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Home » इक्कीसवीं सदी का हिंदी साहित्य : आचार्य द्विवेदी और अज्ञेय

इक्कीसवीं सदी का हिंदी साहित्य : आचार्य द्विवेदी और अज्ञेय

१९६७ में अज्ञेय ने आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी से यह जानना चाहा था कि इक्कीसवीं सदी का हिंदी साहित्य कैसा होगा. आचार्य द्विवेदी ने इस प्रश्न का उत्तर भी दिया. अब, जबकि इक्कीसवीं सदी का पहला चौथाई भी बीत चुका है, यह देखना अत्यंत दिलचस्प होगा कि आचार्य द्विवेदी के वे अनुमान किस हद तक सच सिद्ध हुए हैं. यह संवाद अज्ञेय के संपादकत्व में प्रकाशित दिनमान के १३ अगस्त १९६७ के अंक में छपा था. दस्तावेज़ीकरण के कार्य में संलग्न मनोज मोहन के प्रयासों का यह सुफल है. प्रस्तुत है.

by arun dev
December 15, 2025
in बातचीत
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इक्कीसवीं सदी का हिंदी साहित्य : आचार्य द्विवेदी और अज्ञेय
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इक्कीसवीं सदी का हिंदी साहित्य
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और अज्ञेय

 

गीता में बताया गया है कि किसी कार्य के प्रत्यक्ष घटित होने के पाँच कारण हैं:

१. वह देश और उसकी प्रकृति जिस में घटी है;
२. स्वयं करने वाला या करने करने वालों की योग्यता;
३. तत्काल उपलब्ध साधन जिसमें कर्ता की मानसिक स्थिति भी शामिल है;
४. उस काल में और उस स्थान पर रहने वाले लोगों या वस्तुओं की भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएँ या चेष्टाएँ; और
५. ऐसी प्राकृतिक शक्तियाँ जो मनुष्य के नियन्त्रण में नहीं हैं, और जिसे किसी अच्छे शब्द के अभाव में “दैव” कह कर सन्तोष कर लिया जाता है.

ये पाँचों कारण अतीत, वर्तमान और भविष्य में किसी कार्य के घटित होने के लिए उत्तरदायी हैं. इतिहास की संरचना में जो ग़लतियाँ होती हैं— उनका कारण है इन पाँचों में से एक या दो या अधिक के विषय में जानकारी का अभाव. जब इनमें से कोई जानकारी अधिक स्पष्ट रूप में मिल जाती है, तब इतिहास में संशोधन की आवश्यकता हुआ करती है.

 

 

२.

सन् दो हजार ईस्वी में हिन्दी साहित्य की क्या स्थिति होगी, इसका भी अन्दाजा इन्हीं पाँच बातों को ध्यान में रख कर लगाया जाना चाहिए. अब से लगभग एक-तिहाई शताब्दी में क्या कुछ होने वाला है, उसे पिछली २-३ शताब्दियों में जो कुछ हुआ है, उस के आधार पर ही अनुमान का विषय बनाया जा सकता है.

आज से ३३ वर्ष पहले किसी को यदि १९६७ की हिन्दी साहित्य की स्थिति पर विचार करना होता तो कदाचित् वह सोच भी नहीं सकता था कि सन् १९६७ में भारतवर्ष के दो टुकड़े हो गये होंगे और पाकिस्तान और हिन्दुस्तान इन दोनों टुकड़ों में नित्य बैर जैसा दिखने वाला भाव पैदा हो गया होगा. सन् १९६५ में पाकिस्तानी आक्रमण के समय जिस प्रकार का विक्षोभ लेखकों के मन में उत्पन्न हुआ और उसके कारण जिस प्रकार का साहित्य लिखा गया, वह उस समय के भविष्य-वक्ता के लिए अज्ञेय था. परन्तु इतना उस समय भी उसे पता था कि हिन्दू और मुसलमान इन दो प्रमुख सम्प्रदायों में तनातनी बढ़ रही है और यह तनाव किसी-न-किसी अशुभ परिणाम की सृष्टि अवश्य करेगा. इसी प्रकार आज का मनुष्य कुछ विशेष प्रकार के तनाव का अनुभव जरूर कर रहा है और यह तनाव कोई-न-कोई रूप लेगा, यह भी निश्चित है. परन्तु क्या रूप लेगा, यह निश्चयपूर्वक कोई नहीं कह सकता.

हिन्दी भाषा और साहित्य का घनिष्ठ सम्बन्ध भारतवर्ष की अखंडता, एकता और समृद्धि से है. क्या यह देश, एक और अखंड बना रहेगा? जिस विषम आर्थिक संकट के भीतर से हम गुज़र रहे हैं, उसका कहीं अन्त भी है या नहीं? क्या होने वाला है इस देश का?

जब से भारतवर्ष स्वतन्त्र हुआ है तब से वह भाषा के क्षेत्र में एक प्रकार का मानसिक तनाव अनुभव करने लगा है. भाषावार प्रान्तों के पुनर्गठन के बाद पृथक्-पृथक् सभी क्षेत्रीय भाषाओं को समान महत्व देने की माँग बढ़ रही है. हर भाषा में पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षाएँ हों और विश्वविद्यालयों की उच्चतम शिक्षा की व्यवस्था हो, यह आकांक्षा अधिकाधिक प्रबल रूप में प्रकट होने लगी है. पार्लियामेंट में हर भाषा को समान मर्यादा देने का प्रस्ताव भी क्रमशः दृढ़ स्वर में व्यक्त किया जाने लगा है. इसी प्रकार देश के विभिन्न खंडों में अधिकाधिक स्वतन्त्र इकाई होने की लालसा निरन्तर बढ़ रही है. कई बार हिन्दी-प्रेमी इन बातों से चिन्तित होते हैं. परन्तु इससे हिन्दी की कोई हानि होगी, ऐसी आशंका मुझे नहीं है.

वस्तुतः देश की अन्य सभी भाषाओं की स्वतन्त्र और समान मर्यादा की माँग अंग्रेज़ी के विरुद्ध जायेगी और हिन्दी १५ भाषाओं में एक होने पर भी इनमें सब से अधिक समृद्ध और शक्तिशाली रहेगी— इस विषय में सन्देह की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि लगभग आधे भारतवर्ष की भाषा वह तब भी रहेगी. और यदि इस माँग ने इतना उग्र रूप नहीं धारण किया कि इस देश की एकता ही संकट में पड़ जाये तो इतना निश्चित है कि वहीं सारे देश में सम्पर्क भाषा के रूप में स्वीकृत होगी. कभी-कभी यह आशंका होती है कि स्वयं हिन्दी प्रदेशों में स्थानीय बोलियों को भाषा की मर्यादा देने की माँग प्रबल हो रही है. यह प्रवृत्ति यदि अपनी तर्क-सम्मत परिणति की ओर जाये तो चिन्ता का विषय हो सकती है. लेकिन इससे भी निराश या चिन्तित होने की बात नहीं है. इन बातों से हिन्दी प्रदेशों की एकता के नष्ट होने की सम्भावना या देश की अखंडता के भी नष्ट होने की आशंका नहीं है. भाषाई विभेद और जाति-पाँति का मनोभाव अधिक दूर तक चल नहीं सकता. इसके दो कारण है. दोनों ही देश के दुर्भाग्य के निदर्शक हैं, परन्तु मेरा अनुमान है कि ये आगामी १०-१५ वर्षों में कम होने लगेंगे.

एक दुर्भाग्य तो हमारी वर्तमान आर्थिक स्थिति ही है. यह आर्थिक स्थिति कुछ तो हमारे देशवासियों के सामूहिक प्रयत्नों की शिथिलता, दुर्व्यवस्था और सामाजिक जीवन के प्रति अस्वस्थ दृष्टिकोणों के कारण उत्पन्न हुई है, परन्तु बहुत कुछ विकासशील देश के लिए अनिवार्य भी है. व्यक्तिगत सम्पत्ति संचय करने की अस्वस्थ मनोवृत्ति, जड़ता, आलस्य, अनुशासनहीनता, अनास्था आदि से बहुत हानि हुई है.

इसका बहुत बड़ा दुष्परिणाम यह है कि संवेदनशील युवकों के चित्त में एक विचित्र प्रकार का अजनबीपन, सन्त्रास, असहाय वृत्ति और निराशा का वातावरण प्रस्तुत हुआ है. इस मनोवृत्ति से उत्पन्न हुआ साहित्य पुराने मूल्यों के अनुसन्धान को व्यर्थ का प्रयास मानने लगा है और सम्पूर्ण सभ्यता को ही कृत्रिम, प्रपंचपूर्ण और मृगमरीचिका के रूप में देखने लगा है. वस्तुतः इस भ्रष्टप्राय व्यवस्था के सामने कोई बहुत बड़ा लक्ष्य नहीं है. ऐसा लगने लगा है कि वह कुछ लोगों के हाथ का खिलौना-मात्र है और इस के सामने किसी-न-किसी प्रकार अपना पेट भरने और तोंद फुलाने के सिवा और कोई लक्ष्य ही नहीं है. उसका संवेदन बिल्कुल थोथा हो गया है. हृदय नाम की चीज उस के पास है ही नहीं. है तो केवल विकराल मुख और भयंकर पेट.

 

 

३.

अजनबीपन, प्रेम के अभाव का द्योतक है; सन्त्रास भविष्य की उज्ज्वलता के विषय में निराशा का परिणाम है और अनास्था समाज के प्रतिष्ठित कहे जाने वाले लोगों के आचरणों के भोग-परायण होने का फल है. इसमें आशा का केवल एक ही स्थान है वह है साधारण जनता का स्वस्थ मनोबल.

पिछली दशाब्दी की घटनाएँ संकेत करती हैं कि साधारण जनता इसे अधिक बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं है. मेरा विश्वास है कि आगामी २०-२२ वर्षों में निस्सन्देह साधारण जनता के गर्भ से शक्तिशाली महामानव उत्पन्न होगा. मनुष्य की जिजीविषा बहुत प्रबल होती है. जैसी स्थिति इस समय है, उसमें जीना ही दूभर हो गया है. इसलिए शीघ्र ही इसकी प्रतिक्रिया किसी-न-किसी रूप में प्रकट होगी. इस देश के इतिहास को देखते हुए मैं इस प्रकार की जन-क्रान्ति की बात नहीं सोच सकता जैसी कि पश्चिम के कई देशों में हुई है.

भारत की क्रान्ति सदा भोग-पराङमुख और त्यागमूलक मूल्यों का अनुसरण करती रही है और वह अब भी उन्हीं उपायों पर बल देगी जो रचनात्मक होंगे. सौभाग्यवश उस का बीजारोपण हो गया है.

वह उपाय है आधुनिक वैज्ञानिक साधनों के प्रयोग से देश के पर्वतों और नदियों, जंगलों और रेगिस्तानों के भीतर दबी हुई अपार सम्पत्ति का उद्घाटन. जो महामानव नेता आगामी २०-२५ वर्षों के भीतर ही आने वाला है, वह क़ानूनी बहसों के चक्कर में नहीं पड़ेगा. इस और उस देश की ओर उन्नति के मन्त्रों की खोज नहीं करता फिरेगा. वह देश की मिट्टी से पैदा होगा और देश की मिट्टी को अपना सम्बल बनायेगा. भारतवर्ष समस्त साधनों से परिपूर्ण अपने ढंग की अद्वितीय इकाई है. जिस आर्थिक अवसन्नता के चक्कर में हम फँस गये हैं, उस से उबरने का एकमात्र मार्ग देश की अखंडता है. टुकड़ों में बँट कर यह देश छिन्न मेघ की तरह बरबाद हो जायेगा. परन्तु एक बना रह कर अपार सम्पत्ति का अधिकारी होगा. बड़ी-बड़ी योजनाओं का सूत्रपात हो गया है, लेकिन भविष्य में इनसे भी अधिक महत्त्वपूर्ण और बड़ी योजनाएँ देश को एक सिरे से दूसरे सिरे तक कस कर बाँध देंगी.

आज देश का काफ़ी बड़ा हिस्सा प्रतिदिन, अनवरत रेलों और बसों में यात्रा करता है. एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश में जाने को बाध्य हैं- और भी अधिक बाध्य होंगे. भाषाओं की संकीर्ण सीमा निश्चित रूप से टूटेगी. एक प्रदेश दूसरे प्रदेश के निकट आने को बाध्य है. यह दुर्भाग्य आगामी बीस वर्षों में हमारे लिए वरदान सिद्ध होगा. भारतवर्ष अपने आप को खोजने लगा है और जिस दिन खोज लेगा, उस दिन अजनबीपन और सन्त्रास समाप्त हो जायेंगे. सुन्दर भविष्य के निर्माण का स्वप्न जब थोड़े से सुविधाभोगी हाथों से निकलकर देश की कोटि-कोटि जनता के हाथों में आ जायेगा तो पुराने मूल्यों के प्रति विद्रोह तो होगा ही नहीं, उनके प्रति नयी आस्थाएँ उत्पन्न होगी और उन्हें नये सन्दर्भ में नयी शक्ति प्राप्त होगी.

मेरा विश्वास है कि सन् दो हज़ार ईस्वी आने के पहले आशा और उत्साह की लहर एक छोर से दूसरे छोर तक व्याप्त हो जायेगी. आर्थिक विषमता और दुर्व्यवस्था का जो घिनौना रूप आज प्रकट हुआ है, उस का पेट फाड़ कर नयी व्यवस्था जन्म लेगी और उस से प्रेरित नये साहित्य में अधिक स्वस्थ और सबल स्वर सुनाई देगा.

इस प्रकार, देश की विषम आर्थिक स्थिति जितनी भी भयंकर हो, उसी में भावी भारत की एकता और अखंडता की आशा के बीज है. जो लोग भावुकतावश क्षेत्रीय बिलगाव का राग अलापने लगे थे वे भी समझने लगे हैं कि कल्याण एकता और अखंडता में है. जैसे-जैसे उग्र राजनीतिक दल उत्तरदायित्व का काम सँभालने का अवसर पायेंगे, वैसे-वैसे उनकी बिलगाव की नीति समाप्त होती जायेगी.

एक दूसरी बात भी है. जात-पाँत, प्रान्तीयता, क्षेत्रीयता आदि भी उभरी हैं. बीज जब नए अंकुर के रूप में प्रकट होता है तो छिलका उसके सिर पर सवार होता है. हमारी स्वाधीनता के अंकुर की भी यही हालत है. छोटी-छोटी जड़ता की ख़ाल हमारे सिर पर सवार हो गयी है. परन्तु अंकुर जरा शक्तिशाली होगा तो यह अपने आप इस छिलके को झाड़ कर फेंक देगा. स्वाधीन भारतवर्ष पर दो विदेशी आक्रमण हो चुके हैं और प्रच्छन्न विदेशी आक्रमणों का तो ताँता बँधा हुआ है. जो दो आक्रमण खुल कर हुए हैं उन्होंने देश को एक सिरे से दूसरे सिरे तक झकझोरा है. पर बुद्धिमान कहे जाने वाले लोगों की अपेक्षा उपेक्षित जनशक्ति ने ही डटकर उनका मुक़ाबला किया है.

देश पहले से शक्तिशाली हुआ है. इस से आशा बँधती है कि देश की प्राण शक्ति अविच्छिन्न और अखण्ड है. वह समय पर जाग सकती है और उचित दिशा में आगे बढ़ सकती है. प्रच्छन्न आक्रमणों का पता साधारण जनता को लग ही नहीं पाता और लगता भी है तो देर से. जो साहसी नेतृत्व उत्पन्न होने वाला है, वह देश की जनता को गुप्त और प्रच्छन्न आक्रमणों के समय साथ ले कर चलेगा, क्यों कि वह झूठी कूटनीतियों में विश्वास नहीं करेगा.

 

 

४.

इन सब बातों को देखने से लगता है कि आगामी २०-२५ वर्षों में देश के संवेदनशील चित्त में सन्त्रास की जगह आस्था, अजनबीपन की जगह प्रेम और आशंका के स्थान पर विश्वास की तरंगें हिल्लोलित होंगी. दीर्घकाल तक हम साँस रोक कर नहीं रह सकते. इस समय का विक्षुब्ध वातावरण फट जाने को बाध्य है. यह संचित विक्षोभ कुछ तोड़-फोड़ कर नयी आस्था की संजीवनी को अपना स्थान देगा. निस्सन्देह उस समय साहित्य में अपूर्व शक्ति आयेगी और इस समय जो पिछलग्गू बनने की प्रवृत्ति है, उस के स्थान पर संसार के साहित्य को नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता आयेगी. आज हम अनुकर्ता हैं दूसरों के अनुकरण पर सोचते, बोलते और लिखते हैं. हममें अपनी समृद्ध विरासत के प्रति न तो किसी प्रकार का प्रेम ही बच रहने के लक्षण दिखाई दे रहे हैं और न ममता का भाव ही शेष रह गया जान पड़ता है. जिस दिन हम अपने को अतीत के इतिहास के साथ सही अर्थों में जोड़ देंगे, उस दिन हमारा भविष्य भी सुनहरा और उज्ज्वल हो कर प्रकट होगा.

ऊपर प्रसंगवश साहित्यकारों की बड़ी-सी चर्चा हो गयी है. यहाँ उसे विशेष रूप से ध्यान में रख कर कुछ कहने का प्रयत्न किया जा रहा है. अगर २०वीं शताब्दी को ३ हिस्सों में बाँट दें तो प्रथम तिहाई का साहित्य बहुत अधिक स्वदेशी जान पड़ेगा. उस समय के साहित्यकार विदेशी भाषा और रीति-नीति से उतने अधिक प्रभावित नहीं थे जितने कि दूसरी तिहाई में हो गये. दूसरी तिहाई में हिन्दी-भाषी प्रदेशों में अंग्रेज़ी शिक्षा पहले की अपेक्षा अधिक बद्धमूल हुई है. अंग्रेजी शिक्षा के कारण जहाँ नव-शिक्षितों में मानसिक क्षितिज का विस्तार हुआ, वहाँ एक नया दोष यह आ गया कि वे देश के बृहत्तर समाज से कटते गये. यह दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि शिक्षित जनता के मानसिक क्षितिज का विस्तार साधारण जनता के लिए अपरिचित ही बना रहा. उनकी भाषा, शैली, वक्तव्य, वस्तु सभी कुछ ऐसे होने लगे जिन की जड़ें देश की मिट्टी में गहराई तक नहीं पहुँच पायीं. परन्तु फिर भी उन्होंने देश की जनता की संवेदना को कुछ-न-कुछ परिष्कृत किया अवश्य.

सन् १९३६ के बाद हमारे साहित्य में विस्तार तो बहुत आया, परन्तु ऐसी रचनाएँ बहुत कम हुई जो आगामी ३३ वर्षों में याद की जा सकें. अधिक से अधिक वे परीक्षाओं में बैठने वाले उपाधिकामी विद्याथियों के अध्ययन तक ही सीमित रहीं. परन्तु निश्चित रूप से उन्होंने क्षेत्र-निर्माण का काम किया. यद्यपि उनकी भाषा और उपस्थापन-पद्धति अंग्रेज़ी से बहुत अधिक प्रभावित है और साधारण जनता की भाषा और उपस्थापन पद्धति से बहुत दूर पड़ जाती है तो भी नवीन अभिव्यक्ति देने में समर्थ भाषा के निर्माण में उनका योगदान उपेक्षणीय भी नहीं है. यह और बात है कि कवि और लेखक, अपने मन के किसी अन्तराल में ऐसी आशंका को पोसते आये हैं कि उनकी बात साधारण जनता नहीं समझ सकेंगी. यही कारण है कि प्रत्येक कवि और कहानी-लेखक अपनी कविता और कहानी के साथ लम्बे-लम्बे वक्तव्य दिया करते हैं. यह वक्तव्य उसी आशंका के फल हैं. इसका प्रमुख कारण यही है कि कवि या लेखक के मन में अपनी इन कविता या कहानी के बारे में यह सन्देह है कि वे उस की बात स्पष्ट कर सकेगी.

वक्तव्यों से मूल कहानी या कविता की शक्ति का चाहे पता न लगा हो, परन्तु उनसे साधारण पाठक के मन का विस्तार अवश्य हुआ है और इस का शुभ परिणाम आगामी ३० वर्षों में दिखाई देगा. निस्सन्देह आगे चलकर कवि सवक्तव्य कविता लिखने की अपेक्षा कविता ही ऐसी लिखेंगे जिस में संप्रेषणीयता, वक्तव्य की तुलना में, कहीं अधिक होगी. तभी साधारण जनता उसे अधिक उत्सुकता और आयत के साथ ग्रहण करेगी, क्योंकि ऐसी कहानियाँ और कविताएँ “स्वस्थ” होगी. स्वस्थ अर्थात् अपने आप में स्थित, किसी बाहरी वक्तव्य या शास्त्र-ज्ञान में नहीं.

इस बीच ज्ञान का साहित्य प्रचुर मात्रा में लिखा जायेगा. जब हिन्दी उच्चतम शिक्षा, उच्चतम न्याय और उच्चतम विधान की भाषा होगी, तब निस्सन्देह उस की अभिव्यंजना शक्ति अकल्पनीय ढंग से शक्तिशाली होगी. इन दिनों शब्द-निर्माण के जो कृत्रिम प्रयत्न हो रहे हैं, उनके स्थान पर भाषा में अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सहज भाव मे “स्व-स्थ” शब्दों का अधिकाधिक प्रचलन होगा.

 

 

५.

पद्य का साहित्य मुद्रण यन्त्र के आविष्कार और प्रचलन के बाद बहुत परिवर्तित हुआ है, क्योंकि कविता कान का विषय न रह कर आँखों का विषय बनती गयी है. उस में काकु, वक्रोक्ति आदि को प्रकट करने के लिए नये-नये चिह्नों का आविष्कार हुआ है. छपाई को प्राविधिक विशेषताओं से, जैसे पंक्तियों को तोड़ कर, बीच में “स्पेस” दे कर, पर-वाक्य निदर्शक, प्रश्नवाचक और विस्मय-वाचक चिह्नों की योजना करके भाव प्रकट करने के प्रयास हुए हैं.

छन्द के बन्ध शिथिल हुए हैं और कवि-मानस में प्रवाहित होने वाले लय को पाठक के चित्त में दिगन्तरित करने का प्रयास हुआ है. वर्तमान काल में मुद्रण यन्त्र के प्रतिद्वन्द्वी रेडियो आदि श्रुतिग्राह्य यन्त्रों का आविष्कार हुआ है और उनके कारण काव्य, नाटक कथा आदि की अभिव्यक्ति में कुछ थोड़े-थोड़े प्राविधिक परिवर्तनों का आभास मिला है. टेलीविजन के आविष्कार से चक्षुर्ग्राह्य विषयों की प्राविधिक विशेषताएँ भी सामने आयी हैं.

भविष्य में जब शब्द संचार के अधिक शक्तिशाली साधन उपलब्ध होंगे पृथ्वी के ऊपर उपग्रहीय स्टेशनों से विविध भाँति के समय समन्वित साहित्य का प्रसारण होगा तब मुद्रण यन्त्र का एकच्छत्र आधिपत्य उससे अवश्य प्रभावित होगा. इस से “शब्द-और-अर्थ का साहित्य” नया रूप ग्रहण करेगा. जितना ही काव्य श्रुति-ग्राह्य बनेगा उतना ही उस में छन्द और लय की महिमा प्रतिष्ठित होगी. यद्यपि यह आवश्यक नहीं है कि वह छन्द पिंगल मुनि के छन्दोविधान के अनुकूल ही हो. परन्तु इतना निश्चित है कि मुद्रण यन्त्र की महिमा का एकातपत्र राज्य कमज़ोर होगा और पद्य का साहित्य चक्षुर्ग्राह्य विषय बनने के बन्धन से बहुत दूर तक मुक्त होगा. इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि कवि-सम्मेलनी कविताओं के दिन लौटेंगे. इस का मतलब केवल यह है कि कविता में छन्द का महत्व बढ़ेगा. वह छन्द और लय की सहायता से अभिधेयार्थ से कहीं अधिक को व्यक्त करने की ओर अग्रसर होगी.

क्या कविता उसी प्रकार का प्रमुख साहित्यांग बनी रहेगी जैसी अब तक रही है ? सन्देह है. वह प्रमुख साहित्यांग नहीं रहेगी, परन्तु प्रभावशाली अवश्य रहेगी ?

जब मनुष्य आदिम स्थिति में था, उसकी भाषा में वर्षों का इतना स्पष्ट विच्छेद नहीं था. वे बहुत कुछ एक दूसरे से मिले हुए संगीतात्मक स्थिति में थे. लेकिन जैसे-जैसे मनुष्य सभ्यता की ओर अग्रसर होता गया, वैसे-वैसे विविक्त ध्वनियों वाले वर्णों और उन विविक्त वर्णों से बने हुए शब्दों का प्राचुर्य होता गया और भाषा अर्थ-प्रधान अर्थात् गद्यात्मक होती गयी. भाषा का संगीत अथवा शब्द-गुणप्रधानता मद्धिम पड़ती गई. भाषा में अर्थ-योजन का भार बढ़ता ही चला गया. कविता विविक्त ध्वनि वाले वर्णों की भाषा से खो गये हुए संगीत को पुनः प्राप्त करने का प्रयास था. इसी प्रयास को छन्द कहते हैं.

आधुनिक युग में गद्यात्मक भाषा की शक्ति और भी बढ़ी है और उस की खोई हुई संगीतात्मकता और भी अधिक खोती जा रही है. यह गति और भी तीव्र होगी. व्यक्तिगत निबन्धों और कहानियों में जो अर्थातीत लय की सम्भावना अब भी बच रही है, वह धीरे-धीरे क्षीणतर होती जायेगी. सन् २००० ई. में गद्य की और भी बहुत-सी विधाएँ प्रकट होंगी और काव्य में भी लय का स्थान सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होता चला जायेगा. प्रतिक्रिया के रूप में कई बार गीत सिर उठायेंगे, परन्तु गीत-तत्त्व अधिकाधिक काव्य से बहिष्कृत हो कर संगीत के क्षेत्र में चला जायेगा. कहानी में राग-तत्त्व क्रमशः शिथिल होता जायेगा और अर्थाभार से बोझिल रचनाएँ बढ़ती जायेंगी.

परन्तु यथार्थवाद का जो वर्तमान रूप है, वह बहुत दिनों तक ज्यों-का-त्यों नहीं बना रहेगा. यदि देश की स्थिति आर्थिक दृष्टि से कुछ सम्पन्न हुई जिसकी पूरी सम्भावना है, तो मनुष्य की दृष्टि सतही यथार्थवाद में ज़रूर विद्रोह करेगी और मनुष्य जीवन की सफलता (जिसे अंग्रेज़ी में सक्सेस (success) कहा जाता है) के सम्बन्ध में अधिक चिन्तित न हो कर उस की चरितार्थता के बारे में सोचने को अग्रसर होगी. सन दो हज़ार ईस्वी का साहित्य आधुनिक अर्थ में यथार्थ नहीं होगा. वह बहुत कुछ चरितार्थवादी के रूप में प्रकट होगा. यथार्थवाद जीवन की सफलता या सार्थकता के बारे में परेशान रहता है जबकि चरितार्थवाद मनुष्य जीवन की चरितार्थता के बारे में दृढ़ आस्था रखेगा.

पुराने मूल्यों के प्रति जो अनास्था का भाव आया है उसके मूल में विद्यमान विरूप परिस्थितियाँ हैं. इन मूल्यों का सन्दर्भ के अनुकूल रूपान्तरण होगा. भारतवर्ष में, और सच पूछिए तो सारे संसार में, ऐसा बराबर होता आया है. भारतवर्ष की विशेषता यह रही है कि यहाँ यह काम चुपचाप हुआ है, भाष्यों और व्याख्याओं के द्वारा. अब शायद उतना चुपचाप और उसी पद्धति में ऐसा नहीं होगा. पर ढोल पीट कर भी नहीं होगा. पुराने प्रतीकों को नये सन्दर्भों में नया अर्थ दे कर ऐसा किया जाने लगा है. और भी अधिक मात्रा में किया जाएगा.

परन्तु यदि अणु अस्त्रों की मारामारी शुरू हो गयी, संसार महाप्रलय का शिकार हो गया तो इन मनमोदकों से क्या भूख मिटेगी. प्रश्न यह है कि क्या प्रथम दो महायुद्धों के समान तीसरा महायुद्ध भी निकट भविष्य में हो सकता है? जिस प्रकार मनुष्य-चित्त की संकीर्णता ऊपर उठती आ रही है उसे देखते हुए लगता है कि आगामी ३३ वर्षों में युद्ध के कई नई घिनौने दृश्य देखने को मिलेंगे. इसका कारण यह है कि यद्यपि आधुनिक साधनों ने विभिन्न देशों को बहुत नज़दीक ला दिया है तो भी पूरा मानव समाज सभ्यता के एक ही स्तर पर नहीं है.कुछ लोग बहुत आगे बढ़ गये हैं, कुछ लोग बहुत छटपटा रहे हैं- बीच में न जाने कितने स्तर हैं. सब का स्वार्थ एक ही ओर बढ़ने और न बढ़ने में नहीं है. इसलिए संघर्ष अवश्यम्भावी है.

परन्तु व्यापक विश्वयुद्धों की सम्भावना दिन पर दिन कम होती जा रही है. मनुष्य के पास ऐसे भयंकर मरणास्त्र आ गये हैं कि यदि बड़ी शक्तियों में सचमुच का युद्ध छिड़ गया तो पूरी सभ्यता ही समाप्त हो जायेगी. और उस हालत में इस प्रकार के ऊहात्मक लेखों का कोई मूल्य नहीं रह जायेगा. आशा करनी चाहिए कि सभ्यता विध्वस्त नहीं होगी, महायुद्ध नहीं होगा और आशंका करनी चाहिए कि खंड-युद्धों का ताँता बँधा रहेगा. विभिन्न देशों की आन्तरिक व्यवस्था में भी रह-रह कर विस्फोट होता रहेगा. परन्तु इससे साहित्य को नयी-नयी शक्ति भी प्राप्त होती रहेगी.

 

 

६.

आगामी ३३ वर्षों में हिन्दी साहित्य स्वस्थ होगा अर्थात् देश के भीतरी जनजीवन की उगती हुई आकांक्षाओं के साथ क़दम रखता हुआ आगे बढ़ेगा. आज का साहित्य जितनी मात्रा में जन-जीवन से विच्छिन्न है, उतनी मात्रा में वह अस्वस्थ भी है. परन्तु वह धरती को छोड़ कर जी नहीं सकता और दीर्घकाल तक व्योम विहारी बनने की स्थिति में नहीं रह सकता. जहाँ तक रचनात्मक साहित्य का प्रश्न है, वह अधिकाधिक जन-जीवन के सम्पर्क में आयेगा और जन-जीवन की चरितार्थता की खोज में अधिकाधिक संलग्न होगा.

परन्तु ये सब बातें ज्यों-की-त्यों नहीं घटेंगी. बहुत-सी बातें मनुष्य के नियन्त्रण से परे हैं और मनुष्य के सोचने की शक्ति के भी अतीत हैं. जैसा कि ऊपर कहा गया है हम अतिमानवीय शक्ति को अधिक अच्छे शब्दों के अभाव में “दैव” कहा गया है. न जाने कब से ज्योतिषी “दैवज्ञ” होने का दावा करता आया है. लेकिन वस्तुतः “दैव” मनुष्य की जानकारी के परे रहता है. वह अप्रतिरोध्य ही नहीं, अज्ञेय भी होता है. देवज्ञ का मतलब है अज्ञेय को जानने वाला, अज्ञेयज्ञ! इसलिए यह शब्द स्वतोव्याहत एक सुश्राव्य शब्द मात्र है. उस के बारे में मौन रहना ही अच्छा है.

 

आभार: दिनमान 13 अगस्त, 1967

मनोज मोहन

मनोज मोहन वरिष्ठ पत्रकार व लेखक. वर्तमान में सीएसडीएस की पत्रिका ‘प्रतिमानः समय समाज संस्कृति के सहायक संपादक.इन दिनों सीएसडीएस की आर्काइव परियोजना के अंतर्गत आज़ादी से दशक भर पहले से लेकर सातवें-आठवें दशक की हिंदी पत्रिकाओं के आलेखों, कविताओं और कहानियों के दस्तावेज़ीकरण जैसा महत्त्वपूर्ण काम कर रहे हैं.

manojmohan2828@gmail.com

Tags: 20252025 बातचीतअज्ञेयआचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदीइक्कीसवीं सदी का हिंदी साहित्यमनोज मोहन
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Comments 6

  1. Bajrang Bishnoi says:
    2 months ago

    समालोचन द्वारा यह प्रस्तुति बहुत महत्वपूर्ण है। मनोज मोहन द्वारा संकलित आर्काइव सामग्री का कार्य बहुत मेहनत और लगन का सबूत है। हम उनके आभारी हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वान से सन् 1967 मे अज्ञेय जी द्वारा इक्कीसवीं सदी के साहित्य के विषय मे पूर्वानुमान मांगना उस समय की श्रेष्ठ पत्रकारिता का प्रमाण है।
    मैं सौभाग्यशाली हूँ, कि मैंने तब भी यह लेख पढा था आज पुन: पढ़ा। आश्चर्य है कि मैं आज यह अनुभव कर सका कि काल का प्रभाव पढ़ने और सोचने पर कैसा पड़ता है।
    मैं पुन: मनोज मोहन और अरुण देव का आभार प्रकट करता हूँ, जिनके श्रम और दृष्टि से यह सिंहावलोकन हो सका।

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  2. तेजी ग्रोवर says:
    2 months ago

    “उपाय है आधुनिक वैज्ञानिक साधनों के प्रयोग से देश के पर्वतों और नदियों, जंगलों और रेगिस्तानों के भीतर दबी हुई अपार सम्पत्ति का उद्घाटन. जो महामानव नेता आगामी २०-२५ वर्षों के भीतर ही आने वाला है, वह क़ानूनी बहसों के चक्कर में नहीं पड़ेगा. इस और उस देश की ओर उन्नति के मन्त्रों की खोज नहीं करता फिरेगा. वह देश की मिट्टी से पैदा होगा और देश की मिट्टी को अपना सम्बल बनायेगा. भारतवर्ष समस्त साधनों से परिपूर्ण अपने ढंग की अद्वितीय इकाई है. जिस आर्थिक अवसन्नता के चक्कर में हम फँस गये हैं, उस से उबरने का एकमात्र मार्ग देश की अखंडता है. टुकड़ों में बँट कर यह देश छिन्न मेघ की तरह बरबाद हो जायेगा. परन्तु एक बना रह कर अपार सम्पत्ति का अधिकारी होगा. बड़ी-बड़ी योजनाओं का सूत्रपात हो गया है, लेकिन भविष्य में इनसे भी अधिक महत्त्वपूर्ण और बड़ी योजनाएँ देश को एक सिरे से दूसरे सिरे तक कस कर बाँध देंगी.”

    1984 में वत्सल निधि शिविर के दौरान वात्स्यायन जी नर्मदा बांधों के पक्ष में खड़े थे। ऐसे ही निर्मल जी भी।

    मुझे ताज्जुब है इतने बड़े लेखकों ने बडी परियोजनाओं को लेकर कभी कोई गंभीर चिंतन क्यों नहीं किया। स्थानीय बोलियों को भाषा का रुतबा मिलने से उस हिंदी का क्या बिगड़ जाने वाला था जो बोलियों के सिर पर टिकी है और उसमें बोलियों के वैभव का अभाव अभी तक बना है। ताज्जुब है कि जिन बड़े लेखकों ने खड़ी बोली की सीमाओं को तोड़ा वही लोग बडी परियोजनाओं और हिंदी बचाने के पक्ष में खड़े हैं

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  3. ब्रज नंदन says:
    2 months ago

    उस समय के भाषायी, सांस्कृतिक व राजनीतिक विमर्श के आधार पर भविष्य की कल्पना उन्होंने की थी।आधार में पिछली दो-तीन सदियों की विकास-गति-प्रकृति को उन्होंने आदर्श रूप में रेखांकित किया है।गीता की दी गई आधार-भूमि में अतिकाय मनोलोक का यथार्थ पर अधिकार कर लेने जैसी वैश्विक परिघटना की कल्पना नहीं क्षितिज बद्ध हुई थी तब। प्रकृति और पर्यावरण इस मनोलोक की भेंट चढेंगे, इसकी छाया इतनी विकराल होने का शायद उन्हें अनुमान न रहा हो। लेकिन उपलब्ध आकडों पर भविष्य के अनुमान का मार्ग तो उन्होंने दिया ही।सातवें दशक में साहित्य के क्षेत्र में घटित हो रही तरह-तरह की परिघटनाओं के आलोक में जिन उम्मीदों को कैनवस पर अंकित किया गया है, बहुत हद तक मिथ्या नहीं ही हैं–यथार्थ पर चरितार्थता मजबूत उत्तर उपनिवेशवादी सच के अतिरिक्त अन्य कई रूपों में रूपसिद्ध तो हुई ही हैं।
    मनोज बाबूके प्रति मेरा हार्दिक आभार।

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  4. Vishnu Nagar says:
    2 months ago

    जिस महामानव की कल्पना की गई थी,वह हमारे सामने उपस्थित हैं।वह कानून संविधान किसी के चक्कर में नहीं पड़ता और बाकी आप हम देख ही रहे हैं।

    लेखक आशावादी ही होता है।उदार हृदय होता है। वही इस बातचीत में दिखता है। मुश्किल भी था,तब यह जानना कि आगे क्या होगा। मंगलकामनाएं भविष्य नहीं होती ,यही कहा जा सकता है।

    फिर भी निश्चय ही ऐसे संवाद का महत्व है।

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  5. Priti Jaiswal says:
    1 month ago

    महत्वपूर्ण आलेख।

    Reply
  6. महेश दर्पण says:
    4 weeks ago

    रचनाकार या कोई भी संवेदनशील प्राणी आने वाले समय को लेकर सदिच्छाएँ ही व्यक्त करेगा। वह नजूमी तो होता नहीं। आज भी हम भविष्य को लेकर क्या वही बता सकते हैं जो होने वाला है?

    Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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