ईरान में किताबों पर सेंसरशिप : यादवेन्द्र
वैज्ञानिक और हिंदी के लेखक,अनुवादक यादवेन्द्र इधर ईरान के सांस्कृतिक परिदृश्य पर कार्य कर रहें हैं. प्रस्तुत आलेख ईरानी क्रांति के बाद उभरे कट्टर धार्मिक राजनीतिक सत्ता द्वारा साहित्य पर...
वैज्ञानिक और हिंदी के लेखक,अनुवादक यादवेन्द्र इधर ईरान के सांस्कृतिक परिदृश्य पर कार्य कर रहें हैं. प्रस्तुत आलेख ईरानी क्रांति के बाद उभरे कट्टर धार्मिक राजनीतिक सत्ता द्वारा साहित्य पर...
इतिहास कुछ लोगों के लिए बेरहम होता है, चाहे वह साहित्य का ही क्यों न हो. पुरुषार्थवती देवी एवं रामेश्वरी देवी गोयल दोनों छायावाद की कवयित्रियाँ हैं. दोनों का जन्म...
फोटो : तनवीर फारूकी (साभार : आशुतोष दुबे )हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते.हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे...
कविता क्या है के साथ-साथ कविता क्यों और कैसे पढ़े भी साहित्य के बड़े सवाल हैं. ख़ासकर विमर्शों द्वारा उनके अनुकूलन और व्याख्या/दुर्व्याख्या के इस दौर में यह और प्रासंगिक बनते...
हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता की बात ‘मधुमती’ के बहाने शुरू हुई है तो अब दूर तलक जाएगी. साहित्यिक पत्रिका निकालना दीवानों का काम है. कोई अच्छा भला आदमी यह काम...
सदाशिव श्रोत्रिय ने ‘श्रेष्ठ काव्य के प्रति पाठकों की बढती अरुचि और घटती समझ को देखते हुए’ अपनी पसंद की कविताओं के भाष्य का उपक्रम इधर आरम्भ किया है. कविता...
भारत में पत्रकारिता और स्वाधीनता संघर्ष का नजदीकी रिश्ता रहा है, हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता भी इसी औपनिवेशिक विरोधी चेतना के बीच विकसित हुई. हिंदी साहित्य के एक युग का...
स्त्रियों का लेखन प्रारम्भ से ही संदेह और सवालों के घेरे में रहा है, चाहे भारत हो या यूरोप. अव्वल तो उन्हें बहुत दिनों तक सुना ही नहीं गया. सुना...
ठीक है आप कवि कर्म को महिमा मंडित नहीं करना चाहते. उसे ‘ब्रह्म सहोदर’ नहीं मानते कोई बात नहीं. पर कविता में जो असाधारणता है उसे कवि से आप अलग...
हिंदी कविता का परिसर विस्तृत है. इसमें से प्रभा मुजुमदार, अशोक सिंह और संतोष अलेक्स की कविताओं पर राहुल राजेश का यह आलेख प्रस्तुत है. कविता का प्रक्षेत्र : प्रभा...
समालोचन साहित्य, विचार और कलाओं की हिंदी की प्रतिनिधि वेब पत्रिका है. डिजिटल माध्यम में स्तरीय, विश्वसनीय, सुरुचिपूर्ण और नवोन्मेषी साहित्यिक पत्रिका की जरूरत को ध्यान में रखते हुए 'समालोचन' का प्रकाशन २०१० से प्रारम्भ हुआ, तब से यह नियमित और अनवरत है. विषयों की विविधता और दृष्टियों की बहुलता ने इसे हमारे समय की सांस्कृतिक परिघटना में बदल दिया है.
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