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Home » शुभम नेगी की कविताएँ

शुभम नेगी की कविताएँ

शुभम नेगी के पास कहने के लिए बहुत कुछ है, और वे उसे तरह-तरह से कहते हैं. कहानियों से, फ़िल्मों से और कविताओं से. इन पाँच कविताओं में एक युवा की वह दुनिया सामने आती है जिसे हम उसकी परवरिश कह सकते हैं. पास-पड़ोस, घर और यार-दोस्तों की दुनिया. इसमें समय भी शामिल है. धीरे-धीरे बहता हुआ, कई जगहों पर नुकीला, चुभता और रिसता हुआ. यह ऐसे दृश्यों की रचना करता है जो एक युवा के बनने की प्रक्रिया को मोड़ते-तोड़ते, छीलते-खुरचते हैं. एक ऐसा घाव है जो अब भी टीसता है. एक ऐसी दरार जो पूरी तरह भरती नहीं, बल्कि स्मृति और अनुभव में लगातार बनी रहती है.

by arun dev
December 16, 2025
in कविता
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शुभम नेगी की कविताएँ
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तस्वीर निहारते हुए
शुभम नेगी की कविताएँ

 

1.
बुआ की तस्वीर निहारते हुए

 

तुम्हारे दुपट्टों की सुगंध
जिसे मैं बचपन में
शीशी में भर इत्र बनाना चाहता था
इस तस्वीर से निकल नथुनों में पैठ गई है

तुमने ख़ुद खिंचवायी है यह?
या धकेल दिया था कैमरे के सामने
फूफा जी या बच्चों ने तुम्हें?

सदा की भाँति इसमें भी
आधी बंद हैं तुम्हारी आँखें
जर्जर बांध के अधखुले किवाड़

ठीक वैसे ही खड़ी हो फिर
जैसे खड़ी रहती हैं सारी मास्टरनियाँ तस्वीरों में
एक कंधे पर दुपट्टा लटकाए
हाथ सीने पर गुत्थमगुत्था

यह कौन से पुल पर खड़ी हो?
कहाँ तक जाती है यह सड़क?
दोनों छोर के पहाड़ों को पुल कहाँ
तुम्हारी चाल जोड़ती है
छोड़ो, किस-किसको जोड़ोगी बुआ?

दो तटों से टकरा-टकराकर
थकती क्यों नहीं
पीछे बहती नदी और तुम?

अच्छा बताओ
क्या अब भी झांक आती हो सोने से पहले
मेरे पीछे छूटे कमरे में?
कि कहीं दिख जाऊँ टेबल पर लिखता-पढ़ता कुछ

क्या अब भी टहलती हो पीरियड के बाद
स्कूल के पीछे पीपल की ओट में?
यह सोचने से पहले कि मीटिंग में व्यस्त होगा
या मस्त होगा इस जंजाल से दूर
कितनी देर तक निहारती रहती हो मेरा नंबर?
कार में बैठकर पल भर
क्या अब भी सुबक लेती हो?

‘आपका बंटी’ पढ़कर जो ढुलक गयीं थीं तुम आंसू की तरह
मुझे हिदायत कि मत छूना इस किताब को कभी
मेरे सिरहाने पड़ी रहती है अब
मेरी नींदों की शिकारी

मुझसे छोटी थीं तुम
तुम्हारी गोद में आ गिरा था जब
उल्का-पिण्ड की तरह मैं
छोड़ो बुआ!
कब तक तारा मानोगी मुझे?

जैसा कि उस कवि ने कहा है
कि माँ भी कभी बच्ची थी
तो बच्ची तो कभी तुम भी रहीं होंगी बुआ
क्या नहीं महसूस करती कभी चोटी पर
स्कूल की ओर खींचते दादी के हाथों का कसाव?
सच कहो
स्नान के बाद दो चोटियाँ कर
आख़िरी बार कब निहारा था ख़ुद को?

सब पत्रिकाओं, सब सम्मानों, सब सम्मेलनों से दूर
लिखना चाहता हूँ वह कथा
जिसमें ठंडी साँस लिखी हो तुम्हारे हिस्से

सूरज डूब रहा है तस्वीर में तुम्हारे पीछे
डूबने दो; मत करो प्रयास उसे रोकने का हमारी ख़ातिर
बदहवास आँखों को कुछ शांत-सा दिखाओ अब
तुम्हारे पाँव छाले बन गये हैं बुआ
तुम्हें अब आराम करना चाहिए.

 

pinterest से आभार सहित

2.
भाई की तस्वीर निहारते हुए

तुम्हारी बारहवीं के बाद
दादा के कहने पर खिंचवायी थी यह फोटो
ताकि घर में हम दोनों के न होने पर
दोनों की इस तस्वीर में उतर सके उनकी नज़र

दादा चले गये
तुम भी चले गये परदेस
साथ ही ले गये वह फ़ोटोफ़्रेम
छुपाकर दादा की याद से

भाई!
कनाडा की खुली सड़कों और परदेसी रुपयों में
बचा कर रखना इतनी जगह
कि दादा की नज़र उतर पाये
दीवार पर टंगी तस्वीर तक
कि याद की हूक का कोई देस नहीं

ये नदी
जिसके बग़ल में खड़े मुसकुरा रहे हैं हम दोनों
सूखती जा रही है साल-दर-साल
रह-रह उठती है तुम्हारे गोतों की आवाज़ यहाँ से
परदेस में मिलती है इतनी जगह?
कि दो पल भर लो भीतर
बहते पानी की ख़ुशबू

हाथ फैलाए खड़े रहते थे तुम चार साल
सबके मुँह की तरफ़ तकते
कि कोई खर्चा दे तो हो आऊँ दोस्तों संग कहीं
अब बात-बात पर कह देते हो
मैं भेज दूँ कुछ पैसे?

इस पाँच शब्दों के वाक्य के अलावा
है भी क्या तुम्हारे पास
यहाँ के दुखों में भागीदारी का साधन?

यहाँ के दुख छोड़ो, अपने कहो भाई!
हर वीडियो कॉल में बैठे मिलते हो उसी कार की ड्राइवर सीट पर
सिक्योरिटी गार्ड की जैकेट पहने
उस देश की इमारतों की रक्षा करते
जहाँ तुम्हें बिलखते हुए
बस तुम्हारी कार के शीशे ने देखा है

हम दोनों जन्मे नहीं हैं
गिरे हैं एक ही कोख से
गिरते हुए जो हाथ थामा
भाइयों की सारी रूढ़ियों को नकारते हुए
गुथ गया है अब इक-दूजे में

कौन कह सकता है हमें देख
कि मेमनों जैसे मिमियाये हैं हम पंचों के आगे
बिलखते हुए दी है सफ़ाई पंचायतों को
कि कोई हाथ नहीं हमारा
हमारे पैदा होने में

गाँव वालो!
यह क़सूर थोपा गया है हम पर
यह दुख पुरखों ने गाड़े हैं हमारी जड़ों में
हमें बेटे का फ़र्ज़ मत रटाओ
हमारा सब ले जाओ पर इस दुख से उभारो
हे पंच परमेश्वर!

गाँव की फूहड़ बातों से लड़ते-लड़ते
भूल गया हूँ कि कवि भी होना था मुझे
भाई!
इस तस्वीर ने दिलाया यह याद वापस

इस तस्वीर से माप सकता है कोई?
कितने गहरे भेदा गया हमारे बालमन को?
कितनी बार रगड़े हैं हम दण्डवत
किसी-न-किसी के पैरों में?
कितनी बार माँगी हैं बेवजह माफ़ियाँ?
कितनी बार भरे हैं हर्जाने इस घर में जन्मने के?
कितनी बार फोड़े हैं तुमने दरवाज़े?
कितनी बार जड़े हैं मैंने थप्पड़ ख़ुद को?

मालूम है मुझे
दहाड़ोगे यह पढ़कर तुम
फोड़ोगे हाथ कार के हैंडल पर
ज़ोर से चीख़ेगा हॉर्न; पर कोई सुनेगा नहीं

तुम कार में होगे
भाग जाने के सब साधनों से लैस
पर हिल नहीं पाओगे इंच भर भी

हम कहीं नहीं जा सकते भाई
हमारी यही नियति है.

 

pinterest से आभार सहित

3.
दादा की तस्वीर निहारते हुए

तुम्हारे आख़िरी समय में तुम
पहाड़ों से उतरकर
पंजाब में उस ज़मीन को देख आना चाहते थे
जिसके लिये दादी ने दिये थे लाला को कितने ज़ेवर
तुमने कितने पत्थर तोड़े थे जिसके लिये

पंजाब जाते थे तो कहते थे
देस जा रहा हूँ
जैसे तुम्हारा पहाड़ी गाँव देस का हिस्सा न हो

तुम्हारे आख़िरी समय में तुम
बुआ के घर भी जाना चाहते थे एक बार
रूँधे गले से टालती रही वह तुमको
कि क्लेश न हो कोई तुम्हारे घर

तुम्हारी जगह कहाँ थी दादा?
कहाँ था वह टुकड़ा जिसे तुम घर कह सको?

बहुत रोए तुम जीवन भर
पर आज उमड़ी है भीतर तुम्हारी हँसी की याद दादा

पहाड़ी झुर्रियों वाले चेहरे पर
पोपले मुँह की हँसी
तुम्हारे हुक्के की गुड़-गुड़ जैसी

मेरी याद तक क्यों नहीं पहुँचती वह याद
जिसे सोच तुम ठठाकर हँस दिये थे

भेड़, बकरी, भैंस, इंसान
किसी का हाथ-पैर टूटे
पाँच-छह लकड़ियाँ लगा
ख़ुद ही कर देते थे उपचार
किसी डॉक्टर के पहुँचने से पहले

क्या-क्या नहीं टूटा है मेरा
फुसलाकर थाम लो
और झटके से मोड़ दो मेरी मोच
कि अब थिरकना भूल रहा हूँ मैं

तुम्हारी पत्नी होने से पहले
तुम्हारे बड़के की साली थी दादी
उसके घर पर छत बिछाते हुए
देखते रहे तुम ख़्वाब अपने ब्याह के

अब देखा करती है वह
छत से गिरते चक्कों को अक्सर

कोई इनाम मिला था मुझे
प्रिंसिपल ने तुम्हें बधाई दी
तुम्हारे मुँह से निकला: आपको भी!
जैसे सुख का इकलौता अर्थ सामूहिक हो तुम्हारे लिये

गाँव की राह में चट्टान दिखती
कि तुम निकल जाते हथौड़ा-छेनी लिए
कुछ घंटों में टाँक देते सीढ़ियाँ उसमें
फिसल न जाये कहीं
गोबर ढोता कोई बच्चा-बूढ़ा

उन्हीं सीढ़ियों से उतरते
चले गये हो तुम खबरू के खेतों तक शायद
उस चट्टान को ढूँढते
जो बाड़ थी हमारी ज़मीन की
या शायद निकल गये हो ज़मीन से भी बाहर

और मैं जहाँ भी हूँ
आ पहुँचा हूँ यहाँ
उन्हीं सीढ़ियों को चढ़ता-चढ़ता

ओबरे में तुम्हारी संदूक में
ख़ाली पड़ा है तुम्हारे आने-जाने का बटुआ

जाना ही था
तो इसमें छूटी अपनी गंध भी ले जाते दादा

पंजाब की उस ज़मीन पर से गुज़रा आज
जहाँ तुमने कभी कुआँ खोद दिया था अकेले
कश्मीरी मज़दूरों के अँजुरी-भर पानी माँगने पर

लौटा हूँ फ़ोन में सहेजे
वहाँ की नयी तस्वीर
तुम्हारे आख़िरी समय की चाह का दस्तावेज

पर अब किसे दिखाऊँ दादा?
कि तुम अब वहाँ से भी बहुत दूर चले गये
जहाँ को तुम देस कहते थे.

 

pinterest से आभार सहित

4.
एक क्लासमेट की तस्वीर निहारते हुए

पहाड़ों की ठंडी शाम में
जब दूर-दूर तक उदासी का छींटा तक न हो
सारे आँसू सोख गई हो चिड़िया की आवाज़
चीड़ के दरख़्तों में टहलती हवा
रख चुकी हो सारे महानगरी सपनों के होंठों पर उँगली

यह तस्वीर देखते ही कौंधती है ज़हन में
नौवीं कक्षा की वह सुबह
जब तुम मेरी छाती पर बैठ
मेरे मुँह से अपना लिंग रगड़ रहे थे!

हम तो दोस्त हुआ करते थे न शौनक?
ऐसा क्या कुरेद दिया था मैंने तुम्हारे भीतर
कि मेरे शरीर पर अब
तुम्हारी चोटों के निशान हैं

मेरे घुटने से थोड़ा नीचे एक नील है
तुम्हारे हैंडबॉल खेलकर लौटते हुए
भारी वाले सफेद जूते की नोक से रंगी पेंटिंग

ठिगने से तुम
चाहता तो जड़ता एक उल्टे हाथ की
हैंडबॉल की तरह उड़ते स्कूल से बाहर तक
पर क्यों नहीं कर पाया कभी कुछ?

मेरा चार नंबर बेड खाली रहता अक्सर
तुमसे छुपता
इंतज़ार में कि तुम सो जाओ
तब घुसूँ हॉस्टल में आज फिर

आठवीं में एक ही बेंच पर बैठते थे हम शौनक
तुमने कितनी कहानियाँ बतायीं थी मुझे
कि तुम्हें डॉक्टर बनना है
कि तुम्हारी दादी को तुम्हारी ज़रूरत है
कि तुम्हें सुहानी बेहद पसंद है
कि तुम्हें भी यह अमीर लड़के समझ नहीं आते
कि स्कूल के पीछे जो पहाड़ है
तुम्हें किसी इतवार तड़के-तड़के
उसके ऊपर जाना है
कि वहाँ एक लंबा घास का मैदान है
कि वहाँ मखमली गायें चरती हैं

तो एक ही साल बाद
तुम्हें अपनी छाती पर कैसे पाता हूँ मैं शौनक?
तुम्हें किसने सिखा दिया?
कि मेरा शरीर तुम्हारा मैदान है
कि तुम उसे रंग सकते हो घिनौने रंगों से
ठोक सकते हो कीलें यहाँ
टाँग सकते हो अपनी सारी मर्दानगी जिन पर

तुम एक बार चक्कर खाकर गिरे थे
चार-पाँच लड़के तुम्हें नर्स-ऑफिस लेकर गए
उनके पीछे मैं भी था
नक़ली आँसू बहाता
तुम्हें होश आए; तुम मुझे रोता देखो
और अगले दिन से मुझे पीटना छोड़ दो

उस रात चार नम्बर बिस्तर फिर खाली था
पर तुम्हारे कारण नहीं शौनक
बाक़ी बाईस लड़के हँसते थे उस रात
कि नेगी चूतिया है
झूठ-मूठ कौन रोता है यार?

और भी दर्जनों ने ठोकी हैं कीलें मुझपर
और भी कइयों ने किए हैं प्रहार
एक वह सीनियर जिसे मुझमें लड़की दिखती थी
एक वह जूनियर जो एक रात बिस्तर पर आया
बायोलॉजी का प्रैक्टिकल समझने

कई और थे
जिन्हें मुझमें कुछ ऐसा दिखता
जिसकी बात वह बस रात में करते
कई अब शादीशुदा हैं, कई बाप

पर तुम में ऐसा क्या था शौनक?
कि तुम्हारी याद, यह टीस
आज तक खींचता फिरता हूँ अपनी पीठ से
हाथों में एक झुरझुरी उठती है तुम्हें सोच

तुम्हें सोचता हूँ तो नौवीं में ख़ुद को सोचता हूँ
झकझोरना चाहता हूँ उसे
उठ साले!
कुछ बोलता क्यों नहीं है?
यह लड़का जो तेरे मुँह पर अपनी मर्दानगी लटकाए बैठा है
इसे काटा भी जा सकता है
ख़त्म किया जा सकता है
यह वीर्य का लोटा बम है
जब फटता है तो कोलेट्रल डैमेज पुश्तें झेलती हैं

पर उस नौवीं कक्षा के पहाड़ी लड़के को
जो उस बिस्तर पर लेटा था शौनक के नीचे
जो कुछ-कुछ लड़की दिखता था
जो गोरा था; और गोरा होना उसका गुनाह था
जिसके दादा पत्थर तोड़ते थे
पर उसके हाथों में पत्ता तोड़
ने जितना ज़ोर नहीं था
जिसके भाई को उन दिनों पहला प्रेम हो रहा था
जो उसकी समझ से बाहर था
और जिसकी बुआ सबसे लड़कर थक चुकी थी
और जिसे यह पता नहीं था
कि बुआ के सामने ‘वीर्य’ कहा कैसे जाए

उस लड़के को
किसी ने नहीं झकझोरा
और वह लेटा रहा आँखें चौड़ी कर
तेईस बिस्तरों की हँसी के बीच

यहाँ रुक जाती कहानी तो भला था फिर भी
दुख है कि यह अंत नहीं
दुख यह है कि मैं भी तो बच्चा था
दुख यह कि किसी ने बताया नहीं
कि इंसान होना कितना जटिल है

तो दसवीं में जब अलग हुए हमारे हॉस्टल
क्यों पहुँच जाया करता था मैं रोज़ रात
शिवालिक के बेड नंबर पंद्रह की खिड़की के बाहर?
तुम्हें पुकारते

शौनक मुझसे बात करो!
शौनक में तुम्हें मिस करता हूँ
शौनक यह क्या है जो मेरे भीतर उफनता है?
शौनक मैं यह खिड़की तोड़ देना चाहता हूँ
शौनक मुझे सपने में मखमली गाय दिखायी दी
शौनक मुझे भी अब डॉक्टर बनना है
शौनक तुम यह खिड़की खोलोगे या नहीं?
शौनक तुम सिर्फ़ मेरे दोस्त हो
सिर्फ़ मेरे!

यह क्या था
जो मुझे खींच लाता था तुम तक शौनक?

अच्छा है तुम दसवीं के बाद चले गए
तेरह बरस हुए तुम्हें देखे अब

तुम भी ठंडी पहाड़ी शामों में टहलते हो शौनक?
तुम्हारी दादी अब कैसी है?
तुम डॉक्टर बने या नहीं फिर?
पहाड़ के ऊपर सच में घास का मैदान है क्या?
क्या सच में वहाँ मखमली गाय चरती हैं?

तुम्हारा ब्याह तो हो गया होगा?
और बच्चे?
अपने लड़के को सिखाना
छातियाँ चढ़ने के लिए नहीं
गले लगने के लिए होती हैं!

मैं भी सिखाऊँगा इधर
कि कोई और न भी हो
तो ऐन वक्त पर ख़ुद को झकझोरना.

 

 

 

5.
ख़ाली फोटोफ्रेम निहारते हुए

दो दशक हो गए
यह ख़ाली फ़्रेम निहारते हुए
इंसानी आकार दिखायी पड़ता है
चेहरा नहीं

पूरा प्रेम-पत्र लिख देने के बाद
अटकी रहती है पेन पहली पंक्ति पर
प्रिय के आगे जोड़ने को कोई नाम नहीं सूझता

आठवीं कक्षा में वह लड़की
बायोलॉजी लैब में जिसके बस्ते में
चुपके से एक पत्र रख आया था
उस प्रेम का इज़हार करते हुए
जो दरअसल कुछ था ही नहीं
अब तस्वीरों में अपने पति संग दिखायी पड़ती है

कॉलेज का वह लड़का भी
जो कॉलेज में दोस्त से कहीं ज़्यादा था
तैयार है अगले बरस ब्याहने को

नुक्कड़-नाटकों में ढोल पीटते हुए
भीड़ों को समझाते हुए गूढ़ बातें, ज़रूरी मुद्दे
शामों को लौटते हुए उस लड़के के बिस्तर पर
खेलते हुए उसके बालों, गालों, और हाथों से
चुम्बनों से रंगने, रंगे जाने के बाद भी
नहीं समझ आया कि वह प्रेम था
क्योंकि उस प्रेम की शब्दावली नहीं थी जीभ पर

यह फ़ोटोफ़्रेम जिसमें लगायी जा सकती थी उसकी तस्वीर
ख़ाली ही रही कॉलेज के चार साल
मन-दीवार पर से निहारती मुझको हर दिन

जब प्रेम मिला तो नकारता रहा मैं
उस होटल में वह लड़का
जिसने मेरे जन्मदिन पर गुब्बारे टाँगने के लिए
अपना जनेऊ उतार दिया था
चाहता तो उसकी तस्वीर से भर सकता था यह फ़्रेम
पर नहीं,
इंस्टाग्राम एस्थेटिक पर जँचा नहीं वो शायद

हालाँकि कितना उग्र एस्थेटिक था
जनेऊ से किसी वर्जित प्रेम का लटकना

लटकता लटकता
अब इस महानगर में
असंख्य बिस्तरों तक आ पहुंचा हूँ

डेटिंग ऐप खोलता हूँ
तो सौ शरीर मिलते हैं जाँघें फैलाए
एक बिस्तर से उतरता हूँ
अगला कदम दूसरे बिस्तर पर पड़ता है

सहवास की देहरी लांघते ही
उचक जाती है गोदी में
कितने सालों से दौड़ती आती टीस

कितनी तस्वीरों से भरी है दुनिया
कितने नाम हैं इस संसार में
पर मेरे नाम कोई नाम नहीं!

कहाँ हैं मेरे हिस्से की चारुशिलाएँ?
मेरे हिस्से के इंद्रनील कहाँ हैं?
सरसों के कौन से खेत में खड़ी है सिमरन?
कहाँ बहती है वह चनाब
जिसके पार मेरे हिस्से के महिवाल हों?

बुलाओ उन्हें
मेरे गालों पर दो हथेलियों की जगह ख़ाली है
कंठ में रखी जा सकती है अभी एक पुकार

वे आयें
मुझे प्रिय के आगे एक नाम लिखना है
मुझे इस फ्रेम को एक तस्वीर सौंपनी है.

 

शुभम नेगी (जन्म: 4 दिसंबर 1997, बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश) लेखक, कवि और फ़िल्म निर्देशक हैं. उन्होंने 2018 में आईआईटी वाराणसी से इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की. उनकी एक कहानी को 2022 में हंस कथा सम्मान में विशेष ज्यूरी सम्मान और एक समीक्षा को 2024 में हंस समीक्षा सम्मान मिला है. वे नेटफ्लिक्स के ‘टेक टेन’ ग्रांट के विजेता हैं; उनकी फीचर फ़िल्म ‘सोमा हेलंग’ का चयन एनएफडीसी को-प्रोडक्शन मार्केट 2024 में हुआ था. वे ‘दी राइटर्स इंक लैब’ तथा ‘क्वियरफ्रेम्स स्क्रीनराइटिंग लैब’ (नेटफ्लिक्स–फ्रेंच इंस्टीट्यूट) के फेलो रहे हैं, काशिश फ़िल्म फ़ेस्टिवल में उनकी एक लघु फ़िल्म की स्क्रिप्ट को ग्रांट मिली है, और नेटफ्लिक्स ने उन्हें NFCE कोहोर्ट के तहत बुसान अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में प्रतिनिधित्व के लिए भेजा है.
shubhamnegiwork@gmail.com

Tags: 20252025 कविताएँतस्वीर निहारते हुएनयी सदी की हिंदी कविताशुभम नेगी
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Comments 7

  1. रास बिहारी गौड़ says:
    2 months ago

    लाजवाब, हर कविता संवेदना और सरोकारों से लदी .. अगर कोई संग्रह हो तो बताएं, पूरी पढ़ने का मन हर

    Reply
  2. निशांत उपाध्याय says:
    2 months ago

    Shubham is amongst the flagbearer of the younger generations’ creativity.

    Reply
  3. Ammber Pandey says:
    2 months ago

    इन कविताओं का आवेग (emotional intensity) और संयम (restrain) अत्यंत प्रशंसनीय है, यह विमर्श और अस्मिता से परे मानवीय स्थिति (human condition) की कविताएँ है और ख़ुद को दूसरों से अलगाकर कि देखो मेरा अनुभव आपसे अलग है, इस तरह अपना स्थान नहीं बनाती।
    विपरीत लिंगी संबंध (cishet) जो कि हमारे समाज में सामान्यीकृत है ऐसे कवि इतनी अच्छी और गहरी कविता नहीं लिख पा रहे तो आप सोच सकते है कि इन कविताओं को लिखना मन को कितना निचोड़ देनेवाला होगा।

    Reply
  4. Upasana Jha says:
    2 months ago

    आवेग को नियंत्रण के साथ लिखना और वर्जित विषयों को कविता में स्थान दिलाना, आपकी विशेषता है। मन में ठहर जाने वाली कवितायें हैं।

    Reply
  5. योगेश ध्यानी says:
    2 months ago

    इन कविताओं से गुज़रना मन के सबसे कोमल हिस्सों से गुज़रने जैसा है। कथाओं में यदि कहीं क्रूरताएं भी हैं (जो कि हैं ही), वे भी आपकी कविताओं के बयान में किसी बहुत गहरी नदी की कोमलता की तरह हम तक पंहुचती हैं। सभी कविताएं गहरा असर रखती हैं और “दोस्त की तस्वीर” तो पाठक को बहुत भीतर तक भेदती है।
    कविताओं की भाषा भी उसकी विशेषता में इजाफा करती है। आप मन को इन कविताओं के जरिये खोल सके। इस बात के लिए बधाई…..लिखते रहें भाई

    Reply
  6. Viresh Kumar Tyagi says:
    1 month ago

    बहुत अच्छी कविताएँ हैं! अनुभूतियों की इतनी महीन बुनावट, बहुत कम देखने में आती है!
    शुभकामनाएँ!!

    Reply
  7. पवन करण says:
    1 month ago

    कविताएं हैं कि स्मृति कि नदी की तरह बहती चली जाती हैं।
    बढ़िया।

    Reply

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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