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Home » कीहोल सर्जरी: अशअर नज्मी : अनुवाद: रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी

कीहोल सर्जरी: अशअर नज्मी : अनुवाद: रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी

प्रेम पर निगरानी की वर्तमान विडम्बनाओं और विद्रूपताओं को अशअर नज्मी की कहानी ‘कीहोल सर्जरी’ बड़ी ही पुख्तगी से सामने रखती है. ताला और चाभी मानो स्वयं एक किरदार बन उठते हैं. ताले खोलने की प्रक्रियाओं का ऐसा महीन और सूक्ष्म वर्णन सचमुच आश्चर्यचकित करता है. इस कहानी का सुंदर अनुवाद रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी ने किया है. प्रस्तुत है.

by arun dev
February 15, 2026
in कथा
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कीहोल सर्जरी: अशअर नज्मी : अनुवाद: रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी
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कीहोल सर्जरी
अशअर नज्मी
उर्दू से अनुवाद: रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी

 

लिफ़्ट की दीवारों पर लगे आईने में अब्दुल क़य्यूम को अपना अक्स किसी पुराने, ज़ंग लगे ताले जैसा लगा. उसके हाथ में पकड़ा चमड़े का थैला, जिसमें पीतल की सुइयाँ, फ़ौलादी तार, ड्रिल मशीन और विभिन्न आकार के फ़ाइलर भरे थे, उसे अपने ही शरीर का एक भारी हिस्सा महसूस हो रहा था. बत्तीसवीं मंज़िल पर जब लिफ़्ट रुकी, तो गलियारे की सफ़ेद रौशनी ने उसकी आँखों में चुभन पैदा कर दी, जहाँ पहले से ही एक अदृश्य ख़ौफ़ का पहरा था.

गलियारे के आख़िरी छोर पर फ़्लैट नंबर 321 के सामने एक जमावड़ा था. यह वह पारंपरिक भीड़ नहीं थी जो लाठियाँ लहराती है, बल्कि यह ‘डिजिटल भेड़ियों’ का झुंड था जिनके एक हाथ में स्मार्ट फ़ोन थे और आँखों में एक ऐसा ‘विश्वास’ जो किसी भी सबूत से ज़्यादा घातक होता है.
“आ गया चाबी वाला!”

एक घुटी हुई आवाज़ आई. यह इंस्पेक्टर राठौर था, जिसकी वर्दी की शिकन में घुटन छिपी थी. उसके बराबर में एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति खड़ा था, जिसकी आँखों में ‘शुद्धता की सनक’ तेज़ाब की तरह उबल रही थी.

क़य्यूम चुपचाप भीड़ को चीरता दरवाज़े के क़रीब पहुंचा. उसकी नज़रें सबसे पहले उस ‘ताले’ पर पड़ीं जो सागवान की भारी लकड़ी में पैवस्त था. यह एक आधुनिक, छह लीवर वाला डेड बोल्ट था.

“क़य्यूम मियां! वक़्त बर्बाद न करो. यह ताला चुपचाप ऐसे खुलना चाहिए, जैसे यह कभी बंद ही न हुआ हो,” इंस्पेक्टर ने दबी आवाज़ में कहा. “हमें अंदर जाकर बस ‘पुष्टि’ करनी है. अंदर एक ‘पापी’ है और एक ‘पाप’.”

क़य्यूम ने घुटनों के बल बैठकर अपना थैला खोला. उसकी उंगलियों ने एक लंबी, बारीक ‘टेंशन रिंच’ उठाई. धातु की ठंडक उसकी नसों में समा गई.

‘ताला कभी झूठ नहीं बोलता. यह तो सिर्फ़ उस ‘एकांत’ की सुरक्षा करता है जो इसे सौंपा जाता है. चाचा कहा करते थे, ‘बेटा! ताले का काम रोकना नहीं, बल्कि एक सीमा स्थापित करना है. जब तुम किसी का ताला खोलते हो, तो तुम सिर्फ़ एक दरवाज़ा नहीं खोलते, तुम उसके भरोसे को ‘पंचर’ भी करते हो.’ आज मेरी यह सुइयाँ किसी की ज़िंदगी के सबसे निजी कमरे में सेंध लगाने जा रही हैं.’

उसने कीहोल के अंदर रौशनी डाली. ताले के भीतरी पिन्स तांबे की तरह चमक रहे थे. उसने महसूस किया कि अंदर से एक बहुत महीन सी आवाज़ आ रही है; यह किसी के बोलने की नहीं, बल्कि किसी के ‘सांस रोकने’ की आवाज़ थी.

“अरे अब्दुल! कितना वक़्त लगेगा?” पीछे खड़े एक युवक ने, जो फ़ोन पर लाइव स्ट्रीमिंग कर रहा था, बेचैनी से पूछा. उसके फ़ोन की रौशनी क़य्यूम के माथे पर पड़ रही थी. “सुना है तुम लोगों कोताला खोलने से ज़्यादा घर तोड़ने वालों से कमीशन खाना पसंद है.”

क़य्यूम के हाथ एक पल के लिए रुके. उसने सिर उठाकर उस युवक को नहीं देखा, बल्कि उसकी नज़रें उस सफ़ेद एलईडी लाइट पर टिकी थीं जो गलियारे में लहरा रही थी. उसे अपना बचपन याद आया, जब वह अपने पिता के साथ पुरानी हवेलियों के ताले ठीक करने जाता था.

‘वे ताले बड़े थे, भारी थे, मगर उनमें एक लाज शर्म होती थी. उनकी चाबियाँ पीढ़ियों तक संभाली जाती थीं. आज ये जो फ़्लैट के बाहर खड़े हैं, इनके पास चाबी नहीं है, मगर ये हर ताला तोड़ना चाहते हैं. ये देखना चाहते हैं कि अंदर कौन किस रंग के बिस्तर पर सो रहा है और किसके साथ सो रहा है. ये ‘लव’ ढूंढने नहीं निकले, ये तो उस ‘ख़ालीपन’ को भरना चाहते हैं जो इनके अपने अंदर व्याप्त है.’

उसने ‘पिक’ को ताले के अंदर डाला. पहली पिन का जब इस्पात से टकराव हुआ, तो एक हल्की सी ‘क्लिक’ की आवाज़ आई. यह आवाज़ क़य्यूम के लिए किसी के दिल की धड़कन जैसी थी. उसने बड़ी सफ़ाई से दूसरे लीवर को ऊपर उठाया.

ताले के अंदर का मैकेनिज़्म प्रतिरोध कर रहा था, जैसे वह भी बाहर खड़ी भीड़ का चरित्र जानता हो.

“इंस्पेक्टर साहब! अगर मैंने इसे खोला, तो यह ताला फिर कभी काम नहीं करेगा,”क़य्यूम ने धीमी आवाज़ में कहा. “इसका स्प्रिंग टूट सकता है.”

“तुम ताले की चिंता मत करो, देश की चिंता करो,” इंस्पेक्टर ने व्यंग्य किया. “अंदर जो ‘ब्रेन वॉशिंग’ चल रही है, उसे रोकना ज़रूरी है. तुम बस अपना काम करो.”

क़य्यूम ने महसूस किया कि उसके अपने सीने में एक गाँठ लग गई है. उसने तीसरी पिन को दबाया. ताला अब आधा खुल चुका था. अब केवल एक आख़िरी झटके की ज़रूरत थी और वह मर्यादा ‘पदध्वस्त’ हो जानी थी जिसकी सुरक्षा का दावा यह दरवाज़ा कर रहा था.

अचानक, दरवाज़े के दूसरी ओर से एक बहुत हल्की सी सिसकी की आवाज़ आई. यह किसी लड़की की आवाज़ थी, या शायद यह क़य्यूम का वहम हो. इस आवाज़ ने उसकी उंगलियों में वह कपकपी पैदा कर दी जो उसे चालीस साल पहले तब महसूस हुई थी जब उसने पहली बार अपनी माँ के बक्से का ताला खोला था ताकि उसमें से वह पुरानी तस्वीर निकाल सके जो अब्बा ने सबकी नज़रों से छिपा रखी थी.

‘इस दरवाज़े के पीछे क्या है? एक लड़का? एक लड़की? या इस देश की आख़िरी सांस? अगर मैंने यह रास्ता समतल कर दिया, तो यह भीड़ इस कमरे को एक बाज़ार बना देगी. मेरा हुनर क्या आज एक ‘जासूस समाज’ की मदद कर रहा है?’

क़य्यूम ने चौथी पिन पर दबाव डाला. धातु की रगड़ से एक कराह सी निकली. भीड़ एक क़दम और क़रीब आ गई. मोबाइल फ़ोन के कैमरे अब क़य्यूम के कंधों के ऊपर से झाँक रहे थे.

अब्दुल क़य्यूम की पेशानी से पसीने की एक बूँद ढलकी और उसकी ऐनक के शीशे पर एक धुंधला सा निशान छोड़ गई. उसने पलक झपकाई, पर उसका पूरा ध्यान उस ‘शेयर लाइन’ पर था जहाँ ताले के आंतरिक पिन्स को एक रेखा में आना था ताकि सिलेंडर घूम सके. उसके हाथ में मौजूद बारीक स्टील का टुकड़ा ताले के अंधेरे पेट में किसी अंधे की लाठी की तरह सच्चाई टटोल रहा था.

“क़य्यूम मियां! उंगलियाँ थक गई हैं क्या?” इंस्पेक्टर राठौर की आवाज़ अब उसके कान के बिल्कुल क़रीब थी. उसके स्वर में तंबाकू की बास और एक रौबदार बेसब्री थी. “याद रखना, अगर किसी खुली खिड़की से परिंदा उड़ गया, तो इसकी ज़िम्मेदारी तुम्हारे इन सुस्त हाथों पर होगी.”

क़य्यूम ने कुछ नहीं कहा. उसे इस समय उन मोबाइल फ़ोन के कैमरों के ‘लेंस’ अपने शरीर पर चुभते महसूस हो रहे थे, जो गलियारे के भारी अंधेरे में किसी भूखे दरिंदे की आँखों की तरह चमक रहे थे.

‘ये लोग जो यहाँ साँसें रोके खड़े हैं, इन्हें इस बात से मतलब नहीं कि ताला कैसे खुलता है. ये तो बस उस ‘एकांत’ का दर्शन करने को लालायित हो रहे हैं जो इस दरवाज़े के पीछे क़ैद है. एक ताला किसी के घर की आख़िरी सरहद होता है, वो स्थान जहाँ इंसान दुनिया से कटकर खुद से मिलता है. लेकिन आज यह सरहद एक तमाशा बनने वाली है. यह भीड़ किसी अपराध को पकड़ने नहीं आई, यह तो दूसरों के बिस्तरों में झाँकने की उस प्राचीन बीमारी की शिकार है जिसे अब ‘राष्ट्रीय कर्तव्य’ का नाम दे दिया गया है.’

उसने पाँचवीं पिन पर दबाव डाला. ताले के अंदर से एक सूखी रगड़ की आवाज़ उभरी. क़य्यूम का हाथ रुक गया. उसे अपना वो पहला काम याद आया जब उसके पिता ने उसे शहर की एक पुरानी हवेली में भेजा था. वहाँ एक कमरा चालीस साल से बंद था और घर वाले देखना चाहते थे कि अंदर क्या है. जब क़य्यूम ने ताला खोला, तो अंदर सिर्फ़ गर्दो-ग़ुबार, कुछ पुरानी तस्वीरें और एक औरत की खुशबू थी जो अब मिट्टी में रुल चुकी थी. उस दिन उसे पहली बार एहसास हुआ था कि कुछ ताले इसलिए नहीं लगाए जाते कि कोई चीज़ चोरी न हो जाए, बल्कि इसलिए लगाए जाते हैं कि किसी का ‘सच’ सुरक्षित रहे.

आज इस फ़्लैट नंबर 321 का सच बाहर खड़ी इस भीड़ के लिए केवल एक ‘वायरल वीडियो’ की खुराक भर था.

“देखो यार! यह अब्दुल जानबूझकर देरी कर रहा है,” भीड़ में से कोई उकताकर बोला. “लगता है अंदर वालों को समय दे रहा है ताकि वे अपनी ‘मस्ती’ पूरी कर लें.”

क़य्यूम ने महसूस किया कि उसके दिल की धड़कन अब ताले के स्प्रिंगों के कंपन से ताल मिला रही है. उसने छठे और आख़िरी पिन को छुआ. यह पिन सबसे ज़्यादा ज़िद्दी थी. उसने ‘टेंशन रिंच’ पर दबाव थोड़ा कम किया और फिर दोबारा उसे ऊपर की ओर धकेला.

‘ताला एक औरत की आबरू जैसा होता है, जो ज़बरदस्ती करो तो टूट जाती है, पर अगर उसकी ताल (Rhythm) समझ लो तो वह खुद रास्ता दे देती है. मगर ये जो बाहर खड़े हैं, ये ताल को नहीं मानते. उनके लिए हर वो दरवाज़ा जो नहीं खुलता, एक साज़िश है. निजता अब एक जुर्म बन गई है. अगर आप अपनी खिड़कियाँ खुली नहीं रखते, तो आप संदिग्ध हैं. अगर आप अपने कमरे का ताला मज़बूत रखते हैं, तो आप ग़द्दार हैं.’

अचानक, दरवाज़े के अंदर से किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ आई. शायद कोई गिलास टूटा था या शायद किसी ने बौखलाहट में मेज़ को ठोकर मारी थी. इस आवाज़ के साथ ही गलियारे में मौजूद भीड़ में एक सनसनी दौड़ गई. मोबाइलों के कोण बदल गए, लोग एक-दूसरे के ऊपर झुकने लगे ताकि दरवाज़ा खुलते ही पहला फ़्रेम उनकी स्क्रीन पर हो.

इंस्पेक्टर राठौर ने अपनी कमर से लगी हथकड़ी को टटोला. लोहे के टकराने की आवाज़ ने क़य्यूम की नसों पर एक चाबुक लगाई.

‘आख़िरी पिन… बस एक मामूली सा स्ट्रोक… और यह घर बाज़ार बन जाएगा. जिस लड़की की सिसकियाँ मैं सुन रहा हूँ, उसका नाम और उसका चेहरा कल के अख़बार के लिए एक ‘डिजिटल पंचर’ बन जाएगा. उसका पिता, उसकी माँ, उसकी प्रतिष्ठा… सबकुछ इस एक ‘क्लिक’ की मार हैं.’

क़य्यूम की उंगलियों ने एक आखिरी प्रतिरोध महसूस किया. ताले का सिलेंडर अब घूमने के लिए तैयार था, पर क़य्यूम का अंगूठा वहीं जम गया.

“क्या हुआ?” इंस्पेक्टर ने पूछा.

क़य्यूम ने चश्मा उतारा और अपने मैले कुर्ते के पल्लू से उसे साफ़ करने लगा. उसकी आँखों में वह अकेलापन था जो सिर्फ़ सच्चाई का बोझ उठाकर चल रहे लोगों के पास होता है.

“साहब… ताला फँस गया है,” उसने धीमे स्वर में कहा.

“फँस गया है? क्या मतलब? तुम तो खिलाड़ी आदमी हो!” इंस्पेक्टर की आवाज़ में अब ग़ुस्सा उभरने लगा था.

क़य्यूम ने ताले के छिद्र की ओर इशारा किया जहाँ उसकी स्टील की सुई अब भी पैवस्त थी. “इसका आंतरिक लीवर टूट गया है. अब यह किसी चाबी से नहीं खुलेगा. अब इसे सिर्फ़ तोड़ना पड़ेगा… और इसे तोड़ने का मतलब है इस दरवाज़े को हमेशा के लिए बेकार कर देना.”

भीड़ में से एक ग़ुस्से भरी आवाज़ आई: “तो दरवाज़ा तोड़ दो! हमें अंदर जाना है!”

क़य्यूम ने उस व्यक्ति की ओर देखा जिसके माथे पर भगवा रंग की पट्टी बंधी थी और जिसकी नज़रें दरवाज़े के हैंडल को किसी नुकीले हथियार की तरह घूर रही थीं.

‘यह तोड़ना चाहते हैं… सिर्फ़ ताला नहीं, यह तो इस शहर की हर उस दीवार को तोड़ना चाहते हैं जो उनकी नज़रों के आगे रुकावट बने. उन्हें तमाशा-घर चाहिए, केवल घर नहीं.’

गलियारे में फैली घुटन अब गंध में बदल रही थी; पसीने, सस्ते परफ्यूम और एक ऐसी जुनूनी इच्छा की गंध जो दूसरों की बदनामी से जन्म लेती है. अब्दुल क़य्यूम ने जब कहा कि ताला फँस गया है, तो पीछे खड़ी भीड़ में एक ग़ुस्से की लहर दौड़ी, मगर उसमें एक अजीब तरह का स्वाद भी शामिल था, जैसे वे इस सस्पेन्स का भी मज़ा ले रहे हों.

“फँस गया है या फँसाया गया है?” वही भगवा पट्टी वाला युवक दांत किटकिटाकर बोला. उसने अपने फ़ोन का कैमरा और क़रीब कर दिया, यहाँतक कि उसकी तेज़ रौशनी क़य्यूम की गर्दन के रोमछिद्रों को नंगा करने लगी. “देखो भाई! लगता है अब्दुल अपना ‘हुनर’ दिखा रहा है. अंदर उसका भाई किसी मासूम हिंदू लड़की का ब्रेनवॉश कर रहा है और यह बाहर ताले को ‘टेक्निकल एरर’ बना रहा है.”
भीड़ में एक घुटी हुई हंसी गूंजी.

“अरे भाई, ये लोग ट्रेनिंग लेकर आते हैं,” एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति ने, जिसके हाथ में पीले रंग की डायरी थी, कहा. “पहले बहन-बेटियों को जाल में फँसाते हैं और फिर जब पकड़े जाएं तो इन जैसे कारीगर रास्ता रोककर खड़े हो जाते हैं. ताला नहीं फँसा साहब, इसके अंदर का ‘भाईचारा’ जाग गया है.”

क़य्यूम के हाथ काँप रहे थे. उसे अपने थैले में मौजूद फौलादी औज़ार अब किसी की हत्या के हथियार लग रहे थे. उसकी नज़रें ताले के उस महीन छेद पर जमी थीं, जिसके अंदर उसकी स्टील की सुई अभी तक एक अधूरे सच की तरह पैवस्त थी.

दरवाज़े के पीछे से अब किसी के तेज़ी से चलने की आवाज़ आई. शायद वे खिड़कियाँ चेक कर रहे थे.

“सुना है अंदर वाली लड़की किसी पंडित की बेटी है, “पीछे से एक औरत की आवाज़ आई जो अपने फ़्लैट का दरवाज़ा थोड़ा सा खोलकर यह तमाशा देख रही थी. “इन लोगों को पता होता है कि कहाँ हाथ मारना है. पहले मीठी बातों का शहद चटाएँगे और फिर… अब देखना, अंदर से क्या क्या निकलता है. उनके पास कोई ‘ख़ास इत्र’ होता है, जिससे ये दूसरों को अपने वश में कर लेते हैं?”

“इत्र नहीं बहन जी, ये ‘लव जिहाद’ है,” एक दूसरे युवक ने जुमला कसा. “इनका तो पूरा नेटवर्क है. एक ताला खोलता है, दूसरा दिल. और जब दरवाज़ा बंद हो जाए, तो समझो कि एक और शिकार हलाल हो रहा है. इंस्पेक्टर साहब! दरवाजा तोड़ दीजिए, इस अब्दुल के भरोसे मत रहिए, ये तो शाम तक इसे ‘दुरुस्त’ ही करता रहेगा.”

इंस्पेक्टर राठौर ने क़य्यूम के कंधे पर अपना भारी हाथ रखा. उसके बूटों की धमक गलियारे के सन्नाटे को खुरच रही थी.

“क़य्यूम! ये लोग सही कह रहे हैं. मेरा भी सब्र जवाब दे रहा है. अगर तुमने अगले दो मिनट में ये दरवाज़ा नहीं खोला, तो मैं हथौड़ा इस्तेमाल करूंगा, फिर इस घर की दीवारें भी सलामत नहीं रहेंगी.”

क़य्यूम ने आँखें बंद कर लीं. उसे अपनी बेटी याद आई, जो छोटी थी तो अक्सर अपने कमरे का ताला अंदर से लगाकर गुड़िया से बातें किया करती थी. क़य्यूम कभी उसका ताला नहीं खोलता था, वह बाहर से दस्तक देता था और उसके ‘हाँ’ कहने का इंतिज़ार करता था.

‘वह ताला ‘ख़ौफ़’ के लिए नहीं था, वह तो उसके ‘बचपन’ की सरहद थी. लेकिन आज इस दरवाज़े के पीछे जो सरहद है, वह बिखरने वाली है. यह भीड़ अंदर मौजूद इंसानों को ढूँढने नहीं आई, यह तो अपनी उस ‘नफ़रत’ की पुष्टि करने आई है जिसे उन्होंने रातों रात पाला है. यह उस लड़की का चेहरा देखना चाहते हैं ताकि कल बाज़ार में उसका चीरहरण कर सकें, और उस लड़के का नाम सुनना चाहते हैं ताकि उसके पूरे मोहल्ले पर बुलडोज़र चला सकें.’

“अब्दुल! जल्दी कर! क्या अंदर ‘निकाह’ ख़त्म होने का इंतिज़ार कर रहा है?” भीड़ में से किसी ने एक भद्दा वाक्य उछाला, जिसपर कई लोग खिलखिला कर हंस पड़े.

क़य्यूम ने फिर से ‘पिक’ को छुआ. उसके हाथ फिर से कांप रहे थे. उसने महसूस किया कि ताले के अंदर के स्प्रिंग अब टूटने के क़रीब हैं. उसने एक आख़िरी कोशिश के तौर पर सुई को एक ख़ास कोण पर मोड़ा.

अचानक, ताले के अंदर से एक तेज़ ‘कड़ाक’ की आवाज़ आई. तांबे के लीवर आपस में टकराकर बिखर गए.

“हो गया?” इंस्पेक्टर ने जल्दी से पूछा.

क़य्यूम ने अपना थैला समेटा और ज़मीन से उठकर सीधा खड़ा हो गया. उसका चेहरा सपाट था, जैसे उसने कोई बहुत बड़ी हार स्वीकार कर ली हो.

“साहब, ताला खुल गया है. लेकिन अब यह कभी बंद नहीं होगा.”

जैसे ही क़य्यूम ने दरवाज़े के हैंडल को छुआ, गलियारे में मौजूद सौ से अधिक मोबाइल फ़ोनों की रौशनियाँ एक साथ दरवाज़े की उस झिर्री पर केंद्रित हो गईं जहाँ से ‘सच’ को बाहर आना था. भीड़ एक क़दम और आगे बढ़ी, साँसें रुक गईं, और कैमरों के शटर की आवाज़ें किसी फ़ायरिंग के सिलसिले की तरह गूंजने लगीं.

क़य्यूम ने दरवाज़े को अंदर धक्का दिया. दरवाज़ा एक ऐसी लंबी चरचराहट के साथ खुला जैसे कोई बूढ़ी हड्डी टूट रही हो.

 

2.

दरवाज़ा जब पूरी तरह खुल गया, तो गलियारे की सफ़ेद रौशनी किसी सैलाब की तरह कमरे की ख़ामोशी में उतर गई. मोबाइल फ़ोनों के कैमरों की फ्लैश लाइट्स एक साथ चमकीं, जैसे दर्जनों ख़ंजर एक साथ हवा में लहरा गए हों.

अंदर का दृश्य किसी ‘साज़िश’ का नहीं, बल्कि एक ऐसी ‘बिखरी मासूमियत’ का था जिसे देखकर किसी भी आम इंसान का सिर शर्म से झुक जाना चाहिए था.

कमरे के बीच में रखी लकड़ी की डाइनिंग टेबल पर किताबें बिखरी हुई थीं. लैपटॉप की स्क्रीन पर कोई रिसर्च पेपर खुला था जिसकी नीली रौशनी वहाँ मौजूद अस्तित्वों पर पड़ रही थी. एक बीस- बाईस साल का युवक, जिसके माथे पर पसीना जम गया था, और एक लड़की, जिसने अपना चेहरा अपनी हथेलियों में छिपा रखा था. वे दोनों सोफ़े के पास फ़र्श पर सहमे बैठे थे, जैसे किसी परमाणु धमाके का इंतज़ार कर रहे हों.

भीड़ अंदर घुसी. वे लोग सोफों पर, मेज़ों पर और क़ालीन पर ऐसे चढ़ गए जैसे वे किसी मुफ़्त की प्रदर्शनी में आए हों. कैमरे लड़की के कांपते कंधों और लड़के की भयभीत आँखों के बिल्कुल क़रीब पहुँच गए थे.

इंस्पेक्टर राठौर ने मेज़ पर पड़ी किताबों को उलट-पुलट कर देखा. वहाँ कोई हथियार नहीं था, कोई ‘कोड वर्ड्स’ नहीं थे. वहाँ केवल रसायनशास्त्र  और गणित की किताबें थीं.

“तुम्हारा नाम?” इंस्पेक्टर ने लड़के को ठोकर मारते हुए पूछा.

युवा ने सूखे हुए गले से जवाब दिया, “फ़रहान… और यह… यह मेरी पत्नी है, नजमा. हम… हम परसों ही यहाँ शिफ़्ट हुए हैं. यह हमारे निकाह और रजिस्ट्रेशन के काग़ज़ात हैं…” उसने कांपते हाथों से मेज़ की दराज़ की ओर इशारा किया.

“तुम दोनों मुसलमान हो तो यहाँ छिपे क्यों हो? दरवाज़ा क्यों नहीं खोल रहे थे?” सिर पर भगवा पट्टी बांधे युवा की आँखों में अब भी शक के साए लहरा रहे थे.

“हमने घर वालों की मर्ज़ी के खिलाफ़ भागकर शादी की है,” लड़के ने अटकते झिझकते जवाब दिया, “मैं अहमदिया मुस्लिम (क़ादियानी) हूँ और नजमा के घर वाले सुन्नी मुस्लिम…हमने सोचा, शायद आप लोगों को हमारे घर वालों ने भेजा है…”

कमरे में एक ‘निराशाजनक ख़ामोशी’ छा गई.

“अरे यार, यह इनके आपस का टंटा है जो कभी ख़त्म ही नहीं होता… मरो सालों…मूड ख़राब कर दिया यार…”

वह भीड़, जो किसी ‘शिकार’ की गंध सूंघती आई थी, अब एक-दूसरे के चेहरे देख रही थी. उन्हें महसूस हुआ जैसे उनके साथ कोई बहुत बड़ा मज़ाक हुआ हो. उन्हें वह ‘लव जिहाद’ नहीं मिला जिसका विज्ञापन वे सारा दिन अपने फ़ोन पर देखते रहे थे. उन्हें तो सिर्फ़ एक साधारण, क़ानूनी और बोरिंग क़िस्म की ‘मोहब्बत’ मिली थी.

“चलो भाई, यहाँ कुछ नहीं है,” इंस्पेक्टर ने भी निराशा से कहा और मुड़ गया.

भीड़ धीरे-धीरे बाहर निकलने लगी. लेकिन जाते-जाते वे इस घर की ‘निजता’ को अपने पैरों से रौंद गई थी. अलमारियाँ खुली थीं, कपड़े ज़मीन पर पड़े थे, और सबसे बढ़कर वह लड़की अब भी अपना चेहरा नहीं खोल रही थी; जैसे उन पचासों मोबाइल फोनों की रौशनी ने उसकी आत्मा में ऐसा‘पंचर’ कर दिया था जिसे अब शायद उसका पति भी नहीं बना सकता था.

अब्दुल क़य्यूम वहीं चौखट पर खड़ा था. उसके हाथ में वह टूटा ताला था जिसके लीवर अब उसकी हथेली में चुभ रहे थे.

भगवा पट्टी वाला युवा जाते-जाते क़य्यूम के पास रुका और नफ़रत से उसके थैले को देखा. “तेरे ही भाई-भाभी हैं. देख ले क्या करना है इनका?”

वह हंसता हुआ चला गया. गलियारे में फिर से सन्नाटा छा गया, पर यह ख़ामोशी अलग थी. यह तो एक ऐसी वीरानी थी जो किसी बस्ती के लुट जाने के बाद पैदा होती है.

क़य्यूम ने कमरे के अंदर झाँका. वे दोनों अब भी वहीं बैठे थे. उनके बीच मौजूद वे किताबें अब रद्दी का ढेर लग रही थीं. क़य्यूम ने अपना थैला बंद किया और टूटा हुआ ताला वहीं फ़र्श पर रख दिया.

बाहर सड़क पर यातायात का वही शोर था, पर क़य्यूम को अपने कानों में उस टूटते हुए ताले की ‘कराह’ अब भी सुनाई दे रही थी. उसने अपने थैले को ज़ोर से भींच लिया. उसे लगा जैसे अब उसे कभी किसी ताले को खोलने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि इस देश की शर्म का ‘ताला’ हमेशा के लिए टूट चुका था.

 

अशअर नज्मी उर्दू के सुपरिचित लेखक हैं. 2021 में प्रकाशित उनके उपन्यास उसने कहा था को उर्दू का पहला पोस्ट्माडर्न नॉवेल माना जाता है. उनके दो अन्य उपन्यास शून्य की तौहीन और काँग्रेस हाउस का हिन्दी अनुवाद ‘सेतु प्रकाशन’ और ‘राजपाल एण्ड संस’ छाप चुके हैं. इसके अतिरिक्त दो उर्दू लघुकथा-संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं. पिछले दो दशकों तक भारतीय टेलिविज़न इंडस्ट्री से जुड़े रहे, जहां उन्होंने कई टीवी धारावाहिक लिखे. 2008 से उर्दू साहित्यिक पत्रिका ‘इसबात’ के संपादक पद पर कार्यरत हैं. वो मुंबई में रहते हैं. asharnajmi2020@gmail.com रिज़वानुद्दीन फ़ारूक़ी उर्दू के युवा लेखक,अनुवादक एवं स्तम्भकार हैं. आप उर्दू की बहुचर्चित त्रैमासिक पत्रिका ‘इस्बात’ के सह सम्पादक हैं. आपके द्वारा हिन्दी से उर्दू में अनूदित पुस्तक ‘एक फ़िक्शन निगार का सफ़र(शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी एवं उदयन वाजपेयी के बीच संवाद)’ उर्दू पाठकों के बीच काफ़ी लोकप्रिय हुई. इसके साथ ही आपने अशअर नजमी के उपन्यासों “सिफ़र की तौहीन” एवं “कांग्रेस हाऊस” का भी हिन्दी अनुवाद किया है और डाॅ. नुसरत मेहदी काव्य संग्रह “रक़्सां है ज़िंदगी” का संचयन एवं संकलन भी कर चुके हैं.  आप दूरदर्शन मध्य प्रदेश में उर्दू समाचार वाचक भी हैं एवं उर्दू की सुप्रसिद्ध वेबसाइट rekhta.org के लिए स्वतन्त्र रूप से शायरों एवं साहित्यकारों का परिचय एवं ब्लॉग भी लिखते हैं.
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Comments 1

  1. पुनीत श्रीवास्तव says:
    9 minutes ago

    नयापन और एक ही समुदाय के बीच के भेदभाव को बताती कहानी साथ ही हर हाथ में कैमरे के दुरुपयोग की वास्तविकता

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समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.

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