आलेख

परख : फाँस (संजीव): राकेश बिहारी

वरिष्ठ कथाकार संजीव का उपन्यास ‘फाँस’ भारतीय कृषक समाज की वर्तमान दारुण दशा पर केन्द्रित है. बड़ी संख्या में किसानों की आत्महत्या पूरे तंत्र पर सवालिया निशान है. समस्या जितनी...

विष्णु खरे : साहित्य अकादेमी का क्रांतिकारी संकल्प

२३/१०/२०१५ को साहित्य अकादेमी के कार्यकारी मंडल ने लेखकों - कलाकारों के विरोध प्रदर्शन के बीच अपना प्रस्ताव पारित किया. वरिष्ठ लेखक–आलोचक विष्णु खरे इस प्रस्ताव को अकादमी के इतिहास...

वीरेन डंगवाल : विष्णु खरे

रात नही कटती? लम्बी यह बेहद लम्बी लगती है ?इसी रात में दस-दस बारी मरना है जीना हैइसी रात में खोना-पाना-सोना-सीना है.ज़ख्म इसी में फिर-फिर कितने खुलते जाने हैंकभी मिलें...

भूमंडलोत्तर कहानी (८) : नीला घर (अपर्णा मनोज) : राकेश बिहारी

भूमंडलोत्तर कहानियों के चयन और आलोचना के क्रम में इस बार अपर्णा मनोज की कहानी ‘नीला घर’ पर आलोचक राकेश बिहारी का आलेख- ‘नीला घर के बहाने’समालोचन प्रस्तुत कर रहा...

भूमंडलोत्तर कहानी (७) : उत्तर प्रदेश की खिड़की (विमल चन्द्र पाण्डेय) : राकेश बिहारी

भूमंडलोत्तर कहानियों के चयन और चर्चा के क्रम में इस बार विमल चंद्र पाण्डेय की चर्चित कहानी ‘उत्तर प्रदेश की खिड़की’ पर आलोचक राकेश बिहारी का आलेख- ‘प्रेम, राजनीति और...

१९ वीं शताब्दी का भारतीय पुनर्जागरण: नामवर सिंह

१९ वीं शताब्दी का भारतीय पुनर्जागरण: नामवर सिंह

व्याख्यान सुनने (यहाँ पढने) का फायदा यह है कि आप एक बैठकी में ही व्याख्याता के वर्षों के अध्ययन, शोध और निष्कर्षों से सामना कर पाते हैं. व्याख्यान अगर नामवर...

भूमंडलोत्तर कहानी (६) : कायांतर (जयश्री रॉय) : राकेश बिहारी

भूमंडलोत्तर कहानी की विवेचना क्रम में इस बार आलोचक राकेश बिहारी ने जयश्री रॉय की कहानियों में ‘कायान्तर’ का चयन किया है और उसकी व्याख्या करते हुए उसमें भारतीय समाज...

लोठार लुत्से : विष्णु खरे

लोठार लुत्से : विष्णु खरे

लोठार लुत्से (Lothar Lutze) सिर्फ अनुवादक नहीं थे, वह भाषाओं के बीच पुल थे, साहित्य संवाहक थे, संस्कृतियों के जीवंत प्रवाह थे. इस जर्मन भाषा के विद्वान का ८७ वर्ष...

सबद भेद : आचरण पुस्तकें और स्त्रियाँ : गरिमा श्रीवास्तव

clare parkस्त्रियाँ पैदा नहीं होती, समाज उन्हें निर्मित करता है. बायोलाजिकल विभेद से अलग जो भी अंतर एक स्त्री को किसी पुरुष से अलग करता है उसका निर्माण समाज सदियों...

भूमंडलोत्तर कहानी (५) : पानी (मनोज कुमार पाण्डेय) : राकेश बिहारी

भूमंडलोत्तर कहानी विवेचना की श्रृंखला में आलोचक राकेश बिहारी ने  मनोज पाण्डेय की कहानी पानी को परखा है. पानी में कितना यथार्थ  है कितनी कल्पना यह इतना महत्वपूर्ण नही है...

Page 18 of 20 1 17 18 19 20

फ़ेसबुक पर जुड़ें

पठनीय पुस्तक/ पत्रिका

इस सप्ताह