पता लिखवा दिया. फिर उसे एना का दिया हुआ पाँच पाउण्ड का एक पुराना नोट थमाया. मेट्रन वह पत्र और नोट लेकर एक इंडियन व्यापारी के पास गई. शहर में ऐसे व्यापारी अब कम ही बचे थे. जब से यह पुर्तगालियों से छूटकर गुरिल्लाओं के कब्जे़ में आया, यहाँ की डाक व्यवस्था बिगड़ गई. लेकिन इस व्यापारी ने अफ्रीका के पूर्वी तटों तक से सम्बन्ध बनाए हुए थे, वह उत्तर से लेकर दर.ए.सलाम और मोम्बासा तक स्थानीय चीजें भिजवा देता था. इसके बाद पत्रों पर मुहर लगा कर उन्हें आगे भेजा जाता था.

टेढ़ा-मेढ़ा पता लिखा वह पत्र तुरन्त अफ्रीका भेज दिया गया, जहाँ उस पर बेढ़ंगेपन से स्टाम्प लगाई गई, फिर एक दिन लाल रंग वाली एक छोटी डाकगाड़ी आई, जिससे उसे चारलोटनबर्ग भेजा गया.
इसके कोई डेढ़ माह बाद विली स्वयं ही वहाँ जा पहुँचा था. पीली मिट्टी की पगडण्डियों और रास्तों पर बर्फ़ जमा थी, उसी पर कहीं कुत्ते की गंदगी पड़ी थी तो कहीं नमक.जैसा कुछ दिखाई दे रहा था.
   
सरोजिनी दो मंज़िल ऊपर एक बड़े किन्तु अंधियारे से फ्लैट में रहती थी. वूल्फ़ वहाँ नहीं था. इससे पहले विली उससे कभी नहीं मिला था और अब भी उसकी इच्छा नहीं था. उसके बारे में सुनकर विली को अच्छा ही लगा, उसे ज़्यादा छानबीन नहीं करनी पड़ी थी.
   
शायद सालों से इस फ्लैट की देखभाल नहीं की गई थी; उसे देख विली को एस्टेट हाउस की याद आ गई और उसका दिल बैठने लगा. सरोजिनी ने बताया- ‘युद्ध से पहले ही इसकी सार.संभाल छोड़ दी गई थी.’ अब तो इसका पेन्ट उधड़ने लगा था, प्लास्टर की चिप्पियाँ भी गिरना शुरू हो गई थी. जिससे इसके नीचे लगी लकड़ी चटकने लगी थी. एना का घर जहाँ उसके घरेलू फ़र्नीचर से अटा पड़ा था, वहीं सरोजिनी का घर आधा खाली दिखता था. कुछ ज़रूरी फ़र्नीचर ज़रूर दिख तथा वह भी सैकण्ड. हैण्ड और बिना किसी विशेष सावधानी के लिया हुआ लग रहा था. प्लेट, चाकू, चम्मच, कप भी सस्ते वाले दिख रहे थे, कुल मिलाकर सबकुछ कामचलाऊ था. विली को सरोजिनी का बनाया खाना खाने में बिल्कुल मज़ा नहीं आया क्योंकि रसोई में पीछे से मल.मूत्र आदि की बदबू आ रही थी.
   
उसने साड़ी, कार्डीगन और जुराबें पहनना छोड़ दिया था, फ़िलहाल वह जीन्स और एक भारी स्वेटर में थी. पहले के बजाय अब उसमें चपलता और गंभीरता दिख रही थी.
   
’’मैं इसे जैसी घर छोड़ कर आया था, यह अब वैसी नहीं रही. यदि जर्मन नहीं आया होता और इसे लेकर नहीं गया होता तो ऐसा कभी नहीं हो पाता. उसके बिना इसमें और इसकी आत्मा में कोई बदलाव संभव नहीं था.’’ अब वह आकर्षक लगने लगी थी, आश्रम में दिनों में ऐसा सोचना भी मुश्किल था. उसकी बातों और व्यवहार से विली को लग गया कि जब उसने इसे अंतिम बार देखा था, तब से अब तक उसके कई प्रेमी रह चुके थे. बर्लिन आने के कुछ ही दिनों में वह ख़ुद पर बहन का प्रभाव महसूस करने लगा था. अफ्रीका के बाद उसे यहाँ की कड़क ठंड भाने लगी थी. वह उसे घुमाने ले जाती, ख़तरनाक रास्तों पर कई बार वह लड़खड़ा भी जाता. कभी.कभार जब वे रेस्टोरेन्ट में होते तो कुछ तमिल लड़के लंबी टहनियों वाले गुलाब बेचते दिख जाते. उनके चेहरे कुम्हलाए होते, नज़रें झुकी रहतीं. उनका मिशन था- तमिल को युद्ध से बचाने के लिए अधिकाधिक फंड इकट्ठा करना. यद्यपि यह दूसरी पीढ़ी थी पर विली को उनमें अपनी झलक दीखती. वह सोचता- ‘‘लंदन में मैं भी ऐसे ही गया था, अब भी इसी तरह आया हूँ, पर मैं उतना अकेला नहीं, जितना सोच रहा हूँ.’’ फिर उसे लगा- ‘‘मैं ग़लत सोच रहा हूँ. मुझमें और इनमें फ़र्क़ है. कहाँ मैं इकतालीस साल का अधेड़ और कहाँ ये पन्द्रह.सोलह साल के किशोर. अब दुनिया बदल चुकी है. ये सबको बता देना चाहते हैं कि ये कौन हैं और इसके लिए ये हर रिस्क उठाने को तैयार हैं. मैं तो अपने से ही बचता रहा. कभी कोई जोखिम नहीं उठाया और अब मेरे जीवन का सबसे बेहतरीन हिस्सा बीत चुका है.’’
   
शाम के समय कई बार वे कुछ अफ्रीकनो को नीली बत्ती वाले टेलीफोन बूथों के नीचे बातचीत के बहाने खड़ा देखते, असल में वे उस जगह पनाह लिए रहते थे. सरोजिनी ने बताया कि जब पूर्वी जर्मन से इनको पूर्वी बर्लिन की तरफ खदेड़ दिया जाता है तो ये यहीं आते हैं.

विली का दिमाग़ चल रहा था- ‘‘कितने लोग यहाँ हम जैसे हैं! कितने ही मेरे जैसे! क्या हम सबको यहाँ शरण मिल पाती है ?’’

’‘मेरे दोस्त पर्सी काटो का क्या हुआ ? काफ़ी समय पहले तुमने उसके बारे में लिखा था!’’ 
विली ने पूछा.

‘‘वह चे और उसके साथियों के साथ काम कर रहा था. पता नहीं अचानक क्या खटका, उसने पनामा छोड़ दिया, उपमहाद्वीप को लेकर उसके विचार बहुत बचकाने थे. जब तक वह वापस लौटा सब बदल चुका था. तब से उसे स्पेनियों से बेहद घृणा हो गई. कहा जा सकता है वह ‘पॉल पॉट (पॉल पॉट: 1925 में जन्मा एक कंबोडियाई कम्युनिस्ट राजनेता. जो 1976-79 के बीच वहाँ का प्रधानमंत्री बना. इसके शासन काल में हजारों कंबोडिया निवासियों को बुर्जुआ घोषित कर मौत के घाट उतार दिया गया था.) की पोजीशन’  में आ गया था.’’

“यह पॉल पॉट की पोजीशन क्या है ?’’

“उसे लगता था स्पेनियों ने उपमहाद्वीपों को बहुत बुरे ढंग से रौंदा और लूटा था. जब तक सारे स्पेनी और उनसे सहानुभूति रखने वाले लोग मार न दिए जाएँ, वहाँ अच्छाई नहीं आ सकती. जब तक यह हो नहीं जाता, क्रांति की बात अपने आप में समय की बर्बादी है. यह अज़ीब किन्तु रोचक विचार है. कुछ समय बाद इसे स्वाधीनता आंदोलनों को अपनाना होगा. लातिन अमेरिका से आप निराश हो सकते हैं. पर्सी को अपने विचार सही ढंग से रखना नहीं आता था, वह भूल गया था कि वह स्पेनियों के बीच है. उसे थोड़ी कुशलता अपनानी चाहिए थी. पर उसने इस ओर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया. उन्होंने उसे बाहर कर दिया. पीछे से वे उसे ‘निग्रीटो’ ( दक्षिण-पूर्वी एशिया के बेहद काले और ठिगने कद के लोगों के लिए गाली के रूप में प्रयुक्त शब्द.) कहकर पुकारते. आखिर वह जमैका लौट गया. हुआ यह कि स्वाधीनता आंदोलन के लिए काम करने वाला पर्सी इसके बाद उत्तरी तट स्थित नाइट क्लब में पर्यटकों के लिए काम करने लगा था.’’ सरोजिनी ने बताया.

‘‘वह शराबी तो नहीं था. दिल से हमेशा काम में डूबा रहता था. अच्छों के साथ और बुरों के साथ बुरा.’’ विली ने बताया.



जिस तरह एक बार विली को उसके पिताजी ने अपनी आपबीती सुनाई थी, अब विली भी बर्लिन में सर्दियाँ गुजारते हुए, कभी कैफे, रेस्टोरेन्ट तो कभी सरोजिनी के आधे खाली घर में बैठकर उसे अफ्रीका में बिताई अपनी जिन्दगी की एक-एक कथा सुनाने लगा.

एना के एस्टेट-हाउस में मेरा पहला दिन बहुत लम्बा गुज़रा. घर की हर चीज- रंग.रोगन, लकड़ी, फ़र्नीचर, वहाँ की गंध सब मेरे लिए नई थीं. यहाँ तक की बाथरूम, उसकी पुराने ज़माने की फ़िटिंग, पुराना गीज़र तक मुझे नए प्रतीत हो रहे थे. कमरे की फ़िटिंग भी पुराने ढंग की थी. दीवार में जड़ी सफ़ेद टाइलें कई जगह से टूटने लगी थीं. जिनसे गर्द और सीमेन्ट निकलने के कारण वे बदरंग और खुरदरी लगने लगी थीं. वहाँ के और लोग तो इन सबके आदी हो चुके थे, उनके आराम में कोई खलल नहीं था. लेकिन मुझे ख़ासतौर पर वह कमरा अजनबी अहसास दे रहा था.
   
ख़ैर, किसी तरह दिन बिताया. एना समेत कोई मेरी मानसिक स्थिति का अनुमान नहीं कर सकता था. सबको लगता था इंग्लैण्ड छूटने के कारण मैं ऐसा हो गया था. रात में जेनरेटर चलाया गया. बिजली लगातार आ.जा रही थी. घर और बाहर के सारे बल्ब कभी चमक उठते, कभी मद्धिम पड़ जाते. यानी कमरा एक पल रोशनी से नहा उठता, दूसरे ही पल अंधेरा छा जाता. उस पहली रात मैं किसी प्रेमी की तरह बिजली का इंतज़ार करता रहा. दस बजे के लगभग बल्ब डिम हो गया और कम होते.होते आख़िरकार बुझ गया. बंद होते जेनरेटर की चीख सुनाई दे रही थी. झींगुरों की आवाजें कानों में घंटियों.सी लग रही थी. चारों ओर अंधेरा और सन्नाटा पसरा था. बस एस्टेट हाउस के पिछवाड़े दूर बने सर्वेन्ट.र्क्वाटरों से लालटेन की पीली रोशनियाँ आती दिखाई दे रही थीं.
   
मुझे घर में दिख रही हर चीज़ से एक दूरी महसूस हो रही थी- चाहे वह पुर्तगाल का औपनिवेशिक फर्नीचर हो, या बाथरूम की पुरानी फ़िटिंग. जब मैं सोने के लिए लेटा तो मेरे दिमाग में फिर से नोकदार चट्टानें, डामर की सड़कों पर घूमते अफ्रीकन फिर रहे थे.
   
मुझे एना को देखकर तसल्ली होती थी, मैं उसके बलबूते और अधिकार चेतना से प्रभावित था. सरोजिनी, तुमने नोट किया होगाय आज मैं जिस तरह तुमसे प्रभावित हूँ, उन दिनों मेरा झुकाव उसके प्रति था. उसने मुझे अपने साथ की इज़ाजत भी दे रखी था. मुझे उसके भाग्य पर भरोसा था. सच तो यह है कि वही एक ऐसी औरत थी, जिसने अपने आपको मुझे सौंप दिया. मुझे उसका सुरक्षात्मक रवैया और समय.समय पर दी जाने वाली सलाहों पर भी यक़ीन था, मैं जब तब उसके साथ रहता, मुझे किसी चीज़ का डर नहीं रहता. यह हमारी संस्कृति में ही है- पुरुष ऐसी औरतों की तलाश में रहते हैं, जिनकी ओर उनका झुकाव बना रहे. अगर आप अपनी सरकार, कानून, समाज अथवा इतिहास का अपने पक्ष में इस्तेमाल नहीं कर पाते तब या तो अपने भाग्य एवं सितारों पर विश्वास रखो अन्यथा मर जाओेगे. मुझे पता है, तुम्हें माँ के चाचा के दृढ़ संस्कार विरासत में मिले हैं, तुम्हारे विचार भिन्न हो सकते हैं, पर मैं ये बहस नहीं करूँगा. मैं केवल यह बताना चाह रहा हूँ, मैंने क्यों किसी का अनुसरण किया. मैं अफ्ऱीकी उपनिवेश के बारे में कुछ नहीं जानता था, सिवाय इसके कि वहाँ जटिल नस्लीय और सामाजिक समस्याएँ हैं. मैं एना से प्यार करता था और उसके भाग्य पर पूरा यक़ीन भी. प्रेम को लेकर तुम्हारे अपने क्या विचार हैं सरोजिनी, वे भी मैं बताऊँगा. एना मेरे लिए महत्त्वपूर्ण थी क्योंकि एक मुनष्य के नाते मैं उस पर निर्भर था. मेरा मतलब, तुम इसे प्यार कह सकती हो. इसीलिए मैं उसे जितना प्यार करता था, उतना ही उसके भाग्य पर भी भरोसा करता था. प्रेम के रूप में उसने मुझे जीवन का महानतम उपहार दिया. मैं उसके साथ कहीं भी जाने को स्वतन्त्र था.
   
मेरे वहाँ जाने के एक या दो हफ़्ते की बात है, एक दिन सुबह. सुबह कमरे में एक अफ्ऱीकन ‘मेड’ आई. इकहरी कद काठी की वह औरत एक झीनी-सी कॉटन की ड्रेस पहने थी. उसका चेहरा चमकीली आभा लिए था. उसने अपनापन दर्शाते हुए बनावटी लहजे में कहा- ’‘तो आप एना के लंदन वाले दोस्त हैं.’’ उसने अपनी झाड़़ू सामने पड़ी एक आर्मचेयर के सहारे टिका दी और कुर्सी पर बैठकर अपने हाथ कुर्सी के हत्थों पर ऐसे टिका लिए मानो वह कोई सिंहासन था. अब वह मुझसे बात करने लगी. वह ऐसे बोल रही थी जैसे कोई किताबी प्रश्न पूछा जा रहा हो- \”क्या आपकी यात्रा अच्छी  रही ?’’ ’‘क्या आप पहले यहाँ आ चुके थे ?’’ ‘‘इस देश के बारे में आपकी क्या राय  है ?’’ आदि.

पहले तो मैं उसकी भाषा समझने का प्रयास करता रहा, इसके बाद मैं भी उसी की तरह बात करने लगा. तभी एना भीतर आई- ‘अच्छा, तो तुम थी!’ उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, कुर्सी से तुरन्त उठी और झाडू़ लेकर चली गई.

‘’इसके पिताजी का नाम जूलियो है, वह बढ़ई है, बहुत पीता है.’’ एना ने बताया था.
   
मैं जूलियो से मिल चुका था. वह मिश्रित माता-पिता की संतान था और सर्वेन्ट क्वार्टर में रहता था, उसकी आँखें हमेशा मुस्कुराती हुई लगतीं. पीने को लेकर उसके बहुत किस्से मशहूर थे. पर उसे कोई परवाह नहीं थी. वह वीकेण्ड का पियक्कड़ था, शुक्र, शनि या रविवार को अक्सर लेट हो जाता. उसकी पत्नी अकेलेपन से घबराकर एस्टेट हाउस के पार्क में आ जाती और चहलकदमी करते हुए उसका इन्तज़ार करती. उसके कपड़े भी कंधों से सरक जाते. अंधेरा होने तक यही होता रहता, इसके बाद जेनरेटर चलाया जाता, जिसकी आवाज से सब कुछ थरथराने लगता. इससे माहौल और बिगड़ जाता. सुबह तक क्वार्टरों में पूरी तरह शांति हो जाती. तब तक शाम का सारा संताप घुल जाता था.
    
लेकिन जूलियो की लड़की इसे मज़ाक़ में नहीं लेती थी. एस्टेट के पिछवाड़े जो कुछ होता, वह सब बता देती. उसने बताया था- ‘‘पीने के बाद मेरे पिताजी माँ को मारते हैं, कई बार मुझे भी. कई बार तो झगड़ा इतना बढ़ जाता है नींद आना हराम हो जाता है. तब मैं कमरे में उठकर चहलकदमी करने लगती हूँ, जब तक पूरी थक न जाऊँ. कभी.कभी सारी रात इसी में बीत जाती है.’’ इसके बाद जब भी मैं सोने जाता, एकाध मिनट के लिए उस बेचारी ‘मेड’ की याद जरूर आती.
   
एक दिन उसने बातचीत के दौरान बताया- ‘‘हम रोजाना एक जैसा ही खाना खाते हैं.’ पता नहीं यह शिकायत थी या शेखी. या अपने अफ्ऱीकी तौर-तरीके विशेष बताने के लिए कही गई बात थी. शुरुआती दिनों में स्थानीय लोग मुझे अफ्ऱीकी लड़कियों के बारे में कई गूढ़ चीजें बताते थे. मुझे जूलियो की लड़की में अपना अक्स देख भय लगता था.’’
   
साथ ही आश्चर्य भी कि इतनी अच्छाई के बावजूद वह अपने को यहाँ इस जंगल से तालमेल कैसे बिठा पाती थी! हालाँकि इसे पूरी तरह जंगल नहीं कहना चाहिए. अगर आप उन रेतीली सड़कों पर अपनी गाड़ी से चल रहे हों तो हरेक तीस मिनट में एना जैसा या उससे कुछ कमतर एस्टेट हाउस आपको मिल जाएगा. फर्श थोड़ा उजला होता हो हो, बोगनविलिया सारे बरामदे में, बल्कि पीछे तक फैला मिलेगा.
   
रविवार को हम पास ही एना के एक पड़ोसी के यहाँ लंच पर गए. काफी बड़ा आयोजन था. घर के सामने ही रेतीले अहाते में कीचड़ सनी जीपें, लैण्ड रोवर और अन्य चौपहिया वाहन खड़े थे. नौकरों ने बंद गले की सफेद ड्रेस पहन रखी थी. ड्रिंक के बाद सब अपनी.अपनी रुचि के अनुसार बँट गए थे. कुछ वहाँ रखी बड़ी डाइनिंग टेबुल पर तो कुछ बरामदे में लगी छोटी मेंजों पर बैठे हुए थे. बोगनविलिया की पुरानी बेलें रोशनी में लटकी हुई काफी मनभावन लग रही थीं. मैं समझ नहीं पा रहा था कि मुझे लेकर वे लोग क्या सोच रहे थे, मुझे पसन्द भी कर रहे थे या नहीं ? एना ने इस विषय पर बात करना उचित नहीं समझा, मैं भी चुप ही रहा. बाद में पता चला कि मुझे लेकर उनमें कोई खास प्रतिक्रिया नहीं थी, जो आश्चर्यजनक था. मैं तो सोच रहा था कि मेरी पहचान एक ख़ास रूप में की जाएगी, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. वहाँ जो एस्टेट.मालिक आए थे, उनमें कुछ तो बात ही नहीं कर रहे थे. शायद जीवन में आया एकाकीपन इसका जिम्मेदार था. लंच भी उन्होंने चुपचाप ही किया. सारे दम्पत्तियाँ एक तरफ बैठे थे, अधेड़ दूसरी तरफ. सब ऐेसे चुपचाप खाए जा रहे थे, मानो अपने.अपने घरों मे बैठे हों. यहाँ तक कि वे अपने आस.पास भी नजर उठाकर नहीं देख रहे थे.   
   
खाने के बाद दो-तीन औरतों ने नौकरों को इशारे से बुलाया और कुछ बात कही. थोड़ी देर में उनके ले जाने के लिए कागज के थैलों में खाना पैक कर ले आया गया. वहाँ का यही रिवाज़ था, जैसे वे बहुत दूर से आए थे, पहुँचते.पहुँचते उन्हें फिर से भूख लग आएगी.
   
नस्लीय स्तर पर उनमें काफी विभिन्नताएँ दिख रही थीं. कोई एकदम सफेद था तो कोई गहरा काला. कुछ मेरे पिताजी जैसे रंग.रूप और स्वभाव के भी लग रहे थे. मुझे अपने में स्वीकार करने का शायद एक कारण यह भी था. बाद में एना ने बताया कि उन्हें समझ में नहीं आ रहा था तुम्हारे साथ कैसे व्यवहार करें ? चूँकि देश में और भी भारतीय थे, इसलिए मैं पूरी तरह बाहरी नहीं था. वहीं कुछ भारतीय व्यापारी भी थे जो सस्ती दुकानों पर दौड़ते रहते. सामाजिक रूप से वे कभी वे अपने परिवार से बाहर नहीं गए थे. उन्हीं में भारतीय मूल का एक गोवा.परिवार भी था, जो एक बेहद पुरानी पुर्तगाली कॉलोनी से आए थे. वे सिविल सेवा के माध्यम से क्लर्क और अकाउन्टेन्ट के रूप में अफ्रीका गए थे. उनकी पुर्तगीज ख़ास ढंग की थी. मैं उनसे भूलकर भी बात नहीं करता क्योंकि मेरी पुर्तगीज कमजोर और अंग्रेज़ी अनुतान लिए थी. लोगों ने मुझसे कुछ दूरी भी बनाए रखी. उनकी निगाहों में मैं एना का लंदन वाला दोस्त था. वह ’मेड’ भी यही कहती थी.
   
लंच के बाद एना ने मुझे उन लोगों के बारे में बताया- ’‘ये दोयम-दर्जे के पुर्तगाली हैं. ये सरकारी तौर पर स्वीकृत हैं, इसीलिए यहाँ के लोगों ने इन्हें अपनाया. ये इसलिए भी दोयम दर्ज़े के हैं क्योंकि इनमें से ज्यादातर के दादा.दादी मेरी तरह अफ्ऱीकन रहे हैं.
   
उन दिनों दोयम दर्ज़े का पुर्तगाली भी ऊँची हैसियत वाला होता था. जिस तरह ये लोग लंच के वक्त यहाँ सिर झुकाए खा रहे थे. अपने उपनिवेश में भी ये उसी तरह सर झुकाए रखते हैं और पैसे कमाते जाते हैं. बाद में ये स्थितियाँ बदल गईं लेकिन उस वक्त औपनिवशिक दुनिया को चलाने वाली शक्तियाँ सबको बड़ी मजबूत लग रही थी. यही वह दुनिया थी, जिसमें मैंने पहली बार अपनी सम्पूर्ण स्वीकृति की भावना महसूस की.
   


उन दिनों मैं एना के साथ प्रेम-विहार में मग्न था. मैं उसके दादा-दादी द्वारा निर्मित कमरे में उससे रति-क्रिया किया करता, जहाँ से बरसाती पेड़ की ख़ूबसूरत पत्तियाँ और लटकती टहनियाँ दिखाई देती थीं. अपने पौरुष को लेकर मुझे जो भय बना था, उसकी स्वतन्त्रता और सौभाग्य ने दूर कर दिया था. हालाँकि निजी क्षणों में भी उसके चेहरे पर गंभीरता बनी रहती.

   
उसकी कनपटियों पर बिखरी घुँघराली अलकें मुझे बहुत आकर्षित करती, यद्यपि उनमें मुझे उसकी अफ्ऱीकी आनुवांशिकता नजर आती थी. तभी एक दिन मुझे अहसास हुआ कि पिछले कई हफ़्तों से मैंने अपनी अभिव्यक्ति के उपहार-भाषा खो जाने के बारे में सोचना ही छोड़ दिया था.
   
एस्टेट में कपास, काजू और सीसल लगाए गए थे, फसलों के बारे में मेरी जानकारी नगण्य थी पर वहाँ मैनेज़र और ओवरसियर भी नियुक्त थे. जो एस्टेट हाउस से दस मिनट दूर उसी रेतीली सड़क के पास सफेदी किए हुए मकानों में रहते थे, उनकी छतों पर टीन डला हुआ था. मकानों के आगे छोटे-छोटे बरामदे बने थे. एना ने एस्टेट के लिए एक आदमी की जरूरत के बारे में कहा था लेकिन मैं बिना बताए ही समझ गया था कि मेरा काम इन लोगों के साथ एना की ऑथोरिटी की सुरक्षा करना था. मैंने इससे ज्यादा कभी कुछ नहीं किया, और मुझे ओवरसियरों ने स्वीकार भी कर लिया था. मैं जानता था इसके पीछे एना की ऑथोरिटी के प्रति उनका आदर था. हम सब मिलकर काम करने लगे. मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा भी.
   
अब मुझे इस जीवनशैली में आनंद आने लगा था जिसका मुझे कोई अनुभव नहीं था. पहले.पहल मुझे ओवरसियरों के बारे में सोचकर परेशानी होती थी कि उन्हें जीवन की विविधताओं का कुछ पता नहीं था. वे मिश्रित दम्पत्तियों की संतान थे और कंकरीट से बने इन्हीं मकानों में पैदा होकर यहीं बड़े हुए थे. इनका कंकरीट इन्हें अन्य अफ्रीकियों से अलग करता था. इनके द्वारा बनाए छप्पर साधारण होते हैं, कंकरीट तो हैसियत की खातिर लगाया जाता, लेकिन उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता था. वास्तव में ये ओवरसियर अफ्रीकनों के साथ ही रहते. और कोई रास्ता नहीं था. मैं अक्सर अपने को उनकी जगह रखते हुए सोचता कि मिश्रित पृष्ठभूमि के चलते क्या इन्हें भी कुछ अतिरिक्त चाहिए. वहीं तट पर एक शहर था, जहाँ एक भिन्न प्रकार के जीवन के दर्शन होते थे. किन्तु यहाँ दिन में एक घण्टे ज्यादा और रात में तो इससे भी ज्यादा काम किया जाता था. यह एक ऐसी जगह थी, जहाँ तुरत मौज-मस्ती की जा सकती थी. एस्टेट में काम करना वहीं रहने के बराबर था. सब जानते थे कि ज्यादातर ओवरसियर अफ्रीकन परिवारों वाले थे. भले ही वे दर्शाएँ कुछ भी, लेकिन कंकरीट के उन मकानों में वे अफ्रीकी जीवन ही जीते थे, जिसका हम सिर्फ अनुमान कर सकते हैं.
   
एक दिन मैं एक ओवरसियर के साथ कपास के नए खेत में जा रहा था, चलते.चलते ही मैंने उसके बारे में पूछा. हम लैण्ड.रोवर से जा रहे थे. रेतीली सड़क छोड़कर कीचड़ के बड़े.बड़े गड्ढों और रास्ते में गिरे पेड़ों से बचते.बचाते हम कच्चे रास्ते पर बढ़े जा रहे थे.
   
मैं सोच रहा था कि ओवरसियर से उसकी कुछ अधूरी इच्छाओं, कुछ ग़लतियों और दुनिया को सुधारने के कुछ बेचैनी भरे उपाय सुनने को मिलेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. बल्कि ओवरसियर स्वयं को भाग्यशालियों में गिना करता था. उसने एक बार पुर्तगाल में बसने की कोशिश की थी, इसके बाद वह दक्षिण अफ्रीका के और एक शहर भी गया.

’‘मैं कहीं और नहीं रह सकता.’’ लैण्ड रोवर के स्टेयरिंग पर हाथ मारते हुए उसने कहा था. जब मैंने पूछा तो कहने लगा- ’‘यहाँ, हम जो कर रहे हैं, पुर्तगाल में नहीं कर सकते.’’ लैण्ड रोवर जैसे चौपहिया वाहन चलाना मेरे लिया नया था. रोमांच में मैंने उसे झाड़ियों वाले चट्टानी रास्ते पर चढ़ा दिया. ओवरसियर को इस क्षेत्र की जीवन शैली का ज्यादा अनुभव था, सेक्स के बारे में वह कुछ अधिक जानकार लगा. आगे सफेद रंग के मगर फफूंदी लगे स्टाफ बंगले दिख रहे थे, मैंने उनकी ओर हसरत भरी नज़रों से देखा. इस प्रकार मैं धीरे.धीरे सीख रहा था. कपास, काजू और सन के बारे में ही नहीं वहाँ के लोगों के बारे में भी.
   
मैं शहर तक अक्सर सड़क द्वारा जाता था, रास्ते भर पहाड़ियों की विशालकाय चोटियाँ मिलतीं. अपने विशेष आकार के कारण प्रत्येक चोटी मेरे लिए एक निशान थी. तिकोने आकार की कुछ चट्टानें जमीन से सीधे उठी हुई लगती तो कईयों को रूप चट्टानी मलबे.जैसा दिखाई देता, जिस पर से चिप्पियाँ टूटती रहती. कुछ चट्टानें भूरी और नंगी दिखती, कुछ के किनारों पर पीले.पीले लाइकेन उग आए थे तथा कुछ पर हरियाली और एकाध पेड़ भी दिख जाता था. ये चट्टानें हर बार नई लगती थीं, इसलिए एक.दो हफ़्तों में एस्टेट से शहर की ओर जाना रोमांच से भरा होता. यही नहीं- औपनिवेशिक दुकानें, देहाती, छोटी.छोटी और अस्त-व्यस्त.सी उन दुकानों के आगे सामान ढोने के इंतजार में बैठे अफ्ऱीकन कुली, पक्की सड़कें, कार, ट्रक, गैराज, मिश्रित जनसंख्या, छावनी के लाल चेहरों वाले युवा पुर्तगाली रंगरूट जो यहाँ यूरोपीय अहसास करा रहे थे- सब कुछ एकाध घण्टों के लिए नया लगता था. छावनी अभी छोटी ही थी, बैरक भी ऐसे ही थे. ये दुमंजिले थे और सफेद और भूरे कंकरीट के बने थे. यह हिस्सा बाकी शहर से भिन्न था. कभी.कभार यहाँ कोई नया कैफे़ दिख जाता, लेकिन ऐसे कैफे ज्यादा नहीं टिक पाते थे. रंगरूटों के पास अधिक पैसे नहीं रहते थे. इस शहर के लोग प्राइवेट जीवन पसन्द करते थे. हम जिन दुकानों पर जाते, ज्यादातर पुर्तगालियों की होतीं, केवल एक.दो भारतीयों की रही होंगी. शुरू में मुझे उनमें जाने में बड़ी झिझक हुई, क्योंकि उन्हें देखकर मैं घर के हालात और दूसरी बेकार की चीजें याद नहीं करना चाहता था. पर ऐसा कुछ हुआ नहीं, उनमें नस्लीय पहचान को लेकर कोई उत्सुकता नहीं दिखी. बल्कि एना के देश में आए एक नए आदमी के रूप में उन्होंने मेरा स्वागत ही किया. मैं कोई ख़ास था, इसे जानने में उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं ली. वे तो सिर झुकाए काम में मग्न रहते. इस तरह मुझे और ओविरसियरों को भिन्न.भिन्न मामलों में एक किस्म की आजादी मिल गई थी. कभी.कभार हम वीकेण्ड में शहर से दूर स्थित‘बीच’  पर जाते, वहाँ छोटेमोटे रेस्तराँ में बैठकर ताजी मछली अथवा घोंघे खाए जाते और रेड एण्ड ह्वाइट पुर्तगीज शराब पी जाती.
   
मैं अक्सर अपने पहले दिन की हैरानी को लेकर सोचने लगता, तब रास्तों और उस पर टहलते अफ्रीकनों का दृश्य मेरे आगे घूम जाता और आश्चर्य होता कि भूमि का दोहन इस तरह भी किया जा सकता है. बेकार जमीन से अच्छी चीज़ें इस तरह निकाली गई हैं मानो पत्थर से ख़ून निचोड़ा गया हो.
   
साठसत्तर साल पहले यहाँ का दृश्य कुछ अलग ही रहा होगा जब एना के दादाजी यहाँ पहुँचे थे. ब्रिटेन तथा जर्मनी की बढ़ती आबादी और राजनीतिक अस्थिरता के चलते यहाँ की चिन्तित और कमजोर सरकार द्वारा अफ्रीकन कॉलोनियों पर दावा पाने के लिए जमीन का काफी बड़ा हिस्सा कब्जे में कर लिया था.
   
इस शहर का समुद्र के पास वाला किनारा अश्वेत अरबवासियों से पटा था. ये पिछली एक सदी से यहाँ बसे थे और अब ज्यादातर मिश्रित हो गए थे. भीतर की ओर आने वाले रास्ते भी बड़े रेतीले थे, सब कुछ दो मील दूर से घंटे भर में गाड़ी पर लाद कर आता था. आज जो सफर हम एक घण्टे में करते हैं तब दो दिन लग जाते थे. एस्टेट हाउस भी इन अफ्रीकन झोंपड़ियों से बहुत अलग नहीं लगता, अगर उसमें टिम्बर, टीन की छत, कब्ज़े आदि राजधानी से जहाज़ द्वारा और आगे गाड़ी से लादकर नहीं लगाए जाते. तब यहाँ न बिजली थी, न मच्छरदानी, पानी भी छत पर इकट्ठा हुई बरसात का प्रयोग किया जाता था. यहाँ केवल ज़मीन थी, जहाँ लोग मौसम और बीमारियों की मार झेलते, एक दूसरे के साथ महीनों और सालो से रहते आ रहे थे. आज तो उसकी कल्पना भी मुश्किल है.
   
जिस तरह आदमी कुछ और होना नहीं चाहता, कोई दिल और दिमाग के बिना अपने अस्तित्व के बारे में सोच भी नहीं सकता, उसी तरह उन दिनों के बारे में कोई नहीं जानता कि केवल जमीन के भरोसे कैसे रहा जाता था! हम जो कुछ जानते हैं, उसी का तो जायजा ले सकते हैं. एना के दादा और वे सभी लोग जिन्हें विली जानता था, उसी रूप में जाने जाते थे, जिस में वे थे. वे उसके साथ संतुष्ट भी थे.
   


तब यूरोप में प्रथम विश्व युद्ध (1914) हो रहा था. उसी दौरान एना के दादाजी के भाग्य ने पलटा खाया. देश के ज्यादातर लोग यहीं आ बसे थे. इससे राजधानी विकसित होने लगी, वहाँ ट्रामें चलने लगीं. अफ्ऱीकी और गोरे आपस में मिलने लगे, इससे सारा दृश्य ही बदल गया. एना के दादा अपनी आगामी संततियाँ यूरोपियन बनाना चाहते थे. इसलिए उन्होंने अपनी दो अर्द्ध.अफ्रीकी बेटियों को शिक्षा के लिए यूरोप भेजा. उनकी इच्छा थी कि वे पुर्तगालियों से विवाह करें. इसके बाद उन्होंने मार्बल से लाल रंग की फर्श और सफेद रंग की दीवारों वाला एस्टेट हाउस बनवाया, जिसके सामने और बगल में एक बड़ा.सा बाग था. उसके बरामदों युक्त गेस्ट रूम मुख्य बरामदे के पीछे तक चले गए थे. प्रत्येक गेस्ट रूम के साथ सटा हुआ बाथरूम बनवाया गया, जिसमें उस जमाने की अच्छी फिटिंग कराई गई. पीछे पर्याप्त संख्या में सर्वेन्ट क्वार्टर भी बनवाए गए. बढ़िया शाही फर्नीचर खरीदा गया, जो आज भी वहाँ लगा है. मैं और एना उन्हीं के बेडरूम में सोते थे, उनका बड़ा नक्काशीदार था. यदि किसी अर्द्ध.अफ्रीकी हो चुके आदमी की मानसिकता समझना मुश्किल काम है तो यह उसकी बाद वाली स्थिति के लिए ज्यादा सही है जबकि होना इसका उल्टा चाहिए.

   
मैंने एस्टेट हाउस में अपने को हमेशा अजनबी महसूस किया. मैं उसकी भव्यता का आनंद नहीं उठा सका, यहाँ तक कि मुझे उसका फ़र्नीचर भी अंत तक अजनबी और उबाऊ ही लगता रहा. अपने परिवेश के चलते ऐसी स्थितियाँ मुझे फींच डालतीं. मैं अफ्रीकियों को कभी नहीं भूल सकता. एना के दादाजी के अलावा प्राचीन संस्कारों वाले, डरावने लेकिन आकर्षक विदेशी मिशनों के पादरी और ननों के साथ अन्य सभी लोगों को भी मैं नहीं भूल सकता. इन लोगों की मान्यता थी कि अफ्ऱीकनों को उनकी इच्छा के अनुसार रहने दो, तभी नये रास्ते बनेंगे. मुझे उनकी इस जड़ता से आश्चर्य होता पर मैं कहने में हिचकिचाता. अभी भी अफ्ऱीकी कई मामलों में बेहद पारंपरिक और धार्मिक हैं, हालाँकि उन्होंने अपनी जमीनें चारों ओर से बाँट रखी थी और अपनी ज़रूरत के मुताबिक पौधे उगा लेते थे. ये लोग जब सड़क के दोनों ओर चलते तो एस्टेट श्रमिकों जैसे लगते थे. इनमें सामाजिक बन्धन इतने जटिल थे, जितने अपने घरों में हैं. वे बिना किसी पूर्व सूचना के एस्टेट के काम से छुट्टी कर लेते और आनुष्ठानिक यात्रा अथवा भेंट लेने निकल पड़ते. यात्रा के दौरान वे पानी तक नहीं पीते, बल्कि उसकी जरूरत भी महसूस नहीं करते. खाने.पीने के मामले में वे आज तक प्राचीन परम्पराओं का पालन करते हैं, वे सुबह और शाम के अलावा दिन में बिल्कुल पानी नहीं पीते. काम पर निकलने से पूर्व अलस्सुबह वे कुछ नहीं खाते. उनका पहला भोजन सुबह के कुछ बाद होता, जिसमें वे सिर्फ सब्जी लेते. वे अपना भोजन अपने तरीके से करते हैं, ख़ासकर वह, जिसे वे अपनी झोपड़ियों के आस.पास उगाते हैं. इसमें आमतौर पर सूखा कैसावा होता है; इसे पीसकर अथवा ऐसे ही खाया जाता है. यात्रा के दौरान दो-तीन पौधों से एक आदमी का पूरा दिन आराम से चल सकता है.
   
इन छोटेछोटे गाँवों में आपको लोग कैसावा बेचते नजर आ जायेंगे. ये एक बार में एक या दो बोरी रखे रहते और प्रत्येक सप्ताह अपनी आवश्यकताओं के अनुसार इन्हें बेचने आते. उन्हें देखने पर काफी अजीब.सा लगता- दो अलग.अलग दुनिया साथ.साथ नजर आतीं. एक ओर विशाल एस्टेटें और मार्बली इमारतें तथा दूसरी ओर समुद्र की तरह चहुँ ओर फैली अफ्रीकी दुनिया. यह कुछ भिन्न रूप में सही उसी तरह का जीवन है, जो मैंने घर पर देखा.
   
आश्चर्यजनक रूप से मैं यहाँ अपने को दूसरी तरफ पाता हूँ जब मैंने इस पर और अधिक विचारमनन किया तो मुझे लगा कि एना के दादाजी ने बिल्कुल नहीं चाहा होगा कि मेरे जैसा कोई आदमी उनके एस्टेट हाउस में रहने लगे, उनकी खूबसूरत कुर्सियों पर बैठे और उनकी पोती के साथ नक्काशीदार पलंग पर सोए. अपने परिवार और नाम के बारे में उनकी धारणा एकदम अलग थी. उन्होंने शिक्षा के लिए अपनी दो अर्द्ध.अफ्रीकन बेटियों को पुर्तगाल भेजा था ताकि वे ठेठ पुर्तगालियों से विवाह करें जिससे भावी संतति में अफ्ऱीकी आनुवांशिकता न रहे, बाहरी दुनिया के बारे में उनकी कमतर जानकारी और जमीन से पूर्ण जुड़ाव से चलते उनमें यह घर गया था.
   
उनकी लड़कियाँ सुंदर तो थी ही पैसेवाली भी थीं. उनके लिए पति ढूँढ़ना, वह भी विश्व युद्ध के दिनों में कोई ख़ास मुश्किल काम नहीं था.
उनमें से एक तो पुर्तगाल में बस गई जबकि दूसरी (एना की माँ) वापस अफ्रीका चली आई और अपने पति के साथ एस्टेट में रहने लगी. लंच, पार्टियाँ, यात्राएँ सब वहीं होती. एना के दादाजी अपने दामाद को ज्यादा पसंद नहीं करते थे, सो उन्होंने बेटी दामाद के लिए शाही फर्नीचर सहित अपना बेडरूम छोड़ दिया और घर के पीछे एक गेस्ट रूम में रहने चले गए. इसके बाद वे पास ही एक ओवरसियर के यहाँ रहने लगे. कुछ दिनों बाद एना का जन्म हुआ.
   
मैं अक़्सर जिस बेडरूम में सोया करता, एना के पिताजी उसके प्रति अजनबी की तरह रहते थे. वह निरुत्साही और अकर्मण्य होते चले गए. उन्हें एस्टेट की ड्यूटी थी नहीं, न ही कोई उन्हें जगाता. कई-कई दिनों तक वह कमरे में बिस्तर से नहीं उठते. ओवरसियरों, पड़ोसियों के मार्फ़त मुझे भी पता चल गया था कि पुर्तगाल में एना के पिता का वैवाहिक जीवन अफ्रीका के बजाय बेहतर होता. यहाँ तो वे हर समय कुढ़ते रहते. पिता को लेकर होने वाली बातें एना भी समझती थी. जब हमने उससे इस पर बातचीत की तो उसने बताया- 

’’यह सही तो है लेकिन पूरी तरह नहीं. जब वह पुर्तगाल में थे तो शायद इन सबसे अलग बल्कि पैसों से भी अलग होकर सोचते थे. ये सारी चीजें उन्हें एक नए देश में जाते समय मदद पहुँचाती. वह इस जंगल के लिए नहीं बने थे. वह कभी सक्रिय आदमी नहीं रहे. यहाँ आकर तो उनकी ऊर्जा खत्म सी हो गई थी. वे सब कुछ कमरे में ही करते पर मेरी माँ, दादाजी अथवा मुझ पर गुस्सा नहीं होते. हाँ, रहते अकर्मण्य ही. उन्हें छोटी-छोटी चीज़ों पर टोकना अच्छा नहीं लगता था. मुझे आज भी उनका दुःख और गुस्से से भरा हुआ चेहरा याद है. असल में उन्हें मदद की जरूरत थी. एक बच्चे के रूप में मुझे वह एक बीमार व्यक्ति और उनका बेडरूम बीमारों का कमरा लगता था. इसीलिए मेरा बचपन नाखुशी में बीता. बचपन में मैं अपने माँ.बाप के बारे में सोचती कि ये लोग बिल्कुल नहीं समझते कि मैं भी एक इन्सान हूँ, मेरी भी जरूरतें हैं. मैं कोई खिलौना नहीं, जिसे बनाकर छोड़ दिया जाए.’’

   
जल्द ही एना के मातापिता अलग.अलग रहने लगे. एना कॉन्वेंट में थी, इसलिए उसकी माँ उसकी देखभाल करने के लिए राजधानी में अपने पारिवारिक मकान में रहने लगी थी. कई सालों तक इस विलगाव की किसी को खबर नहीं लगी. औपनिवेशिक काल में यह होता रहता था- पत्नी तो बच्चों की शिक्षा के लिए राजधानी अथवा किसी तटीय इलाके में रहती और पति एस्टेट की देखभाल करते. लगातार ऐसे विलगावों के कारण पति प्रायः अफ्रीकी औरतों के साथ रहने लगते जिनसे उन्हें बच्चे तक पैदा हो जाते. लेकिन यहाँ इसके उलट हुआ- एना की माँ ने शहर के एक मिश्रित.जातीय सिविल सर्वेन्ट से सम्बन्ध जोड़ लिए. वह कस्टम में किसी उच्च पद पर था. उनका अफ़ेयर परवान चढ़ता गया, जिसकी खबर चारों ओर फैल गई थी. यह बात एना के बुजुर्ग दादा को बहुत बुरी लगी. उन्होंने उसकी माँ को काफ़ी भला.बुरा कहा. वह इसे अपने अफ्रीकी खून का ही असर मानते थे. उनकी यह धारणा मरने तक नहीं बदली, इसीलिए जो वसीयत एना की माँ को देनी चाहिए थी, उन्होंने उसे एना के नाम कर दिया.
   
एना उस समय इंग्लैण्ड के लैंग्वेज स्कूल में थी. वह कहती थी- ‘‘मैं पुर्तगाली भाषा का वर्चस्व तोड़ना चाहती हूँ. मेरे दादाजी इसी की वजह से एक दायरे में सिमट कर रह गए. उन्हें दुनिया का सही अंदाजा नहीं था. पुर्तगाल, पुर्तगाली भाषा, अफ्रीका, गोवा और ब्राजील के अलावा उन्हें कुछ पता नहीं था. मैं अफ्ऱीकन अंग्रेज़ी नहीं सीखना चाहती, जिसे यहाँ हर कोई सीखता है, मैं तो ब्रिटिश अंग्रेज़ी सीखना चाहती हूँ.’’
   
जब वह ऑक्सफोर्ड के लैंग्वेज स्कूल में थी तभी उसके पापा कहीं चले गए थे. उन्होंने एक दिन एस्टेट हाउस छोड़ दिया और फिर कभी नहीं लौटे. अपने साथ वह एस्टेट से अच्छा ख़ासा पैसा भी लेते गए. उन्होंने कुछ कानूनी दाँव.पेच लगाकर राजधानी स्थित पारिवारिक मकान सहित एना की आधी एस्टेट को गिरवी रख दिया.
   
एना उस पैसे को चुका सके, इसका सवाल ही नहीं था, इसलिए जो कुछ बैकों के यहाँ गिरवी था, उन्हीं में रह गया. ओवरसियर और दूसरे सारे लोग एना के पिता को लेकर संदेह करते थे, जो बीस साल बाद वह सच हो गया था. इसके बाद एना की माँ और उसके प्रेमी ने उसे एस्टेट में रहने के लिए बुला लिया. लैंग्वेज स्कूल के बाद वह उनके साथ चली गई थी. उनके दिन हँसीखुशी बीत रहे थे लेकिन एक रात वह कथित पिता; उसकी माँ का प्रेमी एना के बिस्तर में घुस आया.

मैंने लंदन में तुम्हें इस कपट के बारे में बताया था.’ उसने कहा था.
   
एना अब भी अपने (स्वयं के) पिता को चाहती थी. वह बताती थी कि ’’वह जो कुछ करते थे, उन्हें सब पता होता था, हो सकता है वह कभी से इस का प्लान बना रहे हों. क्योंकि उन्होंने जो किया उसके लिए एक बड़ी योजना की जरूरत पड़ती है. राजधानी जाजाकर वकीलों और बैंकों के चक्कर काटने पड़ते हैं. लेकिन वह वास्तव में बीमार रहते थे, इसीलिए असहाय और निस्तेज दिखते थे. इसमें कोई संदेह नहीं, वे मुझे बहुत प्यार करते थे.

तुमसे मुलाकात से पूर्व मैं उनसे मिलने पुर्तगाल गई थी. उनकी मृत्यु वहीं हुई. पहले उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में जमने का प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हुए. वह किसी विदेशी भाषा में सारा काम नहीं करना चाहते थे. वह ब्राज़ील जाते लेकिन बुरी तरह डरे हुए थे इसलिए पुर्तगाल जा पहुँचे. कोइम्ब्रा में वे एक छोटे लेकिन मॉडर्न फ़्लैट में रहते थे और अब तक रेहन से मिले पैसे पर ही जीवित थे. तुम कह सकते हो, उन्होंने पैसे का सही उपयोग नहीं किया. वह अभी भी अकेले ही थे, घर में किसी औरत का निशान तक नहीं. वहाँ सब कुछ खालीखाली और बिखरा हुआ था कि देखकर मेरा मन भारी हो आया. वह बहुत स्नेही है पर खास मौकों पर ही. एक बार उन्होंने मुझे बेडरूम में रखी मेज़ की दराज़ से अपनी दवा लाने को कहा. मैंने जाकर ड्रॉअर खोला, उसमें मेरा बचपन का एक पुराना कोडक 620 फ़ोटो पड़ा था. देखकर मैं चकित रह गई. मुझे यह भी उनकी योजना ही लगी थी. बाहर आने पर मैंने ऐसा व्यवहार किया मानो कुछ देखा ही न हो. दो में से अपने एक बेडरूम को वह स्टूडियो कहते थे. मुझे इससे हैरानी होती थी, इसका खुलासा तब हुआ जब मैंने घोड़ों, पक्षियों आदि की काँसे की आवक्षप्रतिमाएँ बनी देखीं. मुझे उनका यह काम अच्छा लगता था. ये प्रतिमाएं एक तरफ से हरे रंग की और खुरदरी होतीं, दूसरी तरफ से पॉलिश युक्त. उनके अनुसार एक वस्तु तैयार होने में दो से तीन महीने लगते थे. उन्होंने मुझे अपना बनाया एक बाज़ दिया था.
   
मैं उसे अपने बैग में रखती और बड़ा गर्व अनुभव करती. दोतीन हफ्ते तक मैं उनके कलाकार होने पर फूली रही. मुझे हर जगह काँसे के टुकड़े पड़े मिलते, जो उनका स्मृति चिह्नों, प्रतिमाओं आदि के लिए कच्चा माल था. जो भी हो, स्टूडियो में किया गया सारा काम उनकी अकर्मण्यता का ही हिस्सा था. इसी वजह से मुझे उनके कलाकार होने पर शर्म आती है. मेरे मन में कुछ सवाल थे, जिन्हें मैं उनसे पूछना चाहती थी, यह तुम्हारे मिलने से कुछ पूर्व की ही बात है. अब शायद तुम समझ गये होगे कि क्यों तुम्हारी कहानियाँ मुझे बोलती प्रतीत होती हैं. दुःखद लेकिन स्पष्टवादी और रहस्यमयी. इसीलिए मैंने तुमसे पत्रव्यवहार किया था.’’
   
कहानियों को लेकर उसका इतना स्पष्ट रुख कभी नहीं रहा था, इसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि मैंने उसे बहुत ज्यादा बता दिया था और शायद अब वह मेरे बारे में जान गई थी कि मैं कौन हूँ, क्या हूँ ? मेरे पास किताब की एक भी प्रति नहीं थी, मेरी इच्छा लंदन में ही सब छोड़कर जाने की थी. एना के पास अपनी प्रति जरूर थी, पर उसे भी देखने का मन नहीं होता था.
   
मैं अपने साथ थोड़ी सी स्टेशनरी लेकर गया था, जिसमे मिशन स्कूल में लिखी गई कहानियों की दो अभ्यासपुस्तिकाएँ और स्केच थे. कुछेक रोजर की सुंदर लेखनी से निकले पत्र थे, जिन्हें किन्हीं कारणों वश मैं फेंकना नहीं चाहता था. इनके अलावा अपना भारतीय पासपोर्ट और पाँच पाउण्ड के दो नोट भी मेरे साथ थे. मैं इसे दान का धन मानता था. कई बार मैं अपने को भिखारी की तरह पाता, इसलिए शुरू में ही लगने लगा था कि एक दिन यह जगह छोड़नी होगी. दस पाउण्ड ज्यादा नहीं चल सकते. लंदन में मेरे पास यही बचे थे. अपनी समझदारी या पूर्वजों के किसी संकेत की वजह से मैंने छोटी योजना ही बनाई थी ताकि एक शुरुआत भर कर सकूँ. इन दस पाउण्ड, पासपोर्ट और दूसरी चीज़ों को मैंने भूरे रंग से एक पुराने लिफाफे में डालकर बेडरूम में मेज की एक बड़ी.सी दराज के नीचे रख छोड़ा था.    
   
लेकिन एक दिन मुझे वह अपनी जगह नहीं मिला. मैंने सब लोगों से, एना से इस बारे में पूछताछ की लेकिन कोई सुराग नहीं मिला. पासपोर्ट की चोरी मेरे लिए सबसे कष्टदायक थी, क्योंकि बिना पासपोर्ट के मुझे अफ्रीका, इंग्लैण्ड या भारत, कहीं कोई पूछने वाला न था. एना ने कहा, मुझे दूसरे पासपोर्ट के लिए घर लिख देना चाहिए.
   
ब्यूरोक्रेसी के प्रति उसके विचार सुनकर मैं दुःखी हो उठता. अपने ऑफिसों का रवैया भी मैं अच्छी तरह जानता था, बल्कि वहीं बैठे उन्हें देख रहा था- सिर, कंधों और फर्श के पास से गंदली पड़ चुकी हरी-हरी दीवारें, रोकड़ियों के काउण्टर का खुरदरा फर्नीचर, धूल में अटी फर्श, पाजामे या लुंगी पहनकर पान चबाते बैठे हुए क्लर्क, जो आदमी पर नज़र डालते ही मानो उसकी जाति पहचान लेते हैं (यही तो उनका पहला काम था) मेजों पर जीर्णशीर्ण और उड़े हुए रंगों की फाइलें, जिनका कागज बारबार टूटता रहता है, मुझे सब दिखाई दे रहा था. मैं जानता था कि मैं यहाँ अफ्रीका मैं बैठा आँखें फाडे़ इंतजार करता रहूँगा लेकिन कहीं कुछ नहीं होगा. बिना पासपोर्ट ना कोई दावा किया जा सकता था और ना ही अपना प्रमाण किया जा सकता था. जितना ज्यादा मैं उस बारे में सोचता उतना ही अपने असुरक्षित होने का अहसास होता. कई दिनों तक मैं और कुछ भी नहीं सोच पाया. यह भी वैसी ही यंत्रणा थी, जैसी अफ्रीका के तट तक आते समय मैंने झेली थी- अपने भाषा रूपी उपहार के खो जाने की.
   
एक सुबह एना ने कहा- ‘मैंने एक ‘कुक’ से इस पर बात की थी . उसने हमें ओझा के पास जाने का सुझाव दिया. यहाँ से बीस.तीस मील दूर एक ओझा रहता है, वह आस.पास के सारे गाँवों में प्रसिद्ध है, मैंने कुक को उसे बुलाने के लिए कह दिया है.’
तुम्हें क्या लगता है, पासपोर्ट और वे पुराने पत्र कौन चुरा सकता है ?’’ मैंने पूछा था. ‘‘हम इसे यूँ नहीं जाने देंगे. हमें कोई नाम भी नहीं लेना. मुझे अपने अनुसार काम करने दो. हमें किसी के बारे में कुछ नहीं सोचना है, यह सब ओझा पर छोड़ दो. वह बेहद गंभीर और इज्जत वाला आदमी है.’’ एना बोली. अगले दिन उसने बताया कि ओझा अगले हफ्ते आने वाला है.
   
उसी दिन जूलियो बढ़ई को अपनी वर्कशॉप में वही भूरे रंग का लिफ़ाफ़ा मिल गया, जिसमें रोज़र का एक पत्र और मेरे स्कूल की कॉपियाँ थीं. लेकिन पासपोर्ट और दोनों नोट अभी तक खोए थे. सब जानते थे कि ओझा आने वाला है. हालांकि वह आया नहीं. इसके एक दिन पहले ही पासपोर्ट और पैसे एक छोटी दराज़ में पाए गए. एना ने कुक द्वारा ओझा को उसकी फीस भिजवाई, लेकिन उसने उसे लौटा दिया, क्योंकि वह आया ही नहीं था.

एना ने कहा- ‘‘तुम्हें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि अफ्रीकी लोग मुझसे और तुमसे नहीं एकदूसरे से डरते हैं. ओझा की पहुँच सब तक है, यानी नम्रता भी आदमी की एक ताकत है और इस रूप में वे हमसे बेहतर हैं.’’
   
पासपोर्ट मिलने पर मैं फिर सुरक्षित महसूस करने लगा था. मैंने और एना ने इस विषय पर ज्यादा बात नहीं की मानो हमारे बीच कोई समझौता था. ना ही कभी ओझा का जिक्र आया लेकिन मुझमें भीतर कुछ दरक गया था.
हमारे दोस्त आदि जिनसे हम वीकेण्ड में मुलाकात करते थे, सबके पास दो घण्टे के रास्ते के बीच अपने-अपने एस्टेट हाउस थे, उनमें ज्यादातर रेतीली सड़कों के किनारे ही पड़ते. जिनकी अपनी खासियत और खतरे थे, (कुछ सड़कें अफ्रीकी गाँवों से होकर भी गुजरती थीं.) लेकिन उन पर दो घण्टे से ज्यादा चलना कठिन था. गर्मियों में बारह घण्टे के दिन होते और जंगल का चलन था कि लोग घर के लिए चार बजे तक चल देते थे, अधिक से अधिक पाँच तक. हमें अक्सर वही लोग मिलते. मैं उन्हें एना के दोस्तों के रूप में लेता, अपना कभी नहीं मान पाया. क्योंकि एना ही थी, जो एस्टेट से पैतृक रूप से जुड़ी थी. उसके दोस्त भी अपने लिए यही मानते होंगे कि हम सब जमीन से जुड़े हुए हैं.
   
शुरुआत में मुझे वहाँ का जीवन वहाँ रोमांचक और समृद्धि भरा लगा. मुझे वहाँ के घर अच्छे लगे (उनमें बोगनविलिया या ऐसी कोई बेल लटकी दीखती) जिनके कमरे भीतर से ठण्डे और अंधेरे होते थे, वहाँ तेज़ रोशनी में डंकदार कीड़ों के आस पास मंडराने से आदमी परेशान भी हो उठता है. गार्डन रेतीला और झाड़-झंखाड़ से भरा था, उसमें जाने पर कहीं तो जलन का अहसास होने लगता, कहीं-कहीं डर-सा महसूस होता. इन शीतल और आरामदायक घरों को भीतरी वातावरण बहुत अच्छा था ऐसा लगता था मानो प्रकृति अपना बीमारियाँ फैलाने वाला रूप बदलकर सुख.समृद्धि लुटाने वाली बन गई थी. शुरुआती दिनों में यह एना के दादा और अन्य लोगों के लिए बहुत कष्टकर रही होगी.   
   
मैं शुरुआत में सुरक्षित और ऐश्वर्य युक्त जीवन चाहता था, इसके परे मैं अपनी कल्पना भी नहीं करता था, नए लोगों से मिलने में मुझे बहुत हिचक होती थी. मैं किसी के भी संदेह के दायरे में नहीं आना चाहता था. एना के आगे तो ऐसे सवाल नहीं पूछे गए, लोगों ने शायद अपनी सोच अपने तक ही रखी, क्योंकि उनके बीच एना भी एक ऑथोरिटी थी.
   
मैं निराश हो चला था. एकाध साल बाद मेरी समझ में आने लगा कि मैं जहाँ हूँ वह तो एक मिश्रित दुनिया है, यहाँ के बहुत सारे लोग जिन्हें हम दोस्त समझ रहे हैं, वे पूरी तरह पुर्तगीज नहीं, दोयम दर्ज़े के हैं. पर उनकी आकांक्षाएँ वहीं से जुड़ती थीं.
   
इन मिश्रित दोस्तों के साथ ऐसा लगता मानो समुद्र तट पर कोई शहर. जहाँ शुरुआती एकाध घण्टा ड्राइव करना बड़ा रोमांचक होता पर इसके बाद ऊब होने लगती. इसी तरह रविवार के लंच के लिए किसी एस्टेट हाउस की यात्रा भी काफी अच्छी लगती पर कुछ देर बाद वह भी फीका लगने लगता. प्रायः लोग एक-दूसरे से खूब बात कर चुके होते पर अन्ततः सब खत्म हो जाता. लेकिन हम साथ खाने-पीने का खूब आनंद लेते. लगभग तीन बजे जब सूरज अपने पारे पर होता तब हम चौपहिया वाहनों से घर के लिए निकलते.
   
एस्टेट के ये सभी दोस्त और पड़ोसी ज़मीन से जुड़े थे और चीज़ों को व्यापक स्तर पर लेते थे, वे स्वयं को बड़ी तहजीब से पेश करते. यह विशेषता सबमें पाई जाती थी. कभी.कभी वे हमारे स्कूल में खेले गए किसी नाटक के पात्रों की तरह लगते, तब मानो प्रत्येक पात्र के कुछ अंक निर्धारित हो जाते.
   
जैसे कोरियाज (वहाँ के अभिजात लोगों का एक कुल-नाम.)  अपने अभिजात नामों पर बहुत घमण्ड करते थे. वे हमेशा पैसों की मनोग्रन्थि से आक्रान्त रहते. हर वक्त पैसों की बात करते रहते. उन्हें लगता कि घोर आपदा आने वाली है. उन्हें इसका पता नहीं था कि संकट कब आयेगा या वह किस रूप में होगा- वह क्षेत्र विशेष में आयेगा कि विश्वस्तरीय. वे अपनी सुरक्षा अफ्रीका या पुर्तगाल से परे रहने में समझते. इसीलिए उन्होंने अपने बैंक खाते लंदन, न्यूयॉर्क अथवा स्विटजरलैण्ड में खुलवा रखे थे. उन्हें लगता, बुरा वक्त आने पर कहीं न कही से बचा हुआ पैसा मिल ही जाएगा.
   
इन खातों के बारे में उन्होंने सबको बता रखा था. कभी-कभार वे सीधे-साधे लगते तो कभी उत्तेजना से भरे हुए. असल में वे अपनी साथियों में संकट आने की सूचना फेलाकर जंगल में एक तरह का भय फैलाना चाहते थे, ताकि वे महसूस कर सके कि बैंक खाते रखने की दूरदर्शिता उन्होंने ही रखी, वे ही सचेत थे और कोई भी नहीं.
   
रिकार्डो एक बड़ा और फौजी-सा लगने वाला आदमी था, उसने अपने बाल मिलिटरी स्टाइल में कटवा रखे थे. उसे मेरे साथ अंग्रेजी बोलना अच्छा लगता था पर उसका उच्चारण खासा दक्षिण अफ़्रीकी  टोन लिए था. आजकल वह बड़े दुख में था. वह अपनी बिटिया को गायक बनाना चाहता था. कॉलोनी में जो भी कोई उसे सुनता, मुग्ध हो जाता, सबको उसके यूरोप में स्टार बनने की उम्मीद थी. रिकार्डो के पास ज्यादा पैसा नहीं था, इसलिए उसने अपनी कुछ ज़मीन बेचकर उसे ट्रेनिंग के लिए लिस्बन भेज दिया. वहाँ जाकर वह अंगोला (उपमहाद्वीप के दूसरी तरफ एक पुर्तगाली उपमहाद्वीप) के एक अफ्ऱीकी के साथ रहने लगी. बस, तब से लड़की का गाना और परिवार से उसका रिश्ता ही खत्म नहीं हुआ, रिकार्डो की सारी उम्मीदें और गर्व के भी टुकड़े हो गए. कहतें हैं रिकार्डों ने उस पर गायक बनने का बहुत दबाव डाल रखा था, इसलिए उसने अफ्रीकी से मुलाकात से पहले ही गाना छोड़ दिया था. एक दिन रविवार को लंच के दौरान हमारे मेजबान ने उसकी लड़की का रिकॉर्ड बजा दिया. यह रिकार्डो के घाव हरे करने के लिए नहीं बल्कि उसका और लड़की का सम्मान करते हुए रिकार्डो के दुख कम करने के लिए किया गया था, मैं और एना इसे जानते थे. मेज़बान को कुछ देर पहले ही घर में यह रिकॉर्ड मिला था, वह इसे रखकर भूले हुए थे. गर्मी भरे इस दिन में हमने उस लड़की की का गाना इतालवी और जर्मन में सुना था. यद्यपि मैं गाने के बारे में कुछ नहीं जानता था पर मुझे लगा कि वह बहुत प्रतिभावान थी. पूरे गाने के दौरान रिकार्डो ने कोई हंगामा नहीं किया, बस चुपचाप ज़मीन की ओर देखकर कभी रोने लगता तो कभी हँसने.
   

नोरोन्हा तो पूरा कुलीन था, पूरा पुर्तगाली. वह इकहरा और ठिगना-सा था. लोग जन्म से उसे ऐसे ही देखते आए थे. इसमें कितनी सच्चाई थी पता नहीं, मिसेज़ नोरोन्हा थोड़ी-बहुत विकृत या अक्षम हो गई थी- हालाँकि मैंने इस बारे में न कभी उससे पूछा, ना कहीं सुना. वह हमारे बीच व्हील चेयर पर आई थी, जिसे उसका पति धक्का दे रहा था. हमारी मिश्रित दुनिया में उन्होंने बड़े भद्र ढंग से दस्तक दी थी. वे देश, अपने तथा हमारे स्तर के बारे में काफ़ी जानते थे. उनकी अक्षमता या मिजाज में बदलाव ही उन्हें नियमों से हटने को प्रेरित करता. वैसे वे हमारे बीच मिसेज नोरोन्हा की एक ‘ख़ासियत’ की वजह से आए थे. वह थोड़ी ‘रहस्यमयी’ थी. उसका पति (मैन ऑफ बर्थ) अपनी पत्नी की इस विशेषता पर गर्व करता था. जब रविवार को लंच के लिए उन्होंने एस्टेट हाउस में ह्वील चेयर के साथ प्रवेश किया तो पति का चेहरा कुछ खिंचा.खिंचा दिख रहा था. मुझे एना समेत किसी ने सीधे यह नहीं बताया, कि मिसेज नोरान्हा में ही वह खासियत थी. इसलिए शुरू में मैं कुछ नहीं समझ पाया था. इसके लिए कुछ कहना पड़ता था, जैसे कोई पूछे- ’‘मैं लिस्बन जाना चाहता हूँ.’’ तब मिसेज नोरान्हा अपनी चेयर पर सीधी होकर धीरे.धीरे बोलने लगेगी- ’‘यह सही समय नहीं है, सितम्बर ठीक रहेगा.’’ फिर वह चुप हो जाएगी, कोई सफ़ाई नहीं देगी, और जाने वाला मार्च में लिस्बन नहीं जाएगा. इसकी जाँच के लिए मैं अगर उनकी उपेक्षा करते हुए कह दूँ कि ’‘वैसे मार्च में लिस्बन बहुत ख़ूबसूरत हो जाता है.’’ तब मिस्टर नोरोन्हा पनीली आँखें लिए घृणा का भाव दर्शाते हुए कहने लगेंगे- ’‘इनके यह कहने के पीछे कई कारण हैं कि वह समय ठीक नहीं.’’ उस समय उनकी पत्नी सपाट चेहरा लिए कहीं दूर झाँकती रहती है. शायद मिसेज नोरोन्हा की अक्षमता और उनके पति (मैन ऑफ बर्थ) की स्थितियों ने उसे एक तरह की तानाशाह बना दिया था, वह कुछ भी कह देती. दुःख और खुशी दोनों समय वह एक जैसी लगती थी. इसीलिए कोई उससे कुछ पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था. मिसेज नोरोन्हा के शरीर में समय.समय पर दर्द की लहरें उठती थीं. लेकिन विश्वास नहीं होता, वह और उसका पति जैसे ही अपने घर पहुँचते, वह एकदम ठीक हो जाती और चेयर से उठ खड़ी होती. उसकी सलाहें पूरी तरह रहस्यमयी लेकिन विशिष्ट होतीं. एस्टेट में उनकी जाँच होती रहती थी, जिसे थोड़ी आशंका होती वही उन्हें तोड़ पाता था.
   
एना और मेरी एक हैसियत थी, पर हमने उसे परखा नहीं था. लेकिन कोरियाज, रिकार्डो और नोरोन्हा को देखकर हम भी औरों की तरह चकित और अपमानित महसूस करते थे.
एस्टेट जीवन की यह शैली 1920 के आस-पास विश्वयुद्ध के ख़त्म होने के बाद शुरू हुई होगी. द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यह अच्छी तरह स्थापित हो चुकी होगी. इसलिए तुलनात्मक रूप से यह नई थी; जो न सिर्फ़ आदमी की वयस्कता में बल्कि जीवन भर भी बनी रह सकती थी.
   
यह ज़्यादा लम्बी चलने वाली नहीं थी; मुझे हैरानी थी कि मेरे समूह में कोरियाज को ही नहीं किसी को भी कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला, जिसे हम अर्थ दे पाते. कि हमारी जो सभ्यता है वह अफ्रीका में एक दिन ऐसी कहलाएगी. यद्यपि मैं नहीं सोचता कि कोई अंदाज भी लगा पाया होगा कि कंकरीट की यह मजबूत दुनिया भूसे की तरह कमजोर होती जा रही है.
   
कई बार हम वीकेंड पर रविवार के लंच के लिए रेस्टोरेन्ट में जाते. वहाँ हमें ताजा समुद्री भोजन परोसा जाता, जिसे हम आराम से खाते, अब यह उतना बुरा नहीं लगता था. एक दिन हमने पाया कि रेस्टोरेन्ट की पूरी फर्श पर नीली-पीली टाइलें बिछाई जा रही हैं, जो काफी आकर्षित करती हैं. इन्हें बिछाने वाला व्यक्ति एक वर्णसंकर था, उसकी बड़ी.बड़ी आँखें भूरे रंग की थी. उसका पुर्तगाली मालिक किसी कारणवश, शायद समय पर काम पूरा नहीं कर पाने के कारण उसे डाँट रहा था. ग्राहकों के साथ वह अच्छे ढंग से पेश आता था लेकिन इस समय वह टाइल बिछाने वाले पर उखड़ा हुआ था. जैसे ही वह चिल्लाता, टाइल वाला अपना सर ऐसे झुका लेता मानो तेज़ हवा का झोंका आया हो. उसे इतने पसीने आ रहे थे जैसे उसे बहुत गर्मी लग रही थी. लेकिन वह फास्ट-ड्राइंग मोटर से उस पर सीमेंट की परत सुखाने में लगा था. इसके बाद एक-एक पुर्तगीज टाइल अपने स्थान पर जमाई जाती. अपने सफेद-भूरे माथे पर बार-बार आ रहे पसीने को वह आँसुओं की तरह पोंछ रहा था. वह जाँघों पर से कसा हुआ एक निक्कर पहने था. उसकी जाँघ एवं चेहरे से घुंघराले बाल नजर आ रहे थे और गहरी शेविंग के कारण चेहरे पर एकाध जगह ब्लेड से कटने के निशान भी उभरे दिख रहे थे. वह मालिक की चिल्लाहट का कोई जवाब नहीं दे रहा था, चुपचाप अपने काम में लगा था, यद्यपि चाहता तो उसे मारकर गिरा सकता था. बाद में जब मैं और एना इस पर बात कर रहे थे तो उसने कहा- यह टाइल बिछाने वाला जरूर संकर संतान है. जरूर इसकी माँ अफ्रीकन और बाप पुर्तगाल का बड़ा भूस्वामी रहा होगा. रेस्टोरेन्ट मालिक को इसकी जानकारी होगी. अमीर पुर्तगाली अपनी जारज संतानों को इलेक्ट्रीशियन, मैकेनिक, मैटल वर्कर, बढ़ई, टाइल बिछाने वाला आदि कुछ खास काम सीखने के लिए छोड़ दिया करते थे. वैसे वहाँ अधिकांश टाइल बिछाने वाले पुर्तगाल के उत्तरी क्षेत्र से आए थे.
   
मैंने एना से इस पर और कुछ नहीं कहा लेकिन जब भी मुझे उसका पसीने से तरबतर और जन्म से ही अपमान का भाव लिए भूरी आँखों वाला चेहरा याद आता, मैं अक्सर सोचता- ’‘ऐसे लोगों को कौन बचाएगा ? कौन लेगा उनका बदला ?’’
   
काफ़ी देर तक यह चित्र मुझे मथता रहता. हालाँकि यह मेरी आजादी पर निर्भर था कि मैं किस पर सोचूँ, किस पर नहीं. जब मेरे वहाँ जाने के तीसरे वर्ष महाद्वीप के दूसरी ओर की वारदातों की खबरें अखबारों में आने लगी तब मैं उनके लिए स्वयं को पूरी तरह तैयार नहीं कर पाया था.
   
ये खबरें इतनी बड़ी थीं कि उन्हें दबाया नहीं जा सकता था. शुरू में तो अधिकारियों ने शांति बनाए रखने का प्रयास किया होगा लेकिन बाद में वे भी चुप हो गए, मनमानी होने दी. देश के एक हिस्से में दंगा भड़क गया था, जिसमें शहर के बाहर पुर्तगालियों का जमकर नरसंहार किया गया. कोई दो-तीन सौ बल्कि चार सौ के लगभग लोगों को छुरों से काट डाला गया.
   
मैं अपनी और अपने जैसे अफ्रीकनों के बारे में सोचने लगा था, (हालाँकि यह गलत था) उनके गाँव, झोपड़ियाँ, कसावा और मक्के के खेत, काजू और सीसल, पशुओं के बाड़े, अभी-अभी साफ किए गए जंगल, जो पशुओं को जहरीले कीड़ों से बचाने के लिए काटे या जला दिए गए थे. कई तरह के तर्क और क्रम मेरे दिमाग में चल रहे थे, लेकिन पहले दिन जो तस्वीर मेरे मन में थी, उसमें सड़क किनारे चलने वाले आम लोग स्वप्न तक में भयभीत हुए दिख रहे थे. वे मानो मुझसे कह रहे थे कि मैं जहाँ से आया हूँ, वह अब बहुत दूर रह गया है. मुझे यह भविष्यवाणी-सी  प्रतीत होती. 
   
हमारे आस-पास के अफ्रीकन इससे बेखबर लग रहे थे, उनके रहन-सहन में कोई बदलाव नजर नहीं आया, उस दिन ही नहीं, उससे अगले दिन भी बल्कि उससे अगले हफ़्ते और महीने भर भी उनमें कोई फर्क नहीं देखा गया. बैंक खातेधारी कोरिया कहता था कि इतना सीधापन भी अच्छा नहीं होता. कुछ जैक्वारी (श्रंबुनमतपम) इसकी भयानक तैयारी भी कर रहे थे. लेकिन हममें यह सीधापन पूरे साल भर बना रहा, मानो हम इसे झेल रहे थे. बेडरूम में बंदूकें, डंडे आदि लेकर बैठने की हमारी तैयारियाँ बेकार ही रहीं क्योंकि यहाँ कुछ नहीं हुआ. क्वार्टरों में तो यह तड़प कुछ ज्यादा ही रही थी.
   
बंदूक चलानी मैंने तभी सीखी थी. यह भी सुझाव दिया गया कि हमें शहर की पुलिस शूटिंग रेंज से कुछ जरूरी सीख ले लेनी चाहिए. छावनी की सेना के पास यह व्यवस्था नहीं थी, इसलिए वह लड़ाई के लिए बेकार थी. हमारे पड़ोसी बड़े उत्तेजित थे लेकिन पुलिस रेंज में नहीं जाना चाहते थे. वास्तव में मैंने कभी बंदूक पकड़ना नहीं चाहा. मिशन स्कूल में भी एन.सी.सी नहीं थी. मैं चिन्तित था और मेरी यह चिन्ता अफ्रीकनों से ज्यादा थी कि मैं कहीं बड़े लोगों के आगे मूर्ख सिद्ध न हो जाऊँ. लेकिन मैंने पहली बार ही में उन्हें लुभा लिया था. घोड़े पर अंगुली रखकर मैंने सावधानी से बंदूक थामी हुई थी. मेरे लिए यह बेहद निजी स्थिति थी, खुद से बतियाने की सबसे भावप्रवण स्थिति…. हर पल मेरे दिमाग़ में विचार बदल रहे थे. मानो एक का जवाब दूसरा दे रहा था. लेकिन मैं सोच कुछ और ही रहा था. मुझे एक धार्मिक-सी उत्तेजना का अहसास हुआ, जैसी अंधेरे कमरे में मोमबत्ती की लौ पर ध्यान केंद्रित करने पर होता है. मेरा ध्यान जैसे ही बंदूक पर जाता मैं और सतर्क हो उठता. पर अगले ही पल स्थिति बदल जाती मैं फिर निजी दुनिया में खो जाता. अफ्रीका में मेरा किसी शूटिंग रेंज में होना और उस समय अपने पिता, ब्राह्मण कुल और मंदिरों में उनके काम पर सोचना विस्मयकारी था. मैंने एक बंदूक खरीद ली और एना के घर के पास मैदान में निशाना साधने लगा. मैं जमकर अभ्यास करता. इससे हमारे पड़ोसी मुझे एक नयी इज्जत से देखने लगे थे.
   
सरकार को समय तो लगा पर बदलाव दिखना शुरू हो गए थे. दुर्ग-सेना बढ़ा दी गई थी. सफेद कंकरीट के तिमंजिले नए बैरक बना दिए गए थे. जमीन पर कंकरीट बिछाकर छावनी का एरिया भी बढा दिया गया था.
   
कई मिलिटरी-प्रतीकों को मिलाकर बनाए एक मंडल ने बताया कि यहाँ नए मिलिटरी दस्ते का मुख्यालय बना दिया गया है. पूरे शहर की जिन्दगी पलट-सी गई थी.
प्रायः सरकारें निरंकुश होती थी पर हमेशा हम वैसा ही नहीं सोच सकते. हमें लगता सरकार तो दूर रहती है, कुछ राजधानी तो कुछ लिस्बन में. वह हमें हल्के में लेती है. लेकिन मुझे इसकी तब चिंता हुई जब सीसल की कटाई के लिए हमने जेलों को माँग-पत्र भेजे, ख़ैर उन्होंने इसे मान लिया और पूरी सुरक्षा के बीच कटाई के लिए कैदी भेज दिए. सीसल काटना काफी ख़तरनाक है, ग्रामीण अफ्रीकन इसे नहीं करना चाहते. यह एक बड़ी एलोय या अनानास के पौधे जैसा होता है, चार-पाँच फुट ऊँचा, और पंखुड़ियों के बजाय माँसल पत्तियों वाला, हरा और काँटों युक्त बड़े गुलाब जैसा. आधार की तरफ से पत्तियाँ मोटी और दाँतेदार किनारों की होती हैं. ज़रा सी चूक से हाथ कट सकता है. सीसल कड़ी और ख़तरनाक होती है, इसलिए इसे काटना काफी सावधानी एवं मेहनत का काम है. इसकी पत्तियाँ काफी लम्बी, सिरे पर काली, सूच्याकार और ज़हरीली होती हैं. सीसल के खेतों में चूहे बहुत ज्यादा होते हैं, छायाप्रिय होने के कारण ये पड़े.पड़े इनके गूदे को खा जाते हैं. और जहरीले साँप आकर चूहों को पूरा निगल जाते हैं. किसी साँप के फैले हुए मुँह में चूहे का मुँह या पूँछ लटकते देखना बड़ा डरावना लगता है. कुल मिलाकर सीसल की खेती काफी खतरनाक काम है. नियमतः कटाई के दौरान हाथों में दवाएँ और सर्प-दंश का सीरम लिए कोई नर्स वहाँ रहनी चाहिए. इतने जोखिम के बाबजूद केवल पाँच प्रतिशत सीसल के गूदे से रेशा बन पाता है. वह भी बेहद सस्ता होता है. इससे रस्सी, टोकरियाँ, चप्पलों की तलियाँ जैसी साधारण चीजें बनाई जाती हैं. कैदियों के बिना सीसल कटाई बहुत मुश्किल हो गई होती. उसी वक्त से कृत्रिम रेशे ने सीसल की जगह लेनी शुरू कर दी थी, पर मुझे इसकी कोई परवाह नहीं थी.
   
सरकार के लिए वहाँ सालों तक कोई चुनौती नहीं थी. बल्कि वह उदासीन हो चली थी. अपनी सुरक्षा के तहत शासक को लग गया कि व्यवस्था कायम रखना मुश्किल भरा काम है, उसने कुछ सरकारी कानून बनाए और जमीन को भरोसेमन्द और उत्सुक लोगों को किराए पर देना शुरू कर दिया. जिन्हें ये दिया गया वे बेहद अमीर हो गए, साथ में उतने ही विश्वसनीय भी. उन्होंने अपना काम अच्छी तरह किया था. यह सरकारी नियमों में एक तरह की प्रभावित करने की शक्ति  और तार्किकता लाना था. कुछ ऐसे ही नियम छावनी और हमारे विकास के लिए भी काम कर रहे थे. लेकिन शांति भी बनी थी. लोग खतरनाक विचार लेकर ज्यादा नहीं चल सकते. साल-दर-साल युद्ध का पैसा आता था, हम खुद को सदाचारी एवं पुरस्कृत समझते थे, लेकिन सब अपना-अपना स्वार्थ देख रहे थे. हमने पाया कि हमारे समूह में नये धन का सर्वाधिक प्रभाव कोरिया पर पड़ा था. वही धूर्त कोरिया, जो हमें आपदा आने के अपने विचारों से भयभीत रखता था और जिसके विदेशों में कई बैंक खाते थे. वह राजधानी के किसी बड़े आदमी के सम्पर्क में आ गया था और अपने क्षेत्र, शहर अथवा पूरे देश में विदेशी उत्पादकों के तकनीकी सामानों का एजेन्ट बन गया था, जो कि वास्तव में तकनीकी नहीं लगते थे. हालांकि वह अब भी एस्टेट चला रहा था.
   
शुरुआत में कोरिया अपने साथ उस बड़े आदमी के नजदीकी सम्बन्धों को लेकर डींगें हाँकता रहता, जबकि वह पुर्तगाली था. उसकी एजेन्सियों में कोरिया ने खूब काम किया था. हम उसके सम्बन्ध पर जलते-भुनते रहते. पता नहीं कोरिया ने उससे सम्पर्क किया था (या शायद उसने राजधानी के किसी व्यापारी की मध्यस्थता से कोरिया से मुलाकात की थी) जो भी हो, कोरिया ने एक जगह बना ली थी. वह हम सबसे आगे निकल गया था.
   
वह हवाई-जहाज से राजधानी जाने की बातें करता, ना कि पुराने और गन्दे पानी के जहाजों की, जिन्हें हम अब भी काम में लेते हैं. लंच और डिनर भी वह उसी आदमी के साथ करने की बातें करता था एक बार तो उसने रात का खाना भी उसी के घर खाया. लेकिन कुछ दिनों बाद उसका उस बड़े आदमी के बारे में बात करना कम हो गया. वह ऐसे दर्शाता कि इस बिज़नेस का आइडिया उसके अपने दिमाग़ की उपज थी. हम भी हामी भर लेते. जब वह अपने से जुड़ी विदेशी कम्पनियों का हवाला देता, जिनसे वह तकनीकी सामान आयात करता था और जो आर्मी और शहर के काम आ सकता था, तब मुझे हैरानी होती थी कि आधुनिक दुनिया के बारे में मैं कितना कम जानता था. मुझे कोरिया पर भी आश्चर्य होता जो कि उतने ही समय में आगे बढ़ता जा रहा था, जबकि वह केवल एस्टेट के काम का जानकार था.
   
हमारे बीच वह एक बड़ा शॉट बन गया था. जब उसे इस बात का पता चला कि सब लोग उससे जलते हैं, यहाँ तक कि उसके दोस्त और पड़ोसी भी तो अपनी इस नई छवि पर वितण्डा करने लगा. वह आश्चर्यजनक रूप से थोड़ा विनयशील हो गया था. एक दिन रविवार को उसने मुझसे कहा- ’’तुम भी वही कर सकते हो विली, जो काम मैं करता हूँ. बस थोड़ी हिम्मत चाहिए. सुनो, तुम इंग्लैण्ड में रह चुके हो, तुम वहाँ जूतों के कारखाने जानते होगे. हमें वहाँ की बनी दवाओं और अन्य चीज़ों की भी जरूरत है. उनके पास एजेन्ट नहीं है, जो तुम बन सकते हो. उन्हें इसके लिए लिख भेजो, फिर जो जानकारियाँ वे माँगें, बता देना. इसके बाद तुम भी बजनेस में आ जाओगे. उन्हें भी खुशी होगी.’’

“लेकिन जो चीज़ें वे मुझे भेजेंगे, उनका मैं क्या करूंगा ? क्या मैं उन्हें बेचना शुरू कर दूँ, आखिर उन्हें रखूंगा कहाँ ?’’ मैंने पूछा.

तब वह कहने लगा- ‘‘यही तो दिक्कत है, देखो बिजनेस करने के लिए वैसा चौकन्ना भी रहना पड़ता है. उसी के अनुरूप सोच-विचार कर चलना पड़ता है. तब उन्हें जूतों के लिए मत लिखो, पहले ऐसी रणनीति बनाओ कि वे तुम्हारे साथ एक दिन का नहीं, साल भर का बिजनेस तुरन्त स्वीकार कर लें.’’
   
जब मैंने इस पर सोचा तो लगा कि वह और मुखिया जूतों के बिजनेस को काफी गंभीरता से ले रहा है, लेकिन इससे कुछ खास लाभ नहीं होने वाला था.
   
एक रविवार उसने बताया कि, वह एक प्रसिद्ध हेलीकॉप्टर निर्माता से अनुबन्ध करने की सोच रहा था, सुनकर हमारी साँसे रुक गई थी क्योंकि वह मज़ाक़ के मूड में नहीं था. तब हमने समझा कि वह कितना बड़ा आदमी बन गया था. शायद हैलीकॉप्टरों के बारे में उसे अच्छी जानकारी थी. उसने बताया कि यह विचार उसे एकदम दिमाग़ में आया था वह इसे संत की सी सूझ बता रहा था. फिर तो वह कई हफ़्तों तक हेलीकॉप्टरों की बात करता रहा. इसके बाद हमने पढ़ा कि हैलीकॉप्टरों की एक खेप आने वाली है. अगर हम कोरिया को नहीं जानते तो उस ख़बर की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता. लेकिन कोरिया ने इसे दूसरे ढंग से बताया था.
   
इस तरह कोरियाज अमीर बन गए थे- हेलीकॉप्टर का बिजनेस महज़ एक इत्तिफाक था- आज भी वह और उसकी पत्नी उसी ढंग से पैसों को लेकर बतियाते. आपदा संकट का भ्रम वे अब भी पाले हुए थे. सौभाग्य ने उन्हें औरों के बजाय अधिक सचेत रखा था. अब उन्होंने तय किया था कि वे ‘कॉलोनी’ में ज्यादा पैसा खर्च नहीं करेंगे, सिर्फ उन्होंने एक ‘बीच-हाउस’ खरीदा, जो उस रेस्टोरेन्ट के पास ही था. उन्होंने इसे एक ‘इन्वेस्टमेन्ट’ के रूप में किया था. यह उनके नए शब्दों में से एक था. उन्होंने ‘जेकर इन्वेस्टमेन्ट’ नाम से यहाँ एक फर्म खोल ली थी. वे हमारे बीच से ऐसे निकले जैसे कोई देहाती आगे बढ़ता है. अपने नामों के पहले हिस्से ‘जेकिन्टो’ और ‘कार्ला’ को मिलाकर उन्होंने बड़े स्टाइलिश अंदाज के कार्ड छपवाए. उन्होंने बैंक खाते तो नहीं खुलवाए पर अपने नए बिजनेस के सिलसिले में वे घूमते खूब थे. वे विभिन्न देशों के ‘पेपर’ लेना चाहते थे ताकि हमें पीछे छोड़ने का और अहसास करा सकें. ट्रेन में ही उन्होंने इनका मजमून बना लिया थाः आस्ट्रेलिया, कनाडा, यूनाइटेड स्टेट्स, अर्जेन्टीना और ब्राजील के पेपर बनवाने का. वे प्रायः बताते थे कि वे फ्रांस में रहने जा रहे हैं, कार्ला ने भी एक रविवार यही कहा. वे अभी वहीं से लौट रहे थे और रविवार के लंच की खातिर एक फ्रांसीसी वाइन की बोतल लाए थे. जिसमें से आधा.आधा गिलास सभी को दिया गया, पीते हुए हर कोई उसकी तारीफ कर रहा था, पर सच यह है कि उसमें एसिड की बहुत ज्यादा मात्रा थी.
कार्ला बोली- ’‘वास्तव में फ्रांसीसी ही जीने का असली ढंग जानते हैं. मैं तो जैकिन्टो को कह रही थी कि एक फ्लैट लेफ्ट-बैंक में और एक छोटा सा मकान प्रोवेन्स  में अच्छा रहेगा.’’ हम जैसे लोग, जो अभी तक फ्रांस नहीं गए थे, सुनकर एसिड वाइन को ज़हर की तरह गले से उतार रहे थे.
   
कुछ सालों बाद यह सबको निश्चय हो चला कि कोरियाज की सफलता कभी नहीं थमने वाली, जैसे वहाँ की आर्मी अथवा शहर का विकास हो रहा था, वैसे ही वह भी बढ़ रही थी. वह बड़ा आदमी भी राजधानी में अपनी जगह बना हुआ था, लेकिन इसके कुछ सालों बाद एक घटना घट गई, जिसे हम कोरियाज के व्यवहार से जान पाए. वे रोज सुबह-सुबह कोई डेढ़ घण्टा ड्राइविंग करके मिशन-चर्च में प्रार्थना के लिए जाने लगे थे. यानी एक घण्टे की प्रार्थना के लिए तीन घण्टे की यात्रा की जा रही थी, इसके अलावा घर पर भगवान जाने वे कितनी प्रार्थनाएँ और नवदिवसीय पूजा करते रहे थे. ऐसी दिनचर्या छुपी नहीं रह सकती. जेकिन्टो कोरिया पीला और कमजोर होता जा रहा था. हमने अखबारों में पढ़ा कि एजेन्सी में कुछ अनियमितताएँ पकड़ी गई थीं. कई हफ्तों तक अखबारों में यह खबर छाई रही थी. फिर उस विख्यात एवं कुलीन पुर्तगाली ने, जो जैकिन्टो से जुड़ा था- लोकल एक्ज़ीक्यूटिव काउंसिल को बयान दिया और सरकार को चौकसी बरतने की सलाह दी थी. बिना किसी डर अथवा पक्षपात के उसने धाँधली की गहराई में जाकर अपनी बात रखी थी. अपराधी से इसका जवाब माँगा भी गया, लेकिन कॉलोनी में किसी को उस पर शक नहीं हुआ था.
   
यह रामभरोसे चलती सत्ता का एक अन्य रूप था. हम जानते थे कि कोरियाज़ बेहद गहरे संकट में फंसे हैं, जिससे विदेशी बैंकों के खाते या फिर विख्यात देशों के ‘पेपर’, कोई नहीं बचा सकता था. उनके लिए चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा था. बेचारी कार्ला बड़बड़ाती- ’‘मुझे ऐसी जिन्दगी नहीं चाहिए थी, पूछो ननों से, मैं भी नन ही बनना चाहती थी.’’
हम जान गए थे कि उस अभिजात पुर्तगाली ने कोरिया का चुनाव क्यों किया था, यह वर्षों हमारे बीच चर्चा का विषय बना रहा. ऐसे ही मौके पर वह बड़ा आदमी किसी को अंधेरे में फेंकने की सोच सकता था. क्योंकि कॉलोनी की संहिता के अुनसार अपने जैसे किसी पूर्ण पुर्तगाली को बर्बाद करना न केवल अपनी जाति में सूराख करना था बल्कि बेइज्जत होने जैसा था. हाँ, इस मिश्रित दुनिया के किसी शिक्षित, इज़्ज़तदार लेकिन दोयम दर्जे के अभागे व्यक्ति के साथ, जो पैसे का कोई मूल्य न समझता हो- यह व्यवहार कोई परेशानी की बात नहीं थी.
   
कोई तीन-चार महीने कोरियाज़ इसी शोक में पड़े रहे. हर समय वे एजेन्सी से पहले के आम दिनों की याद करते और अपने को कोसते. हमारा मन भी अब उनसे ऊब गया था, लेकिन उनका दुःख हमें भी बड़ा कष्टकारी लगता.
   
बीमार रहने के कारण जैकिन्टो अशक्त हो चला था, वह सबके साथ दुश्मनों की तरह व्यवहार करता और हमेशा किसी सोच में डूबा रहता. एक दिन अचानक उसका संकट समाप्त हो गया. असल में, राजधानी में रहने वाले और जैकिन्टो से जुड़े उस बड़े आदमी ने अब असली अपराधी को ढूँढ़ निकाला था.
   
इसके बाद से अखबारों ने इस पर अपने जहरीले लेख लिखना बंद कर दिया. अखबारों के कारण उछला यह केस अब स्वतः समाप्त हो गया था.
   
लेकिन इससे जैकिन्टो की परेशानियों का अंत नहीं हुआ. उसे ताकत से निपट लेने की धमकी दी गई. जैकिन्टो जानता था कि वह उस बड़े आदमी से हमेशा अपनी सुरक्षा नहीं कर सकता था. विभिन्न कारण गिनाते हुए उसने उसके ख़िलाफ केस पुनः खुलवा देने की बात भी कह डाली थी. इसलिए वह सदमे में था. जैकिन्टो प्रायः कहता था (कई बार उत्साह में भी) कि आपदा आने वाली है, जो कॉलोनी ही नहीं, उसकी सारी दुनिया तक को उड़ा ले जाएगी. उसका कहा सच हो गया था.
   
एक आदमी जो ऐसे विचारों के साथ रहता है बल्कि इससे अन्य लोगों में भी भय पैदा करता है, से राजधानी में प्रतिकार भाव रखने वाले कुछ लोग तो होंगे ही. इसे चिन्ता करने के बजाय उसका भाग्य समझकर छोड़ देना चाहिए. लेकिन जैकिन्टो वाली घटना से सब लोग किसी दार्शनिक बहाने की तरह दूर होते चले गए. उसका मामला धुँधला चुका था. असल में यह आत्ममुक्ति का आदर्श ढंग है और एक ही समय कॉलोनी में और उसके बाहर रहने का तरीका भी.
   
यह एक तरह का अमूर्तन था. लेकिन जो अपमान वह झेल रहा था, वह अमूर्त नहीं पूरी तरह वास्तविक था. निजी होने के कारण वह उसी में डूबा रहता था. इसने उसे अकेला ही नहीं कर दिया, सारी बेहतरीन दुनिया से भी काट दिया.
   
एक रविवार को हमारी लंच देने की बारी थी. हम पीली और नीली टाइलों उसी बीच रेस्टोरेन्ट पहुँचे. कोरिया का सुझाव था कि बाद में हम उसका बीच-हाउस (इन्वेंस्टमेंट) भी देख लें. एना और मुझ सहित कई लोगों ने उसे अब तक नहीं देखा था. खुद कोरिया भी वहाँ दो साल से नहीं गया था. हमने रेस्टोरेन्ट से गाड़ी घुमाकर वापस डामर की संकरी सड़क पर डाल दी. सड़क धरती पर जमी काली पपड़ी-सी लग रही थी. इसके बाद एक बलुई सड़क आई जिसके दोनों और करीने से झाड़ियाँ, गुल्म और बादाम के पेड़ लगे थे और आगे समुद्र तक चले गए थे. आगे चलकर हमें सरकण्डों बनी छत की एक अफ्ऱीकन झोपड़ी दिखी, जो धूप में चमक रही थी. वहाँ पहुँचते ही कोरिया ने आवाज लगाई- ‘आंटी, आंटी..!’ एक बुजुर्ग अश्वेत औरत सरकण्डों की बड़ से निकल कर आई, उसकी वेशभूषा अफ्रीकी थी. कोरिया ने हमें बताया था- ’‘उसका बेटा अर्द्ध-पुर्तगली है, जो यहाँ ’केयर-टेकर’ है. काफी तेज़ बोलता हुआ वह उस अफ्रीकन बुढ़िया के प्रति स्नेह दिखा रहा था. हो सकता है, वह हमें दिखाने के लिए ऐसा कर रहा हो. उसका बदला हुआ व्यवहार देख बुढ़िया ने मुँह बनाया. अफ्रीकनों और कामगारों के प्रति उसके बर्ताव को वह जानती थी. कोरिया ने पूछा- ‘सेबस्त्यो कहाँ    है ?’ वह घर पर नहीं था. शोर मचाते हुए कोरिया के साथ हम भीतर पहुँचे.
   
वहाँ काफी कुछ बरबाद हुआ दिख रहा था. खिड़कियाँ टूट चुकी थीं. नीचे पड़ी कीलें आद्रता के कारण जंग खा गई थीं. दीवारों तथा लकड़ियों पर कीलें उखड़ने के निशान बने थे. ग्राउण्ड फ्लोर पर लगे फ्रांसीसी दरवाजों के कब्जे़ निकाल लिए गए थे. मछलियाँ पकड़ने वाली नाव बैठक में आधी भीतर और आधी बाहर निकली थी, जो सूखी लकड़ियों के बंदरगाह पर खड़ी हुई लग रही थी.


   
वह अफ्रीकन बुढ़िया कोरिया के पीछे कुछ दूर पर खड़ी हो गई थी. कोरिया का चेहरा अजीब तरह से ऐंठ गया था, वह चुपचाप देखे जा रहा था. वह गुस्से में नहीं था, कहीं खो-सा गया था और काफी दुःखी एवं असहाय लग रहा था. मैं सोच रहा था, वह पागल हो गया है. मैंने ऐसा उसे पहले कभी नहीं देखा था. बेचारी कार्ला- ’कान्वेंट गर्ल’ को ऐसे आदमी के साथ रहना पड़ रहा था. वह उसके पास गई और ऐसे बचकाने ढंग से बोलने लगी मानो हम वहाँ थे ही नहीं. उसकी यह भाषा मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी. ‘‘हम इस गंदी जगह को फूँक डालेंगे. मैं अभी जाकर केरोसीन लाती हूँ, साली नाव सहित सब कुछ जला डालना है.’’ वह कुछ नहीं बोला. कार्ला उसकी बाँह पकड़कर आंटी की झोंपड़ी के पीछे कार में ले कर चली गई.

कुछ हफ्तों बाद हम फिर मिले तो वह शांत नजर आ रहा था. उसके पतले और कोमल गाल लटके हुए थे.
   
“हम कुछ दिनों के लिए यूरोप जा रहे हैं.’’ कार्ला ने बताया.
तभी मिसेज नोरोन्हा कुर्सी में धँसते हुए धीमी आवाज में बोली- ‘‘समय ठीक नहीं है.’’
’’हम जाकर बच्चों से मिलना चाह रहे हैं.’’ कार्ला ने सफाई दी.
कोरियाज के दोनों बच्चे कोई साल भर पहले, जब तो वे छोटे-छोटे थे, पुर्तगाल के बोर्डिंग स्कूलों में भेज दिए गए थे.
   
“उनका समय तो अच्छा है.’’ नोरोन्हा ने कहा.
फिर उसी स्वर में बोली- ‘‘लड़के को क्या हुआ, वह इतना बीमार क्यों है ?’’
सुनकर कार्ला व्यथित हो उठी- ‘‘मुझे नहीं पता, वह बीमार है, ऐसा उसने लिखा तो नहीं है!’’
मिसेज नोरोन्हा ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया, कहने लगी- ‘एक बार मैंने भी अशुभ मुहूर्त में यात्रा की थीं. यह विश्वयुद्ध के ज्यादा बाद की घटना नहीं है. तब मैंने कुर्सी रूपी यह सिंहासन नहीं पकड़ा था. हम दक्षिण अफ्रीका में डरबन गए थे. वह जगह बहुत अच्छी है, पर हमारा समय खराब था. कोई हफ्ते भर बाद ही वहाँ दंगे भड़क उठे. दुकानें लूटी और जलाई जाने लगीं. ये दंगे वैसे तो इंडियनों के खिलाफ थे, लेकिन एक दिन मैं भी उसकी चपेट में आ गई. मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था. ना मैं वहाँ के रास्तों की जानकार थी. तभी कुछ दूर मैंने एक भूरे बालों वाली सफेद महिला को देखा, जिसने लम्बी फ्रॉक डाल रखी थी. उसने इशारे से मुझे बुलाया और बिना कुछ बोले विभिन्न गलियारों से होती हुई एक बड़े से घर में ले गई. रास्ते खाली होने तक मैं वहीं रही. शाम को मैंने यह घटना अपने दोस्तों को बताई. वे हैरानी से उस महिला के बारे में पूछताछ करने लगे, फिर उसके घर का हुलिया पूछा. मेरे बताने पर कोई कहने लगा- ’‘अरे, वह घर तो बीस साल पहले ही गिरा दिया गया था. जिस महिला से तुम मिली, वह वहीं रहती थी, लेकिन उसके मरने के बाद उसका घर ढहा दिया गया.’’ उसके द्वारा बताई गई यह कहानी वास्तव में नोरोन्हा की खुद की शक्तियों के बारे में कही गई थी. कहते-कहते उसका सिर कंधों पर ऐसे झूल गया मानो कोई पक्षी बैठे.बैठे सो गया हो. जब भी वह ऐसी कहानियाँ कहती या कोई भविष्यवाणी करती, सब चुपचाप उसकी ओर ध्यान से देखने लगते. कुछ देर के लिए सन्नाटा छा जाता. लेकिन अंत में कोई यह नहीं बताता कि उसने उससे क्या सीखा था.
   
जो भी हो, वह बुरा दौर था कि नहीं लेकिन कोरिया दम्पत्ति अपने बच्चों से मिलने तथा अन्य कामों के सिलसिले में यूरोप चले गए. और वहाँ कई महीने रहे.
मैं उनके एस्टेट मैनेजर को जानता था. आमतौर पर मैं उसको कस्बे में ही देखता था. वह ठिगने कद का चालीस की उम्र का मिश्रित नस्ल का आदमी था. उसके पास बातचीत का नायाब ढंग था. पर कभी-कभार उसका वह ढंग खटकने लगता. अपने उसी ढंग से कई बार वह पुर्तगाली अथवा भारतीय दुकानदारों के उस व्यवहार के बारे में बताता जिसमें उसे असहजता महसूस हुई हो. जैसे ‘वह किसी कल्पना लोक का प्राणी तो नहीं था, पर उसे आप भद्रलोक का शायद ही माने.’
मेरी ओर देर तक देखने पर उसकी आवाज़ लड़खड़ाने लगती थी. वह खीज़ से भर जाता लेकिन मेरा थोड़ा विश्वास भी करता था. मुझे कोरिया दम्पत्ति के खिलाफ उसकी छोटी-मोटी साजिशें समझ में आ रही थी. हमने कई नए कैफे देखे, जो प्रायः खुलते-बंद होते रहते थे. हमने बारों के विषय में भी जाना. मुझे मिलिटरी से भरे इस क्षेत्र के नए रूप का भी अंदाज था, मैं इसे पसंद करता था. मुझे पुर्तगाली सैनिकों के साथ समय बिताना अच्छा लगता था. कभी-कभार वहाँ एक ऑफिसर भी आ जाता था, जो गोवा और भारतीयों के बारे में काफी पहले की बातें बड़बड़ाता रहता था.
लेकिन भारतीयों ने सात-आठ वर्ष पूर्व ही गोवा पर अधिकार कर लिया था. नए रंगरूटों में से कुछ ही इस बारे में जानते थे. ऐसा लगता कि यहाँ कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं है. तभी यहाँ अल्जीरिया और इसके बाद जॉर्डन के रेगिस्तानों में चलने वाले गुरिल्ला ट्रेनिंग कैम्पों की अफ़वाहें ज़ोरों से फैलने लगी थी. जो वास्तविक नहीं थी. दरअसल लिस्बन और कोईम्ब्रा के कुछ छात्र छुट्टियों में यहाँ आकर गुरिल्ला-गुरिल्ला खेल रहे थे. हमारे मिलिटरी इलाके में अब भी शांति और भाईचारा बरकरार था. मानो सब लोग यूरोप की छुट्टियों पर हों. मैं भी मानो फिर से इंग्लैण्ड में था, लेकिन इस बार पैसों के साथ. शहर की मेरी यात्राएँ आमतौर पर लम्बी ही हुआ करती थीं.
   
एक दिन कोरिया के मैनेजर अल्वारो ने मुझसे पूछा- ‘‘क्या तुम देखना चाहोगे, वे क्या करती हैं ? हमलोग उस समय राजधानी के एक कैफे से चाय पीने के बाद घर चलने की तैयारी कर रहे थे. उसकी नज़र कैफे की खिड़की के पास से गुजरती औरतों पर थी, जिन्होंने चमकीली पोशाक पहन रखी थी, यह दुपहरी की बात है. धूप की चमक में वे और भी लुभावनी लग रही थीं. इस समय प्रायः भीख माँगते हुए गंद-संदे बच्चों का हुजूम दिखा करता था. जो कभी सड़कों, दीवारों अथवा दुकानों की खिड़कियों के पास झुके हाथ फैलाए खड़े रहते. उनका मुँह हमेशा धीरे.धीरे खुलता और बंद होता रहता था. वे किसी ओर देखते हुए प्रतीत नहीं होते. यहाँ तक कि जब आप उनकी हथेली पर पैसे रख देंगे तो भी वे अनजान ही बने रहेंगे. चाहे कितने ही पैसे दे दो वे वहाँ से हिलते नहीं, आख़िरकार लोग उनकी अनदेखी करना शुरू कर देते. लेकिन वे औरतें ऐसी नहीं लग रही थीं. उन्हें देखकर लगता वे कुलीन घरों की होंगी. मैंने सोचा वे भी कैम्प की रही होंगी. तब मैंने अल्वारो से कहा था कि मैं देखना चाहता हूँ, आखिर वे करती क्या हैं ? उसने कहा- ‘‘इसके लिए कल शाम को चलेंगे. शाम को जाना ज़्यादा अच्छा रहता है. अरे हाँ, वीकेण्ड में जाना तो और भी बढ़िया होगा. तब तक आप मिसेज एना से बचकर निकलने का कोई बहाना तलाश लेना.’’
   
अल्वारो इसे आसानी से कह रहा था, पर मुझे यह काफी कठिन जान पड़ा. पिछले दस वर्षों में मैंने एना से कभी झूठ नहीं बोला था. ऐसा कोई मौका आया भी नहीं था. शुरुआत में मैं जब लंदन में था और आगे बढ़ने को कोई रास्ता नहीं खोज पा रहा था, खासकर अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण, शायद तब मैंने कभी झूठ बोला हो. लेकिन पता नहीं एना ने उन पर यकीन भी किया था कि नहीं. हो सकता है उसने उसे किसी और रूप में लिया हो. अफ्रीका आकर मैंने लंदन की तरह झूठ बोलना छोड़ दिया था, हमारे मिले-जुले समूह में इसकी ज़रूरत भी नहीं पड़ी. लेकिन इतने सालों में एना मेरे कुछ राज जान गई थी, जो काफी हद तक सही भी थे.
लेकिन उसने कभी भूले से भी मुझे वे बातें याद नहीं दिलाईं, जो मैंने उससे कही थीं. अफ्रीका में हम एक-दूजे के बेहद नजदीक थे, जो कि स्वाभाविक भी था. उसी ने मुझे वहाँ व्यवस्थित जीवन दिया था. वह मेरी संरक्षक थी. मुझे किसी और का सहारा नहीं था. इसलिए उसे झूठ बोलना कठिन लग रहा था. अगला दिन भी इसी उधेड़बुन में बीता. इसके बाद मैं एक कहानी गढ़ने लगा, हालाँकि वह भी झूठ जैसी ही थी, पर मैं गहराई से उस पर सोचने लगा. विचार आया कि क्यों न मैं क्वार्टर में रहने वाले किसी आदमी की आवाज निकालने लगूं. एकबारगी लगा कि मैं अपने लंदन वाले तौर-तरीकों पर लौट रहा था. वक्त आने पर मैंने जो भी कहा, एना ने वह शायद ही सुना हो. बोली- ’‘शायद कार्ला वापस एस्टेट लौटने वाली है.’’ बात सीधी थी पर मुझे लगा, बिना किसी कारण के कुछ दरक गया था.
   
अल्वारो एकदम सही समय पर आ गया था, और एस्टेट के बाहर मेरा इंतजार कर रहा था. मैं सोच रहा था कि हमें शहर जाना होगा, लेकिन अल्वारो ने गाड़ी मेन रोड के बजाए पिछवाड़े के रास्ते पर डाल दी थी. रात के समय भी मैं इन रास्तों से परिचित था. मुझे लगा अल्वारो इस तरह समय बरबाद करेगा. हम खुले जंगल में कपास के खेतों, झाड़ियों, काजू के पेड़ों की कतारों के पीछे से बढ़े जा रहे थे. कुछ मील बाद कोई न कोई गाँव आ जाता था जिससे हमारी रफ्तार धीमी हो जाती. कई गाँवों में रात्रि.बाज़ार लगे थे, खुली झोंपड़ियों में दुकानें सजी थीं. लालटेनों की रोशनी में माचिस, खुली हुई सिगरेट और डिब्बों में अन्य कुछ चीजें़ बेचने के लिए रखी दिख रही थीं. कुछ बेहद गरीब लेग, जो दिन में कुछ नहीं कमा पाए थे, मोमबत्तियों के डिब्बे, डंडियों लगे सूखे कैसावा, पेपर, सब्ज़ियाँ और अपने लिए बगल में थोड़ा सा खाना रखे बैठे थे. पता नहीं लोग घर की व्यवस्था से खेल रहे थे अथवा खरीदने-बेचने का खेल.खेल रहे थे, मैं आज तक समझ नहीं पाया हूँ.
   
अरे, वाह!’  अल्वोरा के मुँह से निकला. मैं इनमें कुछ गाँवों के बारे में अच्छी तरह जानता था. ये रात्रि बाजार भी मैं पहले कई बार देख चुका था. जाहिर है, अल्वारो के साथ मैं इन्हें देखने नहीं आया था. तभी उसने कहा- ’‘तुम देखना चाहते थे ना कि अफ्रीकी रात में क्या करते हैं? चलो मैं दिखता हूँ. तुम्हें यहाँ दस साल होने को आए, फिर भी पता नहीं तुम कितना जानते हो? हमने मौज-मस्ती की तलाश में यहाँ दो.दो घण्टे सड़कों पर लोगों के साथ फिसलते हुए ड्राइविंग की है. पता है इस समय भी तुम्हारे आस-पास तुम जैसी बीस से तीस पार्टियाँ घूम रही हैं और वे वहाँ केवल डान्स करने नहीं जाते.’’
   
तभी लैण्ड रोवर की हेडलाइड में एक ठिगनी-सी लड़की दिखाई थी. वह फ्रॉक  पहने थी. रोशनी में उसका चेहरा चमक रहा था. वह सड़क के एक ओर खड़ी इशारे की आस में हमारी ओर देखे जा रही थी. ’‘तुम्हारे अनुसार यह लड़की कितनी बड़ी  होगी ?’’ अल्वारो ने पूछा. मैं अंदाजा नहीं लगा सका, वह आम लड़कियों.सी लग रही थी. मैं उसे बिल्कुल नहीं पहचान पाया था. अल्वोरा ने बताया- ’‘यह कोई ग्यारह साल की होगी. इसकी पहली माहवारी हो चुकी है, यानी अब यह सेक्स के लिए पूरी तैयार है. अफ्रीकन इन चीजों के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं, कोई विदेशी भला कम उम्र के सेक्स का आनंद क्या जाने! यह लड़की, जो तुम्हें कुछ नहीं लगती, रोज रात को किसी न किसी मर्द के साथ होती है. क्या तुम्हें इसका अंदाजा था ?’’
   
“मैं इस बारे में कुछ नहीं जानता.’’
   
“बुरा मत मानना, मैं भी यही सोच रहा था.’’ अल्वारो बोला.
वास्तव में पिछले दस सालों में गाँवों और सड़क पर घूमते रहने वाले अफ्रीकनों के बारे में मैंने इस तरह कभी नहीं सोचा था. शायद मेरी जिज्ञासाओं की कमी या अपनी जातीय भावनाओं के अवशेषों के चलते ऐसा हुआ हो. वैसे भी मैं इस देश का नहीं था, ना ही मुझे सेक्स के बारे में इस तरह की कोई ट्रेनिंग मिली. साथ ही, इससे पहले अल्वारो जैसा गाइड भी मुझे नहीं मिला था.
   
एकदम शुरुआत में जब मैं जंगल की इस रोमांच भरी मस्ती के बारे में नहीं जानता था, तो इन मिश्रित.जातीय ओवरसियरों को लेकर सोचता था कि ये बेचारे जीवन की विविधता क्या जानें. अफ्रीकनों के इतने पास रहते हैं, कुछ ने उससे निजी सम्बन्ध स्थापित कर रखे है, बस. अब पता चला कि ये तो हमेशा मौज.मस्ती का लुत्फ़ उठाते हैं.
   
अल्वारो चार कमरों के एक अंधेरे से मकान में रहता था. बिना पेड़ों का यह मकान कोरिया के एस्टेट से जुड़ा हुआ था. बाहर से यह ऐसा लगता था कि इसे घर कहना अनुचित जान पड़ता था लेकिन अल्वारो इसमें अपनी अफ्रीकी पत्नी और परिवार सहित खुशी से रह रहा था और वहीं से आस.पास के गाँवों की दूसरी बहुत.सी लड़कियों, रखैलों आदि से सम्पर्क बनाए था. दुनिया की कोई और जगह उसे ऐसी जिन्दगी नहीं दे सकती थी. चलते समय एकबारगी मुझे लगा था कि ऐसे पिछड़े रास्तों पर गाड़ी चलाकर वह टाइम बर्बाद करेगा लेकिन वह मुझे यहाँ छिपे खज़ाने के दर्शन कराना चाहता था. “उस छोटी लड़की के पास चलें, जिसे हमने अभी पीछे छोड़ा है. आप जैसे ही उसे पुकारेंगे, वह अपनी नन्हीं-नन्हीं छातियाँ उचकाकर खड़ी हो जाएगी. यह सब वह अनजाने में नहीं करती.’’ अल्वारो ने कहा. मैं जान गया कि अल्वरो ऐसी किसी भी लड़की द्वारा अपनी ओर उचकाई गई छातियाँ दबाने को तैयार बैठा था.
   
हम मेन रोड़ पर आ गए थे. बरसात के कारण उसमें बडे़.बड़े गड्ढे बन गए थे, हमें ज्यादा आगे तक दिखाई भी नहीं दे रहा था, इसलिए धीरे.धीरे आगे बढ़ रहे थे. हमारे बगल से चट्टानें जल्दी.जल्दी गुजरती जा रही थी. आगे शहर देखकर लग रहा था जैसे हम अब तक अंधेरे में टँगे थे. शहर में चहल-पहल थी लेकिन शोर.शराबा नहीं था. गलियों में स्ट्रीट लाइटें लगी थीं, जो विज्ञापन की ख़ातिर नहीं चीज़ों को चोरी से बचाने के लिए थी. सड़कों की नीली डिम रोशनी से आँखों को परेशानी हो रही थी, क्योंकि ज्यादा दूर तक दिखाई नहीं दे जा रहा था. दुकानों के आस.पास काम का इंतजार करते कुली पैर पसारे बैठे थे तो गैरीसन से आने वाले ट्रैफिक की बाट जोहते कुछ और लोग भी आलस में पसरे पड़े थे. “इन लोगों की कोई ठीक व्यवस्था की जानी चाहिए, वरना इन पर कंट्रोल नहीं किया जा सकेगा.’’ अल्वारो ने कहा था.
   
शुरुआत में वह जिस तरह के रास्ते से चला था, फिलहाल भी वैसी ही किसी सड़क से गुजर रहा था और कभी.कभार लैण्ड रोवर से उतर कर आते.जाते लोगों से कुछ बात करने लगता था. उसने मुझे बताया कि वह डान्स की कोई अच्छी.सी  जगह खोज रहा है, यहाँ वे अक्सर बदलती रहती हैं. बेहतर होता, हम किसी बार में चलते, लेकिन वे जगह अच्छी नहीं. बार में आप किसी लड़की से सीधे बात नहीं कर सकते, पहले आपको उसके दलाल  से मिलना पड़ेगा, जो गली में बैठे आवारागर्दों में से कोई एक होगा. बार में आपको कोई सुविधा भी नहीं मिलेगी. अगर साथ में कोई लड़की है तो आपको शहर के मकानों के बीच किसी अंधेरी सुनसान जगह पर या किसी अफ्रीकन (इन्हें स्ट्रानसिटी भी कहा जाता है) के घर जाना होगा और सारे समय आप दलाल की दया पर होंगे. यह किसी फौजी के लिए तो चल सकता है पर एस्टेट मैनेजर के लिए उचित नहीं. अगर दलाल के साथ ज़रा भी अनबन हो गई तो एस्टेट में खबर पहुँचते देर नहीं लगेगी और फिर मजदूरों तक से समस्या हो सकती हैं.
   
अन्ततः हमें ऐसी एक जगह मिल ही गई जिसे अल्वारो खोज रहा था. मैं सोच रहा था यह तो सुविधाओं से लैस होगी. वह बोला- ’‘हमारे बड़े-बूढे़ कहते थे कि अगर आपको अक्सर इसकी जरूरत पड़ती हो तो रोम चले जाओ.’’
हम शहर के किनारे पर आ पहुँचे थे, डामर की सड़क यहीं तक थी, आगे रेगिस्तान शुरू हो जाता था. यह भी बारिश से बुरी तरह कटा-फटा था. एकाध लाइट के अलावा यहाँ चारों ओर अंधेरा पसरा था. माहौल इतना शांत था कि हवा से हमारे लैण्ड रोवर का दरवाजा टकराना भी शोर महसूस हो रहा था.
   
हम एक मालगोदाम जैसी इमारत के आगे रूक गए. उसकी कोने वाली चोटी पर एक बल्ब लगा था, मौसम की वजह से उसके चारों ओर उड़ने वाली चीटियाँ छाई थीं. उसके सामने अन्य कारें भी खड़ी थी. वहीं पर वॉचमैन या निरीक्षकनुमा लोग भी थे, जो मालगोदाम के पास ही एक छोटी सी दीवार के सहारे जमीन पर बैठे थे. उनमें से एक ने हमें रास्ता बताया. हम मालगोदाम के भीतर बने रास्ते पर बढ़ चले. भीतर से गाने की आवाज आ रही थी. एक लट्ठधारी आदमी ने छोटा.सा दरवाजा खोला, हम दोनों ने उसे पैसे चुकाए. आगे एक संकरा और अंधियारा रास्ता था, जो मुख्य कमरे तक जाते.जाते एकदम घूम गया था. डांस फ्लोर पर हल्का नीला प्रकाश फैला था. उस पर पुर्तगाली पुरुष और अफ्रीकन महिलाओं के दो जोड़े नाच रहे थे. दीवार पर लगे आईनों और चमकती टाइलों पर उनकी झलक पड़ रही थी. पूरे कमरे में मेज लगी थी, जिन पर नीचे करके लाइटें लगाई हुई थीं. उनमें कितनी मेजों पर लोग बैठे थे, इसका अंदाजा कठिन था. खैर, हम ज्यादा आगे नहीं गए, फ्लोर के पास ही पड़ी एक मेज पर बैठ गए. थोड़ी दूरी पर वही लड़कियाँ थीं, जो पिछली दोपहर वेश्याओें जैसी लग रही थीं और जिन्हें सुंदर कपड़े पहनकर सर नचाते हुए सड़कों पर टहलना बहुत पसंद था. जब मैंने डांस फ्लोर के परे खड़ी उन लड़कियों पर गौर किया तो पता चला कि उनमें कई इन गाँवों से नहीं थी, बल्कि तटीय क्षेत्र के अरब परिवेश की थीं, जिन्हें मुसलमान कहा जाता था. वहीं मेजों के अगल.बगल दो अफ्रीकी वेटर और स्पोर्ट की कमीज पहने एक पतला-सा पुर्तगाली मालिक घूम रहे थे. जब वह पुर्तगाली हमारे नज़दीक आया तो मैंने देखा कि वह जवान नहीं रहा था, उसकी शांत आँखों में हर चीज़ के प्रति निरपेक्ष भाव झलक रहा था.
   
काश मैं भी उसी जैसा कोई काम करता लेकिन मुझे ऐसी कोई ट्रेनिंग नहीं मिली थी, पर इस विचार से मुझे बड़ी शर्म आने लगी थी. ये सारी लड़कियाँ अफ्रीकी थीं. लेकिन इससे उन दोनों अफ्रीकी वेटरों को कोई परेशानी नहीं होती थी. यौवन से लदी ये लड़कियाँ इतनी मूर्ख थीं कि खुद अपने शरीर का शोषण करवा कर जीवन को अंधेरे में धकेल रही थी. मुझे घर की वही पुरानी पीड़ा याद हो आई. अपने माँ.बाप की याद भी आने लगी थी, जो बेचारे शायद जानते ही नहीं थे कि सेक्स आखिर है क्या बला! मुझे तुम्हारी याद भी आ रही थी सरोजिनी, एक पल को लगा जैसे उन लड़कियों में एक तुम भी थी, सोचकर मेरा दिल बैठ गया.
   
अल्वारो का चेहरा बुझा था, मालगोदाम के अंधियारे में घुसते ही उसकी यह हालत हो गई थी. वह तो हर माह तैयार होने वाली अबोध ग्रामीण लड़कियों के साथ सेक्स कर ही उत्तेजित होता था. वे लड़कियाँ जिनका पहला मासिक हो चुका होता है और जो उसके सामने अपनी छोटी.छोटी छातियाँ उचकाने को तैयार रहती थी. इस मालगोदाम में कुछ भी अलग नहीं था. मुझे नहीं लगता ऐसी सुविधाएँ परोसने वाले ये स्थान आर्मी आने के पूर्व भी रहे होंगे. तब यह अल्वारो के लिए भी नई बात रही होती.
   
मैं सोचता हूँ अपने को मेरे गाइड के रूप में दर्शाने वाला अल्वारो वास्तव में स्वयं भी नौसिखिया था और थोड़ा निराश भी, इसलिए उसे मेरी मदद की जरूरत पड़ती थी.
   
फिर हमने बीयर पी. हमारी सारी शर्म हवा हो चली थी. मैं वहाँ नीली लाइट में डांस कर रही लड़कियों और लम्बे-चौड़े आइनों में पड़ रही उनकी झलक देखने में मशगूल हो गया. इससे पहले मैंने कभी अफ्रीकन डांस नहीं देखा था. एस्टेट में रहने के दौरान ऐसा मौका भी नहीं आया था. लड़कियों के डांस की अदाएँ बड़ी मोहक लग रही थीं. उनके हाव-भाव ज्यादा मुखर थे. उनके डांस में एक तरह की लय थी, यहाँ तक कि अपने पार्टनर से बात करने, उसके कंधे के आस-पास बोलने, हँसने तक में इसे देखा जा सकता था.
   
यह मौज-मस्ती से कुछ ज्यादा ही था. लेकिन डांस के दौरान मानो लड़कियों की अंतरात्मा बुझी हुई लग रही थी. हर लड़की में इसे देखा जा सकता था. शायद बड़ पैमाने पर होने के चलते मुझे ऐसा लग रहा था. खैर, अपने परिवेश की वजह से मैं अफ्रीकनों के बारे में राजनीतिक नज़रिए से बहुत सोचता था. उस मालगोदाम में बैठे-बैठे मेरे दिमाग में आया कि अफ्रीकन दिलों में कुछ ऐसा है, जो हमारे बजाय ज्यादा साफ है, राजनीति के मामले में भी उनकी यही स्थिति है.
   
अल्वारो, जो कुछ अजीब-सा मुँह बनाए बैठा था, ने उनमें एक लड़की के साथ डांस करना शुरू कर दिया था. पहले तो अपने को आईने में देखते हुए वह भाँड की तरह करने लगा था लेकिन जल्दी ही तन्मय होकर नाचने लगा था. इसके बाद जब वह मेरे पास आया तो एकदम बदले हुए मिजाज में था. उसकी आँखों में वासना झलक रही थी. बीयर का गिलास उठाकर घूरते हुए वह गुस्से में ऐसे बोलने लगा मानो सबने उसे पीछे से पकड़ रखा था- ’‘पता नहीं, विली, तुम इस बारे में क्या सोचते हो, पर अब हम यहाँ इतनी गंदी जगह आ ही गए हैं, तो मैं कुछ.न.कुछ करके जाऊँगा.’’ और घूरते, झूमते हुए वह अपनी डांस पार्टनर को लेकर दरवाजे की तरफ से कमरे के अंधियारे हिस्से में चला गया.
   
मैं वहीं बैठा बीयर पीता हुआ उसका इंतजार करने लगा था. लेकिन चौकन्नी आँखों वाला वह पुर्तगाली मालिक अपना काम अच्छी तरह जानता था. तीन-चार मिनट के बाद उसने कुछ इशारा किया. एक लड़की आई और मेरी मेज पर बैठ गई. अपने भड़कीले वस्त्रों में वह कुछ छोटी लग रही थी. लेकिन गालों पर रूज़ और पलकों पर पर कोई रंग लगाए वह थी एकदम जवान.

उसका ‘अरबी’ चेहरा देखकर मुझे खास उत्तेजना नहीं हुई, पता नहीं अल्वारो उनको देखकर कैसे पागल हो उठता था. उसने उठकर मुझे अपने पीछे-पीछे आने का इशारा दिया, मैं चल पड़ा. छोटे दरवाजे से निकलकर हम अंधेरे कोने में पहुँचे. वहाँ बहुत सारी कोठरियाँ थीं, जिनके बगल में कंकरीट का रास्ता बना था. बीच की दीवारें छत तक नहीं थी. पीछे की तरफ दो बल्ब जल रहे थे. मैंने सोचा, अगर कोशिश करूँ तो आस-=पास से अल्वारो की आवाज़ सुन सकता हूँ. मालगोदाम में उपलब्ध सेक्स की ये सुविधाएँ बेहद सस्ती थी. ऐसी जगहें कभी भी सील की जा सकती थीं, लेकिन मालिक का इससे कोई नुकसान नहीं होना था. वह अपने सारे कपड़े हटाने पर वास्तव में छोटी लगने लगी थी. शायद बचपन से मेहनत करते रहने के कारण उसका शरीर कसा हुआ था. लेकिन एना ऐसी नहीं थी, वह तो दुबली और हड़ीली थी. मैंने उसकी छातियाँ दबाईं थीं, पर वे इसके बजाय कम कसावट लिए थीं. अल्वारो को ये बहुत पसन्द आतीं. अब मैं सस्ते और सूती कपड़े पहने गाँव की किसी लड़की की उचकी छातियों की कल्पना कर सकता था. उसके चुचुक मुलायम और बड़े थे, शायद उसे एकाध बच्चा रहा हो. मुझे जरा भी उत्तेजना नहीं हो रही थी, यहाँ तक कि सेक्स के दौरान भी घर, ग्यारह.बारह साल पूर्व का लंदन, सोहो की वह ऊबाऊ वेश्या, नॉटिंग हिल के उस गंदे मकान में फर्श पर गद्दे के ऊपर पड़ी बडे.बड़े कूल्हों वाली जुने, सारी शर्म और अपनी अक्षमता भूत की तरह मुझमें बनी थीं. मुझे नहीं लगता, आर्मी के फेंके हुए गद्दे पर मेरे नीचे पड़ी उस लड़की से मुझे कुछ फर्क पड़ा था.

   
उसकी आँखें सूनी लग रही थी पर जैसे ही मैं स्खलित होने को आया उसकी आँखों में उत्तेजना की चमक लहराने लगी. उसके शरीर में एकदम तनाव आ गया और अपने हाथ एवं पैरों से उसने मुझे बुरी तरह जकड़ लिया. उसी क्षण मेरे दिमाग में आया कि यही तो है, जिसके लिए अल्वारो जीता है. मैं फिर सक्रिय हो गया था.
इसके बाद भी मैं और अल्वारो बुझे-बुझे थे. एस्टेट के पास आकर अल्वारो चौकन्ना हो उठा था. मेरे लिए प्रवेश द्वार ;जो कि अधखुला थाद्ध पर एक प्रेशर लैम्प जलाकर छोड़ा हुआ था. एना अपने दादा के नक्काशीदार पलंग पर सोई पड़ी थी. कोई दो घण्टे पहले मैं उसके बारे में गलत.सलत सोच रहा था, अब मुझे एक शॉवर कि ज़रूरत थी ताकि उसके पास जाकर लेट सकूँ. बाथरूम की पुरानी फिटिंग, पुर्तगीज गीजर, शॉवर का मुहाना, टूटी-फूटी लोहे के सहारे लगी वॉशबेसिन सब मुझे अजनबी मालूम पड़ रहे थे. उन्हें देखकर मैं उस नक्काशीदार पलंग पर सोने वालों के बारे में सोचने लगा था- एना ने दादाजी, उनकी अफ्रीकी पत्नी और बच्चे, एना की माँ, जिसने अपने पति के साथ छल किया था, उसका प्रेमी, एना के पिताजी जिन्होंने सबको छला था, एक-एक कर मेरे दिमाग में घूम रहे थे. मुझे यह याद नहीं आया कि आज शाम मैंने भी एना के साथ कोई गंभीर छल किया था. सच्चाई यह है कि जो कुछ भी हुआ, सब फालतू था, ना तो उससे मुझे कोई उत्तेजना आई, न मैं पूरी तरह संतुष्ट ही हुआ. लेकिन मेरे दिमाग में वह चित्र अंकित हो गया था जब ऐन स्खलन के दौरान लड़की उत्तेजना से मुझे देख रही थी और मैं उसके छोटे से शरीर का ताकत भरा कसाव महसूस कर रहा था.
   
जैसे लम्बी, कठोर या खतरनाक यात्रा के बाद भी सोते हुए किसी ड्राइवर के मानस में रास्ते के दृश्य आते रहते हैं, एना के बगल में लेटे हुए मुझे भी बार-बार उस लड़की की कौंध आ रही थी. शहर किनारे स्थित वह मालगोदाम, वे नीली बत्तियाँ और डांस फ्लोर मुझे एक हफ्ते के भीतर ही फिर वहीं खींच लाए थे. लेकिन इस बार मैंने एना से कोई बहाना नहीं बनाया.

अब मुझे सेक्स का एक नया आइडिया मिल गया था, मैं अपनी क्षमता को भी नए ढंग से लेने लगा था. दरअसल हम सब यौन भावनाओं के साथ पैदा होते हैं, यौन कुशलता के साथ नहीं. इसके लिए कोई स्कूल भी नहीं जहाँ इसकी ट्रेनिंग ली जा सके. इत्तिफाक मिलने पर मुझ जैसे लोग काम तो अनाड़ियों-सा करते हैं और सोचते हैं कि सबसे अच्छा उन्हीं को आता है, फिर इसी को वे ज्ञान की तरह सँजोए रखते हैं. मैं तैंतीस का हो चला था और इस बारे में एना की वजह से इतना सीख पाया था, लंदन में तो मुझे कुछ आता ही नहीं था. अफ्रीका पहुँचते ही हम परस्पर उन्मादी हो चले थे. वहाँ उन्माद की और कई वजह थीं, सेक्स-डिस्कवरी के कई मौके भी थे. लेकिन शुरुआती दस सालो का उन्माद मेरी ऐन्द्रिकता (सेन्सुअलिटी) और वास्तविक इच्छाशक्ति के कारण नहीं बल्कि मेरी निराशा, अफ्रीका में होने का बच्चों जैसा डर और स्वयं को शून्य में रखने के कारण नहीं आ पाया था. दस साल बाद हमारे बीच वह बात नहीं रही. एना तो उत्तेजना के समय भी सहमी हुई लगती. जब मैंने उसके परिवारिक अतीत को जाना तब उसका डर समझ में आया. असल में हमारी हालत एक जैसी थी. तब हम बेहद नजदीक और एक दूसरे से संतुष्ट थे. हमें तृप्ति के दूसरे तरीकों का न पता था, ना ही इस बारे में हमने कभी सोचा था. अगर अल्वारो नहीं आया होता तो मैं उसी में मग्न रहता, यानी सेक्स और ऐन्द्रिकता के मामले में अपने बेचारे वंचित पिता से आगे नहीं जा पाता.
   
वह मालगोदाम कुछ समय बाद बंद हो गया, इसके बाद एकाध और भी खुले लेकिन जल्द ही बंद कर दिए गए. असल में वह शहर काफी छोटा था. वहाँ के व्यापारी, सिविल-सर्वेंट और दूसरे लोग मौज-मस्ती की इन जगहों को अपने घर-परिवार के पास पसन्द नहीं करते थे. इसलिए ये बदलती रहती थीं. वहाँ कुछ भी स्थाई तौर बनाना उचित नहीं था क्योंकि जिस सेना के भरोसे यहाँ का कारोबार टिका था, वह कभी भी जा सकती थी.
   
एक दिन मैंने ड्रेस पहने और रूज लगाए उन्हीं लड़कियों के बीच कारपेन्टर की लड़की जूलियो को देखा. यह वही नौकरानी थी, जिसने पहले दिन सुबह-सुबह कमरे के कोने में झाड़ू टिकाकर इतमीनान से ऊँचे हत्थों वाली कुर्सी पर बैठकर बड़े अदब से मुझसे बातें की थी. इसी बीच उसने बताया था कि हम एक ही तरह का खाना रोज खाते हैं. जब पितजा खूब पीकर मार-पीट करते थे तो वह अपने कमरे में घूम.घूम कर खुद को थका लेती थी, फिर सो पाती थी. बाद में पता चला कि उस लड़की ने भी अपने पिताजी की तरह पीना शुरू कर दिया था और अक्सर क्वार्टरों से बाहर रहने लगी थी. मुझे लगा जिस तरह अल्वारो मुझे गाइड कर रहा था, कहीं उसे भी कोई गाइड करने तो वाला नहीं मिल गया.
   
ख़ैर, चाहते हुए भी मैंने उसे अनदेखा कर दिया, उसने भी यही किया. हम अजनबियों की तरह पास से गुजर गए. मैंने उस बारे में चुप्पी साधना ही उचित समझा. जब हमारी दुबारा भेंट हुई तो उसने भी उस मुलाकात का कोई संकेत नहीं दिया. न उसकी आँखें फैलीं, न भौहें उठी और ना ही उसने अपना मुँह बनाया. मुझे लग रहा था कि मैंने एना के साथ विश्वासधात किया था बल्कि उसी के घर में उसका अपमान किया था.
कोरिया साल भर से बाहर थे. तभी हमें आस-पास के लोगों से खबर लगी कि जेकिन्टो मर गया. हमने कई लोगों से अलग.अलग समय में यह बात सुनी. वह लंदन के एक होटल में सोता हुआ रह गया था. अल्वारो दुःखी हो उठा था, उसे अपना भविष्य दाँव पर नज़र आया. उसने हमेशा जेकिन्टो के अनुबन्ध पर काम किया था. अब शायद कार्ला उसे हटा दे.
   


कोई महीने भर बाद कार्ला आस-पास के सभी घरों से सहानुभूति बटोरती हुई हमारे यहाँ आई. वह बार.बार उसकी अकाल मृत्यु के बारे में बता रही थी, उस रात उसने विशाल स्टोरों से काफी खरीददारी की थी. खुले पड़े पार्सल ही उसकी मृत्यु शैया बन गए थे. वह उसकी लाश को कॉलोनी में लाना चाहती थी लेकिन मिसेज नोरान्हा ने शहर के कब्रिस्तान के प्रति उसके मन में ‘बुरे ख़यालात’ भर दिए थे. इसलिए वह उसे पुर्तगाल ले गई, जहाँ जेकिन्टो के विशुद्ध पुर्तगाली दादा का अंतिम संस्कार किया गया था. तब से वह बेहद शोक में थी. बार.बार उसे वही याद आता. लिस्बन में भिखारियों को देखकर तो वह बिफर पड़ी थी, बोली- ‘’ऐसे लोग जिनके पास जीने लायक कुछ भी नहीं, जिए चले जाते हैं. जेकिन्टो के पास सब कुछ था, फिर भी वह मर गया.’’ यह नाइन्साफी उसे व्यथित किए रहती. वह सड़कों पर चीख.चीख कर रोने लग जाती. जब भिखारियों को उसकी सोच का पता चला तो उनमें से कइयों ने उसे माफ कर दिया था. (एना ने मुझे बाद में बताया कि मैं जेकिन्टो की एक बात पर अक्सर सोचती रहती थी- वह मानता था कि अगर किसी ने अच्छा.खासा कमा लिया है तो वह जल्दी से नहीं मरेगा लेकिन वह अमीर हो गया तो जरूर मर जायेगा. था न मजाक! मैं नहीं जानती थी कि यह सच भी हो जाएगा) कार्ला ने बताया कि जेकिन्टो पैसों की वजह से लोगों में आने वाले बदलाव से पूरी तरह परिचित था इसलिए कड़ी मेहनत करता था.

   
वह लिस्बन में पढ़ रहे अपने बच्चों से अक्सर कहता था कि उन्हें पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग नहीं करना है. वे प्रायः टैक्सी लेते थे ताकि लोग उनके उपनिवेशिक न होने का शक नहीं कर सके. मरने से कुछ दिन पहले उसने फिर यही कहा था. बच्चों और घर-परिवार से जुड़ी जेकिन्टो की अच्छी लगने वाली बातें सुनाते हुए कार्ला एक एस्टेट हाउस से दूसरे में रोती हुई घूमती.
   
लेकिन अल्वारो के साथ उसका व्यवहार क्रूर था. वापस आते ही उसने तीन माह के भीतर अल्वारो को परिवार सहित कंकरीट हाउस खाली करने का हुक्म सुना दिया. उसने उसे अगला काम ढूँढ़ने लायक तक नहीं छोड़ा. एस्टेट के लोगों के बीच वह उसकी जी भर कर बुराई करती. कहती- ’’वह गंदे चरित्र का आदमी है. इतनी सारी रखैलों के साथ अब वह मैनेजर की तनख़्वाह लायक नहीं बचा था. जेकिन्टो को जब राजधानी में उसकी किसी हरकत का पता चलता तो वह मुझसे कहता था कि अल्वारो का ध्यान रखो. मैं जब भी उससे हिसाब.किताब की नोटबुक लाने को कहती वह थर्रा जाता.’’ कार्ला का दिमाग जकिन्टो जितना तेज नहीं था, ना ही उसे हिसाब.किताब की इतनी जानकारी थी, लेकिन वह जल्दी ही उसकी चाल समझ गई थी, जिसके बारे में जेकिन्टो ने उसे चेताया था. वह सामान की जाली सूची बनाता है, असली सूची में हेराफेरी कर देता है, जाली मजदूर लिख देता है. ‘‘अल्वारो के समय मशीनरी तो अक्सर बिगड़ मिलती है. यहाँ तक कि सबसे आसान मशीन सीसल का जर्मन कोल्हू तक बुरी तरह बिगड़ा रहता है. हमलोग जितने दिन यूरोप में रहे, उसकी बेशर्मी बढ़ती गई है.’’
   
कार्ला ने जो भी बताया, उसकी हमें पूरी जानकारी नहीं थी. एकाध बार मूर्खतापूर्ण ढंग से अल्वारो ने जरूर संकेत किया था कि वह एस्टेट का दोहन कर रहा है. उसने यह बात मुझ सहित कई अन्य लोगों को भी बता रखी थी. वह सोचता था इससे उसे एस्टेट मालिक की तरह इज्जत से देखा जाएगा. एस्टेट के जीवन को वह गहराई से जानता था, वह उसकी ख्वाबगाह थी. उसके पिताजी ने, जो एक संकर संतान थे, अपने विशुद्ध पुर्तगाली पिता से ली गई एस्टेट में एक मैकेनिक से जीवन की शुरुआत की थी और अंत तक एक निम्न श्रेणी की ओवरसियर हो पाए थे. वे कंकरीट के दो कमरों के मकान में रहते थे. अल्वारो ने युवावस्था में ही तय कर लिया था कि उसे दुनिया में नाम रोशन करना है. मशीनों के बारे में उसकी जानकारी अच्छी थी. जानवरों और फसलों के बारे में भी उसने सीख लिया था.
   
वह अफ्रीकियों के साथ पटरी बैठाना जानता था. उसने विकास किया भी लेकिन आडम्बरी हो गया. कोरियाज के एस्टेट मैनेजर के रूप में उसे बढ़िया घर और लैण्ड रोवर मिले हुए थे, पर उसमें दिखावा बहुत था. उससे जानकारी के बाद (और उसकी असलियत पता चलने से पूर्व) वह मुझे प्रायः उपहार आदि भेंट करता, फिर कहता- ’’मैंने जो भी आपको दिया है, सब कोरियाज से लूटा हुआ माल है.’’
   
इस तरह बेनकाब और तिरस्कृत होने के बाद भी मुझे उसके प्रति दुख था, क्योंकि एस्टेट हाउस से उसका परिवार चल रहा था और वही उसकी पसंदीदा जगह थी. उसका परिवार सचमुच जाने वाला है सोचकर मुझे आश्चर्य होता. उन्हें निकलने के आदेश मिल गए थे. जल्दी ही उन्हें कंकरीट हाउस छोड़ देना था. ऐसा दूसरा घर मिलने में समय भी लगता है.
“वह शायद उन्हें भूल जाए.’’ एना बोली, पर मैं इस पर ज्यादा सोचना नहीं चाहता था, शायद उसकी बात सही थी. अल्वारो ने मुझे कभी अपने परिवार के बारे में नहीं बताया था; अपने बच्चों के नाम या लक्षण तक भी नहीं. मैंने उन्हें सड़क से ही देखा था, वे अफ्रीकन ग्रामीण बच्चों के मिलते-जुलते थे. वे कभी कंकरीट हाउस के छोटे बरामदे से झाँक रहे होते, कभी सरकंडों की छत वाली रसोई से निकलकर पीछे की ओर भागते दिखते. मैं सोच रहा था कि यदि अल्वारो को कोई नया काम मिल जाए तो उसे जाने में केई दिक्कत नहीं होगी. वह फिर उसी ढर्रे पर आ जाएगा. नई जगह पर भी वह किसी औरत से सम्बन्ध कायम कर लेगा. आस-पास की औरतों के साथ भी शुरू हो जाएगा. तब शायद यहाँ से निकाले जाने के वह कृपा के रूप में ले. वह सब चीजों के साथ फिर संगति बना लेगा.
   
मैंने उसे कई हफ्तों से नहीं देखा था. मालगोदाम जैसी जगहों पर भी हमें साथ गए लम्बा समय हो गया था. एक दिन सड़क पर हमारी मुलाकात हो गई, वह कुछ बुझा हुआ था, चेहरे पर अपमान और चिन्ता की रेखाएँ साफ दिख रही थीं.
उसने कहा- ‘‘पता नहीं विली, साले ये लोग क्या समझते हैं ? सब कुछ धुएँ की तरह उड़ चुका है. ये कभी लिस्बन, पेरिस तो कभी लंदन जा रहे हैं, बच्चों की पढ़ाई की बात कर रहे हैं. सब ख़याली पुलाव (भ्रम) में हैं. ‘‘मुझे लगा वह अपने स्वर्गीय मालिक की तरह भविष्यवाणी कर रहा था, पर बात सच थी. ’’गुरिल्लाओं का पड़ाव सीमा के बिल्कुल नजदीक आ लगा है. सरकार भी उन्हीं की तरफ है. यह कोई अफवाह नहीं, वे वास्तविक गुरिल्ला हैं. वे बढ़ना शुरू करेंगे तब उनसे निपटने का मुझे कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा.’’ उसने फिर कहा.
   
कई हफ्तों से शहर में सैनिक कम होते गए थे. जंगल के उत्तर ओर पश्चिम में आर्मी के युद्धाभ्यास की बातें भी सुनाई पड़ रही थीं. इन पर अखबारों ने ज़्यादा नहीं लिखा था. मैंने अल्वारो से ही इस बारे में सुना था. उसने मुझे इस घोषणा की जानकारी भी दी कि आर्मी द्वारा सफलतापूर्वक उत्तर और पश्चिम का क्षेत्र छान लिया गया है और अब सीमा की ओर बढ़ रही है. आर्मी ने इसके बाद शहर में लौटना शुरू कर दिया था. सब कुछ फिर पहले की तरह हो चला था. मौज-मस्ती की जगह फिर आबाद होने लगी थीं. लेकिन तब से मेरा और अल्वारो का साथ टूट गया था.
   
मौज-मस्ती की इन जगहों से अब मेरा मन उचट रहा था. इसका एक कारण तो यह था कि कहीं जुलियो (कारपेन्टर) की लड़की दुबारा से न दिख जाए. लेकिन असली मुद्दा वहाँ सेक्स के तरीकों का था. वहाँ उत्तेजना के लिए प्रायः खुलेआम, मशीनी और पशुवत रवैया अपनाया जाता था.
   
मैंने पहले साल से ही अपने मन में हिसाब रखना शुरू कर दिया था कि मैं कितनी बार कहाँ गया. लंच, यात्राएँ, इन गर्म कोठरियों के उजले-गहरे पल, बाहर की घटनाएँ जब उसमें जुड़ते जा रहे थे. मानो अगले वर्ष के लिए मेरा एक खास कलैण्डर तैयार हो रहा था. धीरे-धीरे ऐसा लगने लगा मानो मैं किसी जरूरतवश नहीं कैलेण्डर का हिसाब रखने के लिए बाहर जाता था. इसके बाद तो मैं बस अपनी क्षमता का टेस्ट करने वहाँ जाता. ऐसे मौकों पर कई बार मैं अपने साथ जबरदस्ती करता और चाहता कि स्खलन का क्षण आगे न बढ़े, जितना जल्दी हो सके, हो जाए. पर लड़कियाँ अभी भी वैसे ही तैयार मिलतीं- अपनी लचक भरी चाल-ढाल और ताकत से लैस, जिनमें से एक ने पिछली बार मुझमें सनसनी जगा दी थी. मैं हर चीज़ के प्रति नए ढंग से देखने लगा. लेकिन अब वह बात नहीं रही थी. मेरा यौनांग सूख-सा गया था. मुझे पुनः तैयार होने के लिए एक-दो दिन लगने लगे थे. इतना क्लान्त होने के बावजूद मैंने एना से प्यार करना शुरू कर दिया ताकि हमारी नजदीकियाँ फिर प्रगाढ़ हो जाएँ, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ . वैसे भी वह प्रगाढ़ता सेक्स की वजह से नहीं थी. मेरी लम्बी अनुपस्थिति ने भी उसे नहीं चिढ़ाया बल्कि वह पहले की तरह सहमी बनी रही. मेरी वजह से उसे तो थोड़ा-बहुत आनंद मिला भी पर मुझे कुछ नहीं हुआ था. इस हालत में मैं उससे ज्यादा परेशान और अतृप्त था, तभी शहर के एक कैफे में मुझसे अल्वारो ने पूछा था- ’वे क्या करती हैं, आप देखना चाहते हैं ?’’ उस तरह की यौन-जिन्दगी से परिचय के पूर्व मुझे पता ही नहीं था कि मैं कुछ खो रहा हूँ.
कार्ला ने घोषणा की कि ज्यों ही उसे नया मैनेज़र मिलेगा वह पुर्तगाल चली जाएगी. इस खबर से हम और कार्ला के एस्टेट हाउस के लोग उदास हो उठे थे. अगले कई हफ़्ते हमने उसे मनाने और अपना विचार बदल देने की कोशिश की, असल में हमें उसकी चिन्ता नहीं थी, उसके जाने से होने वाले दुःख से बचने के लिए हम ऐसा कर रहे थे.
   
हमें उससे ईर्ष्या भी कर रहे थे. कार्ला के जाने का मतलब कोरियाज का हमारी खास दुनिया से गायब हो जाना था, सोचते ही हमारी हालत बिगड़ने लगती थी. यह एक नए किस्म का डर था जिससे हम अक्सर बचते थे लेकिन इससे भी हमारी जीवन-शैली को एक नया ढंग मिला था. एना भी ईर्ष्या से कह रही थी- (प्रायः वह किसी से नहीं चिढ़ती थी) ‘‘कार्ला कहती है कि वह घर में अकेली नहीं रह सकती इसलिए जाना पड़ेगा. वास्तव में वह केवल वही कर रही है जैसा जेकिन्टो ने उससे कहा था.’’
   
जल्दी ही नया मैनेजर ढूँढ लिया गया. वह कार्ला की कान्वेंट स्कूल की एक सहेली का पति था. कार्ला ने उस दम्पत्ति की सहानुभूति जीत ली थी, क्योंकि भाग्य ने उसके साथ बुरा किया था. वे मैनेजर के क्वार्टर में रहने नहीं गए. अल्वारो और उसके परिवार ने वह जगह और उनके द्वारा बनाई गई उसी झोंपड़ी को बड़े दुःखी मन से छोड़ा. वे एस्टेट हाउस में रहने जा रहे थे. एना ने बताया कि कार्ला बुरे वक्त में साथ देने वाली अपनी सहेली की दान करने की कह रही है, लेकिन उसे घर को सही ढंग से रखना पड़ेगा. उसके यूरोप जाने के बाद यह बिखर गया था. मुझे लग रहा था कि आने वालो सालों में अगर भाव अच्छे लगे तो कार्ला उसे बेच सकती थी .
   
कार्ला की विदाई के उपलक्ष्य में हमने रविवारीय लंच रख लिया और उसी समय उसके नए मैनेजर से मुलाकात तय कर ली. मैं उसके बारे में कुछ नहीं जानता था कि कुछ नोटिस करता. लेकिन उसमें झगड़े निपटाने का गुण लगा. देखने में वह चौकन्ना लगता था. संकर कुल का वह आदमी अफ्रीकन कम पुर्तगाली ज्यादा लग रहा था, लेकिन दिखने में भला था. कोई चालीस की उम्र होगी उसकी. वह सबके साथ नम्र और औपचारिक ढंग से पेश आ रहा था. उसका व्यवहार कुछ अलग ढंग का था लेकिन वह अच्छा प्रभाव जामने की कोशिश में था. उसकी आँखें बड़ी निरपेक्ष किस्म की थीं, मानो वह जो कर रहा था उससे उनका कोई सम्बन्ध ही न था. उसके ऊपरी होंठ का उभार कुछ बोलता प्रतीत होता था तो निचला होंठ भरा-भरा, मुलायम और चमक लिए हुए था. जिससे उसका चेहरा किसी रोमानी आदमी (ैमदेनंसउंद) का सा लग रहा था.
   
मिसेज नोरोन्हा ने कुर्सी में धँसते हुए मुँह उठाया और अपने खास अंदाज में बोली- 

’‘अशुभ समय … अशुभ निर्णय… पुर्तगाल में तुम्हें बहुत परेशानियाँ आने वाली हैं. तुम्हारे बच्चे तक इसका कारण बनेंगे.’’ लेकिन कार्ला ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया, दो साल पहले वह आत्माओं के नाम से ही उछल जाती थी. हम सब उसके यहाँ लाइन में लगे थे. हमने भी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं लीय सोचा जो कुछ हुआ अथवा हो रहा है वह कार्ला और नोरोन्हा का आपसी मसला है. शायद मिसेज नोरोन्हा ने भी भाँप लिया कि वह अपने को ज्यादा कुछ ज्यादा ही गिन बैठी थी. उसने अपना सिर झुका लिया और गुस्से और शर्म से फुँफकारने लगी. मानो वह अभी अपने दुबले-पतले, और खिंचे हुए चेहरे वाले पति को इशारा देंगी और हम मिश्रित लोगों का तिरस्कार करते हुए यहाँ से चली जाएगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हमारा लंच कोई डेढ़ घण्टे चला तब तक उसने अपना स्वभाव बदल दिया था, वह आम ढंग से बतियाने लगी, अंत में तो उसने कार्ला के पुर्तगाल जाने को अच्छा भी बता दिया. यह थी उसके भविष्यवक्ता की भूमिका के अंत की घोषणा. वह आसानी से छीज गई थी. नोरोन्हा पहले जितने महत्त्वपूर्ण नहीं रहे थे. उन्होंने सीमा-क्षेत्र, जाति अथवा सामाजिक हैसियत के समाचारों की जो अफवाहें फैलाइंर्, वे अब खत्म हो चली थी.
   
जैसे ही हम लंच करके चुके मेरा सामना ग्राशा से हो गया. ग्राशा नये मैनेजर की पत्नी और कार्ला की कान्वेंट स्कूल की सहेली थी. नज़रें मिलते ही मुझे उसकी आँखें कुछ व्याकुल लगीं. जिन्होंने मुझे उसके पति के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया. उसने मेरी ओर दो-तीन सैकण्ड जिस तरह देखा, उससे पहले किसी ने नहीं देखा था. मैं उसी पल समझ गया कि वह मुझे एना का पति अथवा किसी बाहरी मूल का होने के कारण नहीं बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देख रही थी जिसने अपना काफी समय मौज-मस्ती की जगह या कोठों पर बिताया था. सेक्स हमें कई रूपों में आकर प्रभावित करता है और मुझे लगता है हमारा चेहरा हमारे कुल अनुभवों का आइना है. ख़ैर, बात आई गई हो गई थी. किसी औरत की आँखें पढ़ने के क्रम में मैं फैंटेसी में चला गया था. मानो औरतों की एक और चीज जानकर मैंने कोई खोज़ कर डाली अथवा मेरी इंद्रिय-शिक्षा में कुछ इजाफ़ा हो गया था.
   


दो हफ्ते बाद मेरी मुलाकात उससे शहर में एक राष्ट्रीय कार्यक्रम के अवसर पर हुई. इसमें मेहमान-जनरल  के सम्मान में मिलिटरी परेड का आयोजन होता है. यह कार्यक्रम इतना भव्य होता है कि विश्वास नहीं होता. सब जानते थे कि वहाँ इकट्ठा हुई आर्मी अफ्रीका में लम्बे युद्ध के खिलाफ़ है, उसका ज्यादा ध्यान वहाँ घरेलू परिस्थितियों बनाने के लिए होता. बॉर्डर पर शांति बनाए रखने के लिए जनरल की प्रशंसा की जा रही थी. (हमें काफी देर बात पता चला कि) मोर्चेबंदी के लिए आर्मी को सीमा के आस-पास पूरी तरह फैला देना बेहतर होता है. उनके साथ एक मजबूत चल.सेना  भी होती है जो जरूरत पड़ने पर कहीं भी पहुँचकर वहाँ की सेना से जुड़ जाती है. शनिवार की उस सुबह शहर में आर्मी के चलते अमन कायम था. झण्डारोहण के बाद भाषण आदि दिए गए, फिर बैण्ड की धुन के साथ परेड आरम्भ हुई. हम जवान.बूढे़, अफ्रीकी, पुर्तगाली, मिली-जुली दुनिया के लोग, व्यापारी, लोफ़र अथवा बाल.भिखारी सबने खड़े होकर ड्रेस पहने और हाथ में तलवार लिए देशभक्ति के नारे लगाते जवानों को डर बैण्ड धुन पर मार्च करते देखा.

   
इसके बाद मेहमान-जनरल को शहर स्थित गर्वनर के आवास पर भोज दिया गया. जो ऐसे ही मौकों पर खुलता था. यह गर्वनर हाउस कॉलोनी और शहर की सबसे पुरानी इमारतों में से एक था. कुछ लोग इसे ढाई सौ वर्ष पुराना बताते थे, लेकिन यह कितना सच था, पता नहीं. पत्थर और मलबे से चौकोर और समतल बनाई गई इसकी दुमंजिला इमारत सामने से एकदम साधारण लगती थी. शायद पुराने जमाने में गर्वनर यहीं रहते थे अथवा यात्रा के दौरान कभी.कभार यहाँ आकर ठहरते थे. लेकिन अब इसमें कोई नहीं रहता था.
   
अब यह अजायबघर और ऐतिहासिक स्मारक बन गया था. इसकी निचली मंजिल हफ्ते में एक दिन आम जनता के लिए खोली जाती थी. मैं वहाँ दो-तीन बार गया था पर कोई नहीं मिलता, वहाँ ज्यादा कुछ देखने को था भी नहीं- एक ताज़ा रंग की हुई नाव ज़रूर थी, कहते हैं वास्को द गामा ने यहाँ तट तक आने के लिए उसका इस्तेमाल किया था. इसे लंगर के सहारे बाँधा जाता था, जो कई बार छोटे भी होते. लकड़ी की पतवारें प्रायः लम्बी होती थीं, इस नाव को पटरे के सहारे साथ-साथ रखा गया था, जिनमें बढ़ई के भारी-भारी औजारों, विंच, लम्बी-लम्बी पुरानी रस्सियों के साथ उनके काम की कलाकारी साफ नज़र आती थी. यह ऐतिहासिक नाव ऐसी थी जैसे परिवार द्वारा रखकर भुला दी गई रद्दी, जिसे फेंकने का मन नहीं करता, लेकिन उसके प्रति कोई सम्मान भी नहीं होता, ना ही उसकी कोई पहचान या फिर कोई उपयोग ही बचा है.
   
आगे एक और सीढ़ी थी, जिस पर मैं कभी नहीं गया था. वह एक बड़े अंधेरे कमरे में खुलती थी. उसके फर्श की चौड़ी टाइलें अंधियारे में भी चमक रही थीं. मोटी-मोटी दीवारों में नीले आसमानी रंग के शटर लगे थे, छत का रंग लगभग उड़ चुका था. कुल मिलाकर सजावट बहुत प्रभावशाली नहीं थी. कमरे में चारों तरफ भूतपूर्व गर्वनरों के चित्र लगे हुए थे, जिनमें एक जैसे रंग और रेखाओं का प्रयोग किया गया था. इनके शीर्ष पर रंग से ही प्राचीन लिपि में उनके नाम लिखे थे, जिन्हें राजकीय सांस्कृतिक विभाग की समिति द्वारा प्रस्तावित किया गया था. बढ़िया व्यवस्था समायोजन के कारण वहाँ भव्यता का अहसास होता था. कमरे का शाही फर्नीचर इसे और बढ़ाता था. यह फर्नीचर तेन्दु या ऐसी ही किसी काली लकड़ी का बना था और इस पर इतनी जटिल और महीन नक्काशी की गई थी कि उसमें खोह.सी नजर आती थी. यह बैठने के लिए नहीं, केवल प्रदर्शन के लिए था.
   
यह फर्नीचर गर्वनरों की शक्ति का प्रतीक लग रहा था. यह भी इस बिल्डिंग जितना ही पुराना थ. मेरी बगल में गोवा (भारत) की पुर्तगाली कॉलोनी के एक अधिकारी खड़े थे. उनके अनुसार फर्नीचर की यह सारी कलाकारी गोवा में की गई थी.
   
यह सुनकर पता नहीं क्यों मैंने अपने को आकस्मिक रूप से घर के बेहद नजदीक महसूस किया. मैं गर्वनर हाउस के ढाई सौ साल पीछे पहुँच गया था, ताकि समय के कुछ अवशेष देख सकूँ.
आसमान हमेशा की तरह साफ़ है, बरसात का मौसम छोड़ दे तो समुद्र भी शांत है, छोटे-छोटे जहाज आकर कुछ देर के लिए लंगर डाल रहे हैं. शहर अभी व्यवस्थित नहीं हुआ लेकिन विकास की दिशा में है. सड़क मार्ग नहीं होने से आम जनता बाहरी सम्पर्क से कटी है, अपने पिछड़ेपन के चलते थोड़ी.सी परेशानी आने पर ओझा जैसे लोग बुलाए जाते हैं. मुझे पक्का यकीन था कि अगर यह अफ्रीका न होकर भारत या गोवा होता तो उनके हाथ महीनों अथवा सालों तक गर्वनर की शाही कुर्सियाँ और सोफे बना रहे होते. यह अपने इतिहास को नए रूप में देखना था. लंदन के बहुत सारे हिस्से इन्हीं ढाई सौ सालों में समृद्ध हुए थे, उन्हीं में कुछ मौज.मस्ती के लिए विकसित हुए थे. भारत में तो हम अपने शहर के उस विख्यात मंदिर से ही चिपके रहते. लेकिन यहाँ गर्वनर हाउस से अपना इतिहास आदि सब कुछ कोसों दूर लगता है, जो कितना भयानक है.
   
कमरे में कोई सौ लोग रहे होंगे, उनमें ज्यादातर पुर्तगाली थे. लेकिन मेरी तरह शायद ही कोई सोच रहा था. उनकी दुनिया अफ्रीका तक ही सीमित था. मुझे नहीं लगता इतने सारे भाषणों, बहस और समारोहों के बीच किसी को कोई ऐसा सवाल सूझा हो, ये सब संतुष्ट लग रहे थे. उस ऐतिहासिक कमरे में हँसते हुए बातें कर रहे थे, जैसे उन्हें कोई चिन्ता नहीं. जैसे वे अपने इतिहास के साथ जीना जानते थे. इससे पहले मैंने कभी पुर्तगालियों की इतनी प्रशंसा नहीं की थी (!) मुझे लगा, मेरे लिए भी अतीत के साथ जीना ज्यादा आसान था पर हमने तो शुरुआत ही उल्टी दिशा से की थी.
   
इस बीच मैं ग्राशा के बारे में लगातार सोच रहा था- वही कार्ला की कॉन्वेंट स्कूल की सहेली और नए मैनेजर की बीवी. जब मैं ऊपर वाले कमरे में था तो वह एक बार के लिए दिखी थी. मैंने उसे या उसके पति को परेड के समय नहीं देखा, हालाँकि मैं उसे वहाँ देखने नहीं गया था. यह मेरा सौभाग्य ही रहा होगा, एक तरह का उपहार समझिए- बिना खोजे उसका दिख जाना. मैं उस पर कोई दबाव नहीं चाहता था. ना ही उसके अलगाव के बारे में जानता था, जो मुझे कार्ला ने बताया. शायद मैंने उसकी आँखें गलत पढ़ ली थीं. मैं सोच रहा था काश, हम संयोग से अचानक एक.दूसरे के सामने पड़ जाए. और कुछ देर बाद यही हुआ. हम गोवा निर्मित एक सोफे के पास, जहाँ एक पुराने गर्वनर का चित्र लगा था, टकरा गए. वह भी अकेले थी. उसकी आँखें मुझे फिर वैसी ही लगीं. मेरी वासना भड़क उठी. लेकिन यह वासना लंदन की तरह मूक और स्वार्थी किस्म की नहीं थी बल्कि सामने वाले के प्रति ज्ञान, अनुभव और वास्तविक प्रेम से सम्पन्न थी. लेकिन अचानक मुझे शर्म ने घेर लिया. मुझे उससे आँखें मिलाने का साहस नहीं हो रहा था, उनमें आमन्त्रण झलक रहा था.
   
“मैं आपसे मिलने वाला था.’’ मैंने कहा.
‘’मेर पति के साथ!’’ उसने पूछा. इस तरह वह बेचारा रास्ते से हटा दिया गया था.
   
“पता है, यह बेवकूफी भरा सवाल है.’’
   
“चलिए, आप मुझे कब मिलने वाले थे !’’ उसने फिर पूछा.
   
“कल, आज… कभी भी! मैंने कह दिया.’’
“आज यहाँ एक बड़े भोज का कार्यक्रम है और कल हमारे यहाँ रविवारीय लंच का आयोजन किया गया है.’’ उसने मेरी बात लेते हुए बताया.
   

‘‘मैं आपसे सोमवार को मिलूंगा. उस दिन तुम्हारे पति बादाम और रूई के मोलभाव पर सरकारी नुमाइन्दो- से बात करने शहर जाएंगे. उनसे कहिए तुम्हें घर ले आएँ. हमारा घर उनके रास्ते में ही पड़ता है. हम हल्का.सा लंच लेंगे, इसके बाद मैं तुम्हें वापस घर छोड़ दूँगा. रास्ते में हम जर्मन कैसल (दुर्ग) रुक जाएंगे.’’

   

‘‘जब हम कॉन्वेंट स्कूल में थे तो कभी-कभार जर्मन दुर्ग घूमने जाया करते. उसके बारे में अफ्रीकी कहते हैं कि वह भुतहा है. जिस जर्मन ने उसे बनवाया, वही उसमें भूत बनकर रहता है.’’ 


उसने बताया.

   
सोमवार को लंच के बाद मैंने एना से कोई बहाना नहीं किया. मैं ऐसा चाहता तो नहीं था लेकिन अगर वह कोई विरोध करती तो किसी भी स्थिति के लिए मन बना चुका था. साधारण ढंग से बोला- ’‘मैं ग्राशा को उसके घर छोड़ने जा रहा हूँ.’’ एना ने इस पर जैसे ध्यान नहीं दिया, वह ग्राशा से बोली- ‘’खुशी हुई कि आपलोग व्यवस्थित हो गए.’’
   
जर्मन दुर्ग बहुत दिनों से परित्यक्त एस्टेट हाउस था. मैं सालों से सुनता आ रहा था कि आजकल उसका प्रयोग गुप्त.मिलन के लिए होता था. जाते समय मेरे दिमाग में यही घूम रहा था. मैंने घण्टे भर खूब तेजी से गाड़ी दौड़ाई, जगह-जगह दूरी के संकेत के लिए छोटे.छोटे पत्थरों पर नीला रंग किया हुआ था. आस-पास के खेत रेतीले, खाली-खाली और अर्द्ध-उपजाऊ थे. गाँव रेत और हरियाली से ढँके जान पड़ रहे थे. इन खाली खेतों के पार जर्मन दुर्ग दूर नजर आ रहा था. वह काफी लम्बा-चौड़ा और शाही प्रतीत होता था. आगे बरामदे के दोनों ओर बनी बुर्जें भी काफी ऊँची थी. इन बुर्जों के कारण ही वह दुर्ग के रूप में जाना जाता था. जिस आदमी ने इतना विशाल किला बनवाया, उसने सोचा होगा कि वह अमर हो गया है या फिर उसने इतिहास की दिशा बदल दी है. सोचता होगा वह अपनी संतानों के लिए अकूत ऐश्वर्य छोड़ कर जाएगा.
   
यहाँ लोगों को किसी भी चीज़ की तारीख नहीं पता, कोई पूरी तरह नहीं जानता कि यह जर्मन दुर्ग कब बना ? कुछ लोगों का मानना था कि इसे 1920 के आस-पास एक जर्मन प्रवासी  द्वारा बनाया गया था जो 1914 के विश्वयुद्ध के बाद जर्मनी से पूर्वी अफ्रीका के पुर्तगाली क्षेत्र में आया था. कुछ इसे निराश और आगामी युद्ध से दूर जाने के आकांक्षी एक स्वाभिमानी जर्मन द्वारा 1930 में बनाया मानते थे. लेकिन मौत का इतिहास लिखा जा चुका था और हमारे समय के बहुत पहले ही यह दुर्ग छोड़ा जा चुका था; कब, कोई नहीं बता सकता. मैं अपना लैण्ड रोवर दुर्ग के गार्डन में काफी अंदर तक ले गया था. उसका गार्डन काफी बड़ा था, जिसमें कंकरीट के दोनों ओर ढेर सारे फूल लगे थे. लेकिन अब वह उजाड़ और बंजर हो चला था. बस इधर-उधर घास के गुच्छे उगे थे, कुछ लम्बे तने वाले ‘जीनियास’ और जामुनी बोगनविलिया की बेलें भी बेतरतीब ढंग से बढ़ी थीं. बुर्ज के चारों ओर सुरक्षा को देखते हुए छेद बनाए हुए थे. विशाल और अधखुले दरवाजों से कमरे के भीतर फैला स्याह अंधेरा झाँक रहा था. फर्श पर धूल-मिट्टी जमा थी जिसके कण हवा में भी उड़ रहे थे. कुछ बड़े कण घोंसला बनाने वाले पक्षियों ने वहाँ ला डाले थे. वहाँ अजीब-सी मछली जैसी गंध आ रही थी. मुझे लगा इमारत में सफाई के बिना सड़न पैदा होने से ऐसा हो रहा होगा. अपने साथ मैं आर्मी की रबर सीट लेता गया था. हमने उसे बरामदे में बिछाया और लेट गए.
   
देर तक गाड़ी चलाने से थकान महसूस हो रही थी, लेकिन ग्राशा मेरी जरूरत समझ रही थी. यह मेरे लिए नई बात थी. मुझे लंदन की लुका-छिपी, वहाँ स्थानीय क्षेत्रों की उबाऊ वेश्याएं, यहाँ के कोठों पर पैसों में पाई गई अश्वेत लड़कियाँ, जिनके साथ मैं पिछले एक साल से तृप्ति पा रहा था, सब याद आ रहे थे. साथ ही, बेचारी एना- एक भोली-सी लड़की- जो मेरे साथ लंदन कॉलेज में सोफे पर बैठी की और मेरे चुम्बन पर कोई एतराज़ नहीं करती. वह आज भी वैसी ही भोली और उदार थी.
   
मैं अगले आधे घण्टे में स्खलित हो गया था. सोच रहा था काश यह आराम से होता तो कितना अच्छा होता. मैं संवेदना की गहराई में पहुँचे बिना ही पस्त हो गया था. मैंने अपने में एक और विली महसूस कर रहा था, जिसका एक मूल्य था, एक प्रासंगिकता थी.
   
तभी एक आवाज सुनाई दी. हमने ध्यान नहीं दिया. कुछ देर बाद फिर किसी ने पुकारा. कोई गार्डन की ओर से आवाज दे रहा था, मैंने कमीज पहनी और बरामदे की आंधी ऊँची दीवार के पीछे जाकर खड़ा हो गया. गार्डन के दूसरे छोर पर एक अफ्रीकी राहगीर खड़ा था और किले में हमें देखकर सहमा हुआ था. मुझ पर नजर पड़ते ही वह हाथ उठाकर चिल्लाया- ’‘इस किले में कोबरा फुँफकारते घूमते हैं.’’ उसने बताया कि जिसे हम मछलियों की गंध समझ रहे थे, वह असल में साँपों की गंध है. गीले सूखे जैसे भी थे, हमने उठकर तुरंत कपड़े और गार्डन से सड़क पर आ गए. अपने नजदीक साँपों की बात सुनकर हम डर गए थे. लैण्ड रोवर में पहुँचकर हमने पूरे कपड़े पहने थे. इसके बाद चुपचाप वहाँ से चल दिए.
कुछ देर बाद मैं ग्राशा से बोला- ‘’चलते समय मुझे अपने शरीर में तुम्हारी गंध महसूस हो रही है.’’ हालाँकि यह स्वाभाविक बात थी, फिर भी पता नहीं मैं कैसे कह गया. ’‘मुझे भी तुम्हारी आ रही है.’’ मुझे उसके उत्तर पर प्यार हो आया. मैंने अपना दाहिना हाथ उसकी जाँघ पर रख लिया. और खेदपूर्वक अपने माता.पिता के बारे में सोचने लगा, जिन्हें इन सबके बारे में कुछ नहीं पता था. मेरी जिन्दगी ग्राशा के आस-पास सिमटने लगी थी, मुझे किसी की चिन्ता नहीं थी. कभी-कभार मैं अपने पर आश्चर्य करने लगता, मैं कैसा था और अब क्या बन चुका था. मुझे घर पर घटी एक घटना याद आ रही थी. यह कोई पच्चीस बरस पहले की बात होगी. तब मैं दसेक साल का रहा होऊँगा.
‘‘शहर का एक व्यापारी मेरे पिता से मिलने आया. वह काफी अमीर था, धार्मिक संस्थानों को खूब दान करता था, फिर भी लोग उससे चिढ़े रहते थे क्योंकि वह निजी जिंदगी में काफी बेशरम बताया जाता था. पता नहीं, इसका मतलब क्या था लेकिन मेरी माँ के अंकल द्वारा सिखाए गए क्रांतिकारी सबक के चलते मुझे वह आदमी और उसकी सम्पति घटिया लगे. उसे जीवन में एक झटका लगा था, वह धर्मपरायण आदमी था इसलिए मेरे पिता के पास उसके समाधान हेतु सुझाव लेने आया था. अभिवादन के बाद उनकी बातचीत होने लगी. थोड़ी देर में उसने कहा- ’’महाराज, मैं एक परेशानी में फँस गया हूँ …’’कहकर वह थोड़ा रुका, मेरे पिता उसको देखते रहे. फिर बोला- 

‘‘महाराज, मैं राजा दशरथ की तरह हूँ.’’ दशरथ एक पवित्र और महान नाम था, वह कोसल की प्राचीन राजधानी के शासक और अवतार राम के पिता थे. कहकर व्यापारी मुस्कराने लगा था मानो उसने बहुत अच्छी और सच्ची बात कही थी. लेकिन मेरे पिता को इससे कोई खुशी नहीं हुई. उन्होंने गंभीर होकर पूछा- ’‘आप राजा दशरथ की तरह कैसे हैं ?’’ व्यापारी मेरे पिता के स्वर को भाँप गया था पर उसने मुस्कुराना नहीं छोड़ा- ’‘मैं पूरी तरह दशरथ जैसा नहीं, उनकी तीन बीवियाँ थी, मेरे पास दो हैं और महाराज यही मेरी परेशानी की जड़ है.’’ 

पिताजी से और नहीं सुना गया- 

‘‘तुम्हारी भगवान से अपनी तुलना करने की हिम्मत कैसे हुई ? दशरथ पूज्य थे. उनके शासन काल मे सदाचारिता, धर्मपरायणता अपने शिखर पर थीं. उनका बाद का जीवन तो ‘बलिदान’ से भरा था. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई कि तुम अपनी और अपनी गंदी बाज़ारू वासनाओं की तुलना ऐसे महान आदमी से करो ? अगर मैं अंहिसा का पुजारी नहीं रहा होता तो अभी तुम्हे धक्के मारकर आश्रम से बाहर कर देता.’’ 


दरअसल पिता जी के लिए यह घटना आत्मसम्मान का मुद्दा बन गई थी. हम बच्चे थे लेकिन व्यापारी की बेहयाई से हमें भी पिताजी की तरह उसकी धृष्टता पर हैरानी हो रही थी.’’

   
दो पत्नियाँ और दो परिवार रखना प्रकृति के साथ खिलवाड़ है. नकली व्यवस्था और नकली लगाव हमेशा झूठ पर टिके होते हैं. यह हम सबका अपमान करना था, बल्कि सारी दुनिया को एक तरह से बलुई दलदल में धकेलना था.
   
दस साल की अवस्था में ही मैं इस बात से दो-चार हो गया था, लेकिन मैं तब भी रोज बेशर्मी से एना का सामना करता. जब ग्राशा के पति लुइस को देखता तो उससे दोस्ती का भाव दर्शाता था, ग्राशा के प्रति मेरे प्यार को देखते हुए यह एक जरूरी कृतज्ञता ज्ञापन लगता.
   
जल्द ही मुझे पता चल गया कि वह पियक्कड़ था. हमारी पहली मुलाकात में वह गंभीर लग रहा था, उसने स्वयं को जान-बूझकर गंभीर बना रखा था क्योंकि उसे आत्मपीड़ा महसूस हो रही थी. ग्राशा ने बताया कि वह सारा दिन लगातार शराब पीता था मानो वही उसे चलने-फिरने की ताकत देती थी. वह थोड़ी-थोड़ी मात्रा में रम या व्हिस्की लेता रहता था, लेकिन कभी पीया हुआ या कंट्रोल से बाहर नहीं दिखा. असल मे ज्यादा पीने की आदत ने उसका खाना कम कर दिया था. ग्राशा का सम्पूर्ण वैवाहिक जीवन इसी पियक्कड़ से चलता आया था. वे एक शहर से दूसरे शहर, एक एस्टेट से दूसरी एस्टेट और एक नौकरी से दूसरी पकड़ते छोड़ते फिरते रहे थे.
   
वह अपनी शादी का आरोप ननों पर मढ़ती थी. एक उम्र के बाद कॉन्वेंट स्कूल में उसके नन बनने की बाते होने लगी थीं. ऐसा प्रायः गरीब लड़कियों के साथ किया जाता. ग्राशा भी गरीब परिवार से आती थी. उसकी माँ मिश्रित नस्ल की एक भाग्यहीन महिला थी और पिता दोयम दर्जे के पुर्तगाली. वह उपनिवेश में पैदा हुए थे और सिविल सेवा में छोटे से कर्मचारी थे. ग्राशा को एक धार्मिक न्यास की ओर से कॉन्वेंट स्कूल में डाला गया था और अब नन उसका प्रतिफल चाहती थीं. ग्राशा काफी शर्मीली लड़की थी, घर या स्कूल वह किसी आज्ञाकारी बालक की तरह रहती. वह कृतघ्न कहलाना नहीं चाहती थी इसलिए उनके आगे ना नहीं कह पा रही थी. महीनों तक उसे फुसलाने की कोशिश की जाती रही, वे उस की प्रशंसा करते हुए कहतीं- 

‘‘ग्राशा, तुम कोई आम लड़की नहीं हो, तुममें विशेष क्षमताएँ हैं, हमें तुम जैसे लोगों की ही जरूरत है ताकि धर्म को ऊपर उठाया जा सके.’’ 


लेकिन उनके प्रति ग्राशा के मन में डर बैठ गया. इसलिए छुट्टियों में घर लौटने पर इस बार वह और दुःखी लग रही थी. उसके परिवार के पास कोई दो एकड़ जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा था. उसमें फलों के पेड़, विभिन्न फूल लगाए हुए थे और मुर्गे, पशु आदि रखे जाते थे. ग्राशा को उनसे बहुत लगाव था. वह उन्हें बचपन से देखती आई थी. उसे मुर्गी का अपने अण्डे सेते हुए देखना और छोटे-छोटे रोंयेदार चूज़ों का बाहर निकलना, उनकी चीं-चीं की आवाज, कोई खटका होते ही भागकर मुर्गी के फैले पंखों के नीचे छिप जाना, मुर्गी का कुड़कुड़ाना, उसके पीछे-पीछे चूजों का घूमना सब बहुत अच्छा लगता था. कुछेक हफ्तों में वे बड़े हो जाते और उनका अपना रंग, रूप, आकार विकसित हो जाता. मैदान में बिल्लियों का अपने पीछे-पीछे चलना भी उसे बहुत भाता, वे उससे डरती नहीं, किलोल करती थी. इन बिल्लियों, मुर्गियों, चूज़ों आदि को दड़बे में बंद करने की सोचकर ही वह दुखी हो उठती. यह उसे ऐसा लगता मानो उसे ख़ुद ही बंद कर दिया गया हो. वह डरी हुई थी क्योंकि नन उसकी माँ से उसके बारे में बात करने आने वाली थीं, वह जानती थी कि उसकी धार्मिक और आज्ञाकारी माँ उन्हें ना नहीं कर पाएगी. यह सब सोच आखिर उसने लुइस से शादी करने का फैसला ले डाला. लुइस उसके पड़ोसी का लड़का था. ग्राशा की माँ भी बिटिया का दुख समझ गई थी इसलिए उसने इसकी इज़ाजत दे दी.

   
लुइस स्मार्ट तो था ही, कई दिनों से उसके पीछे भी पड़ा था. ग्राशा उस समय सोलह की और लुइस इक्कीस का रहा होगा. सामाजिक रूप से भी वे स्वजातीय थे. कॉन्वेंट की अमीर लड़कियों के बजाय वह लुइस के साथ ज्यादा फिट रही.
   
वह एक स्थानीय फर्म में मैकेनिक था. वहाँ कार, ट्रक और खेती की मशीनरी ठीक की जाती थी. वह अपना खुद का काम खोलने की भी कहता रहता था. वह पहले से पीता था, लेकिन उस समय वह उसकी स्टाइल लगती थी, मानो यह भी आम जीवन का एक हिस्सा था.
   
शादी के बाद वे राजधानी चले आए थे. उसे लगता था कि वह स्थानीय शहर से आया हुआ है, शायद उसे वहाँ जमने नहीं दिया जाए क्योंकि स्थानीय रईसों ने सब कुछ अपने कब्जे में कर रखा था, वे ग़रीब लोगों को टिकने ही नहीं देते थे. सो कुछ दिन तो वे लुइस के एक रिश्तेदार के यहाँ ठहरे, फिर लुइस को रेलवे में मैकेनिक की नौकरी मिल गई, ग्रेड के अनुसार उसे रेलवे क्वार्टर मिल गया. फिर वे उसमें रहने लगे. उनके पास एक लाइन में बने तीन कमरों का छोटा-सा क्वार्टर था, जो मौसम के अनुरूप नहीं बना था. पश्चिम में दरवाज़ा होने की वजह से यह दोपहर बाद भभकने लगता और शाम के नौ-दस बजे से पहले ठण्डा नहीं हो पाता था. उसमें रहना परेशानी का सबब बन गया था, दिन-ब-दिन वे उससे दुखी होते गए. ग्राशा को दो बच्चे वहीं हुए. दूसरे बच्चे के जन्म के बाद पता नहीं ग्राशा को क्या हुआ, वह अपने को शहर में कहीं चलता हुआ महसूस करती. उसी समय लुइस भी शराब में डूबा रहने लगा था. बस, तभी से वे यायावरी जीवन जी रहे थे. लुइस अच्छा मैकेनिक था, तब तक वे अच्छा खासा कमा चुके थे, लोग भी उन्हें चाहने लगे थे. फिर उसने एस्टेट का काम हाथ में लिया और जल्दी ही मैनेजर तक पहुँच गया.
   
उसमें सही समय पर चीजों की शुरुआत करने और जल्दी से शिखर पर जाने की योग्यता थी पर कुछ परेशानियों और झटकों के चलते नौकरी-दर-नौकरी इसमें कमी आती गई थी. लुइस के साथ रहते हुए, उसकी पीने की बात छुपाए रखने के चक्कर में ग्राशा शुरू से ही झूठ बोलती आई थी और अब थक चुकी थी. इसने उसका स्वभाव बदल डाला था. एक दिन जब वह बच्चों के साथ घूम-फिर कर लौटी तो देखा कि लुइस एक अफ्रीकी बागवान ने के साथ केले-निर्मित घर की शराब बुरी तरह पीने में व्यस्त था. बच्चे उन्हें देखकर डर गए थे; ग्राशा ने भी उन्हें शराब खतरे बताए लेकिन अचानक कुछ सोचकर वह पलट गई. उसने बच्चों से कहा कि उसके पापा जो कुछ कर रहे हैं, एकदम ठीक है. अब समय बदल रहा है; आजकल एस्टेट मैनेजर और बागवान का साथ-साथ पीना सामाजिक समानता का सूचक है. बाद में पता चला कि बच्चे भी झूठ बोलने लगे थे. उन्होंने यह आदत अपनी माँ से ही सीखी थी. इसलिए कांन्वेट से नाख़ुशी के बावजूद उसने उन्हें बोर्डिंग स्कूल में भेज दिया था.
   
सालों से वह अपने गाँव आना चाह रही थी, जहाँ उसका बचपन बीता और जहाँ उसके परिवार का दो एकड़ का प्लॉट था, मुर्गियाँ, पशु, फूल और फलों के पेड़ थे. अब वह वहाँ एक एस्टेट हाउस के मैनेजर की पत्नी के रूप में गई थी, जहाँ औपनिवेशिक फ़र्नीचर भरा था. लेकिन सब झूठी शान थी, चीजें हमेशा की तरह एक सी चल रही थीं. वहाँ भी वही पुराना तनाव उभर आया था, मानो उसकी ज़िन्दगी में यही लिखा था. यह कहानी ग्राशा ने कई महीनों में टुकड़े.टुकड़े मुझे सुनाई थी. जीवन में उसके ज्यादा प्रेमी नहीं थे और उनमें से किसी को उसने इस कहानी का राज़दार नहीं बनाया था. कहने को तो ग्राशा अपना यौन-जीवन उसकी दूसरी ज़िन्दगी से अलग बताती थी लेकिन परोक्ष रूप से मैं जान गया था कि मुझसे पहले भी लोग उसकी ज़िन्दगी में आ चुके थे. एक तो लुइस के यहाँ नौकरी करने वाला ही था, जिसने मुझसे पहले उसकी आँखों में वही चीज़ पढ़ ली थी जो मैंने अब समझी थी और उसकी इच्छा पूरी कर दी थी. मुझे उन सारे प्रेमियों से जलन हो रही थी, इससे पहले मुझे ऐसा कभी नहीं लगा था. उन सभी लोगों के बारे में, जिन्होंने ग्राशा की कमज़ोरी जान ली थी और उस पर चोट की थी, सोचते हुए मुझे पर्सी काटो के लंदन में कहे वही शब्द याद हो आए थे. पहली बार मैं यौन जीवन में अपनी पशुता का आभास कर रहा था.
   
ग्राशा के साथ मैं इस पशुता में इतना डूब चुका था कि जब वह मेरे साथ नहीं होती तब भी उसकी यौन.क्रीड़ाएँ मेरे मन में घूमती रहतीं. सेक्स के मामले में वह मुझसे ज्यादा अनुभवी थी और मेरा निर्देशन तक करती थी. उसके तौर-तरीकों से मैं कभी चकित होता कभी बेचैन हो जाता लेकिन अन्ततः मुझे इससे खुशी ही मिलती थी. ग्राशा कहती- ’‘शायद नन इसे अनुचित करार दें.’’ कभी कहती- ’‘अगर कल को मुझे अपना अपराध स्वीकारना पडे़े तो मैं यही कहूँगी- फादर, मैं बेशरम हो गई थी.’’ लेकिन जो भी वह सिखा चुकी थी, काम.संवेदना के उन नए अहसासों को भुला पाना मुश्किल था. ना ही पुराने दिनों की उस साधारणता में लौटना आसान लगता था. मैंने जब-जब यह सब किया, अपने पिता की बचकानी इच्छाएँ मुझे बेधती रहीं.
   
इस तरह महीने पर महीने बीत रहे थे. यहाँ तक कि दो साल बाद मुझे इस जीवन से भी उकताहट होने लगी थी, साथ ही अपने में बढ़ती संज्ञाहीनता का आभास भी हो रहा था. बल्कि धार्मिक दृष्टि से ऐसे यौन संबंधों को अवैध मानने का स्वीकार भाव तक जागने लगा था.
एक दिन एना मुझसे बोली- ‘‘लोग तुम्हें और ग्राशा को लेकर कानाफूसी करने लगे हैं. तुम जानते हो कि नहीं?’’
   
मैंने कहा- ’‘हाँ, वे सही कहते हैं.’’
   
“तुम्हें मुझसे इस तरह बात करना शोभा नहीं देता विली!’’
“काश कि उसके साथ सेक्स-क्रीड़ा के दौरान तुम कमरे में होतीं, तब समझ पातीं.’’ मैंने कह दिया.
   
“तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए विली, आख़िर कुछ तो तमीज़ रखो.’’